रविवार, 30 जनवरी 2022

हत्या होगी / राकेशरेणु

 #इसी_से_बचा_जीवन_7



 

पहले कहा, डेढ़ सौ साल जीना चाहता हूँ 

फिर कहा, एक सौ बीस साल 

फिर एक सौ दस और सौ साल पर आए 

आगे चलकर नब्बे साल जीने की इच्छा जताई 

वे अपनी उम्मीद की आयु कम करते गए धीरे-धीरे।

 

एक वक्त आया जब लोग जयंती मना रहे थे उनकी 

उन्होंने कहा 79 का हो गया, 

अब जीने की इच्छा बची नहीं मुझमें 

यह दूसरी अक्तूबर 1947 की सुबह थी।

 

गाँधी देख रहे थे 

लोग मुख्तलिफ थे, देश उनका न था

हालाँकि आज़ादी की भोर सुहावन थी अभी 

लोग वे नहीं थे लेकिन जिनके लिए वे जिए और लड़े।

 

हत्यारे घूम रहे थे चारों तरफ 

कहीं से हत्यारे नजर नहीं आते थे वे

सीधे-साधे सफेदपोश लोग 

खास तरह की मासूमियत दिखती उनके चेहरों पर 

साथ-साथ आगे-पीछे चलते लोग।

 

गाँधी देख रहे थे 

अहिंसा के भभूत के भीतर 

हिंसा की चिनगी सुलग रही थी।

 

देख लिया था उन्होंने 

अहिंसक कोई न था 

वह भी नहीं जिसका नाम लेकर वे जिए और मरे।


वे देख रहे थे 

साथ घूमता कोई हत्या करेगा उनकी 

और दूसरे अनेक     दूसरों की।


वे देख रहे थे भविष्य  

उनकी जयंती मनाई जा रही थी डेढ़ सौवीं 

वैसे ही सफेदपोश सीधे-सरल लगते लोग

घूम रहे थे हर तरफ 

वे कहीं से हत्यारे नहीं लगते थे न बलात्कारी 

पर सबके भीतर मौजूद था एक हत्यारा 

एक मर्द एक बलात्कारी मौजूद था।

 

बलात्कारियों की रक्षा करने वाले 

अनेक दूसरे बलात्कारी थे उनसे बड़े 

रक्षक तंत्र था बलात्कारियों-हत्यारों का 

स्त्रियाँ उन्हें प्रिय थीं गोश्त की तरह 

हत्या प्रिय था स्वाद की तरह।

 

गाँधी देख रहे थे  

अपनी हत्या के ठीक पहले

देख रहे थे 

उनकी हत्या होगी बार-बार।


@ राकेशरेणु

(‘दोआबा’ अक्तूबर-दिसम्बर 2021 अंक से साभार)

शनिवार, 29 जनवरी 2022

स्वर्ग का शिक्षक की दावेदारी

: तीन लोग स्वर्ग के दरवाज़े पर खड़े थे।

1,पुजारी,      2,डॉक्टर      3,टीचर,


भगवान : सिर्फ एक ही सीट खाली है स्वर्ग में ।

पहला: मैं पुजारी था। सारी उम्र आपकी सेवा की है ।

दिन रात आपकी पूजा की है।

दूसरा: मैं डॉक्टर था। सारी उम्र लोगों की सेवा की है । दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा।

तीसरा: मैं एक टीचर था और मैंने पढ़ाने के साथ साथ  

वज़ीफ़ा वितरण,

ड्रेस वितरण 

पुस्तक वितरण

बैग वितरण

अभिभावक संपर्क 

बाल गणना

जनगणना

साक्षरता

स्कूल की रंगाई पुताई

स्कूल चलो अभियान की रैलियां आयोजित करना

ग्राम शिक्षा समिति

पी टी ए 

एम् टी ए

smc

आदि की की बैठके आयोजित करना। 

MDM बनवाना और उसे वितरित करना

इसके लिए लकड़ी  गैस गल्ला और सब्ज़ी ढोना

चुनाव

सेमिनार

पोषाहार

बोर्ड परीक्षा ड्यूटी

यूनिवर्सिटी परीक्षा

 CBSE

 ICSE

PTI

SMC सचिव

SSC

HSC

पल्स पोलियो

पशु गणना

राशन कार्ड

वोटर कार्ड

बी.एल.ओ....

मैपिंग

रजिस्टर्ड

जाति प्रमाण पत्र

बच्चो के फोटो

खिंचकर धुलवाना

 आधार कार्ड बनवाना,

जन्म प्रमाण

साइकिल वितरण covid 19 duty

भगवान - बस--बस---बस कर पगले... अब क्या रुलायेगा ?

चल अंदर आ जा ।"

          यदि आप शिक्षक  हैं तो इस मैसेज को इतना फैलाओ कि हर उस आदमी को जवाब मिल जाए, जो शिक्षक को लापरवाह कहता है।

[ बिहार के सुशाशन राज : में अब एक नया काम टीचर को सौंपा जारहा शराब एवं शराबियो का पता करना.होगा 

अपना काम खुद करें💐

 *🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐💐*


दिल्ली से गोवा की उड़ान में एक सज्जन मिले, साथ में उनकी पत्नी भी थी, सज्जन की उम्र लगभग 80 की रही होगी,मैंने पूछा नहीं लेकिन उनकी पत्नी भी 75 के पार ही होंगी, पत्नी खिड़की की ओर बैठी थी, सज्जन बीच में और मैं सबसे किनारे वाली सीट पर था, प्लेन के उड़ान भरने के साथ ही पत्नी ने खाने का कुछ सामान निकाला और पति की ओर किया, पति कांपते हाथों से धीरे धीरे खाने लगे...


 फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व हुआ तो उन लोगों ने राजमा चावल का आर्डर किया, दोनों आराम से राजमा चावल खा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक में उन सज्जन ने कोई जूस लिया था... 


 खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल का ढक्कन खोलना शुरु किया तो ढक्कन उनसे खुला ही नहीं, सज्जन कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और मैं लगातार उन्हें देखे जा रहा था, मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें दिक्कत हो रही थी तो शिष्टाचार वश मैंने कहा :- लाइए, मैं खोल देता हूं !


 सज्जन ने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और बोले :- बेटा जी, ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा ! मैंने कुछ कहा नहीं लेकिन प्रश्नभरी निगाहों से उन्हें देखता रहा...


 ये सज्जन ने कहा :- बेटा जी, आज तो आप खोल देंगे लेकिन अगली बार कौन खोलेगा, इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए, पत्नी भी पति की ओर देख रही थी, जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था, लेकिन सज्जन उसे खोलने की कोशिश में लगे रहे और बहुत कोशिशों के बाद अंततः उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया, दोनों आराम से जूस पी रहे थे...


 मुझे दिल्ली से गोवा की इस उड़ान में जिंदगी का *एक सबक मिला,* सज्जन ने मुझे बताया :- हमने एक नियम बना रखा है अपना हर काम खुद ही करना है..., घर में बच्चे हैं, हंसता खेलता परिवार है, सब साथ ही रहते हैं लेकिन अपनी रोज की जरूरतों के लिए केवल पत्नी की ही मदद लेते हैं, बाकी किसी की नहीं, दोनों एक दूसरे की जरूरतों को समझते हैं...


 सज्जन ने मुझसे कहा :- *जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए,* एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो बेटा, समझो बिस्तर पर ही पड़ जाउंगा, फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं वो काम उससे, फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा, अभी चलने में पांव कांपते हैं,खाने में भी हाथ कांपते हैं लेकिन जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए... 


  हम गोवा जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे, हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं,बेटे बहू कहते हैं कि अकेले आपको दिक्कत होगी लेकिन उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना फिरना बंद करके खुद को घर में बंद कर लेंगे, सारी जिंदगी खूब काम किया, अब सब कुछ बेटों को देकर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं और हम दोनों उसी से आराम से घूमते हैं, जहां जाना होता है, एजेंट टिकट बुक करा देता है, टैक्सी घर पर आ जाती है,वापसी में एयरपोर्ट पर ही टैक्सी आ जाती है ! होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है, स्वास्थ्य व उम्र के अनुसार सब एकदम ठीक है, बस, कभी कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती लेकिन थोड़ा दम लगाओ तो वो भी खुल जाती है...


*मेरी तो आंखें ही खुली रह गई, मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा लेकिन यहां तो कुछ ही पलों में मैंने पूरे जीवन की ही फिल्म देख ली ! एक ऐसी फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था...*


*दोस्तो, जब तक हो सके "आत्मनिर्भर" रहो, जहां तक संभव हो, अपना काम स्वयं ही करें...*


🙏🙏


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*


🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

चालीस साल लम्बी दर्द की कविता खत्म -----/-----गुलजार

 


मीना जी ने अपनी डायरी गुलजार को सौपी | गुलजार ने उनकी मृत्यु पर कहा था की चालीस साल लम्बी दर्द की कविता खत्म हुई |


गुलजार ने मीना जी की भावनाओं की पूरी इज्जत की |

उन्होंने उनकी नज्म , गजल

, कला और शेर की एक किताब का कलेवर दिया | जिसमे एक जगह उन्होंने मीना जी पर लिखा है ----


शहतूत की डाल पे बैठी मीना ,


बुनती है रेशम के धागे


लम्हा -- लम्हा खोल रही है ,


पत्ता -- पत्ता बिन रही है ,


एक -- एक सांस बजाकर सुनती है


सौदायन,


अपने तन पर लिपटाती जाती है , अपने ही तागो की कैदी ,


रेशम की यह शायद एक दिन


अपने ही तागो में घुटकर मर जायेगी |


इसे सुनकर दरिया में उठते ज्वार की तरह मीना जी का दर्द छलक गया | उनकी

गहरी हंसी ने उनकी हकीकत बया कर दी ....................जानते हो न , वे

तागे क्या है ? उन्हें प्यार कहते है | मुझे तो प्यार से प्यार है | प्यार

के एहसास से प्यार है , प्यार के नाम से प्यार है |इतना प्यार कोई अपने तन

से लिपटाकर मर सके और क्या चाहिए ?


सावंन कुमार टाक ने मीना जी के बारे में लिखा मीना जी बहुत अच्छी इन्सान थी

...................आज सावन कुमार जो कुछ भी है मीना जी के वजह से है ---

मैं न केवल उनसे इंस्पायर्डहुआ हूँ बल्कि उन्होंने मुझे तीच भी किया है |

मार्गदर्शन दिया है |


सच बात तो यह है की मैंने किसी हद तक उनकी जिन्दगी का मतलब समझा है | वे

जितनी बड़ी अदाकारा थी कही उससे बड़ी भी बड़ी बहुत अच्छी इंसान थी | वे

कहती थी की मुझे थोड़ी ख़ुशी चाहिए बहुत ज्यादा नही | उनका प्यार हमेशा

निश्छल और पवित्र रहा | यदि उनकी सबसे अच्छी बात थी की वे बहुत संवेदनशील

थी तो सबसे बुरी बात यह थी की वे बहुत जल्दी किसी पर यकीं कर लेती थी और वह

उन्हें चोट करके चला जाता था | आज सिर्फ यही कह सकता हूँ मैं


''तेरी याद धडकती है मेरे सीने में |


जैसे कब्र के सिरहाने शमा जला करती है || ''


मीनाजी के एक नज्म ....................


चाँद तन्हा है , आसमा तन्हा ,


दिल मिला है ,कहा कहा तन्हा ,


बुझ गयी आस , छुप गयाh तारा ,


थरथराता रहा , धुँआ तन्हा ,


जिन्दगी क्या इसी को कहते है ,


जिस्म तन्हा है और जा तन्हा ,


हमसफर कोई गर मिले भी कही


दोनों चलते रहे यहा तन्हा


जलती बुझती सी रौशनी के परे


सिमटा -- सिमटा सा एक मका तन्हा


राह देखा करेगा सदियों तक


छोड़ जायेंगे यह जहा तन्हा ||


ये दर्द का समन्दर उनमे उठते ज्वार का एहसास दिलाते मीना की नज्मे अपने आप

में एक बेमिशाल धरोहर है

.................................................कबीर

ये ज़िन्दगी है प्यार / -किशोर कुमार कौशल

 ' ये ज़िन्दगी है प्यार /  -किशोर कुमार कौशल 

     

ये ज़िन्दगी है प्यार की 

तू हर बशर से प्यार कर


सवेरे तुझको राह में 

मिलेंगे अजनबी कई

तू मुस्कराता गाता चल 

कि ज़िन्दगी लगे नई

कहीं से कोई आएगा,

मिलेगा ख़ूब बाँह भर 

न ऐसी आस पाल तू,

न उसका इंतज़ार कर। 


तू हर बशर से प्यार कर 


चले थे शहंशाह कुछ 

भरे हुए गुमान में 

करेंगे राज ठाठ से 

डटे हुए जहान में 

मगर दिलों में प्यार के 

जला न पाए दीप कुछ

नहीं हुए सफल कभी

चले गए वे हार कर


तू हर बशर से प्यार कर 


ये ज़िन्दगी है कितने दिन 

किसी को भी नहीं पता 

तो किसलिए घमंड में 

तू घूमता है,यह बता

न कोई पास आएगा

जो साँस जाएगी निकल

बनेगा राख ये बदन 

रखा जिसे सँभालकर


तू हर बशर से प्यार कर


झगड़ रहे जो रात-दिन 

ज़मीन धन के वास्ते 

किये हैं बन्द धर्म के 

जिन्होंने नेक रास्ते 

उन्हें मिलेगा स्वर्ग क्या

जो बाँटते रहे सदा

जिन्हें बशर से प्यार की

समझ न आई उम्र भर 


तू हर बशर से प्यार कर 


यही कहा है वेद ने 

यही लिखा कुरान में 

नहीं है कोई  देवता 

कमी है हर इंसान में 

बनाया जिसने आदमी

बसाया जिसने ये जहाँ

उसी का मंत्र है यही

लुटा दे प्यार हर डगर


तू हर बशर से प्यार कर। 

 *  *  *  *  *  *  *  *  *

--- किशोर कुमार कौशल 

     28 जनवरी,2022

रवि अरोड़ा की नजर से...

  अंटी में क्या है / रवि अरोड़ा



चुनाव की बेला है । प्रत्याशी धड़ाधड़ नामांकन दाखिल कर रहे हैं । कई चरणों में चुनाव होने हैं सो यह क्रम अभी लंबा चलेगा । परंपरा ही कुछ ऐसी है नामांकन दाखिल होते ही अखबार प्रत्याशी की घोषित जन्मकुंडली छापते हैं । किसके पास कितनी चल अचल संपत्ति , कितने मुकदमे, शिक्षा और कौन कौन सी गाड़ी है वगैरह वगैरह । इस वैगरह वगैरह के क्रम में यह भी लिखा होता है कि प्रत्याशी के पास कौन कौन से हथियार हैं । पता नहीं क्या गंदी आदत है कि मेरा ध्यान हथियार वाली बात पर सबसे पहले जाता है ।

दरअसल मुझे लगता है कि बाकी तमाम घोषणाओं में तो हेर फेर होगा मगर यह इकलौती ऐसी बात है जिसमे कोई लाग लपेट नहीं हो सकती । जैसे बेनामी संपत्ति का लेखा जोखा कोई ढूंढ नहीं सकता । माल मत्ता कितना दिखाना है यह प्रत्याशी से अधिक उसके चार्टेड एकाउंटेंट की काबिलियत पर निर्भर करता है । शिक्षा वाले कॉलम में तो राष्ट्रीय स्तर के नेता भी झोल कर लेते हैं । मुकदमों की संख्या भी फाइनल रिपोर्ट लगवा कर कम की जा सकती है । ले देकर हथियार ही ऐसा कॉलम है जिसमें चाह कर भी कोई प्रत्याशी झूठी घोषणा नहीं कर सकता । हां हथियार अवैध हो तो बात अलग है । 


मेरे शहर समेत पहले राउंड की तमाम विधान सभा सीटों पर नामांकन हो चुका है । अपनी बुरी आदत के अनुरूप इसबार भी मेरा ध्यान केवल इसी बात पर है कि किस प्रत्याशी के पास कौन सा हथियार है ? वैसे थोड़ी हैरानी भी होती है कि राजनीति तो सेवा कार्य है फिर इसमें ऐसा कौन सा जान का खतरा है कि हमारे नेताओं को हथियार रखना पड़ जाता है ? यूं भी तो गांधी जयंती और दूसरे तमाम राष्ट्रीय उत्सवों में ये नेता हमें अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहते हैं , फिर हिंसा के इस औजार की उन्हें क्या जरूरत है ? अब तक मैं सैकड़ों प्रत्याशियों का चुनाव अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत बायोडाटा खंगाल चुका हूं , अधिकांश के पास पिस्टल, रिवाल्वर, दोनाली अथवा राइफल मौजूद है । अच्छी खासी भली सूरत वाले प्रत्याशियों के पास भी गन है । उनके पास भी है जिनके पास कोई माल असबाब भी नहीं है । पता नहीं क्या लुटने का खतरा उन्हें है ? और तो और महिला प्रत्याशियों के पास भी हथियार है । मुख्यमंत्री , पूर्व मुख्यमंत्री  स्तर के ऐसा नेता भी हथियार लिए बैठे हैं जिनकी सुरक्षा में पूरा अमला दिन भर लगा रहता है । अहिंसा का राग अलापने वाले देश का यह हाल है । कमाल है , कैसे लोग आ गए हैं राजनीति में ? 


