पोस्ट

2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दो लघुकथाएँ

 मेरी दो लघुकथाएं रोटी । मार्स स्टूडियो ने स्वरबद्ध की है। दोनों लघुकथाएं लॉकडाउन के दौरान मजदूर पलायन के समय व्याप्त माहौल पर लिखी गई थी। प्रस्तुत है।  कथा  एक।  : रात गहरा गई थी। सड़क पर चलते-चलते बहुत दिन हो गए थे। कुछ पक्का पता भी नहीं था। बस यही याद है कि चलते  समय रात को चांद इतना बड़ा नजर नहीं आता था। पर अब तो आसमान पर थाली सा, गोलाकार उदास चांद अटका हुआ था।  घर अभी दूर था। रास्ते समझ में भी नहीं आ रहे थे। बस सर्पीली सड़कें जिधर मुड़ती थी, वे मुड़ जाते थे। दिन में भी शहर और गाँव,  सोए-सोए लगते थे। पर एक सैलाब साथ था। उन्हीं की तरह आंशकित और सहमा हुआ, उसी से थोड़ी हिम्मत मिलती थी।                         वो अकेली नहीं थी। साथ में पति और छोटा बच्चा भी था। रात को चलते-चलते, सड़क के किनारे एक पेड़ से साईकिल टिकाकर वहीं जमीन पर लेट गए थे। साइकल के पीछे गृहस्थी का सामान बंधा हुआ था। खाने को आज कुछ नहीं था। पति को कुछ देर भूख लगी। पर फिर थकान ने भूख पर विजय पाई और वो सो गया। बच्चा, दिन भर साईकिल के डंडे पर बैठा रहता था। सो उतना नहीं थका था। उसे भूख लग रही थी। ‘माँ, भूख लग रही है। रोटी दे न।’  

जो हरि इच्छा

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳/💐 हरि_इच्छा*💐💐 प्रस्तुति - कृष्णा  मेहता  एक बार भगवान विष्णु गरुड़जी पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर जा रहे थे। रास्ते में गरुड़जी ने देखा कि एक ही दरवाजे पर दो बारातें ठहरी थीं। मामला उनके समझ में नहीं आया, फिर क्या था, पूछ बैठे प्रभु को।  गरुड़जी बोले ! प्रभु ये कैसी अनोखी बात है कि विवाह के लिए कन्या एक और दो बारातें आई हैं। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ रहा है, प्रभु बोले- हाँ एक ही कन्या से विवाह के लिए दो अलग-अलग जगह से बारातें आई हैं।  एक बारात पिता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है, और दूसरी माता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है। यह सुनकर गरुड़जी बोले- आखिर विवाह किसके साथ होगा ?  प्रभु बोले- जिसे माता ने पसन्द किया और बुलाया है उसी के साथ कन्या का विवाह होगा, क्योंकि कन्या का भाग्य किसी और के साथ जुड़ा हुआ है,,,, भगवान की बातें सुनकर गरुड़जी चुप हो गए और भगवान को बैकुंठ पर पहुँचाकर कौतुहल वश पुनः उसी जगह आ गए जहाँ दोनों बारातें ठहरी थीं।            गरुड़जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं माता के बुलाए गए वर को यहाँ से हटा दूँ तो कैसे विवाह संभव होगा, फिर क्य

कुछ कविताएं

 उसने फैला ली ना सनसनी , /.विवेक रंजन श्रीवास्तव  उत्तेजना और उन्माद ! एक ही धर्मस्थल पर  हरे और भगवे झंडे  लहराकर !  पता नही इससे ,   मिले कुछ वोट या नही !   पर हाँ  आम आदमी की सुरक्षा और समाज में शांति व्यवस्था के नाम पर  हमारी मेहनत के करोड़ो रुपये  व्यर्थ बहाये हैं  , तुम्हारे इस जुनून के एवज में ! बंद रहे हैं स्कूल और कालेज  और नही मिल पाई उस दिन  गरीब को रोजी ,  क्योकि ठप्प थी प्रशासनिक व्यवस्था ! टीवी चैनल इस आपाधापी को  ब्रेकिंग न्यूज बनाकर , विज्ञापनो के जरिये  रुपयो में तब्दील कर रहे थे . मेरी अलमारी में रखी  कुरान , गीता और बाइबिल  पास पास यथावत साथ साथ शांति से रखी थीं .  सैनिको के बैरक में बने एक कमरे के धर्मस्थल में  विभिन्न धर्मो के प्रतीक भी , सुबह वैसे ही थे , जैसे रात में थे .   पर इस सबमें  सबसे बड़ा नुकसान हुआ मुझे  जब मैंने अपने किशोर बेटे  की फेसबुक पोस्ट देखी  जिसमें उसने  उलझे हुये नूडल्स को  धर्म निरूपित किया , और लिखा  कि उसकी समझ में धर्म ऐसा है , क्या फिर भी हमें   धार्मिक होना चाहिये ?  मैं अपने बेटे को धर्म की  व्याख्या समझा पाने में असमर्थ हूं ! तुमने धर्म

