सोमवार, 31 अगस्त 2020

ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें

ज्ञान  प्रकाश  विवेक की ग़ज़लें  


Tuesday, September 15, 2009

ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें और परिचय









30 जनवरी 1949 को हरियाणा मे जन्में ज्ञान प्रकाश विवेक चर्चित ग़ज़लकार हैं । इनके प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह हैं "प्यास की ख़ुश्बू","धूप के हस्ताक्षर" और "दीवार से झाँकती रोशनी", "गुफ़्तगू आवाम से" और "आँखों मे आसमान"। ये ग़ज़लें जो आपके लिए हाज़िर कर रहे हैं ये उन्होंने द्विज जी को भेजीं थीं ।

एक

उदासी, दर्द, हैरानी इधर भी है उधर भी है
अभी तक बाढ़ का पानी इधर भी है उधर भी है

वहाँ हैं त्याग की बातें, इधर हैं मोक्ष के चर्चे
ये दुनिया धन की दीवानी इधर भी है उधर भी है

क़बीले भी कहाँ ख़ामोश रहते थे जो अब होंगे
लड़ाई एक बेमानी इधर भी है उधर भी है

समय है अलविदा का और दोनों हो गए गुमसुम
ज़रा-सा आँख में पानी इधर भी है उधर भी है

हुईं आबाद गलियाँ, हट गया कर्फ़्यू, मिली राहत
मगर कुछ-कुछ पशेमानी इधर भी है उधर भी है

हमारे और उनके बीच यूँ तो सब अलग-सा है
मगर इक रात की रानी इधर भी है उधर भी है

(बहरे-हज़ज मसम्मन सालिम)
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222x4

दो

तुम्हें ज़मीन मिली और आसमान मिला
हमें मिला भी तो विरसे में ख़ाकदान मिला

ज़रूर है किसी पत्थर के देवता का असर
कि जो मिला मुझे बस्ती में बेज़ुबान मिला

वो मेरे वास्ते पत्थर उबाल लाया है-
तू आके देख मुझे कैसा मेज़बान मिला

तू मुझसे पूछ कि बेघर को क्या हुआ हासिल
मिला मकान तो हिलता हुआ मकान मिला

सुना है जेब में बारूद भर के रखता था
जो शख़्स आज धमाकों के दरमियान मिला

तू उससे पूछ दरख़्तों की अहमियत क्या है
कि तेज़ धूप में जिसको न सायबान मिला

बहरे-मजतस की मुज़ाहिफ़ शक़्ल
म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन
1212 1122 1212 22/ 112

तीन

लोग ऊँची उड़ान रखते हैं
हाथ पर आसमान रखते हैं

शहर वालों की सादगी देखो-
अपने दिल में मचान रखते हैं

ऐसे जासूस हो गए मौसम-
सबकी बातों पे कान रखते हैं

मेरे इस अहद में ठहाके भी-
आसुओं की दुकान रखते हैं

हम सफ़ीने हैं मोम के लेकिन-
आग के बादबान रखते हैं

बहरे-खफ़ीफ़ की मुज़ाहिफ़ शक़्ल
फ़ा’इ’ला’तुन म’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन
2122 1212 22/112

चार

तमाम घर को बयाबाँ बना के रखता था
पता नहीं वो दीये क्यूँ बुझा के रखता था

बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लकें भर लीं,
मै दोस्तों की दुआएँ बचा के रखता था

वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों
इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था

न जाने कौन चला आए वक़्त का मारा
कि मैं किवाड़ से सांकल हटा के रखता था

हमेशा बात वो करता था घर बनाने की
मगर मचान का नक़्शा छुपा के रखता था

मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद,
कि हर कदम मैं बहुत आज़मा के रखता था

बहरे-मजतस की मुज़ाहिफ़ शक़्ल
म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन
1212 1122 1212 22/ 112

पाँच

मुझे मालूम है भीगी हुई आँखों से मुस्काना
कि मैंने ज़िन्दगी के ढंग सीखे हैं कबीराना

यहाँ के लोग तो पानी की तरह सीधे-सादे हैं
कि जिस बर्तन में डालो बस उसी बर्तन-सा ढल जाना

बयाबाँ के अँधेरे रास्ते में जो मिला मुझको
उसे जुगनू कहूँ या फिर अँधेरी शब का नज़राना

वो जिस अंदाज़ से आती है चिड़िया मेरे आँगन में
अगर आना मेरे घर में तो उस अन्दाज़ से आना

न कुर्सी थी, न मेज़ें थीं, न उसके घर तक़ल्लुफ़ था
कि उसके घर का आलम था फ़कीराना-फ़कीराना

(बहरे-हज़ज मसम्मन सालिम)
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

कुछ कविताएं

 

कुछ कविताएं  

अवसाद / डिप्रेशन 


आज हावी है हर किसी पर 

किसी न किसी रूप में ----

इसने नहीं छोड़ा बच्चों को भी 

और न ही घर के बुजुर्गो को ---

कारण साफ़ है ---

आधुनिकता की भाग दौड़ 

जिसने पीछे छोड़ दिया है 

हर रिश्ते को ---

जिसने किया है कुठाराघात ---

हर किसी के कोमल मन पर 

आज कोमलता खत्म हो गयी मन की --

सभी बेबस हैँ ---.