बेशक प्रदेश में मात्र प्वाइंट 63 फीसदी लोगो को हथियार का लाइसेंस मिला हुआ है । मगर यहां के बाशिंदों के सिर हथियार का भूत ही सवार है । हर जिले में असला बाबू की औकात कलक्टर जैसी है । जिनके पास लाइसेंस है अथवा जिन्होंने इसके लिए आवेदन किया हुआ है, उन्हें पता है कि सामान्य आदमी की जूतियां घिस जाती हैं एक अदद लाइसेंस बनवाने में । सारे नियम कानूनों का पालन करने के बावजूद यह जिलाधिकारी के मूड पर निर्भर करता है कि आपको लाइसेंस मिलेगा अथवा नहीं । अधिकांश नेता भी बताते हैं कि उनके पास आने वाली आधी सिफारिशें हथियार के लाइसेंस की ही होती हैं । पूरे प्रदेश में हथियार का ऐसा क्रेज है कि देश भर में सर्वाधिक हथियार इसी सूबे में हैं । कई जिले तो ऐसे हैं कि बंदे के पांव में जूता हो अथवा नहीं , मगर कंधे पर बंदूक जरूर होगी । अब ऐसी आबोहवा हो तो नेता जी पहले अपना लाइसेंस ही तो बनवाएंगे ।  गण तंत्र दिवस आ रहा है । इस बार भी हम शहर शहर गली गली शांति, अहिंसा , प्रेम और सद्भावना पर छोटे बड़े नेताओं के भाषण सुनेंगे । यदि मन करे तो आप भी इसबार मेरी तरह नेता जी की अंटी पर ध्यान देना और पता करने की कोशिश करना कि उनकी पेंट में रिवाल्वर है या पिस्टल ?


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रवि अरोड़ा की नजर से....

नृप के चुनाव की नई शैली /  रवि अरोड़ा


जमाने से पढ़ते आ रहे हैं "कोउ नृप होइ हमैं का हानी " । चुनाव की वेला में खुद को निर्विकार साबित करने के लिए बड़े बड़े काबिल इसे ब्रह्म वाक्य की तरह स्तेमाल करते हैं । राजनीतिक पक्षधरता के आरोप से बचने को मैं भी अक्सर इस चौपाई को दोहराया करता था । मगर एक बार किसी सयाने से टोक दिया । उसने पूछा कि क्या आपको मालूम है कि राम चरित्र मानस में गोस्वामी तुलसी दास किस के मुख से यह कहलवाते हैं ? मेरे इनकार करने पर उन्होंने बताया कि कैकई की मति भ्रष्ट करने के लिए उसकी दासी मंथरा ने ही कहा था - "कोउ नृप होइ हमैं का हानी ;चेरि छाड़ि अब होब की रानी"। यानी सत्ता का पूरा तख्तापलट करवाने  लिए एक षड्यंत्रकारी दासी ही कहती है कि राजा कोई भी हो हमें कोई लेना-देना नहीं, मैं तो दासी की दासी ही रहूंगी , रानी आप सोचो आप का क्या होगा ? हालांकि दासी मंथरा भी भली भांति जानती थी कि उसकी मालकिन कैकई का पुत्र भरत राजा बना तो उसमें वह अधिक लाभान्वित होगी न कि कौशल्या पुत्र राम के राजा बनने पर ।  इस चौपाई का अर्थ और मंतव्य जानने के बाद कसम से  - "कोउ नृप होइ हमैं का हानी' का भाव ही न जाने कहां गुम हो गया । उसके स्थान पर यह भाव जन्मा कि राजा कौन बनेगा जब इससे सरासर फर्क पड़ता है तो मंथरा सा अभिनय क्यों , खुल कर अपनी पसंद नापसंद जाहिर क्यों न की जाए ? 


लीजिए मैं अभी राजनीतिक पसंद नापसंद को खुल कर व्यक्त करने की बात ही कर रहा हूं और उधर ऐसी खबरें मिलनी भी शुरू हो गई हैं । पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक दर्जन से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में जनता ने अपने प्रत्याशियों को दौड़ा लिया है । बंगाल के खेला हौबे की तर्ज पर यहां खदेड़ा हौबे हो रहा है । कहना न होगा कि जिन्हें खदेड़ा जा रहा है उनमें से अधिकांश भाजपा विधायक हैं और जहां जहां से उन्हें खदेड़ा गया वे किसान अथवा जाट बहुल क्षेत्र हैं ।  हालांकि अलीगढ़ जैसे शहर में विरोध तो सपा प्रत्याशी का भी हुआ मगर लोगों का गुस्सा अधिकांशत भाजपा प्रत्याशियों पर ही निकल रहा है । महंगाई, बेरोजगारी, कोरोना की दूसरी लहर के दौरान नाइंतजामी से तो लोगों में आक्रोश है ही साथ ही किसान आंदोलन के दौरान किए गए अपमान से भी लोगबाग कुपित हैं । विधायक ही नही उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी इस विरोध प्रदर्शनों का शिकार हो गईं । अभी तो पहले चरण का भी मतदान नहीं हुआ और अभी से पब्लिक "कोउ नृप होइ हमैं का हानी " को नकार रही है , आगे पता नहीं क्या क्या होगा ? 


पिछले पैंतीस सालों से चुनावों को नजदीक से देखता आ रहा हूं । प्रत्याशियों के प्रति लोगों में गुस्सा सामान्य सी बात है । जीते हुए पुराने प्रत्याशियों के अपेक्षाओं पर खरा न उतरने पर लोग कुपित होते ही हैं मगर इस बार का विरोध कुछ अलग सा ही है । यह विरोध इक्का दुक्का विधानसभा क्षेत्रों तक भी सीमित नहीं दिख रहा । इस बार का गुस्सा एक किस्म की सामूहिकता लिए हुए है और खास बात यह है कि कोई खास राजनीतिक दल भी इसके पीछे नहीं लगता । पता नहीं आपका क्या विश्लेषण है मगर मुझे तो लगता है कि जनता अब खुद को बेवकूफ समझे जाने से ज्यादा नाराज है । हर बार जाति और धर्म के सांचे में डालकर उसका वोट झटक लिया जाता है और बाद में उसे झुनझुना सा थमा देते हैं । अवश्य ही उसे बुरा लगता होगा कि उसके जीने मरने के मामलों पर कोई बात ही नहीं करता । बेशक उसे अपनी जाति का आदमी अच्छा लगता है । यकीनन अपने धर्म का आदमी भी उसकी पहली पसंद होता है मगर उसे उसकी आखिरी पसंद भी राजनीतिक दल मान लेते हैं , यह उसे अब बर्दाश्त नहीं होता । नृप के चुनाव को शायद यही अब उसकी शैली हो ।



उद्भ्रांत एक जुझारु व्‍यक्तित्‍व / रामधनी द्विवेदी


आज कानपुर छोडने के बाद उद्भ्रांत जी से मेरी तीस साल बाद मुलाकात हुई थी। वह भी अचानक। मैं बरेली जागरण से नोएडा आ गया था। थोड़े ही दिन हुए थे कि एक दिन लखनऊ से जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक सुभाष राय  का फोन आया कि लीजिए अपने एक पुराने मित्र से बात कीजिए। आवाज से पहचानिए कि ये कौन हैं,नाम नहीं बताउंगा। मैंने फोन ले लिया और उधर से फोन करने वाले ने कहा- पंडित जी पहचाना। फिर मेरी झिझक समझते हुए कहा कि मैं उद्भ्रांत बोल रहा हूं। उद्भ्रांत जी से आज तक  बरेली छोड़ने के बाद संपर्क नहीं था। मैं इलाहाबाद, लखनऊ और बरेली होते हुए दिल्‍ली आ गया था और जागरण नोएडा में कार्यरत था और वे कई जगह अनेक तरह की नौकरियां करने के साथ ही अपने रचनाकर्म में लगे हुए दूरदर्शन के महानिदेशक  पद से रिटायर होने के बाद नोएडा सेक्‍टर 51के केंद्रीय विहार सोसायटी में रह रहे थे।


 उनसे बात कर बहुत ही अच्‍छा लगा और पुरानी स्‍मृतियां सजीव हो गईं। वह बोले कि नोएडा लौटने के बाद आपसे मिलता हूं। उस दिन जनसंदेश टाइम्‍स में मुद्रा राक्षस जी की अध्‍यक्षता में उद्भ्रांत जी का एकल काव्‍य पाठ हुआ। शहर के प्रमुख साहित्‍यकार उपस्थित थे और दूसरे दिन के अखबार में इस काव्‍यपाठ की खबर छाई हुई थी। इस फोन वार्ता के थोड़े दिन बाद ही वह जागरण के नोएडा कार्यालय में थे। काफी देर बातचीत हुई। पुराने मित्रों के हाल चाल पूछे गए। और इस तरह लगभग 30 साल पहले टूटा संपर्क पुन: कायम हुआ। तब से आज तक उनसे बराबर संपर्क बना रहता है। फोन पर लंबी बातचीत होती रहती है,सामान्‍य हाल चाल के साथ ही उनकी नई रचनाओं पर भी बातचीत होती है। लगभग चार साल पहले 2017 में उन्‍होंने अपनी छोटी बेटी की शादी नोएडा सेक्‍टर 37 के सनातनधर्म मंदिर से की थी। मुझे निमंत्रित किया लेकिन उसी दिन किसी अन्‍य कार्य से बनारस जाना था। मैं उस शादी में सम्मिलित हुआ। उस शादी में दोनों परिवारों के अलावा मैं ही बाहरी व्‍यक्ति था। शाम को प्रीति भोज में शामिल नहीं हो पाया क्‍यों कि मुझे रात में ट्रेन पकड़नी थी। 

उद्भ्रांत बिलकुल नहीं बदले हैं। जैसा 1975-77 में आज कानपुर में काम करते समय थे,वैसे ही आज हैं। वह बोली, वही तेवर, वही या यूं कहे पहले से अधिक सक्रियता। उनका रूप रंग भी वही है। मुझे लगता है उनके शरीर का वजन भी 45 साल पहले वाला ही है,बस बाल कुछ कम हो गए हैं, और चेहरे पर वार्धक्‍य दिखता है। बातचीत में वही बेबाकपन है। जो मन करता  है,बोल देते हैं, न कोई लाग-लपेट और न कोई दुराव- लगाव। यदि कोई बात नहीं पसंद है तो उसपर तत्‍काल अपनी प्रतिक्रिया भी व्‍यक्‍त कर देने का उनका स्‍वभाव आज भी नहीं बदला है। अभी कल ही बात करते समय मैने सुझाव दिया कि आप बहुत परिपक्‍व रचनाकार हैं। आपकी रचनाओं की काफी ग्राह्यता है और लोग उसके अनन्‍य प्रशंसक हैं।यदि कोई आपके बारे में अनुचित कहता है तो भी उसे क्षमा कर दिया करें। इससे आप और बड़े होंगे। उनका कहना था कि आपकी बात सही है लेकिन मेरा स्‍वभाव ही ऐसा है कि गलत बात बर्दाश्‍त नहीं होती और मेरी प्रतिक्रिया आ ही जाती है। 

मैं जब आज कानपुर में जनरल डेस्‍क का इंचार्ज था तो उद्भ्रांत मेरी ही शिफ्ट में थे। क्‍या कहने उनकी अदा के। बड़े बड़े बाल देवानंद स्‍टाइल में काढ़े रहते और बात करते करते उन्‍हें या तो पीछे झटकते रहते या उनमें उंगलियां फेरते रहते। मेरी शिफ्ट के जो तेज तर्रार लोग थे, उनमें एक उद्भ्रांत भी थे। आज मे पहले वह रिपोर्टर के रूप में भर्ती हुए थे। उन्‍हें श्रमिक संगठन और श्रमिक गतिविधियों की बीट मिली थी। चूंकि कानपुर उद्योग बहुल शहर था,इसलिए उन दिनों वहां श्रमिक गतिविधियां अधिक हेाती थीं। आज ने श्रमिकों के रूप में अपना नया पाठक वर्ग तलाशा और उसकी बीट अलग कर एक फुलटाइम रिपोर्टर तैनात कर दिया। उद्भ्रांत अपनी बीट में जी जान से जुटे रहते। आज श्रमिकों और उद्योग जगत में अपनी पहचान बनाने लगा। उनका इनसे मिलिए कॉलम बहुत पसंद किया जाने लगा। उन्‍होंने कई अच्‍छे इंटरव्‍यू भी किए। फिर उनकी जब शादी हो गई तो उन्‍हें मेरे साथ जनरल डेस्‍क पर कर दिया गया। जनरल डेस्‍क पर अंग्रेजी के तारों का अनुवाद ही मुख्‍य काम होता और  उसमें वह दक्ष थे। उनकी चारुचंद्र त्रिपाठी से खूब पटती लेकिन ज्ञानेंद्र जी को वह चिकोटी काटने से बाज नहीं आते। जब मैं आज से इलाहाबाद अमृत प्रभात में चला गया तो एक साल बाद ही वह भी आज छोड़ गए। 

पिछले दिनों मैने उनकी जीवनी के पहले खंड को पढ़ा। उससे उनके बारे में बहुत सी बातें पता चलीं और उनमें सबसे महत्‍वपूर्ण बात थी कि वह बचपन से ही अपने मन की करते और आज भी उनका यह स्‍वभाव बना हुआ। समझौता उनके शब्‍दकोश में नहीं दिखता। जीवनी का प्रथम भाग पत्रकारिता में आने तक हैं लेकिन उसे पढ़ने से पता चलता है कि युवा उद्भ्रांत में कितने बड़े वट वृक्ष की बीज दबा हुआ था। यह आत्‍म कथा भी बहुत बेबाक पन से लिखी गई है। न कुछ छिपाया है न अतिशयोक्ति है। इसे पढ़ने में उपन्‍यास जैसा आनंद आता है। मैने इसकी समीक्षा भी लिखी जो दैनिक जागरण में छपी। अभी दूसiरा खंड पूरा हुआ है और शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। 

उद्भ्रांत की रचनाधर्मिता अब भी किसी युवा को चुनौती देती है। हर साल  दो तीन किताबें पाठकों को दे ही देते हैं। ईश्‍वर उन्‍हें स्‍वस्‍थ रखे और निरंतर सक्रिय भी। अभी उनसे बहुत उम्‍मीदें हैं। 

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रामधनी द्विवेदी 

9560798111 

ऑलिव 504 

गुलमोहर रेजिडेंसी अहिंसा खंड दो 

इंदिरापुरम, गाजियाबाद उप्र

उद्भ्रांत: वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी का संस्मरण)

गुरुवार, 27 जनवरी 2022

अर्चना श्रीवास्तव 'आहना', मलेशिया

 #तेरा साथ#

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हर्षित है,पुलकित,मनोहारी ,विभोर सृष्टि

ऐसा प्रणय-भाव दृष्टिगोचर, ना और कही 

यह खगवृंद क्या उर मे शोर  नही मचाते 

सगंराही के प्रति अगाध लग्न की प्रतिध्वनि?

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हर पल की चाह हो,साथ की हसरत मेरी

बेपनाह ख्वाहिशों से भरा मेरा साथ, जीवनीसंग

तेरे गम को पहचाना, खुशी को भी आजमाया

अपने रंजो-गम भूल बस तुझे दिल से अपनाया

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मेरे मौन की धडकन, हर आहट तेरी राह निहारे

निहाल रही तेरे साथ के एहसासों मे,पलके बिछाये

एक सुकून जो बेकरारी रही, ताउम्र लडती रही

वक्त के आर-पार ना जा सके, तो ठहरने को तरसती

दो लम्हा ,जहां हम खुद से मिले बेबाक,बेखटक

तेरे ही साथ का असर ,अधरों पर मुस्कान ठहरे

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खुशी अतिरेक हो दर्द की घुटन का दंश

कोई रोकता है ,टोकता है हरकही संग-अंग

बेख्याली हो या कठिन चुनौती का खिंचाव-तनाव

मौजूद हर मौसम में , न्योछावर सर्वस्व मन-प्राण 

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ना जीने-मरने की कसमे ,ना वादों के पुलिंदे के कागजी ख्याल

 ना तौल-नाप ,नाअहम-बिरादरी ,पंथ-रिवाज का सवाल

 दिये सा रौशन ,आ़खो का तारा ,हे प्रिय मुझे तुझपर नाज


जिस्म से जान तक ,चाहत-लग्न सर का मान ताज 


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सतत् प्रेम-अर्पण सिर्फ अन्य जीवो के, आपसी नाते की स्वीकृति

विलुप्त-दुर्लभ एकनिष्ठ भरोसा-नेह छांव से  मानव की सर्वथा असहमति


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@अर्चना श्रीवास्तव 'आहना', मलेशिया

बुधवार, 26 जनवरी 2022

भारतीय पिता पुत्र की जोड़ी अजीब

 भारतीय पिता पुत्र की जोड़ी भी बड़ी कमाल की जोड़ी होती है ♦️घर में दोनों अंजान से होते हैं,

एक दूसरे के बहुत कम बात करते हैं, कोशिश भर एक दूसरे से पर्याप्त दूरी ही बनाए रखते हैं। बस ऐसा समझो कि दुश्मनी ही नहीं होती।

♦️माहौल कभी भी छोटी छोटी सी बात पर भी खराब होने का डर सा बना रहता है और इन दोनों की नजदीकियों पर मां की पैनी नज़र हमेशा बनी रहती है।


♦️ऐसा होता है जब लड़का,

अपनी जवानी पार कर, 

अगले पड़ाव पर चढ़ता है, 

तो यहाँ, 

इशारों से बाते होने लगती हैं, 

या फिर, 

इनके बीच मध्यस्थ का दायित्व निभाती है माँ ।


♦️पिता अक्सर पुत्र की माँ से कहता है, 

जा, "उससे कह देना"

और, 

पुत्र अक्सर अपनी माँ से कहता है, 

"पापा से पूछ लो ना"

इन्हीं दोनों धुरियों के बीच, 

घूमती रहती है माँ । 


♦️जब एक, 

कहीं होता है, 

तो दूसरा, 

वहां नहीं होने की, 

कोशिश करता है,


शायद, 

पिता-पुत्र नज़दीकी से डरते हैं।

जबकि, 

वो डर नज़दीकी का नहीं है, 

डर है, 

माहौल बिगड़ने का । 


♦️भारतीय पिता ने शायद ही किसी बेटे को, 

कभी कहा हो, 

कि बेटा, 

मैं तुमसे बेइंतहा प्यार करता हूँ...