रॉन्ग नंबर/ चित्रगुप्त

 रॉन्ग नंबर / चित्रगुप्त  ********** ट्रेंग ट्रेंग..... अननोन नंबर देखकर थोड़ा सोचा फिर फोन उठा लिया।  "हेलो...." "इत्ती देर से फोन कर रही हूँ आखिर उठा काहे नहीं रहे थे? किसी नजारे को देखने में मगन थे क्या?" "अनजान नंबर से काल आ रही थी तो......"  बात पूरी होने से पहले ही काट दी गई-- "इसका मतलब मेरा नंबर भी सेव नहीं है क्या तुम्हारी मोबाइल में...? तुम्हें क्या तुम्हें तो अपनी सीता गीता रीता से फुरसत मिले तब न...जनाब के मोबाइल में दुनिया जहान का नंबर सेव रहता है बस बीवी का ही नंबर नहीं रहता.... तुम बाकी छोड़ो ये तो घर आओ फिर निपट लूँगी... सामान नोट करो वो लेकर आ जाना" मैडम  का जोश मिनट दर मिनट बढ़ता ही जा रहा था। "जी बोलिये..." "बड़ा जी जी कर रहे हैं आज फिर चढ़ा ली क्या..." इस बार तिलमिलाहट में दांत पीसने की आवाज भी सुनी जा सकती थी। "जी..." " रहोगे अपनी मां की तरह ढपोरशंख ही, जैसे वो दिन भर राम राम करती फिरती हैं लेकिन खटमल की तरह खून पीने का एक भी मौका नहीं छोड़ती...हुंह तुम सामान लिखो और लेकर घर आओ फिर बताती हूँ।"

संजीव शुक्ला का एक व्यंग्य

 अपना एक व्यंग्य निवाण टाइम्स में।/ संजीव शुक्ला  जुझारूलाल प्रवक्ता बनना चाह रहे थे। यह उनकी दिली तमन्ना थी, बल्कि उनका तो खुला मानना था कि क्षेत्र की जनता और पार्टी का बहुमत भी उनको प्रवक्ता के रूप में देखना चाहता है। इस पद के लिए वह अपने को सर्वथा उपयुक्त व्यक्ति मानते थे, पर उनका दुर्भाग्य देखिये कि पार्टी के शीर्ष गुट में उनके सब विरोधी जमे थे। क्या जीवन व्यर्थ ही जायेगा यह चिंता उन्हें दिन-रात खाए डाल रही थी। प्रवक्ताई का आकर्षण उन्हें तबसे अपने में दबोचे हुए है जबसे उन्होंने मीडिया वालों को प्रवक्ता से महज एक बाइट के लिए माइक और कैमरे के साथ गिरते-पड़ते दौड़ते देखा है। पत्रकारों-मीडियाकर्मियों का प्रवक्ता से साक्षात्कार हेतु घण्टों राह तकना और फ़िर अचानक उनके कार्यालय से प्रकट होने का अंदाज़ उन्हें घायल कर जाता!! यह पद उन्हें पार्टी के शीर्ष-नेतृत्व से भी ज़्यादा आकर्षित करता। कारण वह किसी पचड़े में .....…...  नेतृत्व की जिम्मेदारी सबको साथ लेकर के चलने की होती है। वह अपनी ऊर्जा सबको मनाकर साथ रखने में नहीं खर्च करना चाहते थे।  उनका स्पष्ट मानना था कि वह इसके लिए नहीं बने हैं। उनकी मे

सुरेश कांत की नजर में व्यंग्य

 दोस्तो, हास्य और व्यंग्य के संबंध में बहुत-से विचार आए। उनमें कुछ व्यवस्थित और मौलिक भी थे, जैसे जयप्रकाश पांडेय जी के विचार। मेरे भी इस संबंध में कुछ विचार हैं, जिनसे आपका सहमत होना बिलकुल भी आवश्यक नहीं है। मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि फेसबुक पर आते ही मेरे विचारों को व्यंग्यकार विभिन्न मंचों पर अपने विचारों के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं। इससे मुझे अपने विचारों के सही होने की पुष्टि मिलती है।    बहरहाल, अपने विचार प्रस्तुत करने से पहले मैं उनकी पूर्वपीठिका या नींव के रूप में कुछ बिंदु प्रस्तुत करूँगा। 1. हास्य व्यंग्य का सहोदर है। ‘सहोदर’ का मतलब ‘भाई’ होता है, लेकिन सिर्फ ‘भाई’ नहीं होता, बल्कि एक ही माता के उदर को साझा करने वाला (सह+उदर) ‘सगा भाई’ होता है। इसीलिए दोनों में कुछ साम्य मिलते हैं, जिनसे भ्रमित होकर कुछ लोग दोनों को एक ही समझने तक की गलती कर बैठते हैं। आखिर, जुड़वाँ न होने पर भी भाइयों की शक्ल आपस में काफी मिलती-जुलती है। एक माँ की संतान जो ठहरे!    2. हास्य व्यंग्य का सगा भाई ही नहीं है, बल्कि उसका ‘अग्रज’ भी है, इसलिए वह व्यंग्य पर अकसर हावी होने, उस पर अपना

पहले मैं.....

