बुधवार, 30 दिसंबर 2020

दो लघुकथाएँ

 मेरी दो लघुकथाएं रोटी । मार्स स्टूडियो ने स्वरबद्ध की है। दोनों लघुकथाएं लॉकडाउन के दौरान मजदूर पलायन के समय व्याप्त माहौल पर लिखी गई थी। प्रस्तुत है। 



कथा  एक।  :


रात गहरा गई थी। सड़क पर चलते-चलते बहुत दिन हो गए थे। कुछ पक्का पता भी नहीं था। बस यही याद है कि चलते  समय रात को चांद इतना बड़ा नजर नहीं आता था। पर अब तो आसमान पर थाली सा, गोलाकार उदास चांद अटका हुआ था।  घर अभी दूर था। रास्ते समझ में भी नहीं आ रहे थे। बस सर्पीली सड़कें जिधर मुड़ती थी, वे मुड़ जाते थे। दिन में भी शहर और गाँव,  सोए-सोए लगते थे। पर एक सैलाब साथ था। उन्हीं की तरह आंशकित और सहमा हुआ, उसी से थोड़ी हिम्मत मिलती थी।


                        वो अकेली नहीं थी। साथ में पति और छोटा बच्चा भी था। रात को चलते-चलते, सड़क के किनारे एक पेड़ से साईकिल टिकाकर वहीं जमीन पर लेट गए थे। साइकल के पीछे गृहस्थी का सामान बंधा हुआ था। खाने को आज कुछ नहीं था। पति को कुछ देर भूख लगी। पर फिर थकान ने भूख पर विजय पाई और वो सो गया। बच्चा, दिन भर साईकिल के डंडे पर बैठा रहता था। सो उतना नहीं थका था। उसे भूख लग रही थी। ‘माँ, भूख लग रही है। रोटी दे न।’


                          रोटी थी भी नहीं। आज रोटी नसीब नहीं हुई थी। ‘देख, सामने चाँद, कितना गोल है। तुझे चंदा मामा बहुत अच्छा लगता है न।’


                            ‘माँ, ये चाँद भी रोटी जैसा ही लग रहा है न बिल्कुल गोल। तू ऐसी ही रोटी बनाती है न। एक रोटी दे दे न।’


                             ‘देख, इधर पेड़ कैसे हिल रहे हैं। गाँव में अपने आँगन में भी पेड़ हैं।’


                               ‘माँ, पेड़ों पर फल लगते हैं न। मैंने किताबों में देखे हैं। कितने सुंदर लगते हैं। माँ, ये भी रोटी की तरह होते हैं क्या। इनसे भी भूख खत्म हो जाती है। माँ, रोटी दे दे न।’


                                                            ‘      रोटी-रोटी, बार-बार एक ही बात। दस साल का हो गया। मेहनत नहीं करता। दिन भर साईकिल पर चढ़ा रहता है। कल से पैदल चलना। देख, मेहनत करने से कैसी नींद आ जाती है। देख तेरे बापू को।’


                            बच्चा सहमकर चुप हो गया। उसे भूख का हल मिल गया था।


 


 कथा दो:               


                        स्वर्ग के रास्ते में दो आत्माऐं मिल गई। सड़क पर चलते-चलते मौत हो गई थी।


                                                     ‘क्या हुआ, तुम कैसे मरी।’ पहली ने कहा।


                                           ‘पता नहीं, तीन दिन से भूखी थी। धूप में चक्कर आया और गिर गई।


                           ’चल झूठी। यहाँ परलोक में तो झूठ मत बोल। तेरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में तो दिल का दौरा पड़ने का कारण मृत्यु बताई गई है।’


                                                            ‘पता नहीं। मुझे तो बस भूख का ही पता है। तीन दिन से कुछ खाया नहीं था। हालत तो बहुत खराब थी। पर चलना जरूरी था। अब बच्चे के पाँव में भी छाले पड़ गए थे। उसे भी गोदी में उठा रखा था।’


                                                            ‘बाई, यह परलोक है। दुनिया के छल-प्रपंच तो वहीं छोड़ दे। अखबार में साफ लिखा है। तेरे आँचल में दो रोटी बंधी थी।’


                                                            पहली आत्मा उदास हो गई बोली। ‘ मैं कब मना कर रही। रोटी तो थी। पर वो मैंने अपने बच्चे के लिए बचाकर रखी थी। कमबख्त लाश के साथ रोटी भी ले गए। पता नहीं सुबह छुटका भूखा ही रह गया होगा।’


                          दूसरी आत्मा चुपचाप चलने लगी।


 


                    


                      


           


 


                                                                                                                                            


                      


        


 


 


                                                            ‘

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

जो हरि इच्छा

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳/💐 हरि_इच्छा*💐💐


प्रस्तुति - कृष्णा  मेहता 




एक बार भगवान विष्णु गरुड़जी पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर जा रहे थे। रास्ते में गरुड़जी ने देखा कि एक ही दरवाजे पर दो बारातें ठहरी थीं। मामला उनके समझ में नहीं आया, फिर क्या था, पूछ बैठे प्रभु को। 


गरुड़जी बोले ! प्रभु ये कैसी अनोखी बात है कि विवाह के लिए कन्या एक और दो बारातें आई हैं। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ रहा है, प्रभु बोले- हाँ एक ही कन्या से विवाह के लिए दो अलग-अलग जगह से बारातें आई हैं।


 एक बारात पिता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है, और दूसरी माता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है। यह सुनकर गरुड़जी बोले- आखिर विवाह किसके साथ होगा ? 


प्रभु बोले- जिसे माता ने पसन्द किया और बुलाया है उसी के साथ कन्या का विवाह होगा, क्योंकि कन्या का भाग्य किसी और के साथ जुड़ा हुआ है,,,, भगवान की बातें सुनकर गरुड़जी चुप हो गए और भगवान को बैकुंठ पर पहुँचाकर कौतुहल वश पुनः उसी जगह आ गए जहाँ दोनों बारातें ठहरी थीं।

          

गरुड़जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं माता के बुलाए गए वर को यहाँ से हटा दूँ तो कैसे विवाह संभव होगा, फिर क्या था; उन्होंने भगवद्विधान को देखने की जिज्ञासा के लिए तुरन्त ही उस वर को उठाया और ले जाकर समुद्र के एक टापू पर धर दिए। 


ऐसा कर गरुड़जी थोड़ी देर के लिए ठहरे भी नहीं थे कि उनके मन में अचानक विचार दौड़ा कि मैं तो इस लड़के को यहाँ उठा लाया हूँ पर यहाँ तो खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में इस निर्जन टापू पर तो यह भूखा ही मर जाएगा और वहाँ सारी बारात मजे से छप्पन भोग का आनन्द लेंगी, यह कतई उचित नहीं है, इसका पाप अवश्य ही मुझे लगेगा। 


मुझे इसके लिए भी खाने का कुछ इंतजाम तो करना ही चाहिए, यदि विधि का विधान देखना है तो थोड़ा परिश्रम तो मुझे करना ही पड़ेगा। और ऐसा विचार कर वे वापस उसी स्थान पर फिर से आ गए।

           

इधर कन्या के घर पर स्थिति यह थी कि वर के लापता हो जाने से कन्या की माता को बड़ी निराशा हो रही थी। परन्तु अब भी वह अपने हठ पर अडिग थी। अतः कन्या को एक भारी टोकरी में बैठाकर ऊपर से फल-फूल, मेवा-मिष्ठान आदि सजा कर रख दिया, जिसमें कि भोजन-सामग्री ले जाने के निमित्त वर पक्ष से लोग आए थे। 


माता द्वारा उसी टोकरी में कन्या को छिपाकर भेजने के पीछे उसकी ये मंशा थी कि वर पक्ष के लोग कन्या को अपने घर ले जाकर वर को खोजकर उन दोनों का ब्याह करा देंगे। माता ने अपना यह भाव किसी तरह होने वाले समधि को सूचित भी कर दिया।

          

अब संयोग की बात देखिये, आंगन में रखी उसी टोकरी को जिसमे कन्या की माता ने विविध फल-मेवा, मिष्ठानादि से भर कर कन्या को छिपाया था, गरुड़जी ने उसे भरा देखकर उठाया और ले उड़े। उस टोकरी को ले जाकर गरुड़जी ने उसी निर्जन टापू पर जहाँ पहले से ही वर को उठा ले जाकर उन्होंने रखा था, वर के सामने रख दिया। 

        

इधर भूख के मारे व्याकुल हो रहे वर ने ज्यों ही अपने सामने भोज्य सामग्रियों से भरी टोकरी को देखा तो उसने टोकरी से जैसे ही खाने के लिए फल आदि निकालना शुरू किया तो देखा कि उसमें सोलहों श्रृंगार किए वह युवती बैठी है जिससे कि उसका विवाह होना था। गरुड़जी यह सब देख कर दंग रह गए। 


उन्हें निश्चय हो गया कि :–‘हरि इच्छा बलवान।’


*‘राम कीन्ह चाहैं सोई होई, करै अन्यथा आस नहिं कोई।’*

           

 फिर तो शुभ मुहुर्त विचारकर स्वयं गरुड़जी ने ही पुरोहिताई का कर्तव्य निभाया। वेदमंत्रों से विधिपूर्वक विवाह कार्य सम्पन्न कराकर वर-वधु को आशीर्वाद दिया और उन्हें पुनः उनके घर पहुँचाया।

           

तत्पश्चात प्रभु के पास आकर सारा वृत्तांत निवादन किए और प्रभु पर अधिकार समझ झुंझलाकर बोले- "प्रभो- आपने अच्छी लीला की, सारे विवाह के कार्य हमसे करवा दिये।" भगवान गरुड़जी की बातों को सुनकर मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे।     



*नित याद करो मन से शिव को* 💥🧚🏻‍♂️

*सदैव प्रसन्न रहिये!!*

*जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!*



*💐💐हरि_इच्छा*💐💐




एक बार भगवान विष्णु गरुड़जी पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर जा रहे थे। रास्ते में गरुड़जी ने देखा कि एक ही दरवाजे पर दो बारातें ठहरी थीं। मामला उनके समझ में नहीं आया, फिर क्या था, पूछ बैठे प्रभु को। 


गरुड़जी बोले ! प्रभु ये कैसी अनोखी बात है कि विवाह के लिए कन्या एक और दो बारातें आई हैं। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ रहा है, प्रभु बोले- हाँ एक ही कन्या से विवाह के लिए दो अलग-अलग जगह से बारातें आई हैं।


 एक बारात पिता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है, और दूसरी माता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है। यह सुनकर गरुड़जी बोले- आखिर विवाह किसके साथ होगा ? 


प्रभु बोले- जिसे माता ने पसन्द किया और बुलाया है उसी के साथ कन्या का विवाह होगा, क्योंकि कन्या का भाग्य किसी और के साथ जुड़ा हुआ है,,,, भगवान की बातें सुनकर गरुड़जी चुप हो गए और भगवान को  बैकुंठ पर पहुँचाकर कौतुहल वश पुनः उसी जगह आ गए जहाँ दोनों बारातें ठहरी थीं।

          

गरुड़जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं माता के बुलाए गए वर को यहाँ से हटा दूँ तो कैसे विवाह संभव होगा, फिर क्या था; उन्होंने भगवद्विधान को देखने की जिज्ञासा के लिए तुरन्त ही उस वर को उठाया और ले जाकर समुद्र के एक टापू पर धर दिए। 


ऐसा कर गरुड़जी थोड़ी देर के लिए ठहरे भी नहीं थे कि उनके मन में अचानक विचार दौड़ा कि मैं तो इस लड़के को यहाँ उठा लाया हूँ पर यहाँ तो खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं है,  ऐसे में इस निर्जन टापू पर तो यह भूखा ही मर जाएगा और वहाँ सारी बारात मजे से छप्पन भोग का आनन्द लेंगी, यह कतई उचित नहीं है,  इसका पाप अवश्य ही मुझे लगेगा। 


मुझे इसके लिए भी खाने का कुछ इंतजाम तो करना ही चाहिए, यदि विधि का विधान देखना है तो थोड़ा परिश्रम तो मुझे करना ही पड़ेगा। और ऐसा विचार कर वे वापस उसी स्थान पर फिर से आ गए।

           

इधर कन्या के घर पर स्थिति यह थी कि वर के लापता हो जाने से कन्या की माता को बड़ी निराशा हो रही थी। परन्तु अब भी वह अपने हठ पर अडिग थी। अतः कन्या को एक भारी टोकरी में बैठाकर ऊपर से फल-फूल, मेवा-मिष्ठान आदि सजा कर रख दिया, जिसमें कि भोजन-सामग्री ले जाने के निमित्त वर पक्ष से लोग आए थे। 


माता द्वारा उसी टोकरी में कन्या को छिपाकर भेजने के पीछे उसकी ये मंशा थी कि वर पक्ष के लोग कन्या को अपने घर ले जाकर वर को खोजकर उन दोनों का ब्याह करा देंगे। माता ने अपना यह भाव किसी तरह होने वाले समधि को सूचित भी कर दिया।

          

अब संयोग की बात देखिये, आंगन में रखी उसी टोकरी को जिसमे कन्या की माता ने विविध फल-मेवा, मिष्ठानादि से भर कर कन्या को छिपाया था, गरुड़जी ने उसे भरा देखकर उठाया और ले उड़े। उस टोकरी को ले जाकर गरुड़जी ने उसी निर्जन टापू पर जहाँ पहले से ही वर को उठा ले जाकर उन्होंने रखा था, वर के सामने रख दिया। 

        

इधर भूख के मारे व्याकुल हो रहे वर ने ज्यों ही अपने सामने भोज्य सामग्रियों से भरी टोकरी को देखा तो उसने टोकरी से जैसे ही खाने के लिए फल आदि निकालना शुरू किया तो देखा कि उसमें सोलहों श्रृंगार किए वह युवती बैठी है जिससे कि उसका विवाह होना था। गरुड़जी यह सब देख कर दंग रह गए। 


उन्हें निश्चय हो गया कि :–‘हरि इच्छा बलवान।’


*‘राम कीन्ह चाहैं सोई होई, करै अन्यथा आस नहिं कोई।’*

           

 फिर तो शुभ मुहुर्त विचारकर स्वयं गरुड़जी ने ही पुरोहिताई का कर्तव्य निभाया। वेदमंत्रों से विधिपूर्वक विवाह कार्य सम्पन्न कराकर वर-वधु को आशीर्वाद दिया और उन्हें पुनः उनके घर पहुँचाया।

           

तत्पश्चात प्रभु के पास आकर सारा वृत्तांत निवादन किए और प्रभु पर अधिकार समझ झुंझलाकर बोले- "प्रभो- आपने अच्छी लीला की, सारे विवाह के कार्य हमसे  करवा दिये।" भगवान गरुड़जी की बातों को सुनकर मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे।     




*नित याद करो मन से शिव को* 💥🧚🏻‍♂️


*सदैव प्रसन्न रहिये!!*

*जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!*

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

कुछ कविताएं

 उसने फैला ली ना सनसनी , /.विवेक रंजन श्रीवास्तव 


उत्तेजना और उन्माद !


एक ही धर्मस्थल पर 


हरे और भगवे झंडे 


लहराकर ! 


पता नही इससे , 


 मिले कुछ वोट या नही !


 


पर हाँ 


आम आदमी की सुरक्षा और समाज में


शांति व्यवस्था के नाम पर 


हमारी मेहनत के करोड़ो रुपये 


व्यर्थ बहाये हैं  ,


तुम्हारे इस जुनून के एवज में !



बंद रहे हैं स्कूल और कालेज 


और नही मिल पाई उस दिन 


गरीब को रोजी , 


क्योकि ठप्प थी प्रशासनिक व्यवस्था !


टीवी चैनल इस आपाधापी को 


ब्रेकिंग न्यूज बनाकर , विज्ञापनो के जरिये 


रुपयो में तब्दील कर रहे थे .



मेरी अलमारी में रखी 


कुरान , गीता और बाइबिल 


पास पास यथावत साथ साथ शांति से रखी थीं . 


सैनिको के बैरक में बने एक कमरे के धर्मस्थल में 


विभिन्न धर्मो के प्रतीक भी ,


सुबह वैसे ही थे , जैसे रात में थे .


 


पर इस सबमें 


सबसे बड़ा नुकसान हुआ मुझे 


जब मैंने अपने किशोर बेटे 


की फेसबुक पोस्ट देखी 


जिसमें उसने 


उलझे हुये नूडल्स को 


धर्म निरूपित किया , और लिखा 


कि उसकी समझ में धर्म ऐसा है , क्या फिर भी हमें  


धार्मिक होना चाहिये ? 


मैं अपने बेटे को धर्म की 


व्याख्या समझा पाने में असमर्थ हूं !



तुमने धर्म में हमारी आस्था की चूलें 


हिलाकर अच्छा नही किया !!


धर्म तो सहिष्णुता , सहअस्तित्व और सदाशयता 


सिखाने का माध्यम होता है . है ना ! 