जबकि वह प्यार बेइंतहा ही करता है।


पिता के अनंत रौद्र का उत्तराधिकारी भी वही होता है,

क्योंकि, 

पिता, हर पल ज़िन्दगी में, 

अपने बेटे को, 

अभिमन्यु सा पाता है ।


♦️पिता समझता है,

कि इसे सम्भलना होगा, 

*इसे मजबूत बनना होगा,* 

ताकि, 

ज़िम्मेदारियो का बोझ, 

इसको दबा न सके । 


♦️पिता सोचता है,

जब मैं चला जाऊँगा, 

इसकी माँ भी चली जाएगी, 

बेटियाँ अपने घर चली जायेंगी,

तब, 

रह जाएगा सिर्फ ये, 

जिसे, हर-दम, हर-कदम, 

परिवार के लिए, अपने छोटे भाई के लिए,

आजीविका के लिए,

बहु के लिए,

अपने बच्चों के लिए, 

*चुनौतियों से, सामाजिक जटिलताओं से, लड़ना होगा ।*


♦️पिता जानता है कि, 

हर बात, 

घर पर नहीं बताई जा सकती,

इसलिए इसे, 

खामोशी से ग़म छुपाने सीखने होंगें ।


♦️परिवार और बच्चों के विरुद्ध खड़ी...हर विशालकाय मुसीबत को, 

अपने हौसले से...दूर करना होगा।


♦️कभी कभी तो ख़ुद की जरूरतों और ख्वाइशों का वध करना होगा । 

इसलिए, 

वो कभी पुत्र-प्रेम प्रदर्शित नहीं करता।


♦️पिता जानता है कि, 

प्रेम कमज़ोर बनाता है ।

फिर कई बार उसका प्रेम, 

झल्लाहट या गुस्सा बनकर, 

निकलता है, 


♦️वो गुस्सा अपने बेटे की

कमियों के लिए नहीं होता,

वो झल्लाहट है, 

जल्द निकलते समय के लिए, 

वो जानता है, 

उसकी मौजूदगी की, 

अनिश्चितताओं को । 


♦️पिता चाहता है, 

कहीं ऐसा ना हो कि, 

इस अभिमन्यु की हार, 

*मेरे द्वारा दी गई,*

*कम शिक्षा के कारण हो जाये...*


♦️पिता चाहता है कि, 

पुत्र जल्द से जल्द सीख ले, 

वो गलतियाँ करना बंद करे,

हालांकि गलतियां होना एक मानवीय गुण है,

लेकिन वह चाहता है कि *उसका बेटा सिर्फ गलतियों से सबक लेना सीख ले।*

सामाजिक जीवन में बहुत उतार चढ़ाव आते हैं, रिश्ते निभाना भी सीखे,


♦️फिर, 

वो समय आता है जबकि, 

पिता और बेटे दोनों को, 

अपनी बढ़ती उम्र का, 

एहसास होने लगता है, 

बेटा अब केवल बेटा नहीं, पिता भी बन चुका होता है, 

कड़ी कमज़ोर होने लगती है।


♦️पिता की सीख देने की लालसा, 

और, 

बेटे का, 

उस भावना को नहीं समझ पाना, 

वो सौम्यता भी खो देता है, 

यही वो समय होता है जब, 

*बेटे को लगता है कि,*

*उसका पिता ग़लत है,* 

बस इसी समय को समझदारी से निकालना होता है, 

वरना होता कुछ नहीं है,

बस बढ़ती झुर्रियां और बूढ़ा होता शरीर जल्द बीमारियों को घेर लेता है । 

फिर, 

*सभी को बेटे का इंतज़ार करते हुए माँ तो दिखती है,* 

पर, 

*पीछे रात भर से जागा,*

*पिता नहीं दिखता,* 

जिसकी उम्र और झुर्रियां, 

और बढ़ती जाती है, बीमारियां भी शरीर को घेर रहीं हैं।


*पिता अड़ियल रवैए का हो सकता है लेकिन वास्तव में वह नारियल की तरह होता है।*


कब समझेंगे बेटे, 

कब समझेंगे बाप, 

     कब समझेगी दुनिया ????


पता है क्या होता है, 

उस आख़िरी मुलाकात में, 

जब, 

जिन हाथों की उंगलियां पकड़, 

पिता ने चलना सिखाया था, 

वही हाथ, 

लकड़ी के ढेर पर पड़े

पिता को 

लकड़ियों से ढकते हैं,

उसे घी से भिगोते हैं, 

और उसे जलाते हैं, *इसे ही पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाना कहते हैं।*


ये होता है,

हो रहा है, 

होता चला जाएगा ।


जो नहीं हो रहा,

और जो हो सकता है,

वो ये, 

कि, 

*हम जल्द से जल्द,*

*कहना शुरु कर दें,*

*हम आपस में,* 

*कितना प्यार करते हैं?*

और कुछ नहीं तो कम से कम घर में हंस के मुस्कुरा कर बात तो की ही जा सकती है,सम्मान पूर्वक।

*समस्त पिता एवं पुत्रो को समर्पित🙏❤️

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

अच्छा लगता है" / अनंग

"

रोते  हुए  बच्चे  को  हंसाना , अच्छा  लगता है। 

भूखों को  भरपेट खिलाना , अच्छा  लगता  है।।

दोस्त  हमारी   ताकत  हैं , मिलते  ही  रहते  हैं।

दुश्मन  को  भी  गले लगाना , अच्छा लगता है.।। 

मुझे  बुजुर्गों  के  जीवन से,सीख बहुत मिलती।

अंधे को घर तक  पहुंचाना , अच्छा  लगता  है।।

कब  कैसे  कोई  चुपके  से , मन  में बस जाता। 

फिर भी उनका आंख चुराना, अच्छा लगता  है।। 

दरबारों   में  डरकर  रहना , कायर का है काम।

खुलकर  सच्ची बात सुनाना , अच्छा लगता है।।

बड़ी मोहब्बत होती  है , मेहनतकश  लोगों  में।

ऐसे   लोगों  के  घर   जाना , अच्छा  लगता है।। 

झालर  - बत्ती  बाजारों  के , मुझे   नहीं   भाते।

दिवाली   में  दीप   जलाना , अच्छा  लगता  है।।

राजनीति   की  बातें   अब  , बेमानी  लगती  हैं।

बच्चों के संग दिल बहलाना,  अच्छा  लगता है।। 

जितना मन हो  उड़ते  जाओ , पर  वापस आना। 

घर-मंदिर खुशियों का खजाना,अच्छा लगता है।।......"अनंग "

सोमवार, 24 जनवरी 2022

आपकी जुबानी कायस्थ परिवार की कहानी

 सक्सेना के घर की रोटी,

श्रीवास्तव के घर की दाल।

छप्पन भोग में भी नही ऐसा कमाल।

अस्थाना के घर का अचार,

बदल देता है  सबका विचार।

सिन्हा  के घर  का पानी,

शुद्ध करे मीठी वाणी।

माथुर के घर के फल और फूल,

उतार देती है जन्मों -जन्मों की धूल।

भटनागर की छाया, बदल देती है  माया काया।

कुलश्रेष्ठ के घर का रायता, मिलती है चारों ओर से सहायता।

निगम के घर के आम, नई सुबह नई शाम। 

खरे के घर का हलवा, दिखाता है

हर मौके  पर जलवा।

वर्मा की सेवा, मिलता है मिश्री और मेवा। 


🌷 आप का कायस्थ  परिवार

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👌🏽✌🏾️👍🏼

रविवार, 23 जनवरी 2022

शिव का अपूर्व सौंदर्य

 *एक बार गणेशजी ने भगवान शिवजी से कहा कि पिताजी ! आप यह चिताभस्म ,लगाकर, मुण्डमाला धारणकर अच्छे नहीं लगते, मेरी माता गौरी अपूर्व सुंदरी और आप उनके साथ इस भयंकर रूप में,,*

*पिताजी ! आप एक बार कृपा करके अपने सुंदर रूप में माता के सम्मुख आएं, जिससे हम आपका असली स्वरूप देख सकें !*

   *भगवान शिवजी मुस्कुराये और गणेशजी की बात मान ली,,*

*कुछ समय बाद जब शिवजी स्नान करके लौटे तो उनके शरीर पर भस्म नहीं थी , बिखरी जटाएं सँवरी हुई, मुण्डमाला उतरी हुई थी !*

   *सभी देवता, यक्ष, गंधर्व, शिवगण उन्हें अपलक देखते रह गये,*

*वो ऐसा रूप था कि मोहिनी अवतार रूप भी फीका पड़ जाये !*

*भगवान शिव ने अपना यह रूप कभी भी प्रकट नहीं किया था !*

    *शिवजी का ऐसा अतुलनीय रूप कि करोड़ों कामदेव को भी मलिन कर रहा था !*

     *गणेशजी अपने पिता की इस मनमोहक छवि को देखकर स्तब्ध रह गए और मस्तक झुकाकर बोले -*

*मुझे क्षमा करें पिताजी !    परन्तु अब आप अपने पूर्व स्वरूप को धारण कर लीजिए।।*

*भगवान शिव मुस्कुराये और पूछा- क्यों पुत्र अभी तो तुमने ही मुझे इस रूप में देखने की इच्छा प्रकट की थी,*

*अब पुनः पूर्व स्वरूप में आने की बात क्यों ?*

    *गणेशजी ने मस्तक झुकाये हुए ही कहा -*

*क्षमा करें पिताश्री !* 

*मेरी माता से सुंदर कोई और दिखे मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता !*

   *और शिवजी हँसे और अपने पुराने स्वरूप में लौट आये !*

*पौराणिक ऋषि इस प्रसंग का सार स्पष्ट करते हुए कहते हैं....*

*आज भी ऐसा ही होता है पिता रुद्र रूप में रहता है क्योंकि उसके ऊपर परिवार की जिम्मेदारियों अपने परिवार का रक्षण ,उनके मान सम्मान का ख्याल रखना होता है तो थोड़ा कठोर रहता है...*

   *और *माँ सौम्य,प्यार लाड़,स्नेह उनसे बातचीत करके प्यार देकर उस कठोरता का संतुलन बनाती है ।। इसलिए सुंदर होता है माँ का स्वरूप।।*


 *प्रेम से बोलिए - हर हर महादेव*


*पिता के ऊपर से भी जिम्मेदारियों का बोझ हट जाए तो वो भी बहुत सुंदर दिखता है।*


*🔱 ओम नमः शिवाय. 🔱*

रवि अरोड़ा की नजर से....

 आपने कभी देखी / रवि अरोड़ा



किसी फिल्म का तो याद नहीं मगर जहां तक साक्षात दर्शन की बात है तो मुझे अभी तक लैंबोर्गिनी कार के दीदार नहीं हुए । करोड़ों रुपयों की इस कार में सवारी तो कभी सपने में भी नसीब नहीं हुई । क्या करूं मेरे सभी लोग हैं ही गरीबडे , एक बढ़िया कार तक नहीं खरीद सकते । अपने शहर की बात करूं तो यहां भी सब फक्कड़ ही हैं । एक लैंबोर्गिनी भी पूरे शहर में नहीं है । बड़े बड़े धन्ना सेठ घूम रहे हैं मगर हैं सब हवा हवाई ही । असली माल तो दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू जैसे शहरों के लोग लिए बैठे हैं । इस कोरोना काल में मोदी जी की सलाह का असली पालन भी उन्होंने ही किया और आपदा में अवसर पैदा कर लिया । 


आज सुबह ही अखबार में पढ़ा कि देश में पिछले साल लैंबोर्गिनी की बिक्री में रिकार्ड तोड़ वृद्धि हुई है । यह वृद्धि 86 फीसदी आंकी गई । कंपनी के इतिहास में ऐसा 59 साल बाद हुआ । कोरोना में पूरा देश तबाह हो गया मगर कुछ लोगों पर लक्ष्मी इतनी मेहरबान हुई कि उनके छप्पर ही नोटों की बरसात से फट गए । लैमोर्गिनी बनाने वाली कंपनी ने अपनी सालाना रिपोर्ट जारी करते हुए बताया है कि उसकी दुनिया भर में बिक्री दर सबसे अधिक भारत में बढ़ी है । आलम यह है कि 2021 ही नही 2022 के लिए भी बुकिंग फुल हो गई है । अब जिसे यह कार चाहिए उसे 2023 तक का इंतजार करना पड़ेगा । जी नहीं , यह कोई ऐसी वैसी कार नहीं है । इसका सस्ते से सस्ता मॉडल भी साढ़े तीन करोड़ रुपए का है । ऊंचा मॉडल चाहिए तो साढ़े पांच करोड़ खर्च करने पड़ेंगे ।

उधर दुनिया की सबसे महंगी कार रॉल्स रॉयस की भी यही कहानी है । उसकी भी भारत में रिकॉर्ड तोड बिक्री हुई है । अब ऐसा हो भी क्यों नहीं , देश तरक्की की राह पर कुलांचें जो भर रहा है । पिछले हफ्ते ही अखबार में खबर थी कि कोरोना काल में अडानी की संपत्ति दोगुनी हो गई । अंबानी ने भी अपने पैसे डेढ़ गुना कर लिए । देश में इतने नए अरबपति बन गए जितने सत्तर सालों में नहीं बने ।

 सरकार भी कह रही है कि हम अगले कुछ सालों में दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेंगे । देखा है न खुशखबरी ?


मगर पता नहीं क्यों कुछ लोग हमारी खुशियों से जलते हैं और सुबह शाम आएं शाएं बकते हैं । पता नहीं कौन अखबारों में छपवा रहा है कि देश की 57 फीसदी संपत्ति 10 फीसदी लोगों के पास है । वैश्विक असमानता रिपोर्ट में भी न जाने किसने डलवा दिया कि गरीब अमीर के बीच असमानता बढ़ने के मामले में भारत दुनिया का अगुआ देश बन रहा है । नीति आयोग में भी कुछ विघ्न संतोषी बैठे हैं जो दावा कर रहे हैं कि भारत का हर तीसरा आदमी गरीब है । पार्वटी एंड शेयर्ड पोस्पैरिटी रिपोर्ट भी पता नही इस साल किसने तैयार की और लिख दिया कि भारत में पिछले 45 सालों में जितने गरीब बड़े उतने पिछले एक साल में बढ़ गए । सरकारी आंकड़ा 2019 तक 36 करोड़ गरीब लोगों का था मगर कुछ खुराफातियों ने सरकार से 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज बंटवा कर इस आंकड़े को भी पलीता लगा दिया । न जाने कौन खुराफाती हैं जो कह रहे हैं कि देश गरीब हो रहा है और लोग अमीर हो रहे हैं । बेरोजगारी  और भुखमरी के आंकड़े भी घर में बैठ कर ही किसी ने जारी कर दिए । मेरे खयाल से हमारे सिस्टम में कुछ बिगाड़ खाते वाले लोग हैं । उन्हें देश की तरक्की दिखाई ही नहीं देती ।

 न जाने कहां कहां से लाकर न जाने किस किस की रिपोर्ट छपवा देते हैं । चलिए जाने दीजिए उन्हें । आप बताइए क्या आपने कभी देखी है लिंबोर्गिनी कार ?