पर आज भी अवसाद को बीमारी की तरह 

नहीं लेते लोग . .

नहीं करते आंकलन 

नहीं करते और नहीं करवाते किसी प्रकार का चिकित्सीय विमर्श ---

जिसके कारण ---

आज हरपल खतरा मंडरा रहा है 

हर रिश्ते में 

एक अज़ीब सा डर बैठ गया है 

जाने कब और कैसे कौन सा रिश्ता 

कर देगा तार तार संबंधों को !!!


#सीमा

[8/31, 14:46] +91 97600 07588: 9760007588              सुरेंद्र सिंघल

          

          सुनो

             1

गुजरती रहेगी

 मेरे और तुम्हारे 

बीच में से 

जब तक हवा 

खिलते ही रहेंगे

 रंग बिरंगे फूल

 अपनी अपनी खुशबू

 बिखेरते हुए

 मुझ में 

तुम में 

और हमारे चारों ओर

 सुनो

 इस तरह मत जकड़ो

 अपनी बाहों में मुझे


              2

ऐसा भी क्या

 गुजर जाएं

 मेरे और तुम्हारे 

बीच में से 

हवा के साथ साथ

 जहर भरे नारे भी 

नफरतें उछालते हुए 

सुनो 

कसकर भींच लो

 अपनी बाहों में मुझे


            3

सुनो 

छलनी बन जाते हैं

 हम दोनों 

हर मिलावटी हवा के लिए

 ताकि 

गुजर पाए सिर्फ़ 

ताजी और साफ हवा

 हम दोनों के बीच में से

 ताकि

 जन्म लेते रहें 

नए नए रिश्ते

 महकते हुए 

हम दोनों के बीच

 और हमारे चारों ओर

[8/31, 22:17] +91 98736 05905: *"दरवाजे "*


पहले दरवाजे नहीं खटकते थे...

रिश्ते -नातेदार

मित्र -सम्बन्धी

सीधे

पहुँच जाते थे...

रसोई तक


वहीं जमीन पर पसर

गरम पकौड़ियों के साथ

ढेर सारी बातें

सुख -दुःख का

आदान -प्रदान


फिर खटकने लगे दरवाजे...

मेहमान की तरह

रिश्तेदार

बैठाये जाने लगे बैठक में..

नरम सोफों पर


कांच के बर्तनों में

परोसी जाने लगी

घर की शान...


क्रिस्टल के गिलास में

उड़ेल कर ...

*पिलाई जाने लगी.. हैसियत.


धीरे -धीरे

बढ़ने लगा स्व का रूप..


मेरी जिंदगी ... मेरी मर्जी

अपना कमरा..

अपना मोबाइल ..

कानों में ठुसे..द्वारपाल..

लैपटॉप..


पर कहीं न कहीं 

स्नेहपेक्षी मन.... 


प्रतीक्षा रत है...

किसी अपने का..!!!


पर अब.....

दरवाजे नहीं खटकते हैं ..!!!

कोविड युग है न

कोई आता भी है तो

दो मीटर की दूरी से

हाथ हिलाता है

चला जाता है

उसके जाने के बाद

कहते है हम

अजीब आदमी है

कोविड काल में यूँ ही घूम रहा है

इन्तजार है हमें ,उस समय का जब

दरवाजे खटकने लगेगें

हम मेजबानी करे, अपने मेहमान की

उनके मनपसन्द व्यंजनों से,

परोसे उनका मन पसन्द पेय पदार्थ,

फिर हम भी किसी का दरवाजा

 खटखटायें ,मेहमान बन 

किसी अपने के घर जायें,

हमें इन्तजार है उन दिनो का,

जब बिना दरवाजा खटकायें,

कोई अपना मेरे घर आयें,

उनको किचन में खड़े खड़े ही,

चाय पकौड़े खिलायें,

कुछ उनकी सुने,

कुछ अपनी सुनायें,

गले लगें,

मन हल्का करें,

बिना दरवाजा खटकायें,

किसी अपने के घर जाए।

[8/31, 23:12] +91 84331 34545: जीडीपी के गिरने की बिलकुल चिंता न करें. चढ़ना उतरना जीवन का धर्मं है. भगवान में आस्था रखिये. तुलसीदास जी कह ही गए हैं, हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस बिधि हाथ. जो जीडीपी गिरने से विचलित हो रहे हैं, उनकी आस्था संदिग्ध है. 

याद रखें, देश आगे बढ़ रहा है.