गजब है , एक ही स्थल पर दोनो की आस्था है


फिर भी , बल्की इसीलिये , उनमें परस्पर विवाद है . 


यदि शिरडी , काशी और काबा हो सकता है साथ साथ !


तो मथुरा और धार क्यों नही ? 



धर्म तो सद्भावना का संदेश होता है ! 


धर्म के नाम पर 


कट्टरता, जड़ता और असहिष्णुता फैलाना


कानूनन जुर्म होना चाहिये 


किसी भी सभ्य समाज में !


तभी बच्चे धर्म को उलझे हुये नूडल्स नही 


बूंदी के बंधे हुये लड्डू सा समझ पायेंगे !! 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

जबलपुर


2



मौत  / 

: मौत! अभी मत आना मेरे पास

-अशोक मिश्र

मौत! अभी मत आना मेरे पास

फुरसत नहीं है

तुम्हारे साथ चलने की

लेकिन यह मत समझना

कि मैं डरता हूं तुमसे

कई काम पड़े हैं बाकी अभी

वो जो गिलहरी

बना रही है अपने बच्चों के लिए घरौंदा

ठीक से बन तो जाए।

फुरसत नहीं है मुझे

तब तक/जब तक

इस धरती पर भूखा सोता है

एक भी बच्चा, स्त्री, पुरुष।

अभी श्रम की सत्ता

पूंजी की सत्ता को नहीं कर पाई है परास्त

पूंजी की सत्ता के खिलाफ

बिछा तो लूं विद्रोह की बारूद

कर लूं तैयार एक हरावल दस्ता

पूंजी की सत्ता के खिलाफ।

फिर तुम्हारे साथ

मैं खुद चल पडूंगा सहर्ष

मुझे मत डराओ अपनी थोथी कल्पनाओं से

स्वर्ग-नर्क, पुनर्जन्म

या फिर उन कपोल कल्पित कथाओं से

जो रच रखे हैं

तुम्हारे नाम पर धर्म के ठेकेदारों ने।

मैं जानता हूं

मृत्यु कुछ नहीं

एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में

रूपांतरण मात्र है, बस।

मौत कहां होगी मेरी

मैं तो एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में

बदलकर भी रहूंगा जीवित

विचार के रूप में

किस्सों के रूप में

कहानियों के रूप में

लेकिन हां,

मत आना अभी

फुरसत नहीं है मेरे पास

बच्चे थोड़ा बड़े तो हो जाएं।


3


 कविता .गर्म चाय की प्याली हो.../ नेहा नाहटा


हिदायत नही है यह 

साफ साफ शब्दों में वार्निंग दे रहा हूं , मिसेज नाहटा ...

आज से बिलकुल बन्द है 

आपकी चाय ,

क्लिनिक में गर्दन झुकाए 

बैमन सुन रही थी मैं 

और चेतावनी दे रहा था 

मेरा डॉक्टर .....


बार बार के अल्टीमेटम और 

हाइपर एसिडिटी के बावजूद 

रोज सुबह गटक ही लेती हूं चाय 

अपने फेवरेट मग में ,

बचपन से सुनती जो आयी हूं ,

कड़वाहट मार देती है कड़वाहट को

जहर काटता है जहर को..


न चाहते हुए भी 

चढ़ा देती हूं चाय उबलने ,

चाय की भाप के साथ उड़ जाते  हैं

मेरे दबे ,उमड़ते - घुमड़ते जज्बात

तूफ़ान उठाती तन्हाईयाँ   ,

सारी वेदना 

हो जाती है वाष्पित,


चाय की चुस्कियां चूस लेती है 

मेरी तमाम चुभन ,

भर देती है स्फूर्ति  

ताकि  पूरे दिन लड़ सकू खुद से ,

इस बैगेरत जमाने से 

कुछ दगाबाज रिश्तो से 

पीठ में ख़ंजर घोंपते अपनों से 

और दोस्ती का दम भरते दोगलों से भी..


चाय का घूँट भरते ही

चुटकियों में चार्ज हो जाती है मेरी चपलता

अगले चौबीस घण्टो तक जिन्दा रहती है 

मुझमे चंचलता 

चाय को चाय नही 

संजीवनी समझती हूं तभी ,

बेदर्द जमाने में 

चंद सांसो के लिए लड़ते 

किसी वेंटिलेटर की संज्ञा देती हूं इसे


सब समझाते हैं मुझे

क्यों ! अपने लिवर को यातना देती हो तुम,

कैसे बताऊँ उनको , 

नही मैं बेवफा..

यतीम नही होने दे सकती चाय को ,

जो साथ रही है सदा 

मेरा यकीन बनकर..


तोहमतें ,उलाहने,शिकायते,

तहरीरें ,तकरारें सब सुड़क लेती हूं 

इस एक चाय के प्याले में 

और बटोर लेती हूं चंद खुशियाँ , 

घोल लेती हूं थोड़ी सी मिठास अपने लिए 

और कुछ खास अपनों के लिए भी ,


महकाती है 

चाय की खुश्बू 

हर पल मुझे

ताकि महकता रहे मेरा वजूद 

मेरे मरने के बाद भी..


नेहा नाहटा


4


 गेंहू की व्यथा-


गर्मी में तपने के बाद

जब आया बरसात।

सीलन और कीड़ो-मकोड़ो से

एक किसान ने संभाले रखा

मुझे धरोहर बनाकर।।


उसे फिक्र जो थी मेरी। 

मेरी वंशावली बढ़ाने की।।

और उन करोडों भूखे 

क्षुधा को संतृप्त करने की


सच कहूँ तो-आज के दौर में

ऐसा परमार्थ कौन करता है जी।

लोग तो फिराक में लगे रहते है

कि कब मौका मिले

और  उड़ा दें गर्दन धड़ से अलग।


सर्दी शुरू होते ही डाल दिया गया

धरती के गर्भ में।।


मैं बहुत खुश था

यह अवसर पाकर ।

पूरा करूं फर्ज

अपनी वंशावली बढ़ाकर।

एक किसान के अहसानों का

जिसने संजोया मुझे पसीना बहकर ।।


भर सकूँगा उनकी क्षुधा।

और पूरा कर सकूँगा

कभी न पूरा होने वाले

एक किसान के अरमानों को।।


एक से अनेक बन अब,

यद्यपि झेलने पड़े हमें

सर्दी,धूप,आंधी और ओले।

हममें से कितने उखड़ गए थे

और कितने अब भी हवा में डोले।।


लेकिन इन थपेड़ो को झेलते हुए

अब भी हमारी हर सांस

बस एक किसान के

अहसानों की ही गाथा बोले।


जिसने सहकर अनेकों कठिनाई

हमारे चिन्ता में दिन-रात डोले।।

इस संघर्ष की लड़ाई में

यद्यपि विजय भी हमारी हुई।।


अब तो काट,छांट और तिनका-तिनका जोड़कर

पहुँच चुके थे मंडी ।

होने पालनहार के लिए नीलाम

ताकि उसके अरमानों का पूरा कर

सांस ले अब ठंड़ी।।


लेकिन अब भी कुछ बाकी था अंजाम।

गिरते-पड़ते ।धूल-कंकड़ संग सड़ते।

अपने अस्तित्व के लिए लगातार लड़ते।

लम्बे बहस और तिरस्कार के बीच बिके।

दलालों को दलाली खिलाकर, सहकर बेशर्मी  ।

तब जाकर हम सरकारी गोदाम में टिके।।


एक लम्बे कैद के बाद

अब जाकर जगी है कुछ आस।

छोटे-बड़े  समूहों में बंटकर

अब हम पहुँच चुके थे

सरकारी सस्ते गल्ले के पास।।


मन ही मन खुशी के मारे अब झूम रहे थे।

अपने पालनहारों के क्षुधा भरने को

आतुर एक - दूजे का माथा चुम रहे थे।।


लेकिन पूरा हो न सका

ये भी हमारा आखिरी सपना।

इतना खुदक़िस्मत कहाँ थे हम गेंहू कि

काम आ सके उनके दुर्दिनों में

 जो कभी बहा दिए थे खून-पसीना अपना।


रात को ही हम गेंहू 

भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ चुके थे

कोटेदार ने पहले ही हाथ साफ कर दिया अपना।

लगता है हम गेंहू के नसीब में ही

 लिखा है बार-बार बिकना।।


                             " विनोद विमल बलिया


5


 अलका  जैन आनंदी       

   दोहे  *गुरु*

गुरुवर मुझको ज्ञान दो, बने कलम पहचान । 

मन के तम को दूर कर, दूर करो अज्ञान ।।


ज्ञान गुरू देते सदा ,जाने यह संसार ।

होते सपने सच तभी, सुनलें गुरू पुकार।।


 गुरु की कृति अनमोल है, सही गलत पहचान ।

सदा रखो संभालकर, बनो नेक इंसान।।


नौका करते पार हैं, गुरु हैं खेवनहार।

करें दुखों का अंत ये, भव से करते पार।।


मेरे गुरुवर आपने, भरे ज्ञान भंडार।  

सत्य राह पर हम चलें, मिले आपका प्यार।। 


बादल आया झूम के, मनवा करता गान।

 रोम-रोम हर्षित हुआ, भरे खेत खलियान।।


 बागों में झूले पड़े, धरा रचाएँ रास।

 इस *सावन* के मास में,सोम रहा दिन खास।।


 बादल काले घिर गए ,वर्षा हुई अपार ।

हृदय खुशी से अब भरा, साजन मेरा प्यार ।।


कोयल कू कू कर रही, मीठी है आवाज ।

दादुर की आवाज से, होता बेहद शोर।।


सावन आया झूम के, लगती सुखद फुहार ।

 मोर नाचता बाग में, अपनी बाँह पसार।।


 छम छम वर्षा हो रही, बाहर मचता शोर।

 साजन आते पास जब, मन में प्रेम हिलोर।।

आनंदी


6



 जेब खाली है अगर जज़्बात का क्या कीजिये

 पुरसुकूं दिन ही नहीं तो रात का क्या कीजिये


मर रहे हैं भूख से नवजात माँ की गोद में

ज्ञान वाली आसमानी बात का क्या कीजिये।


सोचिए जुम्मन पदारथ जॉन इब्लिस बैठकर

देश के बिगड़े हुए हालात का क्या कीजिये।


मर्म की सूखी नदी तक बूंद भी आनी नहीं

सागरों पर हो रही बरसात का क्या कीजिये।


उम्र सारी काटली है सिर्फ तनहा ही अगर

आज मैयत पर सजी बारात का क्या कीजिये।


उम्र भर एहसान ढोएं और हासिल कुछ नहीं

हक अगर मिलता नहीं खैरात का क्या कीजिये।


कट रही है आपकी भी बस यही तो है बहुत

जिंदगी की दौड़ में सह मात का क्या कीजिये।

#चित्रगुप्त


6


आपका हौसला बढाने के लिए एक कविता*

*यूं ही हंसने के लिए दिल पर न लिजिएगा* / सुनीता शानू 


सुनो सुनो रे एडमिन जी

माफ करो तुम एडमिन जी

जब चाहे जोड़ लो हमको

जब चाहे तुम मुक्त करोगे

तुम तानाशाह बनकर

हम पर हरदिन राज करोगे

हिटलर जैसे एडमिन जी

अकड़े अकडे़ एडमिन जी 

तुम चाहो तो दांत हिलाएं

तुम चाहो तो चुप हो जाएं

उल्टी सीधी कविता पर

तुम चाहो तो कमेंट लगाएं

नही चलेगी मनमानी जी

अगर करोगे बेईमानी जी

सुनो सुनो रे एडमिन जी

अब जाने भी दो एडमिन जी

सुनीता शानू

रॉन्ग नंबर/ चित्रगुप्त

 रॉन्ग नंबर / चित्रगुप्त 

**********


ट्रेंग ट्रेंग..... अननोन नंबर देखकर थोड़ा सोचा फिर फोन उठा लिया। 


"हेलो...."


"इत्ती देर से फोन कर रही हूँ आखिर उठा काहे नहीं रहे थे? किसी नजारे को देखने में मगन थे क्या?"


"अनजान नंबर से काल आ रही थी तो......"


 बात पूरी होने से पहले ही काट दी गई--


"इसका मतलब मेरा नंबर भी सेव नहीं है क्या तुम्हारी मोबाइल में...? तुम्हें क्या तुम्हें तो अपनी सीता गीता रीता से फुरसत मिले तब न...जनाब के मोबाइल में दुनिया जहान का नंबर सेव रहता है बस बीवी का ही नंबर नहीं रहता.... तुम बाकी छोड़ो ये तो घर आओ फिर निपट लूँगी... सामान नोट करो वो लेकर आ जाना" मैडम  का जोश मिनट दर मिनट बढ़ता ही जा रहा था।


"जी बोलिये..."


"बड़ा जी जी कर रहे हैं आज फिर चढ़ा ली क्या..." इस बार तिलमिलाहट में दांत पीसने की आवाज भी सुनी जा सकती थी।


"जी..."


" रहोगे अपनी मां की तरह ढपोरशंख ही, जैसे वो दिन भर राम राम करती फिरती हैं लेकिन खटमल की तरह खून पीने का एक भी मौका नहीं छोड़ती...हुंह तुम सामान लिखो और लेकर घर आओ फिर बताती हूँ।"


"जी"


"फिर जी.... तुमको न तुम्हारी बहन का जीजा बना दूंगी सामान लिखो...." वो लगभग चिल्लाते हुए बोले जा रही थीं।


"बताइए"


"आलू पांच किलो, टमाटर एक पौवा, सोया वाला साग एक गड्डी, सौ ग्राम धनिया पत्ती, एक पाव लहसुन, आधा किलो प्याज..... लिख रहे हो न?" उसने फिर दांत पीसा...


"लिख रहा हूँ....."


"लिख रहे हो तो हूँ हाँ कुछ तो बोलो.... किस्मत फूट गई मेरी जो तुम्हारे जैसे निकम्मे से शादी हुई...लिखो ... साबूदाना एक किलो, चीनी दो किलो, चायपत्ती एक पैकिट.....ठीक है इतना लेकर आ जाओ बाकी घर मे आकर पर्चा बना लेना फिर जाना" लंबी सांसें छोड़ते हुए मोहतरमा की लिस्ट समाप्त हुई।


"जी सामान तो ले आऊंगा पर घर का पता तो बता दो"


"घर का पता.... तुम सुमित के पापा नहीं बोल रहे"


"नहीं.... हेलो ...हेलो ..."


उसके बाद फोन कट गया,, अब काल बैक कर रहा हूँ  तो उठ नहीं रहा....बिजी बता रहा है। मैं यहाँ बैठा उन भाई साब की खैर मना रहा हूँ जिनका नंबर अब लगा होगा...

#चित्रगुप्त

संजीव शुक्ला का एक व्यंग्य

 अपना एक व्यंग्य निवाण टाइम्स में।/ संजीव शुक्ला 


जुझारूलाल प्रवक्ता बनना चाह रहे थे। यह उनकी दिली तमन्ना थी, बल्कि उनका तो खुला मानना था कि क्षेत्र की जनता और पार्टी का बहुमत भी उनको प्रवक्ता के रूप में देखना चाहता है। इस पद के लिए वह अपने को सर्वथा उपयुक्त व्यक्ति मानते थे, पर उनका दुर्भाग्य देखिये कि पार्टी के शीर्ष गुट में उनके सब विरोधी जमे थे। क्या जीवन व्यर्थ ही जायेगा यह चिंता उन्हें दिन-रात खाए डाल रही थी। प्रवक्ताई का आकर्षण उन्हें तबसे अपने में दबोचे हुए है जबसे उन्होंने मीडिया वालों को प्रवक्ता से महज एक बाइट के लिए माइक और कैमरे के साथ गिरते-पड़ते दौड़ते देखा है। पत्रकारों-मीडियाकर्मियों का प्रवक्ता से साक्षात्कार हेतु घण्टों राह तकना और फ़िर अचानक उनके कार्यालय से प्रकट होने का अंदाज़ उन्हें घायल कर जाता!! यह पद उन्हें पार्टी के शीर्ष-नेतृत्व से भी ज़्यादा आकर्षित करता। कारण वह किसी पचड़े में .....…...

 नेतृत्व की जिम्मेदारी सबको साथ लेकर के चलने की होती है। वह अपनी ऊर्जा सबको मनाकर साथ रखने में नहीं खर्च करना चाहते थे।  उनका स्पष्ट मानना था कि वह इसके लिए नहीं बने हैं। उनकी मेधा का सही उपयोग तो नीतियों के निर्माण और उनकी व्याख्या में हो सकता है। फ़िर जिस चीज के लिए उन्होंने बरसों से तपस्या की उसे क्या यूँ ही छोड़ दें? आख़िर इसके लिए उन्होंने क्या नहीं किया! वह अपने जीवन के तमाम बसन्त (ऐसा उनका अपना मानना था)  शीर्ष नेतृत्व की गणेश-परिक्रमा में गुजार चुके थे। अपने से दस साल छोटे नेताओं तक को उन्हें दद्दा कहना पड़ा। पान-पुड़िया का कोई शौक न रखने के बावजूद जेब मे तुलसी और रजनीगंधा का पैकेट रखना पड़ा!!

