सोमवार, 28 सितंबर 2020

आओ फिर लौट चले

 *थोड़ा हटके.…*

*"यदि जीवन के 50 वर्ष पार कर लिए है तो अब लौटने की तैयारी प्रारंभ करें.... इससे पहले की देर हो जाये... इससे पहले की सब किया धरा निरर्थक हो जाये....."*

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*लौटना क्यों है*❓

*लौटना कहाँ है*❓

*लौटना कैसे है*❓


इसे जानने, समझने एवं लौटने का निर्णय लेने के लिए आइये टॉलस्टाय की मशहूर कहानी आज आपके साथ साझा करता हूँ :


*"लौटना कभी आसान नहीं होता"*


एक आदमी राजा के पास गया कि वो बहुत गरीब था, उसके पास कुछ भी नहीं, उसे मदद चाहिए...

राजा दयालु था.. उसने पूछा कि "क्या मदद चाहिए..?"


आदमी ने कहा.."थोड़ा-सा भूखंड.."


राजा ने कहा, “कल सुबह सूर्योदय के समय तुम यहां आना.. ज़मीन पर तुम दौड़ना जितनी दूर तक दौड़ पाओगे वो पूरा भूखंड तुम्हारा। परंतु ध्यान रहे,जहां से तुम दौड़ना शुरू करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौट आना होगा, अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा...!"  


आदमी खुश हो गया...

सुबह हुई.. 

सूर्योदय के साथ आदमी दौड़ने लगा...

आदमी दौड़ता रहा.. दौड़ता रहा.. सूरज सिर पर चढ़ आया था.. पर आदमी का दौड़ना नहीं रुका था.. वो हांफ रहा था, पर रुका नहीं था... थोड़ा और.. एक बार की मेहनत है.. फिर पूरी ज़िंदगी आराम...

शाम होने लगी थी... आदमी को याद आया, लौटना भी है, नहीं तो फिर कुछ नहीं मिलेगा...

उसने देखा, वो काफी दूर चला आया था.. अब उसे लौटना था.. पर कैसे लौटता..?

सूरज पश्चिम की ओर मुड़ चुका था.. आदमी ने पूरा दम लगाया..

वो लौट सकता था... पर समय तेजी से बीत रहा था.. थोड़ी ताकत और लगानी होगी... वो पूरी गति से दौड़ने लगा... पर अब दौड़ा नहीं जा रहा था.. वो थक कर गिर गया... उसके प्राण वहीं निकल गए...! 


राजा यह सब देख रहा था...

अपने सहयोगियों के साथ वो वहां गया, जहां आदमी ज़मीन पर गिरा था...

राजा ने उसे गौर से देखा..

फिर सिर्फ़ इतना कहा...

*"इसे सिर्फ दो गज़ ज़मीं की दरकार थी... नाहक ही ये इतना दौड़ रहा था...!"*


आदमी को लौटना था... पर लौट नहीं पाया...

वो लौट गया वहां, जहां से कोई लौट कर नहीं आता...


अब ज़रा उस आदमी की जगह अपने आपको रख कर कल्पना करें, कही हम भी तो वही भारी भूल नही कर रहे जो उसने की

हमें अपनी चाहतों की सीमा का पता नहीं होता...

हमारी ज़रूरतें तो सीमित होती हैं, पर चाहतें अनंत..

अपनी चाहतों के मोह में हम लौटने की तैयारी ही नहीं करते... जब करते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है...

फिर हमारे पास कुछ भी नहीं बचता...


अतः *आज अपनी डायरी पैन उठाये कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर अनिवार्य रूप से लिखें* ओर उनके जवाब भी लिखें

मैं जीवन की दौड़ में सम्लित हुवा था, आज तक कहाँ पहुँचा?

आखिर मुझे जाना कहाँ है ओर कब तक पहुँचना है?

इसी तरह दौड़ता रहा तो कहाँ ओर कब तक पहुँच पाऊंगा? 


