शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

शेरजंग गर्ग की कविताएं

                          
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क्या हो गया कबीरों को / शेरजंग गर्ग
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क्या हो गया कबीरों को / शेरजंग गर्ग
ग़लत समय में सही बयानी / शेरजंग गर्ग
खुद से रूठे हैं हम लोग / शेरजंग गर्ग
आदमी हर तरह लाचार है / शेरजंग गर्ग
सतह के समर्थक समझदार निकले / शेरजंग गर्ग
आदमी की अज़ीब सी हालत है / शेरजंग गर्ग
हौंसलों में फ़कत उतार सही / शेरजंग गर्ग
आवाज़ आ रही है / शेरजंग गर्ग
मत पूछिए क्यों / शेरजंग गर्ग
कोई शहर गुमशुदा है / शेरजंग गर्ग
काफ़ी नहीं तुम्हारा / शेरजंग गर्ग
दर्द की चाशनी है / शेरजंग गर्ग
मेरे समाज की हालत / शेरजंग गर्ग
स्वच्छ, सजग अधिकार कहाँ / शेरजंग गर्ग
सब करार को तरसे / शेरजंग गर्ग
काँच निर्मित घरों के / शेरजंग गर्ग
ऐसी हालत मे क्या किया जाए / शेरजंग गर्ग
हम क्यों न सबको ठीक तरज़ू पे तोलते / शेरजंग गर्ग
बुझ गई रोशनी / शेरजंग गर्ग
चोटियों में कहाँ गहराई है / शेरजंग गर्ग
खुश हुए मार कर ज़मीरों को / शेरजंग गर्ग
जब पूछ लिया उनसे / शेरजंग गर्ग
न पूछिए हम कहाँ से / शेरजंग गर्ग
आप कहने को बहुत ज्यादा बड़े है / शेरजंग गर्ग
चन्द सिक्को की खुराफ़ात से क्या होना है / शेरजंग गर्ग
नर्म रहकर न यहाँ बैठना, न चलना होगा / शेरजंग गर्ग
महाजनो के ऊँचे तर्क / शेरजंग गर्ग
सारे जलते प्रश्न खो गए / शेरजंग गर्ग
हारे पहुँचे हुए वकील / शेरजंग गर्ग
पा गए लोग बड़े पद प्यारे / शेरजंग गर्ग
देश को शौक से खाते रहिए / शेरजंग गर्ग
देस-परदेस में जनतंत्र का हंगामा है / शेरजंग गर्ग
हम तिकड़मों के बल पर शासन सम्भालते हैं / शेरजंग गर्ग
देश चारो ओर धू-धू जल रहा है / शेरजंग गर्ग
गम का पर्वत, तम का झरना / शेरजंग गर्ग
लोग क्यो व्यर्थ हमसे जलते है / शेरजंग गर्ग
मंज़िलो की नज़र में रहना है / शेरजंग गर्ग
ज़िन्दगी-सी यों ज़िन्दगी भी नहीं / शेरजंग गर्ग
आपको खास जगह जाना है / शेरजंग गर्ग
मेरा सवाल है, न तुम्हारा सवाल है / शेरजंग गर्ग
होश की बात बड़ी बात है / शेरजंग गर्ग
एक खास काम कर रहा है आम आदमी / शेरजंग गर्ग
ये जो कुछ ज़ख़्म खिले है यारों / शेरजंग गर्ग
साल आकर बड़ी तेज़ी से गुज़र जाते है / शेरजंग गर्ग
सादगी की मिसाल हो तुम तो / शेरजंग गर्ग
नयन है नशीले नज़रों से परिचित / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
तुम्ही मिल गए हो डगर के बहाने / शेरजंग गर्ग
न करता शिकायत ज़माने से कोई / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
भ्रमर को मिला जब सुमन का निमंत्रन / शेरजंग गर्ग
तुम अगर बेकरार हो जाते / शेरजंग गर्ग
दूर बैठा हूँ हर हक़ीक़त से / शेरजंग गर्ग
अब तो कहने के लिए शेष कोई बात नहीं / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
फूलो की बेकरार निगाको के आसपास / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
सपनो की धूमिल छाया का आकार न भूलूंगा हरगिज़ / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
न देखो पीर उर की पर अधर की प्यास तो देखो / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
ग़लत समय में सही बयानी / शेरजंग गर्ग
खुद से रूठे हैं हम लोग / शेरजंग गर्ग
आदमी हर तरह लाचार है / शेरजंग गर्ग
सतह के समर्थक समझदार निकले / शेरजंग गर्ग
आदमी की अज़ीब सी हालत है / शेरजंग गर्ग
हौंसलों में फ़कत उतार सही / शेरजंग गर्ग
आवाज़ आ रही है / शेरजंग गर्ग
मत पूछिए क्यों / शेरजंग गर्ग
कोई शहर गुमशुदा है / शेरजंग गर्ग
काफ़ी नहीं तुम्हारा / शेरजंग गर्ग
दर्द की चाशनी है / शेरजंग गर्ग
मेरे समाज की हालत / शेरजंग गर्ग
स्वच्छ, सजग अधिकार कहाँ / शेरजंग गर्ग
सब करार को तरसे / शेरजंग गर्ग
काँच निर्मित घरों के / शेरजंग गर्ग
ऐसी हालत मे क्या किया जाए / शेरजंग गर्ग
हम क्यों न सबको ठीक तरज़ू पे तोलते / शेरजंग गर्ग
बुझ गई रोशनी / शेरजंग गर्ग
चोटियों में कहाँ गहराई है / शेरजंग गर्ग
खुश हुए मार कर ज़मीरों को / शेरजंग गर्ग
जब पूछ लिया उनसे / शेरजंग गर्ग
न पूछिए हम कहाँ से / शेरजंग गर्ग
आप कहने को बहुत ज्यादा बड़े है / शेरजंग गर्ग
चन्द सिक्को की खुराफ़ात से क्या होना है / शेरजंग गर्ग
नर्म रहकर न यहाँ बैठना, न चलना होगा / शेरजंग गर्ग
महाजनो के ऊँचे तर्क / शेरजंग गर्ग
सारे जलते प्रश्न खो गए / शेरजंग गर्ग
हारे पहुँचे हुए वकील / शेरजंग गर्ग
पा गए लोग बड़े पद प्यारे / शेरजंग गर्ग
देश को शौक से खाते रहिए / शेरजंग गर्ग
देस-परदेस में जनतंत्र का हंगामा है / शेरजंग गर्ग
हम तिकड़मों के बल पर शासन सम्भालते हैं / शेरजंग गर्ग
देश चारो ओर धू-धू जल रहा है / शेरजंग गर्ग
गम का पर्वत, तम का झरना / शेरजंग गर्ग
लोग क्यो व्यर्थ हमसे जलते है / शेरजंग गर्ग
मंज़िलो की नज़र में रहना है / शेरजंग गर्ग
ज़िन्दगी-सी यों ज़िन्दगी भी नहीं / शेरजंग गर्ग
आपको खास जगह जाना है / शेरजंग गर्ग
मेरा सवाल है, न तुम्हारा सवाल है / शेरजंग गर्ग
होश की बात बड़ी बात है / शेरजंग गर्ग
एक खास काम कर रहा है आम आदमी / शेरजंग गर्ग
ये जो कुछ ज़ख़्म खिले है यारों / शेरजंग गर्ग
साल आकर बड़ी तेज़ी से गुज़र जाते है / शेरजंग गर्ग
सादगी की मिसाल हो तुम तो / शेरजंग गर्ग
नयन है नशीले नज़रों से परिचित / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
तुम्ही मिल गए हो डगर के बहाने / शेरजंग गर्ग
न करता शिकायत ज़माने से कोई / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
भ्रमर को मिला जब सुमन का निमंत्रन / शेरजंग गर्ग
तुम अगर बेकरार हो जाते / शेरजंग गर्ग
दूर बैठा हूँ हर हक़ीक़त से / शेरजंग गर्ग
अब तो कहने के लिए शेष कोई बात नहीं / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
फूलो की बेकरार निगाको के आसपास / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
सपनो की धूमिल छाया का आकार न भूलूंगा हरगिज़ / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)
न देखो पीर उर की पर अधर की प्यास तो देखो / शेरजंग गर्ग (अब तक बनाया नहीं)

