मंगलवार, 30 जून 2020

हिंदी के उपयोगी प्रयोग





*हिन्दी के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोग*
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हिन्दी लिखने वाले अक़्सर 'ई' और 'यी' में, 'ए' और 'ये' में और 'एँ' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं...।
कहाँ क्या इस्तेमाल होगा, इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...।
जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं, क्रियाएँ नहीं।
जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई-बुझाई...।
इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है... इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...। इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...। 'नई' ग़लत है , सही शब्द 'नयी' है... मूल शब्द 'नया' है , उससे 'नयी' बनेगा...।

क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...?
( 'मिलाई' ग़लत है...।)
आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...।
( 'जताई' ग़लत है...।)
उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...। ('पाई' ग़लत है...।)

अब आइए 'ए' और 'ये' के प्रयोग पर...।
बच्चों ने प्रतियोगिता के दौरान सुन्दर चित्र बनाये...। ( 'बनाए' नहीं...। )
लोगों ने नेताओं के सामने अपने-अपने दुखड़े गाये...। ( 'गाए' नहीं...। )
दीवाली के दिन लखनऊ में लोगों ने अपने-अपने घर सजाये...। ( 'सजाए' नहीं...। )

तो फिर प्रश्न उठता है कि 'ए' का प्रयोग कहाँ होगा..?
 'ए' वहाँ आएगा जहाँ अनुरोध या रिक्वेस्ट की बात होगी...।
अब आप काम देखिए, मैं चलता हूँ...। ( 'देखिये' नहीं...। )
आप लोग अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी के विषय में सोचिए...। ( 'सोचिये' नहीं...। )
 ऐसा विचार मन में न लाइए...। ( 'लाइये' ग़लत है...। )

अब आख़िर (अन्त) में 'यें' और 'एँ' की बात...
यहाँ भी अनुरोध का नियम ही लागू होगा... रिक्वेस्ट की जाएगी तो 'एँ' लगेगा , 'यें' नहीं...।
आप लोग कृपया यहाँ आएँ...। ( 'आयें' नहीं...। )
जी बताएँ , मैं आपके लिए क्या करूँ ? ( 'बतायें' नहीं...। )
मम्मी , आप डैडी को समझाएँ...। ( 'समझायें' नहीं...। )

अन्त में सही-ग़लत का एक लिटमस टेस्ट...
एकदम आसान सा... जहाँ आपने 'एँ' या 'ए' लगाया है , वहाँ 'या' लगाकर देखें...। क्या कोई शब्द बनता है ? यदि नहीं , तो आप ग़लत लिख रहे हैं...।
आजकल लोग 'शुभकामनायें' लिखते हैं... इसे 'शुभकामनाया' कर दीजिए...। 'शुभकामनाया' तो कुछ होता नहीं , इसलिए 'शुभकामनायें' भी नहीं होगा...।
'दुआयें' भी इसलिए ग़लत है और 'सदायें' भी... 'देखिये' , 'बोलिये' , 'सोचिये' इसीलिए ग़लत हैं क्योंकि 'देखिया' , 'बोलिया' , 'सोचिया' कुछ नहीं होते...।

रविवार, 28 जून 2020

बेटी की विदाई






माँ अब मैं विदा हो रही हूं
ये न समझो जुदा हो रही हूँ
मैं हूँ बेटी बहु बन रही हूँ
हाँ तेरी हू-ब-हू बन रही हूं

रीतियों के चलन चल रही हूं
हां माँ ! बिछिया पहन चल रही हूँ
नाक नथिया पहन चल रही हूँ
माँ ! क्या सच मे ? दुल्हन बन रही हूँ

थाम दामन सजन चल रही हूँ
झुमके कंगना पहन चल रही हूं
माँ ! थाम मुझको किधर जा रही हूँ
तू भी चल मैं जिधर जा रही हूँ

माँ ! पापा किस बात पे रो रहे हैं
बोलो किस दर्द में खो रहे हैं
तुम भी कुछ क्यों नही कह रही हो
ऐसे चुप चाप क्यों रो रही हो

माँ ! देख भैया उधर रो रहा है
जानें किस बात से डर रहा है
डर भी डरता है जिससे उसे भी
देखो खंभा पकड़ रो रहा है

माँ ! मेरी किस्मत की रेखा
जो तेरी हाथ होकर गुजरती
टूटने ना तू देना कभी भी
थाम लेना अगर कुछ हुआ तो
प्रार्थना तुझसे मैं कर रही हूँ

माँ अब मैं विदा हो रही हूँ
ये न समझो जुदा हो रही हूँ i

    #Shubhu😭😭😭

साथ साथ




सुबह सुबह एक जाहिल किस्म का मित्र आ गया।

कुछ देर बात करते करते बात चाइना और चाइनीज सामान के बहिष्कार पर आ गई।

उसने भी बाकी सारे जाहिल मूर्खो की तरह एक ही कुतर्क दिया - सरकार से कहो आयत बंद कर दो, हमको सस्ता मिलेगा तो हम लेंगे, जब इतना ही बुरा है तो बाजार में बिकता क्यों है ?

मैं जवाब देने के बदले मुस्कुराया और बोला चल हल्दी राम का समोसा खिलाता हूँ गाडी में बिठाया और एक बहुत छोटे से खोमचे/ ठेले के सामने गाड़ी रोक दिया।

वहां की गंदगी देख कर वो भिनभिनाने लगा।

मित्र - ये कहा ले आया, चल हल्दी राम के यहाँ चल न....

मैं - भाई ये सस्ता है, यहाँ समोसा 5 रुपये में मिलता है।

मित्र ने कहा - सस्ता है तो क्या हुआ भाई, देख नहीं रहा कितनी गंदगी है, तबियत ख़राब हो जाएगी।

मैंने कहा - भाई अगर इतना बुरा है तो नगरपालिका / खाद्य विभाग वाले बंद क्यों नहीं कराते।

मित्र - भाई कोई किसी को अपना ठेला लगाने से कैसे रोक सकता है, अपनी सेहत का ख्याल तो खुद को ही रखना होगा न।

मैंने भी फाइनली वाला ज्ञान दिया - वाह बेटा अपनी सेहत की बारी आई तो लगभग आधी कीमत में मिल रहे समोसे से इंकार , और देश की अर्थव्यवस्था की सेहत के समय मुझे तो चीन का माल सस्ता मिल रहा है कहते हो।

मत भूलो तुम भी इस देश की अर्थव्यवस्था के एक अंग हो, आज नहीं तो कल सेहत पर असर तुम्हारे भी आएगा, और रही बात सरकार के रोकने की, तो ये खुला बाजार है, जैसे नगरपालिका ऐसे ठेला लगाने से नहीं रोक सकती वैसे सरकार भी किसी को माल बेचने से नहीं रोक सकती....

पर एक भारतीय होने के कारण अपनी और देश की सेहत का ख्याल तुम को खुद रखना होगा।

कसम से वो अर्जुन सा नतमस्तक हो कर मुझे श्री कृष्ण सी फीलिंग दे रहा था।

मैंने भी जोश जोश में कह दिया - चलो पार्थ अब हल्दी राम के ही समोसे खिलाता हूँ।
🙏
*जय हिंद

संस्कृत के रोचक प्रसंग तथ्य






#संस्कृत_के_बारे_में_रोचक_तथ्य

1. मात्र 3,000 वर्ष पूर्व तक भारत में संस्कृत बोली जाती थी तभी तो ईसा से 500 वर्ष पूर्व पाणिणी ने दुनिया का पहला व्याकरण ग्रंथ लिखा था, जो संस्कृत का था। इसका नाम ‘अष्टाध्यायी’ है।

2. संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक (ऋग्वेद) की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की# प्रथम भाषा मानने में कहीं किसी संशय की संभावना नहीं है।

3. इसकी सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है।

4. संस्कृत ही एक मात्र साधन हैं जो क्रमशः अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं।

5. संस्कृत अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ ग्रहण करने में सहायता मिलती है।

6. संस्कृत केवल एक मात्र भाषा नहीं है अपितु संस्कृत एक विचार है संस्कृत एक संस्कृति है एक संस्कार है संस्कृत में विश्व का कल्याण है शांति है सहयोग है वसुदैव कुटुम्बकम् कि भावना है।!

7. नासा का कहना है की 6th और 7th generation super computers संस्कृत भाषा पर आधारित होंगे।

8. संस्कृत विद्वानों के अनुसार सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से 9 रश्मियां(Beams of light) निकलती हैं और ये चारों ओर से अलग-अलग निकलती हैं। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गईं। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने।!

9. कहा जाता है कि अरबी भाषा को कंठ से और अंग्रेजी को केवल होंठों से ही बोला जाता है किंतु संस्कृत में वर्णमाला को स्वरों की आवाज के आधार पर कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अंतःस्थ और ऊष्म वर्गों में बांटा गया है।!

10. संस्कृत उत्तराखंड की आधिकारिक राज्य(official state) भाषा है।!

11.अरब आक्रमण से पहले संस्कृत भारत की राष्ट्रभाषा थी।!

12. कर्नाटक के मट्टुर(Mattur) गाँव में आज भी लोग संस्कृत में ही बोलते हैं।!

13. जर्मनी के 14 विश्वविद्यालय लोगों की भारी मांग पर संस्कृत (Sanskrit) की शिक्षा उपलब्ध करवा रहे हैं लेकिन आपूर्ति से ज्यादा मांग होने के कारन वहाँ की सरकार संस्कृत (Sanskrit) सीखने वालों को उचित शिक्षण व्यवस्था नहीं दे पा रही है।!

14. हिन्दू युनिवर्सिटी के अनुसार संस्कृत में बात करने वाला मनुष्य बीपी, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल आदि रोग से मुक्त हो जाएगा।!

15. संस्कृत में बात करने से मानव शरीर का तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है। जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश के साथ सक्रिय हो जाता है।!

16. यूनेस्को(UNESCO) ने भी मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की अपनी सूची में संस्कृत वैदिक जाप को जोड़ने का निर्णय लिया गया है। !यूनेस्को(UNESCO) ने माना है कि संस्कृत भाषा में वैदिक जप मानव मन, शरीर और आत्मा पर गहरा प्रभाव पड़ता है।!

17. शोध से पाया गया है कि संस्कृत (Sanskrit) पढ़ने से स्मरण शक्ति(याददाश्त) बढ़ती है।!

18. संस्कृत वाक्यों में शब्दों की किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं। जैसे- अहं गृहं गच्छामि >या गच्छामि गृहं अहं दोनों ही ठीक हैं।!

19. नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार जब वो अंतरिक्ष ट्रैवलर्स को मैसेज भेजते थे तो उनके वाक्य उलट हो जाते थे। इस वजह से मैसेज का अर्थ ही बदल जाता था। उन्होंने कई भाषाओं का प्रयोग किया लेकिन हर बार यही समस्या आई। आखिर में उन्होंने संस्कृत में मैसेज भेजा क्योंकि संस्कृत के वाक्य उलटे हो जाने पर भी अपना अर्थ नहीं बदलते हैं। जैसा के ऊपर बताया गया है।!

20. संस्कृत भाषा में किसी भी शब्द के समानार्थी शब्दों की संख्या सर्वाधिक है. जैसे हाथी शब्द के लिए संस्कृत में १०० से अधिक समानार्थी शब्द हैं।!



माँ की सीख - सबक





मां की सीख
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सुबह के चार बजे थे, अचानक बज रही फ़ोन की घंटी ने मेरी नींद को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, सुबह के चार बजे फ़ोन आना किसी अनहोनी घटना के होने की और हमेशा इशारा होता है। पापा का फ़ोन.. इस टाइम.. मेरे हाथ एक दम से सुन्न हो गये थे। कई दिनों से मां की तबियत ठीक नहीं चल रही थी। फ़ोन तो उठाओ.. मेरे पति राहुल ने कहा, हेलो पापा.. बेटा जितनी जल्दी हो सके आ जाओ... क्या हुआ पापा... मां ठीक तो है... मैंने नम आँखों से कहा, आ जाओ... पापा ने ये कहते हुए फ़ोन रख दिया था, मैं फूट फूट कर रोने लगी। पागल मत बनो.. सम्भालो अपने आप को... जल्दी करो घर चलना है। राहुल ने मेरी ओर देखते हुए कहा।
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करीब 1 घंटे के सफर के बाद मैं घर पहुंची, मां मैं आ गई.. मां ने मुश्किल से आंखें खोल कर मेरी ओर देखा, बेटा तू ठीक तो है.. ये मां ही पूछ सकती है। खुद जिंदगी और मौत से जूझ रही है और अब भी अपनी औलाद की चिंता है। मां मैं ठीक हूं। तुम परेशान मत हो। जल्दी ठीक हो जाओ, फिर बाहर चलेंगे। बेटा मुझको पता है मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। ये बोलते हुए मां ने मेरी ओर एक लेटर बढ़ा दिया। ये क्या है... मैंने नम आंखो से कहा। बेटा ये मेरी अंतिम नसीहत है और जरूरी भी। अंतिम शब्द सुन कर मैं अपने आप से काबू खो चुकी थी। मां से लिपट कर फूट फूट कर रोने लगी। पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा.. बेटा बस कर... वो जा चुकी है। आज मेरी सहेली, मेरी शिक्षक, मेरी मां मुझको छोड़कर जा चुकी थी। ऐसा लगा, मेरे शरीर का कुछ हिस्सा मुझसे अलग हो चुका है। अंतिम संस्कार के बाद
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मैंने मां का लेटर खोला। लिखा था- मेरी प्यारी बेटी जब तुम ये लेटर पढ़ रही होगी, तब मैं शारीरिक रूप से तुमसे अलग हो चुकी होगी। लेकिन मेरी सीख, मेरे संस्कार हमेशा तुम्हें मेरे होने का आभास दिलाते रहेंगे। मेरी तीन नसीहत हैं।
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1-मां बाप के बाद मायका भैया और भाभी से होता है। कभी लेने और देने के बीच प्यार को मत आने देना।
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2-तुम ऐसी बनना जैसे तुम अपनी बेटी को बनाना चाहती हो, क्योंकि तुम आने वाली मां हो और मैं बीते हुए कल की बेटी
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3-एक औरत की पहचान उसके त्याग, ममता, और प्यार से ही होती है जो हमेशा बनाये रखना।
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अगले जन्म में मैं तुम्हारी बेटी बनकर आना चाहती हूं, तुममें आने वाली मां देखना चाहती हूं।

तुम्हारी मां।

रिपोस्ट

कालिदास सच सच बतलाना / नागार्जुन




कालिदास! सच-सच बतलाना

इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोये थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना!

शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
कालिदास! सच-सच बतलाना
रति रोयी या तुम रोये थे?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास! सच-सच बतलाना
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे!

