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जून, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कुलीन कवियों की आत्ममुग्धता😊 # भारतेंदु मिश्र

कुलीन कवियों की आत्ममुग्धता/ भारतेंदु मिश्र 😀🙃😀😀😀😀😃😃😃😃😃😃😃😃😃🙃🙃 कविता की राजनीति पर चर्चा हो रही है।कुछ कुलीन कवि उस चर्चा को आगे बढ़ा रहे हैं।उन्हें मालूम है कि उनके सजातीय, संगोत्रीय संगोष्ठी में बुलाए जा चुके हैं। कुछ भक्त पत्रकार ,कुछ उनकी कृपा से  नौकरी पाए हुए अघाए हुए कवि नुमा लोग उनकी चर्चा को चर्चित करने के लिए आतुर बैठे हैं।प्रकाशक ने बैनर देकर दरी बिछा दी है।उसे अपना धंधा चलना है।अचर्चित कम चर्चित पुस्तकें बेचनी हैं उसकी भी अपनी राजनीति है। कविता  की राजनीति पर कुलीन कवि ही बोल सकते हैं।ये कुलीनता उन्होंने लगातार हिंदी की जनोन्मुख छंदोबद्ध कविताओं और ऐसे कवियों को उपेक्षित करके,उनकी लोकोन्मुख कविताओं को लतिया कर अर्जित की है।  प्रकशित होने के लिए आयी ऐसी कविताओं को तब उन्होंने बहुत जतन से फाड़ कर कचरापेटी में फेंका था।उन्होंने बन्द कमरे में शपथ ली थी कि कुछ खास पत्र और पत्रिकाओं में न ये कविताएं छपेंगी और न कभी छंदोबद्ध कवियों की चर्चा  होगी।और यह भी कि हिंदी के नाम से जो सम्मान और पुरस्कार सुलभ हैं उन्हें किस आधार पर मिलकर बाँट लिया जाए। ये कुलीन कवियों की सेवा

#समकालीन_त्रिवेणी ~ वर्ष 2 अंक 2

 ●● #समकालीन_त्रिवेणी ~ वर्ष 2 अंक 2 •==========================• ● श्री अखिलेश श्रीवास्तव "चमन" के संपादन में महानगर लखनऊ से प्रकाशित "समकालीन त्रिवेणी" ~ साहित्य संस्कृति कला पर केंद्रित पत्रिका मिली। " समकालीन त्रिवेणी" के इस अंक में सबसे भारी भरकम सामग्री अगर कुछ समझ में आई, तो वह है, "देश काल" स्तंभ मे प्रखर आलोचक उमाशंकर सिंह परमार का एक आलेख~ "अकादमिक आलोचना की संकुचित परिधि और मूल्यों का संकट"। इस भारी भरकम और वजनदार लेख का महत्व इसलिए भी है कि इसमें बहुत ही संक्षेप में आलोचना के समग्र इतिहास को समेटने की कोशिश की है उमाशंकर सिंह परमार ने। यूँ भी उमाशंकर सिंह परमार निडर, निर्भीक और बेखौफ तथा बेरहम लेखन के लिए जाने जाते हैं। उनका लेख, उनकी बात, उनकी टिप्पणी एक बार नहीं, सौ सौ बार सोचने पर विवश करती है और अंततः उनके अकाट्य तर्क स्वीकार करना ही होता है। उदाहरण के लिए जैसे वे लिखते हैं कि~ "शुक्ल जी के बाद हिंदी आलोचना में जिस तरह अकादमिक जगत का प्रभुत्व बढ़ा और पूर्व लेखन को ही थोड़े बहुत मत मतांतरों के बाद स्वीकृति प्रदत्त कर