*इस पोस्ट को भले लाइक ना करे, कॉमेंट ना करें आगे साझा ना करें पर मेरा विनम्र निवेदन है इन प्रश्नों के जवाब लिखित में अवश्य नॉट कर ले यही मेरी पोस्ट की सार्थकता होगी, की हम सबके जीवन को दिशा मिल जाये... हम लौटने की तैयारी कर पाए*


हम सभी दौड़ रहे हैं... बिना ये समझे कि सूरज समय पर लौट जाता है...

अभिमन्यु भी लौटना नहीं जानता था... हम सब अभिमन्यु ही हैं.. हम भी लौटना नहीं जानते...


सच ये है कि "जो लौटना जानते हैं, वही जीना भी जानते हैं... पर लौटना इतना भी आसान नहीं होता..."


*काश टॉलस्टाय की कहानी का वो पात्र समय से लौट पाता...!*


*"मै ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि  हम सब लौट पाए..! लौटने का विवेक, सामर्थ्य एवं निर्णय हम सबको मिले.... सबका मंगल होय...."*

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बुधवार, 23 सितंबर 2020

महाभारत के नौ सूत्र सार

महाभारतो इस तरह पढ़े 

 यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय न हो तो भी इसके नौ सार- सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं:-


कौरव 


1.संतानों की गलत मांग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे


कर्ण 


2.आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हों, तो आपकी विद्या, अस्त्र-शस्त्र-शक्ति और वरदान सब निष्फल हो जायेगा


अश्वत्थामा 


3.संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे. 


भीष्म पितामह 


4.कभी किसी को ऐसा वचन मत दो  कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े. 


दुर्योधन 


5.संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है. 


धृतराष्ट्र 


6.अंध व्यक्ति- अर्थात मुद्रा, मदिरा, अज्ञान, मोह और काम ( मृदुला) अंध व्यक्ति के हाथ में सत्ता भी विनाश की ओर ले जाती है. 


अर्जुन 


7.यदि व्यक्ति के पास विद्या, विवेक से बंधी हो तो विजय अवश्य मिलती है. 


शकुनि 


8. हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते 


युधिष्ठिर 


9.यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता पूर्वक पालन करेंगे, तो विश्व की कोई भी शक्ति आपको पराजित नहीं कर सकती. 


यदि इन नौ सूत्रों से सबक लेना सम्भव नहीं होता है तो जीवन में महाभारत संभव हो जाता है।

शनिवार, 19 सितंबर 2020

लघुकथा के साहनी / सुभाष नीरव

लघुकथा संसार 

 कथाकार मित्र सुकेश साहनी मुझसे बेशक आयु में तीन वर्ष छोटे हों, पर लेखक के तौर पर मेरे अग्रज और वरिष्ठ हैं। मुझे साहनी जी की लघुकथाएं प्रारम्भ से प्रभावित करती रही हैं और मैं इनकी अनेक लघुकथाओं को लघुकथा के मानक के रूप में  लेता रहा हूं। लघुकथा में  बारीकी और उसकी गुणवत्ता को कैसे अपने रचनात्मक कौशल से रचा - बुना जा सकता है, यह मैंने सुकेश साहनी की लघुकथाओं से सीखने की कोशिश की। कुछ नाम और हैं जैसे रमेश बतरा,  भगीरथ, सूर्यकांत नागर, बलराम अग्रवाल जिनकी लघुकथाओं ने मुझे सीखने - समझने की भरपूर ज़मीन दी। सुकेश भाई की न केवल लघुकथाएं, बल्कि इनकी कहानियां भी मुझे उद्वेलित और प्रेरित करती रही हैं। इनके भीतर का कथाकार ' कहानी ' और ' लघुकथा ' दोनों को साधने में सिद्धहस्त है। यही कारण है कि सुकेश मुझसे उम्र में छोटे होने के बावजूद मुझसे बड़े हैं। इनकी विनम्रता का तो मैं कायल हूं। बहुत से लघुकथा सम्मेलनों में मिलने और एक साथ मंच साझा करने का मुझे अवसर मिला है।  इनकी नई आलोचना पुस्तक "लघुकथा : सृजन और रचना - कौशल" कल मुझे डाक में मिली।     इसमें लघुकथाओं, लघुकथा संकलनों, लघुकथा संग्रहों को लेकर और विशेषकर कथादेश की अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिताओं को लेकर समय - समय पर लिखे आलेख संकलित किए गए हैं। ये सभी महत्वपूर्ण आलेख इधर - उधर बिखरे हुए थे, उन्हें एक जगह एक किताब में उपलब्ध कराया गया है, जिसे मैं ज़रूरी भी मानता हूं।  