 "पहले मैं ही जाऊंगी" सुनो, हर वक्त,  पहले तुम पहले तुम करते हो ना, जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना, तब भी पहले मैं ही जाऊंगी.... मुझे आदत नहीं बिल्कुल, तुम बिन रहने की... जिंदगी के सारे दर्द, अकेले सहने की.... सुनो, हर सांस  साथ निभाया है ना तुमने.. जब सांस टूटने लगे ना, तो पहले मैं ही जाऊंगी... जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना, तब भी पहले मैं ही जाऊंगी... सुनो, इस आंगन में,  तुम ही लेकर आए थे.. इस आंगन से, तुम ही लेकर जाना.... साथ निभाया तो, है अब तक तुमने... अंत तक तुम ही साथ निभाना... तेरे साथ ही,  इस आंगन में आई थी... तेरे साथ ही,  इस आंगन से जाऊंगी..... जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना, तब भी पहले मैं ही जाऊंगी... जिंदगी बाहों में ही गुजारी है तेरे, मौत भी बाहों में ही आएगी... पहली बार तुमने ही मांग भरी थी ना, अंतिम बार भी, तेरे हाथों से ही भरी जाएगी... सुनो, हर बात तुम्हारी मानी है, इसमें एक भी नहीं मानूंगी.... जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना, तब भी पहले मैं ही जाऊंगी....        रीना झा शर्मा ©®.

पहले सी बात नहीं / महाकवि अज्ञात

जाने क्यूँ,* *अब शर्म से,* *चेहरे गुलाब नहीं होते।* *जाने क्यूँ*, *अब मस्त मौला *मिजाज नहीं होते।* *पहले बता दिया करते थे*,  *दिल की बातें*, *जाने क्यूँ,अब चेहरे,* *खुली किताब नहीं होते।* *सुना है,बिन कहे,* *दिल की बात, समझ लेते थे* *गले लगते ही,* *दोस्त,* *हालात समझ लेते थे।* *तब ना फेस बुक था,* *ना स्मार्ट फ़ोन*, *ना ट्विटर अकाउंट,* *एक चिट्टी से ही,* *दिलों के जज्बात, समझ लेते थे।* *सोचता हूँ,* *हम कहाँ से कहाँ*  *आ गए,* *व्यावहारिकता सोचते सोचते,* *भावनाओं को खा गये।* *अब भाई भाई से*, *समस्या का *समाधान,कहाँ पूछता है,* *अब बेटा बाप से,* *उलझनों का निदान,* *कहाँ पूछता है* *बेटी नहीं पूछती,* *माँ से गृहस्थी के सलीके,* *अब कौन गुरु के*, *चरणों में बैठकर*, *ज्ञान की परिभाषा सीखता है।* *परियों की बातें,* *अब किसे भाती है,* *अपनों की याद*, *अब किसे रुलाती है,* *अब कौन,* *गरीब को सखा बताता है,* *अब कहाँ,* *कृष्ण सुदामा को गले लगाता है* *जिन्दगी में,* *हम केवल *व्यावहारिक हो गये हैं,* *मशीन बन गए हैं हम सब,*   *इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!....*             🙏 😊😊😊

बेचन मामा

 कहानी -बेचन मामा / सीमा. मधुरिमा  मुन्नी पॉँच साल की होगी ज़ब पहली बार अपने मामा के घर गयी या यूँ कहे उसे मामा के घर भेज दिया गया उसकी माँ द्वारा l ज़ब वो तीन साल की थी तभी उसे उसके दो और बड़े भाईयों  के साथ अपनी बड़ी अम्मा के यहाँ पढ़ने के उद्देश्य से भेज दिया गया था ....या कहा जा सकता है कि उसके माता पिता कि मजबूरी थी क्योंकि उसके पिता वन विभाग में नौकरी करते थे तो उनका सरकारी आवास भी लखीमपुर स्थिति खटीमा रेंज में सुरई नामक स्थान पर था जहाँ मुन्नी के अब दो जुड़वे भाई बहन भी हो गए थे जिससे मुन्नी की माँ का ध्यान मुन्नी पर कम ही हो पाता ऐसे में मुन्नी एक बार जंगल में खोते खोते बची l माँ बिलकुल ही डर गयीं और पिता ने मुन्नी के दोनों बड़े भाईयों सँग मुन्नी को अपने बड़े भाई भाभी के घर शहर में पढ़ने के उद्देश्य से भेज दिया l मुन्नी तीन साल में ही माँ से दूर हो गयी l बड़ी अम्मा के घर में कई और चचेरे भाई बहन थे l मुन्नी को भी एक स्कूल में दाखिला दे दिया गया l मुन्नी अक्सर माँ के प्रेम को तरस जाती l स्कूल जाती तो अक्सर अपने साथियों के टिफिन चुरा के खा जाती l मुन्नी शायद चोरी का मतलब तो उस उम्र में जानत