#छत्तीसगढ़_में_मुक्ति_संग्राम और आदिवासी ~ #सुधीर_सक्सेना

 ● #छत्तीसगढ़_में_मुक्ति_संग्राम और आदिवासी ~  #सुधीर_सक्सेना •============================================• ● सुप्रसिद्ध कवि, लेखक तथा अनुवादक एवं संपादक डाॅ सुधीर सक्सेना की एक महत्वपूर्ण पुस्तक "छत्तीसगढ़ में मुक्ति संग्राम और आदिवासी (अध्ययन)"  "भारतीय ज्ञानपीठ" नई दिल्ली से प्र काशित हुई है, 360 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य ₹ 650/ है।  इतिहास की यह पुस्तक "बस्तर (छत्तीसगढ़)" के महान भुमकाल के महानायक गुंडाधूर और उनके सदृश्य सेनानियों की प्रतिरोध और बलिदान की अप्रतिहत परंपरा को समर्पित है। ● पुस्तक के फ्लैप पर प्रस्तावना या भूमिका के रूप में~ "छत्तीसगढ़ मे मुक्ति संग्राम" शीर्षक के अंतर्गत श्री राजेन्द्र चंद्रकांत राय लिखते हैं कि ~ छत्तीसगढ़ में सम्पन्न हुए मुक्ति संग्राम मे आदिवासियों की ऐतिहासिक भूमिका पर सबसे ज्यादा तथ्य परक और गवेषणायुक्त कोई अन्य ग्रंथ होगा, इसमे संदेह ही है। "डाॅ सुधीर सक्सेना गहरी मानवीय चेतना के कवि हैं। वे निष्णात और प्रखर पत्रकार के तौर पर पहले से अपनी एक विशेष पहचान रखते हैं। ••••• असीम धैर्य और तथ्यों की प्रामाण

सहमति_के_पक्ष_में ~ #उमाशंकर_सिंह_परमार

 📚 #सहमति_के_पक्ष_में ~ #उमाशंकर_सिंह_परमार ○=========================○ ● हिन्दी साहित्य के अधिकारी विद्वान आलोचक, मार्क्सवाद के सम्यक विश्लेषक, इतिहासविद, समर्थ लेखक एवं कवि, अनुवादक एवं चिंतक तथा भाषा वैज्ञानिक  #डाॅ_रामविलास_शर्मा_की_पुण्यतिथि (10 अक्तूबर) पर उनका स्मरण इसलिए भी आवश्यक है कि उनके बाद आलोचना के क्षेत्र में एक अधूरापन, एक शून्य सा प्रतीत हो रहा था। इधर लंबे समय से हिन्दी साहित्य मे और साहित्यिक संस्थानों व संगठनो मे  जिस तरह से अकादमिक और विश्वविद्यालयी वर्चस्व स्थापित हुआ, उसके चलते पद, पैसा, पुरस्कारों तथा अन्यान्य प्रलोभनों का मायाजाल प्रभावी हो गया। ऐसी धारणा स्थापित करने का सुनियोजित षड्यंत्र चल पड़ा कि मानो साहित्य सृजन केवल विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थाओं से ही उत्पादित हो सकता है, शेष सब मूल्यहीन एवं अर्थहीन तथा हेय है। चाटुकारिता, चापलूसी तथा चरण चंपन की बढ़ती प्रवृत्ति ने वास्तविक रचनाकारों को हाशिये पर धकेलना शुरू कर दिया। अपने समय के जरूरी रचनाकार उपेक्षित किये जाने लगे। इस घातक स्थति पर कठोर प्रहार करने की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस हो रही थी।  ● उमस

बुढ़ापे👨🏼‍🦯 को भी प्यार चाहिए💐💐

🌳🦚आज की कहानी🌳 💐💐बुढ़ापे👨🏼‍🦯 को भी प्यार चाहिए💐💐* मोहन बेटा ! मैं तुम्हारे काका के घर जा रहा हूँ . क्यों पिताजी ? और आप आजकल काका के घर बहुत जा रहे हो ...? तुम्हारा मन मान रहा हो तो चले जाओ ... पिताजी  !  लो ये पैसे रख लो , काम आएंगे । पिताजी का मन भर आया . उन्हें आज अपने बेटे को दिए गए संस्कार लौटते नजर आ रहे थे । जब मोहन स्कूल जाता था ... वह पिताजी से जेब खर्च लेने में हमेशा हिचकता था , क्यों कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी . पिताजी मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से घर चला पाते थे ... पर माँ फिर भी उसकी जेब में कुछ सिक्के डाल देती थी ... जबकि वह बार-बार मना करता था । मोहन की पत्नी का स्वभाव भी उसके पिताजी की तरफ कुछ खास अच्छा नहीं था . वह रोज पिताजी की आदतों के बारे में कहासुनी करती थी ... उसे ये बडों से टोका टाकी पसन्द नही थी ... बच्चे भी दादा के कमरे में नहीं जाते , मोहन को भी देर से आने के कारण बात करने का समय नहीं मिलता । एक दिन पिताजी का पीछा किया ... आखिर पिताजी को काका के घर जाने की इतनी जल्दी क्यों रहती है ? वह यह देख कर हैरान रह गया कि पिताजी तो काका के घर जाते ही नहीं

कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय’

 नए सशक्त एवं आत्म-निर्भर भारत का आगाज़ है ‘कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय’ भारत जैसे विकासशील देश में अक्सर यह महसूस किया गया है कि देश में ई-शासन को सुनिश्चित करने के लिए बहुत अधिक जोर देने की आवश्यकता है,जो इलेक्ट्रॉनिक सेवाओं, उत्पादों, उपकरणों,नौकरी के अवसरों और शिक्षा को शामिल करने वाले समावेशी विकास को बढ़ावा दे सके। इसी कड़ी में डिजिटल यूनिवर्सिटी ऑफ़ स्किल रिसर्जेंस देश के युवाओं और प्रशिक्षुओं में पारंपरिक ज्ञान व कौशल के प्रति आत्मविश्वास पैदा करने एवं समसामयिक अपेक्षित कौशल और आधुनिक तकनीकी समझ के अंतराल को कम करने के उदेश्य से सत्यापित एक प्रयोग है। उक्त विचार DUSR की नियंत्रक (Governor)डॉ.रिंजू राय के हैं। डॉ.राय ने बात करते हुए हमें बताया कि कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय ( एक आभासी मेटा विश्वविद्यालय ) गैर सरकारी संगठन- सामाजिक विकास एवं शोध संस्था की एक इकाई है जो वर्ष 2002-03 में संस्था पंजीकरण अधिनियम 1860 के अंतर्गत पंजीकृत है। कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय ( Digital University of Skill Resurgence DUSR ) ऑनलाइन माध्यम से संचालित एक आभासी मेटा विश्वव

अरुण कमल की इच्छा / मुकेश प्रत्यूष

 हिंदी के महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल की एक कविता है  - 'इच्छा' । पूर्वप्रकाशित है। उन पर केन्द्रित पूर्वग्रह के आवरण पर, कविता खंड में तथा एक आलेख  में यानी एक ही अंक में तीन बार इसे  जगह दी  गयी है। पूरी कविता है    मै जब उठूं तो भादो हो पूरा चंद्रमा उगा हो ताड़ के फल सा  गंगा भरी हो धरती के बराबर  खेत धान से धधाए  और हवा में तीज त्यौहार की गमक  इतना भरा हो संसार  कि जब मैं उठूं  तो चींटी भर  जगह भी  खाली न हो छोटी-सी, सहज संप्रेषित  होने वाली इस कविता में कवि  की छह  इच्छाएं हैं। पहली,  जब वह सोकर उठे तो भादो का महीना हो , दूसरी आसमान में पूरा चांद खिला हो यानी पूर्णिमा की रात हो और आसमान में बादल नहीं हो। यह दोनों इच्छाएं तभी पूरी हो  सकती  हैं  जब कवि सावन  की पूर्णिमा को सोए और भादो के पहले दिन सूर्योदय से पहले या कहें  ब्रह्ममुहूर्त में जग जाए। न  बारिश  हो रही हो, न बादल उमड़-घुमड़ रहे हों।   ऐसी स्थिति में कवि की तीसरी इच्छा - खेत  धान से धधाए  - कैसे पूरी होगी और खेती से जुड़ा किसान तो बेमौत मर जाएगा ।  नदियां भी तभी भरेंगी जब बारिश  हो और कवि को बरसात के मौसम   में निरभ्

भारतीय धर्म के बारे में

जाने अपने #धर्म और संस्कृति समाज के बारे मे प्रस्तुति -- दिलीप कुमार सिन्हा *पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -* *1. युधिष्ठिर    2. भीम    3. अर्जुन* *4. नकुल।      5. सहदेव* *( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )* *यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन* *की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।* *वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..* *कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -* *1. दुर्योधन      2. दुःशासन   3. दुःसह* *4. दुःशल        5. जलसंघ    6. सम* *7. सह            8. विंद         9. अनुविंद* *10. दुर्धर्ष       11. सुबाहु।   12. दुषप्रधर्षण* *13. दुर्मर्षण।   14. दुर्मुख     15. दुष्कर्ण* *16. विकर्ण     17. शल       18. सत्वान* *19. सुलोचन   20. चित्र       21. उपचित्र* *22. चित्राक्ष     23. चारुचित्र 24. शरासन* *25. दुर्मद।       26. दुर्विगाह  27. विवित्सु* *28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ* *31. नन्द।        32. उपनन्द   33. चित्रबाण* *34. च