इस किताब को हमारे प्यारे मित्र भूपाल सूद (अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली) ने छापा है। वह आज हमारे बीच नहीं हैं, पर न जाने क्यों सुकेश भाई की अयन प्रकाशन से छप कर अाई इस किताब को छुआ, तो यूं लगा जैसे भूपी भाई को छुआ हो, यह छुअन बहुत अपनी सी लगी, जैसे वह जब मिलते थे, मुस्कराते हुए हाथ बढ़ाकर सीधे गले लगा लेते थे, ठीक वैसी ही आत्मीय सी छुअन ! 

हार्ड बॉन्ड में 150 पेज की इस किताब की कीमत 300 रुपए है।

बहरहाल, भाई सुकेश साहनी जी को दिल से बधाई। 

- सुभाष नीरव

19 सितम्बर 2019

बुधवार, 2 सितंबर 2020

🙏 दाता की दया है 🙏

  *हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं ।*


 *इस  संसार के हालातों से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।* 


सुन रहा हूं सत्संग आपकी दया व मेहर से ।

उठा रहा हूं रुहानी लाभ इन बंदिशों में भी।।


अविष्कारों  का उपयोग करना तो अब सीख रहा हूं ।

मगर तेरे दर्शन के वियोग में सब बेरंग महसूस  किये जा रहा हूं ।।


हे मेरे दाता अब और सहा नही  जाता ।

तेरे दर्शन के बिना मेरा मन बार बार बेचैनी से भर जाता ।।


मिल रही है भरपूर दया ई सत्संग शब्द सुनने की ।

मगर पूरी नहीं होती हसरत तुझसे मिलने की ।।


मुझे अपने चरणों में लगा लें दाता ।

मैं तेरा दास हूं मुझे बुला ले दाता ।।


दाता तेरे दर्शन को मैं तरस गया हूं ।

मैं सत्संग रोज सुनकर अपने आप को रोक रहा हूं ।।


दिल करता है कि तेरे दर पे दौड़ आऊं, सब बंधन तोड़कर ।

मगर तेरे आदेशों का पालन कर अपने आप को रोक रहा हूँ ।।


*हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं।*

*इस संसार के हालात से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।*


प्राथना कुल मालिक के चरणों में


(SANT ADHAR BARODA BRANCH)



*दाता जी की दया है*


दाता जी की दया है

कि हम सब बेख़ौफ़ जुड़े हैं

 सत्संग  सुनने को मिल रहा है

और घर बैठे दर्शन भी मिल रहा है।


बस दाता जी की दया है

खेतों की सेवा का यह नया रूहानी  आलम है।


दया मेहर की पर्चे और सुपरमैन नस्ल की मिसाल है।

निर्मल अमृत दूध का प्रसाद दया की दया धार है।।

चाय , टोस्ट, फ्लेवर्ड मिल्क, और मक्खन, सूरत की अपनी ही खुराक है।

 

बस दाता जी की दया है


दयालबाग की जीवन शैली, दुनिया में है बेमिसाल

कर लो फौलो इसको, तुम भी हो जाओ मालामाल।

बन सुपरमैन सत्संग के, सब कुछ हमको करना है

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र के, सब गुणों को अपने में धारण करना  है।


अगर हो दया दाता दयाल की तो उनके चरणों में पूरा जीवन अर्पण कर दूंगा। रहमत के आश्रय राधा स्वामी मिशन में अपनी सारी सांसे कुर्बान कर दूंगा । 


बस रहमत हो उस कुल मालिक की मालिक की, अपनी जान लगा दूंगा।




Writer - SANT ADHAR BARODA BRANCH MGRSA

प्रेम उपदेश

 प्रेम उपदेश:-(परम गुरु हुज़ूर महाराज)