उनका बन्द कमरे में प्रवक्ताई अंदाज़ में घण्टों बोलने का अभ्यास प्रवक्ता बनने की साधना का ही एक भाग था।  हर बात पर पार्टी का खुलकर बचाव करना, आरोपों को विपक्षियों की साज़िश बताना, विपक्षी दल के सदस्य को बोलने न देना और अच्छी-भली बहस को दंगल में तब्दील कर देना उनका दलीय धर्म बन चुका था। वे विपक्षियों को अब देशद्रोही और चरित्रहीन तक कहने लगे। विपक्षियों को धिक्कारने में जीवंतता लाने के लिए अब वे घर में भी सबको धिक्कारने लगे थे। कई बार घर के सदस्यों को ही विपक्षी मान उन्हें बोलने न देते।

 कुलमिलाकर बिना पद के ही वह प्रवक्ता के चरित्र को जी रहे थे। पर इंतजार की भी कोई हद होती है। कल के लौंडे प्रवक्ता बनते जा रहे थे और जुझारूलाल अभी भी प्रवक्ताई के लिए जूझ रहे थे। वह तो कहिए कि राजनीति में रिटायरमेंट की कोई अवधि नहीं होती। आदमी मरते दम तक जनसेवा की शपथ ले सकता है। सो उम्मीदों पर वे पार्टी में जमे थे। पर इधर मार्गदर्शक मंडल की स्कीम ने उनको अंदर तक हिला दिया था। उनको डर था कि देर-सबेर हर पार्टी इस अच्छी स्कीम को लपकने की कोशिश करेगी, इसलिए अब वह निराश से हो गए थे। "नर हो न निराश करो मन को" का नियमित पारायण करने के बावजूद अब उन्हें इससे कोई ऊर्जा नहीं मिलती। उल्टे अब इसे नियमित पढ़ने से बची-खुची ऊर्जा के भी क्षय होने की आशंका होने लगी। उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा देने का मन बना लिया। उनके पुराने मित्र होने के नाते मैंने उनको यह कदम उठाने से रोका। 

कहा; आप तो ऐसे न थे ! आप तो कह रहे थे कि, 'अब यहाँ से हमारी लाश ही उठेगी, मैं दलबदल नही करता।'....  वह थोड़ी देर चुप रहे फ़िर उन्होंने अपने दर्द को आवाज दी और कहा कि आप हमें अब भी जिंदा मानते हैं। अरे भाई! हम तो इस पार्टी में जिंदा लाश हैं और ऐसा कहकर वे निढाल होकर सोफे पर एक तरफ संभलते हुए लुढ़क से गये !!! 

करीबी होने और आँखों के लिहाज के चलते मैंने उत्साह भरा। मैंने कहा दिल न छोटा करिये। पद ही सब कुछ नहीं होता और फिर आप तो राजनीति में सेवा के लिए आए थे न!!


 उन्होंने कहा काहे की सेवा.... हम सर्वहारा वर्ग के उत्थान के लिए राजनीति में आए थे, आज हमारी खुद की हालत सर्वहारा वर्ग जैसी हो गयी है। जो खुद का उत्थान न कर सका वह दूसरों का क्या करेगा?? दरवाजे पर एक सरकारी नल तक न लगवा सका। अब और ज्यादा न कहलवाइये अपने ऊपर घिन आने लगी है, कहते-कहते वह भावुक हो उठे। मैंने उनको समझाना चाहा कि पार्टी छोड़ने पर आपका पहला जैसा सम्मान न रहेगा। वह विमर्श की मुद्रा में आ गए और कहने लगे भाई! आप इतिहास उठा के देखिये। सुभाष, लोहिया, जेपी, चंद्रशेखर और वी.पी.सिंह आदि सबने अपनी-अपनी पार्टी छोड़ी और नई पार्टी बनाई। किसका सम्मान कम हुआ आप ही बताइए? बल्कि मेरा तो मानना है कि पार्टी छोड़ने के बाद ही उनकी इज्ज़त बढ़ी ही है। और आजकल तो थोक में लोग बदलते हैं। कई बार तो मूल पार्टी में संस्थापक ही बचता है, बाकी सब निकल लेते हैं। तर्क अकाट्य थे, सो मानना पड़ा। पर मैंने सवाल उठाया कि पार्टी छोड़ने की वजह भी तो बतानी पड़ेगी जनता को। 

उन्होंने कुशल राजनीतिज्ञ की भाँति मुस्कुराकर कहा कि मैं कल ही एक बयान जारी करूँगा की पार्टी में लोकतंत्र नहीं रह गया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो अब पार्टी में बची ही नहीं। वह सिद्धांतों से भटक सिर्फ़ सत्तावादी राजनीति करने लगी है। पार्टी में अब व्यक्ति-पूजा का बोलबाला है। मेरे जैसे स्वाभिमानी, सिद्धांतवादी लोगों का यहाँ रुकना अब संभव नहीं। मैं जान दे सकता हूँ, पर अपने उसूलों से समझौता नहीं कर सकता। वह वसीम बरेलवी को गाने लगे, " उसूलों पे जहाँ आंच आए टकराना जरूरी है" वह अब पूरी तरह रौ में आ चुके थे।


 लेकिन मैंने उन्हें लगभग रोकते हुए कहा कि कुछ समय पहले तो आप शीर्ष नेतृत्व के बारे में कह रहे थे कि उनकी छवि हमारे हृदय में उसी तरह बसती है, जिस तरह हनुमान के हृदय में राम-सिया। यह भी तो व्यक्ति पूजा ही हुई।


वह फिर भावुक हो गए, कहने लगे कि अब जब वही राम न रहे तो हम हनुमान जी की पूँछ कहाँ तक पकड़े रहेंगे। 


'अब न रहे वो पीने वाले अब न रही वो मधुशाला' कहकर वह अपने समर्थन में बच्चन साहब को घसीट लाए.

उन्होंने कहा कि आपको पता है कि राम हनुमानजी से बगैर पूछे कोई काम नहीं करते थे। यह था जलवा उनका। 


लेकिन उनकी बात अलग थी, मैंने उन्हें टोकते हुए कहा..


"क्या अलग बात थी. वे लगभग खीजते हुए बोले। मेरे अंदर तो आपको कोई अच्छाई दिखती ही नहीं।"


नहीं मेरा मतलब यह नहीं था, मैंने बात घुमाई।

 मैंने कहा- "हनुमानजी के अंदर कोई पद की लालसा नहीं थी। बस सेवा-भाव से थे।"

जुझारूलाल ने समझाते हुए कहा कि वह वानर थे और तिस पर घर न घरवाली। उनको किस चीज की जरूरत। रहने के लिए पेड़ बहुत। भैय्या यहाँ परिवारदार आदमी तिस पर पापी पेट का सवाल! वे दीनता पर उतर आए। और रही बात सेवा की तो जितनी सेवा मैंने इनकी (पार्टी-प्रमुख) की' उतनी तो अपने बाप तक की नहीं की। मुझे उनसे सहानुभूति हो आई।


 मैंने बात बदलते हुए एक बड़े राष्ट्रीय दल का नाम लिया और बताया कि वहाँ जुगाड़ लगाइये। बात बन सकती है। वहाँ कुछ संभावनाएं हैं। पर वह मायूस हो गए उन्होंने बताया कि वहां हमारे लिए कुछ नहीं होगा और फ़िर वहां घुसना भी तो आसान नहीं। उन्होंने बताया- "आपको तो पता ही है कि अभी हाल ही में एक बहस के दौरान उनके नेता जो बार-बार अभिव्यक्ति की आजादी मुद्दा उठाकर हमको बोलने नहीं दे रहे थे, को हमने वहीं पटक के मारा था। हमने पूछा था और चाहिए आजादी ???"

ख़ैर, सो अब अपनी वहाँ कहाँ गुंजाइश ??


फ़िर उन्होंने खुद ही संभावनाओं को ख़त्म करते हुए कहा- "अब किसी के दरवाजे पर नहीं जाऊँगा, मैं खुद की पार्टी बनाऊंगा और खुद ही प्रवक्ता बनूँगा।" अब मेरे के पास उन्हें शुभकामनाएं देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था .......


        - संजीव शुक्ल

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

सुरेश कांत की नजर में व्यंग्य

 दोस्तो, हास्य और व्यंग्य के संबंध में बहुत-से विचार आए। उनमें कुछ व्यवस्थित और मौलिक भी थे, जैसे जयप्रकाश पांडेय जी के विचार। मेरे भी इस संबंध में कुछ विचार हैं, जिनसे आपका सहमत होना बिलकुल भी आवश्यक नहीं है। मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि फेसबुक पर आते ही मेरे विचारों को व्यंग्यकार विभिन्न मंचों पर अपने विचारों के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं। इससे मुझे अपने विचारों के सही होने की पुष्टि मिलती है।   

बहरहाल, अपने विचार प्रस्तुत करने से पहले मैं उनकी पूर्वपीठिका या नींव के रूप में कुछ बिंदु प्रस्तुत करूँगा।

1. हास्य व्यंग्य का सहोदर है। ‘सहोदर’ का मतलब ‘भाई’ होता है, लेकिन सिर्फ ‘भाई’ नहीं होता, बल्कि एक ही माता के उदर को साझा करने वाला (सह+उदर) ‘सगा भाई’ होता है। इसीलिए दोनों में कुछ साम्य मिलते हैं, जिनसे भ्रमित होकर कुछ लोग दोनों को एक ही समझने तक की गलती कर बैठते हैं। आखिर, जुड़वाँ न होने पर भी भाइयों की शक्ल आपस में काफी मिलती-जुलती है। एक माँ की संतान जो ठहरे!   

2. हास्य व्यंग्य का सगा भाई ही नहीं है, बल्कि उसका ‘अग्रज’ भी है, इसलिए वह व्यंग्य पर अकसर हावी होने, उस पर अपना अधिकार जमाने की कोशिश करता है।

3. हास्य का कोई उद्देश्य नहीं होता, सिवा हँसाने के सिवा, लेकिन ‘हँसाना’ उद्देश्य न होकर हास्य का गुण या धर्म होता है। अब (भारत में) यदि किसी की नाक पकौड़े जैसी है, तो हास्य को उसी में हँसाने के लिए बहुत-कुछ मिल जाता है, जबकि इसमें उस व्यक्ति-विशेष का कोई ‘दोष’ नहीं होता। जायसी के संबंध में एक जनश्रुति है। वही जायसी, जिनकी काव्य-कला के पीछे रामचंद्र शुक्ल ने कबीर तक को ‘डंप’ कर दिया था। कहते हैं कि वे जायसी कुछ कुरूप थे। एक बार वे शेरशाह के दरबार में गए। शेरशाह उनके ‘भद्दे’ चेहरे को देखकर हँस पड़ा। यह हास्य था, जो जायसी के चेहरे की कुरूपता ने उपजाया था। जायसी ने अत्यंत शांत स्वर में बादशाह से पूछा, ‘मोहि का हँसेसि कै कोहरहिं?’ यानी तू मुझ पर हँस रहा है या उस कुम्हार पर, जिसने मुझे गढ़ा है? यह व्यंग्य था, जिसका परिणाम यह निकला कि बादशाह बहुत लज्जित हुआ और उसने क्षमा माँगी। जमाने-जमाने की बात है! ऐसा ही प्रसंग अष्टावक्र ऋषि के संबंध में भी मिलता है।

4. व्यंग्य का एक स्पष्ट उद्देश्य होता है और वह है असंगति, विसंगति, अन्याय, अत्याचार आदि के खिलाफ आवाज उठाना, कमजोर की आवाज बनना (न कि उसकी गलतियाँ निकालने का परिश्रम करके कथित रूप से ‘तटस्थ’ बनने की कोशिश करना)।

5. स्तरीय हास्य रचना कोई आसान काम नहीं है, समस्या सिर्फ यह है कि वह अधिक देर तक स्तरीय रह नहीं पाता, ‘निरुद्देश्य’ होने के कारण बड़ी जल्दी ट्रैक से उतर जाता है, फूहड़ हो जाता है। व्यंग्य के साथ आने पर वह उसे भी अपनी संगति से प्रभावित करने की कोशिश करता है। इसीलिए व्यंग्य में हास्य से परहेज रखने की बात की जाती है।

इन बिंदुओं से आप हास्य और व्यंग्य का अंतर समझ गए हॉगे।

अब सवाल यह उठता है कि व्यंग्यकार हास्य और व्यंग्य को लेकर खेमे में क्यों बँट जाते हैं। मेरा विचार है ऐसा केवल वही व्यंग्यकार करता है, जो असल में व्यंग्यकार नहीं है, पर जो किसी तरह, या जिसने किसी तरह, अपने को व्यंग्यकार ‘मनवा’ लिया है। वरना ये दोनों अलग-अलग विधाएँ हैं, जिन्हें अपने-अपने सामर्थ्य और रुचि के अनुसार अलग-अलग लोग लिखते हैं। 

लेकिन चूँकि ये सहोदर हैं, इसलिए दोनों अनायास ही एक-दूसरे को ओवरलैप करते हैं। यहीं व्यंग्यकार को सजग रहना पड़ता है, क्योंकि हास्य के साथ आकर व्यंग्य तो उसकी गुणवत्ता बढ़ा देता है, किंतु व्यंग्य के साथ आकर हास्य उसकी गुणवत्ता घटा सकता है, और घटा सकता क्या, घटा ही देता है।

शुद्ध हास्य पढ़कर आपका मनोरंजन तो हो सकता है, किंतु अंत में ’तो क्या?’, ‘मिला क्या?’ जैसे प्रश्न खड़े हो जाते हैं, जबकि व्यंग्य पढ़कर आदमी का मनोरंजन भले हो, पर उसमें स्थितियों के प्रति आक्रोश, असहमति और सक्रियता भी उत्पन्न होती है।

ध्यान रहे, व्यंग्य साहित्य है और सरस होना साहित्य का अनिवार्य गुण-धर्म है—रसो वै स:! व्यंग्य में र्स नहीं होगा, तो उसे साहित्य से खारिज कर दिया जाएगा। लेकिन वह ‘रस’ फूहड़ता से नहीं आता. व्यंग्य अपना रस स्वयं उत्पन्न करता है। वह हास्य जैसा लग सकता है, पर होता नहीं है।  

रही बात यह कि व्यंग्य में हास्य और हास्य में व्यंग्य होना चाहिए या नहीं, या होंना चाहिए तो कितना? तो यह व्यंग्यकार नहीं, रचना तय करती है। जब रचना यह तय करती है, रचनाकार नहीं, और रचनाकार रचना को ऐसा करने देता है, उसमें बाधा नहीं डालता, रेलगाड़ी के ड्राइवर की तरह केवल जरूरत पड़ने पर ही हस्तक्षेप करता है, तो व्यंग्य में हास्य और हास्य में व्यंग्य बिलकुल सही मात्रा में आता है, अन्यथा रचनाकार द्वारा जबरन ‘घुसेड़ा’ गया हास्य व्यंग्य की गरिमा नष्ट करने में देर नहीं लगाता।

यह भी गौरतलब है कि व्यंग्य में जो हास्य आता है, वह हूबहू वैसा ही हास्य नहीं होता, जैसा वह शुद्ध हास्य में होता है। मेरे विचार से उसे हास्य कहा भी नहीं जाना चाहिए।    

बहुत कम प्रतिभाएँ हास्य से व्यंग्य उत्पन्न कर पाती हैं। रवींद्रनाथ त्यागी शायद इसके अकेले उदाहरण हैं।

बातें बहुत-सी हैं, लेकिन समय हो रहा है, और मेरी तबीयत भी ठीक नहीं है, इसलिए फिलहाल इतना ही।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

पहले मैं.....

 "पहले मैं ही जाऊंगी"


सुनो, हर वक्त,

 पहले तुम पहले तुम करते हो ना,

जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना,

तब भी पहले मैं ही जाऊंगी....


मुझे आदत नहीं बिल्कुल,

तुम बिन रहने की...

जिंदगी के सारे दर्द,

अकेले सहने की....


सुनो, हर सांस

 साथ निभाया है ना तुमने..

जब सांस टूटने लगे ना,

तो पहले मैं ही जाऊंगी...


जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना,

तब भी पहले मैं ही जाऊंगी...


सुनो, इस आंगन में,

 तुम ही लेकर आए थे..

इस आंगन से,

तुम ही लेकर जाना....

साथ निभाया तो, है अब तक तुमने...

अंत तक तुम ही साथ निभाना...


तेरे साथ ही,

 इस आंगन में आई थी...

तेरे साथ ही,

 इस आंगन से जाऊंगी.....


जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना,

तब भी पहले मैं ही जाऊंगी...


जिंदगी बाहों में ही गुजारी है तेरे,

मौत भी बाहों में ही आएगी...

पहली बार तुमने ही मांग भरी थी ना,

अंतिम बार भी, तेरे हाथों से ही भरी जाएगी...


सुनो, हर बात तुम्हारी मानी है,

इसमें एक भी नहीं मानूंगी....


जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना,

तब भी पहले मैं ही जाऊंगी....

       रीना झा शर्मा ©®.

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

पहले सी बात नहीं / महाकवि अज्ञात

जाने क्यूँ,*

*अब शर्म से,*

*चेहरे गुलाब नहीं होते।*


*जाने क्यूँ*,

*अब मस्त मौला *मिजाज नहीं होते।*


*पहले बता दिया करते थे*, 

*दिल की बातें*,


*जाने क्यूँ,अब चेहरे,*

*खुली किताब नहीं होते।*


*सुना है,बिन कहे,*

*दिल की बात, समझ लेते थे*


*गले लगते ही,*

*दोस्त,*

*हालात समझ लेते थे।*


*तब ना फेस बुक था,*

*ना स्मार्ट फ़ोन*,

*ना ट्विटर अकाउंट,*


*एक चिट्टी से ही,*

*दिलों के जज्बात, समझ लेते थे।*


*सोचता हूँ,*

*हम कहाँ से कहाँ* 

*आ गए,*


*व्यावहारिकता सोचते सोचते,*

*भावनाओं को खा गये।*


*अब भाई भाई से*,

*समस्या का *समाधान,कहाँ पूछता है,*


*अब बेटा बाप से,*

*उलझनों का निदान,*

*कहाँ पूछता है*


*बेटी नहीं पूछती,*

*माँ से गृहस्थी के सलीके,*


*अब कौन गुरु के*,

*चरणों में बैठकर*,

*ज्ञान की परिभाषा सीखता है।*


*परियों की बातें,*

*अब किसे भाती है,*


*अपनों की याद*,

*अब किसे रुलाती है,*


*अब कौन,*

*गरीब को सखा बताता है,*


*अब कहाँ,*

*कृष्ण सुदामा को गले लगाता है*


*जिन्दगी में,*

*हम केवल *व्यावहारिक हो गये हैं,*

*मशीन बन गए हैं हम सब,*

 

*इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!....*

            🙏 😊😊😊

शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

बेचन मामा

 कहानी -बेचन मामा / सीमा. मधुरिमा 


मुन्नी पॉँच साल की होगी ज़ब पहली बार अपने मामा के घर गयी या यूँ कहे उसे मामा के घर भेज दिया गया उसकी माँ द्वारा l ज़ब वो तीन साल की थी तभी उसे उसके दो और बड़े भाईयों  के साथ अपनी बड़ी अम्मा के यहाँ पढ़ने के उद्देश्य से भेज दिया गया था ....या कहा जा सकता है कि उसके माता पिता कि मजबूरी थी क्योंकि उसके पिता वन विभाग में नौकरी करते थे तो उनका सरकारी आवास भी लखीमपुर स्थिति खटीमा रेंज में सुरई नामक स्थान पर था जहाँ मुन्नी के अब दो जुड़वे भाई बहन भी हो गए थे जिससे मुन्नी की माँ का ध्यान मुन्नी पर कम ही हो पाता ऐसे में मुन्नी एक बार जंगल में खोते खोते बची l माँ बिलकुल ही डर गयीं और पिता ने मुन्नी के दोनों बड़े भाईयों सँग मुन्नी को अपने बड़े भाई भाभी के घर शहर में पढ़ने के उद्देश्य से भेज दिया l मुन्नी तीन साल में ही माँ से दूर हो गयी l बड़ी अम्मा के घर में कई और चचेरे भाई बहन थे l मुन्नी को भी एक स्कूल में दाखिला दे दिया गया l मुन्नी अक्सर माँ के प्रेम को तरस जाती l स्कूल जाती तो अक्सर अपने साथियों के टिफिन चुरा के खा जाती l मुन्नी शायद चोरी का मतलब तो उस उम्र में जानती ही नहीं रही होगी ....पर ज़ब उसे भूख लगती तो किसी न किसी का टिफिन खा जरूर लेती थी ...जिसकी शिकायतें घर पर पहुंचती ...तब मुन्नी को खूब डाँट पड़ती और सख्त हिदायतें दी जाती l उसे आये एक से ड़ेढ़ वर्ष ही हुए होंगे की उसे जबरदस्त खाँसी आने लगी जो महीनों ठीक नहीं हुयी ऐसे में उसे उसके गावँ भेज दिया गया l अब मुन्नी गावँ में रहने लगी जहाँ जल्दी ही उसकी माँ भी आ गयीं क्योंकि उसके पिता जी ने राजनीति में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था जिसके कारण माँ और दोनों छोटे भाईयों को गावं शिफ्ट करा दिया गया l मुन्नी बहुत खुश हुयी की अब माँ के साथ रहने को मिलेगा l ज़ब उसकी माँ रात को सोती थी तो दोनों भाई बहन को अगल बगल लेकर सोती थी और मुन्नी अपनी माँ के पैरों की तरफ उनके पैरों को ऐसे पकड़कर सोती थी मानों उसे संसार का सब सुख उन पैरों से मिल जा रहा l एक बार मुन्नी उनके पैरों को कसकर पकड़ लेती तो सुबह नींद खुलने पर ही छोड़ती l माँ का स्पर्श उसे पुलकित करता रहता l उसके चचेरे भाई बहन गावँ के पास के पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे ....मुन्नी उनके साथ अक्सर स्कूल चली जाती ....पर शाम को लौटने पर उसकी एक चचेरी बहन रोज ही उसकी माँ पर चिल्लाती ....या तो इसका  एडमिशन करवा दिया जाय या इसे मेरे पीछे स्कूल न भेजा जाय मुझे वहाँ की गुरूजी लोग डाँटती हैँ ....l

मुन्नी अपनी माँ का उदास चेहरा देखती तो उसे अच्छा नहीं लगता l खिचड़ी आने वाली थी मुन्नी के मामा के यहाँ से एक चनरपत मामा मुन्नी की माँ के लिए खिचड़ी लाये ....बस फिर क्या था उसकी माँ ने उसे उनके साथ ही मामा के घर के लिए भेज दिया और बोल दिया इसका स्कूल में दाखिला करवा देना l मुन्नी चनरपत मामा की साइकिल पर सवार हो निकल पड़ी अपने मामा के घर l मुन्नी ने अपनी  याददाश्त में पहली बार मामा का घर देख बड़ा सा दालान अंदर बड़े बड़े कमरे किसी राजमहल से कम न था ...बाहर उसके दो दो नाना अंदर घर में एक नानी एक मामी एक भैया और एक दीदी ....सबने बड़ी ही गर्मजोशी से उसका स्वागत किया l उसकी मामी एक थाली में पानी भरकर लायीं और उसे एक खटिया पर बिठाकर बड़े ही प्यार से उसके पाँव धोये मुन्नी को बहुत सुख मिला l मुन्नी मामा के घर रम गयी l स्कूल जाने लगी मामा मामी नाना नानी सभी की लाडली हो गयी l धीरे धीरे मुन्नी गावँ में भी रम गयी l मुन्नी के घर से लगभग पचास कदम दूर ही बेचा मामा का घर था जहाँ तीन परिवार रहते थे जिसमें बेचैन मामा का भी एक परिवार था l मुन्नी बेचैन मामा के घर अक्सर खेलने जाने लगी और बेचैन मामा उनके तो जैसे मुन्नी में प्राण ही बसते थे l एक बार मुन्नी को याद है गाँव में फिरकी बेचने वाला आया मुन्नी फिरकी लेने के लिए रोने लगी ....बेचैन मामा ने उस दिन मुन्नी के लिए ढेरों फिरकियाँ बना डाली ...तब जाके मुन्नी खुश हुयी ...बेचैन मामा रोज ही उसके लिए ढेरों कंडे से कलम गढ़कर देते रहते थे ...मुन्नी का स्कूल का झोला ढेरों कलम से भ्रम रहता ...उसकी पटरी सबसे ज्यादा चमकती क्योंकि बेचैन मामा उसपर खूब मेहनत करते l मुन्नी को अक्सर सुंदर सुंदर अक्षर बनाना सीखाते l मुन्नी स्कूल से घर आते ही खाने पिने की धुन की जगह बेचैन मामा के घर भाग जाती और वहीं उनकी माँ यानि नानी से कुछ मांगकर खा लेती थी ....कई बार ज़ब बेचन मामा अपने कमरे में जो ऊपर छत पर बना था सो रहे होते तो मुन्नी चुपके से जाकर भम से करके उनके सोते शरीर पर ही कूद पड़ती और वो डर जाते पर मुन्नी को देखते ही उनका गुस्सा काफूर हो जाता और मुन्नी पर बहुत सी नेह की वर्षा करते l ऐसे ही मुन्नी के एक एक दिन बीतने लगे l एक बार बेचैन मामा का कोई मित्र आया था जो उनके कमरे में ठीक वैसे ही सो रहा था जैसे मामा सोते थे और मुन्नी उसके ऊपर भी मामा को समझकर ही कूद पड़ी ...l

वो मित्र दो तीन दिन रुका ...ज़ब वो चला गया तो मुन्नी को कुछ कुछ याद आता है की उसके बेचैन मामा ने उसे सख्त हिदायत दी थी की किसी अजनबी से यूँ घुलना मिलना नहीं चाहिए ....मुन्नी ने सिर झुकाकर उनकी बात मान ली ....मुन्नी को उनकी बात का मर्म कुछ सालों बाद पता चला ...की शायद उनका वो मित्र कुछ गलत जगहों पर हाथ लगा रहा था जो मामा को बिलकुल पसंद नहीं आया था और मुन्नी अपने मामा की ही तरह उस आदमी के भी सिर पर चढ़कर खेल रही थी कभी गोद में घुस जाती l 

समय बीतता रहा मामा और मुन्नी का प्रेम प्रगाढ़ होता रहा ....मुन्नी जिसे कभी माता पिता ने भी जी भरकर प्रेम नहीं किया ....वो अब बेचन मामा जैसे एक ऐसी प्रेम की क्षत्रछाया में थी की उसे अब दुनिया के किसी प्रेम की अभिलाषा नहीं रह गयी थी इसी बीच में बेचन मामा का विवाह हुआ जिसमें मुन्नी ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और घर में एक नई मामी आयीं ....कुछ दिन तो मुन्नी को अच्छा नहीं लगा क्योंकि वो ज़ब भी अपने बेचना मामा से मिलने जाती वो मामी पहले मिलतीं लेकिन जल्दी ही मामी ने मामा और मुन्नी के वातसल्य को भाँप लिया और वो भी एक उसका हिस्सा बन गयीं ....वो भी मुन्नी को उतना ही प्रेम करने लगीं जितना कि मामा करते थे ....यूँ कहिये मुन्नी उन दोनों की पहली संतान की तरह हो गयी थीं  l इधर मुन्नी के घर में उसकी बड़ी मामी कुछ दिनों के लिए आयीं थीं जो गोरखपुर रहा करती थीं l कुछ ही दिनों बाद उसकी माँ भी आ गयीं उसके दोनों जुड़वे भाई बहन के साथ मुन्नी बहुत प्रसन्न थीं l अपनी छोटी बहन को लेकर पूरा गावँ घूमने गयी बेचन मामा से भी मिला लायी l इधर बड़ी मामी ने घर में बेचन मामा के खिलाफ सबके कान भरने शुरू कर दिए ...आखिर ये लड़की क्यों वहाँ इतना जाती है ...पता करो इसका वहाँ ज्यादा जाना ठीक नहीं मना किया करो उसकी  माँ को हिदायत देतीं ....फिर उसकी माँ उसे अक्सर डाँटने लगीं और फिर ज़ब उसके पिता आये तो उनके साथ उसे उसकी बुआ के यहाँ भेज दिया गया पढ़ने के लिए जो एक स्कूल में शिक्षिका थीं l मुन्नी वहाँ भी बुआ फूफा के प्रेम में रम गयी और ऐसे ही यहाँ वहाँ करते करते मुन्नी अब पढ़लिखकर बड़ी हो गयी l मुन्नी पन्दरह साल बाद बीस इक्कीस साल की उम्र में फिर मामा के घर गयी और बड़ी ही उत्सुकता से अपने बेचन मामा से भी मिलने गयी जो अब तीन बच्चों के पिता भी बन चुके थे l मुन्नी की आँखों के समक्ष पूरा बचपन नाच गया .....वो इस उम्र में भी एक बार अपने बेचन मामा की गोद में छुप जाना चाहती थी l 

बेचन मामा मुन्नी के समक्ष बैठे अपनी वही चीर परिचित मुस्कान और प्रेम और वातसल्य की पराकाष्ठा से भरे व्यक्तित्व मामी को मुन्नी के स्वागत के लिए चाय बनाने की आज्ञा दे अपने किसी काम में व्यस्त हो गए और मुन्नी ....मुन्नी सोचे जा रही थी कि शायद बेचन मामा न होते तो मुन्नी को अपना बचपना बिना किसी प्रेम के ही बिताना पड़ता ....मुन्नी आज मन ही मन प्रार्थना कर रही थी ईश्वर ऐसे ही मामा हर एक लड़की को जरूर देना जो अपने सुख से ज्यादा उसका ख्याल कर सके और उसकी हर जरूरत को समझ सके l


सीमा"मधुरिमा"

लखनऊ ll

बुधवार, 11 नवंबर 2020

समय के साथ बदलाव

 एक रशियन यहूदी को इजरायल में बसने का परमिशन मिला

मॉस्को हवाई अड्डे पर कस्टम अधिकारियों ने उसके थैले में लेनिन की मूर्ति देखी तो पूछ बैठा,

'ये क्या है ?

उसने कहा,

'ये क्या है ?, कॉमरेड ये गलत सवाल है, आपको पूछना चाहिये था कि ये कौन है, ये कॉमरेड लेनिन हैं जिन्होंने सोशलिज्म की बुनियाद रखी और रूस के लोगो का भविष्य उज्ज्वल किया, मैं इसे अपने साथ, अपने "यादगार हीरो" की तरह ले जा रहा हूं 

रशियन कस्टम अधिकारी थोड़ा शर्मिंदा हुये और आगे बगैर किसी जांच के उसे जाने दिया ....

तेल अवीव एयरपोर्ट पर

इजरायल के कस्टम अधिकारी ने पूछा,

'ये क्या है ?'

उसने कहा,

'ये क्या है ? ये गलत सवाल है श्रीमान, आपको पूछना चाहिये था, ये कौन है ?

ये लेनिन है, ऐसा हरामखोर दोगला का औलाद जिसने मुझे यहूदी होने के कारण,रूस छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मैं अपने साथ उसकी मूर्ति इसलिये लाया ताकि रोज, जब भी इस चूतिये पर नजर पड़े, इसकी मां-बहन एक कर सकूं''

इजरायली कस्टम अधिकारी ने कहा,

'आपको मैंने कष्ट दिया उसके लिये माफी चाहता हूं, आप इसे अपने साथ ले जा सकते हैं'

इजरायल में जब वो अपने नये घर मे पहुंचा तो मूर्ति को एक ऊंचे मेज पर रख दिया

घर और वतन वापसी की खुशी में अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को घर पर बुलाया 

उसके एक दोस्त ने सवाल किया,

'ये कौन है ?'

उसने कहा,

'मेरे दोस्त, ये कौन है ?, ये गलत सवाल है। तुम्हे पूछना चाहिये था कि 'ये क्या है ?'