कालिदास! सच-सच बतलाना!

~~~~नागार्जुन~~~~
https://youtu.be/r0FBhLcD24M

डॉ. हरी ओम पवार





डाँ हरी ओम पवार ने रायपुर कविसम्मेलन आज चंद्रशेखर आज़ाद पे कविता सुनाइ जो उन्होने मायावती द्वारा चंद्रशेखर आज़ाद का अपमान करने पर लिखी थी…और विडम्ब्ना देखिये उस समय मायावती की सरकार बीजेपी के समर्थन पे बनी थी, और बीजेपी के किसी नेता ने उसका विरोध नही किया…कवि की हिम्मत देखो उन्होने ये कविता डाँ रमन सिंग के सामने कहि…

“मन तो मेरा भी करता है झूमूँ , नाचूँ, गाऊँ मैं
आजादी की स्वर्ण-जयंती वाले गीत सुनाऊँ मैं

लेकिन सरगम वाला वातावरण कहाँ से लाऊँ मैं
मेघ-मल्हारों वाला अन्तयकरण कहाँ से लाऊँ मैं

मैं दामन में दर्द तुम्हारे, अपने लेकर बैठा हूँ
आजादी के टूटे-फूटे सपने लेकर बैठा हूँ

घाव जिन्होंने भारत माता को गहरे दे रक्खे हैं
उन लोगों को z सुरक्षा के पहरे दे रक्खे हैं

जो भारत को बरबादी की हद तक लाने वाले हैं
वे ही स्वर्ण-जयंती का पैगाम सुनाने वाले हैं

आज़ादी लाने वालों का तिरस्कार तड़पाता है
बलिदानी-गाथा पर थूका, बार-बार तड़पाता है

क्रांतिकारियों की बलि वेदी जिससे गौरव पाती है
आज़ादी में उस शेखर को भी गाली दी जाती है

राजमहल के अन्दर ऐरे- गैरे तनकर बैठे हैं
बुद्धिमान सब गाँधी जी के बन्दर बनकर बैठे हैं

इसीलिए मैं अभिनंदन के गीत नहीं गा सकता हूँ |
मैं पीड़ा की चीखों में संगीत नहीं ला सकता हूँ | |

इससे बढ़कर और शर्म की बात नहीं हो सकती थी
आजादी के परवानों पर घात नहीं हो सकती थी

कोई बलिदानी शेखर को आतंकी कह जाता है
पत्थर पर से नाम हटाकर कुर्सी पर रह जाता है

गाली की भी कोई सीमा है कोईमर्यादा है
ये घटना तो देश-द्रोह की परिभाषा से ज्यादा है

सारे वतन-पुरोधा चुप हैं कोई कहीं नहीं बोला
लेकिन कोई ये ना समझे कोई खून नहीं खौला

मेरी आँखों में पानी है सीने में चिंगारी है
राजनीति ने कुर्बानी के दिल पर ठोकर मारी है

सुनकर बलिदानी बेटों का धीरज डोल गया होगा
मंगल पांडे फिर शोणित की भाषा बोल गया होगा

सुनकर हिंद – महासागर की लहरें तड़प गई होंगी
शायद बिस्मिल की गजलों की बहरें तड़प गई होंगी

नीलगगन में कोई पुच्छल तारा टूट गया होगा
अशफाकउल्ला की आँखों में लावा फूट गया होगा

मातृभूमि पर मिटने वाला टोला भी रोया होगा
इन्कलाब का गीत बसंती चोला भी रोया होगा

चुपके-चुपके रोया होगा संगम-तीरथ का पानी
आँसू-आँसू रोयी होगी धरती की चूनर धानी

एक समंदर रोयी होगी भगतसिंह की कुर्बानी
क्या ये ही सुनने की खातिर फाँसी झूले सेनानी ???

जहाँ मरे आजाद पार्क के पत्ते खड़क गये होंगे
कहीं स्वर्ग में शेखर जी केबाजू फड़क गये होंगे

शायद पल दो पल को उनकी निद्रा भाग गयी होगी
फिर पिस्तौल उठा लेने की इच्छा जाग गयी होगी

केवल सिंहासन का भाट नहीं हूँ मैं
विरुदावलियाँ वाली हाट नहीं हूँ मैं

मैं सूरज का बेटा तम के गीत नहीं गा सकता हूँ |
मैं पीड़ा की चीखों में संगीत नहीं ला सकता हूँ | |

महायज्ञ का नायक गौरव भारत भू का है
जिसका भारत की जनता से रिश्ता आज लहू का है

जिसके जीवन के दर्शन ने हिम्मत को परिभाषा दी
जिसने पिस्टल की गोली से इन्कलाब को भाषा दी

जिसकी यशगाथा भारत के घर-घर में नभचुम्बी है
जिसकी थोड़ी सी आयु भी कई युगों से लम्बी है

जिसके कारण त्याग अलौकिक माता के आँगन में था
जो इकलौता बेटा होकर आजादी के रण में था

जिसको ख़ूनी मेहंदी से भी देह रचना आता था
आजादी का योद्धा केवल चना-चबेना खाता था

अब तो नेता सड़कें, पर्वत, शहरों को खा जाते हैं
पुल के शिलान्यास के बदले नहरों को खा जाते हैं

जब तक भारत की नदियों में कल-कल बहता पानी है
क्रांति ज्वाल के इतिहासोंमें शेखर अमर कहानी है

आजादी के कारण जो गोरों से कभी लड़ी है रे
शेखर की पिस्तौल किसी तीरथ से बहुत बड़ी है रे !

स्वर्ण जयंती वाला जो ये मंदिर खड़ा हुआ होगा
शेखर इसकी बुनियादों के नीचे गड़ा हुआ होगा
मैं साहित्य नहीं चोटों का चित्रण हूँ

आजादी के अवमूल्यन का वर्णन हूँ
मैं दर्पण हूँ दागी चेहरों को कैसे भा सकता हूँ
मैं पीड़ा की चीखों में संगीत नहीं ला सकता हूँ
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अंतिम पंकतिया उन शहीदों को सलाम !
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जो सीने पर गोली खाने को आगे बढ़ जाते थे,

भारत माता की जय कह कर फ़ासीं पर जाते थे |

जिन बेटो ने धरती माता पर कुर्बानी दे डाली,

आजादी के हवन कुँड के लिये जवानी दे डाली !

वे देवो की लोकसभा के अँग बने बैठे होगे

वे सतरँगी इन्द्रधनुष के रँग बने बैठे होगे !

दूर गगन के तारे उनके नाम दिखाई देते है

उनके स्मारक चारो धाम दिखाई देते है !

जिनके कारण ये भारत आजाद दिखाई देता है

अमर तिरँगा उन बेटो की याद दिखाई देता है !

उनका नाम जुबा पर लो तो पलको को झपका लेना

उनको जब भी याद करो तो दो आँसू टपका लेना

उनको जब भी याद करो तो दो आँसू टपका लेना….

डा॰हरीओम पवार

मैं भारत का वोटर मीनाक्षी





मैं भारत का वोटर हूँ, मुझे लड्डू दोनों हाथ चाहिये
-बिजली मैं बचाऊँगा नहीं,
बिल मुझे कम चाहिये,
-पेड़ मैं लगाऊँगा नहीं,
मौसम मुझको नम चाहिये,
-शिकायत मैं करूँगा न हीं, कार्रवाई तुरंत चाहिये
-बिना लिए कुछ काम न करूँ,
भ्रष्टाचार का अंत चाहिये
-पढ़ने को मेहनत न बाबा,
नौकरी लालीपाॅप चाहिये
-घर-बाहर कूड़ा फेकूं,
शहर मुझे साफ चाहिये
-काम करूँ न धेले भर का,
वेतन लल्लनटाॅप चाहिये
-एक नेता कुछ बोल गया सो,
मुफ्त में पंद्रह लाख चाहिये
-लाचारों वाले लाभ उठायें
फिर भी ऊँची साख चाहिये
-लोन मिले बिल्कुल सस्ता,
बचत पर ब्याज बढ़ा चाहिये
-धर्म के नाम रेवडियां खाएँ
पर देश धर्मनिरपेक्ष चाहिये
-जाती के नाम पर वोट दे
अपराध मुक्त राज्य चाहिए
-मैं भारत का वोटर हूँ मुझे लड्डू दोनों हाथ चाहिये।'
#मिनाक्षी

शुक्रवार, 26 जून 2020

सरल बनो स्मार्ट नहीं / महाकवि व्हट्सप्प





A Very Beautiful Message

             मिठास
             〰〰〰〰

        चाय का कप लेकर आप
        खिड़की के पास बैठे हों
    और बाहर के सुंदर नज़ारे का
आनंद लेते हुए चाय की चुस्की लेते हैं
.....अरे चीनी डालना तो भूल ही गये..;

  और तभी फिर से किचन मेँ जाकर
   चीनी डालने का आलस आ गया....
    आज फीकी चाय को जैसे तैसे
      पी गए,कप खाली कर दिया

     तभी आपकी नज़र कप के तल
      में पड़ी बिना घुली चीनी पर
                पडती है..!!
  मुख पर मुस्कुराहट लिए सोच में पड
    गये...चम्मच होता तो मिला लेता

   हमारे जीवन मे भी कुछ ऐसा ही है...
       सुख ही सुख बिखरा पड़ा है
            हमारे आस पास...
                    लेकिन,
     बिन घुली उस चीनी की तरह !!

           थोड़ा सा ध्यान दें-
 किसी के साथ हँसते-हँसते उतने ही
   हक से रूठना भी आना चाहिए !
       अपनो की आँख का पानी
     धीरे से पोंछना आना चाहिए !
     रिश्तेदारी और दोस्ती में कैसा
              मान अपमान ?
      बस अपनों के दिल मे रहना
             आना चाहिए...!

 जितना हो सके....
"सरल" बनने की कोशिश करें...
"स्मार्ट" नही,

क्योंकि....हमें "ईश्वर" ने बनाया है...
"SAMSUNG"
Google  या  व्हाट्सप्प ने नही... !

गुरुवार, 25 जून 2020

मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी / शेखर





हिंदी दिवस पर विशेष

अपनत्व ,शिष्टाचार की भाषा है हिंदी
मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी

मातृ पिता हैं परम पूजनीय,
गुरु शिक्षक सदा आदरणीय,
भेद भाव न करे किसी में
धनी निर्धन दोनों माननीय ,

आदर और सत्कार की भाषा है हिंदी
मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी,

राष्ट्र प्रेम की जगे भावना,
जन गण की है यही कामना ,
एक सूत्र में बंधे भारती
वर्षों इस ने की आराधना,

समता के आधार की भाषा है हिन्दी
मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी,

नित नवीन शब्दों को लाती,
स्वयं में समाहित उन्हें कराती,
बहुत विशाल ह्रदय है इसका,
हर परिवेश में घुल मिल जाती,

भाषा के विस्तार की भाषा है हिंदी,
मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी,

ज्ञान विज्ञान भाग्य कर्म है
साहित्य संस्कृति और धर्म है
इस में पुट आधुनिकता का
रीति परंपरा का भी मर्म है

उत्सव और त्यौहार की भाषा है हिंदी
मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी,

चलो गर्व से इसको बोलें,
द्वार इसकी प्रगति के खोलें,
विश्व पटल के शीर्ष पे पहुंचे,
इसकी मिठास हर देश में घोलें,

अब समस्त संसार की भाषा है हिंदी,
मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी,

शेखर

जय जवान जय किसान जय हो जय हिंदुस्तान





भारत के   चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ  विपिन रावत  ने कहा  है कि भारत का हर व्यक्ति भारतीय सेना के बारे में नीचे लिखे वाक्यों को अवश्य पढ़े।

भारतीय सेना के 10 सर्वश्रेष्ठ अनमोल वचन: अवश्य पढें।
इन्हें पढकर सच्चे गर्व की अनुभूति होती है...

1.
" *मैं तिरंगा फहराकर वापस आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर आऊंगा, लेकिन मैं वापस अवश्य आऊंगा।*"
- कैप्टन विक्रम बत्रा,
  परम वीर चक्र

2.
" *जो आपके लिए जीवनभर का असाधारण रोमांच है, वो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी है।* "
- लेह-लद्दाख राजमार्ग पर साइनबोर्ड (भारतीय सेना)

3.
" *यदि अपना शौर्य सिद्ध करने से पूर्व मेरी मृत्यु आ जाए तो ये मेरी कसम है कि मैं मृत्यु को ही मार डालूँगा।*"
- कैप्टन मनोज कुमार पाण्डे,
परम वीर चक्र, 1/11 गोरखा राइफल्स

4.
" *हमारा झण्डा इसलिए नहीं फहराता कि हवा चल रही होती है, ये हर उस जवान की आखिरी साँस से फहराता है जो इसकी रक्षा में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देता है।*"
- भारतीय सेना

5.
" *हमें पाने के लिए आपको अवश्य ही अच्छा होना होगा, हमें पकडने के लिए आपको तीव्र होना होगा, किन्तु हमें जीतने के लिए आपको अवश्य ही बच्चा होना होगा।*"
- भारतीय सेना

6.
" *ईश्वर हमारे दुश्मनों पर दया करे, क्योंकि हम तो करेंगे नहीं।"*
- भारतीय सेना

7.
" *हमारा जीना हमारा संयोग है, हमारा प्यार हमारी पसंद है, हमारा मारना हमारा व्यवसाय है।*
- अॉफीसर्स ट्रेनिंग अकादमी, चेन्नई

8.
" *यदि कोई व्यक्ति कहे कि उसे मृत्यु का भय नहीं है तो वह या तो झूठ बोल रहा होगा या फिर वो इंडियन आर्मी का  ही होगा।*"
- फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ

9.
" *आतंकवादियों को माफ करना ईश्वर का काम है, लेकिन उनकी ईश्वर से मुलाकात करवाना हमारा काम है।*"
- भारतीय सेना

10.
" *इसका हमें अफसोस है कि अपने देश को देने के लिए हमारे पास केवल एक ही जीवन है।*"
।।जयहिंद......
    ⚔ भारतीय थल सेना ⚔💐🙏जय जवान जय किसान जय hindustan

करमा के ठाकुर जी





*करमा रो खिचड़ो* e5

राजस्थान के मारवाड़ इलाके का एक जिला है नागौर। नागौर जिले में एक छोटा सा शहर है... "मकराणा"।

यूएन ने मकराणा के मार्बल को विश्व की ऐतिहासिक धरोहर घोषित किया हुआ है .... ये क्वालिटी है यहां के मार्बल की।

लेकिन क्या मकराणा की पहचान सिर्फ वहां का मार्बल है।
"जी नहीं"

मारवाड़ का एक सुप्रसिद्ध भजन है ....

*थाळी भरकर ल्याई रै खीचड़ो,*
*ऊपर घी री बाटकी...*
*जिमों म्हारा श्याम धणी,*
*जिमावै करमा बेटी जाट की...*
*बापू म्हारो तीर्थ गयो है,*
*ना जाणै कद आवैलो...*
*उण़क भरो़स बैठ्यो बैठ्यो, भुखो ही मर जावलो।*
*आज जिमाऊं त़न खिचड़ो,*
*का़ल राबड़ी छाछ री...*

*जिमों म्हारा श्याम धणी,*
*जिमावै बेटी जाट री...*

मकराणा तहसील में एक गांव है कालवा .... कालूराम जी डूडी (जाट) के नाम पे इस गांव का नामकरण हुआ है कालवा।कालवा में एक जीवणराम जी डूडी (जाट) हुए थे, भगवान कृष्ण के भक्त।

जीवणराम जी की काफी मन्नतों के बाद भगवान के आशीर्वाद से उनकी पत्नी रत्नी देवी की कोख से वर्ष 1615 AD में एक पुत्री का जन्म हुआ नाम रखा.... "करमा"।

करमा का लालन-पालन बाल्यकाल से ही धार्मिक परिवेश में हुआ .... माता पिता दोनों भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थे।घर में ठाकुर जी की मूर्ति थी जिसमें रोज़ भोग लगता भजन-कीर्तन होता था।

करमा जब 13 वर्ष की हुई तब उसके माता-पिता कार्तिक पूर्णिमा स्नान के लिए समीप ही पुष्कर जी गए .... करमा को साथ इसलिए नहीं ले गए कि घर की देखभाल, गाय भैंस को दुहना निरना कौन करेगा। रोज़ प्रातः ठाकुर जी के भोग लगाने की ज़िम्मेदारी भी करमा को दी गयी।

अगले दिन प्रातः नन्हीं करमा बाईसा ने ठाकुर जी को भोग लगाने हेतु खीचड़ा बनाया (बाजरे से बना मारवाड़ का एक शानदार व्यंजन) और उसमें खूब सारा गुड़ व घी डाल के ठाकुर जी के आगे भोग हेतु रखा।

करमा;- ल्यो ठाकुर जी आप भोग लगाओ तब तक म्हें घर रो काम करूँ...