19. जिस किसी सच्चे प्रेमी का यह हाल है कि जब किसी की भक्ति की बढ़ती का हाल सुनता है, तब ही अपनी ओछी हालत से मिला कर सुस्त और फ़िक्रमंद हो जाता है, सो यह बहुत अच्छा है और यह निशान दया का है। इसी तरह इस जीव को ख़बर पड़ती है और अपनी हालतों को देखता है और अपने मत को चित्त से सुनता है और विचारता है। ग़रज़ कि इसमें सब तरह की गढ़त है, इसको दया समझो।

20. जो वक्त़ ध्यान और भजन के बजाय स्वरूप सतगुरु के कुटुम्बी और मित्रों की सूरतें नज़र आवें, उसका सबब यह है कि वह स्वरूप अभी हिरदे में धरे हैं, आहिस्ता आहिस्ता निकल जावेंगे। हुज़ूर राधास्वामी दयाल अपनी दया से सब तरह सफ़ाई करते हैं।

21. हुज़ूर राधास्वामी दयाल सब तरह से जीवों पर दया कर रहे हैं। और दया के भी अनेक रूप हैं, जैसे उदासी तबीयत की भी एक तरह की दया है। हर एक को यह उदासीनता नहीं मिलती। इसमें भी कुछ भेद है। ऐसा नहीं होता कि हर वक्त़ तबीयत सुस्त रहे, पर किसी क़दर सुस्ती और उदासीनता रहने से बड़े फ़ायदे हैं।    

  22. हुज़ूर राधास्वामी दयाल आप सबको अंतर में सँभालते हैं, पर एक सतसंगी दूसरे सतसंगी का हाल देख कर जो अपनी समझ के मुवाफ़िक़ कोई बचन समझौती का सुझावे, तो उसमें कुछ हर्ज नहीं है। पर इतना कहना सब के वास्ते ठीक है कि हुज़ूर राधास्वामी दीनदयाल और समर्थ हैं और जिस जिस ने उनके चरनों की सरन सच्ची ली है, उसकी फ़िक्र और ख़बरगीरी वे आप करते हैं। पर उनकी दया की सूरतें अनेक हैं और वे सच्चे प्रेमी और बिरही को, जो निरख परख के साथ चलता है, अंतर और बाहर जल्द मालूम पड़ती हैं।.                              23. जैसी हालत जिस किसी सच्चे प्रेमी पर जब तब गुज़रती है, वह हुज़ूर राधास्वामी दयाल की मौज और दया से है और उस हालत में हुज़ूर राधास्वामी दयाल अपनी मेहर से आहिस्ता आहिस्ता तरक़्क़ी परमार्थ की बख़्शते जावेंगे, यानी कोई दिन सुस्ती और बेकली और कोई दिन आनंद और मगनता। यह दोनों हालतें संग संग चलेंगी। बेकली और घबराहट और सुस्ती ऐसी है जैसी सूरज की गर्मी, और शांति और आनंद, जो उसके पीछे प्राप्त होवे, वह ऐसा है जैसे वर्षा मेघ की। इन दोनों का आपस में जोड़ और संग है, सो किसी को घबराना नहीं चाहिए। और बहुत जल्दी करना भी मुनासिब नहीं है, क्योंकि मनुष्य की जल्दी से कुछ कारज नहीं बन सकता है। हुज़ूर राधास्वामी समर्थ दयाल प्रेमी और दर्दी भक्तों की चाह के मुवाफ़िक़ बहुत जल्दी काम बनाते हैं, पर इस दया की ख़बर धीरे धीरे मालूम पड़ेगी। शुरू में इसकी परख बहुत कम होती है। 

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

आजकल में नवल की आलोचना

 रेणु  की यादों में नवल 

नंदकिशोर नवल अगर हमारे बीच होते तो आज हम उनका 83 वां जन्मदिन मना रहे होते। बीती लगभग आधी सदी तक हिंदी साहित्य, खासकर कविता आलोचना के वे न केवल साक्षी रहे बल्कि उसके सक्रिय मार्ग-निर्धारक भी बने रहे। उन्होंने अपने आलोचकीय लेखन की शुरुआत छायावाद और उत्तर छायावाद से की। इसके बाद राजकमल चौधरी के प्रभाव में अकविता तथा अन्य प्रयोगवादी  कविता धाराओं के  वे प्रशंसक रहे और उनपर धाराप्रवाह लिखा।  राजकमल चौधरी की लंबी कविता 'मुक्ति प्रसंग' की उनकी व्याख्या कविता आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। इसके जरिये वे 'मुक्ति प्रसंग' को 'अंधेरे में' के बाद हिंदी कविता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में स्थापित करते हैं।