समय के साथ बदलाव

 एक रशियन यहूदी को इजरायल में बसने का परमिशन मिला मॉस्को हवाई अड्डे पर कस्टम अधिकारियों ने उसके थैले में लेनिन की मूर्ति देखी तो पूछ बैठा, 'ये क्या है ? उसने कहा, 'ये क्या है ?, कॉमरेड ये गलत सवाल है, आपको पूछना चाहिये था कि ये कौन है, ये कॉमरेड लेनिन हैं जिन्होंने सोशलिज्म की बुनियाद रखी और रूस के लोगो का भविष्य उज्ज्वल किया, मैं इसे अपने साथ, अपने "यादगार हीरो" की तरह ले जा रहा हूं  रशियन कस्टम अधिकारी थोड़ा शर्मिंदा हुये और आगे बगैर किसी जांच के उसे जाने दिया .... तेल अवीव एयरपोर्ट पर इजरायल के कस्टम अधिकारी ने पूछा, 'ये क्या है ?' उसने कहा, 'ये क्या है ? ये गलत सवाल है श्रीमान, आपको पूछना चाहिये था, ये कौन है ? ये लेनिन है, ऐसा हरामखोर दोगला का औलाद जिसने मुझे यहूदी होने के कारण,रूस छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मैं अपने साथ उसकी मूर्ति इसलिये लाया ताकि रोज, जब भी इस चूतिये पर नजर पड़े, इसकी मां-बहन एक कर सकूं'' इजरायली कस्टम अधिकारी ने कहा, 'आपको मैंने कष्ट दिया उसके लिये माफी चाहता हूं, आप इसे अपने साथ ले जा सकते हैं' इजरायल में जब वो अपने नय

धूमिल नहीं हो सकती धूमिल की यादें / कबीर up

 यादों में धूमिल धूमिल का आज जन्म दिन है । उन्होंने निराला और मुक्तिबोध की तरह केवल अभिव्यक्ति के खतरे नही  उठाये , कविता को साहसिक बनाया । उन्होंने कविता में लोक मुहावरों और खाटी भाषा का उपयोग किया । आम आदमी की आवाज में कविताएं लिखी ।   धूमिल की कविता हिंदी कविता का प्रस्थान बिंदु है । उन्होंने हिंदी कविता के सौंदर्यबोध को बदलने की कोशिश की है । उनके बाद के कवियों ने उनकी कविता की खूब नकल की , और पकड़े भी गए । उन्होंने प्रजातन्त्र की विफलताओं और अंतर्विरोध को उजागर किया ।   उनकी कविता आज के समय में ज्यादा प्रासंगिक है ।  उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि वे अभी लिखी गयी है ।  उनकी बहुपठित कविता को ही देखिए -एक आदमी रोटी बेलता है /एक आदमी रोटी खाता है /एक तीसरा आदमी भी है / जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है / वह सिर्फ रोटी के साथ खेलता है /यह तीसरा आदमी कौन है?/ मेरे देश की संसद मौन है ।     यह आकस्मिक नही है कि उनके कविता संग्रह का नाम संसद से सड़क तक , है । उनकी कविताएं संसद में बैठे हुए विधाताओं को चुनौती देती है , उनसे प्रश्न पूछती हैं ।   धूमिल ने उस समय जिस तीसरे आदमी की बात कही

*ब्रह्मांड* / दिनेश श्रीवास्तव

 दिनेश-दोहावली /                *ब्रह्मांड* यहाँ सकल ब्रम्हांड का,निर्माता है कौन? तर्कशास्त्र ज्ञाता सभी, हो जाते हैं मौन।।-१ वेदशास्त्र गीता सभी,अलग-अलग सब ग्रंथ। परिभाषा ब्रह्मांड की,देते हैं सब पंथ।।-२ सकल समाहित है जहाँ,पृथ्वी,गगन समीर। वही यहाँ ब्रह्मांड है,बतलाते मति-धीर।।-३ परमब्रह्म को जानिए, निर्माता ब्रह्मांड। बतलाते हमको यही,पंडित परम प्रकांड।।-४ पंचभूत निर्मित यथा,काया सुघर शरीर। काया ही ब्रह्मांड है,जो समझे वह धीर ।।-५ पंचभूत विचलित जहाँ, पाता कष्ट शरीर। इसी भाँति ब्रह्मांड भी,पाता रहता पीर।।-६ ग्रह तारे गैलेक्सियाँ, सभी खगोली तत्त्व। अंतरिक्ष ब्रह्मांड का, होता परम महत्व।।-७ गूँजे जब ब्रह्मांड में,'ओम' शब्द का नाद। सभी चराचर जीव के,मिट जाते अवसाद।।-८ नष्ट न हो पर्यावरण,करें संवरण लोभ। होगा फिर ब्रह्मांड में,कभी नहीं विक्षोभ।।-९ देवत्रयी ब्रह्मांड के,ब्रह्मा,विष्णु महेश। ब्रह्मशक्ति की साधना,करता सदा 'दिनेश'।।-१०                  दिनेश श्रीवास्तव                  ग़ाज़ियाबाद

आज का दिन मंगलमय हो

 प्रस्तुति - कृष्ण  मेहता  🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞 ⛅ *दिनांक 22 अक्टूबर 2020* ⛅ *दिन - गुरुवार* ⛅ *विक्रम संवत - 2077 (गुजरात - 2076)* ⛅ *शक संवत - 1942* ⛅ *अयन - दक्षिणायन* ⛅ *ऋतु - हेमंत* ⛅ *मास - अश्विन* ⛅ *पक्ष - शुक्ल*  ⛅ *तिथि - षष्ठी रात्रि 07:39 तक तत्पश्चात सप्तमी* ⛅ *नक्षत्र - पूर्वाषाढा 23 अक्टूबर रात्रि 01:00 तक तत्पश्चात उत्तराषाढा* ⛅ *योग - सुकर्मा 22 अक्टूबर रात्रि 02:37 तक तत्पश्चात धृति* ⛅ *राहुकाल - दोपहर 01:48 से शाम 03:14 तक*  ⛅ *सूर्योदय - 06:38*  ⛅ *सूर्यास्त - 18:07*  ⛅ *दिशाशूल - दक्षिण दिशा में* ⛅ *व्रत पर्व विवरण - सरस्वती पूजन, हेमंत ऋतु प्रारंभ*  💥 *विशेष - षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*                🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🌷 *दाँतों में से खून निकलता हो तो* 🌷 🍋 *नीबूं का रस मसूड़ों को रगड़ने से आराम होगा ।* 🙏🏻 *- पूज्य बापूजी Jodhpur 4th Sep, 2011*            🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🌷 *वास्तु शास्त्र* 🌷 🏡 *किचन में दवाईयां रखने की आदत वास्