बुधवार, 26 अगस्त 2020

खतरनाक समय से जिरह करती कविताएँ-/ रंजीता सिंह फलक

 खतरनाक समय से जिरह करती कविताएँ----

*********************

हम विडम्बनाओं से भरे खतरनाक समय से गुजर रहें हैं,यह समय बगीचे से फूल तोड़कर माला बनाने का नहीं है,न ही किसी सुंदर चित्र में कृत्रिम रंग भरने का समय है,यह समय है,समझने और समझाने का, 

"रंजिता सिंह फ़लक" की कविताएं इसी खतरनाक समय से मनुष्य को बचाने की कोशिश करती हैं,इनकी यह कोशिश है कि विडम्बनाओं से भरे समय को लोग समझे औऱ अपने हक के लिए लड़ने के लिए जागरूक हों,अपने आसपास के लोगों को सतर्क औऱ सचेत करे.

कविता हर मनुष्य के भीतर रहती है और उसकी अनुभूतियों को भीतर ही भीतर बहाती रहती है जो इस बहती धारा को शब्दों में बांधकर कागज में उतार देता है वह कवि कहलाने लगता है.

"रंजिता सिंह" अपने भीतर बहती अनुभूतियों को आंदोलन की तरह लेती हैं और इसे प्रभावी तरह से शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती हैं,वह चाहती हैं कि हर मनुष्य इस खतरनाक समय से बहस करे,

अपनी आवाज उठाये औऱ एक संवेदनशील समाज का निर्माण करें,औऱ अपने भीतर बह रही अनुभूतियों को रचनात्मक साहस के साथ व्यक्त करे,क्योंकि कविता में इसे सरलता से व्यक्त किया जा सकता है. 

"रंजिता सिंह" की कविताएं आत्मकुंठा के दौर से गुजर रहे मनुष्य को बचाती हैं. 

आज के दौर में जो हो रहा है और जो होने वाला है,इनकी कविताएं इसकी पड़ताल करती है औऱ 

समाज,राजनीति और रुढ़िवादी मानसिकता की परतें खोलकर वास्तविक सच को उजागर करती हैं

इन कविताओं में विलाप नहीं है बल्कि मनुष्य की मानसिकता को सचेत औऱ जागरूक बनाने का सार्थक प्रयास हैं.

साहित्यकार "रंजिता सिंह" 

ऐसे ही सच्ची और पारदर्शी विचारों को सलीके से व्यक्त की पक्षधर हैं, 

इसीलिए इनकी कविताओं की भाषा सरल और सहज है जो  

आम पाठक को प्रभावित करती हैं, 

इनकी कविताओं को पढ़तें समय अपने होने और कुछ सोचने की अनुभूति होती है,

औऱ शून्य हो रहे सामाजिक जीवन को समझने की प्रेरणा देती हैं.

"रंजिता सिंह"की कविताएं लच्छेदार बातों और हवा हवाई नारों को सिरे से खारिज करती हैं औऱ मनुष्य की चेतना को जीवित रखने का हर संभव प्रयास करती हैं.

इनकी कविताओं में गहरापन है, औऱ जीवन के बहुत सारे अनुभव भी मौजूद हैं.

कविताएँ पठनीय औऱ प्रभावशाली हैं.

हार्दिक बधाई औऱ उज्जवल भविष्य की 

शुभकामनाएं----


"ज्योति खरे"

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शर्मनाक  हादसों के  गवाह

******************

हम  जो  हमारे समय  के 

सबसे  शर्मनाक  हादसों  के 

चश्मदीद गवाह  लोग  हैं 


हम जो हमारे समय  की 

गवाही  से मुकरे 

डरे ,सहमें  मरे से  लोग हैं 


हमारे  माथे 

सीधे  सीधे 

इस  सदी  के  साथ  हुई 

घोर  नाइंसाफी 

को  चुपचाप देखने  का 

संगीन  इल्जाम  है 


हमने अकीदत की  जगह 

किये  हैं  सिर्फ और  सिर्फ 

कुफर

हमने  अपने  समय  के  साथ 

 की  है दोगली साज़िशें  .


हमने  अपने  हिस्से  की 

जलालत

पोंछ ली  है 

पसीने  की  तरह 

और  घूम  रहे  हैं 

बेशर्म  मुस्कुराहटों के  साथ 

दोहरी  नैतिकता लिए 


हम  सिल  रहें  हैं 

चिथड़े हुए 

यकीं  के  पैरहन  और 

उदासियों ,मायूसियों  और 

नाकामियों के  लिहाफ 

की  ढ़क  सकें  

अधजले  सपनों  के  चेहरे 


हमने अपने होठों पर 

जड़ ली है 

एक बेगैरत चुप्पी 

बड़ी हीं बेहय़ायी से 

दफना दी  है 

ज़िन्दा सवालों की 

पूरी  फेहरिस्त 


हमने अपनी तालू पर  

चिपका लिए हैं 

चापलूसी के गोंद 

और सुखरू हो चले हैं 

कि हमने सीखा दी है 

आने वाली नस्लों को  

एक शातिराना चुप्पी 


हम  ठोंक -पीट  कर  

आश्वस्त हो चले हैं कि 

मर चुके सभी सवाल 


पर हम भूल गए हैं कि 

असमय मरे लोगों की  तरह 

असमय मरे सवाल भी  

आ  जाते  हैं  

 प्रेत योनि में 


और भूत -प्रेत  की  तरह हीं 

निकल आते हैं  

व्यवस्था  के  मकबरों  से 

और  मंडराने लगते  हैं 

चमगादड़ों  की तरह 

हमारी चेतना के माथे  पर 


हम भूल जाते हैं कि 

कितनी भी चिंदी- चिंदी  कर  

बिखेर  दें 

तमाम हादसों के दस्तावेज 

वे तैरते रहते  हैं 

अंतरिक्ष में 

शब्दों  की  तरह 


हम भूल जाते है कि 

शब्द नहीं मरते ..