करमा घर का काम करने लगी व बीच बीच में आ के चेक करने लगी कि ठाकुर जी ने भोग लगाया या नहीं, लेकिन खीचड़ा जस का तस पड़ा रहा दोपहर हो गयी।
करमा को लगा खीचड़े में कोई कमी रह गयी होगी वो बार बार खीचड़े में घी व गुड़ डालने लगी।
दोपहर को करमा बाईसा ने व्याकुलता से कहा ठाकुर जी भोग लगा ल्यो नहीं तो म्हे भी आज भूखी ही रहूंली....
शाम हो गयी ठाकुर जी ने भोग नहीं लगाया इधर नन्हीं करमा भूख से व्याकुल होने लगी, वो बार बार ठाकुर जी की मनुहार करने लगी भोग लगाने के लिए...
नन्हीं करमा की अरदास सुन के ठाकुर जी की मूर्ति से साक्षात भगवान श्री-कृष्ण प्रकट हुए और बोले: "करमा तूँ म्हारे परदो तो करयो ही कोनी, म्हें भोग कंइया लगातो ?"

करमा - ओह्ह इत्ती सी बात, थे (आप) मन्ने तड़के (सुबह) ही बोल देता भगवान।
करमा अपनी लुंकड़ी (ओढ़नी) की ओट (परदा) करती है और हाथ से पंखा हिलाती। करमा की लुंकड़ी की ओट में ठाकुर जी खीचड़ा खा के अंतर्ध्यान हो जाते हैं। अब ये करमा का नित्यक्रम बन गया।

रोज़ सुबह करमा खीचड़ा बना के ठाकुर जी को बुलाती, ठाकुर जी प्रकट होते व करमा की ओढ़नी की ओट में बैठ के खीचड़ा जीम के अंतर्ध्यान हो जाते।

माता-पिता जब पुष्कर जी से तीर्थ कर के वापस आते हैं तो देखते हैं गुड़ का भरा मटका खाली होने के कगार पे है। पूछताछ में करमा कहती है, म्हें नहीं खायो गुड़...
"ओ गुड़ तो म्हारा ठाकुर जी खायो"

माता-पिता सोचते हैं करमा ही ने गुड़ खाया है अब झूठ बोल रही है।

अगले दिन सुबह करमा फिर खीचड़ा बना के ठाकुर जी का आह्वान करती है तो ठाकुर जी प्रकट हो के खीचड़े का भोग लगाते हैं।

माता-पिता यह दृश्य देखते ही आवाक रह जाते हैं।

देखते ही देखते करमा की ख्याति सम्पूर्ण मारवाड़ व राजस्थान में फैल गयी।

जगन्नाथपुरी के पुजारियों को जब मालूम चला कि मारवाड़ के नागौर में मकराणा के कालवा गांव में रोज़ ठाकुर जी पधार के करमा के हाथ से खीचड़ा जीमते हैं तो वो करमा को पूरी बुला लेते हैं।

करमा अब जगन्नाथपुरी में खीचड़ा बना के ठाकुर जी के भोग लगाने लगी। ठाकुर जी पधारते व करमा की लुंकड़ी (ओढणी) की ओट में खीचड़ा जीम के अंतर्ध्यान हो जाते।बाद मे करमा बाईसा जगन्नाथपुरी मे ही रहने लगी व जगन्नाथपुरी में ही उनका देहावसान हुआ।

(1) जगन्नाथपुरी में ठाकुर जी को नित्य 6 भोग लगते हैं, इसमें ठाकुर जी को तड़के प्रथम भोग करमा रसोई में बना खीचड़ा आज भी रोज़ लगता है।

(2) जगन्नाथपुरी में ठाकुर जी के मंदिर में कुल 7 मूर्तियां लगी है .... 5 मूर्तियां ठाकुर जी के परिवार की है .... 1 मूर्ति सुदर्शन चक्र की है .... 1 मूर्ति करमा बाईसा की है।

(3) जगन्नाथपुरी रथयात्रा में रथ में ठाकुर जी की मूर्ति के समीप करमा बाईसा की मूर्ति विद्यमान रहती है .... बिना करमा बाईसा की मूर्ति रथ में रखे रथ अपनी जगह से हिलता भी नहीं है।

*"मारवाड़ या यूं कहें राजस्थान के कोने-कोने में ऐसी अनेक विभूतियां है जिनके बारे में आमजन अनभिज्ञ है।"



बुधवार, 24 जून 2020

व्याकरण इतिहास




हिन्दी व्याकरण का संक्षिप्त इतिहास
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मेरे शोध-लेख "हिन्दी व्याकरण का संक्षिप्त इतिहास" को यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं -
https://drive.google.com/file/d/1VlJEBdp7EKjvxn_Vg6KIsYSXV9BJg3tl/view?usp=sharing

विकिपीडिया पर "हिन्दी व्याकरण का इतिहास" लगभग पूरा का पूरा मेरे इसी शोध-लेख पर आधारित है।

पारिभाषिक शब्द




व्याकरण के पारिभाषिक शब्द "गुण" और "वृद्धि" - भाग-2
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भाग-1 में पारिभाषिक शब्द "गुण" की चर्चा की गई। अब पारिभाषिक शब्द "वृद्धि" पर आते हैं।
निम्नलिखित धातु और प्रातिपदिक (शब्द) से बने कृत् प्रत्ययान्त एवं तद्धित प्रत्ययान्त शब्दों पर विचार करें।

त्यज् - त्याग
पठ् - पाठक
वच् - वाचक
वर्ष - वार्षिक
धर्म - धार्मिक

इह - ऐहिक
दिन - दैनिक
किरात - कैरात (किरात जाति या देश से संबंध रखनेवाला)
केकय - कैकेयी

उचित - औचित्य
उज्ज्वल - औज्ज्वल्य
उत्सुक - औत्सुक्य
उदार - औदार्य
उद्योग - औद्योगिक
उपमा - औपम्य (सादृश्य, समता)
सुन्दर - सौन्दर्य
कुमार - कौमार्य
भूत - भौतिक

कृ - कारक
मृज् - मार्जक
ऋषि - आर्ष
मृज् - मार्जन (धो-माँजकर साफ करना, शोधन)

उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि कृत् या तद्धित प्रत्यायान्त शब्दों में धातु या प्रातिपदिक के आदि अच् (स्वर) के स्थान में आ, ऐ, औ, आर् कर दिए गए हैं।
आ, ऐ, औ, आर् - इन्हें वृद्धि संज्ञक कहते हैं।

नोटः कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनमें गुण और वृद्धि दोनों होते हैं, लेकिन अर्थ में अन्तर होता है। जैसे -

ग्रह् (पकड़ना) - ग्रह (planet), ग्राह (घड़ियाल)। आप खुद ही सोच सकते हैं कि ग्रह या ग्राह का ऐसा नाम क्यों है।

वर्ण - वर्णिक (वर्ण संबंधी, जैसे - वर्णिक-वृत्त; लेखक); वार्णिक (लेखक)

भाग-1 में बताया जा चुका है कि -अन प्रत्यय लगाने पर अजन्त धातु और इकार या उकार उपधा वाली धातु का भी गुण होता है। परन्तु मृज् धातु इसका अपवाद है। पाणिनि सूत्र "मृजेर्वृद्धिः" (पा॰7.2.114) से बिना कोई शर्त के मृज् धातु से गुण के स्थान पर वृद्धि ही की जाती है।



मंगलवार, 23 जून 2020

भूख कचोटे पेट को / रा. हि. ब......





रा हि ब - - -

दुनिया में सबसे अधिक , भ्रष्ट हिंद की प्रेस ।
कहां वसूली हो सके ,  दिन भर ढूँढ़े केस ॥

भूख कचोटे पेट को , धूप ओढ़ रह जायं ।
दुखिया को इस  हाल में , कैसे बुद्ध सुहांय॥

क्या पाए की शायरी , क्या  लहज़ा अंदाज़ ।
ग़ालिब मोमिन जौक ने , रखा मीर सर ताज॥

फंसा पंच स्कन्ध में , सुख से वंचित होय  ।
नाम रूप रस राग में , जीवन  मकसद खोय  ॥

ख़बर सितारों की धरो , लेकिन  पांव ज़मीन ।
ये खिसकी तो सब गया ,व्यर्थ पड़ी  दुरबीन ॥

  सारी बुद्धि उधार की , बुद्धिवाद कहलाय   ।
बिन अनुभव कोई कहां , बुद्ध  घटित हो पाय  ॥

राहिब क्यों पीछे चले  , अब तो आँखें खोल ।
स्वानुभूति के सत्य पर  , सारी बातें तोल ॥

राम रहीमा एक हैं  , कविता रही बताय  ।
कुफ़्र और इस्लाम का , अंतर ग़ज़ल मिटाय  ॥

सब सुविधाएं भोग के , उनको कुफ्र बतांय  ।
कठमुल्लों का ढोंग ये , काश समझ हम पांय  ॥

खोज ख़बर कागज़ क़लम  , नोंक झोंक रंग ढंग ।
हिंदी अरबी फारसी , जमा हिंदवी रंग ॥

लाख बरस की सभ्यता,  इक क़िताब में आय  ।
खरबों मानुष आ चुके , पन्नों ज्ञान समाय  ॥

नेत्र कर्ण अनुभव करें ,इसमें  ढेरों लोच ।
सबके  पीछे आत्मा ,  सोच सके तो   सोच ॥

बुद्ध कहैं आनंद से , उतना दिया बताय  ।
पतझड़ चारों ओर है , जितना मुट्ठी आय ॥

राहिब ख़ुद तेरे बिना , तुझको रोके कौन ।
तेरे मुँह से सब कहैं ,  केवल तू ही मौन ॥

घूँघट में कु़छ भी नहीं , केवल तेरे ख़ाब ।
तुझे भरम तू पी रहा , तुझको पिए शराब ॥

उपयोगी कछु कह सके ,  तो  राहिब मुख खोल ।
वरना बेहतर मौन है  , खाली है कचकोल ॥

साहस से बढ़ते चलो , साथ राखिए आस ।
अंधकार जितना घना , उतना निकट प्रकाश ॥

आवश्यकताएं अल्प हों , ऊँचा रहे ज़मीर ।
लेशमात्र  आशा नहीं , सबसे बड़ा अमीर ॥

डिजिटल दुनिया ने दिया , ध्यान भंग का रोग ।
बहके से चंचल मना ,  भटक रहे सब  लोग॥

भारत में सब चाहते , बातों से हो जाय ।
वैभव शाली राष्ट्र हो , बिना किए सब आय  ॥

बिना सहारे हो नहीं , भव सागर ये पार ।
सत संगति गुरु प्रेम की , नौका रहो सवार॥

होने से मरने तलक , पाखंडों का बोझ ।
मक्कारी में दब गया , भारत तेरा ओज ॥

मुर्दों को  पकवान हैं  , जिंदा भूखा जाय ।
रा हि ब  ये दीनो -धरम ,  जग भर हंसी कराय  ॥

नदियों में स्नान से , कहां धुल सकें पाप ।
आदम मैला ही रहा  , नदी सहें अभिशाप ॥

आम आदमी कर रहा , हर डर को स्वीकार ।
चोर ठगों को मिल रहे , रक्षा के अधिकार॥

श्वास श्वास है कीमती , कुदरत रही गिनाय ।
आलस और प्रमाद में , दिन दिन बीता  जाय  ॥

ढीली ढाली ज़िंदगी , फीकी सी मुस्कान ।
ज़िंदा खुद को  सब कहें , मगर कहां है  जान ॥

कौन कहां पैदा हुआ , ये केवल संयोग ।
मगर इसी में जी मरे , ये कहलाए रोग ॥

चलता फिरता आदमी , स्वयं प्रमाणित नांय  ।
चाल जात गुण हैसियत , कागज़ात बतलायं ॥

निर्बल से होता नहीं ,  प्रेम क्रोध अनुरोध  ।
बलशाली की शक्ति है , तोड़ सके अवरोध ॥

बुद्ध ख़ुदा मुर्शिद नहीं , खुद को वैध बतां य  ।
आजा पास निकाल  दूं , कांटा तेरे पांय  ,  ॥

रा हि ब जग तेरा नहीं , कैसे  देगा छोड़ ।
भरम जालघेरे खड़े , इनकी बांह मरोड़  ॥

कब मरना है पूछिए  , रा हि ब  लड़ भिड़ जाय  ।
एक मात्र जो  तय यहां , तासे पिंड छुड़ाय  ॥

उठते ही पहला क़दम , मंज़िल मिली  कमाल  ।
पत्थर छूटा  हाथ से , पहुंचेगा हर हाल॥

लेता अपने  विषय में , रा हि ब जग से राय ।
खुद से क्यूँ  पूछे नहीं , जो सब सच बतलाय ॥

जब तक बाज़ी चल रही , राजा रुतबा पाय  ।
खेल खतम मोहरे सहित , एकै डब्बा जाय  ॥

सूर किशन कुम्भन परम , छीत नंद गोविंद ।
चतुर संग अठछाप की , फैली गंध  सुगंध॥

ढोंगी गुंडे माफिया , पहले रस्ता पांय  ।
सड़क  किनारे देश में , सभ्य खड़े रह जांय  ॥

रहजन रहबर बन गए , खुलेआम है  लूट ।
शोषक पीड़ित से कहे  ,  तेरे  कारण  फूट ॥

कोटि कोटि जब मूढ़ हों , एक बुद्ध तब होय  ।
सौदा महंगा इस कदर , देखा सुना न कोय  ॥

नित्य क्रिया को जा रहा , धर कंधा बंदूक ।
कैसा भारत हो गया , कहां हो गयी चूक ॥

कु़छ पानी कु़छ धूप हो , कुछ हो चैन सूकून ।
स्वर्ग यहीं सबको मिले  , भोजन दोनों जून ॥

सूरज पानी पेड़ हों , कुछ अपनों का साथ ।
यह जीवन ही स्वर्ग है , काफ़ी है सौगात ॥

दिन दिन घटती जा रही , इस दुनिया की आयु ।
सब कु़छ मिला विकास से , दांव लगी जल वायु ॥

मुर्शिद ने मेरे दिया , तब मुझको कु़छ मान ।
जब इस नश्वर देह में , बची नहीं कु़छ जान ॥

ख़ुदा दूर से दूर है , और पास से पास ।
मैं जब तक क़ायम रहे , नहीं मिलन की आस ॥

संयम का अभिप्राय है , चार कदम बस देख ।
ता आगे सम्मोहना , वही बिगाड़े लेख ॥

ईंट बुरादा कैमिकल , पलास्टिक शैम्पू सोप ।
ये भोजन के तत्व हैं  , क्या अब भी कु़छ होप ॥

मैं मेरा के ढेर में , खोई मन की सुइ ।
हम अंधे काना गुरु , ढूँढ़ सकें ना दुइ ॥

मीरा ने रैदास को , मुर्शिद लिया बनाय ।
हीरे की तो  जौहरी  , जांच परख कर पाय॥

कुरुण प्रेम हित दैन्य का , भाव विह्वल संयोग ।
दास नरोत्तम को पढ़ें , रोते  रोते लोग ॥

रूहानी ग़ज़लें धुनें , कौन नहीं जो गाय ।
ख़ुसरो सबका दिल छुए , उसे कौन छू पाय ॥

ग़ज़ल पहेली गीत हों  या मुकरनियां राग ।
ख़ुसरो कानों में पड़ें , सोते जाएं जाग॥

जो खुद से हर्षित रहे  , सो सबको हर्षाय।
जो खुद से ही ख़ुश नहीं , किसको सुख दे  पाय ॥

- - - रा हि ब

सोमवार, 22 जून 2020

बेमिसाल ईमानदारी का नायाब मिशाल




लाल बहादुर शास्त्री जी को ज़ब  b
रेल मंत्री बनाया गया तो
उन्होंने माँ को नहीं बताया था कि वो अब रेलमंत्री हैं। कहा था, ''मैं रेलवे में नौकरी करता हूँ।'' वो एक बार किसी कार्यक्रम मे आए थे जब उनकी माँ भी वहाँ पूछते पूछते पहुची कि मेरा बेटा भी आया हैं वो भी रेलवे में हैं। लोगों ने पूछा क्या नाम है तो उन्होंने जब नाम बताया तो सब चौक गए बोले, ''ये झूठ बोल रही है।'' पर वो बोली, ''नहीं वो आए है।'' लोगो ने उन्हें लाल बहादुर शास्त्री के सामने ले जाकर पूछा, ''क्या वहीं हैं ?'' तो माँ बोली, ''हाँ, वो मेरा बेटा है।'' लोग, मंत्री जी से दिखा कर बोले, ''वो आपकी माँ है।'' तो उन्होंने अपनी माँ को बुला कर पास बैठाया और कुछ देर बाद घर भेज दिया। तो पत्रकारों ने पुछा, ''आप ने, उनके सामने भाषण क्यों नहीं दिया।'' ''मेरी माँ को नहीं पता कि मैं मंत्री हूँ। अगर उन्हें पता चल जाय तो लोगों की सिफारिश करने लगेगी और मैं मना भी नहीं कर पाउंगा। ...... ....... और उन्हें अहंकार भी हो जाएगा।'' जवाब सुन कर, सब सन्न रह गए। "कहाँ गए वो निस्वार्थी सच्चे ईमानदार लोग ... '' सोचियेगा ज़रूर ? #काॅपी

रविवार, 21 जून 2020

नज़्म / सुरेन्द्र सिंघल






हवाएं शांत पड़ी सो रहीं हैं बिस्तर पर
और हम झेल रहे हैं घुटन
 वो घुटन जिसकी कोई सीमा नहीं
 आओ जाकर इन्हें जगाएं तो
इनसे कुछ छेड़छाड़ करे
 जिससे ये करवटें बदलें
पहले ऊं ऊं भी करें
 किंतु फिर बाद में ले अंगड़ाई
 जाग उठ्ठें ये आंख मलती हुईं
 और फिर इनके दुपट्टे फड़कें
 इनके कांधों से फिसल
 उड़ चलें चारों दिशाओं में
 एक उन्माद सा बिखर जाए
 दिल दिमाग देह की शिराओं में
 जागना इनका बहुत ज़रूरी है
यह घुटन वरना मार डालेगी

शनिवार, 20 जून 2020

सिंहासन खाली करो की जनता आती हैँ / दिनकर





सिंहासन खाली करो कि जaनता आती है:
रामधारी सिंह “दिनकर”

 दिनकर ने ये कविता हमारे पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर लिखी थी|
 फिर ये १९७४ के संपूर्ण-क्रांति का भी नारा बनी|चलिए आज फिर दोहराते हैं:

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता?हां,लंबी – बडी जीभ की वही कसम,
“जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।”
“सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?”
‘है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?”

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

चाँद का कुर्ता / रामधारी सिंह दिनकर





आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' जी  का जन्मदिन है। दिनकर जी का जन्म २३ सितंबर १९०८ में बिहार के सिमरिया ग्राम में हुआ था।
 बचपन से वो मेरे सबसे प्रिय कवि रहे हैं। मुझे याद है कि छठी से दसवीं तक जब भी हिंदी की नई पाठ्य पुस्तक मिलती थी, तो सबसे पहले मैं ये देखता था कि कविता वाले भाग में दिनकर की कोई कविता है या नहीं। उनकी कविता को कभी मन ही मन नहीं पढ़ा जाता था। बार बार पढ़ते और वो भी जोर जोर से बोल के जैसे खुद की ही कविता हो। जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा के छायावादी रहस्यों को समझने की उम्र नहीं थी पर दिनकर की पंक्तियाँ ना केवल बड़ी आसानी से कंठस्थ हो जाती थीं बल्कि वे मन में एक ऐसा ओज भर देती थीं जिसका प्रभाव कविता की आवृति के साथ बढ़ता चला जाता था।

पहली बार छठी कक्षा में उनका किया इस प्रश्न ने मन में हलचल मचा दी थी

दो में से तुम्हें क्या चाहिए ?
कलम या कि तलवार
मन में ऊँचे भाव
या तन में शक्ति अजय आपार !

तो वहीं सातवीं या आठवीं में शक्ति और क्षमा पढ़ने के बाद उनकी काव्य शैली ने मुझे पूरी तरह मोहित कर दिया था

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

दसवीं की परीक्षा में इन पंक्तियों का भावार्थ लिखते वक़्त लगा ही नहीं था कि इसके लिए कुछ अलग से याद करना पड़ा हो..

रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर लौटा हमें गांडीव गदा
लौटा दे अर्जुन भीम वीर

राम धारी सिंह दिनकर






रोटी और स्वाधीनता / रामधारी सिंह "दिनकर"

(1)
आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ?
मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ?
आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,
पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।
(2)
हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले,
पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले।
इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ?
है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ?
(3)
झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ?
आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ?
है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी,
बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।. 

शुक्रवार, 19 जून 2020

मस्यूर पंख / हरे धानी





🦃  मयूर  पंख  🦃
             

  वनवास के दौरान माता सीताजी को
पानी की प्यास लगी, तभी श्रीरामजी ने
चारों ओर देखा, तो उनको दूर-दूर तक
     जंगल ही जंगल दिख रहा था.
 कुदरत से प्रार्थना करी ~ हे जंगलजी !
     आसपास जहाँ कहीं पानी हो,
  वहाँ जाने का मार्ग कृपया सुझाईये.

      तभी वहाँ एक मयूर ने आकर
 श्रीरामजी से कहा कि आगे थोड़ी दूर पर
    एक जलाशय है. चलिए मैं आपका
      मार्ग पथ प्रदर्शक बनता हूँ,  किंतु
      मार्ग में हमारी भूल चूक होने की
                 संभावना है.

     श्रीरामजी ने पूछा ~ वह क्यों ?
      तब मयूर ने उत्तर दिया कि ~
   मैं उड़ता हुआ जाऊंगा और आप
   चलते  हुए आएंगे, इसलिए मार्ग में
 मैं अपना एक-एक पंख बिखेरता हुआ
     जाऊंगा. उस के सहारे आप
   जलाशय तक पहुँच ही जाओगे.

  इस बात को हम सभी जानते हैं कि
  मयूर के पंख, एक विशेष समय एवं
    एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं.
     अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध
         पंखों को बिखेरेगा, तो
        उसकी मृत्यु हो जाती है.

    और वही हुआ. अंत में जब मयूर
   अपनी अंतिम सांस ले रहा होता है,
      उसने मन में ही कहा कि
    वह कितना भाग्यशाली है, कि
    जो जगत की प्यास बुझाते हैं,
  ऐसे प्रभु की प्यास बुझाने का उसे
          सौभाग्य प्राप्त हुआ.
        मेरा जीवन धन्य हो गया.
 अब मेरी कोई भी इच्छा शेष नहीं रही.

तभी भगवान श्रीराम ने मयूर से कहा कि
 मेरे लिए तुमने जो मयूर पंख बिखेरकर,
   मुझ पर जो ऋणानुबंध चढ़ाया है,
     मैं उस ऋण को अगले जन्म में
              जरूर चुकाऊंगा ....
     ★ मेरे सिर पर धारण करके  ★

        तत्पश्चात अगले जन्म में
     श्री कृष्ण अवतार में उन्होंने
    अपने माथे पर मयूर पंख को
      धारण कर वचन अनुसार
    उस मयूर का ऋण उतारा था.

       🔅🔅🦃🔅🔅

      📍  तात्पर्य यही है कि  📍
 अगर भगवान को ऋण उतारने के लिए
        पुनः जन्म लेना पड़ता है, तो
  हम तो मानव हैं. न जाने हम कितने ही
          ऋणानुबंध से बंधे हैं.
     उसे उतारने के लिए हमें तो
   कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे.
          ~~  अर्थात  ~~
    जो भी भला हम कर सकते हैं,
      इसी जन्म में हमें करना है.🌹🙏🌹

हिन्दू शब्द का कब हुआ प्रयोग?






*जानिए किस ग्रन्थ में प्रयुक्त हुआ है हिन्दू शब्द*

पश्चिमी देशों में भूख मिटाने, नींद लाने, यहां तक कि खुशी महसूस करने के लिए भी दवा का प्रयोग किया जाता है, जबकि भारत में मानसिक और ज्यादातर शारीरिक रोगों का समाधान ध्यान और योग में तलाशने की परंपरा है। सनातन धर्म में ईश्वर को पाने का एक मार्ग ध्यान और योग भी बताया गया है। इसलिए यह मात्र धर्म ही नहीं है, बल्कि जीने की कला है,सनातन धर्म का अर्थ होता है-जीवन जीने की शाश्वत शैली।

सनातन को मानने वाले ‘हिन्दू’ कहलाये, हिन्दू शब्द को लेके स्वयं हिन्दू ही नहीं अपुती दूसरे मतों के लोगो का भी यही मानना है की “हिन्दू’ शब्द ईरानियों की देन है | ये भ्रान्ति प्रचलित है की ”हिन्दू’ शब्द सनातन के किसी भी शास्त्र में नहीं है, हिदुत्व कोई धर्म नहीं है, भोगोलिक स्थिति के कारण इसका नाम हिंदुस्तान रखा गया है, हिंदुस्तान में रहने वाले सब धर्म के लोग हिन्दू हैं…. इत्यादि|

परन्तु क्या ये सच है ? क्या ‘हिन्दू’ शब्द विदेशियों का दिया हुआ नाम है? क्या हिन्दू नाम का कोई धर्म नहीं?

इन्ही सब प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए कुछ तथ्य प्रस्तुत हैं जो ये दर्शाते हैं की “हिन्दू’” शब्द ईरानियों के आने से बहुत पहले ही सनातन धर्म में प्रयोग होता था| सनातन को मानने वालों को “हिन्दू” कहा जाता था , ईरानियों ने तो बस केवल इसे प्रचलित किया|

कुछ उधाहरण देखते है सनातन में हिन्दू शब्द के बारे में …

१-ऋग वेद में एक ऋषि का नाम ‘सैन्धव’ था जो बाद में “ हैन्दाव/ हिन्दव ” नाम से प्रचलित हुए

२- ऋग वेद के ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दू शब्द

हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।

( हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं)

३- मेरु तंत्र ( शैव ग्रन्थ) में हिन्दू शब्द
‘हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्चते प्रिये’
( जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं)

४- यही मन्त्र शब्द कल्पद्रुम में भी दोहराई गयी है
‘हीनं दूषयति इति हिन्दू ’

५-पारिजात हरण में “हिन्दू” को कुछ इस प्रकार कहा गया है |
हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टमानसान ।
हेतिभिः शत्रुवर्गं च स हिंदुरभिधियते ।।

६- माधव दिग्विजय में हिन्दू
ओंकारमंत्रमूलाढ्य पुनर्जन्म दृढाशयः ।
गोभक्तो भारतगुरूर्हिन्दुर्हिंसनदूषकः ॥
( वो जो ओमकार को ईश्वरीय ध्वनी माने, कर्मो पर विश्वाश करे, गौ पालक, बुराइयों को दूर रखे वो हिन्दू है )

७- ऋग वेद (८:२:४१) में ‘विवहिंदु’ नाम के राजा का वर्णन है जिसने ४६००० गएँ दान में दी थी|
विवहिंदु बहुत पराक्रमी और दानी राजा था ऋग वेद मंडल ८ में भी उसका वर्णन है|
हिंदुत्व क्या है…

*दुनिया की सबसे पुरानी आध्यात्मिक और नैतिक परंपरा ही हिंदुत्व है। इसके अनुसार, ईश्वर सर्वत्र मौजूद होते हैं। ईशोपनिषदके पहले मंत्र के अनुसार, संपूर्ण ब्रह्मांड में ईश्वरीय शक्ति विराजमान है। ऐसी सभी चीजें, जो दृश्य और अदृश्य हैं, जिनका हम स्पर्श कर पाते हैं या नहीं कर पाते हैं या फिर हर अच्छी और बुरी चीज भी सर्वशक्तिमान का ही अंश है। ईश्वर हमारे अंदर भी मौजूद हैं, जरूरत है तो इसे अनुभव करने की।*

*हिंदुत्व हमें बताता है कि किसी भी व्यक्ति की प्रकृति या स्वभाव बुरा नहीं होता है। यदि वह स्वयं को नहीं समझ पाता है या उसके शरीर और मन-मस्तिष्क में सही तालमेल नहीं हो पाता है, तभी वह बुरे कर्म करता है। स्वयं को नहीं समझ पाने के कारण व्यक्ति लोभ, क्रोध, मोह आदि का शिकार होता है।*

*आज हिन्दू अपने ही धर्म शास्त्रों का ज्ञान न होने के कारण आसानी से दूसरे के बहकावे में आ जाता है | उसकी इस अज्ञानता का मुख्य कारण कथित हिन्दू धर्म के ढेकेदार हैं जिन्होंने अपने निजी लाभ के कारण शास्त्रों के सही ज्ञान को जनमानस तक नहीं पहुचने दिया |*


🚩 🌸 🕉 🌸 🙏 🌸 🚩

गुरुवार, 18 जून 2020

इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार का साक्षात्कार





*1 मिनिट👇*

*न्यूयार्क में एक बड़े पत्रकार एक साधु का*
*इंटरव्यू ले रहे थे....*

पत्रकार-
सर, आपने अपने लास्ट लेक्चर में
*संपर्क* (Contact) और
 *संजोग* (Connection)
पर स्पीच दिया लेकिन यह बहुत कन्फ्यूज करने वाला था..।
क्या आप इसे समझा सकते हैं..?

साधु मुस्कराये और उन्होंने कुछ अलग...
पत्रकारों से ही पूछना शुरू कर दिया।

"आप न्यूयॉर्क से हैं"...?

पत्रकार: "Yeah"...

सन्यासी: "आपके घर मे कौन कौन हैं"...?

पत्रकार को लगा कि.. साधु उनका सवाल
टालने की कोशिश कर रहे है क्योंकि
उनका सवाल बहुत व्यक्तिगत और
उसके सवाल के जवाब से अलग था।

फिर भी पत्रकार बोला : मेरी "माँ अब नही हैं, पिता हैं तथा 3 भाई और एक बहिन हैं...।

सब शादीशुदा हैं "

साधू ने चेहरे पे एक मुस्कान के साथ पूछा:
 "आप अपने पिता से बात करते हैं..?"

पत्रकार चेहरे से गुस्से में लगने लगा...

साधू ने पूछा, "आपने अपने फादर से
last कब बात की"...?

पत्रकार ने अपना गुस्सा दबाते हुए जवाब दिया : *"शायद एक महीने पहले".*

साधू ने पूछा: "क्या आप भाई-बहिन अक़्सर मिलते हैं..?
आप सब आखिर में कब मिले
एक परिवार की तरह..?"

इस सवाल पर पत्रकार के माथे पर पसीना
आ गया कि , इंटरव्यू मैं ले रहा हूँ या ये साधु ?
ऐसा लगा साधु, पत्रकार का इंटरव्यू ले रहा है...?

एक आह के साथ पत्रकार बोला : *"क्रिसमस पर*
*2 साल पहले"*

साधू ने पूछा: "कितने दिन आप सब
साथ में रहे..?"

पत्रकार अपनी आँखों से निकले आँसुओं को पोंछते हुये बोला :  "3 दिन"...

*साधु: /कितना वक्त आप भाई बहनों ने अपने पिता के बिल्कुल करीब बैठ कर गुजारा?*

पत्रकार हैरान और शर्मिंदा दिखा और
एक कागज़ पर कुछ लिखने लगा...

साधु ने पूछा: *"क्या आपने पिता के साथ नाश्ता, लंच या डिनर लिया?*
*क्या आपने अपने पिता से पूछा के वो कैसे हैँ ? माता की मृत्यु के बाद उनका वक्त कैसे गुज़र रहा है.....?*
साधु ने पत्रकार का हाथ पकड़ा और कहा: " शर्मिंदा, या दु:खी मत होना।
मुझे खेद़ है अगर मैंने आपको
अनजाने में चोट पहुंचाई हो..,
 लेकिन ये ही आपके सवाल का जवाब है ।
*"संपर्क और संजोग"*
*(Contact & Connection)*

आप अपने पिता के सिर्फ संपर्क
 *(Contact)* में हैं
 ‌पर आपका उनसे कोई 'Connection'  *(जुड़ाव )* नही है।
 *You are not Connected to him.*
*आप अपने Father से संपर्क में हैं*
*जुड़े नही है..*

*Connection* हमेशा आत्मा से
आत्मा का होता है।
Heart से Heart होता है..।
एक साथ बैठना, भोजन साझा करना और
एक दूसरे की देखभाल करना, स्पर्श करना,
हाथ मिलाना, आँखों का संपर्क होना,
कुछ समय एक साथ बिताना

आप अपने  पिता, भाई और बहनों  के
संपर्क *('Contact')* में हैं लेकिन
आपका आपस मे कोई "जुड़ाव *'(Connection)* नहीं है".

पत्रकार ने आंखें पोंछी और
बोला: "मुझे एक अच्छा और *'अविस्मरणीय'*
सबक सिखाने के लिए धन्यवाद"..।

*आज ये भारत की भी सच्चाई हो चली है....।*
 सबके हज़ारो संपर्क *(Contacts)* हैं...
पर  कोई  *Connection* नही...।
कोई विचार-विमर्श  नहीं..।

*हर आदमी अपनी नकली दुनिया में ही*
*खोया हुआ है..।*😞

क्या आप में से कोई बता सकता
 है कि वह साधु कौन थें...?

वो साधु और कोई नहीं
*"स्वामी विवेकानंद" थे...।*😊

दिनेश श्रीवास्तव की रचनाएँ




 अलविदा सुशांत
--------------------

टूटा फिर से एक सितारा,
कैसे वह जीवन से हारा।
मुस्काता चेहरा तो देखो,
कितना सुंदर कितना प्यारा।।

कैसा दुख उसको था घेरा,
छाया इतना जल्द अँधेरा।
गहरी चिर निद्रा क्यों आई,
क्या प्यारा था नहीं सबेरा?