अपनों का साथ

 *पिता की चारपाई* पिता जिद कर रहे थे कि उसकी चारपाई गैलरी में डाल दी जाये। बेटा परेशान था। बहू बड़बड़ा रही थी..... कोई बुजुर्गों को अलग कमरा नहीं देता, हमने दूसरी मंजिल पर ही सही एक कमरा तो दिया.... सब सुविधाएं हैं, नौकरानी भी दे रखी है। पता नहीं, सत्तर की उम्र में सठिया गए हैं? निकित ने सोचा पिता कमजोर और बीमार हैं.... जिद कर रहे हैं तो उनकी चारपाई गैलरी में डलवा ही देता हूँ। पिता की इच्छा पू्री करना उसका स्वभाव भी था। अब पिता की चारपाई गैलरी में आ गई थी। हर समय चारपाई पर पडे रहने वाले पिता अब टहलते टहलते गेट तक पहुंच जाते। कुछ देर लान में टहलते। लान में खेलते नाती - पोतों से बातें करते , हंसते , बोलते और मुस्कुराते। कभी-कभी बेटे से मनपसंद खाने की चीजें लाने की फरमाईश भी करते। खुद खाते , बहू - बेटे और बच्चों को भी खिलाते ....धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य अच्छा होने लगा था। दादा मेरी बाल फेंको... गेट में प्रवेश करते हुए निकित ने अपने पाँच वर्षीय बेटे की आवाज सुनी तो बेटे को डांटने लगा...  अंशुल बाबा बुजुर्ग हैं उन्हें ऐसे कामों के लिए मत बोला करो। पापा! दादा रोज हमारी बॉल उठाकर फेंकते हैं..

झारखण्ड के पलामू वाला काजर

 #ठेठ_पलामू:- #जड़ी-बूटी और #काजर ------------------------------------------------------- पिछला साल इहे दशहरा टाईम का बात है, भोरे-भोरे उठे तो आदत के अनुसार आँख मइसत उठ के ऐनक देखने गए कि खूबसूरती तनी-मानी बचल है अगुआ लोग के लिए कि सब साफ हो गया। तो अपन चेहरा देख के डेरा गए। पूरा आँख के नीचे करिया हो गया था। जब हाथ से छुए तो पता चला कि काजर लगा हुआ था। फिर याद आया कि #जा_सार_के दशहरा न स्टार्ट हो गया, तो वही माई लगा दी थी। रात में सुतला घरी कि रात के कोई डायन बिसाहिन के नज़र न लगे। अब बड़े हो गए थे, तो सोचे अब न तो बच्चा हैं न ही #सुनर हैं, तो नजर थोड़े लगेगा, पर बात का है न कि माई के लिए बेटा भले 2 लईका के बाप बन जाए, लेकिन उ बच्चा ही रहता है और दुनिया में सबसे सुंदर दिखता है। सो ज़ाहिर सी बात है, नजर से बचाना था तो काजर तो लगाना था। लईका में दशहरा के ठीक एक दिन पहिले बड़की फुआ के ड्यूटी रहता था। एगो थरिया में बालू आऊ करिया कपड़ा सुई डोरा लेके बैठ जाती थी और सब के लिए छोटा-छोटा चरखूँट आकार में कपड़ा के थैली बना-बना के ओकरा में बालू भर के सी देती थी। अब जे बड़हन लईका रहे उ बाँह पर बाँधे, न त

गीत

 *भारत का नया गीत* ×××××××××××××××× *आओ बच्चों तुम्हे दिखायें,  शैतानी शैतान की... ।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की...।।* *बड़े-बड़े नेता शामिल हैं,   घोटालों की थाली में ।* *सूटकेश भर के चलते हैं,  अपने यहाँ दलाली में ।।* *देश-धर्म की नहीं है चिंता,  चिन्ता निज सन्तान की ।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की...।।* *चोर-लुटेरे भी अब देखो,  सांसद और विधायक हैं।* *सुरा-सुन्दरी के प्रेमी ये,  सचमुच के खलनायक हैं ।।* *भिखमंगों में गिनती कर दी,  भारत देश महान की ।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की...।।* *जनता के आवंटित धन को,  आधा मंत्री खाते हैं ।* *बाकी में अफसर ठेकेदार,  मिलकर मौज उड़ाते हैं ।।* *लूट खसोट मचा रखी है,  सरकारी अनुदान की ।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की...।।* *थर्ड क्लास अफसर बन जाता,  फर्स्ट क्लास चपरासी है, *होशियार बच्चों के मन में,  छायी आज उदासी है।।* *गंवार सारे मंत्री बन गये,  मेधावी आज खलासी है।* *आओ बच्चों तुम्हें दिखायें,  शैतानी शैतान की...।।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की. *please share in otha