वे दिख जाते  हैं 

जलावतन किये जाने के  बाद भी 


वे  दिखते रहते हैं  

हमारे  समय  के  दर्पण  में 

जिन्हें  हम  अपनी 

सहुलियत,महत्वकांक्षाओं ,

और लोलुपताओं  

के  षडयंत्र  में 

दृष्टि-दोष कह  

खारिज  कर  देते  हैं .


हम  जो  हमारे  समय  की 

सबसे  शर्मनाक  हादसों  के 

चश्मदीद गवाह  लोग  हैं ---

---------------------

होना  अपने  साथ---

***********

पीले  पत्तों  से 

बीमार  दिन  में  भी  

हरे  सपने  

आकर  टंग  जाते  हैं  

मन  की  सुखती  सी

खुरदुरी  डाल  पर  

और  वहीं  ख्वाहिशों  की 

छोटी  सी गौरया  

फुदकती  है  

चोंच  मारती  है  ..

सपनों के अधपके फलों पर  


वहीं  नीले  से  दिन  की  

आसमानी  कमीज  पहने  

निकलता  है  कोई  

तेज  धूप  में  


सच  का  आईना  

एकदम  से  चमकता है 

और  चुभते  हैं  

कई  अक्स  माज़ी  के 

और  नीला  दिन 

तब्दील  हो  जाता  है  

सुनहरी  सुर्ख  शाम  में  


कुछ  रातरानी  और  

हरसिंगार  

अंजुरी  भर  लिये  

ठिठकता  है 

वक्त  का  एक  छोटा  सा  

हसीं  लम्हा  

और  एकदम  उसी पल 

खिल  उठता  है  पूरा  चाँद  

किसी याद  सा 


देखती  हूँ  

दूर  तक पसरती 

 स्याह  रात  

तुम्हारी  बाँहों  की  तरह  


बीमार  पीले  पत्तों  से  दिन  

हो  जाते  हैं  

दुधिया  चाँदनी  रात 


सच  हीं  है  

उम्मीदें बाँझ नहीँ होती 

वे जन्मती रहती हैं 

सपने 

उम्मीद  खत्म  होने  की  

आखिरी  मियाद तक 


ठीक  वैसे 

जैसे  जनती  है  

कोई  स्त्री  

अपना  पहला  बच्चा 

रजोवृति  के  आखिरी  सोपान  पर----

----------------------------

बिसराई  गई बहनें और  भुलाई गई  बेटियां---

******************

बिसराई गईं बहनें 

और भुलाई गई बेटियाँ 

नहीं बिसार पातीं मायके की देहरी


हालांकि जानती हैं 

इस गोधन में नहीं गाए जाएँगे 

उनके नाम से भैया के गीत 

फिर भी 

अपने आँगन में 

कूटती हैं गोधन

गाती हैं गीत 

अशीषती हैं बाप भाई जिला-जवार को 

और देती हैं 

लंबी उम्र की दुआएँ


बिसराई गईं बहनें 

और भुलाई गई बेटियाँ 

हर साल लगन के मौसम में 

जोहती हैं 

न्योते का संदेश

जो वर्षों से नहीं आए

उनके दरवाज़े 


फिर भी 

मायके की किसी 

पुरानी सखी से 

चुपचाप बतिया कर 

जान लेती हैं 


कौन से 

भाई-भतीजे का 

तिलक-छेंका होना है?

कौन-सी बहन-भतीजी की 

सगाई होनी है?  


गाँव-मोहल्ले की 

कौन-सी नई बहू सबसे सुंदर है 

और कौन सी बिटिया  

किस गाँव ब्याही गई है? 