अदम गोंडवीकी कविता


Hindi Literature

मैं चमारों की गली में ले चलूंगा आपको / अदम गोंडवी

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CHANDER
आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी की कुएं में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी खामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेिड़या है घात में
होनी से बेखबर कृष्ना बेखबर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हंस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आखिर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पांव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे जिन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुंह काला करें
बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पांव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारो के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गंवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गांव की गलियों में क्या इज्जत रहे्रगी आपकी´
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूंछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हां मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर जोर था
भोर होते ही वहां का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
`जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने´
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर `माल वो चोरी का तूने क्या किया´
`कैसी चोरी माल कैसा´ उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
`मेरा मुंह क्या देखते हो ! इसके मुंह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूंक दो´
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहां चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुंहा बच्चा व बुड्ढा जो वहां खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे
´´ कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएं नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूं कोई कहीं जाए नहीं ´´
यह दरोगा जी थे मुंह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े ``इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा
इक सिपाही ने कहा ``साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें´´
बोला थानेदार ``मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उनझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है´´

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
`कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल ´
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूं आएं मेरे गांव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छांव में
गांव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहां पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !

कबीर का ब्राह्मण से संवाद / कॅंवल भारती


9
बुद्ध और ब्राह्मण का संघर्ष ‘वर्ण-संघर्ष’ के सिवा कुछ नहीं था
कॅंवल भारती
ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहिं।
उरझि-पुरझि करि मरि रह्या, चारिउ वेदा माँहि।।
(क.ग्र. पृष्ठ 28)
कहु पाँडे कैसी सुचि कीजै।
        सुचि कीजै तौ जनम न लीजै।।
(वही, पृष्ठ 129)
ब्राह्मण के साथ कबीर का अत्यन्त तीखा संवाद है। उसे देखकर ऐसा लगता है, जैसे एक महासंग्राम था कबीर और ब्राह्मण के बीच। क्या यह महासंग्राम नेतृत्व को लेकर था? यदि हाँ, तो नेतृत्व की यह लड़ाई किस क्षेत्र में थी? ब्राह्मण हिन्दू धर्म, समाज और सत्ता तीनों का अगुवा था। क्या कबीर उससे यह अगुवाई छीनना चाहते थे? अवश्य ही ऐसा नहीं था। ‘ना हिन्दू और ना मुसलमान’ चेतना के कबीर को ब्राह्मण के हिन्दुओं का नेतृत्व करने पर कोई ऐतराज नहीं था। वह शाक्तों, शैवों, वैष्णवों, सिद्ध – योगियों का भी नेतृत्व कर रहा था, इससे भी उन्हें कोई समस्या नहीं थी। उन्हें समस्या इस बात को लेकर थी कि ब्राह्मण दलित जातियों का भी नेता बन रहा था। ब्राह्मण का ‘हिन्दू देव’ बना रहना ठीक था, पर कबीर उसे ‘भू-देव’ नहीं बनने देना चाहते थे। आठवीं-नौवीं सदी में शंकराचार्य हुए, जिन्हें ब्राह्मणों ने ‘जगदगुरु’ की पदवी दी। यह पदवी उनके बाद भी चलती रही, न केवल कबीर के समय में, बल्कि वह आज भी चल रही है। ब्राह्मण उन्हें सम्पूर्ण जगत का गुरु मानते थे, जिनमें सम्पूर्ण हिन्दुओं के साथ-साथ दलित जातियों को भी उसमें शामिल कर लिया गया था। इसलिये कबीर ने सबसे पहला प्रहार इसी धरणा पर किया। उन्होंने कहा-
ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहिं।
उरझि-पुरझि करि मरि रह्या, चारिउ वेदा माँहि।।
(वही, पृष्ठ 28)