गुड़ुप ! ( लघुकथा )/ सुभाष नीरव

 लेखनी लघुकथा मैरेथन 2020 ================ मित्रो, यू.के. निवासी हिन्दी साहित्यकार और 'लेखनी' पत्रिका की संपादिका शैल अग्रवाल जी  द्वारा प्रारंभ की गई 'लेखनी लघुकथा मैरेथन, 2020' के लिए कल उन्होंने मुझे नामित किया। मैं उनका आभारी हूँ। इसके तहत मुझे पाँच दिन तक प्रतिदिन अपनी एक लघुकथा पोस्ट करनी है और किसी एक लघुकथा लेखक को नामित करना है। आज मेरा पहला दिन है। मैं अपने कथाकार मित्र बलराम अग्रवाल को इस 'लेखनी लघुकथा मैरेथन 2020' के लिए नामित करता हूँ और अपनी एक लघुकथा आपसे साझा करता हूँ। -सुभाष नीरव 5 अक्तूबर 2020 लघुकथा गुड़ुप ! -------- सुभाष नीरव दिन ढलान पर है और वे दोनों झील के किनारे कुछ ऊँचाई पर बैठे हैं। लड़की ने छोटे-छोटे कंकर बीनकर बाईं हथेली पर रख लिए हैं और दाएं हाथ से एक एक कंकर उठाकर नीचे झील के पानी में फेंक रही है, रुक रुककर। सामने झील की ओर उसकी नजरें स्थिर हैं। लड़का उसकी बगल में बेहरकत खामोश बैठा है। "तो तुमने क्या फैसला लिया?" लड़की लड़के की ओर देखे बगैर पूछती है। "किस बारे में?" लड़का भी लड़की की तरफ देखे बिना गर्दन झुकाए पैर

आओ फिर लौट चले

 *थोड़ा हटके.…* *"यदि जीवन के 50 वर्ष पार कर लिए है तो अब लौटने की तैयारी प्रारंभ करें.... इससे पहले की देर हो जाये... इससे पहले की सब किया धरा निरर्थक हो जाये....."* ✍️ *लौटना क्यों है*❓ *लौटना कहाँ है*❓ *लौटना कैसे है*❓ इसे जानने, समझने एवं लौटने का निर्णय लेने के लिए आइये टॉलस्टाय की मशहूर कहानी आज आपके साथ साझा करता हूँ : *"लौटना कभी आसान नहीं होता"* एक आदमी राजा के पास गया कि वो बहुत गरीब था, उसके पास कुछ भी नहीं, उसे मदद चाहिए... राजा दयालु था.. उसने पूछा कि "क्या मदद चाहिए..?" आदमी ने कहा.."थोड़ा-सा भूखंड.." राजा ने कहा, “कल सुबह सूर्योदय के समय तुम यहां आना.. ज़मीन पर तुम दौड़ना जितनी दूर तक दौड़ पाओगे वो पूरा भूखंड तुम्हारा। परंतु ध्यान रहे,जहां से तुम दौड़ना शुरू करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौट आना होगा, अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा...!"   आदमी खुश हो गया... सुबह हुई..  सूर्योदय के साथ आदमी दौड़ने लगा... आदमी दौड़ता रहा.. दौड़ता रहा.. सूरज सिर पर चढ़ आया था.. पर आदमी का दौड़ना नहीं रुका था.. वो हांफ रहा था, पर रुका नहीं था... थोड़ा औ

महाभारत के नौ सूत्र सार

महाभारतो इस तरह पढ़े   यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय न हो तो भी इसके नौ सार- सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं:- कौरव  1.संतानों की गलत मांग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे कर्ण  2.आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हों, तो आपकी विद्या, अस्त्र-शस्त्र-शक्ति और वरदान सब निष्फल हो जायेगा अश्वत्थामा  3.संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे.  भीष्म पितामह  4.कभी किसी को ऐसा वचन मत दो  कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े.  दुर्योधन  5.संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है.  धृतराष्ट्र  6.अंध व्यक्ति- अर्थात मुद्रा, मदिरा, अज्ञान, मोह और काम ( मृदुला) अंध व्यक्ति के हाथ में सत्ता भी विनाश की ओर ले जाती है.  अर्जुन  7.यदि व्यक्ति के पास विद्या, विवेक से बंधी हो तो विजय अवश्य मिलती है.  शकुनि  8. हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते  युधिष्ठिर  9.यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता

लघुकथा के साहनी / सुभाष नीरव

लघुकथा संसार   कथाकार मित्र सुकेश साहनी मुझसे बेशक आयु में तीन वर्ष छोटे हों, पर लेखक के तौर पर मेरे अग्रज और वरिष्ठ हैं। मुझे साहनी जी की लघुकथाएं प्रारम्भ से प्रभावित करती रही हैं और मैं इनकी अनेक लघुकथाओं को लघुकथा के मानक के रूप में  लेता रहा हूं। लघुकथा में  बारीकी और उसकी गुणवत्ता को कैसे अपने रचनात्मक कौशल से रचा - बुना जा सकता है, यह मैंने सुकेश साहनी की लघुकथाओं से सीखने की कोशिश की। कुछ नाम और हैं जैसे रमेश बतरा,  भगीरथ, सूर्यकांत नागर, बलराम अग्रवाल जिनकी लघुकथाओं ने मुझे सीखने - समझने की भरपूर ज़मीन दी। सुकेश भाई की न केवल लघुकथाएं, बल्कि इनकी कहानियां भी मुझे उद्वेलित और प्रेरित करती रही हैं। इनके भीतर का कथाकार ' कहानी ' और ' लघुकथा ' दोनों को साधने में सिद्धहस्त है। यही कारण है कि सुकेश मुझसे उम्र में छोटे होने के बावजूद मुझसे बड़े हैं। इनकी विनम्रता का तो मैं कायल हूं। बहुत से लघुकथा सम्मेलनों में मिलने और एक साथ मंच साझा करने का मुझे अवसर मिला है।  इनकी नई आलोचना पुस्तक "लघुकथा : सृजन और रचना - कौशल" कल मुझे डाक में मिली।     इसमें लघुकथाओं, ल

🙏 दाता की दया है 🙏

  *हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं ।*  *इस  संसार के हालातों से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।*  सुन रहा हूं सत्संग आपकी दया व मेहर से । उठा रहा हूं रुहानी लाभ इन बंदिशों में भी।। अविष्कारों  का उपयोग करना तो अब सीख रहा हूं । मगर तेरे दर्शन के वियोग में सब बेरंग महसूस  किये जा रहा हूं ।। हे मेरे दाता अब और सहा नही  जाता । तेरे दर्शन के बिना मेरा मन बार बार बेचैनी से भर जाता ।। मिल रही है भरपूर दया ई सत्संग शब्द सुनने की । मगर पूरी नहीं होती हसरत तुझसे मिलने की ।। मुझे अपने चरणों में लगा लें दाता । मैं तेरा दास हूं मुझे बुला ले दाता ।। दाता तेरे दर्शन को मैं तरस गया हूं । मैं सत्संग रोज सुनकर अपने आप को रोक रहा हूं ।। दिल करता है कि तेरे दर पे दौड़ आऊं, सब बंधन तोड़कर । मगर तेरे आदेशों का पालन कर अपने आप को रोक रहा हूँ ।। *हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं।* *इस संसार के हालात से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।* प्राथना कुल मालिक के चरणों में (SANT ADHAR BARODA BRANCH) *दाता जी की दया है* दाता जी की दया है कि हम सब बेख़ौफ़ जुड़े हैं  सत्संग  सुनने को मि

प्रेम उपदेश

 प्रेम उपदेश:-(परम गुरु हुज़ूर महाराज) 19. जिस किसी सच्चे प्रेमी का यह हाल है कि जब किसी की भक्ति की बढ़ती का हाल सुनता है, तब ही अपनी ओछी हालत से मिला कर सुस्त और फ़िक्रमंद हो जाता है, सो यह बहुत अच्छा है और यह निशान दया का है। इसी तरह इस जीव को ख़बर पड़ती है और अपनी हालतों को देखता है और अपने मत को चित्त से सुनता है और विचारता है। ग़रज़ कि इसमें सब तरह की गढ़त है, इसको दया समझो। 20. जो वक्त़ ध्यान और भजन के बजाय स्वरूप सतगुरु के कुटुम्बी और मित्रों की सूरतें नज़र आवें, उसका सबब यह है कि वह स्वरूप अभी हिरदे में धरे हैं, आहिस्ता आहिस्ता निकल जावेंगे। हुज़ूर राधास्वामी दयाल अपनी दया से सब तरह सफ़ाई करते हैं। 21. हुज़ूर राधास्वामी दयाल सब तरह से जीवों पर दया कर रहे हैं। और दया के भी अनेक रूप हैं, जैसे उदासी तबीयत की भी एक तरह की दया है। हर एक को यह उदासीनता नहीं मिलती। इसमें भी कुछ भेद है। ऐसा नहीं होता कि हर वक्त़ तबीयत सुस्त रहे, पर किसी क़दर सुस्ती और उदासीनता रहने से बड़े फ़ायदे हैं।       22. हुज़ूर राधास्वामी दयाल आप सबको अंतर में सँभालते हैं, पर एक सतसंगी दूसरे सतसंगी का हाल देख कर जो अपनी समझ के

आजकल में नवल की आलोचना

 रेणु  की यादों में नवल  नंदकिशोर नवल अगर हमारे बीच होते तो आज हम उनका 83 वां जन्मदिन मना रहे होते। बीती लगभग आधी सदी तक हिंदी साहित्य, खासकर कविता आलोचना के वे न केवल साक्षी रहे बल्कि उसके सक्रिय मार्ग-निर्धारक भी बने रहे। उन्होंने अपने आलोचकीय लेखन की शुरुआत छायावाद और उत्तर छायावाद से की। इसके बाद राजकमल चौधरी के प्रभाव में अकविता तथा अन्य प्रयोगवादी  कविता धाराओं के  वे प्रशंसक रहे और उनपर धाराप्रवाह लिखा।  राजकमल चौधरी की लंबी कविता 'मुक्ति प्रसंग' की उनकी व्याख्या कविता आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। इसके जरिये वे 'मुक्ति प्रसंग' को 'अंधेरे में' के बाद हिंदी कविता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में स्थापित करते हैं।      आगे चलकर नवलजी नक्सलवाद से भी प्रभावित हुए और उसके प्रभाव में आकर लिखी गई रचनाओं की व्याख्या और मीमांसा की। फिर वे मार्क्सवाद की ओर प्रवृत्त हुए और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़कर प्रगतिशील और मार्क्सवादी  चिंतन से जुड़ी आलोचना की। इस दौरान प्रगतिशील चेतना वाले कवि मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर आदि उनके प्रिय रचनाकार बने रहे।

ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें

इमेज
ज्ञान  प्रकाश  विवेक की ग़ज़लें   Tuesday, September 15, 2009 ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें और परिचय 30 जनवरी 1949 को हरियाणा मे जन्में  ज्ञान प्रकाश विवेक  चर्चित ग़ज़लकार हैं । इनके प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह हैं " प्यास की ख़ुश्बू "," धूप के हस्ताक्षर " और " दीवार से झाँकती रोशनी ", " गुफ़्तगू आवाम से " और " आँखों मे आसमान "। ये ग़ज़लें जो आपके लिए हाज़िर कर रहे हैं ये उन्होंने द्विज जी को भेजीं थीं । एक उदासी, दर्द, हैरानी इधर भी है उधर भी है अभी तक बाढ़ का पानी इधर भी है उधर भी है वहाँ हैं त्याग की बातें, इधर हैं मोक्ष के चर्चे ये दुनिया धन की दीवानी इधर भी है उधर भी है क़बीले भी कहाँ ख़ामोश रहते थे जो अब होंगे लड़ाई एक बेमानी इधर भी है उधर भी है समय है अलविदा का और दोनों हो गए गुमसुम ज़रा-सा आँख में पानी इधर भी है उधर भी है हुईं आबाद गलियाँ, हट गया कर्फ़्यू, मिली राहत मगर कुछ-कुछ पशेमानी इधर भी है उधर भी है हमारे और उनके बीच यूँ तो सब अलग-सा है मगर इक रात की रानी इधर भी है उधर भी है (बहरे-हज़ज मसम्मन सालिम) मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ

कुछ कविताएं

  कुछ कविताएं   अवसाद / डिप्रेशन  आज हावी है हर किसी पर  किसी न किसी रूप में ---- इसने नहीं छोड़ा बच्चों को भी  और न ही घर के बुजुर्गो को --- कारण साफ़ है --- आधुनिकता की भाग दौड़  जिसने पीछे छोड़ दिया है  हर रिश्ते को --- जिसने किया है कुठाराघात --- हर किसी के कोमल मन पर  आज कोमलता खत्म हो गयी मन की -- सभी बेबस हैँ ---. पर आज भी अवसाद को बीमारी की तरह  नहीं लेते लोग . . नहीं करते आंकलन  नहीं करते और नहीं करवाते किसी प्रकार का चिकित्सीय विमर्श --- जिसके कारण --- आज हरपल खतरा मंडरा रहा है  हर रिश्ते में  एक अज़ीब सा डर बैठ गया है  जाने कब और कैसे कौन सा रिश्ता  कर देगा तार तार संबंधों को !!! #सीमा [8/31, 14:46] +91 97600 07588: 9760007588              सुरेंद्र सिंघल                      सुनो              1 गुजरती रहेगी  मेरे और तुम्हारे  बीच में से  जब तक हवा  खिलते ही रहेंगे  रंग बिरंगे फूल  अपनी अपनी खुशबू  बिखेरते हुए  मुझ में  तुम में  और हमारे चारों ओर  सुनो  इस तरह मत जकड़ो  अपनी बाहों में मुझे               2 ऐसा भी क्या  गुजर जाएं  मेरे और तुम्हारे  बीच में से  हवा के साथ साथ  जहर भर

खतरनाक समय से जिरह करती कविताएँ-/ रंजीता सिंह फलक

 खतरनाक समय से जिरह करती कविताएँ---- ********************* हम विडम्बनाओं से भरे खतरनाक समय से गुजर रहें हैं,यह समय बगीचे से फूल तोड़कर माला बनाने का नहीं है,न ही किसी सुंदर चित्र में कृत्रिम रंग भरने का समय है,यह समय है,समझने और समझाने का,  "रंजिता सिंह फ़लक" की कविताएं इसी खतरनाक समय से मनुष्य को बचाने की कोशिश करती हैं,इनकी यह कोशिश है कि विडम्बनाओं से भरे समय को लोग समझे औऱ अपने हक के लिए लड़ने के लिए जागरूक हों,अपने आसपास के लोगों को सतर्क औऱ सचेत करे. कविता हर मनुष्य के भीतर रहती है और उसकी अनुभूतियों को भीतर ही भीतर बहाती रहती है जो इस बहती धारा को शब्दों में बांधकर कागज में उतार देता है वह कवि कहलाने लगता है. "रंजिता सिंह" अपने भीतर बहती अनुभूतियों को आंदोलन की तरह लेती हैं और इसे प्रभावी तरह से शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती हैं,वह चाहती हैं कि हर मनुष्य इस खतरनाक समय से बहस करे, अपनी आवाज उठाये औऱ एक संवेदनशील समाज का निर्माण करें,औऱ अपने भीतर बह रही अनुभूतियों को रचनात्मक साहस के साथ व्यक्त करे,क्योंकि कविता में इसे सरलता से व्यक्त किया जा सकता है.  "रं