बिसराई गईं बहनें 

और भुलाई गई बेटियाँ 

कभी-कभी 

भरे बाजार में ठिठकती हैं

देखती हैं बार-बार 

मुड़कर 


मुस्कुराना चाहती हैं 

पर 

एक उदास खामोशी लिए 

चुपचाप 

चल देती हैं घर की ओर 

जब 

दूर का कोई भाई-भतीजा 

देखकर भी फेर लेता है नज़र


बिसराई गई बहनें 

और भुलाई गई बेटियाँ 

अपने बच्चों को 

खूब सुनाना चाहतीं हैं 

नाना-नानी

मामा-मौसी के किस्से 


पर 

फिर संभल कर

 बदल देतीं हैं बात 

और सुनाने लगतीं हैं 

परियों और दैत्यों की कहानियां----

-----------------------

उदास  होना अपने वक्त की तल्खियों  पर---

***************

कांपती  सी  प्राथनाओं में  उसने  मांगी 

थोड़ी- सी  उदासी  

थोड़ा-सा  सब्र 

और 

ढ़ेर  सारा  साहस 


अपने अन्दर की आग  को 

बचाये  रखने  के  लिए 

ज़रूरी  है  

अपने वक्त की तल्खियों पर 

उदास  होना 


उन  लोगों  के  लिए 

उदास  होना 

जो  बरसों  से  खुश  नहीं  हो  पाये 


उनके  लिए  उदास  होना 

ज़िन्होने 

हमारे  हक  की  लड़ाई में 

खो दी  जीवन  की  सारी  खुशियां 

ज़िन्होने  गुजार  दिये  

बीहड़ो  में  जीवन  के 

जाने  कितने  वसंत 


ज़िन्होने  नहीं  देखे  अपने  

दूधमुंहें  बच्चे  के 

चेहरे 

नहीं  सुनी  उनकी 

किलकारियां ,

वो  बस  सुनते  रहे  

हमारी  चीखें 

,हमारा  आर्तनाद 

और  हमारा  विलाप ,


उन्होंने  नहीं  थामीं 

अपने स्कूल  जाते  बच्चे  की  

उंगलियां 

उन्होंने  थामे  

हमारे  शिकायत  के

पुलिन्दे  

हमारी  अर्जियां ..


किसी  शाम  घर  में 

चाय की गर्म 

चुस्की  के साथ  

वे  नहीं  पूछ  पाये 

अपनों का हाल-चाल ..

वो बस पूछते रहे 

सचिवालय,दफतर ,थानों में  

हमारी  रपट के  जवाब ..


कभी  चांदनी  अमावस या  

किसी  भी  पूरी  रात 

वे नहीं  थाम  सकें 

अपनी  प्रिया  के  प्रेम  का

 ज्वार 

उन्होंने  थामें  रखी 

हमारी  मशालें 

हमारे  नारे 

और  हमारी  बुलंद  

आवाज़  


वे ऋतुओं  के  बदलने  पर  भी  

नहीं  बदले ,

टिके  रहे  

अडिग संथाल  के  पठार या 

हिमालय  के पहाड़ों  की  तरह 


हर  ऋतु  में उन्होंने  सुने 

एक  हीं  राग  

एक  हीं  नाद ,

वो  सुनते  रहे 

सभ्यता  का  शोक  गीत .


उबलता रहा  उनका  लहू 

फैलते  रहे वे 

 चाँद और  सूरज की  किरण  की  तरह 

और  पसरते  रहे  

हमारे  दग्ध दिलों पर 

अंधेरे  दिनों 

सुलगती  रातों  पर 

और  भूला  दिये  गए 

अपने  हीं  वक्त  की गैर जरूरी 

कविता  की  तरह 


वे  सिमट  गए  घर  और  चौपाल के 

किस्सों  तक 

नहीं  लगे  उनके  नाम  के  शिलालेख 

नहीं  पुकारा  गया  उन्हें  

उनके  बाद  


बिसार  दिया  गया 

उन्हें और  उनकी  सोच  को 

किसी  नाजायज बच्चे  की  तरह  

बन्द  कर  लिए  हमने 

 स्मृतिओं  के  द्वार  


जरूरी  है  थोड़ी -सी  उदासी 

कि  खोल  सकें 

बन्द  स्मृतियों  के  द्वार 


जरूरी  है  थोड़ी  सी  उदासी  

कि बचाई  जा  सके 

अपने  अन्दर  की  आग 


जरूरी  है  थोड़ा -सा  सब्र 

हमारे  आस - पास  घटित  होते  

हर  गलत  बात  पर  

जताई  गई  

असहमति, प्रतिरोध  और  

भरपूर  लड़ी  गई  लड़ाई  के  बावजूद 

हारे -थके  और  चुक-से  जाने का  दंश 

बरदाश्त  करने  के  लिए  


और  बहुत  जरूरी  है  

थोड़ा सा साहस 

तब 

जब  हम  हों  नज़रबन्द 

या  हमें  रखा हो  युद्धबन्दी की  तरह 

आकाओं  के  रहम  पर  


बहुत  जरूरी  है  थोड़ा साहस  

कि कर  सकें  जयघोष

फाड़  सकें  अपना  गला  

और  

चिल्ला  सकें

इतनी  जोर  से  

कि फटने  लगे  धरती  का  सीना

और तड़क उठें 

 हमारे  दुश्मनों  के  माथे  की  नसें  

कि कोई बवण्डर

कोई  सुनामी तहस-नहस  कर  दें 

उनका  सारा  प्रभुत्व  ..