यहाँ ‘साधु’ कबीर ने अपने निर्गुणधर्मी साध्ुओं को कहा है। यह साखी ‘जगदगुरु’ की पदवी का भी खण्डन करती है। यद्यपि 15वीं सदी में किसी जगदगुरु शंकराचार्य की उपस्थिति का पता नहीं चलता, पर यह एक धारणा थी, जिसे मनु ने हिन्दुओं के मनों में स्थापित किया था कि ब्राह्मण सारे संसार का गुरु है। कबीर पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने ब्राह्मण की विश्व गुरु की धारणा को खण्डित कर दिया था। यहाँ यह सवाल उठाया जा सकता है कि बुद्ध और सिद्धों ने भी ब्राह्मण का खण्डन किया है। इस प्रसंग में दो बातें समझने की हैं। पहली, यह कि बुद्ध द्विज श्रेणी में आते हैं और सिद्धों में केवल सरहपाद ने ब्राह्मण का खण्डन किया है, जिनके ‘ब्राह्मण’ वर्ण का होने पर विवाद है। बुद्ध ने ब्राह्मण का खण्डन क्षत्रिय को उसके स्थान पर स्थापित करने के लिये किया था। उन्होंने वर्ण व्यवस्था का खण्डन नहीं किया था, बल्कि उसे गुण-कर्म के आधार पर स्वीकार किया था। ‘धम्मपद’ में ‘ब्राह्मण बग्ग’ में कहा गया है कि ‘‘माता की योनि से उत्पन्न होने के कारण किसी को मैं ब्राह्मण नहीं कहता। यदि वह धन सम्पन्न है, तो केवल ‘भो-वादी’ है। मैं ब्राह्मण उसे कहता हूँ, जो अपरिग्रही और त्यागी है।’’ (26/14) किन्तु, इसी ‘वग्ग’ में बुद्ध, ठीक मनु के शब्दों में यह भी कहते हैंµ ‘‘ब्राह्मण पर प्रहार नहीं करना चाहिये। जो ब्राह्मण को मारता है, उसे धिक्कार है।’’ (26/7) अतः बुद्ध और ब्राह्मण का संघर्ष ‘वर्ण-संघर्ष’ के सिवा कुछ नहीं था। क्षत्रिय और ब्राह्मणों के बीच ऐसे वर्ण-संघर्ष को डा. आंबेडकर ने अपनी रचनाओं में काफी रेखांकित किया है। (वाघमय, खण्ड-7, अ.-11) यद्यपि सरह का ब्राह्मण होना प्रमाणित नहीं होता, पर विद्वान उन्हें ब्राह्मण ही मानते हैं। ब्राह्मण के खण्डन में उनका यह दोहा मिलता हैµ
ब्रम्हणेति य जानन्तहि भेउ।
एवइ पढिअउ ए च्चड वेउ।।
(दो.को., पृष्ठ 2)
अर्थात्- ब्राह्मण चारों वेद यों ही पढ़ लेता है, उसका अर्थ नहीं जानता।
यह ब्राह्मण का खण्डन नहीं है, बल्कि इसमें सरह यह कहते हैं कि ब्राह्मण वेदों को अर्थ के साथ नहीं पढ़ता, इसलिये धर्म-अधर्म को नहीं जानता। अतः न तो बुद्ध और न सिद्ध सरह ही ब्राह्मण की सर्वश्रेष्ठता, सर्वोच्चता और गुरुता का खण्डन करते हैं। यह कबीर ही हैं, जो जन्मना ही नहीं, कर्मणा भी, ब्राह्मण की गुरुता को स्वीकार नहीं करते। कबीर के ठीक पाँच सौ साल बाद इतिहास अपने को दोहराता है, जब कबीर की भाषा में डाॅ. आंबेडकर ब्राह्मण की श्रेष्ठता को चुनौती देते हैं। (वाघमय, खण्ड-14, दे. प्रस्तावना)
क्हा जाता है कि कबीर के समय में हिन्दुओं के नेता रामानन्द थे। वे बनारस मंे भक्ति आन्दोलन के अगुवा थे। उनके सम्बन्ध में हिन्दी के विद्वानों ने खूब कहानियाँ गढ़ी हैं, यथा वे जाति-पाँति नहीं मानते थे और जाति का ख्याल किये बिना उन्होंने शूद्रों को भी भक्ति-साधना में दीक्षित किया था। ऐसी कहानियाँ इन विद्वानों ने कबीर को उनका शिष्य बताने के लिये गढ़ी हैं। हकीकत यह थी कि रामानन्द जाति-पांति के न केवल कट्टर समर्थक थे, वरन् उसका पालन भी करते थे। वे अछूत की छाया से भी बचकर रहते थे। इसका प्रमाण हमें ‘भक्त कल्पद्रुम’ में ही मिलता है, (पृष्ठ 316) जिसमें कहा गया है कि जब रामानन्द ने यह सुना कि कबीर स्वयं को उनका चेला बता रहा है, तो उन्होंने उसे पकड़वा कर बुलाया और परदा डलवा कर कबीर से बात की कि उन्होंने कब उसे अपना चेला बनाया है? (प्रवर, पृष्ठ 31)
दरअसल ब्राह्मण के रूप में कबीर का संवाद रामानन्द से ही हुआ है। यह उसी तरह का विचारोत्तेजक संवाद है, जैसा कि बीसवीं सदी मंे गाँधी के साथ डाॅ. आंबेडकर का हुआ था। यदि हम कबीर-ब्राह्मण संवाद को दृष्टि में रखकर आंबेडकर गाँधी विवाद का अध्ययन करेंगे, तो सचमुच हमें इतिहास की पुनरावृत्ति होती हुई प्रतीत होती है।
कबीर ने रामानन्द को गुरु मानने से इनकार किया था। इसका अर्थ है, कबीर ने दलित जातियों की ओर से उनके नेतृत्व को चुनौती दी थी। इस तथ्य को समझने के लिये कबीर की इस साखी पर विचार करने की जरूरत हैµ
साषत ब्राम्हण जिनि मिलै, बैसनौ मिलौ चंडाल।
अंक माल दै भेंटिये, मानूँ मिलै गोपाल।।
(क.ग्र., पृष्ठ 28)
डा. युगेश्वर के ‘कबीर समग्र’ में यह साखी कुछ परिवर्तन के साथ इस प्रकार मिलती हैµ
साकट ब्रह्मण मत मिलौ, वैष्णव मिलौ चंडाल।
अंग भरे भरि भेंटिये, मानो मिलै दयाल।।
(क.स., पृष्ठ 492)
इन दोनों साखियों में, शब्दान्तर के बावजूद अर्थ में भिन्नता नहीं है। कबीर कहते हैं, शाक्त ब्राह्मण से मत मिलो, पर यदि वैष्णव चण्डाल मिल जाये, तो उसे गले लगालो। यहाँ शाक्त ब्राह्मण और वैष्णव चाण्डाल दो अलग-अलग व्यक्ति हैं, अर्थात् वह ब्राह्मण, जो शाक्त हो गया है और वह चाण्डाल, जो वैष्णव हो गया है। शाक्त के साथ कबीर की कोई सहानुभूति नहीं है, पर उस वैष्णव के साथ है, जो मूलतः चाण्डाल है। उसे गले लगाना है, उसे बदलना है, क्योंकि वह नाम का वैष्णव है, उसकी जाति और संस्कृति चाण्डाल की ही है। उसके साथ व्यवहार भी चाण्डाल जैसा होता है।
वैष्णव चाण्डाल की पृष्ठभूमि यह थी कि कबीर की निर्गुणधारा के विरुद्ध रामानन्द ने सगुण को ही निर्गुण और निर्गुण को ही सगुण बनाकर नयी धारा चलायी और यह दिखाने के लिये कि वह जात-पांत नहीं मानते हैं, उन्होंने कुछ चाण्डालों को वैष्णव बनाया। उन्हें दीक्षा देने की उनकी विधि भी विचित्र थी। वह ब्राह्मणों को तो विधि पूर्वक मन्दिर में मंत्रोच्चार के साथ दीक्षा देते थे, पर चाण्डालों को उन्होंने मन्दिर के बाहर खड़ा कर के एक फर्लांग दूर से कहा, बोलो ‘राम-राम’, जब चाण्डालों ने बोल दिया, ‘राम-राम’ तो रामानन्द ने कहा, जाओ, तुम्हारी दीक्षा हो गयी, तुम वैष्णव हो गये। लेकिन, समाज में वे चाण्डाल ही बने रहे और वही सामाजिक स्तर बना रहा, जो पहले था। वैष्णव चाण्डाल की इस व्याख्या के लिये मैं इतिहासविद प्रो. ओमराज का ऋणी हूँ, जिसे उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘कबीर और समकालीन इतिहास’ के दूसरे खंड में प्रस्तुत किया है।