मानव क्यों विचलित होता है,
बाहर खुश अंदर रोता है।
पता नहीं चल पाता इतना,
पाता क्या है क्या खोता है।।??

यदि जीवन,संघर्ष वहीं है,
मगर पलायन सत्य नहीं है।
आत्म-हन्त बनना मानव का,
बोलो! क्या यह सत्य कहीं है?

कितना प्यारा एक सितारा,
सबकी आँखों का था तारा।
इतनी जल्दी टूट गया वह,
गम से अपने हारा- मारा।।

जो लगते हैं सबको न्यारे,
ईश्वर को भी होते प्यारे।
नहीं भूल सकता है कोई,
तुमको मेरे राज दुलारे।।


            दिनेश श्रीवास्तव😢
            ग़ाज़ियाबाद
[6/18, 18:16] DS दिनेश श्रीवास्तव: गीत-

हमको रहना है तैयार।
होगा युद्ध आर या पार।।

क्यों कहते हो बात करेंगे?
सैनिक मेरे रोज मरेंगे!
सोचो फिर हम जिंदा क्यों हैं,
ऐसे जीवन पर धिक्कार।
हमको रहना है तैयार।
होगा युद्ध आर या पार।।

बुद्ध और गांधी का देश,
पर सुभाष का सैनिक वेश।
शिवा और राणा को अब तो,
करना है हमको स्वीकार।
हमको रहना है तैयार।
होगा युद्ध आर या पार।।

होश-जोश को आज जगा दे,
रक्त-रोम संचार करा दे।
उसी लेखनी से अब तो है,
केवल हमको करना प्यार।
हम को रहना है तैयार।
होगा युद्ध आर या पार।।

रौद्र रूप लेखनी बनाओ,
वीरों की गाथा को गाओ।
कवियों तुम! कुछ दिन की खातिर,
छोड़ो लिखना अब शृंगार।
हमको रहना है तैयार।
होगा युद्ध आर या पार।।

वीर-भूमि भारत है अपना,
विश्व-गुरू बनने का सपना।
आओ हम सब मिलकर कर दें,
इस सपने को अब साकार।
हमको रहना है तैयार।
होगा युद्ध आर या पार।।

इधर बेहया पाक पड़ा है,
सीमा पर अब चीन अड़ा है।
सीमा की रक्षा करने को,
सभी उठाएँ अब हथियार।
रहना है हमको तैयार।
होगा युद्ध आर या पार।।

बना हिमालय अपना प्रहरी,
मगर चीन की साजिश गहरी।
अबकी साजिश तोड़-ताड़ कर,
कर  देना होगा लाचार।
रहना है हमको तैयार।
होगा युद्ध आर या पार।।

                   दिनेश श्रीवास्तव

बुधवार, 17 जून 2020

शोध लेख अनुस्यूत / डाक्टर बहादुर मिश्रा





*अनुस्यूत बनाम अनुस्युत*

यह विषय मेरी प्राथमिकता सूची में नहीं था। एक दिन मैं पी-एच्.-डी. संचिका निबटा रहा था। एक विश्वविख्यात विश्वविद्यालय के ख्यात प्राचार्य का प्रतिवेदन पढ़ रहा था। उसमें एक स्थल पर ‘अनुस्युत’ का प्रयोग देखकर हतप्रभ रह गया; क्योंकि छात्र और शिक्षक- दोनों रूपों में उनकी यशस्विता असंदिग्ध रही है। पहले सोचा कि दूरभाष पर ही उनका भ्रम-निवारण कर दूँ। फिर विचार आया कि ‘पोस्ट’ ही डाल देता हूँ। इससे अन्य पाठक भी लाभान्वित हो जाएँगे। अन्यत्र इसके अनियंत्रित प्रयोग देख-देख कुढ़ ही रहा था कि उक्त महाशय की इस भाषिक विच्युति ने एतद्विषयक विमर्श के लिए तत्क्षण विवश किया। यह शब्द-विमर्श उसी चिन्ता की प्रसूति है।
   अनु+षिवु(तन्तुसन्ताने) >सिवु (आदेश)> सि (व् >ऊ) सि+ऊ (यण् सन्धि)= स्य् +ऊ = स्यू+ क्त > त = अनुस्यूत का अर्थ होता है-- अच्छी तरह सिला हुआ/ गज्झिन बुना हुआ/ सुशृंखलित/ सुषक्त/ नियमित तथा अबाध रूप से सटा-सटाकर बुना हुआ/well woven/well fabricated/well knitted ।

 निवेदन कर दूँ कि ‘अनुस्यूत’ मूलतः बुनकरी-क्षेत्र (weaving field) का शब्द है। भाषा में यह वहीं से चलकर आया है। जब शब्दों, वाक्यों,महावाक्यों (प्रोक्तियों) या अनुच्छेदाें में तनिक भी बिखराव न हो, अर्थात् भाषा की सभी इकाइयाँ परस्पर सम्बद्ध हों, संग्रथित हों या सुगुम्फित हों, तब अनुस्यूति की स्थिति बनती है।
   ‘अनुस्यूत’ का ‘अनु’, जैसा कि आप जानते हैं, पूर्व प्रत्यय, अर्थात् उपसर्ग (prefix) है। इसका अर्थ पीछे या पश्चात्/ साथ-साथ/ पास-पास/ के बाद/ भाग (हिस्सा)/ आवृत्ति इत्यादि होता है। यहाँ ‘पश्चात् और पास-पास’ वाला अर्थ अभीष्ट होगा। इसमें क्रमिकता के साथ-साथ अनवरतता का भाव भी अन्तर्भुक्त है। ‘अनुस्यूत’ के सन्दर्भ में लगातार एक धागे के पीछे बिल्कुल सटाकर दूसरा, दूसरे के पीछे तीसरा, चौथा, पाँचवाँ, छठा धागा इसतरह टाँकना, सीना, बुनना या गूँथना कि दो धागों के बीच से हवा भी न निकल पाए। इससे न केवल सुदृढ़़ता आती है, बल्कि सुघरता भी। इसतरह, ‘अनु’ उपसर्ग यहाँ क्रिया की बारम्बारता के साथ-साथ संहिता, संपृक्तता या सघनता का भी अर्थद्योतन करता है; यथा- अनुकरण, अनुसरण, अनुधावन, अनुरणन, अनुगुञ्जन, अनुश्रवण, अनुवर्तन इत्यादि।
   ‘षिवु’ दिवादिगणीय परस्मैपद धातु है, जिसका अर्थ सिलाई करना होता है। ‘षिवु’ का पूर्वार्ध ‘षि’ ‘धात्वादेः षः सः’ (अष्टा.: 6/1/62) से ‘सकार’ आदेश होकर ‘सिवु’ बन गया, जिसका धात्वर्थ ‘सिवु तन्तुसन्ताने’ (4/2, प. सीव्यति) होता है। (द्रष्टव्य: संस्कृत-धातुकोषः ; सं.- युधिष्ठिर मीमांसक; पृ. 131) अगले चरण में यह ‘सिवु’ 'उ' लोप से  ‘सिव्’ बन जाता है, फिर ‘सिऊ’। प्रश्न है, ‘सिऊ’ का परार्ध ‘ऊ’ कहाँ से आ गया? उत्तर होगा- ‘श् ऊठ् आदेश विधिसूत्रम्’ के अन्तर्गत ‘छ्-वोः’ शूडनुनासिके च ‘‘(अष्टा.: 6/4/19) सूत्र के अनुपालन से। आखिर क्या कहता है यह सूत्र? सूत्र कहता है कि ’’च्छ् व इत्येतयोः स्थाने यथासंख्य श् ऊठ् इत्येतौ आदेशौ भवतोऽनुनासिकादौ प्रत्यये परतः, क्वौ झलादौ चविक्ति’’, अर्थात् अनुनासिक, क्वि तथा झलादि कित्   डि्.त्  प्रत्ययों के परे रहते ‘च्छ्’ एवं ‘व’ के स्थान पर यथासंख्य करके शूठ् ‘श’ और  ‘ऊठ्’ आदेश होते हैं। उदाहरणार्थ - वकारस्य ऊठ् स्योनः। वकारस्य क्वौ अक्षद्यूः आदि। ‘यथासंख्यमनुदेशः समानाम्' परिभाषा से ये आदेश क्रमशः होते हैं। दूसरे शब्दों में, ‘छ्’ का ‘श्’ तथा ‘व्’ का ‘ऊठ्’ आदेश होता है। चूँकि, यहाँ ‘सिव्’ वकारान्त है, इसलिए इसमें ‘ऊठ्’ प्रत्यय लगेगा। ‘ऊठ्’ से ‘ठ्’ का लोप होकर ‘ऊ’ शेष रह जाता है। आगे ‘यण्’ स्वर सन्धि बनाने में सहायता करने वाले सूत्र ‘इको यणचि' (अ.; 6/1/77) से ‘सिऊ’ = स्य्+ऊ = स्यू में परिणत हो गया।
    ‘अनुस्यूत’ ने अबतक कई कठिन चरण पार कर लिये हैं। यहाँ तक आते-आते ‘अनुस्यू’ मात्र बन पाया । अब उसे ‘त’ की प्राप्ति करनी पड़ेगी, अतः उसे भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय ‘क्त’ का आवाहन करना होगा। लीजिए, ‘अनुस्यू’ ने आवाहन किया नहीं कि ‘क्त’ उससे सटकर खड़ा हो गया। फलस्वरूप, ‘अनुस्यू + क्त = ‘अनुस्यूक्त’ तो हो गया, किन्तु ‘अनुस्यूत’ नहीं बन पाया। इसके लिए उसे एकबार पुनः विनती करनी होगी। और विनती किससे? ‘क्त’ के ‘क्’ से - ‘‘मुझे, सुघर और जनप्रिय रूप् देने के लिए हे ‘क्’ महोदय! ‘त’ का साथ छोड़ दीजिए।’’ ‘क्’ ने उसका कहा मानकर ‘त’ को स्वतन्त्र कर दिया, ताकि ‘अनुस्यू’ के साथ जुड़कर सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके।
 जिसतरह मोती स्वयं को छिदवाकर किसी का गलहार बनता है, उसीतरह ‘अनुस्यूत’ भी कई चरणों की ठुकाई-पिटाई के बाद भाषा-प्रेमियों का लाड़ला बनता है।
 अब मैं कुछ प्रयोग सामने रख रहा हूँ, ताकि किसी के मन में कोई संशय न रह जाए। देखिए -
* ‘‘ऊतं स्यूतमुतं चेति त्रितयं तन्तु सन्तते’’ - अमरकोषः (रामाश्रमी भाष्य); पृ. 383
*  स्यूतः प्रसेवके ; वही
*  स्यूत प्रसेवौ ; वही; पृ. 310
* ‘‘स्यूतं स्यूतं पुनरपि च यच्छीर्यते धार्यमाणं
    गात्रे क्लृप्तं कथमपि तथाऽच्छादने नालमेव।
    धृत्वा देहे हिममयमितं श्वेतकार्पासवस्त्रं
    पृथ्वी शेते विकलकरणा निर्धना गेहिनीव।। (राधावल्लभ त्रिपाठी)
(दरिद्र गृहिणी की तरह व्याकुल इन्द्रियों वाली धरती ठंढे सफेद सूती वस्त्र को धारण कर सो रही है। बार-बार सीये जाने (स्यूतं-स्यूतं) के कारण वस्त्र धारण करने पर फटा जा रहा है। फलस्वरूप, वह न तो अंग ढँकने के काम आ रहा है और न ही ओढ़ने के काम।
 छंद का प्रारंभ ‘स्यूतं-स्यूतं’ से हुआ है। उनमें ‘अनु’ उपसर्ग लगा दीजिए तो ‘अनुस्यूतं अनुस्यूतं’ की सृष्टि हो जाएगी।
 इदमित्थं, सिद्ध हुआ कि ‘अनुस्यूत’ ही साधु प्रयोग है, न कि ‘अनुस्युत’। अतः, ‘अनुस्युत’ के प्रयोग को निन्द्य मानते हुए सदा और सर्वत्र ‘अनुस्यूत’ का ही प्रयोग किया जाना चाहिए।

        घर से जब भी निकलें, मुखावरण/मुखच्छद/नासावरण/नासाच्छद  पहनकर ही निकलें।

 - बहादुर मिश्र
 21 मई, 2020

पातालगंगा से फूटी जलधारा / उमाशंकर पाण्डेय







फूट पड़ी पातालगंगा

-उमाशंकर पांडेय

 फूट पड़ी पातालगंगा सांसद, पत्रकारों, स्थानीय नागरिकों ने, उठाया जल संरक्षण के लिए फावड़ा, तसला, शायद विश्वास ना हो सूखे बुंदेलखंड में जलधारा अपने आप ही निकलने लगी है जमीनी सतह से, सामूहिक प्रयास से।

 बांदा से चित्रकूट रोड पर अतर्रा 7 किलोमीटर दूरी पर यह स्थान है। जो तुर्रा ग्राम पंचायत ब्लाक नरैनी के अंतर्गत आता है विषहर नदी के किनारे बुंदेलखंड ही नहीं शायद भारत का यह पहला ऐसा स्थान है जहां पर 100 वर्ष से अधिक समय से अपने आप जमीन से पानी सदैव बहता रहा है। लेकिन किसी कारण बस पिछले 4 वर्ष से यह पूरी तरह से सूख गया था, कई दिनों के प्रयास के बाद सामूहिक योजना बनी बगैर किसी सरकारी सहायता के सर्वोदय विचारधारा को साथ लेकर इस स्थान की सफाई शुरू की गई 100 लोगों के सामूहिक प्रयास से, एक नहीं, दो धाराएं अचानक पाताल से पानी निकालने लगे यह चमत्कार कहा जाए या समूहिक प्रयास।

 इस समूहिक प्रयास में सांसद बांदा चित्रकूट भैरव प्रसाद मिश्रा, अतर्रा तहसील के वरिष्ठ पत्रकारों ने खुद मिट्टी खोदी फावड़ा चलाया स्थानीय नागरिकों ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए वह कर दिखाया जो करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद संभव नहीं है।

 शायद विश्वास ना हो जो भी देखना चाहता है वह वहां जा कर देखें हमें खुशी होगी एक ओर जहां बुंदेलखंड में 300 फीट पर पानी नहीं है सरकारी रिकॉर्ड में, वहीं इस स्थान पर अपने आप जमीन से पानी निकल रहा है। मै सौभाग्यशाली हूं, इस अद्वितीय ऐतिहासिक जल संरक्षण के प्रयोग श्रमदान का नेतृत्व स्थानीय ग्राम प्रधान प्रतिनिधि, स्थानीय नागरिकों, ने मुझे सौंपा और मेरे नेतृत्व में शायद यह ऐतिहासिक कार्य संपन्न हुआ।

मेरे सामाजिक जीवन में शायद यह पहला अवसर है जिसका परिणाम अल्प समय में जल संरक्षण के क्षेत्र में विश्वव्यापी होगा। मुझे खुद विश्वास नहीं था कि जलदेवता ऐसी कृपा इस स्थान पर करेंगे इतनी जल्दी।

ज्ञात हो कि इस विषहर नदी में आज से 20 वर्ष पूर्व बांदा जिले के आसपास के जिलों के कुष्ठ रोगी, चर्म रोगी, बीमार लोग स्नान करने गस नदी मे आते थे, और ठीक होकर चले जाते थे। इस स्थान के पास जब इस कुंड से पानी निकलता था आसपास के दमा रोगी इसका पानी लेकर जाते थे, पानी पीकर ठीक हो जाते थे, यह एकमात्र ऐसी नदी है जो केवल 7 किलोमीटर है, जो कुछ समय बाद नाला बन गई। कई लोगों ने, समाजसेवी पत्रकार, स्थानिक नागरिकों ने मुझसे कई बार इस स्थान की चर्चा की थी। चर्चा उपरांत मैंने निर्णय लिया की यदि सब लोग मेरे साथ हो तो प्रयास किया जा सकता है, 3 दिनों के समूह प्रयास का परिणाम आप सब के सामने है। इस सामूहिक प्रयास में बांदा चित्रकूट सांसद भैरो प्रसाद मिश्रा ने साथ ही नहीं दिया बल्कि फावड़ा उठाया, तसला से मिट्टी फेंकी, पत्रकारों के जो हाथ से खबर लिखते हैं, आज पत्रकारों के उन हाथों ने फावड़ा चलाया, तसले से मिट्टी फेंकी, निस्वार्थ भाव से श्रमदान किया और स्थानीय नागरिकों का एवं मेरा उत्साह ही नहीं बढ़ाया हर संभव मदद देने की बात कही।

राष्ट्रीय सहारा के संवाददाता श्री अर्जुन मिश्र, अमर उजाला के श्री मृत्युंजय द्विवेदी, दैनिक जागरण के श्री राजेश तिवारी, हिंदुस्तान समाचार पत्र के मुन्ना द्विवेदी, दैनिक जागरण कानपुर के बिहारी दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार राजाराम तिवारी ने श्रमदान किया।
आश्चर्य व्यक्त किया कि अचानक यह जलधाराएं कहां से आ गई। प्रत्यक्ष ग्राम प्रधान प्रतिनिधि रज्जू सिंह, दिव्यांग विश्वविद्यालय के चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर सचिन उपाध्याय, विशेष नारायण मिश्र चित्रकूट, राजेश सिंह नंदना, राजा शिवहरे, पंडित रामस्वरूप महाविद्यालय प्रबंधक दिनेश उपाध्याय, बच्चा पांडे प्रबंधक चंद्र शेखर पांडे महाविद्यालय अतर्रा, हनुमान मंदिर के महंत रामगिरी, रामभरोसा पांडे, राम प्रकाश गर्ग, राम प्रबंध पांडे, राज नारायण सिंह, रामाकांत, रामराजा गौतम, राम प्रकाश त्रिपाठी, ओमप्रकाश शिवहरे, राजा बाबू झा, भोला प्रसाद, अनिल वर्मा, मलखान सिंह, संजय सिंह, विश्वनाथ गर्ग, राम अवतार गौतम, विजय वर्मा पूर्व प्रधान, नत्थू यादव मट्ठा वाला, बलराम सिंह खंगार, श्रीमती कमला शिवहरे सहित करीब 100 लोगों ने 3 दिन तक स्वेच्छा से श्रमदान कर जल संरक्षण के क्षेत्र में इतिहास रचा। ईश्वर ने मुझे माध्यम बनाकर देश में कई महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यों का नेतृत्व करने का मौका दिया, लेकिन आज जो जल संरक्षण के क्षेत्र में प्रत्यक्ष जमीनी सतह से पाताल गंगा का पानी निकलना और एक नई धारा का प्रकट होना मैं अपनी निजी उपलब्धि मानता हूं। जल संरक्षण के क्षेत्र में मेरा ऐसा मानना है कि प्राणी और प्रकृति कल्पना जल के बिना संभव नहीं है।