ये 10 किलो शुद्ध सोना है जिसे मैं बिना कस्टम और टैक्स के लाने में सफल रहा""

निष्कर्ष :

असली राजनीति वही है जो एक ही मुद्दे को अलग अलग तरह से जैसे श्रोता हों, वैसे ही पेश किया जाये।

और इसका नतीजा भी हर तरह से बढ़िया निकलेगा

😛 😜

सोमवार, 9 नवंबर 2020

धूमिल नहीं हो सकती धूमिल की यादें / कबीर up

 यादों में धूमिल


धूमिल का आज जन्म दिन है । उन्होंने निराला और मुक्तिबोध की तरह केवल अभिव्यक्ति के खतरे नही  उठाये , कविता को साहसिक बनाया । उन्होंने कविता में लोक मुहावरों और खाटी भाषा का उपयोग किया । आम आदमी की आवाज में कविताएं लिखी ।

  धूमिल की कविता हिंदी कविता का प्रस्थान बिंदु है । उन्होंने हिंदी कविता के सौंदर्यबोध को बदलने की कोशिश की है । उनके बाद के कवियों ने उनकी कविता की खूब नकल की , और पकड़े भी गए । उन्होंने प्रजातन्त्र की विफलताओं और अंतर्विरोध को उजागर किया ।

  उनकी कविता आज के समय में ज्यादा प्रासंगिक है ।  उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि वे अभी लिखी गयी है ।  उनकी बहुपठित कविता को ही देखिए -एक आदमी रोटी बेलता है /एक आदमी रोटी खाता है /एक तीसरा आदमी भी है / जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है / वह सिर्फ रोटी के साथ खेलता है /यह तीसरा आदमी कौन है?/ मेरे देश की संसद मौन है ।

    यह आकस्मिक नही है कि उनके कविता संग्रह का नाम संसद से सड़क तक , है । उनकी कविताएं संसद में बैठे हुए विधाताओं को चुनौती देती है , उनसे प्रश्न पूछती हैं ।

  धूमिल ने उस समय जिस तीसरे आदमी की बात कही थी , वह हमारा शासक बन चुका है । उसके हाथ में देश की लगाम है । धूमिल ने इस तीसरे आदमी की धज्जियां अपनी कविता में उड़ाई है । 

  वे गुस्से के भी कवि है , कभी कभी यह गुस्सा असंयत भी हो उठता है , वे इसकी परवाह नही करते । वे क्रांतिकारी चेतना के कवि है । उन्हें यह चेतना मोचीराम में भी दिखाई देती है । समाज के ये अंतिम लोग उनकी कविता के नायक है । कुलीनता से उनका जन्म से बैर है ।

  उन्होंने लिखा है -भीड़ ने बहुत पीटा है उस आदमी को / जिसका मुख ईसा से मिलता था ।

  यही तो आज की लिंचिंग है जो आज के समय में वैध हो गयी है । पहले का विरोध अब सिंद्धात का रूप ले चुका है । यह जनतंत्र का कर्मकांड बन चुका है ।

  एक अन्य कविता में वह लिखते है - चेहरा चेहरा डर लगता है / लगता है यह गांव का नरक का / भोजपुरी अनुवाद लगता है ।

  धूमिल की कविताएं पढ़ते हुए उसमें आज के बिम्ब आसानी से मिल सकते है । उनकी कविताएं भविष्यवाणी भी करती है । 1975 के पहले की कविताएं , आज के समय मे लिखी गयी लगती हैं ।

  धूमिल अपने समय के बेचैन कवि थे , यह बेचैनी अंत तक बनी रही । मृत्यु के करीब रहते हुए उन्होंने जो काव्य पंक्तियां लिखी है , वे तस्दीक करती है कि उनकी कविता उनसे कत्तई अलग नही थी । उन्होंने लिखा था ।

  लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो /घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है ।

  उनकी स्मृति को बार बार नमन ।


 बड़े भाई स्वप्निल श्रीवास्तव के वाल से

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2020

*ब्रह्मांड* / दिनेश श्रीवास्तव

 दिनेश-दोहावली / 


              *ब्रह्मांड*


यहाँ सकल ब्रम्हांड का,निर्माता है कौन?

तर्कशास्त्र ज्ञाता सभी, हो जाते हैं मौन।।-१


वेदशास्त्र गीता सभी,अलग-अलग सब ग्रंथ।

परिभाषा ब्रह्मांड की,देते हैं सब पंथ।।-२


सकल समाहित है जहाँ,पृथ्वी,गगन समीर।

वही यहाँ ब्रह्मांड है,बतलाते मति-धीर।।-३


परमब्रह्म को जानिए, निर्माता ब्रह्मांड।

बतलाते हमको यही,पंडित परम प्रकांड।।-४


पंचभूत निर्मित यथा,काया सुघर शरीर।

काया ही ब्रह्मांड है,जो समझे वह धीर ।।-५


पंचभूत विचलित जहाँ, पाता कष्ट शरीर।

इसी भाँति ब्रह्मांड भी,पाता रहता पीर।।-६


ग्रह तारे गैलेक्सियाँ, सभी खगोली तत्त्व।

अंतरिक्ष ब्रह्मांड का, होता परम महत्व।।-७


गूँजे जब ब्रह्मांड में,'ओम' शब्द का नाद।

सभी चराचर जीव के,मिट जाते अवसाद।।-८


नष्ट न हो पर्यावरण,करें संवरण लोभ।

होगा फिर ब्रह्मांड में,कभी नहीं विक्षोभ।।-९


देवत्रयी ब्रह्मांड के,ब्रह्मा,विष्णु महेश।

ब्रह्मशक्ति की साधना,करता सदा 'दिनेश'।।-१०


                 दिनेश श्रीवास्तव

                 ग़ाज़ियाबाद

आज का दिन मंगलमय हो

 प्रस्तुति - कृष्ण  मेहता 

🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞

⛅ *दिनांक 22 अक्टूबर 2020*

⛅ *दिन - गुरुवार*

⛅ *विक्रम संवत - 2077 (गुजरात - 2076)*

⛅ *शक संवत - 1942*

⛅ *अयन - दक्षिणायन*

⛅ *ऋतु - हेमंत*

⛅ *मास - अश्विन*

⛅ *पक्ष - शुक्ल* 

⛅ *तिथि - षष्ठी रात्रि 07:39 तक तत्पश्चात सप्तमी*

⛅ *नक्षत्र - पूर्वाषाढा 23 अक्टूबर रात्रि 01:00 तक तत्पश्चात उत्तराषाढा*

⛅ *योग - सुकर्मा 22 अक्टूबर रात्रि 02:37 तक तत्पश्चात धृति*

⛅ *राहुकाल - दोपहर 01:48 से शाम 03:14 तक* 

⛅ *सूर्योदय - 06:38* 

⛅ *सूर्यास्त - 18:07* 

⛅ *दिशाशूल - दक्षिण दिशा में*

⛅ *व्रत पर्व विवरण - सरस्वती पूजन, हेमंत ऋतु प्रारंभ*

 💥 *विशेष - षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*

               🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞


🌷 *दाँतों में से खून निकलता हो तो* 🌷

🍋 *नीबूं का रस मसूड़ों को रगड़ने से आराम होगा ।*

🙏🏻 *- पूज्य बापूजी Jodhpur 4th Sep, 2011*

           🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞


🌷 *वास्तु शास्त्र* 🌷

🏡 *किचन में दवाईयां रखने की आदत वास्तु के अनुसार बिलकुल गलत मानी जाती है। ऐसा करने से लोगों की सेहत में उतार-चढाव बना रहता हैं।*

             🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞


🌷  *इन तिथियों का लाभ अवश्य लें* 🌷

 ➡ *२५ अक्टूबर - दशहरा, विजयादशमी ( पूरा दिन शुभ महूर्त ), संकल्प, शुभारम्भ, नूतन कार्य , सीमोल्लंघन के लिए विजय मुहूर्त ( दोपहर २:१८ से ३:०४ तक ), गुरु-पूजन, अस्त्र-शस्त्र- शमी वृक्ष – आयुध-वाहन पूजन*

➡ *२७ अक्टूबर - पापांकुशा एकादशी ( इस दिन उपवास करने से कभी यमयातना नहीं प्राप्त होती | यह स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्य, सुंदर स्त्री, धन व मित्र देनेवाली है | इसका व्रत माता, पिता व पत्नी के पक्ष की १०-१० पीढ़ियों का उद्धार करता है |)*

➡ *३० अक्टूबर - शरद पूर्णिमा खीर चन्द्रकिरणों में रखें (३१ अक्टूबर शरद पूर्णिमा व्रत हेतु) (२७ अक्टूबर से ३१ अक्टूबर तक ) रात्रि में चन्द्रमा को कुछ समय एकटक देखें व पूर्णिमा की रात में सुई में धागा पिरोयें, इससे नेत्रज्योति बढती है ।*

➡ *३१ अक्टूबर से ३० नवम्बर - कार्तिक मास व्रत व पुण्यस्नान ( इसमें आँवले की छाया में भोजन करने से पाप नष्ट हो जाता है व पुण्य कोटि गुना होता है |)*

➡ *८ नवम्बर - रविवारी सप्तमी ( सूर्योदय से सुबह ७: ३० तक), रविपुष्यामृत योग ( सूर्योदय से सुबह ८:४६ तक )*

➡ *११ नवम्बर : रमा एकादशी ( चिन्तामणि व कामधेनु के सामान सर्व मनोरथपूर्तिकारक व्रत), ब्रह्मलीन मातुश्री श्री माँ महँगीबाजी का महानिर्वाण दिवस*

➡ *१३ नवम्बर - धनतेरस, उम दीपदान, नरक चतुर्दशी ( रात्रि में मंत्रजप से मन्त्रसिद्धि)*

➡ *१४ नवम्बर - नरक चतुर्दशी (तैलाभ्यंग स्नान), दीपावली ( रात्रि में किया गया जप-तप, ध्यान-भजन अनंत गुना फलदायी )*

➡ *१६ नवम्बर - नूतन वर्षारम्भ (गुजरात), कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा ( पूरा दिन शुभ मुहूर्त, सर्व कार्य सिद्ध करनेवाली तिथि), भाईदूज, विष्णुपदी संक्रांति ( पुण्यकाल : सुबह ६:५५ से दोपहर १:१७ तक) (ध्यान, जप व पुण्यकर्म का लाख गुना फल )*

🙏🏻 *


             🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🙏🍀🌷🌻🌺🌸🌹🍁🙏

अपनों का साथ

 *पिता की चारपाई*


पिता जिद कर रहे थे कि उसकी चारपाई गैलरी में डाल दी जाये। बेटा परेशान था। बहू बड़बड़ा रही थी..... कोई बुजुर्गों को अलग कमरा नहीं देता, हमने दूसरी मंजिल पर ही सही एक कमरा तो दिया.... सब सुविधाएं हैं, नौकरानी भी दे रखी है। पता नहीं, सत्तर की उम्र में सठिया गए हैं?


निकित ने सोचा पिता कमजोर और बीमार हैं.... जिद कर रहे हैं तो उनकी चारपाई गैलरी में डलवा ही देता हूँ। पिता की इच्छा पू्री करना उसका स्वभाव भी था।


अब पिता की चारपाई गैलरी में आ गई थी। हर समय चारपाई पर पडे रहने वाले पिता अब टहलते टहलते गेट तक पहुंच जाते। कुछ देर लान में टहलते। लान में खेलते नाती - पोतों से बातें करते , हंसते , बोलते और मुस्कुराते। कभी-कभी बेटे से मनपसंद खाने की चीजें लाने की फरमाईश भी करते। खुद खाते , बहू - बेटे और बच्चों को भी खिलाते ....धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य अच्छा होने लगा था।


दादा मेरी बाल फेंको... गेट में प्रवेश करते हुए निकित ने अपने पाँच वर्षीय बेटे की आवाज सुनी तो बेटे को डांटने लगा... 

अंशुल बाबा बुजुर्ग हैं उन्हें ऐसे कामों के लिए मत बोला करो।


पापा! दादा रोज हमारी बॉल उठाकर फेंकते हैं....अंशुल भोलेपन से बोला।


क्या... "निकित ने आश्चर्य से पिता की तरफ देखा!"... हां, बेटा तुमने ऊपर वाले कमरे में सुविधाएं तो बहुत दी थीं। लेकिन अपनों का साथ नहीं था। तुम लोगों से बातें नहीं हो पाती थी। जब से गैलरी में चारपाई पड़ी है, निकलते बैठते तुम लोगों से बातें हो जाती है। शाम को अंशुल -पाशी का साथ मिल जाता है।


पिता कहे जा रहे थे  और निकित सोच रहा था..... 


बुजुर्गों को शायद भौतिक सुख सुविधाऔं से ज्यादा अपनों के साथ की जरूरत होती है ।


बुज़ुर्गों  का सम्मान करें यह हमारी धरोहर हैं ...!


यह वो पेड़ हैं जो थोड़े कड़वे हैं लेकिन इनके फल बहुत मीठे हैं और इनकी छांव का कोई मुक़ाबला नहीं✒


🌱🌿🌲🌳🍁🍂🍁🌳🌲🌿🌱

🙏🌷🌼🌺🍀🌹🍀🌺🌼🌷🙏

रविवार, 18 अक्तूबर 2020

झारखण्ड के पलामू वाला काजर

 #ठेठ_पलामू:- #जड़ी-बूटी और #काजर

-------------------------------------------------------

पिछला साल इहे दशहरा टाईम का बात है, भोरे-भोरे उठे तो आदत के अनुसार आँख मइसत उठ के ऐनक देखने गए कि खूबसूरती तनी-मानी बचल है अगुआ लोग के लिए कि सब साफ हो गया। तो अपन चेहरा देख के डेरा गए। पूरा आँख के नीचे करिया हो गया था। जब हाथ से छुए तो पता चला कि काजर लगा हुआ था। फिर याद आया कि #जा_सार_के दशहरा न स्टार्ट हो गया, तो वही माई लगा दी थी। रात में सुतला घरी कि रात के कोई डायन बिसाहिन के नज़र न लगे। अब बड़े हो गए थे, तो सोचे अब न तो बच्चा हैं न ही #सुनर हैं, तो नजर थोड़े लगेगा, पर बात का है न कि माई के लिए बेटा भले 2 लईका के बाप बन जाए, लेकिन उ बच्चा ही रहता है और दुनिया में सबसे सुंदर दिखता है। सो ज़ाहिर सी बात है, नजर से बचाना था तो काजर तो लगाना था।


लईका में दशहरा के ठीक एक दिन पहिले बड़की फुआ के ड्यूटी रहता था। एगो थरिया में बालू आऊ करिया कपड़ा सुई डोरा लेके बैठ जाती थी और सब के लिए छोटा-छोटा चरखूँट आकार में कपड़ा के थैली बना-बना के ओकरा में बालू भर के सी देती थी। अब जे बड़हन लईका रहे उ बाँह पर बाँधे, न तो छोटकन लईकन के नया #डांडा में सी के मिलता था। मने सब के सुरक्षा के लिए बुलेट प्रूफ प्रोटेक्शन तैयार रहता था। रोज रात में सोने के बाद #लीलार में, आँख में, हाथ-पैर के #तरुआ में काजर कर दिया जाता था। जो हमलोग जैसा बड़ा हो जाते भोरे उठते-उठते जा के मुँह धोते कि कोई चिढाये नहीं देख के। 


रात में जब दशहरा के मेला ई सब देखने निकलते, तो सब के अंदर ई विश्वास रहता था, कि जड़ी-बूटी तो पहिने हैं, हमको थोड़े कुछ होगा। बस जे हाल अभी कोरोना के समय में मॉस्क पहिन के फील होता है, उहे उस टाईम जड़ी-बूटी से होता था। गलती से कौनो के जड़ी-बूटी टूट के गिर जाए , भूला जाये तो समझिए उहो आफ़त। "कइसे भूला गेलई, अब के के देखा था, फलना के माई तो ना न देखले हलौ।" इस तरह के ढेरे सवाल, फिर दूसरा दिन नया बना के पहनाया जाता था। 


अब डायन बिसाहिन भी दुनिया के कोना-कोना में अंधविश्वास और विज्ञान के बीच में कोरोना जैसा ही पहेली बना हुआ है। नया-नया रिसर्च चलते रहा है मानने न मानने वाला का वाद विवाद भी होते रहा है। इसलिए सही में होता है कि नहीं इसपे कोई बात नहीं करेंगे। पर करिया रंग सब  प्रकाश को सोख लेता है और काजल से आँख को बहुत फायदा है दुनो बात विज्ञान से सत्यापित है। इसलिए अगर लड़का लोग के काजर लगा हो, तो फ़ोटो जरूर भेजिएगा। महिलाएँ लड़कियां भी काजल के साथ बढ़िया फ़ोटो भेजिए। बाकि जड़ी-बूटी अब कोई पहिनता है, बनाता है कि नहीं ये तो नहीं पता। अगर किसी के घर बना होगा, तो उसका भी फ़ोटो भेज सकते हैं।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

गीत

 *भारत का नया गीत*

××××××××××××××××


*आओ बच्चों तुम्हे दिखायें,

 शैतानी शैतान की... ।*

*नेताओं से बहुत दुखी है,

 जनता हिन्दुस्तान की...।।*


*बड़े-बड़े नेता शामिल हैं, 

 घोटालों की थाली में ।*

*सूटकेश भर के चलते हैं,

 अपने यहाँ दलाली में ।।*


*देश-धर्म की नहीं है चिंता,

 चिन्ता निज सन्तान की ।*

*नेताओं से बहुत दुखी है,

 जनता हिन्दुस्तान की...।।*


*चोर-लुटेरे भी अब देखो,

 सांसद और विधायक हैं।*

*सुरा-सुन्दरी के प्रेमी ये,

 सचमुच के खलनायक हैं ।।*


*भिखमंगों में गिनती कर दी,

 भारत देश महान की ।*

*नेताओं से बहुत दुखी है,

 जनता हिन्दुस्तान की...।।*


*जनता के आवंटित धन को,

 आधा मंत्री खाते हैं ।*

*बाकी में अफसर ठेकेदार,

 मिलकर मौज उड़ाते हैं ।।*


*लूट खसोट मचा रखी है,

 सरकारी अनुदान की ।*

*नेताओं से बहुत दुखी है,

 जनता हिन्दुस्तान की...।।*


*थर्ड क्लास अफसर बन जाता, 

फर्स्ट क्लास चपरासी है,

*होशियार बच्चों के मन में,

 छायी आज उदासी है।।*


*गंवार सारे मंत्री बन गये,

 मेधावी आज खलासी है।*

*आओ बच्चों तुम्हें दिखायें,

 शैतानी शैतान की...।।*


*नेताओं से बहुत दुखी है,

 जनता हिन्दुस्तान की.