यदि आधुनिक उदाहरण देना हो, तो ‘वैष्णव चाण्डाल’ की तुलना बीसवीं सदी की उस घटना से की जा सकती है, जिसमें गाँधी ने दलित जातियों को ‘हरिजन’ बनाने का उपक्रम किया था। ‘वैष्णव चाण्डाल’ और ‘हिन्दू हरिजन’ दोनों ही प्रतिक्रान्ति की घटनाएँ हैं। ये दोनों घटनाएँ दलितों को हिन्दू फोल्ड में रखने के उपक्रम थे, वैष्णव के रूप में भी और हरिजन के रूप में भी। दलित नायकों ने इन दोनों का ही खण्डन किया। कबीर ने दलितों को धोखा देने वाले ऐसे कपटी गुरुओं की पोल खोली। उन्होंने ऐसे गुरुओं से दलितों को सावधन किया। उन्होंने कहा कि गुरु तो वह है, जो (चाण्डाल को भी) ब्रह्म बना दें। यथाµ
जा गुरु ते भ्रम ना मिटै, भ्रांति न जीव की जाय।
गुरु तो ऐसा चाहिए, देई ब्रह्म बनाय।।
(वही, पृष्ठ 227)
जैसे बीसवीं सदी में अज्ञानता वश दलित गाँधी के बहकावे के आकर ‘हरिजन’ बन गये थे, उसी प्रकार पन्द्रहवीं सदी में रामानन्द के अज्ञानता के प्रचार में आकर बहुत से शूद्र उनके शिष्य होकर पत्थर पूजने लगे थे। पर कबीर की दृष्टि में वह दलितों की मुक्ति का मार्ग नहीं था। उन्होंने कहा-
गुरु को तो गम्य नहीं, पाहन दिया बताय।
सिख सोधे बिन सेइया, पारि न पहुँचा जाय।।
(वही)
कबीर ने ऐसे गुरुओं से सावधान किया था, जो एजेन्ट के रूप में घर-घर दीक्षा देने के लिये घूम रहे थे। यथाµ
गुरुवा तो घर घर फिरै दीक्षा हमारी लेहु।
कै बूडो कै ऊछलौ, टका पर्दनी देहु।।
(वही, पृष्ठ 228)
ये घर-घर घूमने वाले ब्राह्मण वैसे ही थे, जैसे बीसवीं सदी में दयानन्द और गाँधी के एजेन्ट दलितों को हिन्दू और गाँधी-भक्त बनाने के लिये उनकी बस्तियों में घूमते थे। डाॅ. आंबेडकर ने, दलितों को इन एजेन्टों से सावधान किया था। (वाघमय, खण्ड-16) कबीर कहते हैं कि ये गुरु दलितों को आवागमन का भय दिखाते थे और उससे मुक्ति के लिये उन्हें अपने पंथ की दीक्षा देते थे। कबीर ने उन्हें झूठा गुरु कहा। यथा -
झूठे गुरु के पक्ष को तजत न कीजै बार।
पार न पावै शब्द का भरमें बारम्बार।।
साँचे गुरु के पक्ष में, मन को दे ठहराय।
चंचलते निश्चल भया, नहिं आवै नहिं जाय।।
(वही)
कबीर ने ब्राह्मण से पहला संवाद इसी आवागमन को लेकर किया। ब्राह्मण जनता को वैकुण्ठ के नाम से भ्रमित करता था। कबीर ने उनसे पूछाµ क्या तुम खुद भी जानते हो, बैकुण्ठ कहाँ है? वह कितने योजन दूर है, यह तक तो तुम्हें मालूम नहीं। सिर्फ बातों में ही बैकुण्ठ बखानते हो। कहने-सुनने से कैसे विश्वास हो, पहले वहाँ स्वयं जाकर तो दिखाइए? यथा -
चलन चलन सबको कहत है, नाँ जानौं बैकुंठ कहाँ है?
जोजन एक प्रमिति नहिं जानै, बातन ही बैकुंठ बखानै।।
कहै सुनें कैसे पतिअइये, जब लग तहाँ आप नहिं जइये।।
(वही, पृष्ठ 536)
शूद्रों को दूर से ‘राम’ बोलकर दीक्षा देने का दिखावा करने वाले पंडितों की कबीर खूब खबर लेते हैं। जब उन्हें ब्राह्मणों के इस पाखण्ड की खबर मिली, तो उन्होंने अपने ‘साध-सत्संग’ में कहा- पंडित झूठी बहस करते हैं, जैसे खांड़ कहने से मुँह मीठा नहीं हो जाता, वैसे ही राम कहने मात्र से दुनिया को मुक्ति नहीं मिल जाती है। केवल आग कहने से पैर नहीं जलता, जल कहने से प्यास नहीं बुझ जाती, भोजन कहने से भूखे का पेट नहीं भर जाता हैµ अगर ऐसा होने लगता, हर कोई मुक्त हो जाता। आदमी के साथ तोता भी हरि का नाम बोलता है, पर वह हरि का प्रताप नहीं जानता है और यदि एक बार वह पिंजड़े से निकलकर जंगल में उड़ जाये, तो दुबारा हरि भी नहीं बोलता। ऐसे पंडितों को शूद्रों से रंच मात्र भी प्रेम नहीं है, मनुष्यों से प्रेम किये बिना कोई सन्त नहीं हो सकता। वे एंसे सन्तों का उपहास करते हैं। यथाµ
पंडित वाद बदंते झूठा।
राम कह्याँ दुनियाँ गति पावै, खाँड कह्याँ मुख मीठा।।
पावक कह्याँ पाव जे दाझैं, जल कहि त्रिषा बुझाई।
भोजन कह्याँ भूष जे भाजै, तौ सब कोई तिरि जाई।।
नर कै साथि सूवा हरि बोलै, हरि परताप न जानै।
जो कबहूँ उडि़ जाई जंगल में, बहुरि न सूरतै आनै।।
साची प्रीति बिषै माया सूँ, हरि भगतानि सूँ हासी।
कहै कबीर प्रेम नहीं उपज्यौ, बाँध्यो जमपुरि जासी।।
(वही, पृष्ठ 542)