पृथ्वी में जितने भी जीव हैं, उनका जीवन जल पर निर्भर है। शरीर में, पेड़ में, फलों में, अनाजों में, पत्तों में, जो स्वाद है, रस है, वह सब जल है। और इसके बिना सब कुछ सुना है। जल ही जीवन है, पानी में सारे देवता रहते हैं, वेदों में जल को देवता माना है हमारे इस सामूहिक प्रयास को राष्ट्रीय मीडिया ने, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ अधिकारियों ने, जिस तरीके से स्वीकार किया है, सहयोग किया है, उत्साह बढ़ाया है, हम उनके आभारी हैं। अति शीघ्र एक बड़ी योजना बनाकर स्थानीय नागरिकों के साथ बैठक कर सामूहिक सर्वोदय विचारधारा पर जल संरक्षण के क्षेत्र में प्रयास किए जाएंगे। यदि इस गांव में सामूहिक प्रयास से पातालगंगा निकल सकती है तो अन्य गांव में क्यों नहीं, ज्ञात हो कि अतर्रा की इस भूमि पर आचार्य विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन की वृहद रूपरेखा तैयार की थी तथा देश के जाने-माने समाजवादी जयप्रकाश नारायण ने यहीं पर भूदान आंदोलन के लिए अपना जीवन दान दिय हमने छोटा सा प्रयास किया यह प्रयास बड़ा नहीं है। इससे पूर्व भी इस कुंड की सफाई जल संरक्षण के लिए कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उच्च अधिकारियों को लिखा पढ़ी थी लेकिन 4 वर्षों में सरकार तो सरकार है। कब सुनेगी पता नहीं इसलिए मुझे लगता है, की सामूहिक प्रयास करने चाहिए सरकार अपना काम करें, हम अपना काम करें।

मंगलवार, 16 जून 2020

काश ....... हम पंछी होते..... / लेखक का नाम नहीं दर्ज था.




काश हम पंछी होते !


उषाकाल में जब आकाश धीरे-धीरे आलोकित हो रहा हो ,पक्षियों की गुंजार सुनने का अनुभव बहुत आनंद दायक होता है.
ऐसे समय में ,छत के एक कोने में बैठ अपने हाथ पैर हिलाते(योगासन)समय मेरी दृष्टि बार  बार मुँडेर की ओर जाती है जहां कटोरा भर दाना पानी रखना मेरी बरसों से चली आरही दिनचर्या है. वहाँ एक एक दो दो पक्षियों को क्रमशः आता देख मेरा मन होता है कहूँ-
              राम राम गौरय्या !
               राम राम मैना रानी !
               राम राम मिट्ठू मियाँ!
पर वो कब सुनेंगे? चोंच भर पानी पिया ,उड़े और पेड़ पर बैठ कर चहचहाने लगे.
आज भी मेरी दृष्टि वहीं लगी थी, पहले दो कबूतर आए ,बैठकर सशंकित हो इधर-उधर गर्दन मटकायी,पानी पिया और उड़ गए.मैना आयी  मुँडेर पर इधर-उधर फुदकी फिर फुदक कर कटोरे पर बैठी ,चोंच भर पानी पिया और उड़ गई. कुछ देर बाद आया कौआ,उसकी उड़ान सीधी कटोरे पर उतरी .पानी पीने के बाद गर्दन उठा कर देखा और मालुम नहीं कैसे
उसकी दृष्टि सीधी मेरे पर आकर रुक गई.
धृष्ट एकटक मुझे देख रहा था मानो कह रहा हो -उड़ाओगी ?उड़ा कर देखो .
मैं बुदबुदायीं-मैं क्यों उड़ाऊँगी भय्या ?तुम सब निशंक हो दाना पानी लो इसलिए मैं दूर कोने में बैठी हूँ.कल तो बंदर के छोटे बच्चे ने कटोरा हाथ में उठा ,मुँह अंदर डाल कर पानी घुटक लिया था.मैंने उसे भी नहीं रोका .
कौआ निरन्तर मुझे देख रहा था,मैं निस्पंद उसे देख रही थी.तभी तन के किसी अणु में स्थित अदृश्य मन ने कहा -ईश्वर ने भी धन धान्य,जल पवन से भरा यह धरती नुमा कटोरा सब के लिए समान रूप से रखा है फिर मानव समाज......?
ना ना नहीं मैं यह नहीं कहना चाह रही कि उस बेला मेरे अंदर ज्ञान का संचार हुआ.ऐसे स्वर तो यदा कदा हर व्यक्ति के मन में उठते हैं.इस स्वर को सुन कर व्यक्ति अपनी करनी पर कुछ समय के लिए मुख मलिन कर के बैठ जाता है .लेकिन कब तक ?
हम पंछी थोड़े ही हैं.
हम मानव जाति के ज्ञानवान प्राणी ,समय के उच्च शिखर पर बैठे हैं.हम जानते हैं -
             यह गोरा है-वह काला
              यह अमीर है -वह गरीब
               यह राजा है -वह प्रजा
                 यह बुद्धिमान-वह मूर्ख
                   यह सफल है -वह असफल
                  यह तेरा है -यह मेरा
ऐसी बहुत सी बात हम जानते हैं,केवल वह बात हम नहीं जानते जो हमें जाननी चाहिए .अपने ज्ञान के भार से दबे हम !
काश कि हम पंछी होते !      सहज ज्ञान से भरे ,प्रतिस्पर्धा से दूर ,अपने डैनों की सामर्थ्य पर विश्वास करके (नैराश्य तथा आपदस्थिति में भी ) खुले  आकाश में उन्मुक्त उड़ान भरते .

सोमवार, 15 जून 2020

सुरेंद्र ग्लोश की रचनाएँ






/ सुरेन्द्र  ग्लोश


  एक दिल था शाम को सौंप दिया
अब   दुजा  कहां   से  लाएं  हंम
बंसी   धुन   कान‌   में    बैठ  गई
अब और  क्या  उसे सु नाएं  हंम
एक दिल था शाम को सौंप दिया

आंखों   में  शाम   हैं   आन  बसें
कुछ   और   देख  ना   पाएं  हंम
इस  तन  पे  शाम  का  राज‌ चले
अब   खुद  कैसे   चल  पायें‌  हम
बंसी   धुन    कान   में   बैठ   गई
अब  और  क्या  उसे  सुनाएं  हंम

जब   शाम  शाम   रंग  डाल  गये
किसी  और  ना रंग  रंग पायें  हंम
बैठा    है   लबों   पे    शाम   नाम
कुछ   और   बोल  ना   पायें   हम
 बंसी    धुन   कान   में   बैठ   गई
अब  और  क्या  उसे  सुनाएं   हंम

उदौ ‌ उस   शाम  का  क्या  कहना
हैं   उस    की   आस   लगाए  हंम
अब    रो   रो    ‌आंसू    सूख   गए
दिल   ही   दिल   घुटते  जायें   हम
 बंसी  ‌  धुन   कान    में   बैठ   गई
अब  और   क्या  उसे  सुनाएं   हंम

उस   बिरहा  जल जल  खाक  हुए
अब  किस  को  और  जलांयें‌   हंम
अगर   कांटा  भी  चुभ  जाये‌  उन्हें
यहां   लहू   लुहान   हो  जायें   हम
बंसी   ‌ धुन     कान    में   बैठ  गई
अब   और   क्या  उसे  सुनाएं  हंम

हम   यही    दुआ   नित ‌ करें  सदा
वह      खुश     रहें    आबाद    रहें
जब     याद     हमारी   आ     जाए
उन    के  ही   मन   पा ‌  जायें   हम
 बंसी     धुन   कान   में    बैठ   गई
अब।  और   क्या  उसे  सुनाएं   हंम

जा  ‌  ऊदौ    शाम   से   ना  ‌ कैहना
हमं     घुट    घुट    जिए   जाते    हैं
तेरी  याद  में   तिल   तिल   मरते  हैं
ना    पायें    चैन    ना     सोएं    हंम
बंसी    धुन    कान    में    बैठ    गई
अब   और   क्या  उसे   सुनाएं   हंम

कुछ    ऐसा   ना    कह    देना   उन्हें
जो   और    दुःखी   कर   जाए   उन्हें
हम   खुश  हैं   जिसमें   वो   खुश   हैं
चाहे    जांन   भी   दे    जायें  गे   हंम
बंसी     धुन    कान     में     बैठ   गई
अब   और   क्या ‌  उसे   सुनाएं    हंम
एक   दिल था  शाम  को  सौंप   दिया
अब     दुजा   कहां    से   लाएं    ह

: हम   तो   प्यार _ ए _ वफा   कर  के  सनम
बन  गये  तमाशा  _ए  _ जमानां  ओ  सनम

तुने  क्यूं  तोड़  दिया  आईना _ए_दिल  मेरा
टुकड़े   टुकड़े   बिखरा  है  ज़मी   पे   सनम
बन  गये  तमाशा  _  ए _ जमानां  ओ  सनम

दुनिया  ने दिये   जख्म  वो  भर  गये  तमाम
भर ना पाया एक ज़ख़्म जो तूने  दिया सनम     
बन   गये   तमाशा _ए_ज़माना   ओ    सनम

बहारें  भरी रहें  तेरी  राहों  में  जहां  तुम  रहो
तेरे  ग़म  के  सहारे  जी  लेंगे  सारी  उम्र   हम
बन    गये   तमाशा _ए_ज़माना   ओ    सनम


ना   दर   ना   ठिकाना   पड़ें   रास्तों   पे   हम
राह  तकें   ये   आंखें   तेरे   आने   की   सनम       
बन   गये   तमाशा _ ए _ ज़माना   ओ   सनम
हम   तो   प्यार  _ ए _ वफा   कर    के   सनम
बन  ग   ये  तमाशा  _ ए _  ज़मानां  ओ  सनम




नां मैं तुझ से  खफा  था नां  तू  मूझसे  थी खफा
फिर   क्यु   जिंदगी   ने   हमें   जुदा   कर   दिया

नां  वो   रात  हो  गी   अब  नां  वो   चांद   हो  गा
तुझे  देखने  को  मेरा  दिल  सदा ‌  बेताब   हो  गा
जांनता  हूं  मैं  के  तुम  ना  लौटो  गी  अब   कभी
फिर  भी हर  पल  तेरे  मिलने  का  इंतजार  हो गा
नां  मैं   तुझ  खफा  था  नां  तू   मुझसे   थी  खफा

तुझे  ढूंढें  गी   नज़रें   हर   शाख  पे   हर  फूल   में
आस   रहे   गी   कहीं   तो   तेरा    दीदार   हो   गा
दुआ   मांगूं   रब  से  ले   जाये   मुझे  भी  पास  तेरे
मिला  दे  जान _ए_जिगर  से  बड़ा  उपकार  हो गा
नां  मैं  तुझ  से  खफा  था  नां  तू  मुझसे  थी  खफा

प्यार  भरी    दुनिया   को   उजाड़ ‌   के   रख   दिया
खिजां   ने   खिलते   फूलों   को   बर्बाद   कर  दिया
अंधेरा   छा  गया    मेरे  घर   में  तेरे  जाने   के  बाद
रौशन   रहा   हरदम  तेरे  हुस्न _ ए _ जमाल  से  था
नां  मैं   तुझ  से  खफा  था  नां  तू   मुझसे  थी  खफा
फिर    क्युं    जिंदगी    ने    हमें    जुदा    कर    दिया






दील अंजानें  तुझ   को दे बैठा
एक ज़ैहर - ऐ-,आब.मैं पी बैठा
दिल  अंंजानेंं तुझ  को  दे   बैठा

कुछ ऐसी पी ली निग़ाह - ए -शराब
तेरी   ‌आपनें   होश   गवा   बैठा
दिल  अंजाने  तुझ  को  दे  बैठा

जब   होश  आया  देखा  मैं  तो
तेरी  चौखट  पर था  गीरा  बैठा
दिल  अंजांनें   तुझ को  दे  बैठा

मुझ सा नां इश्क  में खोना यारो
मैं तो आपना जनाजा उठा बैठा
दिल  अंजांनें  तुझ  को  दे  बैठा

वो शख्स जो  इश्क  में डूब गया
वो खुद ही खुद  को मिटा   बैठा

दिल  अंजानें  तुझ  को  दे  बठा
एक ज़हर - ए - आब मैं पी बैठा
दिल  अंजांनें   तुझ  को  दे बैठ




 (यह रचना बच्चों को समर्पित)



ऐक  चिड़िया  ठंड  के  दिनों  में  जा बैठी  धूप  सेंकने

कबुतर  ने देखा  चीडिया  को आ  बैठा  उसके  सामने

देख के  कौवा  उन दोनों  को  लाया  मुंगफली  के दाने
मौसम  सुहाना  देख मोर  भी लगा अपने पंख  फैलाने

अंबवा  बैठी  कोयल  आई  कूहूं कूहूं  करती गाना गाने
दौड़ता  आया  रीछ भी ले  कर ढोल और लगा  बजाने

जमां हो  सब  पंछी  व  जानवर  लग  गये  धूम  मचाने
साथ    साथ    में    खाते    जाएं    मूंगफली     केदाने

लगे  भूल सब  गिले-शिकवे  एक दूजे  को  गले  लगाने
सब  ने कहा  कुछ  वक्त  यहां रोज़  आएं  खुशी  मनाने

एक   चीड़िया   ठंड के  दिनों ‌ में  जा  बैठी  धूप  सेंकने
कबुतर  ने  देखा  चिड़िया  कोआ  बैठा  उस  के  सामने
चिड़िया बैठी धूप सेंकने           चिड़िया बैठी धूप सेंकने



शनिवार, 13 जून 2020

सीमा मधुरिमा की कुछ रचनाएँ






पत्रकार ..

पिछले तीन हफ्ते से वो सड़को पर लगातार पैदल चल रहे मजदूरों का दर्द शूट कर रहा था ....रोज ही नई नई खबरें ...उसके भेजे गए वीडियो और तस्वीरों से उसके समाचार की माँग बढ़ने लगी l
आज ही उसके एक उच्च अधिकारी ने बताया की उसके प्रमोशन की बात चल रही l वो बहुत खुश हुआ और चल दिया इस ख़ुशी को बांटने अपनी सबसे नई महिला मित्र के पास l रास्ते में उसे कुछ रोते हुए लोग मिले ....वो अपनी बड़ी गाड़ी से निचे उतरा और उनका हाल पूछा ..पता चला तीन दिनों से रोटी का एक भी टुकड़ा नहीं मिला ....अब और पैदल नहीं चला जाता इसलिए वो वहीं बैठ गए ....उसने अपना कैमरा निकाला कुछ तस्वीरें खींची एक दो लोगों का इंटरव्यू लिया और अपने बड़े अफसरों को भेज दिया l  उसका मन तो हुआ की कुछ मदद कर दे इनलोगों की ...लेकिन तभी उसे याद आया कि वो पत्रकार है और जो इनलोगों के लिए कर सकता था वो उसने कर लिया है l  तभी उसे याद आया कि वो तो अपनी नई महिला मित्र के यहाँ जा रहा था ...वो अपनी बड़ी गाड़ी में दाखिल हुआ और बढ़ गया l उसकी बड़ी गाड़ी के चारों तरफ स्टिकर लगे थे कोरोना आपातकाल सेवा पत्रकार !!"




कुछ स्त्रियाँ ऐसी भी होती हैँ ---



कुछ लड़कियाँ ऐसी भी होती हैं
जो अपनी सीमायें कभी नहीं सीमित करतीं --
हर वो चीज छिनती हैं जिसपर अपना हक समझती हैं --
हाँ ऐसी ही कुछ लड़कियाँ
मल देती है कलंक लड़कियों के नाम पर भी --
ज़ब दिल दे बैठती किसी पुरुष को
और उस पुरुष से मिलता इंकार ..
उस समय ये कुछ लड़कियाँ दिखलाती हैं क्रोध ..
और ये क्रोध अक्सर शांत होता एसिड अटैक के बाद --
बदल देती उस पुरुष का रूप रंग जिसपर मोहित होती हैं ...
हाँ ये सच हैं एसिड अटैक
बिगड़े लड़के ही नहीं करते
बिगड़ी और तिलमिलाई
लड़कियाँ भी करती हैं ...
और तब शर्मसार होती है प्रकृति भी
क्योंकि प्रकृति ने लड़की को प्रकृति सा ही बनाया है सृजन करने को -=-
पर ऐसी बिगड़ी लड़कियाँ लांघ जाती हैँ बंदिशें और बन बैठती हैं राक्षसी lll




 कुछ क्षणिकाएँ ......

( 1 )भूख -

वो भूखी थी
भटक रही थी रोटी की तलाश में
मुझे विषय मिल गया
और मैंने लिख दी एक बहुत मार्मिक कविता ..
उधर वो रोटी के लिए भटकती रही
इधर मेरी कविता की वाह वाही से मेरी आत्मा की भूख शांत होती रही --
मैंने अपना लेखकीय धर्म निभा लिया था ll

( 2 )प्यास .....

वो प्यासी थी
उसने पानी माँगा ...
उसकी आँखें आशान्वित थीं
उसे विश्वास था मुझसे पानी मिलने का ...
मैंने लिखी एक बड़ी मार्मिक कविता उसकी प्यास पर ..
वो ताकती रही ..मेरी कविता लिखने की प्यास बुझती रही l

( 3 ) छत

बहुत तेज धूप थीं ..
उसे छाया चाहिए थीं
सर पर एक छतनुमा जिससे उसे सुकूँ मिल सकता था ...
मैंने लिख डाली एक छतनुमा कविता ..
मेरी कविता की छत ने जाने कितनों को छत दे दिया ..
उसका मेरी ओर ताकना तब भी जारी था ..
जाने क्यों हरबार वो मुझे ही ताकती है  lll

सीमा" मधुरिमा"
लखनऊ !!!

रामधारी सिंह दिनकर की एक चर्चित कविता