बहुत  ज़रूरी  है  ढ़ेर  सारा  साहस  

तब  जबकि  हम  जानते  हैँ  

हमारे  सामने है 

आग  का  दरिया 

और  हमारा  अगला  कदम  हमें  

धूँ- धूँ  कर  जला  देगा 


फिर  भी  

उस  आग  की  छाती  पर 

पैर  रखकर 

समन्दर  सा  उतर  जाने का 

साहस बहुत ज़रूरी  है |


जरूरी  है  बर्बर 

और  वीभत्स  समय  में 

फूँका  जाये  शंखनाद 

गायए जाएँ 

मानवता   के गीत 

और  लड़ी  जाए 

समानता और  नैतिकता  की  लड़ाई 


तभी  बचे  रह  सकते हैं   

हम  सब  

और  हमारे सपने 

हम  सब  के  बचे  रहने के  लिए  


बहुत  जरूरी  है  

थोड़ी -सी  उदासी ,

थोड़ा -सा  सब्र  और 

ढ़ेर  सारा  साहस----

----------------------

प्रेम  बहुत  दुस्साहसी  है 

************

प्रेम  बहुत  दुस्साहसी  है 

पार  कर  लेता  है 

डर  की  सारी  हदें 

वर्जनाओं  के  समन्दर 

अन्देशाओं  के  पर्वत 


और  ढ़ीठ की  तरह 

टिका  रहता  है 

अपनी  जगह 


कभी  ना  उखाड़ कर  

फेंके  जाने  वाले  

कील  की  तरह  

य़ा  फिर  एक  

धुरी  की  तरह  


और  नाचता  रहता  है  

अपने  हीं  गिर्द---

---------------------

मौन

****

तुमने 

जब  से  

मेरा  बोलना  

बन्द  किया  है ..


देखो

मेरा  मौन  

कितना  चीखने  लगा  है 


.गूँजने   लगी  है

 मेरी  असहमति

 और  ...


चोटिल  हो रहा  है 

 तुम्हारा  दर्प----

---------------//-------------------

परिचय

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रंजिता सिंह 'फ़लक'

जन्मभूमि- छपरा (बिहार)

शिक्षा- रसायन शास्त्र से स्नात्कोत्तर 

* देश के 21 राज्यों में विगत तीन वर्षों से प्रसारित साहित्यिक पत्रिका 'कविकुंभ' की संपादक और  प्रकाशक l

*खबरी डॉट कॉम न्यूज  पोर्टल की  सम्पादक और  प्रोपराईटर l

महिलाओं के पक्षधर संगठन

 'बिईंग वूमेन' की राष्ट्रीय अध्यक्ष।

* शायरा, लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता ।

प्रकाशन--

 देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्पेशल न्यूज, परिचर्चा, रिपोर्ताज, गीत-गजलों का विगत दो दशकों से अनवरत प्रकाशन।

दूरदर्शन ,आकाशवाणी और  चर्चित चैनल से कविता  पाठ 

किताबें 

शब्दशः कविकुंभ - बातें कही अनकही |

कविता संग्रह-

"प्रेम में पड़े रहना"

शीघ्र  प्रकाश्य  किताब "आलोचना  की  प्रार्थना सभा " में कविताओं पर  बात आलोचक समीक्षक  शहंशाह आलम द्वारा .

उपलब्धियां :~ 

*हरिद्वार लिट फेस्ट में  गुरुकुल  कांगरी  विश्वविधालय द्वारा  सम्मानित .

*2019 में अमर भारती  संस्थान द्वारा वर्ष  2018 का  'सरस्वती सम्मान ' |

*2019 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 'शताब्दी सम्मान

* बिहार दूरदर्शन, देहरादून दूरदर्शन, आकाशवाणी, दिल्ली आकाशवाणी, लखनऊ दूरदर्शन केंद्रों पर अनेक परिचर्चाओं में सहभागिता, कविता पाठ।  

* 2017 में कोलकाता, राजभाषा के सौजन्य से 'नारायणी' सम्मान।

* 2016 में दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित, वाणी प्रकाशन के 'शब्द गाथा' संकलन में देश के सर्वश्रेष्ठ समीक्षकों के रूप में चयनित एवं सम्मानित ।

फोन संपर्क~ 9548181083 

ई-मेल संपर्क -

kavikumbh@gmail.com

Khabrinews@gmail.com

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

Kavita Raizaada

 एक चूहा घर में बिल बना कर रहता था।

एक दिन चूहे ने देखा कि उस घर में उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं। चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है।

उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी।

ख़तरा भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है।

कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है?

निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताने गया।

मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा : जा भाई, ये मेरी समस्या नहीं है।

हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा।

उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई, जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था।

अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस कसाई की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डस लिया।

तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने हकीम को बुलवाया। हकीम ने उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी।

कबूतर अब पतीले में उबल रहा था।

खबर सुनकर उस कसाई के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन उसी मुर्गे को काटा गया।

कुछ दिनों बाद उस कसाई की पत्नी सही हो गयी, तो खुशी में उस व्यक्ति ने कुछ अपने शुभचिंतकों के लिए एक दावत रखी तो बकरे को काटा गया।

चूहा अब दूर जा चुका था, बहुत दूर!