🙏🏿✌🏾️

शनिवार, 22 जनवरी 2022

भानगढ़ की सच्ची कहानी

 #pratilipihindi #freeread #goodread

 'भारत एक अद्भुत और रहस्यमई देश है' यह बात पूरा विश्व जानता है। आज भी यहां पर ऐसे अनेक तहखानों के बंद दरवाजे पड़े हैं जिनमें कोई ताला नहीं है, कोई जंजीर नहीं है ! सिर्फ मंत्रों की ताकत से बंधे अपने सीने में न जाने कितने अनजाने राज छुपाए हैं। कुछ इसी तरह की रहस्यमई किंवदंतियों के कारण भानगढ़ का किला हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। भानगढ़ दुर्ग राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के पास में स्थित है। जिसका निर्माण राजा भान सिंह ने करवाया था। उन्होंने अपने पूरे शासनकाल तक यहां सुख पूर्वक शासन किया था। उनके बाद उनके पुत्र भगवंत दास ने गद्दी संभाली। भगवंत दास के भी दो पुत्र हुए... जिनका नाम मानसिंह व माधो सिंह था। माधो सिंह के 3 पुत्र हुए ...सुजान सिंह, छत्र सिंह और तेज सिंह.. माधो सिंह के बाद छत्र सिंह वहां के राजा बने।इसके बाद छत्र सिंह के पुत्र अजब सिंह हुए जिन्होंने मानगढ़ से दूर अजबगढ़ (अपने नाम पर) बसाया। इसके बाद अजब सिंह के दो पुत्र हुए...काबिल सिंह और हरि सिंह। काबिल सिंह अजबगढ़ में ही रह गए, लेकिन हरि सिंह ने पुनः भानगढ़ को स्वीकार किया।उसके बाद हरी सिंह के दो बेटों ने डर वस या लालच वस औरंगजेब के शासनकाल में इस्लाम स्वीकार कर लिया। लेकिन अभी भी भानगढ़ पर उनका अधिकार था। औरंगजेब के शासनकाल के बाद मुगल शक्ति कमजोर पड़ गई और सवाई जय सिंह जी ने भानगढ़ पर विजय हासिल करके अपना अधिकार जमा लिया...!!अभी तक भानगढ़ में सुख शांति और समृद्धि का राज्य था। अभी तक सब खुशहाल थे.....भानगढ़ के रहस्यमई और निर्जन होने के पीछे मुख्य रूप से दो कहानियां मिलती हैं। जिन्हें मैं अपनी शैली में लिखने का प्रयास करता हूँ। 

 

 पहली कहानी

 

 प्रथम कथा के अनुसार भानगढ़ दुर्ग के समीप एक सन्यासी तपस्वी रहते थे। जिनसे अनुनय विनय करके राजा भान सिंह ने वहां पर दुर्ग बनाने की अनुमति तो ले ली ! लेकिन साथ में यह शर्त स्वीकार करना पड़ा कि किसी भी हालत में दुर्ग की परछाई उस ऋषि की कुटिया तक नहीं पहुंचनी चाहिए.... और प्रारंभ में ऐसा ही था ! किंतु आगे चलकर उनके पुत्र भगवंत दास ने 1683 में दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया और ऊंचाई बढ़ जाने के कारण उसका बिंब उस ऋषि की कुटिया तक पहुंचने लगा....ऋषि ने क्रोधित होकर श्राप दे दिया कि," शीघ्र ही इस दुर्ग का विनाश हो जाएगा और यहां पर प्रेत आत्माएं वास करेंगी।" लेकिन यहां पर थोड़ा सा मतभेद है। यदि दुर्ग की ऊंचाई बढ़ जाने पर श्राप दिया गया तो फिर लगभग 200 साल तक वहां पर सुख समृद्धि का राज्य कैसे था ? इसलिए दूसरी कहानी अधिक महत्व रखती है... आइए उसके बारे में पढ़ते हैं।

 

 भानगढ़ के रहस्य के बारे में दूसरी कथा

 

 इस कहानी के अनुसार भानगढ़ के इतिहास में अचानक अद्भुत सुंदरी और बुद्धिमान राजकुमारी रत्नावती का नाम आता है। राजकुमारी रत्नावती की सुंदरता की चर्चा पूरे भारत में हो रही थी। कहा जाता है कि रानी पद्मावती से भी अधिक सुन्दर राजकुमारी रत्नावती का रूप था। जो भी उन्हें देखता था मानो सम्मोहित सा हो जाता था। एक बार की बात है राजकुमारी रत्नावती पास के बाजार में अपनी दासी के साथ घूमने गई थी। जैसे पूर्णिमा का चांद सारे तारों की रोशनी को फीका कर देता है, उसी प्रकार आज सारे बाजार में रत्नावती के अलावा कुछ भी दर्शन के योग्य नहीं था। संयोगवश उसी बाजार में तांत्रिक सिंघवी पहुंच गया था ! जो कि मानगढ़ की पहाड़ियों के दूसरी छोर पर अपनी कुटिया बनाकर तंत्र साधनाएं करता था...सिंघवी एक उच्च कोटि का तांत्रिक और तंत्र साधनाओं में पूरी तरह निपुण था। "स्त्री का सौंदर्य जगत की सबसे बड़ी शक्ति होती है।" आज यह परिभाषित हो रहा था... मनस्वी और संयमी सिंघवी आज रत्नावती को देखते ही अपना सब कुछ न्योछावर करने के लिए तैयार था। आज उसे बोध हो रहा था कि संसार में साधना से भी अधिक आकर्षक कुछ हो सकता है। यूँ तो तंत्र जगत की साधनाओं का नियम है सिद्धि हमेशा परोपकार के लिए की जाती है। लेकिन आज वह सब कुछ भूल कर बावरा हो गया। रत्नावती एक पल के लिए उसकी हो जाए, बदले में उसकी जान भी चली जाए तो उसे कोई पछतावा नहीं होगा। "जब पुरुष के हृदय पर स्त्री का आकर्षण हावी हो जाता है, तो उसे अपना सर्वस्व त्याग देने में जरा भी संकोच नहीं होता। फिर ऐसी परिस्थिति में राजा, योद्धा , तपस्वी अथवा फकीर सब एक जैसे हो जाते हैं उस परम मधु की एक बूंद को पाने के लिए।" सिंघवी उसी तरह राजकुमारी के पीछे पीछे चलने लगा जैसे हवा के साथ पेड़ के सूखे पत्ते उड़ते जाते हैं। कुछ देर बाद राजकुमारी एक इत्र की दुकान पर रूकती है, और कुछ खास प्रकार की इत्र को परखने के बाद अपनी दासी को इत्र लेने के लिए इशारा करती है। इत्र की सुगंध सिंघवी तक पहुंचती है और अचानक उसकी तन्द्रा टूटती है। राजकुमारी ...

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बदलते परिवेश में बालक और बालसाहित्य*/ डॉ०सुरेन्द्र विक्रम*

 


मैंने बचपन में खिलौना तक कभी माँगा नहीं। .

मेरा बेटा माँगता है गोलियाँ मेरे पिता। 

                                  - माणिक वर्मा 


हमारे दौर के बच्चों को क्या हुआ लोगों 

खिलौना छोड़कर चाकू खरीद लाए हैं। 

                          - डॉ० कलीम कैसर 


मैं खिलौनों की दुकानों का पता पूछा किया

और मेरे फूल से बच्चे सयाने हो गए।

                                   - प्रभात शंकर


जुगनू को दिन के वक़्त पकड़ने की ज़िद करें 

बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए। 

                               - परवीन शाकिर


             आज के बच्चों का भयावह सच उजागर करती उपर्युक्त इन पंक्तियों ने अभिभावकों के मन और मस्तिष्क को झकझोर कर रख दिया है। अध्यापक/अध्यापिकाओं के सामने भी यह खुली चुनौती है। वर्षों पूर्व आयोजित राष्ट्रीय बाल भवन, नई दिल्ली की राष्ट्रीय संगोष्ठी में मैंने यह बात कही थी कि मीडिया ने आज के बच्चों को उनकी वास्तविक उम्र से कम से कम 10 वर्ष बड़ा कर दिया है। उस समय मेरी इस बात पर सहमति-असहमति के अलग-अलग स्वर उभरे थे। संगोष्ठी में उपस्थित लोगों के तरह-तरह के तर्क थे परंतु कंप्यूटर, लैपटॉप, इंटरनेट, साइबर कैफे, भूमंडलीकरण और  मीडिया आदि के बढ़ते प्रभाव ने आज के बच्चों को अपनी गिरफ़्त में लेकर मेरी उपर्युक्त बात को सच प्रमाणित कर दिया है। लखनऊ से प्रकाशित राष्ट्रीय सहारा में 4 नवंबर 2013 को संपादकीय पृष्ठ की इस रिपोर्ट ने तो उस समय लोगों की नींद उड़ा दी थी-

           *"पिछले साल (सन् 2012) चेन्नई में कक्षा 11 के 15 वर्षीय छात्र मोहम्मद इरफान ने हिन्दी की शिक्षिका उमा श्रीवास्तव की चाकू घोंपकर हत्या कर दी थी। इसके पहले वैश्विक संस्कृति की आदर्श श्रेणी में आ चुके और साइबर सिटी का मुहावरा बन चुके, दिल्ली से सटे शहर गुड़गाँव में भी आधुनिक शिक्षा की यही दुष्परिणति देखने में आई थी जहाँ के कुलीन बच्चों को विद्यार्जन कराने वाले यूरो इंटरनेशनल स्कूल के आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले दो छात्रों ने अपने ही सहपाठी की छाती गोलियों से छलनी कर दी थी। इसी तरह की एक घटना दिल्ली की है, जहाँ चोर-सिपाही का खेल खेल रहे एक 12 साल के बच्चे ने सचमुच की पिस्तौल को को खिलौना समझकर इसे अपने ही पड़ोस के एक दोस्त पर दाग दिया जिससे बच्चे की मौत हो गई। एक और घटना उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के एक गाँव की है जहाँ ग्यारहवीं के एक छात्र ने अध्यापक की डाँट से बौखलाकर उनके पेट में छुरा घोंप दिया था"*

               ऐसी घटनाएँ दिल को तो दहलाती ही हैं, आज के बच्चों के बारे में फिर से नए सिरे से सोचने के लिए भी मजबूर करती हैं। आज के बच्चों का एक नया पहलू यह भी है कि अब बच्चे आउटडोर खेल-कूद, किस्से -कहानी, रूठना-मनाना तथा हँसी-ठिठोली की मौज़-मस्ती भूल गए हैं। हम भले ही इस तथ्य को नजरअंदाज करना चाहें परंतु वास्तविकता बहुत दूर तक हमारा पीछा नहीं छोड़ती है। 

              यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में डेढ़ करोड़ से अधिक बच्चे एड्स से पीड़ित हैं। कई हजार बच्चे विकलांगता के शिकार हैं। लाखों बच्चे खतरनाक उद्योग-धंधों में लगे हुए हैं। सिर्फ अलीगढ़ के ताला उद्योग में पच्चीस-तीस हजार से अधिक बच्चों का काम करना या अकेले दिल्ली में लगभग कई लाख बालमजदूरों का होना तथा फीरोजाबाद के चूड़ी उद्योग में बच्चों का काम करना आश्चर्य की बात नहीं है। इन उद्योग-धंधों में लगे बच्चे हों या शिवाकासी के पटाखा उद्योग में लगे बच्चे, तथ्य यही है कि गरीबी की मार झेल रहे इन बच्चों का बचपन सिसक रहा है। इन बच्चों की बेचारगी ने कवि कुँवर बेचैन को यह लिखने के लिए मजबूर कर दिया-


दुकानों  में  खिलौने  देखकर  मुँह फेर  लेते  हैं


किसी मुफ़लिस के बच्चों की कोई देखे ये लाचारी।

किसी दिन देख लेना वो उन्हें अंधा बना देगी

घरों में कैद कर ली है जिन्होंने रोशनी सारी। 

                 तथ्य तो यह भी है कि भारत के लगभग तीन करोड़ बच्चों में से बहुत से बच्चे आर्थिक रूप से ऐसे माहौल में रहते हैं जहाँ उन्हें बालश्रम का दंश झेलना ही पड़ता है। बालश्रम समाज में एक खौफनाक सच बन चुका है। डॉ0 आशीष वशिष्ठ की एक रिपोर्ट चौंकाने वाली है--

               *"5 से 12 साल तक की उम्र के बच्चे बालशोषण के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। हैरत की बात यह है कि हर तीन में से दो बच्चे कभी न कभी शोषण का शिकार रहे हैं। एक अध्ययन के दौरान लगभग 53.22% बच्चों ने किसी न किसी तरह के शारीरिक शोषण की बात स्वीकार की तो 21. 90% बच्चों को भयंकर शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। देश का हर दूसरा बच्चा भावनात्मक शोषण का भी शिकार है।"*

                 बालश्रम का फैलाव इतना अधिक है कि बच्चे दबावों के बीच में पिस रहे हैं। उनकी हालत देखकर वर्षों पूर्व लिखी गई वरिष्ठ कवि राजेश जोशी की निम्नलिखित पंक्तियाँ समाज की चेतना को बुरी तरह झकझोर देती हैं। ये पंक्तियाँ हम जब भी पढ़ते हैं तो अनायास हमारी आँखें नम हो जाती हैं। एक बहुत बड़ा सवाल हमारे सामने मुँह बाए खड़ा हो जाता है। हकीकत बयान करता यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था जब ये पंक्तियाँ लिखी गई थीं-

  

  काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे 

  क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें

  क्या दीमकों ने खा लिया है 

  सारी रंग-बिरंगी किताबों को

  क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने

  क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं 

  सारी मदरसों की इमारतें

  क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन 

  खत्म हो गए हैं एकाएक

  तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में? 

               आधुनिक कविता के प्रखर कवि राजेश जोशी ने सवाल भी उठाया और अंत तक आते-आते उसका जवाब भी दे दिया। उनका यह कहना सार्वभौमिक सच है कि अगर बच्चों से जुड़ी सारी चीजें खत्म हो गई हैं तो इस दुनिया में बचा ही क्या है? अगर बच्चे की दुनिया से उसका रंग-बिरंगा संसार, उसका खिलंदड़ापन, उसका नटखट फक्कड़पन और उसकी मौज-मस्ती गायब हो गई है तो सिवाय नीरसता के के बचा ही क्या है? 

                बच्चों के प्रिय कवि निरंकारदेव सेवक ने आज से चालीस वर्षों पूर्व लिखा था कि- *"बच्चों का संसार बड़ों के संसार से सर्वथा भिन्न होता है और उसमें रहे-बसे बिना इसका अनुभव नहीं हो सकता। बड़े होकर बच्चा बनना एक सतत् साधना और अभ्यास का काम है। आज किसे इतना अवकाश है कि इस पचड़े में पड़े। हमारे समाज में जब बच्चा ही उपेक्षित है तो उसके लिए लिखा हुआ साहित्य भी क्यों नहीं होगा।"*

          -ताम्रपर्णी: फरवरी-अप्रैल: 1978-79,पृष्ठ 4

                वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना तो बच्चों के प्रति हमारी मानसिकता को बड़ी व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करते हैं-


कुछ बच्चे बहुत अच्छे होते हैं

वे गेंद और गुब्बारे नहीं माँगते मिठाई भी नहीं माँगते

जिद नहीं करते हैं 

और मचलते तो है ही नहीं

बड़ों का कहना मानते हैं

वे छोटो का भी कहना मानते हैं इतने अच्छे होते हैं

इतने अच्छे बच्चों की तलाश में रहते हैं हम 

और मिलते ही उन्हें घर ले आते हैं अक्सर तीस रुपए महीने और खाने पर। 


                 जनवादी कवि गोरख पांडेय तो बच्चों के मामले में पूरे समाज को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं-


बच्चों के बारे में बनाई गईं ढेर सारी योजनाएँ

ढेर सारी कविताएँ लिखी गई बच्चों के बारे में

बच्चों के लिए खोले गए ढेर सारे स्कूल

ढेर सारी किताबें बाँटी  गईं बच्चों के लिए

 बच्चे बड़े हुए

 जहाँ थे वहाँ से उठ खड़े हुए बच्चे

 बच्चों में से कुछ बच्चे

 हुए बनिया, हाकिम और दलाल हुए मालामाल और खुशहाल बाकी बच्चों ने सड़क पर कंकड़ टोड़ा

दुकानों में प्यालियाँ धोईं

साफ किया टट्टी-घर 

खाए तमाचे 

बाजार में बिके कौड़ियों के मोल गटर में गिर पड़े

 बच्चों में से कुछ बच्चों ने 

आगे चलकर फिर बनाई योजनाएँ बच्चों के बारे में कविताएँ लिखीं स्कूल खोले, किताबें बाँटी बच्चों के लिए। 


               आज का बच्चा समस्याओं से जूझ रहा है। टूटते संयुक्त परिवारों ने बच्चों के सामने अनगिनत प्रश्न खड़े कर दिए हैं। दादी-नानी के आँचल  की छाँव में पलने वाला बच्चा 'क्रेश' में आया की गोद में पल रहा है। आजीविका की आपा-धापी में दौड़ते हुए माता-पिता के पास समय का संकट है। अगर ऐसे समय में आज का  कवि -- जन्म से बोझ पा गए बच्चे, पालने में बुढ़ा गए बच्चे। -- (शिव ओम अंबर) जीवन का सच लिखते हैं तो हमें इसे स्वीकार करना ही होगा। 

                 पालने के संकट से अभी बच्चे उबर भी नहीं पाए थे कि उन्हें बस्ते के बोझ ने आक्रांत कर दिया। बोझ इतना बड़ा की बालमन कराह उठा। बस्ते के बढ़ते बोझ से होमवर्क का बढ़ना लाजमी था, जिसका परिणाम यह हुआ कि बच्चे होमवर्क से आतंकित हो गए। स्वतंत्र टिप्पणीकार पंकज चतुर्वेदी की होमवर्क के बारे में हिन्दुस्तान दैनिक के संपादकीय पृष्ठ पर छपी यह टिप्पणी बड़ी महत्त्वपूर्ण है- *"आज छोटे-छोटे बच्चे होमवर्क के आतंक में दबे पड़े हैं, जबकि यशपाल समिति की सलाह थी कि प्राइमरी कक्षाओं में बच्चों को गृहकार्य इतना दिया जाना चाहिए कि वे अपने घर के माहौल में नई बात खोजें और उन्हीं बातों को विस्तार से समझें। आज तो होमवर्क का मतलब ही पाठ्यपुस्तक के सवालों-जवाबों को काॅपी पर उतारना या उसे रटना रह गया है।"*

                बस्ते के बोझ की यह व्यथा निम्नलिखित पंक्तियों में उभरकर सामने आई है-

   