*please share in othar Group*

Ajay Kumar Patel  

Prayagraj

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

गुड़ुप ! ( लघुकथा )/ सुभाष नीरव

 लेखनी लघुकथा मैरेथन 2020

================


मित्रो, यू.के. निवासी हिन्दी साहित्यकार और 'लेखनी' पत्रिका की संपादिका शैल अग्रवाल जी  द्वारा प्रारंभ की गई 'लेखनी लघुकथा मैरेथन, 2020' के लिए कल उन्होंने मुझे नामित किया। मैं उनका आभारी हूँ। इसके तहत मुझे पाँच दिन तक प्रतिदिन अपनी एक लघुकथा पोस्ट करनी है और किसी एक लघुकथा लेखक को नामित करना है। आज मेरा पहला दिन है। मैं अपने कथाकार मित्र बलराम अग्रवाल को इस 'लेखनी लघुकथा मैरेथन 2020' के लिए नामित करता हूँ और अपनी एक लघुकथा आपसे साझा करता हूँ।

-सुभाष नीरव

5 अक्तूबर 2020


लघुकथा

गुड़ुप !

--------

सुभाष नीरव


दिन ढलान पर है और वे दोनों झील के किनारे कुछ ऊँचाई पर बैठे हैं। लड़की ने छोटे-छोटे कंकर बीनकर बाईं हथेली पर रख लिए हैं और दाएं हाथ से एक एक कंकर उठाकर नीचे झील के पानी में फेंक रही है, रुक रुककर। सामने झील की ओर उसकी नजरें स्थिर हैं। लड़का उसकी बगल में बेहरकत खामोश बैठा है।

"तो तुमने क्या फैसला लिया?" लड़की लड़के की ओर देखे बगैर पूछती है।

"किस बारे में?" लड़का भी लड़की की तरफ देखे बिना गर्दन झुकाए पैरों के पास की घास के तिनके तोड़ते हुए प्रश्न करता है।

इस बार लड़की अपना चेहरा बाईं ओर घुमाकर लड़के को देखती है, "बनो मत। तुम अच्छी तरह जानते हो, मैं किस फैसले की बात कर रही हूँ।"

लड़का भी चेहरा ऊपर उठाकर अपनी अँखें लड़की के चेहरे पर गड़ा देता है, "यार, ऐसे फैसले तुरत-फुरत नहीं लिए जाते। समय लगता है। समझा करो।"

लड़की फिर दूर तक फैली झील की छाती पर अपनी निगाहें गड़ा देती है, साथ ही, हथेली पर बचा एकमात्र कंकर उठा कर नीचे गिराती है – गुड़ुप !

"ये झील बहुत गहरी है न?"

"हाँ, बहुत गहरी। कई लोग डूबकर मर चुके हैं। पर तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो?" लड़का लड़की की तरफ देखते हुए पूछता है। लड़की की नज़रें अभी भी दूर तक फैले पानी पर टिकी हैं, "क्या मालूम मुझे इस झील की जरूरत पड़ जाए।"

लड़का घबरा कर लड़की की ओर देखता है, "क्या मूर्खों जैसी बात करती हो? चलो उठो, अब चलते हैं, अँधेरा भी होने लगा है।"

दोनों उठकर चल देते हैं। दोनों खामोश हैं। पैदल चलते हुए लड़की के अंदर की लड़की हँस रही है, 'लगता है, तीर खूब निशाने पर लगा है। शादी तो यह मुझसे क्या करेगा, मैदान ही छोड़कर भागेगा। अगले महीने प्रशांत इस शहर में पोस्टिड होकर आ रहा है, वो मेरे साथ लिव- इन में रहना चाहता है।'

लड़के के भीतर का लड़का भी फुसफुसाता है, 'जाने किसका पाप मेरे सिर मढ़ रही है। मैं क्या जानता नहीं आज की लड़कियों को?… कुछ दिन इसके साथ मौज-मस्ती क्या कर ली, शादी के सपने देखने लगी। हुंह ! मेरी कम्पनी वाले मुझे कब से मुंबई ब्राँच में भेजने को पीछे पड़े हैं। कल ही ऑफर मंज़ूर कर लेता हूँ।'

चलते-चलते वे दोनों सड़क के उस बिन्दु पर पहुँच गए हैं जहाँ से सड़क दो फाड़ होती है। एक पल वे खामोश से एक दूजे को देखते हैं, फिर अपनी अपनी सड़क पकड़ लेते हैं।

00

सोमवार, 28 सितंबर 2020

आओ फिर लौट चले

 *थोड़ा हटके.…*

*"यदि जीवन के 50 वर्ष पार कर लिए है तो अब लौटने की तैयारी प्रारंभ करें.... इससे पहले की देर हो जाये... इससे पहले की सब किया धरा निरर्थक हो जाये....."*

✍️


*लौटना क्यों है*❓

*लौटना कहाँ है*❓

*लौटना कैसे है*❓


इसे जानने, समझने एवं लौटने का निर्णय लेने के लिए आइये टॉलस्टाय की मशहूर कहानी आज आपके साथ साझा करता हूँ :


*"लौटना कभी आसान नहीं होता"*


एक आदमी राजा के पास गया कि वो बहुत गरीब था, उसके पास कुछ भी नहीं, उसे मदद चाहिए...

राजा दयालु था.. उसने पूछा कि "क्या मदद चाहिए..?"


आदमी ने कहा.."थोड़ा-सा भूखंड.."


राजा ने कहा, “कल सुबह सूर्योदय के समय तुम यहां आना.. ज़मीन पर तुम दौड़ना जितनी दूर तक दौड़ पाओगे वो पूरा भूखंड तुम्हारा। परंतु ध्यान रहे,जहां से तुम दौड़ना शुरू करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौट आना होगा, अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा...!"  


आदमी खुश हो गया...

सुबह हुई.. 

सूर्योदय के साथ आदमी दौड़ने लगा...

आदमी दौड़ता रहा.. दौड़ता रहा.. सूरज सिर पर चढ़ आया था.. पर आदमी का दौड़ना नहीं रुका था.. वो हांफ रहा था, पर रुका नहीं था... थोड़ा और.. एक बार की मेहनत है.. फिर पूरी ज़िंदगी आराम...

शाम होने लगी थी... आदमी को याद आया, लौटना भी है, नहीं तो फिर कुछ नहीं मिलेगा...

उसने देखा, वो काफी दूर चला आया था.. अब उसे लौटना था.. पर कैसे लौटता..?

सूरज पश्चिम की ओर मुड़ चुका था.. आदमी ने पूरा दम लगाया..

वो लौट सकता था... पर समय तेजी से बीत रहा था.. थोड़ी ताकत और लगानी होगी... वो पूरी गति से दौड़ने लगा... पर अब दौड़ा नहीं जा रहा था.. वो थक कर गिर गया... उसके प्राण वहीं निकल गए...! 


राजा यह सब देख रहा था...

अपने सहयोगियों के साथ वो वहां गया, जहां आदमी ज़मीन पर गिरा था...

राजा ने उसे गौर से देखा..

फिर सिर्फ़ इतना कहा...

*"इसे सिर्फ दो गज़ ज़मीं की दरकार थी... नाहक ही ये इतना दौड़ रहा था...!"*


आदमी को लौटना था... पर लौट नहीं पाया...

वो लौट गया वहां, जहां से कोई लौट कर नहीं आता...


अब ज़रा उस आदमी की जगह अपने आपको रख कर कल्पना करें, कही हम भी तो वही भारी भूल नही कर रहे जो उसने की

हमें अपनी चाहतों की सीमा का पता नहीं होता...

हमारी ज़रूरतें तो सीमित होती हैं, पर चाहतें अनंत..

अपनी चाहतों के मोह में हम लौटने की तैयारी ही नहीं करते... जब करते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है...

फिर हमारे पास कुछ भी नहीं बचता...


अतः *आज अपनी डायरी पैन उठाये कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर अनिवार्य रूप से लिखें* ओर उनके जवाब भी लिखें

मैं जीवन की दौड़ में सम्लित हुवा था, आज तक कहाँ पहुँचा?

आखिर मुझे जाना कहाँ है ओर कब तक पहुँचना है?

इसी तरह दौड़ता रहा तो कहाँ ओर कब तक पहुँच पाऊंगा? 


*इस पोस्ट को भले लाइक ना करे, कॉमेंट ना करें आगे साझा ना करें पर मेरा विनम्र निवेदन है इन प्रश्नों के जवाब लिखित में अवश्य नॉट कर ले यही मेरी पोस्ट की सार्थकता होगी, की हम सबके जीवन को दिशा मिल जाये... हम लौटने की तैयारी कर पाए*


हम सभी दौड़ रहे हैं... बिना ये समझे कि सूरज समय पर लौट जाता है...

अभिमन्यु भी लौटना नहीं जानता था... हम सब अभिमन्यु ही हैं.. हम भी लौटना नहीं जानते...


सच ये है कि "जो लौटना जानते हैं, वही जीना भी जानते हैं... पर लौटना इतना भी आसान नहीं होता..."


*काश टॉलस्टाय की कहानी का वो पात्र समय से लौट पाता...!*


*"मै ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि  हम सब लौट पाए..! लौटने का विवेक, सामर्थ्य एवं निर्णय हम सबको मिले.... सबका मंगल होय...."*

✍️

बुधवार, 23 सितंबर 2020

महाभारत के नौ सूत्र सार

महाभारतो इस तरह पढ़े 

 यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय न हो तो भी इसके नौ सार- सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं:-


कौरव 


1.संतानों की गलत मांग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे


कर्ण 


2.आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हों, तो आपकी विद्या, अस्त्र-शस्त्र-शक्ति और वरदान सब निष्फल हो जायेगा


अश्वत्थामा 


3.संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे. 


भीष्म पितामह 


4.कभी किसी को ऐसा वचन मत दो  कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े. 


दुर्योधन 


5.संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है. 


धृतराष्ट्र 


6.अंध व्यक्ति- अर्थात मुद्रा, मदिरा, अज्ञान, मोह और काम ( मृदुला) अंध व्यक्ति के हाथ में सत्ता भी विनाश की ओर ले जाती है. 


अर्जुन 


7.यदि व्यक्ति के पास विद्या, विवेक से बंधी हो तो विजय अवश्य मिलती है. 


शकुनि 


8. हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते 


युधिष्ठिर 


9.यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता पूर्वक पालन करेंगे, तो विश्व की कोई भी शक्ति आपको पराजित नहीं कर सकती. 


यदि इन नौ सूत्रों से सबक लेना सम्भव नहीं होता है तो जीवन में महाभारत संभव हो जाता है।

शनिवार, 19 सितंबर 2020

लघुकथा के साहनी / सुभाष नीरव

लघुकथा संसार 

 कथाकार मित्र सुकेश साहनी मुझसे बेशक आयु में तीन वर्ष छोटे हों, पर लेखक के तौर पर मेरे अग्रज और वरिष्ठ हैं। मुझे साहनी जी की लघुकथाएं प्रारम्भ से प्रभावित करती रही हैं और मैं इनकी अनेक लघुकथाओं को लघुकथा के मानक के रूप में  लेता रहा हूं। लघुकथा में  बारीकी और उसकी गुणवत्ता को कैसे अपने रचनात्मक कौशल से रचा - बुना जा सकता है, यह मैंने सुकेश साहनी की लघुकथाओं से सीखने की कोशिश की। कुछ नाम और हैं जैसे रमेश बतरा,  भगीरथ, सूर्यकांत नागर, बलराम अग्रवाल जिनकी लघुकथाओं ने मुझे सीखने - समझने की भरपूर ज़मीन दी। सुकेश भाई की न केवल लघुकथाएं, बल्कि इनकी कहानियां भी मुझे उद्वेलित और प्रेरित करती रही हैं। इनके भीतर का कथाकार ' कहानी ' और ' लघुकथा ' दोनों को साधने में सिद्धहस्त है। यही कारण है कि सुकेश मुझसे उम्र में छोटे होने के बावजूद मुझसे बड़े हैं। इनकी विनम्रता का तो मैं कायल हूं। बहुत से लघुकथा सम्मेलनों में मिलने और एक साथ मंच साझा करने का मुझे अवसर मिला है।  इनकी नई आलोचना पुस्तक "लघुकथा : सृजन और रचना - कौशल" कल मुझे डाक में मिली।     इसमें लघुकथाओं, लघुकथा संकलनों, लघुकथा संग्रहों को लेकर और विशेषकर कथादेश की अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिताओं को लेकर समय - समय पर लिखे आलेख संकलित किए गए हैं। ये सभी महत्वपूर्ण आलेख इधर - उधर बिखरे हुए थे, उन्हें एक जगह एक किताब में उपलब्ध कराया गया है, जिसे मैं ज़रूरी भी मानता हूं।  

इस किताब को हमारे प्यारे मित्र भूपाल सूद (अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली) ने छापा है। वह आज हमारे बीच नहीं हैं, पर न जाने क्यों सुकेश भाई की अयन प्रकाशन से छप कर अाई इस किताब को छुआ, तो यूं लगा जैसे भूपी भाई को छुआ हो, यह छुअन बहुत अपनी सी लगी, जैसे वह जब मिलते थे, मुस्कराते हुए हाथ बढ़ाकर सीधे गले लगा लेते थे, ठीक वैसी ही आत्मीय सी छुअन ! 

हार्ड बॉन्ड में 150 पेज की इस किताब की कीमत 300 रुपए है।

बहरहाल, भाई सुकेश साहनी जी को दिल से बधाई। 

- सुभाष नीरव

19 सितम्बर 2019

बुधवार, 2 सितंबर 2020

🙏 दाता की दया है 🙏

  *हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं ।*


 *इस  संसार के हालातों से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।* 


सुन रहा हूं सत्संग आपकी दया व मेहर से ।

उठा रहा हूं रुहानी लाभ इन बंदिशों में भी।।


अविष्कारों  का उपयोग करना तो अब सीख रहा हूं ।

मगर तेरे दर्शन के वियोग में सब बेरंग महसूस  किये जा रहा हूं ।।


हे मेरे दाता अब और सहा नही  जाता ।

तेरे दर्शन के बिना मेरा मन बार बार बेचैनी से भर जाता ।।


मिल रही है भरपूर दया ई सत्संग शब्द सुनने की ।

मगर पूरी नहीं होती हसरत तुझसे मिलने की ।।


मुझे अपने चरणों में लगा लें दाता ।

मैं तेरा दास हूं मुझे बुला ले दाता ।।


दाता तेरे दर्शन को मैं तरस गया हूं ।

मैं सत्संग रोज सुनकर अपने आप को रोक रहा हूं ।।


दिल करता है कि तेरे दर पे दौड़ आऊं, सब बंधन तोड़कर ।

मगर तेरे आदेशों का पालन कर अपने आप को रोक रहा हूँ ।।


*हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं।*

*इस संसार के हालात से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।*


प्राथना कुल मालिक के चरणों में


(SANT ADHAR BARODA BRANCH)



*दाता जी की दया है*


दाता जी की दया है

कि हम सब बेख़ौफ़ जुड़े हैं

 सत्संग  सुनने को मिल रहा है

और घर बैठे दर्शन भी मिल रहा है।


बस दाता जी की दया है

खेतों की सेवा का यह नया रूहानी  आलम है।


दया मेहर की पर्चे और सुपरमैन नस्ल की मिसाल है।

निर्मल अमृत दूध का प्रसाद दया की दया धार है।।

चाय , टोस्ट, फ्लेवर्ड मिल्क, और मक्खन, सूरत की अपनी ही खुराक है।

 

बस दाता जी की दया है


दयालबाग की जीवन शैली, दुनिया में है बेमिसाल

कर लो फौलो इसको, तुम भी हो जाओ मालामाल।

बन सुपरमैन सत्संग के, सब कुछ हमको करना है

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र के, सब गुणों को अपने में धारण करना  है।


अगर हो दया दाता दयाल की तो उनके चरणों में पूरा जीवन अर्पण कर दूंगा। रहमत के आश्रय राधा स्वामी मिशन में अपनी सारी सांसे कुर्बान कर दूंगा । 


बस रहमत हो उस कुल मालिक की मालिक की, अपनी जान लगा दूंगा।




Writer - SANT ADHAR BARODA BRANCH MGRSA

प्रेम उपदेश

 प्रेम उपदेश:-(परम गुरु हुज़ूर महाराज)

19. जिस किसी सच्चे प्रेमी का यह हाल है कि जब किसी की भक्ति की बढ़ती का हाल सुनता है, तब ही अपनी ओछी हालत से मिला कर सुस्त और फ़िक्रमंद हो जाता है, सो यह बहुत अच्छा है और यह निशान दया का है। इसी तरह इस जीव को ख़बर पड़ती है और अपनी हालतों को देखता है और अपने मत को चित्त से सुनता है और विचारता है। ग़रज़ कि इसमें सब तरह की गढ़त है, इसको दया समझो।