     आगे चलकर नवलजी नक्सलवाद से भी प्रभावित हुए और उसके प्रभाव में आकर लिखी गई रचनाओं की व्याख्या और मीमांसा की। फिर वे मार्क्सवाद की ओर प्रवृत्त हुए और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़कर प्रगतिशील और मार्क्सवादी  चिंतन से जुड़ी आलोचना की। इस दौरान प्रगतिशील चेतना वाले कवि मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर आदि उनके प्रिय रचनाकार बने रहे।  सोवियत संघ के विघटन के बाद उन्होंने खुद को  प्रगतिशील विचारधारा से अलग कर लिया। इस अलगाव के  साथ ही उन्होंने खुद को  प्रगतिशीलता और गैरप्रगतिशीलता, कथ्य और रूप आदि के विभाजन से भी अलग कर लिया। उसके बाद का नवलजी का आलोचकीय लेखन पाठ-केंद्रित है। आलोचकीय सैद्धांतिकी से अलग होकर उन्होंने अपनी पाठ-आधारित निजी सैद्धांतिकी विकसित की। इस दृष्टि से यदि उन्हें आलोचना का वैचारिक यात्री कहा जाए तो शायद गलत न होगा। 

 

     उनकी आलोचना दृष्टि में आए इस परिवर्तन को लेकर लेखक बिरादरी में तीखी प्रतिक्रिया हुई एक और जहाँ उनके मित्रों ने इसे 'आलोचना का नवल पक्ष' कह कर  अभिहित किया वहीं दूसरी ओर इसे जनधर्मी वैचारिकता से पलायन और उनके कलावादी रुझान के रूप में भी देखा गया।  इस वैचारिक दिशा परिवर्तन के बाद वे सभी कवि जो पहले उन्हें कलावादी और रूपवादी प्रतीत होते थे, उनके प्रिय बन गए। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त से लेकर दिनकर, अज्ञेय और अशोक वाजपेयी की कविताओं की भी समालोचना की।


     मैथिलीशरण गुप्त, निराला और मुक्तिबोध को वे आधुनिक हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवि मानते थे। उनका मानना था कि इन्हीं को लेकर आधुनिक हिंदी कविता की बृहद्त्रयी बनती है। वे कहते थे कि ये तीनों तीन युग का प्रतिनिधित्व करने वाले और हिंदी कविता को नया मोड़ देने वाले कवि हैं।


      अब कम लोग ही इस बात की चर्चा करते हैं कि कविता आलोचना का यह दिलचस्प यात्री स्वयं एक सुकवि था। उनके आलोचना कर्म ने इस सुकवि को पूरी तरह आच्छादित कर दिया। इसकी थोड़ी-बहुत कसक नवलजी को भी थी। अपने दूसरे कविता संग्रह ‘कहाँ मिलेगी पीली चिड़िया’ की अभियुक्ति में वे लिखते हैं कि ‘यह संग्रह अपने कवि जीवन की स्मृति स्वरूप प्रकाशित करा रहा हूँ।’ स्पष्टतः अपने कवि जीवन से उन्हें आत्मीय लगाव था और कविताई बार-बार अपनी ओर खींचती थी। हालाँकि वे कविता से बहुत दूर नहीं थे। आलोचना भी उन्होंने कविता की ही की।