इक ऐसी तरकीब सुझाओ, तुम कंप्यूटर भैया। 

बस्ते का कुछ बोझ घटाओ, तुम कंप्यूटर भैया। 

हिंदी, इंग्लिश, जी०के० का ही,बोझ हो गया काफी 

बाहर पड़ी मैथ की कॉपी, कहाँ रखें  'ज्योग्राॅफी'। 

 रोज-रोज यह फूल-फूलकर, बनता जाता हाथी। 

कैसे इससे मुक्ति मिलेगी, परेशान सब  साथी। 

'होमवर्क' इतना मिलता है, खेल नहीं हम पाते। 

ऊपर से ट्यूशन का चक्कर, झेल नहीं हम पाते। 

पढ़ते-पढ़ते ही आँखों पर, लगा लेंस का चश्मा। 

भूल गया सारी शैतानी, कैसा अजब  करिश्मा। 

घर बाहर सब यही सिखाते, अच्छी भली पढ़ाई।

पर बस्ते के बोझ से भैया, मेरी आफत आई।


                 बच्चा अपनी समस्या का निराकरण चाहता है जिसके लिए वह कंप्यूटर की शरण में जाता है। उसकी कंप्यूटर से प्रार्थना बड़ी दिलचस्प है-


मेरी तुमसे यही प्रार्थना, कुछ भी कर दो ऐसा।

फूला बस्ता पिचक जाए, मेरे गुब्बारे  जैसा।

           - इक्कीसवीं सदी की ओर : पृष्ठ 37


               बदलते जीवन मूल्यों और सूचना-प्रौद्योगिकी से संपन्न इस युग में बच्चों के सामने समस्याओं का अंबार लगा है। समस्याओं की लंबी-चौड़ी सूची में कुछ और नई समस्याएँ जोड़ देना आसान है, परंतु उनका निराकरण करना अपने आप में बड़ा जटिल है। बालसाहित्य के सुप्रसिद्ध समीक्षक और रचनाकार डॉ0 हरिकृष्ण देवसरे ने वर्षों पूर्व यह सवाल उठाया था कि- *"हम बच्चों को कैसा भविष्य देंगे यह एक पेचीदा सवाल बन गया है। विश्व भर के बच्चे किसी न किसी  खतरे, पीड़ा या संकट से आतंकित हैं। आखिर हम उनके लिए कैसी दुनिया का निर्माण करने जा रहे हैं? यह संपूर्ण मानवता के अस्तित्व और भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है।"*

                 गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बच्चों के बारे में बिल्कुल सही लिखा था कि-

             *"ठीक से देखने पर बच्चे जैसा पुराना और कुछ नहीं है। देश-काल, शिक्षा, प्रथा के अनुसार वयस्क मनुष्यों में कितने परिवर्तन हुए हैं, लेकिन बच्चा हजारों साल पहले जैसा था, आज भी वैसा ही है। वही अपरिवर्तनीय, पुरातन बारंबार आदमी के घर में बच्चे का रूप धर कर जन्म लेता है लेकिन तो भी सबसे पहले दिन वह जैसा नया था, जैसा सुकुमार था, जैसा भोला था, जैसा मीठा था, आज भी ठीक वैसा ही है। इस जीवन  चिरंतनता का कारण यह है कि शिशु प्रकृति की  सृष्टि है जबकि वयस्क आदमी बहुत अंशों में आदमी की अपने हाथ से रचना होता है।"*

          - रवीन्द्रनाथ के निबंध :422, 23

इसे और आगे स्पष्ट करते हुए रवींद्रनाथ नाथ टैगोर कहते हैं कि- *"बालक की प्रकृति में मन का प्रताप बहुत क्षीण होता है। जगत, संसार और उसकी अपनी कल्पना उस पर अलग-अलग आघात करती है। एक के बाद दूसरी आकर उपस्थित होती है। मन का बंधन उसके लिए पीड़ाजनक होता है। सुसंलग्न कार्य-कारण सूत्र पकड़कर चीज को शुरू से लेकर आखिर तक पकड़े-पकड़े चलना उसके लिए दुस्साध्य होता है "*

                   - वही :पृष्ठ 427


               कुछ नए की तलाश आज के बच्चों की आवश्यकता है। पुरानी चीजों का मोहभंग उनकी नियति में शामिल हो गया है। ऐसे में बालसाहित्य से जुड़े लेखकों, संपादकों, प्रकाशकों  और अभिभावकों की भूमिका चुनौतीपूर्ण है। यदि हम ऐसे माहौल में भी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और बच्चों के लिए तथा उनके परवरिश के बारे में कुछ नया और महत्त्वपूर्ण नहीं सोचा तो वह दिन दूर नहीं जब बच्चा भविष्य के लिए एक चुनौती बन जाएगा। परंपरागत और बासी हो चुके बालसाहित्य को नई-नई प्लेट में सजाकर (भले ही वही सजी-धजी हो) परोसते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब बच्चा-

   लोरी नहीं सुनाओगे तो रोएगा

   वही चाँद दिखाओगे तो रोएगा

   वही खिलौने दोगे तो रोएगा

   वही दूध भात खिलाओगे तो रोएगा

   बच्चा कुछ नया चाहता है

   नहीं पाएगा तो रोएगा। 


                आज समाज में बच्चों और बालसाहित्य से जुड़े हुए लोगों के सामने समस्याओं से जूझते हुए तथा अनंत संभावनाओं से परिपूर्ण बच्चों को हँसाने की चुनौती है, नए और पुराने के संक्रमण की चुनौती है, बाजार की चकाचौंध से बाहर निकलने की चुनौती है, और चुनौती है कुछ नया कर दिखाने की। आजकल पत्रिका के संपादक प्रवीण उपाध्याय के स्वर में स्वर  मिलाते हुए कहें तो- *"बच्चे में हर पल नई-नई बातें सीखने और देखने की ललक होती है। वह बहुत जल्दी पुरानी चीजों से ऊब जाता है। आज विज्ञान ने पूरी दुनिया की रफ़्तार तेज कर दी है। हर पल कुछ न कुछ नया करने की होड़ मची हुई है। सूचना-क्रांति के चलते पूरी दुनिया सूचना पर आधारित होती जा रही है। बच्चों के सामने टेलीविजन और इंटरनेट पर दुनिया भर की सूचनाएँ उपलब्ध हैं। बाजार की चकाचौंध है। शिक्षा और ज्ञान भी बाजार के फार्मूले पर तैयार किया जाने लगा है। ऐसे में यदि बच्चे किताबों की ओर से विमुख हो रहे हैं, तो दोष न तो बच्चों का है और न ही आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव का। इसके लिए तो बालसाहित्य के रचनाकारों प्रकाशकों और बाल -विशेषज्ञों को ही रास्ता ढूँढ़ना होगा। इस आधुनिकता का लाभ उठाकर उन्हें ही कोई न कोई कोई ऐसा मार्ग तलाशना होगा जिससे बच्चों में बालसाहित्य के प्रति ललक कम न हो"*  

                    - आजकल (मासिक) :नवंबर सन् 2005: पृष्ठ 2


               जहाँ तक मैं समझता हूँ- आज के बच्चों में बालसाहित्य के प्रति ललक तभी बढ़ेगी, जब बालसाहित्य बच्चों से अपना रिश्ता कायम करेगा, और यह रिश्ता जैसे-जैसे प्रगाढ़ होगा, बच्चों का साहित्य के प्रति वैसे-वैसे अनुराग बढ़ता जाएगा। बालसाहित्य को बच्चों की दुनिया में पैठ बनाकर उनके मन की साँकल को खटखटाना होगा, उनके विचारों के दरवाजों को खोलना होगा और करना होगा उनसे आत्म साक्षात्कार, तभी डॉ० सुभाष रस्तोगी की निम्नलिखित  पंक्तियाँ सच साबित होंगी-

   

       कविता बाइस्कोप नहीं है

       कि बच्चे उससे एकदम खिंचे आएँ

       और नाचते-गाते बच्चों की 

       एक पूरी दुनिया सामने देख

       अपना दुख भूल जाएँ।      

        *********************

        इसलिए मैं चाहता हूँ 

        बच्चों से रिश्ता कविता का

        साफ-साफ तय हो। 

        मैं चाहता हूँ 

        कविता अगर बच्चों के साथ

        बढ़ाएं दोस्ती की पींग

        तो चिड़ियों/फलों/रंगों के साथ ही 

        स्लेट /पेंसिल /नेकर और कमीज 

        की भी बात करें। 

                - जागृति :सितंबर-दिसंबर, सन् 1992: पृष्ठ 24


               इक्कीसवीं सदी इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि इसकी शुरुआत धमाकेदार हुई। चर्चा में आए हैरी पॉटर ने एक बार फिर बालसाहित्यकारों के बीच में, बच्चों के लिए लिखने की चुनौती सामने रखी। सोई हुई संवेदनाओं को झकझोरा--- बच्चे मीडिया के लिए चर्चा में आ गए। हैरी पॉटर की लोकप्रियता ने कई सवाल भी खड़े किए। हैरी पॉटर के तथ्यों, कथावस्तु का विश्लेषण, बच्चों की ग्राह्यता और मानसिक स्थिति, मीडिया हाइप, मार्केटिंग स्ट्रेटजी, जादू-टोना, भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, अंधविश्वास और तिलिस्म जैसे सवाल इतने वर्षों बाद आज भी तैर रहे हैं। 

                डॉ० हरिकृष्ण देवसरे ने उस समय यह टिप्पणी की थी थी कि- *"हैरी पॉटर तो तिलिस्मी पाॅप बालसाहित्य है जो हवा के झोंके की तरह आकर चला जाने जाने वाला है।"*

             - नवभारत टाइम्स: 8 सितंबर, सन 2005:पृष्ठ 10


                डाॅ०क्षमा शर्मा ने यह लिखकर हैरी पॉटर की पूरी श्रृंखला को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था कि- *" मीडिया हाइप के कारण एक किताब बिना पढ़े हिट हो गई।"*  

                - हिंदुस्तान, 23 सितंबर, सन 2005 :पृष्ठ 8


                डाॅ० श्रीप्रसाद ने भी यह अभिमत व्यक्त किया था कि- *" हैरी पॉटर को महत्त्वपूर्ण कृति की अपेक्षा जादुई आकर्षण की कृति के रूप में अधिक पढ़ा गया।********* ********* *हैरी पॉटर को बालउपन्यास की दिशा मानना भूत-प्रेतों और भयावह स्थितियों की दुनिया में संक्रमण करना है, जो तार्किक बालसाहित्य सृजन की दिशा नहीं है।"*

                 - आजकल: नवंबर, सन 2005: पृष्ठ 37, 38


                आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि इसके बावजूद हैरी पाॅटर

छपती रही और उसने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। जे0के0 रोलिंग न केवल रातोंरात सुपरहिट हो गईं बल्कि अथाह संपत्ति की मालकिन भी हो गईं। हैरी पाॅटर के सभी प्रकाशित सातों खण्ड, उसके वीडियो तथा उसके पात्रों से बच्चों की ऐसी दोस्ती हुई कि बच्चे बड़ी जल्दी ही तिलिस्म की दुनिया में डूब गए। यहाँ एक तथ्य अवश्य जोड़ना चाहूँगा कि हैरी पाॅटर के बहाने ही सही बच्चों के विकास में स्वस्थ बालसाहित्य की भूमिका की न केवल जोरदार ढंग से चर्चा हुई बल्कि बच्चों के लिए लिखने, उन पर चर्चा करने तथा उनका स्वस्थ मनोरंजन करने की कवायद भी लगातार होती रही। बालसाहित्यकार डाॅ0 क्षमा शर्मा ने न केवल बच्चों से बालसाहित्य और चंदामामा के रिश्तों पर सवाल उठाए बल्कि दो टूक शब्दों में कह दिया था कि- *"बच्चे वैसी यथार्थ कथाएँ तो कतई नहीं पढ़ना चाहते, जिनमें पहली पंक्ति से ही कथा के अंत का बोध हो जाए। पूरी कहानी में उपदेशों की भरमार हो और मनोरंजन नदारद। इनमें न कब-क्यों-कहाँ जैसी जिज्ञासा जगाने वाली बातें होती हैं, न हीं आगे क्या हुआ के प्रति कोई उत्सुकता जगती है। कार्टून, जिन्हें बच्चे बेहद पसंद करते हैं, वे भी एक तरह से से परीकथाएँ ही हैं। कई सभा-सेमिनारों में चंद्रमा के बारे में बताया जाता है कि अब तो छुटपन से ही बच्चे चंद्रमा के बारे में जान जाते हैं कि वहाँ न पानी है और न ऑक्सीजन। वहाँ कोई नहीं रहता, चरखा कातने वाली वह बुढ़िया भी नहीं, जिसकी कहानी बच्चे अब तक सुनते आए हैं। तो क्या बच्चों की दुनिया में चाँद से जुड़ी सारी कहानियाँ या तमाम कथाओं में आने वाले चाँद के जिक्र या लोककथाएँ खारिज कर दी जाए? क्या चाँद से बच्चों का चंदामामा दूर के वाला करीबी रिश्ता बिल्कुल भुला दिया जाए?"*

              -दैनिक जागरण :4 अप्रैल 2018 :पृष्ठ 8


                यह सच है कि बच्चों को संस्कारित कर सही दिशा प्रदान करना बालसाहित्य का प्रमुख उद्देश्य है, मगर इसमें भी उतनी ही सच्चाई है कि मात्र कल्पनाओं के सब्ज़बाग दिखाकर बच्चों को भटकने के लिए छोड़ देना बाल साहित्य का उद्देश्य कदापि नहीं होना चाहिए। सच तो यह है कि बालसाहित्यकार बच्चों के लिए अपनी रचनाओं के माध्यम से ऐसे रास्ते का निर्माण करें जिसमें उतार-चढ़ाव के खतरे तो हो सकते हैं परंतु उन पर चलकर मंजिल आसानी से प्राप्त की जा सके। इक्कीसवीं शताब्दी इस दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि इस परिवेश में  बच्चों के मन में उठने वाली हिलोरें बालसाहित्य में साफ़-साफ़ सुनाई दे रही हैं। बच्चा आनंदित और पुलकित होकर सुरीली ध्वनि में अपनी तान छेड़ रहा है-


      फीड करेंगे कंप्यूटर में, अपना  भारी बस्ता। 

     अब तक जिसको ढोते-ढोते, हालत मेरी खस्ता। 

     ट्यूशन से भी मुक्ति मिलेगी, खेलेंगे  मैदान में। 

     गाएंगे मिल सा रे गा मा, बैठ सुरीली तान में। 


                 उपर्युक्त कविता का उद्देश्य बच्चों को आने वाले बदलावों की एक तस्वीर दिखाकर उन्हें आगे के लिए तैयार करना था। अब बच्चे इक्कीसवीं शताब्दी में आकर पाठ्यक्रमों से इतर बालसाहित्य के उन्नयन  की दिशा में हो रहे बदलावों से भी अच्छी तरह परिचित हो रहे हैं। बच्चों के विकास के लिए समर्पित संस्था यूनिसेफ द्वारा संचालित अनेक योजनाओं में बच्चों की बराबर भागीदारी हो रही है। 

                  चिंतन की दृष्टि से बालसाहित्य पर पुनर्विचार  इसलिए भी आवश्यक है कि आज बच्चों की सोच में आमूलचूल परिवर्तन हो गया है। मेरा मानना है कि बालसाहित्यकारों को अपनी रचनाधर्मिता की कसौटी बच्चों के इस स्तर पर देखने की जरूरत है-  बच्चों के बदलते मनोविज्ञान से जुड़ा  बालसाहित्य क्योंकि इसका सृजन उन्हीं के लिए किया जाता है। बालसाहित्यकारों के स्तर पर क्योंकि वही बालसाहित्य का सर्जक हैं। उन माता-पिता और अभिभावकों के स्तर पर जो बच्चों को बाल साहित्य खरीद कर उपलब्ध कराते हैं, वे अपने विवेक से उनके लिए पढ़ने की सामग्री का चयन भी करते हैं। 

               इन बिंदुओं पर गहराई से विचार करें तो निम्नलिखित बातें हमारे सामने आती हैं। आज इस तरह का बालसाहित्य लिखा ही जाना चाहिए जिसमें बच्चा अपने को प्रतिबिंबित पाए। उसकी जो भी समस्याएँ हैं वह सही परिप्रेक्ष्य में उसका प्रतिनिधित्त्व करें तथा सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि बच्चे बालसाहित्य से अपनी समस्याओं पर काबू पाना सीख सकें। 

                 विगत तीन-चार दशकों के बालसाहित्य पर व्यापक स्तर से विचार करें तो यह बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है कि विविध विधाओं में व्यापक सृजन के साथ-साथ, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों-सेमिनारों, शताधिक शोध-कार्यों, व्यापक विचार-विमर्शों तथा लगातार चार विश्व हिन्दी सम्मेलनों में बालसाहित्य पर केन्द्रित सत्रों के बल पर समकालीन बालसाहित्य ने इस भ्रम को तोड़ा है कि हिंदी में बालसाहित्य का अभाव है या स्तरीय बालसाहित्य नहीं लिखा जा रहा है।अब उनकी बातें जाने दीजिए जो अपनी दोनों आँखें मूँदे हुए हैं और उनके दोनों कान भी बंद हैं, जब भी बालसाहित्य की बात आती है तो वह उसकी प्रगति की ओर ओर निहारना ही नहीं चाहते हैं नहीं चाहते हैं ऐसे लोगों का अरण्यरुदन तो पहले भी था, आज भी है और आगे भी जारी रहेगा।


*- डॉ०सुरेन्द्र  विक्रम*

एसो० प्रोफेसर एवं अध्यक्ष

हिन्दी विभाग

लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज

लखनऊ (उ0प्र0)-226018


*आवास-*

सी-1245,एम0आई0जी0

राजाजीपुरम,लखनऊ (उ0प्र0) -226017

मोबाइल नंबर-

08960285470

09450355390

07618867609

ई-मेल- vikram.surendra7@gmail.com

पुरानी डायरी से ../ प्रवीण_परिमल

 

गाँव की चिट्ठी शहर के नाम 


आगे का समाचार यह है 

कि अब यहाँ जी नहीं लगता। 


कोई छोटी-मोटी नौकरी का जुगाड़ हो सके 

तो लिखना, चला आऊँगा। 


गर्मी की छुट्टियों में 

जब तुम बच्चों के साथ आते थे 

तो कितना अच्छा लगता था--

तुम्हें भी, मुझे भी और बच्चों को भी। 


तुम सोचते होगे --

आम का बगीचा

जामुन का पेड़ 

ताड़ के कोए

इमली और खजूर की फलियाँ आदि

आज भी 

बच्चों की राह देख रहे होंगे

तो जान लो

अब ऐसा बिल्कुल नहीं है!