अगली बार कोई आपको अपनी समस्या बतायेे और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है, तो रुकिए और दुबारा सोचिये।

समाज का एक अंग, एक तबका, एक नागरिक खतरे में है तो पूरा समाज व पूरा देश खतरे में है।

अपने-अपने दायरे से बाहर निकलिये। स्वयं तक सीमित मत रहिये। सामाजिक बनिये !!

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

ऊर्जा का अर्थ / रंजन कुमार सिंह

 ऊर्जा / रंजन कुमार सिंह 

ऊर्जा का निर्माण या विनाश नहीं हो सकता, आइंस्टीन ने कहा था, और कृष्ण ने कहा, मैं ही क्यों, तुम और ये तमाम राजा-महाराजा अब से पहले भी थे और अब के बाद में भी होंगे। आत्मचिन्तन की सातवीं कड़ी आपके ध्यानार्थ 

https://youtu.be/94nRyBcPD_A

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

मुक्ति की कामना / रंजन कुमार सिंह

 

 रंजन कुमार सिंह 

मुक्ति की कामना किसे न होगी। आदि शंकराचार्य ने कहा है कि जब हम रस्सी को साँप समझ लेते हैं तो उससे डर जाते हैं। जी  हां, हमारा डर रस्सी को साँप मान लेने में है। साँप है नहीं, पर हम रस्सी में साँप देख लेते हैं और उससे डर जाते हैं। शंकराचार्य जी कहते हैं, रस्सी में साँप का विभ्रम ही माया है। और इस सत्य की पड़ताल कर के ही हम स्वयं को माया से मुक्त कर सकते हैं। यानी जब हमें रस्सी की सच्चाई का पता चलता है तो हमारा डर आप से आप चला जाता है और हम डर से मुक्त हो जाते हैं। आतम्चिन्तन की आठवीं कड़ी में लेखक एवं चिन्तक रंजन कुमार सिंह कहते हैं, लोगों को डराकर रखना बेहद आसान है और उनमें विश्वास भरना उतना ही मुश्किल। आज के संदर्भ में बात करें तो सभी धर्म हमें डराकर ही मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर तक पहुंचाने की कोशिशों में लगे हैं। जबकि धर्म तो वह है जो हममें विश्वास जगाकर हमें ईश्वर तक पहुंचाए। डर कर रहने से क्या डर से मुक्ति संभव है? https://youtu.be/TJEDJ7Cbx_Q

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

कुण्डलिया /दिनेश श्रीवास्तव

 कृष्ण कन्हैया  / दिनेश श्रीवास्तव: (कुण्डलिया)


                    *कृष्ण-कन्हैया*


                        (१)


कृष्ण-कन्हैया प्रगट हों,पुनः हमारे धाम।

विपदा यहाँ अपार है,संकट यहाँ तमाम।।

संकट यहाँ तमाम,बचा लो धरती प्यारे।

तुम्हीं हमारे देव,आज हे!नंददुलारे।।

धरती के सब लोग,पुकारें दैया-दैया।

हमे बचा लो श्याम!,हमारे कृष्ण-कन्हैया।।


                     (२)


आया ऐसा शुभ दिवस, टूटा कारागार।

भाद्र माह की अष्टमी,लिए कृष्ण अवतार।

लिए कृष्ण अवतार,चतुर्दिक बजी बधाई।

देवों ने भी देख,पुष्प वर्षा बरसाई।।

वासुदेव ने लाल,यशोदा अंक बिठाया।

अद्भुत यह सौभाग्य,नंद के द्वारे आया।।


                      (३)