      नवलजी का पहला कविता संग्रह ‘मंजीर’ सन्  1954 में प्रकाशित हुआ था। मंजीर को कविता संग्रह कहने से बेहतर होगा कविता पुस्तिका कहना। 24 पृष्ठों की इस पुस्तिका में नवलजी की आरंभिक 25 कविताएँ संकलित थीं। नवलजी नामवर सिंह, राजेंद्र यादव, विश्वनाथ त्रिपाठी आदि की तरह आगे चलकर कविता कर्म से पूरी तरह विमुख नहीं हुए। आलोचना में तल्लीन हो जाने के बावजूद उनका कविता कर्म भी निरंतर जारी रहा। छठे दशक में हिंदी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हुईं। उनका दूसरा कविता संग्रह चार दशकों के अंतराल पर सन् 1997 में ‘कहाँ मिलेगी पीली चिड़िया’ के नाम से प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी 143 कविताएँ शामिल हैं। इसके बाद ‘जनपद’ में सन् 2006 और ‘द्वाभा’ में सन् 2010 में उनकी कुल 40 कविताएँ प्रकाशित हुईं। नवलजी के 75वें जन्मदिवस के मौके पर श्याम कश्यप के संपादन में 2012 में ‘नील जल कुछ और भी धुल गया’ का प्रकाशन हुआ जिसमें उनकी प्रतिनिधि कविताएँ संकलित की गई थीं। इस तरह हम देखते हैं कि नंदकिशोर नवल आलोचना के और संपादन से समय निकालकर बीच-बीच में कविताओं की रचना भी करते रहे। हालाँकि उन्होंने इन कविताओं को स्वांतः सुखाय ही माना।


      उनके मित्र श्याम कश्यप का मानना है कि नवलजी की एक संवेदनशील समालोचक के रूप में ‘ख्याति के घनीभूत प्रकाश ने उनकी कविता को लगभग ढक लिया’ लेकिन साथ ही वे जोर देकर कहते हैं कि केवल ‘उनकी कविता को ही। आलोचक के भीतर छिपे सुकवि को नहीं। अंधकार ही नहीं, कभी-कभी तीव्र प्रकाश भी अपनी चकाचौंध से चीजों को ढककर छिपा देता है’। 


      अपने पहले कविता संग्रह में संकलित 25 कविताएँ नवलजी ने 15-16 वर्ष की अवस्था में लिखी थी। इस छोटे से संग्रह की कविताओं से उनकी समझ, संवेदन और सामर्थ्य की झलक मिल जाती है। संभवत यही वजह थी कि इसकी भूमिका में ब्रजकिशोर नारायण ने लिखा, ‘मंजीर की सभी रचनाओं को आद्योपांत अच्छी तरह पढ़ जाने के बाद मैं यह कहने का लोभ और साहस संवरण नहीं कर सकता कि पंद्रह-सोलह की यह अर्द्धस्फुटित प्रतिभा, निकट भविष्य में ही, अनेक प्रौढ़ों के समक्ष प्रश्न-चिह्न बनकर खड़ी होगी और उन्हें अपनी ओर आकर्षित होने को विवश करेगी।’ निश्चय ही विभिन्न संग्रहों और पत्रिकाओं के विशेष आयोजनों में प्रकाशित नवलजी की 200 से ऊपर कविताओं के अलावा उनकी अनेक कविताएँ अभी अप्रकाशित होंगी जिनका संकलन शीघ्र प्रकाश में आएगा।

जीवन के 80वें पड़ाव पर पहुँचने के अवसर पर ‘आजकल’ ने उनके आलोचना कर्म को रेखांकित करने वाली कुछ सामग्री प्रकाशित की थी। तब कहाँ पता था कि इतनी जल्दी, महज तीन साल बाद, अपने 83वें जन्मदिन पर वे भौतिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं रहेंगे। 


      नवलजी के समग्र साहित्यिक अवदान की चर्चा किसी पत्रिका के एक अंक में समेट पाना कठिन है। यह जानते समझते हुए ‘आजकल’ ने अपना सितंबर 2020 का अंक नंदकिशोर नवल के समग्र आलोचकीय और रचनात्मक अवदान पर केंद्रित किया है।

सेवा धर्म ही असली भक्ति*

 *एक शहर में अमीर सेठ रहता था।  वह बहुत फैक्ट्रियों का मालिक था। एक शाम अचानक उसे बहुत बैचेनी होने लगी। डॉक्टर को बुलाया गया सारी जाँचें करव...