ओज गुण के पुरोधा,अपनी कविताओं से सत्ता के सिंहासन तक को हिलाने की क्षमता रखने वाले हिंदी भाषा के महाकवि रामधारी सिंह दिनकर जी को उनके जन्मदिन पर कोटि कोटि नमन।
आज पढ़िए उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक कृष्ण की चेतावनी।

वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

‘दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

‘भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहाँ तू है।

‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

‘बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

‘हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

‘भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,
निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!

-रामधारी सिंह दिनकर



चुनाव सबसे बड़े मुर्ख का / सुभाषचंदर







जनसंदेश टाइम्स के शनिवार के व्यंग्य स्तंभ में पढ़िए "चुनाव सबसे बड़े मूर्ख का '

चुनाव सबसे बड़े मूर्ख का
 सुभाष चंदर

आओ मित्रों, आज आपको एक ऐसे सम्मेलन  में लिए चलता हूँ जहाँ सबसे बड़े मूर्ख का चुनाव होने वाला है l  इस सम्मेलन में दूर दूर से मूर्ख लोगों की सवारियां आईं हुई हैं। चलिए आपका परिचय सभी सहभागियों से करा दूं जो इस चुनाव में हिस्सा लेने आये हैं l उनसे मिलिए l वह जिनके भारी व्यक्तित्व का  खमियाजा उनकी कुर्सी भुगत रही है , वह हमारे  देश के उद्योगपति हैं l  इनके बराबर वाली कुर्सी पर कुर्ता-धोती की राष्ट्रीय पोशाक में नेताजी विद्यमान है जो आसमान को ऐसे घूर रहे हैं जैसे उसके कुछ तारे झपट लेंगे l नेताजी की बगल में खाकी वर्दी में थानेदार जी बैठे हैं जो  कुर्सी पर बैठे- बैठे भी जमीन पर ठोकरे मार रहे हैं  । उधर कोने में चेहरे पर मनहूसियत का स्थायी भाव लिए जो सज्जन शून्य में निहार रहे हैं ,वह हिंदी के साहित्यकार हैं । उधर एकदम कोने में एक साहब शर्माने का लगातार  अभ्यास कर रहे है ।वह कभी  पैर के नाखूनों से जमीन कुदेरते हैं तो  कभी सीट छोडकर जमीन पर बैठने की कोशिश करते हैं  । उनके चेहरे पर अजीब किस्म की दयनीयता तैर रही है । वह उनकी हरकतों से मुझे लगता है कि वह हो न हो कोई मामूली किस्म के आदमी है जिन्हें हम अपनी सुविधा के अनुसार जनता-जनार्दन या आम आदमी भी कह सकते हैं  ।
और भी कुछ लोग हैं।पर देखने में ये ही बड़े दावेदार लग रहे हैं।सो हम उन्हीं पर कंसंट्रेट करेंगे।
  तो पाठको ... आज के इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में हमारे सारे मेहमान पूरी तैयारी से आये हैं । सभी का दावा है कि उनसे बढकर मूर्ख  और कोई नहीं है । आइये हम उन्हीं के श्रीमुख से उनकी दलीलें सुनें ।
सबसे पहले नेताजी का नाम पुकारा गया है । अब वह अपनी मूर्खता का  दावा माइक पर पेश कर रहे हैं ।नेताजी  कहते हैं,” -बहनों और भाइयो , बताइये हमसे  बड़ा मूर्ख और कौन होगा जो जनता की इतनी सेवा करने के बाद भी गाली खाता है । हम तो  सब काम जनहित में करते है । शंकर जी ने तो सिर्फ विष  पिया था, हम तो जनता के लिए यूरिया से लेकर जानवरों का चारा तक पचा लेते हैं । यह तो कोई देखता नहीं कि राजनीति की इस कच्ची नौकरी के लिए हमें  कैसे- कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं । पर जरा सा कोई घोटाला कर लिया तो लोग बेईमान कहने लगते हैं । बताइए  देश हमारा हम देश के । चाहे उसे चाटे या बेचें ,लोग कौन होते हैं। इसके बाद भी हम गालियाँ खाते हैं l पर हम हैं कि फिर भी  जनता की सेवा से बाज़ नहीं आते हैं । बताइये होगा कोई मूर्ख जो सेवा भी करे गाली भी खाए ।बताइये ,बताइये l”
         नेताजी के जाने के बाद उद्योगपति जी माइक के सामने आये और बोले,–“ साथियों ,सही मायने में हम उद्योगपति ही महा मूर्ख की पदवी के सही हकदार है । अब देखिये ,हम व्यवसायी लोग न जाने कितनी तिकड़में करके पैसा इकटठा करते है और सरकार बिना कुछ किए –धरे इनकम टैक्स के रूप में हमारा पैसा हड़प कर जाती है। दूसरा हमारी मूर्खता का सबूत ये कि ये नेता लोग हमसे  ही चंदा लेकर चुनाव लड़ते हैं  और हमें ही गालियाँ देतें हैं । यहाँ तक कि जब चुनाव जीत जाते हैं तो हमारे चंदे के बदले लाइसेंस परमिट देने तक  में भी आना-कानी करते हैं । बताइये हमसे बड़ा मूर्ख देखा है आपने ? है । उनके जाते ही थानेदार जी आये  और बोले,” देखिए हम लोगों ने अपराध कम करने के लिए कितने  कदम उठाये हैं । हमारे डर के कारण लोग अपराध करते हुए डरते हैं । अब वही अपराध करता है ,जिसकी ज़ेब में नोट होते हैं । लोग कहते हैं कि हम लोगों को परेशान करते हैं ,उन्हें लूटते हैं l जबकि हम तो उनके पैसे लेकर उन्हें  मोह माया से दूर करते हैं l बताइये हमसे बड़ा है कोई मूर्ख जो भलाई का काम भी करे और सजा भी पाए ? इतना कहकर डंडा फटकारते हुए वापस लौट जाते हैं।
          पुलिस प्रतिनिधि के बाद साहित्यकारजी का आगमन हुआ है । उन्होंने पहले गला खखारा । परम्परा के मुताबिक ऑंखें आसमान में गड़ाई। महानता के चिह्न  मनहूसियत को चेहरे पर चिपकाया  और ऐसे बोलना शुरू किया । मानो शोक संदेश पढ़ रहें हों---
 भाइयो और बहनों ,हिंदी के साहित्यकार से बड़ा मूर्ख और कोई नहीं हो सकता। बताइए हम पूरी- पूरी  रात  बैठकर रचना तैयार करते है और सम्पादक कई बार  रचना छापना तो दूर,उसकी प्राप्ति की सूचना भी नहीं देते हैं  । और तो और हम जिस आम आदमी के लिए लिखते हैं वो कहता है कि उसे हमारा लिखा समझ में नहीं आता,वह भी हमें कुछ नहीं समझता  । यहाँ तक कि लेखक होने के ऐब के कारण हमारी शादी भी बड़ी मुश्किल से होती है । शादी हो भी जाये तो बीवी तक डांटती हैं । न तो वह रचना सुनती है  और न ही काम करने से रोकती है। बताइए साहित्यकार को क्या काम करना चाहिए । अब बताइए “ हमसे बड़ा मूर्ख कौन होगा जो लेखन जैसे  महान काम भी करेगा और अपमानित भी होगा”। यह कहकर लेखकजी दुखी मन से लौट गये ।
     अब सिर्फ आखिरी प्रतिद्वंद्वी बचे हैं । वही फीके रंगो वाले आम आदमी जी।वह मंच पर काफी कुछ उल्टा पुल्टा बोल रहे हैं, –“सब माई बाप लोगो को प्रणाम । हुज़ूर , यहाँ सब बड़े –बड़े लोग मौजूद है । सबने अपनी –अपनी बात रखी । पर हुजुर,हम सच्ची कह देते हैं,हम बिल्कुल भी मूर्ख नहीं हैं । हम तो काफी समझदार हैं । काफी खुश है । नेताजी ने हमारे लिए बहुत काम किया है । ये हमारी गरीबी दूर करने में लगे हैं । ये तो हमारी गरीबी ही नामुराद ऐसी जिद्दी है कि दूर नहीं हो रही । सिर्फ नेताजी ही क्यों ? सब हमारे लिये  सोचते है । सेठजी ने हम गरीबो के लिए ही मिल खोली है । पुलिस वाले दरोगा जी हमारी रक्षा करते हैं। लेखक- बाबू हम लोगो की खातिर ही इतनी मेहनत  करते हैं । सरकार से लेकर सब लोग हमारे वास्ते कितना-कितना करते हैं ।पर हम उनके लिए कुछ नहीं करते । हुजुर.... हमने काफी  कह लिया । पर हम इतना बताये देते हैं कि हम मूर्ख नहीं है।कतई मूर्ख नहीं है ।“ कहते –कहते आम  आदमी रो पड़ा । वैसे एक बात कहें ,इस  आम आदमी को रोने की बहुत बुरी बीमारी है । ख़ुशी गम हरेक में रोता है ।
पर छोड़िये ..... आप ने पूरा महामूर्ख  सम्मेलन  देख लिया  न ? अब आप ही फैसला कीजिए कि इन सब में महामूर्ख  की पदवी का हकदार कौन है ? और हाँ ,उस आम आदमी को तो छोड़ ही दीजियेगा जिसने  खुद कहा है कि वह मूर्ख नहीं है ।



.....................

शुक्रवार, 12 जून 2020

सर्वेपल्लि राधाकृष्णन






सर्वेपल्लि राधाकृष्णन

प्रसिद्ध शिक्षाविद
एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति

डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन (तमिल: சர்வபள்ளி ராதாகிருஷ்ணன்; 5 सितम्बर 1888 – 17 अप्रैल 1975) भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति (1952 - 1962) और द्वितीय राष्ट्रपति रहे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे। उनके इन्हीं गुणों के कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था। उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारत के तीसरे राष्ट्रपति
कार्यकाल
१३ मई, १९६२ – १३ मई, १९६७
प्रधान  मंत्री
गुलजारी लाल नंदा (प्रथम कार्यावधि)
लाल बहादुर शास्त्री
गुलजारीलाल नंदा (द्वितीय कार्यावधि)
उपराष्ट्रपति
डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन
पूर्व अधिकारी
राजेंद्र प्रसाद
उत्तराधिकारी
डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन
प्रथम भारत के उपराष्ट्रपति
कार्यकाल
१३ मई, १९५२ – १२ मई, १९६२
राष्ट्रपति
राजेन्द्र प्रसाद
पूर्व अधिकारी
कार्यालय आरम्भ
उत्तराधिकारी
डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन
जन्म
५ सितम्बर १८८८
तिरुट्टनी, तमिल नाडु, भारत
मृत्यु
१७ अप्रैल १९७५ (आयु: ८८ वर्ष)
चेन्नई, तमिल नाडु, भारत
राजनैतिक पार्टी
स्वतन्त्र
जीवन संगी
शिवकामु
संतान
५ पुत्रियाँ एवं १ पुत्र
व्यवसाय
राजनीतिज्ञ, दार्शनिक, शिक्षाविद, विचारक
धर्म
हिन्दू
जन्म एवं परिवार संपादित करें
डॉ॰ राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरूतनी ग्राम में, जो तत्कालीन मद्रास से लगभग 64 कि॰ मी॰ की दूरी पर स्थित है, 5 सितम्बर 1888 को हुआ था। जिस परिवार में उन्होंने जन्म लिया वह एक ब्राह्मण परिवार था। उनका जन्म स्थान भी एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में विख्यात रहा है। राधाकृष्णन के पुरखे पहले कभी 'सर्वपल्ली' नामक ग्राम में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में उन्होंने तिरूतनी ग्राम की ओर निष्क्रमण किया था। लेकिन उनके पुरखे चाहते थे कि उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के ग्राम का बोध भी सदैव रहना चाहिये। इसी कारण उनके परिजन अपने नाम के पूर्व 'सर्वपल्ली' धारण करने लगे थे।

डॉ॰ राधाकृष्णन एक ग़रीब किन्तु विद्वान ब्राह्मण की सन्तान थे। उनके पिता का नाम 'सर्वपल्ली वीरास्वामी' और माता का नाम 'सीताम्मा' था। उनके पिता राजस्व विभाग में काम करते थे। उन पर बहुत बड़े परिवार के भरण-पोषण का दायित्व था। वीरास्वामी के पाँच पुत्र तथा एक पुत्री थी। राधाकृष्णन का स्थान इन सन्ततियों में दूसरा था। उनके पिता काफ़ी कठिनाई के साथ परिवार का निर्वहन कर रहे थे। इस कारण बालक राधाकृष्णन को बचपन में कोई विशेष सुख प्राप्त नहीं हुआ।

विद्यार्थी जीवन संपादित करें
राधाकृष्णन का बाल्यकाल तिरूतनी एवं तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही व्यतीत हुआ। उन्होंने प्रथम आठ वर्ष तिरूतनी में ही गुजारे। यद्यपि उनके पिता पुराने विचारों के थे और उनमें धार्मिक भावनाएँ भी थीं, इसके बावजूद उन्होंने राधाकृष्णन को क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरूपति में 1896-1900 के मध्य विद्याध्ययन के लिये भेजा। फिर अगले 4 वर्ष (1900 से 1904) की उनकी शिक्षा वेल्लूर में हुई। इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास में शिक्षा प्राप्त की। वह बचपन से ही मेधावी थे।

इन 12 वर्षों के अध्ययन काल में राधाकृष्णन ने बाइबिल के महत्त्वपूर्ण अंश भी याद कर लिये। इसके लिये उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान प्रदान किया गया। इस उम्र में उन्होंने स्वामी विवेकानन्द और अन्य महान विचारकों का अध्ययन किया। उन्होंने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने 1904 में कला संकाय परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी भी उच्च प्राप्तांकों के कारण मिली। इसके अलावा क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने उन्हें छात्रवृत्ति भी दी। दर्शनशास्त्र में एम०ए० करने के पश्चात् 1916 में वे मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। बाद में उसी कॉलेज में वे प्राध्यापक भी रहे। डॉ॰ राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया। सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गयी।

दाम्पत्य जीवन संपादित करें
उस समय मद्रास के ब्राह्मण परिवारों में कम उम्र में ही शादी सम्पन्न हो जाती थी और राधाकृष्णन भी उसके अपवाद नहीं रहे। 1903 में 16 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह दूर के रिश्ते की बहन 'सिवाकामू' के साथ सम्पन्न हो गया। उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी। अतः तीन वर्ष बाद ही उनकी पत्नी ने उनके साथ रहना आरम्भ किया। यद्यपि उनकी पत्नी सिवाकामू ने परम्परागत रूप से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन उनका तेलुगु भाषा पर अच्छा अधिकार था। वह अंग्रेज़ी भाषा भी लिख-पढ़ सकती थीं। 1908 में राधाकृष्णन दम्पति को सन्तान के रूप में पुत्री की प्राप्ति हुई। 1908 में ही उन्होंने कला स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की और दर्शन शास्त्र में विशिष्ट योग्यता प्राप्त की। शादी के 6 वर्ष बाद ही 1909 में उन्होंने कला में स्नातकोत्तर परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। इनका विषय दर्शन शास्त्र ही रहा। उच्च अध्ययन के दौरान वह अपनी निजी आमदनी के लिये बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम भी करते रहे। 1908 में उन्होंने एम० ए० की उपाधि प्राप्त करने के लिये एक शोध लेख भी लिखा। इस समय उनकी आयु मात्र बीस वर्ष की थी। इससे शास्त्रों के प्रति उनकी ज्ञान-पिपासा बढ़ी। शीघ्र ही उन्होंने वेदों और उपनिषदों का भी गहन अध्ययन कर लिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी और संस्कृत भाषा का भी रुचिपूर्वक अध्ययन किया।