रामानन्दी ब्राह्मण की कथनी और करनी में अन्तर था। वह दोमुही था, एक मुँह से राम-नाम जपता था, तो दूसरे मुँह से वर्णव्यवस्था का समर्थन करता था। इस प्रकार, उसके मुँह में राम था, तो बगल में छुरी थी। वह स्वयं को ऊँचे कुल और वर्ण का पूज्य प्राणी मानता था, शरीर और मस्तक पर तरह-तरह के तिलक लगाकर अन्य मनुष्यों से भिन्न भेष बनाए रहता था और शेष सभी को अपने से निम्न कुल और वर्ण का मानकर अहंकार में अकड़ा रहता था। ऐसे ब्राह्मणों से कबीर का तीखा संवाद हुआ। उन्होंने इन ब्राह्मणों से तर्क करते हुए सवाल कियाµ ‘तुम किस आधार पर वर्ण के सिद्धान्त को मानते हो? यदि यह ईश्वर ने बनाया है, तो जन्म से ही तुम्हारे माथे पर तीन डंडियाँ (रेखाएँ) बनी हुई क्यों नहीं हैं ? ये डंडियाॅं तो तुम स्वयं अपने हाथ से खींचते हो। जिस वीर्य से मनुष्य की उत्पत्ति होती है, वह कहाँ से आया? उसमें वर्ण-अवर्ण (माया, भ्रम) कैसे और कहाँ से आ गया? फिर, कबीर ही जवाब देते हैं, जिसने शरीर (पिण्ड) दिया है, उसी ने वीर्य दिया है। इसलिये न कोई उच्च है और न कोई नीच। उन्होंने सवाल किया- अगर तुम ब्राह्मण हो और यह समझते हो कि ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए हो, तो फिर अन्य मार्ग से पैदा क्यों नहीं हुए? यह ब्राह्मण को निरुत्तर कर देने वाला तर्क था। इसलिये कबीर ने कहा, कोई छोटा नहीं है, छोटा वह है, जिसके मुँह में राम नहीं है। ये ऐसे प्रश्न हैं, जो कबीर से पहले किसी ने ब्राह्मण से नहीं पूछे थे। यथा -
जै पै करता बरण बिचारै, तौ जनमत तीनि डांडि किन सारै।।
उतपति ब्यंद कहाँ थैं आया, तो धरी अरु लागी माया।।
नहिं को ऊँचा नहिं को नीचा, जाका प्यंड ताही का सींचा।।
जे तूँ बाभन बभनी जाया, तो आँन बाट ह्नै काहै न आया।
कहै कबीर मधिम नहीं कोई, जो मधिम जा मुखि राम न होई।।
(वही, पृष्ठ 542)
यह संवाद यहीं नहीं रुका, बल्कि ब्राह्मणों के धर्म, दर्शन, सामाजिक व्यवहार और आचरण तक जाता है। ब्राह्मण वेदान्ती और सनातनी दोनों थे, किन्तु वर्णाश्रम को दोनों मानते थे। वे केवल वर्ण-विचार से ही नहीं, जाति-विचार से भी ग्रस्त थे। वे स्वयं को शुद्ध और दूसरों को अशुद्ध समझते थे, जबकि दलित जातियाँ तो उनके लिये अछूत हीं थीं। वे ब्राह्मण धर्म-शास्त्रों के हवाले से वर्णव्यवस्था और जातिवाद को न्यायोचित ठहराते थे। बीसवीं सदी में इसी आधार पर महात्मा गाँधी ने वर्णव्यवस्था को धर्म सम्मत और न्याय संगत ठहराया था। इसके खंडन में डाॅ. आंबेडकर ने महात्मा गाँधी से लम्बा संवाद (पत्राचार) किया था। कबीर ने भी यह खण्डन ब्राह्मण को सम्बोधित करके किया था। उन्होंने शुद्धता पर सवाल उठाया -
कहु पाँडे सुचि कवन ठाँव, जिहि घरि भोजन बैठि खाऊँ।
माता जूठा पिता पुनि जूठा, जूठे पफल चित लागे।।
जूठा आंगन जूठा जाँनाँ, चेतहु क्यूँ न अभागे।।
अन्न जूठा पाँनी पुनि जूठा, जूठे बैठि पकाया।
जूठी कड़छी अन्न परोस्या, जूठे जूठा खाया।।
चैका जूठा गोबर जूठा, जूठी का ढोकारा।
कहै कबीर तेई जन सूचे, जे हरि भजि तजहिं विकारा।।
(वही, पृष्ठ 627)
कबीर ने बहुत ही सटीक सवाल ब्राह्मण से पूछा था कि वह कौन सी जगह है, जो शुद्ध है, सारी जगहें जूठी हैं, जहाँ तक कि माता-पिता, अन्न और पानी तक। इसी तरह कबीर ने ‘छोति-विचार’ पर भी ब्राह्मण को फटकारा-
काहे को कीजै पाँडे छोति विचारा।
छोतिही तै उपजा संसारा।।
हमारे कैसे लोहू तुम्हारै कैसे दूध।
तुम्ह कैसे ब्राँम्हण पाँडे हम कैसे सूद।।
छोति छोति करता तुम्ह हीं जाय।
तौ ग्रभवास काहै को आय।।
जनमत छोति मरत ही छोति।
कहै कबीर हरि की विमल जोति।।
(क.स., पृष्ठ 79)
पन्द्रहवीं सदी में कबीर का यह सबसे आधुनिक चिन्तन है। ब्राह्मण अपने ‘छोति-विचार’ में एकदम अवैज्ञानिक और मूढ़ दृष्टिकोण का था। कबीर उसे बता रहे थे कि ‘छूति’ से कोई नहीं बच सकता। गर्भ में आने के समय से ही ‘छूति’ शुरु हो जाती है। ब्राह्मण भी उसी प्रक्रिया से गर्भ से पैदा होता है, जैसे सब पैदा होते हैं। ब्राह्मण को भी दाई ही गर्भ से बाहर निकालती है। तब, क्या यह ‘छूति’ नहीं है? मरने के बाद भी चार लोग उठाकर ही उसे श्मशान लेकर जाते हैं। क्या यह ‘छूति’ नहीं है? इस आधार पर, ब्राह्मण किस आधार पर अपने को इतना पवित्र मानता है कि दूसरों के छूने से अपवित्र हो जाता है। कबीर एकदम वैज्ञानिक बात कह रहे हैं कि क्या ब्राह्मण के शरीर में खून की जगह दूध होता है? यदि नहीं, तो किस आधार पर वह ब्राह्मण है और किस आधर पर हम शूद्र हैं?
पवित्रता का मिथ्या ख्याल ही ब्राह्मण को जाति पूछकर पानी पीने को कहता है। सनातनी ब्राह्मण आज भी इसे अपना पवित्र धर्म मानते हैं। इसी इक्कीसवीं सदी में हिन्दी के कर्म काण्डी पंडित और ‘नवभारत टाइम्स’ के सम्पादक विद्या निवास मिश्र इसी पवित्राता के ख्याल से रसोई की लकडि़यों को भी धोकर इस्तेमाल करते थे। बहरहाल, कबीर अपने समय के ऐसे ब्राह्मणों को अज्ञानी मानते थे, जिनके मस्तिष्क को वेद-शास्त्रों ने इस कदर कुन्द कर दिया था कि उनमें सोचने-समझने की शक्ति ही समाप्त हो गयी थी। ऐसे अज्ञानी ब्राह्मणों को चेताने के लिये कबीर ने उनसे यह संवाद किया था -
पाँड़े बूझि पियहु तुम पानी।
जिहि मिटिया के घर मँह बैठे, तामँह सिस्ट समानी।।
छपन कोटि जादव जहँ भींजे, मुनिजन सहस अठासी।
पैग पैग पैगम्बर गाड़े, सो सब सरि भौ माँटि।।
तेहि मिटिया के भाँडे पाँडे, बूझि पियहु तुम पानी।
मच्छ कच्छ घरियार बियाने, रुधिर नीर जल भरिया।।
नदिया नीर नरक बहि आवै, पसु-मानस सब सरिया।
हाड़ झरी झरि गूद गरी गरि, दूध कहाँ तैं आया।।
सो ले पाँड़े, जेंवन बैठे, मटियहि छूति लगाया।
बेद-कितेब छाँडि़ देऊ पाँड़े, ई सब मन के भरमा।।
कहहिं कबीर सुनहु हो पाँड़े, ई तुम्हरे हैं करमा।
(कबीर, पद 150)