हालात बदल चुके हैं

गाँव के अब।


अब गाँव वो गाँव नहीं रहा!


बच्चों से कहना

टूटी हुई दीवार फाँदकर

खँढ़ी में घुस आई बकरियों के 

दूध दूहने के रोमांच को

भूल जाएँ अब।


नदी में

जाँघ भर पानी वाले घाट पर

घंटों नहाते हुए मटरगश्ती करना

फटी हुई मच्छरदानी के टुकड़े से

छोटी-छोटी मछलियाँ पकड़ना

-- जानता हूँ

बच्चे ये सब 'मिस' करते होंगे!


कोलसार से उठती

गर्म- गर्म बन रहे गुड़ की गमक

बच्चों के नथुनों को 

अब भी  

बेचैन तो ज़रूर करती होगी!

 

भरी नदी में

नाव पर सवार होकर

झिंझरी खेलने के रोमांच को तो

बच्चे भूल गये होंगे अब!


अच्छा है

याद करने लायक 

अब रहा भी नहीं कुछ यहाँ। 


टीवी क्या आया गाँव में

देश को विदेश के 

और गाँव को शहर के 

क़रीब ला दिया 

मगर आदमी को 

आदमी से दूर कर दिया।


तुम्हें पता न हो शायद

होली के अवसर पर

अब दो-दो अगजे जलाए जाते हैं यहाँ --

बड़जातियों का अलग

छुटजातियों का अलग। 

 

लुकवारी भाँजते हुए

इस गाँव से उस गाँव तक 

जाने की बात तो छोड़ो

इस टोले से 

उस टोले तक जाने में भी 

डर लगता है।


दहशत इतनी 

कि चार- चार, छह- छह लोगों की टीमें

रात-रात भर जागकर

पहरेदारी करती हैं

टोलों की।


गदहबेर में ही

संझा-पराती के फ़ौरन बाद

दरवाजों के पट

बंद हो जाते हैं।


बैकवर्ड - फॉरवर्ड

पार्टी- पाॅलिटिक्स

दल- गुट का खेला

अब जोरों पर है यहाँ!


टटके भिनसहिरा में

दिसा-मैदान के लिए

नदी की तरफ़ निकलना भी

कम हो गया है।


होरहा लगाने के लिए

एक- दो मुट्ठा चना कबारने

या खाने के लिए

खेत से दो-चार हरी मिर्ची तोड़ लेने पर

खून-खराबा हो जाना 

अब आम बात है यहाँ।


गाँववालों के स्वागत में

हरदम बाँहें फैलाए रहनेवाले

लालाजी के दालान पर भी 

सिर्फ सन्नाटों का ही राज है अब।


आपसी बतकही से

पहर भर रात बीतने तक 

गुलज़ार रहनेवाला

बुधन साव का ओटा भी

शाम होते ही

उदासी ओढ़ लेता है।


सोती-पिरौटा से

सियारों की डरावनी आवाज़ों का 

सुनाई देना

अब जल्दी शुरू हो जाता है।


कीर्तन- फगुआ

नाटक- नौटंकी

हलवा- मलीदा

ताजिया- जुलूस

-- सबके इलाके घोषित कर दिए

 गये हैं।


शादी- विवाह की कौन कहे

मरनी- जीनी तक में

शामिल होनेवाले लोग

शामिल होने से ज्यादा

चौकन्ने रहने पर

ध्यान रखते हैं अब।


कौन जाने

कब, किधर से

हथियारबंद लोग आएँ

और छ: इंच छोटा कर जाएँ!


अब तुम्हीं बताओ

ऐसे में जी कैसे लगेगा

और कब तक लगेगा!


इसीलिए कहा रहा हूँ ---

कोई छोटी-मोटी नौकरी का भी जुगाड़ हो सके

तो लिखना, चला आऊँगा।


कम से कम

सुकून से सो तो पाऊँगा!


#प्रवीण_परिमल


इमेज गूगल से साभार

स्त्री और पुरुष

 🖖स्त्री और पुरुष के बीच मैत्री भी हो सकती है, मित्रता भी हो सकती है, यह भारतीय परंपरा का अंग नहीं रही। भारतीय परंपरा ने कभी इतना साहस नहीं किया कि स्त्री और पुरुष के बीच मैत्री की धारणा को जन्म दे सके।

और मैत्री होनी चाहिए।

🖖

 एक सुंदर, सुसंस्कृत व्यक्तित्व में इतनी क्षमता तो होनी चाहिए कि वह किसी स्त्री के साथ भी मैत्री बना सके, किसी पुरुष के साथ मैत्री बना सके। मैत्री का अर्थ है कि कोई शारीरिक लेन—देन का सवाल नहीं है, एक आत्मिक नाता है।

🖖

एक पुरुष और एक स्त्री के बीच इस तरह की दोस्ती हो सकती है जैसे दो पुरुषों के बीच होती है, या दो स्त्रियों के बीच होती है। मैत्री का आधार बौद्धिक हो सकता है। दोनों के बीच एक बौद्धिक तालमेल हो सकता है। दोनों के बीच रुचियों का एक सम्मिलन हो सकता है। दोनों में संगीत के प्रति लगाव हो सकता है। 

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पश्चिम में शरीर का संबंध ही एकमात्र संबंध नहीं है। यह श्रेष्ठतर बात है, ध्यान रखना। शरीर का संबंध ही एकमात्र संबंध अगर है, तो इसका अर्थ हुआ कि फिर आदमी के भीतर मन नहीं, आत्मा नहीं, परमात्मा नहीं, कुछ भी नहीं, सिर्फ शरीर ही शरीर हैं। अगर आदमी के भीतर शरीर के ऊपर मन है और मन के ऊपर आत्मा है और आत्मा के ऊपर परमात्मा है तो इन चारों तलों पर संबंध हो सकते हैं।

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मैत्री थोड़ी आध्यात्मिक बात है। थोड़े ऊंचे तल की बात है। तुम कल्पना ही नहीं कर सकते कि एक स्त्री और पुरुष में मैत्री है। कि एक स्त्री और पुरुष घंटों बैठकर दर्शनशास्त्र पर या काव्यशास्त्र पर विचार विमर्श करते हैं।


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शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

भारतीय पिता पुत्र

 भारतीय पिता पुत्र की जोड़ी भी बड़ी कमाल की जोड़ी होती है ♦️घर में दोनों अंजान से होते हैं,

एक दूसरे के बहुत कम बात करते हैं, कोशिश भर एक दूसरे से पर्याप्त दूरी ही बनाए रखते हैं। बस ऐसा समझो कि दुश्मनी ही नहीं होती।

♦️माहौल कभी भी छोटी छोटी सी बात पर भी खराब होने का डर सा बना रहता है और इन दोनों की नजदीकियों पर मां की पैनी नज़र हमेशा बनी रहती है।


♦️ऐसा होता है जब लड़का,

अपनी जवानी पार कर, 

अगले पड़ाव पर चढ़ता है, 

तो यहाँ, 

इशारों से बाते होने लगती हैं, 

या फिर, 

इनके बीच मध्यस्थ का दायित्व निभाती है माँ ।


♦️पिता अक्सर पुत्र की माँ से कहता है, 

जा, "उससे कह देना"

और, 

पुत्र अक्सर अपनी माँ से कहता है, 

"पापा से पूछ लो ना"

इन्हीं दोनों धुरियों के बीच, 

घूमती रहती है माँ । 


♦️जब एक, 

कहीं होता है, 

तो दूसरा, 

वहां नहीं होने की, 

कोशिश करता है,


शायद, 

पिता-पुत्र नज़दीकी से डरते हैं।

जबकि, 

वो डर नज़दीकी का नहीं है, 

डर है, 

माहौल बिगड़ने का । 


♦️भारतीय पिता ने शायद ही किसी बेटे को, 

कभी कहा हो, 

कि बेटा, 

मैं तुमसे बेइंतहा प्यार करता हूँ...

जबकि वह प्यार बेइंतहा ही करता है।


पिता के अनंत रौद्र का उत्तराधिकारी भी वही होता है,

क्योंकि, 

पिता, हर पल ज़िन्दगी में, 

अपने बेटे को, 

अभिमन्यु सा पाता है ।


♦️पिता समझता है,

कि इसे सम्भलना होगा, 

*इसे मजबूत बनना होगा,* 

ताकि, 

ज़िम्मेदारियो का बोझ, 

इसको दबा न सके । 


♦️पिता सोचता है,

जब मैं चला जाऊँगा, 

इसकी माँ भी चली जाएगी, 

बेटियाँ अपने घर चली जायेंगी,

तब, 

रह जाएगा सिर्फ ये, 

जिसे, हर-दम, हर-कदम, 

परिवार के लिए, अपने छोटे भाई के लिए,

आजीविका के लिए,

बहु के लिए,

अपने बच्चों के लिए, 

*चुनौतियों से, सामाजिक जटिलताओं से, लड़ना होगा ।*


♦️पिता जानता है कि, 

हर बात, 

घर पर नहीं बताई जा सकती,

इसलिए इसे, 

खामोशी से ग़म छुपाने सीखने होंगें ।


♦️परिवार और बच्चों के विरुद्ध खड़ी...हर विशालकाय मुसीबत को, 

अपने हौसले से...दूर करना होगा।


♦️कभी कभी तो ख़ुद की जरूरतों और ख्वाइशों का वध करना होगा । 

इसलिए, 

वो कभी पुत्र-प्रेम प्रदर्शित नहीं करता।


♦️पिता जानता है कि, 

प्रेम कमज़ोर बनाता है ।

फिर कई बार उसका प्रेम, 

झल्लाहट या गुस्सा बनकर, 

निकलता है, 


♦️वो गुस्सा अपने बेटे की

कमियों के लिए नहीं होता,

वो झल्लाहट है, 

जल्द निकलते समय के लिए, 

वो जानता है, 

उसकी मौजूदगी की, 

अनिश्चितताओं को । 


♦️पिता चाहता है, 

कहीं ऐसा ना हो कि, 

इस अभिमन्यु की हार, 

*मेरे द्वारा दी गई,*

*कम शिक्षा के कारण हो जाये...*


♦️पिता चाहता है कि, 

पुत्र जल्द से जल्द सीख ले, 

वो गलतियाँ करना बंद करे,

हालांकि गलतियां होना एक मानवीय गुण है,

लेकिन वह चाहता है कि *उसका बेटा सिर्फ गलतियों से सबक लेना सीख ले।*

सामाजिक जीवन में बहुत उतार चढ़ाव आते हैं, रिश्ते निभाना भी सीखे,


♦️फिर, 

वो समय आता है जबकि, 

पिता और बेटे दोनों को, 

अपनी बढ़ती उम्र का, 

एहसास होने लगता है, 

बेटा अब केवल बेटा नहीं, पिता भी बन चुका होता है, 

कड़ी कमज़ोर होने लगती है।


♦️पिता की सीख देने की लालसा, 

और, 

बेटे का, 

उस भावना को नहीं समझ पाना, 

वो सौम्यता भी खो देता है, 

यही वो समय होता है जब, 

*बेटे को लगता है कि,*

*उसका पिता ग़लत है,* 

बस इसी समय को समझदारी से निकालना होता है, 

वरना होता कुछ नहीं है,

बस बढ़ती झुर्रियां और बूढ़ा होता शरीर जल्द बीमारियों को घेर लेता है । 

फिर, 

*सभी को बेटे का इंतज़ार करते हुए माँ तो दिखती है,* 

पर, 

*पीछे रात भर से जागा,*

*पिता नहीं दिखता,* 

जिसकी उम्र और झुर्रियां, 

और बढ़ती जाती है, बीमारियां भी शरीर को घेर रहीं हैं।


*पिता अड़ियल रवैए का हो सकता है लेकिन वास्तव में वह नारियल की तरह होता है।*


कब समझेंगे बेटे, 

कब समझेंगे बाप, 

     कब समझेगी दुनिया ????


पता है क्या होता है, 

उस आख़िरी मुलाकात में, 

जब, 

जिन हाथों की उंगलियां पकड़, 

पिता ने चलना सिखाया था, 

वही हाथ, 

लकड़ी के ढेर पर पड़े

पिता को 

लकड़ियों से ढकते हैं,

उसे घी से भिगोते हैं, 

और उसे जलाते हैं, *इसे ही पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाना कहते हैं।*


ये होता है,

हो रहा है, 

होता चला जाएगा ।


जो नहीं हो रहा,

और जो हो सकता है,

वो ये, 

कि, 

*हम जल्द से जल्द,*

*कहना शुरु कर दें,*

*हम आपस में,* 

*कितना प्यार करते हैं?*

और कुछ नहीं तो कम से कम घर में हंस के मुस्कुरा कर बात तो की ही जा सकती है,सम्मान पूर्वक।

*समस्त पिता एवं पुत्रो को समर्पित🙏❤️

बाल साहित्य पर हो रहें शोध की सूची- सुरेंद्र विक्रम



हिन्दी बालसाहित्य में मेरी जानकारी के अनुसार इस समय 100 से अधिक शोधार्थी कार्यरत हैं। मैंने इनकी सूची, शोध विषय, विश्वविद्यालय तथा शोध विवरणिका सहित बनाने का प्रयास किया, मगर लाख प्रयत्न के बाद 50 शोधकर्ताओं की सूची ही तैयार कर पाया जिसे मैंने अपनी पुस्तक---हिन्दी बालसाहित्य: शोध के बढ़ते चरण में विस्तार से प्रस्तुत किया है।


शोधकर्ता बीच-बीच में सामग्री के लिए संपर्क करते रहते हैं।शोधार्थियों की सुविधा के लिए पिछले दो वर्षों में अपने उन प्रकाशित आलेखों की सूची विवरण सहित इस पटल पर दे रहा हूँ ताकि वे लाभान्वित हो सकें।

1. हिन्दी बालसाहित्य

      न‌ई धारा : जून-जुलाई 2020

2.कविताओं में बालक

     न‌ई धारा: अक्तूबर-नवंबर 2020

3. हिन्दी बालसाहित्य और भारतीय संस्कृति

     रिमझिम: महात्मा गांधी संस्थान,माॅरीशस की पत्रिका

4. हिन्दी बालसाहित्य और डॉ० रामकुमार वर्मा

   अभिदेशक: जून-अगस्त 2020

5.बहुत उपयोगी हैं हिन्दी में लिखी जीवनियाँ

    सोच-विचार: नवंबर 2020

6.हिन्दी बालसाहित्य: इतिहास के आइने में

    हिन्दुस्तानी: जनवरी-मार्च 2021

7.हिन्दी बालसाहित्य में शोध ( इक्कीसवीं शताब्दी के      प्रारंभ से अब तक) 

    शोध दिशा (अंक 54) अप्रैल- जून 2021

8.हिन्दी बालसाहित्य में शोध ( आरंभ से बीसवीं शताब्दी के अंत तक)

     शोध दिशा ( अंक 56) अक्टूबर-दिसंबर 2021

9.बालसाहित्य के संदर्भ में

   साक्षात्कार: नवंबर-दिसंबर 2020

10.रवीन्द्रनाथ टैगोर का बालसाहित्य

    वीथिका:  सितंबर 2021

11.हिन्दी बालसाहित्य: चुनौतियाँ, संभावनाएँ और भविष्य

   साहित्य अमृत: नवंबर 2021

12.हिन्दी बालसाहित्य की छवियाँ

    आजकल: नवंबर 2021

13.हिन्दी बालसाहित्य: कुछ मेरे अनुभव

   हिन्दी जगत: अक्तूबर-दिसंबर 2021

14.हिन्दी बालसाहित्य: कुछ बिंदु कुछ विचार

     कृतिका: जनवरी-दिसंबर 2021

15.इक्कीसवीं सदी में हिन्दी बालकविता

     साहित्य भारती: अक्तूबर-दिसंबर 2021

#प्रेम और #मोह ..प्रेम..!!!/ ओशो

 


आखिर क्या है यह प्रेम..

और क्या है यह मोह...? 

कितने लोग इसके बीच का फर्क समझते हैं ??