20. जो वक्त़ ध्यान और भजन के बजाय स्वरूप सतगुरु के कुटुम्बी और मित्रों की सूरतें नज़र आवें, उसका सबब यह है कि वह स्वरूप अभी हिरदे में धरे हैं, आहिस्ता आहिस्ता निकल जावेंगे। हुज़ूर राधास्वामी दयाल अपनी दया से सब तरह सफ़ाई करते हैं।

21. हुज़ूर राधास्वामी दयाल सब तरह से जीवों पर दया कर रहे हैं। और दया के भी अनेक रूप हैं, जैसे उदासी तबीयत की भी एक तरह की दया है। हर एक को यह उदासीनता नहीं मिलती। इसमें भी कुछ भेद है। ऐसा नहीं होता कि हर वक्त़ तबीयत सुस्त रहे, पर किसी क़दर सुस्ती और उदासीनता रहने से बड़े फ़ायदे हैं।    

  22. हुज़ूर राधास्वामी दयाल आप सबको अंतर में सँभालते हैं, पर एक सतसंगी दूसरे सतसंगी का हाल देख कर जो अपनी समझ के मुवाफ़िक़ कोई बचन समझौती का सुझावे, तो उसमें कुछ हर्ज नहीं है। पर इतना कहना सब के वास्ते ठीक है कि हुज़ूर राधास्वामी दीनदयाल और समर्थ हैं और जिस जिस ने उनके चरनों की सरन सच्ची ली है, उसकी फ़िक्र और ख़बरगीरी वे आप करते हैं। पर उनकी दया की सूरतें अनेक हैं और वे सच्चे प्रेमी और बिरही को, जो निरख परख के साथ चलता है, अंतर और बाहर जल्द मालूम पड़ती हैं।.                              23. जैसी हालत जिस किसी सच्चे प्रेमी पर जब तब गुज़रती है, वह हुज़ूर राधास्वामी दयाल की मौज और दया से है और उस हालत में हुज़ूर राधास्वामी दयाल अपनी मेहर से आहिस्ता आहिस्ता तरक़्क़ी परमार्थ की बख़्शते जावेंगे, यानी कोई दिन सुस्ती और बेकली और कोई दिन आनंद और मगनता। यह दोनों हालतें संग संग चलेंगी। बेकली और घबराहट और सुस्ती ऐसी है जैसी सूरज की गर्मी, और शांति और आनंद, जो उसके पीछे प्राप्त होवे, वह ऐसा है जैसे वर्षा मेघ की। इन दोनों का आपस में जोड़ और संग है, सो किसी को घबराना नहीं चाहिए। और बहुत जल्दी करना भी मुनासिब नहीं है, क्योंकि मनुष्य की जल्दी से कुछ कारज नहीं बन सकता है। हुज़ूर राधास्वामी समर्थ दयाल प्रेमी और दर्दी भक्तों की चाह के मुवाफ़िक़ बहुत जल्दी काम बनाते हैं, पर इस दया की ख़बर धीरे धीरे मालूम पड़ेगी। शुरू में इसकी परख बहुत कम होती है। 

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

आजकल में नवल की आलोचना

 रेणु  की यादों में नवल 

नंदकिशोर नवल अगर हमारे बीच होते तो आज हम उनका 83 वां जन्मदिन मना रहे होते। बीती लगभग आधी सदी तक हिंदी साहित्य, खासकर कविता आलोचना के वे न केवल साक्षी रहे बल्कि उसके सक्रिय मार्ग-निर्धारक भी बने रहे। उन्होंने अपने आलोचकीय लेखन की शुरुआत छायावाद और उत्तर छायावाद से की। इसके बाद राजकमल चौधरी के प्रभाव में अकविता तथा अन्य प्रयोगवादी  कविता धाराओं के  वे प्रशंसक रहे और उनपर धाराप्रवाह लिखा।  राजकमल चौधरी की लंबी कविता 'मुक्ति प्रसंग' की उनकी व्याख्या कविता आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। इसके जरिये वे 'मुक्ति प्रसंग' को 'अंधेरे में' के बाद हिंदी कविता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में स्थापित करते हैं।


     आगे चलकर नवलजी नक्सलवाद से भी प्रभावित हुए और उसके प्रभाव में आकर लिखी गई रचनाओं की व्याख्या और मीमांसा की। फिर वे मार्क्सवाद की ओर प्रवृत्त हुए और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़कर प्रगतिशील और मार्क्सवादी  चिंतन से जुड़ी आलोचना की। इस दौरान प्रगतिशील चेतना वाले कवि मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर आदि उनके प्रिय रचनाकार बने रहे।  सोवियत संघ के विघटन के बाद उन्होंने खुद को  प्रगतिशील विचारधारा से अलग कर लिया। इस अलगाव के  साथ ही उन्होंने खुद को  प्रगतिशीलता और गैरप्रगतिशीलता, कथ्य और रूप आदि के विभाजन से भी अलग कर लिया। उसके बाद का नवलजी का आलोचकीय लेखन पाठ-केंद्रित है। आलोचकीय सैद्धांतिकी से अलग होकर उन्होंने अपनी पाठ-आधारित निजी सैद्धांतिकी विकसित की। इस दृष्टि से यदि उन्हें आलोचना का वैचारिक यात्री कहा जाए तो शायद गलत न होगा। 

 

     उनकी आलोचना दृष्टि में आए इस परिवर्तन को लेकर लेखक बिरादरी में तीखी प्रतिक्रिया हुई एक और जहाँ उनके मित्रों ने इसे 'आलोचना का नवल पक्ष' कह कर  अभिहित किया वहीं दूसरी ओर इसे जनधर्मी वैचारिकता से पलायन और उनके कलावादी रुझान के रूप में भी देखा गया।  इस वैचारिक दिशा परिवर्तन के बाद वे सभी कवि जो पहले उन्हें कलावादी और रूपवादी प्रतीत होते थे, उनके प्रिय बन गए। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त से लेकर दिनकर, अज्ञेय और अशोक वाजपेयी की कविताओं की भी समालोचना की।


     मैथिलीशरण गुप्त, निराला और मुक्तिबोध को वे आधुनिक हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवि मानते थे। उनका मानना था कि इन्हीं को लेकर आधुनिक हिंदी कविता की बृहद्त्रयी बनती है। वे कहते थे कि ये तीनों तीन युग का प्रतिनिधित्व करने वाले और हिंदी कविता को नया मोड़ देने वाले कवि हैं।


      अब कम लोग ही इस बात की चर्चा करते हैं कि कविता आलोचना का यह दिलचस्प यात्री स्वयं एक सुकवि था। उनके आलोचना कर्म ने इस सुकवि को पूरी तरह आच्छादित कर दिया। इसकी थोड़ी-बहुत कसक नवलजी को भी थी। अपने दूसरे कविता संग्रह ‘कहाँ मिलेगी पीली चिड़िया’ की अभियुक्ति में वे लिखते हैं कि ‘यह संग्रह अपने कवि जीवन की स्मृति स्वरूप प्रकाशित करा रहा हूँ।’ स्पष्टतः अपने कवि जीवन से उन्हें आत्मीय लगाव था और कविताई बार-बार अपनी ओर खींचती थी। हालाँकि वे कविता से बहुत दूर नहीं थे। आलोचना भी उन्होंने कविता की ही की।


      नवलजी का पहला कविता संग्रह ‘मंजीर’ सन्  1954 में प्रकाशित हुआ था। मंजीर को कविता संग्रह कहने से बेहतर होगा कविता पुस्तिका कहना। 24 पृष्ठों की इस पुस्तिका में नवलजी की आरंभिक 25 कविताएँ संकलित थीं। नवलजी नामवर सिंह, राजेंद्र यादव, विश्वनाथ त्रिपाठी आदि की तरह आगे चलकर कविता कर्म से पूरी तरह विमुख नहीं हुए। आलोचना में तल्लीन हो जाने के बावजूद उनका कविता कर्म भी निरंतर जारी रहा। छठे दशक में हिंदी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हुईं। उनका दूसरा कविता संग्रह चार दशकों के अंतराल पर सन् 1997 में ‘कहाँ मिलेगी पीली चिड़िया’ के नाम से प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी 143 कविताएँ शामिल हैं। इसके बाद ‘जनपद’ में सन् 2006 और ‘द्वाभा’ में सन् 2010 में उनकी कुल 40 कविताएँ प्रकाशित हुईं। नवलजी के 75वें जन्मदिवस के मौके पर श्याम कश्यप के संपादन में 2012 में ‘नील जल कुछ और भी धुल गया’ का प्रकाशन हुआ जिसमें उनकी प्रतिनिधि कविताएँ संकलित की गई थीं। इस तरह हम देखते हैं कि नंदकिशोर नवल आलोचना के और संपादन से समय निकालकर बीच-बीच में कविताओं की रचना भी करते रहे। हालाँकि उन्होंने इन कविताओं को स्वांतः सुखाय ही माना।


      उनके मित्र श्याम कश्यप का मानना है कि नवलजी की एक संवेदनशील समालोचक के रूप में ‘ख्याति के घनीभूत प्रकाश ने उनकी कविता को लगभग ढक लिया’ लेकिन साथ ही वे जोर देकर कहते हैं कि केवल ‘उनकी कविता को ही। आलोचक के भीतर छिपे सुकवि को नहीं। अंधकार ही नहीं, कभी-कभी तीव्र प्रकाश भी अपनी चकाचौंध से चीजों को ढककर छिपा देता है’। 


      अपने पहले कविता संग्रह में संकलित 25 कविताएँ नवलजी ने 15-16 वर्ष की अवस्था में लिखी थी। इस छोटे से संग्रह की कविताओं से उनकी समझ, संवेदन और सामर्थ्य की झलक मिल जाती है। संभवत यही वजह थी कि इसकी भूमिका में ब्रजकिशोर नारायण ने लिखा, ‘मंजीर की सभी रचनाओं को आद्योपांत अच्छी तरह पढ़ जाने के बाद मैं यह कहने का लोभ और साहस संवरण नहीं कर सकता कि पंद्रह-सोलह की यह अर्द्धस्फुटित प्रतिभा, निकट भविष्य में ही, अनेक प्रौढ़ों के समक्ष प्रश्न-चिह्न बनकर खड़ी होगी और उन्हें अपनी ओर आकर्षित होने को विवश करेगी।’ निश्चय ही विभिन्न संग्रहों और पत्रिकाओं के विशेष आयोजनों में प्रकाशित नवलजी की 200 से ऊपर कविताओं के अलावा उनकी अनेक कविताएँ अभी अप्रकाशित होंगी जिनका संकलन शीघ्र प्रकाश में आएगा।

जीवन के 80वें पड़ाव पर पहुँचने के अवसर पर ‘आजकल’ ने उनके आलोचना कर्म को रेखांकित करने वाली कुछ सामग्री प्रकाशित की थी। तब कहाँ पता था कि इतनी जल्दी, महज तीन साल बाद, अपने 83वें जन्मदिन पर वे भौतिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं रहेंगे। 


      नवलजी के समग्र साहित्यिक अवदान की चर्चा किसी पत्रिका के एक अंक में समेट पाना कठिन है। यह जानते समझते हुए ‘आजकल’ ने अपना सितंबर 2020 का अंक नंदकिशोर नवल के समग्र आलोचकीय और रचनात्मक अवदान पर केंद्रित किया है।

सोमवार, 31 अगस्त 2020

ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें

ज्ञान  प्रकाश  विवेक की ग़ज़लें  


Tuesday, September 15, 2009

ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें और परिचय









30 जनवरी 1949 को हरियाणा मे जन्में ज्ञान प्रकाश विवेक चर्चित ग़ज़लकार हैं । इनके प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह हैं "प्यास की ख़ुश्बू","धूप के हस्ताक्षर" और "दीवार से झाँकती रोशनी", "गुफ़्तगू आवाम से" और "आँखों मे आसमान"। ये ग़ज़लें जो आपके लिए हाज़िर कर रहे हैं ये उन्होंने द्विज जी को भेजीं थीं ।

एक

उदासी, दर्द, हैरानी इधर भी है उधर भी है
अभी तक बाढ़ का पानी इधर भी है उधर भी है

वहाँ हैं त्याग की बातें, इधर हैं मोक्ष के चर्चे
ये दुनिया धन की दीवानी इधर भी है उधर भी है

क़बीले भी कहाँ ख़ामोश रहते थे जो अब होंगे
लड़ाई एक बेमानी इधर भी है उधर भी है

समय है अलविदा का और दोनों हो गए गुमसुम
ज़रा-सा आँख में पानी इधर भी है उधर भी है

हुईं आबाद गलियाँ, हट गया कर्फ़्यू, मिली राहत
मगर कुछ-कुछ पशेमानी इधर भी है उधर भी है

हमारे और उनके बीच यूँ तो सब अलग-सा है
मगर इक रात की रानी इधर भी है उधर भी है

(बहरे-हज़ज मसम्मन सालिम)
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222x4

दो

तुम्हें ज़मीन मिली और आसमान मिला
हमें मिला भी तो विरसे में ख़ाकदान मिला

ज़रूर है किसी पत्थर के देवता का असर
कि जो मिला मुझे बस्ती में बेज़ुबान मिला

वो मेरे वास्ते पत्थर उबाल लाया है-
तू आके देख मुझे कैसा मेज़बान मिला

तू मुझसे पूछ कि बेघर को क्या हुआ हासिल
मिला मकान तो हिलता हुआ मकान मिला

सुना है जेब में बारूद भर के रखता था
जो शख़्स आज धमाकों के दरमियान मिला

तू उससे पूछ दरख़्तों की अहमियत क्या है
कि तेज़ धूप में जिसको न सायबान मिला

बहरे-मजतस की मुज़ाहिफ़ शक़्ल
म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन
1212 1122 1212 22/ 112

तीन

लोग ऊँची उड़ान रखते हैं
हाथ पर आसमान रखते हैं

शहर वालों की सादगी देखो-
अपने दिल में मचान रखते हैं

ऐसे जासूस हो गए मौसम-
सबकी बातों पे कान रखते हैं

मेरे इस अहद में ठहाके भी-
आसुओं की दुकान रखते हैं

हम सफ़ीने हैं मोम के लेकिन-
आग के बादबान रखते हैं

बहरे-खफ़ीफ़ की मुज़ाहिफ़ शक़्ल
फ़ा’इ’ला’तुन म’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन
2122 1212 22/112

चार

तमाम घर को बयाबाँ बना के रखता था
पता नहीं वो दीये क्यूँ बुझा के रखता था

बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लकें भर लीं,
मै दोस्तों की दुआएँ बचा के रखता था

वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों
इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था

न जाने कौन चला आए वक़्त का मारा
कि मैं किवाड़ से सांकल हटा के रखता था

हमेशा बात वो करता था घर बनाने की
मगर मचान का नक़्शा छुपा के रखता था

मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद,
कि हर कदम मैं बहुत आज़मा के रखता था

बहरे-मजतस की मुज़ाहिफ़ शक़्ल
म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन
1212 1122 1212 22/ 112

पाँच

मुझे मालूम है भीगी हुई आँखों से मुस्काना
कि मैंने ज़िन्दगी के ढंग सीखे हैं कबीराना

यहाँ के लोग तो पानी की तरह सीधे-सादे हैं
कि जिस बर्तन में डालो बस उसी बर्तन-सा ढल जाना

बयाबाँ के अँधेरे रास्ते में जो मिला मुझको
उसे जुगनू कहूँ या फिर अँधेरी शब का नज़राना

वो जिस अंदाज़ से आती है चिड़िया मेरे आँगन में
अगर आना मेरे घर में तो उस अन्दाज़ से आना

न कुर्सी थी, न मेज़ें थीं, न उसके घर तक़ल्लुफ़ था
कि उसके घर का आलम था फ़कीराना-फ़कीराना

(बहरे-हज़ज मसम्मन सालिम)
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

कुछ कविताएं

 

कुछ कविताएं  

अवसाद / डिप्रेशन 


आज हावी है हर किसी पर 

किसी न किसी रूप में ----

इसने नहीं छोड़ा बच्चों को भी 

और न ही घर के बुजुर्गो को ---

कारण साफ़ है ---

आधुनिकता की भाग दौड़ 

जिसने पीछे छोड़ दिया है 

हर रिश्ते को ---

जिसने किया है कुठाराघात ---

हर किसी के कोमल मन पर 

आज कोमलता खत्म हो गयी मन की --

सभी बेबस हैँ ---.

पर आज भी अवसाद को बीमारी की तरह 

नहीं लेते लोग . .

नहीं करते आंकलन 

नहीं करते और नहीं करवाते किसी प्रकार का चिकित्सीय विमर्श ---

जिसके कारण ---

आज हरपल खतरा मंडरा रहा है 

हर रिश्ते में 

एक अज़ीब सा डर बैठ गया है 

जाने कब और कैसे कौन सा रिश्ता 

कर देगा तार तार संबंधों को !!!