कबीर के तर्क अद्भुत हैं, जिस मिट्टी के घर में हम रहते हैं उसी मिट्टी में, ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर गढ़कर, सड़कर मिट्टी हो गये। उसी मिट्टी के बर्तनों में दिया गया पानी ब्राह्मण को अपवित्र लगता है, जाति पूछ कर पानी पी रहे हो। क्या पानी और बर्तन की भी जाति होती है। जिस नदी को पवित्रा मानते हो, उसी में मछली, कछुवे और घडि़याल बच्चे जनते हैं, उसी में पशु और मनुष्य के शव सड़ते रहते हैं, हाड़-माँस झर-झर कर नदी में मिलते रहते हैं। वह पानी क्या दूध हो गया? उस पानी में तुम ‘छूति-विचार’ करते हो। इसलिये कबीर कहते हैं कि पाण्डे, वेद-शास्त्र में विश्वास करना छोड़ दो- यही तुम्हें भ्रमित करते हैं और तुम्हें ऐसा अवैज्ञानिक कर्म करने को कहते हैं।
कबीर अपने समय के ब्राह्मण के ज्ञान और कर्म को देखकर बहुत हैरान थे। ब्राह्मण को ईश्वर का भी सही ज्ञान नहीं था। वह कर्मकाण्डी बना हुआ था। प्रेम और समता की जगह वह घृणा और विषमता फैला रहा था। वह जनता को अवतारांे और देवताओं की पूजा में ही नहीं उलझा रहा था, वरन् उनके नाम पर पशुओं की हत्याएँ भी करवा रहा था। इस पर भी वह स्वयं को कुलीन कहता था और धार्मिक सभाओं में अकड़ कर बैठता था। हर कोई उससे दीक्षा माँगने को आतुर रहता था, जिसे देखकर कबीर को हँसी आती थी। लेकिन कबीर के लिये यह ब्राह्मण ‘निपुन कसाई’ था। यथा-
साधो, पाँड़े निपुन कसाई
बकरी मारि भेडि़ को धाए दिल में दरद न आई।
करि अस्नान तिलक दै बैठे, बिधि सों देवि पुजाई।
आतम मारि पलक में बिनसे, रुधिर की नदी बहाई।
अति पुनीत ऊँचे कुल कहिये, सभा माँहि अधिकाई।
इनसे दिच्छा सब कोई माँगे, हँसि आवै मोहि भाई।
(वही, पद 151)
यह पद कबीर ने अपने ‘साधु-संगत’ को सम्बोधित किया है। यह सम्भवतः प्रतिदिन के होने वाले सत्संग में साधुओं द्वारा पूछे गये प्रश्नों को ध्यान में रखकर कहा गया होगा। वे इस बात से भी हैरान थे कि पंडितों पर उनकी कोई बात असर नहीं करती थी। कबीर उन्हें यह समझाने की कोशिश करते थे कि ईश्वर अपिंडी (देहरहित) है, उसे देखा नहीं जा सकता, वह सभी प्राणियों में निवास करता है। कबीर को आश्चर्य होता था कि इतनी सीधी-सी बात भी ब्राह्मणों और सन्तों की समझ में नहीं आती थी। यथा -
पंडित सेती कहि रहे, कह्या न मानै कोइ।
ओ अगाध ए का कहै, भारी अचरज होइ।।
बसै अपिंडी पिंड में, ता गति लषै न कोइ।
कहै कबीर संत हौ, बड़ा अचम्भा मोहि।।
(क.स., पृष्ठ 252)
कबीर ब्राह्मण से अपने वाद-विवाद और संवाद में इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि वह सुधरना नहीं चाहता और शास्त्रों के कूप में ही मेढक बनकर रहना चाहता है। कबीर ब्राह्मण की पोथियों को तीतर का ज्ञान कहते थे। वह तीतर, जो दूसरों का शगुन बताता था, पर अपना पफन्दा नहीं जानता था। वे कहते थे, पोथी लेकर चलने वाला पंडित और मशाल लेकर चलने वाला मशालची दोनों एक जैसे हैं, जिन्हें दिखायी नहीं देता है। वह पोथी पढ़-पढ़ कर पत्थर हो गया है, उसकी संवेदनाएँ मर गयी हैं और लिख-लिख कर चोर हो गया है, क्योंकि उसमें अपना कुछ भी मौलिक नहीं होता है। यही नहीं, कबीर ने ब्राह्मण की तुलना गधे से की। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण संसार का वह गधा है, जो अपने ऊपर तीर्थों को लादे हुए है। वह यजमान को ‘पुण्य’ का पाठ पढ़ाता है और उसी से अपनी जीविका चलाता है। यथाµ
पंडित केही पोथियाँ, ज्यों तीतर का ज्ञान।
औरन शकुन बतावहीं, अपना पफंद न जान।।
पंडित और मसालची, दोनू सूझै नाहिं।
औरन को करै चाँदना, आप अंधेरा माँहि।।
पढि़ पढि़ तो पत्थर भया, लिखि लिखि भया जो चैर।
जिस पढ़ते साहब मिलै, तो पढ़ना कछु और।।
ब्राह्मण गदहा जगत का, तीरथ लादा जाय।
यजमान कहै मैं पुनि किया, वह मिहनत का खाय।।
(वही, पृष्ठ 434-35)
अन्तिम साखी में कबीर का व्यंग्य है कि तीरथों पर बैठा ब्राह्मण सुबह से शाम तक अपने पेट के लिये कितनी मेहरत करता है, जैसे गधा, जिसे दिन-भर भार लादने के बाद ही घास मिलती है। और, व्यवसाय के रूप में तीर्थों की रचना करने वाले ऐसे ब्राह्मणों के बारे में उनका मत हैµ
कबिरा ब्राह्मण की कथा, सो चारों की नाव।
सब अंधा मिलि बैठहीं, भावै तहाँ ले जाव।।
(वही, पृष्ठ 435)
कबीर कहते हैं, ब्राह्मण की कहानी उन चार अन्धों की नाव है, जिसमें सब अंधे मिलकर बैठे हुए हैं और जिधर चाहते हैं, उसे ले जाते हैं। उनका कोई लक्ष्य नहीं है।
क्या यह सम्वाद आज भी प्रासंगिक नहीं है?
संकेत विवरण
क.स.    ( कबीर समग्र, प्रथम खण्ड, सं. डा. युगेश्वर, 1995, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी )
क.ग्र.    ( कबीर ग्रन्थावली, सं. श्याम सुन्दर दास, 2034 वि., नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी )
वाघमय    ( डा. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघमय, खण्ड-7, 1993, कल्याण मन्त्रालय, भारत सरकार, नयी दिल्ली )
दो. को.    ( दोहा कोश- राहुल सांकृत्यायन, 1997, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना )
प्रवर    ( सन्त प्रवर रैदास साहेब-चद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु, 1969, बहुजन कल्याण प्रकाशन, लखनऊ )
कॅंवल भारती
कँवल भारती, लेखक जाने माने दलित चिंतक और साहित्यकार हैं।
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बुधवार, 26 दिसंबर 2012