'प्रेम' और 'मोह' यह दो ऐसे शब्द है 

जिनके बीच जमीन और आसमान का फर्क है ..!


अर्थात - प्रेम वह जिसमें पाने की कोई चाह नहीं होती... और मोह वह जो पाने के लिए विवश कर दे ...

जब व्यक्ति किसी इंसान से या किसी भी वस्तु से प्रेम करता है तो उसे पाने के लिए 

न जाने वह क्या-क्या करता है ..

पर असल में वह व्यक्ति की चाहत बन जाती है ....

और चाहत कब मोह का रूप ले लेती है ..

यह व्यक्ति समझ ही नहीं पाता 

और उस पाने की चाह को ही प्रेम समझ बैठता है.. 

किंतु जब हम किसी से सच में प्रेम करते हैं 

तो हम बस उसको खुश देखना चाहते हैं 

उसकी खुशी में ही स्वयं की खुशी ढूंढ लेते हैं..!


मनुष्य की सबसे प्रिय चीज होती है उसकी " स्वतंत्रता "


जब हम किसी व्यक्ति को जिससे हम कहते हैं 

कि हम बहुत प्रेम करते हैं 

उसको बांधने की कोशिश करते हैं ...

उसको समझते नहीं ..

उसको उसकी जिंदगी अपने हिसाब से 

नहीं जीने देते ..

उससे बहुत सी उम्मीदें करते हैं 


परंतु क्या यह सच में प्रेम है ...?


जिससे आप प्यार करते हो उसको पाना ..

अपना बनाना या खुद से बांध कर रखना 

क्या यह प्रेम है ..? 


नहीं असल में यह मोह है ...

इंसान मोह को प्रेम का नाम दे देता है 

क्योंकि जब आप किसी से सच्चा प्यार करते हैं 

तो उसको आजाद छोड़ देते हैं 

क्योंकि आपको उस पर भरोसा होता है 

कि वह व्यक्ति विशेष चाहे कुछ भी करें परंतु 

वह रहेगा आपका ही होकर हमेशा ...


विश्वास है एक ऐसी डोर होती है ..

जो किसी भी रिश्ते के लिए बहुत जरूरी होती है ....

यदि आपको अपने रिश्ते पर भरोसा नहीं होगा तो 

रिश्ता कामयाब नहीं होगा..

अतः यदि प्रेम है तो भरोसा भी करना पड़ेगा 

तभी रिश्ते की डोर मजबूत बनेगी ...!


हम स्वयं क्यों नहीं यह बात आजमा कर देखते .. 

जब वह व्यक्ति जिसे आप प्रेम करते हो 

वह जरूरत से ज्यादा आप को बांधकर रखें 

हमेशा अपनी इच्छाओं का पालन करवाएं 

बजाए आपकी इच्छाओं को महत्व देने के 

और आपसे प्रत्येक क्षण पर सवाल करें 

और उस मोह को प्रेम का नाम दें 

तो कैसा महसूस होता है ..?


बहुत सीधा सा जवाब है 

जाहिर सी बात है हमें पसंद नहीं आता ..क्यों ? 


क्योंकि हमें आजादी की आदत होती है ...

हम सभी को अपनी जिंदगी अपने 

तरह से जीने की आदत होती है 

ठीक उसी प्रकार सामने वाला भी है 

यदि आप उसको सच में प्रेम करते हैं 

तो उसको समझना सीखिए 

उस पर भरोसा करना सीखिए 

जरूरी नहीं आप जिससे प्रेम करो 

उसको अपना बनाओ तभी वह प्रेम है.. 


अतः प्रेम वह है जो निस्वार्थ भाव से किया जाए, 

प्रेम जिससे आप प्यार करो उसकी खुशी ही 

आपके लिए सब कुछ हो वह खुश तो आप खुश...

रिश्ते में मोह होगा तो कभी भी रिश्ता कामयाब नहीं होगा रिश्ता चाहे कोई भी हो 

अगर उसे प्यार के पानी से सिंचा जाएगा 

तभी वह खिलेगा..

मजबूत बनेगा ..

अतः मोह के बंधन में 

बंधा होगा तो टूट जाएगा..!


अतः जिससे आप प्रेम करते हैं, 

उसको स्वतंत्र छोड़ दीजिए 

मोह हट जाएगा तो 


#__प्रेम स्वयं ही बढ़ जाएगा ..!

मेहनत का ज्ञान

 *मेहनती इंसान*

*🕉️🌄🌅शुभ प्रभात🌅🌄🕉️*


एक दुकानदार बड़ा दुखी रहता था। क्यूंकी उसका बेटा बहुत आलसी था। वह अपने पुत्र को एक मेहनती इंसान बनाना चाहता था। एक दिन उसने अपने पुत्र से कहा कि आज तुम घर से बाहर जाओ और शाम तक कुछ अपनी

मेहनत से कमा के लाओ नहीं तो आज शाम को खाना नहीं मिलेगा -

 लड़का पहुत परेशान हो गया वह रोते हुए अपनी माँ के पास गया और उन्हें रोते हुए सारी बात बताई माँ का दिल पासीज गया और उसने उसे एक सोने का सिक्का दिया कि जाओ और शाम को

पिताजी को दिखा देना। शाम को जब पिता ने

पूछा की क्या कमा कर लाए हो तो उसने वो सोने का सिक्का दिखा दिया यह देखकर उसने पुत्र से वो सिक्का कुएँ मे डालने को कहा, लड़के ने खुशी खुशी सिक्का कुएँ में फेंक दिया

 अगले दिन पिता ने माँ को अपने मायके भेज दिया और लड़के को फिर से कमा के लाने को कहा। अबकी बार लड़का रोते हुए बड़ी बहन के पास गया तो बहन दस रुपये दे दिए। लड़के ने फिर शाम को पैसे लाकर पिता को दिखा दिए पिता ने कहा कि जाकर कुएँ में डाल दो लड़के ने फिर डाल दिए।


अब पिता ने बहन को भी उसके ससुराल भेज दिया।

 अब फिर लड़के से कमा के लाने को कहा अब तो लड़के के पास कोई चारा नहीं था वह रोता हुआ बाजार गया और वहाँ उसे एक सेठ ने कुछ लकड़ियाँ अपने घर ढोने के लिए कहा और कहा कि बदले में दो रुपये देगा।

लड़के ने लकड़ियाँ उठाईं और चल पड़ा चलते चलते उसके पैरों में छाले पड़ गये और हाथ पैर भी दर्द करने लगे शाम को जब पिताजी ने फिर कहा की बेटा कुएँ मे डाल दो तो लड़का गुस्सा होते हुए बोला कि मैने इतनी मेहनत से पैसे कमाए हैं और आप कुएँ में डालने को

बोल रहे हैं। पिता ने मुस्कुराते हुए कहा कि यही तो मैं तुम्हें सीखाना चाहता था तुमने सोने का सिक्का तो कुएँ में फेंक दिया लेकिन दो रुपये फेंकने में डर रहे हो क्यूंकी ये तुमने मेहनत से कमाएँ हैं।

अबकी बार पिता ने दुकान की चाबी निकल कर बेटे के हाथ में दे दी और बोले की आज वास्तव में तुम इसके लायक हुए हो क्यूंकी आज तुम्हें मेहनत का अहसास हो गया है।

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

खुसरो की जमीन पर गुलज़ार की कारीगरी / आलोक यात्री



"ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश...//" यानी के खुसरो की जमीन पर गुलज़ार की कारीगरी



  आज एक ऐसे गीत जिसे अक्सर गुनगुनाता, सुनता रहता हूं से, फिर आमना-सामना हो गया। गीत अपने समय में जितना लोकप्रिय था, उतना ही लोकप्रिय आज भी है।‌ लोकप्रिय होने के साथ यह कर्णप्रिय भी है।‌ गीत के बोल काफ़ी अजीब ओ गरीब हैं। फिल्म 'गुलामी' के इस गीत को लिखा गुलज़ार साहब ने है।‌ 

  गीत के बोल "ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश..." का अर्थ मालूम नहीं था। हो सकता है मेरी तरह कई अन्य लोगों को भी "ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश..." का अर्थ शायद न पता हो। लिहाजा "ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश..." पंक्ति का अर्थ जानने की जिज्ञासा हुई। मेरी पड़ताल आगे बढ़े उससे पहले आप उस गीत से रू-ब-रू होइए जिसकी वजह से यह बात छिड़ी है

    "जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश

    बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है

    सुनाई देती है जिसकी धड़कन

    तुम्हारा दिल या हमारा दिल है

वो आके पहलू में ऐसे बैठे

के शाम रंगीन हो गई है

जरा जरा सी खिली तबीयत

जरा सी गमगीन हो गई है

  जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश...

    कभी कभी शाम ऐसे ढलती है

    के जैसे घूँघट उतर रहा है

    तुम्हारे सीने से उठता धुआँ

    हमारे दिल से गुजर रहा है

  जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश...

ये शर्म है या हया है क्या है

नजर उठाते ही झुक गयी है

तुम्हारी पलकों से गिर के शबनम

हमारी आँखों में रुक गयी है

  जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश

  बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है..."


बाकी तो सब ठीक है। गीत भी आला-तरीन है। मामला बस "जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है..." पर ही अटका है। और यही पंक्तियां इस पूरे गीत का शबाब हैं। "जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है..." का मानी न जानते हुए भी यह गीत बार-बार सुनने की इच्छा होती है।

  फारसी की एक अदीब मित्र से "जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है..." का अर्थ पूछा तो उन्होंने इसका अर्थ कुछ यूं बताया -"गरीब की बदहाली को नजरअंदाज न करो"। एक और उस्ताद से जानना चाह तो उन्होंने इन पंक्तियों की तफसील बताते हुए कहा कि "ज़िहाल" का अर्थ होता है -ध्यान देना या गौर फ़रमाना, "मिस्कीं" का अर्थ है -गरीब, "मकुन" के मायने हैं -नहीं और "हिज्र" का अर्थ है -जुदाई। उनके अनुसार इन पंक्तियों का भावार्थ यह निकला कि "मेरे इस गरीब दिल पर गौर फरमाएं और इसे रंजिश से न देखें। बेचारे दिल को हाल ही में जुदाई का ज़ख्म मिला है।"

 लेकिन... इन पंक्तियों का यह अर्थ जान कर भी तस्ल्ली नहीं हुई तो सिरखपाई का यह सिलसिला आगे बढ़ता हुआ अमीर खुसरो तक जा पहुंचा। गुलज़ार साहब के "गुलामी" फिल्म के लिए लिखे गए इस गीत की पंक्तियां असल में अमीर खुसरो की एक कविता से प्रेरित है। जो फारसी और ब्रज भाषा के मिले-जुले रूप में लिखी गई थी। अब जरा अमीर खुसरो के लिखे पर भी गौर फ़रमाया जाए। जिसकी एक पंक्ति फारसी में तो एक ब्रज भाषा में लिखी गई है...

-"ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल

    दुराए नैना बनाए बतियां।

कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऐ जान,

     न लेहो काहे लगाए छतियां।

शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़

वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,

     सखि पिया को जो मैं न देखूं

     तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां।

यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू

ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं,

     किसे पड़ी है जो जा सुनावे

     पियारे पी को हमारी बतियां।


  क्या बेहतरीन प्रयोग किया है अमीर खुसरो ने फारसी और ब्रज भाषा का। "ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, दुराए नैना बनाए बतियां। कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऐ जान, न लेहो काहे लगाये छतियां"... का अर्थ समझते हैं। इसका अर्थ है -"मुझ गरीब की बदहाली को नज़रंदाज़ न करो, नयना चुरा के और बातें बना के।"


  गौरतलब है कि अमीर खुसरो मिजाज और कलाम दोनों से ही सूफियाना तुर्क वंश के खड़ी बोली हिंदी के पहले कवि हैं। मध्य एशिया की लाचन जाति के तुर्क सैफुद्दीन के पुत्र अमीर खुसरो का जन्म सन 652 हिजरी में एटा (उत्तर प्रदेश) के पटियाली नामक कस्बे में हुआ था। लाचन जाति के तुर्क चंगेज खां के आक्रमणों से पीड़ित होकर बलवन (1266 ईस्वी) के राज्यकाल में शरणार्थी के रूप में भारत में आ बसे थे। खुसरो की मां बलबन के युद्धमंत्री इमादुतुल मुलक की लड़की, एक भारतीय मुसलमान महिला थी। सात वर्ष की अवस्था में खुसरो के पिता का निधन हो गया था। खुसरो ने किशोरावस्था में कविता लिखना प्रारम्भ किया और बीस वर्ष के होते-होते वे कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गए। 

  खुसरो ने सामाजिक जीवन की अवहेलना कभी नहीं की। खुसरो ने अपना सारा जीवन राज्याश्रय में ही बिताया। राजदरबार में रहते हुए भी खुसरो हमेशा कवि, कलाकार, संगीतज्ञ और सैनिक ही बने रहे। भारतीय गायन में क़व्वाली और सितार को इन्हीं की देन माना जाता है। इन्होंने गीत की तर्ज पर फ़ारसी में और अरबी ग़जल के शब्दों को मिलाकर कई पहेलियां और दोहे लिखे।

  खुसरो ने दिल्ली वाली बोली अपनाई जिसे कालांतर में ‘हिंदवी’ नाम दिया गया। खुसरो ने सौ के करीब पुस्तकें लिखीं। जिनमें से अब कुछ ही मौजूद हैं। लेकिन उनके गीत, दोहे, कहावतें, पहेलियां और मुकरियां उन्हें आज भी आवाम में जिंदा रखे हुए हैं। कव्वालों की कई पीढ़ियां सदियों से उन्हें गाती आ रही हैं। जीवन के बहुत सारे प्रसंगों में खुसरो रोज़ याद आने वाले कवियों में से एक हैं।

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बुधवार, 19 जनवरी 2022

अकबर इलाहाबादी या अकबर प्रयागराजी / रेहान फ़ज़ल

 


अकबर इलाहाबादी तरक़्क़ी पंसद शायर थे।धर्म,जाति, मज़हब से ऊपर।अपनी न्याय प्रियता के लिए जाने,जाने वाले जज।

उन्होंने कभी सोचा नहीं होगा कि उनकी मौत के सौ साल बाद उनकी पहचान बदल जायगी। वे अकबर इलाहाबादी से अकबर प्रयागराजी हो जायेंगें।किसी व्यक्ति का नाम बदलना उसकी वल्दियत बदलने जैसा है।किसी का नाम बदलना उसकी निजता से खिलवाड़ तो है ही।फिर सोचने वाली बात यह भी है कि आख़िर किसका नाम बदलने की कवायद की गई? अकबर इलाहाबादी का! एक ऐसा शायर जो आज़ाद और प्रगतिशील ख्यालों की जीती जागती इबारत था। अकबर इलाहाबादी कट्टर नहीं थे। दोनों तरफ़ की रूढ़ियों पर उन्होंने हमला किया था।सबकी सुनना और सबको सुनाना उन्हें प्रिय था।

अकबर परंपरावादी थे, लेकिन वे जड़ परंपरावादी नहीं थे। वे मज़हबी थे, लेकिन मज़हबी ईमान के नाम पर चलने वाले पाखंड का मज़ाक उड़ाने से उन्हें कभी गुरेज़ नही था। तभी तो उन्होंने लिखा ‘मेरा ईमान मुझसे क्या पूछती हो मुन्नी/शिया के साथ शिया, सुन्नी के साथ सुन्नी।’   

 

उनकी लेखनी में ऐसा कीमिया था जिसके पास आज के कट्टर होते समाज का मुक़म्मल इलाज था। उन्होंने उस दौर में अपने लेखन में जिस दर्जे की आज़ाद ख्याली दिखाई, आज उसकी कोई कल्पना भी नही कर सकता। यह कल्पना से भी परे है कि आज से सवा सौ साल पहले कोई मुसलमान काबा के बारे में ऐसा लिख सकता था-

 

‘सिधारें शैख़ काबे को हम इंग्लिस्तान देखेंगे 

वो देखें घर ख़ुदा का हम ख़ुदा की शान देखेंगे।’ 

 

वे ऐसा इसलिए लिख सकते थे क्योंकि वे किसी भी तरह की रूढ़ि, तंग ख्याली या फिर संकीर्णता से कोसों दूर थे।उनकी दूरदर्शी आँखों ने आज के समाज की पहचान कोई डेढ़ सौ बरस पहले ही कर ली थी। तभी उन्होंने लिखा- 

 

‘हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम 

वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती।’

 

ये अलग बात है कि उनके चाहने वालों की आह के असर के चलते उनके नाम के क़त्ल की कोशिशों की इस कदर चर्चा हो गई कि नाम बदलने वालों को आखिरकार अपने इरादे बदलने पर मजबूर होना पड़ा। 

 

अकबर इलाहाबादी को इलाहाबाद पर नाज़ था। इलाहाबाद उनकी रगों में दौड़ता था। वे खुद को इस शहर की रूह में धँसा हुआ पाते थे।शायद तभी वे लिख गए-

 

‘कुछ इलाहाबाद में सामाँ नहीं बहबूद के 

याँ धरा क्या है ब-जुज़ अकबर के और अमरूद के।’

 

यानि इस इलाहाबाद में उनके और अमरूद के सिवा और क्या है? इस कदर वे इलाहाबाद  के साथ एकात्म हो चुके थे कि अपने वजूद को इस शहर के वजूद में घुला हुआ पाते थे।अकबर की इलाहाबाद से और इलाहाबाद की अकबर से पहचान हो गयी।ऐसे में इलाहाबाद को उनके नाम से अलगाना अन्याय होगा। 