हिन्दू शास्त्रों का गहरा अध्ययन संपादित करें
शिक्षा का प्रभाव जहाँ प्रत्येक व्यक्ति पर निश्चित रूप से पड़ता है, वहीं शैक्षिक संस्थान की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़ती है। क्रिश्चियन संस्थाओं द्वारा उस समय पश्चिमी जीवन मूल्यों को विद्यार्थियों के भीतर काफी गहराई तक स्थापित किया जाता था। यही कारण है कि क्रिश्चियन संस्थाओं में अध्ययन करते हुए राधाकृष्णन के जीवन में उच्च गुण समाहित हो गये। लेकिन उनमें एक अन्य परिवर्तन भी आया जो कि क्रिश्चियन संस्थाओं के कारण ही था। कुछ लोग हिन्दुत्ववादी विचारों को हेय दृष्टि से देखते थे और उनकी आलोचना करते थे। उनकी आलोचना को डॉ॰ राधाकृष्णन ने चुनौती की तरह लिया और हिन्दू शास्त्रों का गहरा अध्ययन करना आरम्भ कर दिया। डॉ॰ राधाकृष्णन यह जानना चाहते थे कि वस्तुतः किस संस्कृति के विचारों में चेतनता है और किस संस्कृति के विचारों में जड़ता है? तब स्वाभाविक अंतर्प्रज्ञा द्वारा इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करना आरम्भ कर दिया कि भारत के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले ग़रीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते थे। इस कारण राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से यह जान लिया कि भारतीय आध्यात्म काफ़ी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व की आलोचनाएँ निराधार हैं। इससे इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो प्राणी को जीवन का सच्चा सन्देश देती है।

भारतीय संस्कृति संपादित करें
डॉ॰ राधाकृष्णन ने यह भली भाँति जान लिया था कि जीवन बहुत ही छोटा है परन्तु इसमें व्याप्त खुशियाँ अनिश्चित हैं। इस कारण व्यक्ति को सुख-दुख में समभाव से रहना चाहिये। वस्तुतः मृत्यु एक अटल सच्चाई है, जो अमीर ग़रीब सभी को अपना ग्रास बनाती है तथा किसी प्रकार का वर्ग भेद नहीं करती। सच्चा ज्ञान वही है जो आपके अन्दर के अज्ञान को समाप्त कर सकता है। सादगीपूर्ण सन्तोषवृत्ति का जीवन अमीरों के अहंकारी जीवन से बेहतर है, जिनमें असन्तोष का निवास है। एक शान्त मस्तिष्क बेहतर है, तालियों की उन गड़गड़ाहटों से; जो संसदों एवं दरबारों में सुनायी देती हैं। वस्तुत: इसी कारण डॉ॰ राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों को समझ पाने में सफल रहे, क्योंकि वे मिशनरियों द्वारा की गई आलोचनाओं के सत्य को स्वयं परखना चाहते थे। इसीलिए कहा गया है कि आलोचनाएँ परिशुद्धि का कार्य करती हैं। सभी माताएँ अपने बच्चों में उच्च संस्कार देखना चाहती हैं। इसी कारण वे बच्चों को ईश्वर पर विश्वास रखने, पाप से दूर रहने एवं मुसीबत में फँसे लोगों की मदद करने का पाठ पढ़ाती हैं। डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह भी जाना कि भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों का आदर करना सिखाया गया है और सभी धर्मों के लिये समता का भाव भी हिन्दू संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। इस प्रकार उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान को समझा और उसके काफ़ी नज़दीक हो गये।

जीवन दर्शन संपादित करें
डॉ॰ राधाकृष्णन समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- "मानव को एक होना चाहिए। मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो।" डॉ॰ राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से परिपूर्ण व्याख्याओं, आनन्ददायी अभिव्यक्तियों और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को मन्त्रमुग्ध कर देते थे। उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वह अपने छात्रों को भी देते थे। वह जिस भी विषय को पढ़ाते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गम्भीर विषय को भी वह अपनी शैली से सरल, रोचक और प्रिय बना देते थे।

अध्यवसायी जीवन संपादित करें
1909 में 21 वर्ष की उम्र में डॉ॰ राधाकृष्णन ने मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में कनिष्ठ व्याख्याता के तौर पर दर्शन शास्त्र पढ़ाना प्रारम्भ किया। यह उनका परम सौभाग्य था कि उनको अपनी प्रकृति के अनुकूल आजीविका प्राप्त हुई थी। यहाँ उन्होंने 7 वर्ष तक न केवल अध्यापन कार्य किया अपितु स्वयं भी भारतीय दर्शन और भारतीय धर्म का गहराई से अध्ययन किया। उन दिनों व्याख्याता के लिये यह आवश्यक था कि अध्यापन हेतु वह शिक्षण का प्रशिक्षण भी प्राप्त करे। इसी कारण 1910 में राधाकृष्णन ने शिक्षण का प्रशिक्षण मद्रास में लेना आरम्भ कर दिया। इस समय इनका वेतन मात्र 37 रुपये था। दर्शन शास्त्र विभाग के तत्कालीन प्रोफ़ेसर राधाकृष्णन के दर्शन शास्त्रीय ज्ञान से काफ़ी अभिभूत हुए। उन्होंने उन्हें दर्शन शास्त्र की कक्षाओं से अनुपस्थित रहने की अनुमति प्रदान कर दी। लेकिन इसके बदले में यह शर्त रखी कि वह उनके स्थान पर दर्शनशास्त्र की कक्षाओं में पढ़ा दें। तब राधाकृष्ण ने अपने कक्षा साथियों को तेरह ऐसे प्रभावशाली व्याख्यान दिये, जिनसे वे शिक्षार्थी भी चकित रह गये। इसका कारण यह था कि उनकी विषय पर गहरी पकड़ थी, दर्शन शास्त्र के सम्बन्ध में दृष्टिकोण स्पष्ट था और व्याख्यान देते समय उन्होंने उपयुक्त शब्दों का चयन भी किया था। 1912 में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की "मनोविज्ञान के आवश्यक तत्व" शीर्षक से एक लघु पुस्तिका भी प्रकाशित हुई जो कक्षा में दिये गये उनके व्याख्यानों का संग्रह था। इस पुस्तिका के द्वारा उनकी यह योग्यता प्रमाणित हुई कि "प्रत्येक पद की व्याख्या करने के लिये उनके पास शब्दों का अतुल भण्डार तो है ही, उनकी स्मरण शक्ति भी अत्यन्त विलक्षण है।"

मानद उपाधियाँ संपादित करें
जब डॉ॰ राधाकृष्णन यूरोप एवं अमेरिका प्रवास से पुनः भारत लौटे तो यहाँ के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियाँ प्रदान कर उनकी विद्वत्ता का सम्मान किया। 1928 की शीत ऋतु में इनकी प्रथम मुलाक़ात पण्डित जवाहर लाल नेहरू से उस समय हुई, जब वह कांग्रेस पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिये कलकत्ता आए हुए थे। यद्यपि सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय शैक्षिक सेवा के सदस्य होने के कारण किसी भी राजनीतिक संभाषण में हिस्सेदारी नहीं कर सकते थे, तथापि उन्होंने इस वर्जना की कोई परवाह नहीं की और भाषण दिया। 1929 में इन्हें व्याख्यान देने हेतु 'मानचेस्टर विश्वविद्यालय' द्वारा आमन्त्रित किया गया। इन्होंने मानचेस्टर एवं लन्दन में कई व्याख्यान दिये। इनकी शिक्षा सम्बन्धी उपलब्धियों के दायरे में निम्नवत संस्थानिक सेवा कार्यों को देखा जाता है-

सन् 1931 से 36 तक आन्ध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे।
ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में 1936 से 1952 तक प्राध्यापक रहे।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आने वाले जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में 1937 से 1941 तक कार्य किया।
सन् 1939 से 48 तक काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे।
1953 से 1962 तक दिल्ली विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे।
1946 में युनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
राजनीतिक जीवन संपादित करें

१९६३ में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी के साथ वार्ता करते हुए डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन
सर्वपल्ली राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि स्वतन्त्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इसी समय वे कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये। अखिल भारतीय कांग्रेसजन यह चाहते थे कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन गैर राजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी संविधान सभा के सदस्य बनाये जायें। जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि राधाकृष्णन के संभाषण एवं वक्तृत्व प्रतिभा का उपयोग 14 - 15 अगस्त 1947 की रात्रि को उस समय किया जाये जब संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र आयोजित हो। राधाकृष्णन को यह निर्देश दिया गया कि वे अपना सम्बोधन रात्रि के ठीक 12 बजे समाप्त करें। क्योंकि उसके पश्चात ही नेहरू जी के नेतृत्व में संवैधानिक संसद द्वारा शपथ ली जानी थी।
राजनयिक कार्य संपादित करें
सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ऐसा ही किया और ठीक रात्रि 12 बजे अपने सम्बोधन को विराम दिया। पण्डित नेहरू और राधाकृष्णन के अलावा किसी अन्य को इसकी जानकारी नहीं थी। आज़ादी के बाद उनसे आग्रह किया गया कि वह मातृभूमि की सेवा के लिये विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें। इस प्रकार विजयलक्ष्मी पंडित का इन्हें नया उत्तराधिकारी चुना गया। पण्डित नेहरू के इस चयन पर कई व्यक्तियों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि एक दर्शनशास्त्री को राजनयिक सेवाओं के लिए क्यों चुना गया? उन्हें यह सन्देह था कि डॉक्टर राधाकृष्णन की योग्यताएँ सौंपी गई ज़िम्मेदारी के अनुकूल नहीं हैं। लेकिन बाद में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह साबित कर दिया कि मॉस्को में नियुक्त भारतीय राजनयिकों में वे सबसे बेहतर थे। वे एक गैर परम्परावादी राजनयिक थे। जो मन्त्रणाएँ देर रात्रि होती थीं, वे उनमें रात्रि 10 बजे तक ही भाग लेते थे, क्योंकि उसके बाद उनके शयन का समय हो जाता था। जब राधाकृष्णन एक शिक्षक थे, तब भी वे नियमों के दायरों में नहीं बँधे थे। कक्षा में यह 20 मिनट देरी से आते थे और दस मिनट पूर्व ही चले जाते थे। इनका कहना था कि कक्षा में इन्हें जो व्याख्यान देना होता था, वह 20 मिनट के पर्याप्त समय में सम्पन्न हो जाता था। इसके उपरान्त भी यह विद्यार्थियों के प्रिय एवं आदरणीय शिक्षक बने रहे।

उपराष्ट्रपति संपादित करें
1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति निर्वाचित किये गये। संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का नया पद सृजित किया गया था। नेहरू जी ने इस पद हेतु राधाकृष्णन का चयन करके पुनः लोगों को चौंका दिया। उन्हें आश्चर्य था कि इस पद के लिए कांग्रेस पार्टी के किसी राजनीतिज्ञ का चुनाव क्यों नहीं किया गया। उपराष्ट्रपति के रूप में राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पदभार भी सम्भाला। सन 1952 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बनाये गये। बाद में पण्डित नेहरू का यह चयन भी सार्थक सिद्ध हुआ, क्योंकि उपराष्ट्रपति के रूप में एक गैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति ने सभी राजनीतिज्ञों को प्रभावित किया। संसद के सभी सदस्यों ने उन्हें उनके कार्य व्यवहार के लिये काफ़ी सराहा। इनकी सदाशयता, दृढ़ता और विनोदी स्वभाव को लोग आज भी याद करते हैं।

शिक्षक दिवस संपादित करें
हमारे देश के द्वितीय किंतु अद्वितीय राष्ट्रपति डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन (5 सितम्बर) को प्रतिवर्ष 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन समस्त देश में भारत सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है।

भारत रत्न संपादित करें
यद्यपि उन्हें 1931 में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा "सर" की उपाधि[1] प्रदान की गयी थी लेकिन स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात उसका औचित्य डॉ॰ राधाकृष्णन के लिये समाप्त हो चुका था। जब वे उपराष्ट्रपति बन गये तो स्वतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद जी ने 1954 में उन्हें उनकी महान दार्शनिक व शैक्षिक उपलब्धियों के लिये देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया।

सेवा धर्म ही असली भक्ति*

 *एक शहर में अमीर सेठ रहता था।  वह बहुत फैक्ट्रियों का मालिक था। एक शाम अचानक उसे बहुत बैचेनी होने लगी। डॉक्टर को बुलाया गया सारी जाँचें करव...