कामशास्त्र की भारतीय परंपरा में सेक्‍स


      






शुक्रवार, 20 नवम्बर 2009

कामसूत्र की उत्पत्ति की शास्त्रकथा बड़ी रोचक है। इस कथा का भी यदि देरीदियन मूल्यांकन किया जाए तो अनेक नए पक्षों पर रोशनी पड़ती है। पहली बात यह निकलती है कि कामशास्त्र, अर्थशास्त्र और आचार शास्त्र का हिस्सा है। आरंभ में ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों का एक विशाल ग्रंथ बनाया।उस शास्त्रार्णव का मंथन कर मनु ने एक पृथक आचार शास्त्र बनाया।जो मनुसंहिता या धर्मशास्त्र के नाम से विख्यात है। ब्रह्मा के ग्रंथ के आधार पर बृहस्पति ने ब्रार्हस्पत्यम् अर्थशास्त्र की रचना की। ब्रह्मा के ग्रंथ के आधार पर ही महादेवजी के अनुचर नंदी ने एक हजार अध्यायों के कामशास्त्र की रचना की। उसी संस्करण के आधार पर श्वेतकेतु ने पांच सौ अध्यायों का संक्षिप्त संस्करण तैयार किया। श्वेतकेतु की रचना के आधार पर बाभ्रव्य ने डेढ सौ अध्यायों का संस्करण तैयार किया। यही वह बिन्दु है जहां से कामशास्त्र की नयी परंपरा सामने आती है। बाभ्रव्य के पहले कामशास्त्र वाचिक परंपरा का अंग था,बाभ्रव्य ने ही उसे शास्त्र का रूप दिया। कालान्तर में बाभ्रव्य के कामशास्त्र में अनेक चीजें जोड़ी गईं,और अनेक अध्यायों को स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में पेश किया गया। यही वजह है कामसूत्र ग्रंथ न होकर संग्रह है।
    बाभ्रव्य रचित कामशास्त्र के छठे भाग वैशिक प्रकरण को दत्तक आचार्य ने ,आचार्य चारायण ने साधारण अधिकरण, सुवर्णनाभ ने साम्प्रयोगिक अधिकरण,आचार्य घोटकमुख ने कन्यासम्प्रयुक्तक, गोनर्दीय ने भार्याधिकरण, आचार्य गोणि‍कापुत्र ने पारदारिक अधिकरण,आचार्य कुचुमार ने औपनिषदिक नामक अधिकरण को अलग करके संपादित किया। संभवत: बाभ्रव्य का कामशास्त्र पहला ग्रंथ है जिसकी विखंडित रूप में व्याख्या की गई। कामशास्त्र की इन विखंडित व्याख्याओं के आधार पर ही वात्स्यायन ने कामसूत्र की रचना की।
      कामसूत्र के आरंभ में किसी देवी या देवता की वंदना नहीं की गई है। बल्कि कहा गया ''धर्मार्थकामेभ्यो नम:।'' धर्म,अर्थ और काम को नमस्कार है। आगे कहा '' शास्त्रे प्रकृत्वात्'' यानी इस शास्त्र में मूल रूप से धर्म,अर्थ और काम का उपदेश दिया गया है ,इसलिए धर्म,अर्थ और काम को ही नमस्कार किया गया है। जिन आचार्यों ने इन तत्वों का बोध कराया उनको नमस्कार किया गया है। इसके बाद कामसूत्रकार ने विस्तार से उस परंपरा का जिक्र किया है जिसके कारण कामशास्त्र का विमर्श हमारे सामने आया। कामसूत्र के 'शास्त्रसग्रह प्रकरणम्' नामक पहले अध्याय में यह बताया गया है कि कामसूत्र के प्रत्येक अध्याय में क्या है और किस तरह कामसूत्र हमारे सामने आया। जयमंगला टीका को कामसूत्र की सबसे अच्छी टीका माना जाता है। इस टीका का हिन्दी अनुवाद भी है। जयमंगला टीकाकार ने अनेक ऐसी बातें इस कृति में शामिल कर दी हैं जो कृति के मूल लक्ष्य और परिप्रेक्ष्य से मेल नहीं पातीं। इनका अलग से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
काम या सेक्स क्या है ? कामसूत्र के दूसरे अध्याय में वात्स्यायन ने 'काम' की अवधारणा पेश की है। लिखा है , '' श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानामात्मसंयुक्तेन मनसाधिष्ठितानां स्वेषु विषयेष्वानुकूल्यत: प्रवृत्ति: काम:।'' अर्थात् कान, त्वचा, ऑंख,जीभ,नाक इन पाँच इन्द्रियों की इच्छानुसार शब्द, स्पर्श,रूप, रस और गंध इन विषयों में प्रवृत्ति ही काम है अथवा इन प्रवृत्तियों से आत्मा जो आनंद अनुभव करती है,उसे 'काम' कहते हैं। आगे कहा '' स्पर्शविशेषविषयात्वस्या भि माननिकसुखानुबिध्दा फलवत्यर्थ प्रतीति: प्राधान्यात्काम:।'' अर्थात् चुम्बन,आलिंगन,प्रासंगिक सुख के साथ गाल,स्तन,नितम्ब आदि विशेष अंगों के स्पर्श करने से आनंद की जो प्राप्ति होती है वह 'काम' है। इस सूत्र में 'फलवती प्रतीति'का खास  अर्थ है।
   कामसूत्र के चर्चित टीकाकार यशोधर ने इस शब्द का भाव चुम्बन,आलिंगन से लेकर वीर्यक्षरण पर्यन्त तक के आनंद  को माना है। इसी क्रम में उन्होंने लिखा कि कामसूत्र को काम- व्यवहार निपुण व्यक्ति से जानना चाहिए।