इसी इलाहाबाद के बारा क़स्बे में जन्मे अकबर के वालिद तफ़ज़्ज़ुल हुसैन नायब तहसीलदार थे। आरंभिक शिक्षा घर पर हुई।आठ नौ बरस की उम्र में उन्होंने फ़ारसी और अरबी की पाठ्य पुस्तकें पढ़ लीं। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की वजह से उनको स्कूल छोड़कर पंद्रह साल की ही उम्र में नौकरी तलाश करनी पड़ी। उसी कम उम्र में उनकी शादी भी हो गई। उनकी बेगम ख़दीजा ख़ातून एक देहाती लड़की थीं।उनसे उनकी बनी नही। 

 

अपनी अलग ही बेख्याली की दुनिया में डूबे अकबर ने इलाहाबाद की तवाएफ़ों के कोठों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। कहते हैं कि इलाहाबाद की शायद ही कोई ख़ूबसूरत और दिलकश तवायफ होगी, वे जिसके ठौर से न गुजरे हों। वे एक तवायफ बूटा जान के इश्क में भी पड़े और उससे शादी भी कर ली। लेकिन उसका जल्द ही इंतक़ाल हो गया जिसका उन्हें गहरा सदमा रहा। उसी ज़माने में उन्होंने अंग्रेज़ी में कुछ महारत हासिल की और 1867 ई. में वकालत का इम्तिहान पास कर लिया। फिर जजी का लंबा दौर चला और आखिर साल 1905 ई. में वो सेशन जज के ओहदे से रिटायर हुए। फिर बाक़ी ज़िंदगी इलाहाबाद में गुज़ारी।उन्होंने अदालत की कार्यवाहियों के बहाने जिंदगी को बेहद करीब से देखा और समझा, जिसकी झलक उनकी शायरी में  दिखाई देती रही। वकीलों की बाबत लिखा उनका ये शेर उनके इसी भोगे हुए यथार्थ  का आइना था-

 

‘पैदा हुआ वकील तो शैतान ने कहा 

लो आज हम भी साहिब-ए-औलाद हो गए।’

 

वे दुनिया की कड़वी सच्चाइयों से वाकिफ थे, मगर दुनियादारी से दूर थे। उनके शेरों में उनकी इस शख्सियत की मिसाल मिलती है। उन्होंने इस बाबत लिखा भी-

 

‘दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ

बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ।’

 

अकबर इलाहाबादी अगर आज होते तो नाम बदलने की इस कोशिश पर आदतन ही कोई लतीफ़ा पढ़ते और शायद एक बार फिर से अपना यही शेर दोहरा देते-

 

‘मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं 

फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं।’

 

अकबर ने उर्दू की एक पत्रिका भी निकाली।यानी वे सम्पादक की क़तार में भी शुमार हुए।पत्रकार रहते हुए पत्रकारिता के गिरते स्तर पर उनकी चोट देखिए। 


“ चोर के भाई गिरहकट तो सुना करते थे 

अब ये सुनते हैं एडिटर के बरादर लीडर“


अकबर परंपराओं के नाम पर कूढ़मगज़ी के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने इसकी मुख़ालिफ़त की शुरूआत अपने मज़हब में फैली बुराइयों को निशाना बनाते हुए की। खासकर औरतों के मामले में वे उन्हें पर्दे के पीछे रखने या फिर दोयम दर्जा देने की दक़ियानूसी सोच के 

खिलाफ थे। उनकी तरक्की पसंद शायरी में आज का नारी स्वातन्त्र्य आन्दोलन समाया हुआ था जो आज के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की बानगी है। परदे, घूंघट, बुरके को महिलाओं की तरक्की की राह का पत्थर बताते हुए वे आज से सवा सौ साल पहले लिख गए-  

 

‘बेपर्दा नज़र आईं जो कल चंद बीवियां

अकबर ज़मीं में हैरते क़ौमी से गड़ गया

पूछा जो उनसे आपका परदा वो क्या हुआ

कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दों की पड़ गया।’

 

औरतों को पर्दे में रखने के हिमायती मर्दों को उन्होंने सिलसिलेवार तरीके से बेनकाब करने का अभियान जारी रखा।इस बाबत सवाल उठाते हुए उन्होंने यहां तक पूछा-

 

‘बिठाई जाएंगी परदे में बीबियां कब तक 

बने रहोगे तुम इस मुल्क में मियां कब तक।’

 

‘मियां से बीबी हैं, परदा है उनको फ़र्ज़ मगर 

मियां का इल्म ही उट्ठा तो फिर मियां कब तक।’

 

अकबर इलाहाबादी एक ऐसी दुनिया का तसव्वुर करते थे जो बुद्धि और तर्क की नींव पर बनी हो। जहां किसी भी तरह की कट्टरता या संकीर्ण सोच की कोई जगह न हो।जहां खुलकर सवाल पूछे जाएं और नए विचारों के लिए हमेशा जगह बनी रहे। उन्होंने ऐसे ही एक बार  चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को भी सवालों के कटघरे में खड़ा किया-

 

‘डार्विन साहब, हकीकत से निहायत दूर थे

हम न मानेंगे कि मूरिस(पूर्वज) आपके लंगूर थे।’

 

अकबर इलाहाबादी की प्रगतिशील सोच का ये आलम था कि वे भाषा के प्रयोग में भी किसी भी तरह की कट्टरता को बर्दाश्त नही करते थे। उस दौर में मुस्लिम कट्टरपंथी उर्दू ज़ुबान की शुद्धता के हिमायती थे। वे इस बात को बर्दाश्त नही कर सकते थे कि उर्दू की शेरो शायरी में कोई दूसरी ज़ुबान के शब्द पिरोए जाएं। मगर अकबर इलाहाबादी ने इस सोच से खुलकर बगावत की। उन्होंने ऐसे कट्टर शुद्धतावादियों को ठेंगा दिखाते हुए उर्दू शायरी में अंग्रेज़ी शब्दों का पहले पहल और जमकर इस्तेमाल किया।उर्दू शायरी में अंग्रेज़ी के प्रयोग की उनकी पहल ने शायरी की दुनिया में बवंड़र ला दिया। शुद्धतावादियों ने बहुत हो हल्ला काटा पर अकबर टस से मस न हुए। उनके इस तरह के कुछ प्रयोग देखिए-

 

‘लिपट जा दौड़ के 'अकबर' ग़ज़ब की ब्यूटी है

नहीं नहीं पे न जा, ये हया की ड्यूटी है।’

 

‘कोट और पतलून जब पहना तो मिस्टर बन गया 

जब कोई तक़रीर की जलसे में लीडर बन गया।’

 

‘मैं भी ग्रेजुएट हूँ तुम भी ग्रेजुएट 

इल्मी मुबाहिसे हों ज़रा पास आ के लेट।’

 

अंग्रेजी ही नही, बल्कि उन्होंने हिंदी की भी जमकर हिमायत की और हिंदी के विरोधियों को भी कटघरे में खड़ा किया।उन्होंने लिखा-

 

‘दोस्तों तुम कभी हिंदी के मुख़ालिफ़त न बनो।

बाद मरने के खुलेगा कि ये थी काम की बात।’

 

आईसीएस अफ़सरों के लिए लोगों की उतावली को देखते हुए। उनका शेर देखिए।  


शौके लैलाए सिविल सर्विस ने मुझ मज़नू को 

इतना दौड़ाया लंगोटी कर दिया पतलून को ।।


हमें उनकी तरक्की पसंद सोच से सीख लेनी चाहिए। अकबर इलाहाबादी की यही ताकत  है कि वे जितने प्रासंगिक अपने दौर में थे, उससे कहीं ज्यादा प्रासांगिक आज हो चले हैं। वे गजब की ज़िंदादिल शख्सियत थे। उनके क़िस्से बेहद मशहूर हैं। इन क़िस्सों में उनकी हाज़िर जवाबी और मौके से फूट पड़ने वाली सहज शायरी मिसालें हैं। इलाहाबाद से जुड़ा उनका एक ऐसा ही मशहूर क़िस्सा है। एक बार गायिका गौहर जान जानकी बाई के साथ ठहरी थीं। रुखसती के वक़्त  उन्होंने अपनी मेज़बान से कहा कि, “मेरा दिल ख़ान बहादुर सय्यद अकबर इलाहाबादी से मिलने को बहुत चाहता है।” मेजबान जानकी-बाई ने कहा कि, “आज मैं वक़्त मुक़र्रर कर लूंगी, कल चलेंगे।”

 

अगले दिन दोनों अकबर इलाहाबादी के यहाँ जा पहुँचीं। जानकी-बाई ने तआ’रुफ़ कराया और कहा, ‘ये कलकत्ता की निहायत मशहूर-ओ-मा’रूफ़ गायिका गौहर जान हैं। आपसे मिलने का बेहद इश्तियाक़ था, लिहाज़ा इनको आपसे मिलाने लायी हूँ ‘।

 

अकबर इलाहाबादी ने जवाब दिया, “ज़ह-ए-नसीब, वर्ना मैं न नबी हूँ न इमाम, न ग़ौस, न क़ुतुब और न कोई वली जो क़ाबिल-ए-ज़यारत ख़्याल किया जाऊं। पहले जज था अब रिटायर हो कर सिर्फ अकबर रह गया हूँ। हैरान हूँ कि आपकी ख़िदमत में क्या तोहफ़ा पेश करूँ। ख़ैर एक शे’र बतौर यादगार लिखे देता हूँ।”

 

ये कह कर मुंदरजा ज़ैल शे’र एक काग़ज़ पर लिखा और गौहर जान के हवाले किया।

 

‘ख़ुशनसीब आज भला कौन है गौहर के सिवा

सब कुछ अल्लाह ने दे रखा है शौहर के सिवा।’

 

उनकी इसी हाज़िरजवाबी ने उनके क़द्रदानों की अच्छी खासी फौज जमा कर दी थी। उनकी पहली नौकरी भी इसी हाज़िरजवाबी की देन थी। उस वक्त वे मैट्रिक पास थे। अट्ठारह साल का नौजवान अकबर हुसैन रिज़वी अर्ज़ी-नवीस की नौकरी की तलाश में अपनी अर्ज़ी लेकर कलक्टर साहब के पास उनके किसी दोस्त का सिफ़ारिशी ख़त लेकर गया.। कलक्टर साहब ने उसकी अर्ज़ी और अपने दोस्त का ख़त लेकर अपने कोट की जेब में रखकर उसे एक हफ़्ते बाद मिलने के लिए कहा। एक हफ़्ते बाद जब अकबर हुसैन ने पहुंचकर कलक्टर साहब को सलाम किया तो वो उसे देखकर बोले –

 

‘तुम्हारी अर्ज़ी मैंने कोट की जेब में तो रक्खी थी पर वो कहीं गुम हो गयी। ऐसा करो, तुम मुझे दूसरी अर्ज़ी लिखकर दे दो।’

 

अगले दिन अकबर हुसेन अख़बार के पन्ने की साइज़ की अर्ज़ी लिखकर कलक्टर साहब के पास पहुंचा। कलक्टर साहब ने हैरानी और नाराज़ी के स्वर में पूछा — ‘ये क्या है?’ अकबर हुसैन ने बड़े अदब से जवाब दिया — ‘हुज़ूर, ये अर्ज़ी-नवीस की नौकरी के लिए मेरी अर्ज़ी है। आपकी जेब में यह गुम न हो जाय इसलिए इसको इतने बड़े कागज़ पर लिखकर लाया हूँ।कलक्टर साहब अकबर हुसैन के जवाब से इतने खुश हुए कि उन्होंने उसे फ़ौरन अर्ज़ी-नवीस की नौकरी दे दी। 

 

अकबर इलाहाबादी तालीम के जमकर हिमायती थे मगर उनकी नज़र में तालीम डिग्रियों का कोई कारख़ाना नही थी। इसीलिए वे डिग्री की धौंस दिखाने वालों को हमेशा ही क़ाबू में रखते थे। एक हजरत उनके घर पहुंचे। उनके पास अंग्रेजी में छपा विजिटिंग कार्ड था जिसमें नीचे फाउंटेन पेन से लिखा था बीए पास। वे अकबर साहब के घर में विजिटिंग कार्ड भेजकर इंतजार करने लगे। थोड़ी देर में अंदर से एक पर्ची आई। उसमें लिखा था-

 

‘शेख जी निकले न घर से और ये फरमा दिया

आप बीए पास हैं तो बंदा बीवी पास है।’

 

अकबर इलाहाबादी देखते ही देखते अदब की दुनिया का चमकता सितारा बन चुके थे। उनके लिए जिंदगी ज़िंदादिली का दूसरा नाम थी। उनके लतीफ़ों की चर्चा हर तरफ थी। ऐसे में कई ऐसे भी लोग थे जिन्होंने खुद को उनका उस्ताद घोषित कर दिया। ऐसे ही एक शख्स हैदराबाद में थे। जब अकबर तक ये खबर पहुँची कि  हैदराबाद में उनके एक उस्ताद का ज़ुहूर हुआ है, तो कहने लगे, “हाँ मौलवी ‎साहब का इरशाद सच है। मुझे याद पड़ता है मेरे बचपन में एक मौलवी साहब इलाहाबाद में ‎थे। 

 

‘वो मुझे इल्म सिखाते थे और मैं उन्हें अ’क़्ल, मगर दोनों नाकाम रहे। न मौलवी साहब ‎को अ’क़्ल आई और न मुझको इल्म।”‎

 

एक बार अकबर इलाहाबादी से उनके एक दोस्त मिलने आए। अकबर ने पूछा, “कहिए आज ‎इधर कैसे भूल पड़े।” उन्होंने जवाब दिया, “आज शब-ए-बरात है। लिहाज़ा आपसे शबराती ‎लेने आया हूँ।” अकबर इलाहाबादी ने ऐसा जवाब दिया, कि वे लाजवाब हो गए- 

 

‘तोहफ़ा-ए-शबरात तुम्हें क्या दूँ‎

जान-ए-मन तुम तो ख़ुद पटाखा हो।’

 

उनकी पैनी दृष्टि छोटी से छोटी और आमफहम चीज़ तक जाती थी और वे उसमें भी शायरी की संभावनाएं खोज लेते थे। उन दिनो दाढ़ी मुंडवाने का रिवाज हिंदुस्तान में आ’म था। लेकिन लार्ड कर्ज़न जब हिंदुस्तान आए तो ‎उनकी देखा-देखी मूँछ भी सफ़ाया होने लगी। अकबर इलाहाबादी की कलम ने इस नए रिवाज़ को भी नही बख्शा। उन्होंने लिखा-  

 

‘कर दिया कर्ज़न ने ज़न मर्दों को सूरत देखिए ‎

आबरू चेहरे की सब फ़ैशन बनाकर पोंछ ली ‎

सच ये है इंसान को यूरोप ने हल्का कर दिया ‎

इब्तिदा डाढ़ी से की और इंतिहा में मूँछ ली।’

 

उनके लिए शायरी का कोई अलग वक्त मुक़र्रर न था बल्कि ये रोज़मर्रा की ज़िंदगी और घटनाओं से उपजती थी।एक बार अकबर इलाहाबादी दिल्ली में ख़्वाजा हसन निज़ामी के यहाँ मेहमान थे। सब लोग खाना खाने ‎लगे तो आलू की तरकारी अकबर को बहुत पसंद आयी। उन्होंने ख़्वाजा साहबकी दुख़्तर हूर ‎बानो से (जो खाना खिला रही थी) पूछा कि बड़े अच्छे आलू हैं, कहाँ से आए हैं? ‎उसने जवाब दिया कि मेरे ख़ालू बाज़ार से लाए हैं। इस पर अकबर ने ये शे’र पढ़ा-

 

‘लाए हैं ढूंढ के बाज़ार से आलू अच्छे ‎

इसमें कुछ शक नहीं हैं हूर के ख़ालू अच्छे।’


 

1907 ई. में फ़िरंगी सरकार ने अकबर को “ख़ान बहादुर” का ख़िताब दिया और उनको इलाहाबाद युनिवर्सिटी का फ़ेलो भी बनाया गया। 9 सितंबर 1921 ई. को इस महान शायर का इंतकाल हो गया। सोचने वाली बात यह है कि जिस शिक्षा विभाग को चाहिए था कि वो अकबर इलाहाबादी के तरक्की पसंद विचारों से हर तालिबे इल्म के ज़ेहन को रौशन करने की कवायद करे, उसने उनका नाम ही बदल डाला। हालाँकि अगर अकबर इलाहाबादी आज होते तो नाम बदलने पर हुए इस हंगामे का भी मज़ा लेते और अपनी मशहूर ग़ज़ल के चंद शेर पढ़ देते-

 

‘हंगामा है क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है

डाका तो नही डाला, चोरी तो नही की है।’

 

अकबर इलाहाबादी आज भी हमारे बीच मौजूद हैं। अपनी लिखे के जरिए। अपने विचारों के जरिए। अपनी सोच के जरिए।उनकी सोच जो हमें सिखाती है कि नाम बदलने से इतिहास नही बदलता।समय नाम बनाने वालों का इस्तक़बाल करता है और इसीलिए इलाहाबाद रहे न रहे अकबर इलाहाबादी का नाम इतिहास में अमर रहेगा।  


जय जय

मुक़ाबला / कृष्ण मेहता

 🐃मुसीबत का सामना🐃 जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था , तभी एक  बछड़े (पाड़ा) ने पुछा , ” पिताजी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है ...