होते हैं संसार मे,जब जब पापाचार।

तभी यहाँ इस अवनि पर,प्रभु लेते अवतार।।

प्रभु लेते अवतार,दुष्ट मर्दन हैं करते।

भक्त जनों के कष्ट, सदा प्रभुवर हैं हरते।।

कहता सत्य दिनेश,अधर्मी निश्चित रोते।

राम कृष्ण के रूप,अवतरित जब प्रभु होते।।


                      दिनेश श्रीवास्तव

                      ग़ाज़ियाबाद

[8/11, 17:23] DS दिनेश श्रीवास्तव: गीत


          *कृष्ण लिए अवतार*


          चमत्कार ऐसा हुआ,

          टूटा कारागार।

          खुली पाँव की बेड़ियाँ,

           हुआ जगत उजियार।

           भाद्र माह की अष्टमी,

           षोडश गुण आगार।

           मानव सेवा के लिए,

          कृष्ण लिए अवतार।।-१


          देवों के भी दर्प को,

          किया कृष्ण ने चूर।

         मानव-सेवा के लिए,

          हुए देव मजबूर।

          ब्रह्मा जी ने भी किया,

           कृष्णभक्ति स्वीकार।

           गोपालक के रूप में,

           कृष्ण लिए अवतार।।-२


           कामदेव के दर्प को,

           करते हैं जो चूर।

           काम क्रोध मद लोभ से,

           करते हमको दूर।

           पराशक्ति परब्रह्म थे

            कोई नहीं विकार।

            निर्विकार के रूप में,

            कृष्ण लिए अवतार।।-३


             हुआ मानवी रूप का,

             वहाँ श्रेष्ठता सिद्ध।

            देवराज जब इंद्र को

             किए बाण से विद्ध।

            गोवर्धन धारण किया,

            थी विपत्ति की मार।

            प्रतिपालक के रूप में,

            कृष्ण लिए अवतार।।-४


            कंस,जरा,शिशुपाल का,

             फैला था आतंक।

           मधुसूदन ने अंत कर,

            धरती किया निशंक।

            किया धरा पर कृष्ण ने

            असुरों का संहार।

            धर्म धरा संस्थापना,

            कृष्ण लिए अवतार।।-५


           चंद्रवदन,लोचन कमल,

             मुख पर मुरली तान।

            दरस मात्र से हो सदा,

           शोक-मोह अवसान।

           फैले भारत देश में,

           मानवता से प्यार।

           इसी लिए इस जगत में,

            कृष्ण लिए अवतार।।-६


                       दिनेश श्रीवास्तव

                        ग़ाज़ियाबाद

बुधवार, 5 अगस्त 2020

जारुहार (जारहार ) खासघर कथा

जारुहार (जारुआर) खासघर

कुल वाले कृपया ध्यान दे, आपके खासघर से इंगित होने वाला मूल गांव "जारु" वर्तमान जहानाबाद जिला अन्तर्गत हुलासगंज ब्लॉक के अन्दर, फल्गु नदी से पूरब में स्थित है। यह गांव, अम्बा-कुटुम्बा और प्राचीन राजगीर को जोडने वाली सीधी सरल रेखा के समीप है, फल्गु नदी के पूर्वी तट के समीप है और गया जिला तथा जहानाबाद जिला की सीमा के निकट है।

जारु गांव के आसपास कुछ ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं। इनमें से, सबसे महत्वपूर्ण स्थल है बराबर पहाडियों की गुफाएं जो सम्राट अशोक से भी जुडा हुआ है। ये गुफाएं, जारु से पश्चिम दिशा में समीप है।
जारु गांव के समीप एक दूसरा गांव दप्थु (Dapthu) है जो दफ्तुआर खासघर वालों का मूलगांव है। दप्थु अपने ब्लॉक मुख्यालय हुलासगंज से 03 मील की दूरी पर है। दप्थु में  finely carved images और सनातन धर्म मंदिर के अवशेष भी हैं। इस दप्थु गांव के समीप "लाठ" गांव भी है। लाठ के दक्षिण में, खुले मैदान में जो कभी बडा जलाशय  रहा होगा, एक ग्रेनाइट पत्थर का लाठ है जो आधा जमीन में गडा हुआ है। A large monolith granite piller 53 feet 03 inch long having an average width of 03 feet, is lying half burried in the field.

बराबर पहाडियों के दूसरी ओर फल्गु नदी के पूरब में जारु और बनवरिया (Banwaria) गांव है जहां एक विशाल मन्दिर का भग्नावशेष है तथा इसके समीपस्थ गांव काको (Kaako), घेनजन (Ghenjan) तथा नेर (Ner) गांव में ऐतिहासिक महत्व के अवशेष पाये गये हैं। 

निष्कर्ष में यही कहा जा सकता है कि जारु गांव एक प्राचीन गांव, ऐतिहासिक महत्व के स्थलों के मध्य स्थित है। और मुझे यह कहने में कोई दुविधा नहीं है कि जारु गांव ही जारुहार/जारुआर खासघर वालों का मूलगांव है। जारुहार/जारुआर खासघर वाले इसे ध्यान से पढ़ें और अपना कमेन्ट्स अवश्य दे। जय चित्रांश, जय हो..


JARU (जारु) Village, about

Jaru is a small Village in Hulasganj Block in Jehanabad District of Bihar State, India. It comes under Jaru Panchayat. It belongs to Magadh Division . It is located 28 KM towards South from District head quarters Jehanabad. 11 KM from Hulasganj. 77 KM from State capital Patna.

Dharaut ( 8 KM ) , Bauri ( 9 KM ) , Khudauri ( 9 KM ) , Hulasganj ( 10 KM ) , Uber ( 10 KM ) are the nearby Villages to Jaru. Jaru is surrounded by Hulasganj Block towards North , Belaganj Block towards west , Neemchak Bathani Block towards East , Makhdumpur Block towards west .

Makhdumpur , Islampur , Jehanabad , Gaya are the near by Cities to Jaru.

This Place is in the border of the Jehanabad District and Gaya District. Gaya District Neemchak Bathani is East towards this place . 
Jaru 2011 Census Details

Jaru Local Language is Magahi. Jaru Village Total population is 4068 and number of houses are 640. Female Population is 46.9%. Village literacy rate is 61.6% and the Female Literacy rate is 24.9%.


शोध की खातिर किस दुनिया में ? कहां गए ?

प्रिय भारत! / शम्भू बादल  प्रिय भारत!  शोध की खातिर किस दुनिया में ?  कहां गए ? साक्षात्कार रेणु से लेने ? बातचीत महावीर से करने?  त्रिलोचन ...