      यह मिथ जग प्रसिध्द है कि सेक्स करने के लिए ज्ञान की जरूरत नहीं होती।  क्योंकि पशु ,पक्षियों में सेक्स की प्रवृत्ति नजर आती है। सेक्स तो बगैर सिखाए या सीखे आ जाता है। इसके प्रत्युत्तर में कामसूत्र में लिखा है, ''संप्रयोगपराधीनत्वात् स्त्रीपुंसयोरूपायमपेक्षते।'' अर्थात् सम्भोग में पराधीन होने से स्त्री और पुरूष को उस पराधीनता से बचाने के लिए शास्त्र की अपेक्षा हुआ करती है। इसका टीकाकारों ने अर्थ किया है कि सेक्स शिक्षा भय,लज्जा,पराधीनता से मुक्त करती है। आनंद,सुखी और सम्पन्न बनाती है। दायित्वबोध, परोपकार और उदात्त भावों की सृष्टि करती है। अपने सहचर के प्रति श्रध्दा,विश्वास,हितकामना और अनुराग बढ़ाती है। कामशास्त्र के प्रति उदासीनता के कारण अनबन,कलह, व्यभिचार, असंतोष, वेश्यावृत्ति, व्यभिचार और अनेक शारीरिक बीमारियों के होने का खतरा है।
         वात्स्यायन ने 'कामसूत्र' में धर्म और अर्थ की व्याख्या सकारात्मक गतिविधि के रूप में की है ,और काम की व्याख्या नकारात्मक पक्षों क विवेचन और उनके समाधान के रूप में कामसूत्र रचा गया। यह जनप्रिय धारणा थी कि वह धर्म ,अर्थ तथा सज्जनों के विरूध्द है। इस  धारणा का त्रिवर्ग प्रतिपत्तिप्रकरणम् के 32से लेकर 37 वें सूत्र तक विवेचन है।
       वात्स्यायन ने सवाल किया है यदि काम से दोष उत्पन्न होते हैं तो उनके समाधान के बारे में भी सोचा जाना चाहिए। यही वह मूल चिन्ता है जिसके कारण कामसूत्र के निर्माण की आवश्यकता महसूस की गई। यह मूलत: सेक्स के दुष्प्रभावों से बचने के लिए ही रचा गया ग्रंथ है। सेक्स शिक्षा इस तरह प्राप्त किया जाए जिससे किसी अन्य कार्य में बाधा न पड़े। वात्स्यायन की स्पष्ट राय है कि काम प्राप्ति की चेष्टा करनी चाहिए साथ ही उसके दोषों से बचना चाहिए। वात्स्यायन की स्पष्ट राय है कि साधारण लोगों को धर्म और अर्थ के शास्त्रों के साथ कामशास्त्र का भी ज्ञान कराया जाना चाहिए।उन्होंने लिखा है, '' धर्मार्थाङ्गविद्याकालाननुपरोधयन् कामसूत्रं तदङ्गविद्याश्च पुरूषोधीयीत।'' अर्थात् धर्मशास्त्र,अर्थशास्त्र तथा इनके अंगभूत शास्त्रों के अध्ययन के साथ ही पुरूष को कामशास्त्र के अंगभूत शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए। कामसूत्र का अध्ययन स्त्री और पुरूष दोनों को करना चाहिए। स्त्री को कामशास्त्र का पिता के घर पर ही अध्ययन करना चाहिए।यदि शादी हो जाती है तो पति की अनुमति से अध्ययन करना चाहिए।
     जिस तरह इन दिनों अनेक लोग यह मानते हैं कि स्त्रियों को सेक्स शिक्षा नहीं दी जानी चाहिए वात्स्यायन के जमाने में भी ऐसा सोचने वाले लोग थे। वात्स्यायन ने इन सभी के तर्कों का खण्डन किया है और विस्तार से बताया है कि सेक्स शिक्षा क्यों जरूरी है। उनका मानना है कि स्त्रियों को सेक्स के व्यवहारिक पक्ष का तो ज्ञान होता है किन्तु शास्त्रज्ञान नहीं होता। अत: उन्हें कामशास्त्र का ज्ञान कराया जाना चाहिए। वात्स्यायन का यह भी मानना है  कामशास्त्र की सबसे अच्छी शिक्षा स्त्री से ही मिल सकती है। क्योंकि उस जमाने में स्त्रियां ही सबसे अच्छी ज्ञाता हुआ करती थीं। स्त्रियों के लिए सेक्स शिक्षा देने वालों का अभाव रहा है।अत: उनके लिए  किस तरह की स्त्री शिक्षिका हो सकती है ,इसका वर्णन करते हुए छह किस्म की औरतों का जिक्र किया है। 'जो औरत पुरूष के साथ संभोग का अनुभव प्राप्त कर चुकी हो।साथ में पाली-पोसी,साथ में खेली हुई धाय की लड़की हो,अथवा निश्छल हृदय की सखी हो जो संभोग का अनुभव प्राप्त कर चुकी हो,  अपनी ही उम्र की मौसी,  मौसी के समान विश्वासयोग्य बूढ़ी दासी, कुल-शील स्वभाव से पूर्व परिचित भिक्षुणी-संन्यासिनी, अपनी बड़ी बहिन आदि‍
        कामसूत्र में संभोग और प्रेम के जितने  भी उपाय सुझाए हैं उनमें स्त्री और पुरूष दोनों को समान रूप से सुझाव दिए गए हैं। दोनों के लिए अलग-अलग किस्म की व्यवस्थाओं का निर्देश है। जो सुझाव दिए गए हैं वे व्यवहारिक हैं। वात्स्यायन इन्हें नैतिकता के नजरिए से नहीं देखते। इन सुझावों में भिन्न किस्म की काम मुद्राओं का व्यवस्थित विवेचन किया गया है। अधिकांश काम मुद्राओं के बारे में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप में नैतिक निष्कर्ष नहीं दिया गया है। इसके बावजूद काम मुद्राओं को बताते हुए नैतिक आकांक्षाओं को समाहित कर लिया गया है। कामसूत्र की बुनियादी चिन्ता है समाज को एक व्यवस्था में बांधना , नियमित करना। स्त्री-पुरूष संबंधों को सामाजिकता के पैमाने से व्याख्यायित करना। स्त्री और पुरूष की दो भिन्न लिंग,देशज अवस्था,अभिरूचियों और मूल्यबोध की भिन्नता को स्वीकार किया गया है। भिन्नता और सहिष्णुता इसका बुनियादी आधार है।  
   (लेखक - जगदीश्‍वर चतुर्वेदी, सुधासिंह ) 

शोध की खातिर किस दुनिया में ? कहां गए ?

प्रिय भारत! / शम्भू बादल  प्रिय भारत!  शोध की खातिर किस दुनिया में ?  कहां गए ? साक्षात्कार रेणु से लेने ? बातचीत महावीर से करने?  त्रिलोचन ...