#सीमा

[8/31, 14:46] +91 97600 07588: 9760007588              सुरेंद्र सिंघल

          

          सुनो

             1

गुजरती रहेगी

 मेरे और तुम्हारे 

बीच में से 

जब तक हवा 

खिलते ही रहेंगे

 रंग बिरंगे फूल

 अपनी अपनी खुशबू

 बिखेरते हुए

 मुझ में 

तुम में 

और हमारे चारों ओर

 सुनो

 इस तरह मत जकड़ो

 अपनी बाहों में मुझे


              2

ऐसा भी क्या

 गुजर जाएं

 मेरे और तुम्हारे 

बीच में से 

हवा के साथ साथ

 जहर भरे नारे भी 

नफरतें उछालते हुए 

सुनो 

कसकर भींच लो

 अपनी बाहों में मुझे


            3

सुनो 

छलनी बन जाते हैं

 हम दोनों 

हर मिलावटी हवा के लिए

 ताकि 

गुजर पाए सिर्फ़ 

ताजी और साफ हवा

 हम दोनों के बीच में से

 ताकि

 जन्म लेते रहें 

नए नए रिश्ते

 महकते हुए 

हम दोनों के बीच

 और हमारे चारों ओर

[8/31, 22:17] +91 98736 05905: *"दरवाजे "*


पहले दरवाजे नहीं खटकते थे...

रिश्ते -नातेदार

मित्र -सम्बन्धी

सीधे

पहुँच जाते थे...

रसोई तक


वहीं जमीन पर पसर

गरम पकौड़ियों के साथ

ढेर सारी बातें

सुख -दुःख का

आदान -प्रदान


फिर खटकने लगे दरवाजे...

मेहमान की तरह

रिश्तेदार

बैठाये जाने लगे बैठक में..

नरम सोफों पर


कांच के बर्तनों में

परोसी जाने लगी

घर की शान...


क्रिस्टल के गिलास में

उड़ेल कर ...

*पिलाई जाने लगी.. हैसियत.


धीरे -धीरे

बढ़ने लगा स्व का रूप..


मेरी जिंदगी ... मेरी मर्जी

अपना कमरा..

अपना मोबाइल ..

कानों में ठुसे..द्वारपाल..

लैपटॉप..


पर कहीं न कहीं 

स्नेहपेक्षी मन.... 


प्रतीक्षा रत है...

किसी अपने का..!!!


पर अब.....

दरवाजे नहीं खटकते हैं ..!!!

कोविड युग है न

कोई आता भी है तो

दो मीटर की दूरी से

हाथ हिलाता है

चला जाता है

उसके जाने के बाद

कहते है हम

अजीब आदमी है

कोविड काल में यूँ ही घूम रहा है

इन्तजार है हमें ,उस समय का जब

दरवाजे खटकने लगेगें

हम मेजबानी करे, अपने मेहमान की

उनके मनपसन्द व्यंजनों से,

परोसे उनका मन पसन्द पेय पदार्थ,

फिर हम भी किसी का दरवाजा

 खटखटायें ,मेहमान बन 

किसी अपने के घर जायें,

हमें इन्तजार है उन दिनो का,

जब बिना दरवाजा खटकायें,

कोई अपना मेरे घर आयें,

उनको किचन में खड़े खड़े ही,

चाय पकौड़े खिलायें,

कुछ उनकी सुने,

कुछ अपनी सुनायें,

गले लगें,

मन हल्का करें,

बिना दरवाजा खटकायें,

किसी अपने के घर जाए।

[8/31, 23:12] +91 84331 34545: जीडीपी के गिरने की बिलकुल चिंता न करें. चढ़ना उतरना जीवन का धर्मं है. भगवान में आस्था रखिये. तुलसीदास जी कह ही गए हैं, हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस बिधि हाथ. जो जीडीपी गिरने से विचलित हो रहे हैं, उनकी आस्था संदिग्ध है. 

याद रखें, देश आगे बढ़ रहा है.

बुधवार, 26 अगस्त 2020

खतरनाक समय से जिरह करती कविताएँ-/ रंजीता सिंह फलक

 खतरनाक समय से जिरह करती कविताएँ----

*********************

हम विडम्बनाओं से भरे खतरनाक समय से गुजर रहें हैं,यह समय बगीचे से फूल तोड़कर माला बनाने का नहीं है,न ही किसी सुंदर चित्र में कृत्रिम रंग भरने का समय है,यह समय है,समझने और समझाने का, 

"रंजिता सिंह फ़लक" की कविताएं इसी खतरनाक समय से मनुष्य को बचाने की कोशिश करती हैं,इनकी यह कोशिश है कि विडम्बनाओं से भरे समय को लोग समझे औऱ अपने हक के लिए लड़ने के लिए जागरूक हों,अपने आसपास के लोगों को सतर्क औऱ सचेत करे.

कविता हर मनुष्य के भीतर रहती है और उसकी अनुभूतियों को भीतर ही भीतर बहाती रहती है जो इस बहती धारा को शब्दों में बांधकर कागज में उतार देता है वह कवि कहलाने लगता है.

"रंजिता सिंह" अपने भीतर बहती अनुभूतियों को आंदोलन की तरह लेती हैं और इसे प्रभावी तरह से शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती हैं,वह चाहती हैं कि हर मनुष्य इस खतरनाक समय से बहस करे,

अपनी आवाज उठाये औऱ एक संवेदनशील समाज का निर्माण करें,औऱ अपने भीतर बह रही अनुभूतियों को रचनात्मक साहस के साथ व्यक्त करे,क्योंकि कविता में इसे सरलता से व्यक्त किया जा सकता है. 

"रंजिता सिंह" की कविताएं आत्मकुंठा के दौर से गुजर रहे मनुष्य को बचाती हैं. 

आज के दौर में जो हो रहा है और जो होने वाला है,इनकी कविताएं इसकी पड़ताल करती है औऱ 

समाज,राजनीति और रुढ़िवादी मानसिकता की परतें खोलकर वास्तविक सच को उजागर करती हैं

इन कविताओं में विलाप नहीं है बल्कि मनुष्य की मानसिकता को सचेत औऱ जागरूक बनाने का सार्थक प्रयास हैं.

साहित्यकार "रंजिता सिंह" 

ऐसे ही सच्ची और पारदर्शी विचारों को सलीके से व्यक्त की पक्षधर हैं, 

इसीलिए इनकी कविताओं की भाषा सरल और सहज है जो  

आम पाठक को प्रभावित करती हैं, 

इनकी कविताओं को पढ़तें समय अपने होने और कुछ सोचने की अनुभूति होती है,

औऱ शून्य हो रहे सामाजिक जीवन को समझने की प्रेरणा देती हैं.

"रंजिता सिंह"की कविताएं लच्छेदार बातों और हवा हवाई नारों को सिरे से खारिज करती हैं औऱ मनुष्य की चेतना को जीवित रखने का हर संभव प्रयास करती हैं.

इनकी कविताओं में गहरापन है, औऱ जीवन के बहुत सारे अनुभव भी मौजूद हैं.

कविताएँ पठनीय औऱ प्रभावशाली हैं.

हार्दिक बधाई औऱ उज्जवल भविष्य की 

शुभकामनाएं----


"ज्योति खरे"

------------------------------

शर्मनाक  हादसों के  गवाह

******************

हम  जो  हमारे समय  के 

सबसे  शर्मनाक  हादसों  के 

चश्मदीद गवाह  लोग  हैं 


हम जो हमारे समय  की 

गवाही  से मुकरे 

डरे ,सहमें  मरे से  लोग हैं 


हमारे  माथे 

सीधे  सीधे 

इस  सदी  के  साथ  हुई 

घोर  नाइंसाफी 

को  चुपचाप देखने  का 

संगीन  इल्जाम  है 


हमने अकीदत की  जगह 

किये  हैं  सिर्फ और  सिर्फ 

कुफर

हमने  अपने  समय  के  साथ 

 की  है दोगली साज़िशें  .


हमने  अपने  हिस्से  की 

जलालत

पोंछ ली  है 

पसीने  की  तरह 

और  घूम  रहे  हैं 

बेशर्म  मुस्कुराहटों के  साथ 

दोहरी  नैतिकता लिए 


हम  सिल  रहें  हैं 

चिथड़े हुए 

यकीं  के  पैरहन  और 

उदासियों ,मायूसियों  और 

नाकामियों के  लिहाफ 

की  ढ़क  सकें  

अधजले  सपनों  के  चेहरे 


हमने अपने होठों पर 

जड़ ली है 

एक बेगैरत चुप्पी 

बड़ी हीं बेहय़ायी से 

दफना दी  है 

ज़िन्दा सवालों की 

पूरी  फेहरिस्त 


हमने अपनी तालू पर  

चिपका लिए हैं 

चापलूसी के गोंद 

और सुखरू हो चले हैं 

कि हमने सीखा दी है 

आने वाली नस्लों को  

एक शातिराना चुप्पी 


हम  ठोंक -पीट  कर  

आश्वस्त हो चले हैं कि 

मर चुके सभी सवाल 


पर हम भूल गए हैं कि 

असमय मरे लोगों की  तरह 

असमय मरे सवाल भी  

आ  जाते  हैं  

 प्रेत योनि में 


और भूत -प्रेत  की  तरह हीं 

निकल आते हैं  

व्यवस्था  के  मकबरों  से 

और  मंडराने लगते  हैं 

चमगादड़ों  की तरह 

हमारी चेतना के माथे  पर 


हम भूल जाते हैं कि 

कितनी भी चिंदी- चिंदी  कर  

बिखेर  दें 

तमाम हादसों के दस्तावेज 

वे तैरते रहते  हैं 

अंतरिक्ष में 

शब्दों  की  तरह 


हम भूल जाते है कि 

शब्द नहीं मरते ..

वे दिख जाते  हैं 

जलावतन किये जाने के  बाद भी 


वे  दिखते रहते हैं  

हमारे  समय  के  दर्पण  में 

जिन्हें  हम  अपनी 

सहुलियत,महत्वकांक्षाओं ,

और लोलुपताओं  

के  षडयंत्र  में 

दृष्टि-दोष कह  

खारिज  कर  देते  हैं .


हम  जो  हमारे  समय  की 

सबसे  शर्मनाक  हादसों  के 

चश्मदीद गवाह  लोग  हैं ---

---------------------

होना  अपने  साथ---

***********

पीले  पत्तों  से 

बीमार  दिन  में  भी  

हरे  सपने  

आकर  टंग  जाते  हैं  

मन  की  सुखती  सी

खुरदुरी  डाल  पर  

और  वहीं  ख्वाहिशों  की 

छोटी  सी गौरया  

फुदकती  है  

चोंच  मारती  है  ..

सपनों के अधपके फलों पर  


वहीं  नीले  से  दिन  की  

आसमानी  कमीज  पहने  

निकलता  है  कोई  

तेज  धूप  में  


सच  का  आईना  

एकदम  से  चमकता है 

और  चुभते  हैं  

कई  अक्स  माज़ी  के 

और  नीला  दिन 

तब्दील  हो  जाता  है  

सुनहरी  सुर्ख  शाम  में  


कुछ  रातरानी  और  

हरसिंगार  

अंजुरी  भर  लिये  

ठिठकता  है 

वक्त  का  एक  छोटा  सा  

हसीं  लम्हा  

और  एकदम  उसी पल 

खिल  उठता  है  पूरा  चाँद  

किसी याद  सा 


देखती  हूँ  

दूर  तक पसरती 

 स्याह  रात  

तुम्हारी  बाँहों  की  तरह  


बीमार  पीले  पत्तों  से  दिन  

हो  जाते  हैं  

दुधिया  चाँदनी  रात 


सच  हीं  है  

उम्मीदें बाँझ नहीँ होती 

वे जन्मती रहती हैं 

सपने 

उम्मीद  खत्म  होने  की  

आखिरी  मियाद तक 


ठीक  वैसे 

जैसे  जनती  है  

कोई  स्त्री  

अपना  पहला  बच्चा 

रजोवृति  के  आखिरी  सोपान  पर----

----------------------------

बिसराई  गई बहनें और  भुलाई गई  बेटियां---

******************

बिसराई गईं बहनें 

और भुलाई गई बेटियाँ 

नहीं बिसार पातीं मायके की देहरी


हालांकि जानती हैं 

इस गोधन में नहीं गाए जाएँगे 

उनके नाम से भैया के गीत 

फिर भी 

अपने आँगन में 

कूटती हैं गोधन

गाती हैं गीत 

अशीषती हैं बाप भाई जिला-जवार को 

और देती हैं 

लंबी उम्र की दुआएँ


बिसराई गईं बहनें 

और भुलाई गई बेटियाँ 

हर साल लगन के मौसम में 

जोहती हैं 

न्योते का संदेश

जो वर्षों से नहीं आए

उनके दरवाज़े 


फिर भी 

मायके की किसी 

पुरानी सखी से 

चुपचाप बतिया कर 

जान लेती हैं 


कौन से 

भाई-भतीजे का 

तिलक-छेंका होना है?

कौन-सी बहन-भतीजी की 

सगाई होनी है?  


गाँव-मोहल्ले की 

कौन-सी नई बहू सबसे सुंदर है 

और कौन सी बिटिया  

किस गाँव ब्याही गई है? 


बिसराई गईं बहनें 

और भुलाई गई बेटियाँ 

कभी-कभी 

भरे बाजार में ठिठकती हैं

देखती हैं बार-बार 

मुड़कर 


मुस्कुराना चाहती हैं 

पर 

एक उदास खामोशी लिए 

चुपचाप 

चल देती हैं घर की ओर 

जब 

दूर का कोई भाई-भतीजा 

देखकर भी फेर लेता है नज़र


बिसराई गई बहनें 

और भुलाई गई बेटियाँ 

अपने बच्चों को 

खूब सुनाना चाहतीं हैं 

नाना-नानी

मामा-मौसी के किस्से 


पर 

फिर संभल कर

 बदल देतीं हैं बात 

और सुनाने लगतीं हैं 

परियों और दैत्यों की कहानियां----

-----------------------

उदास  होना अपने वक्त की तल्खियों  पर---

***************

कांपती  सी  प्राथनाओं में  उसने  मांगी 

थोड़ी- सी  उदासी  

थोड़ा-सा  सब्र 

और 

ढ़ेर  सारा  साहस 


अपने अन्दर की आग  को 

बचाये  रखने  के  लिए 

ज़रूरी  है  

अपने वक्त की तल्खियों पर 

उदास  होना 


उन  लोगों  के  लिए 

उदास  होना 

जो  बरसों  से  खुश  नहीं  हो  पाये 


उनके  लिए  उदास  होना 

ज़िन्होने 

हमारे  हक  की  लड़ाई में 

खो दी  जीवन  की  सारी  खुशियां 

ज़िन्होने  गुजार  दिये  

बीहड़ो  में  जीवन  के 

जाने  कितने  वसंत 


ज़िन्होने  नहीं  देखे  अपने  

दूधमुंहें  बच्चे  के 

चेहरे 

नहीं  सुनी  उनकी 

किलकारियां ,

वो  बस  सुनते  रहे  

हमारी  चीखें 

,हमारा  आर्तनाद 

और  हमारा  विलाप ,


उन्होंने  नहीं  थामीं 

अपने स्कूल  जाते  बच्चे  की  

उंगलियां 

उन्होंने  थामे  

हमारे  शिकायत  के

पुलिन्दे  

हमारी  अर्जियां ..


किसी  शाम  घर  में 

चाय की गर्म 

चुस्की  के साथ  

वे  नहीं  पूछ  पाये 

अपनों का हाल-चाल ..

वो बस पूछते रहे 

सचिवालय,दफतर ,थानों में  

हमारी  रपट के  जवाब ..


कभी  चांदनी  अमावस या  

किसी  भी  पूरी  रात 

वे नहीं  थाम  सकें 

अपनी  प्रिया  के  प्रेम  का

 ज्वार 

उन्होंने  थामें  रखी 

हमारी  मशालें 

हमारे  नारे 

और  हमारी  बुलंद  

आवाज़  


वे ऋतुओं  के  बदलने  पर  भी  

नहीं  बदले ,

टिके  रहे  

अडिग संथाल  के  पठार या 

हिमालय  के पहाड़ों  की  तरह 


हर  ऋतु  में उन्होंने  सुने 

एक  हीं  राग  

एक  हीं  नाद ,

वो  सुनते  रहे 

सभ्यता  का  शोक  गीत .


उबलता रहा  उनका  लहू 

फैलते  रहे वे 

 चाँद और  सूरज की  किरण  की  तरह 

और  पसरते  रहे  

हमारे  दग्ध दिलों पर 

अंधेरे  दिनों 

सुलगती  रातों  पर 

और  भूला  दिये  गए 

अपने  हीं  वक्त  की गैर जरूरी 

कविता  की  तरह 


वे  सिमट  गए  घर  और  चौपाल के 

किस्सों  तक 

नहीं  लगे  उनके  नाम  के  शिलालेख 

नहीं  पुकारा  गया  उन्हें  

उनके  बाद  


बिसार  दिया  गया 

उन्हें और  उनकी  सोच  को 

किसी  नाजायज बच्चे  की  तरह  

बन्द  कर  लिए  हमने 

 स्मृतिओं  के  द्वार  


जरूरी  है  थोड़ी -सी  उदासी 

कि  खोल  सकें 

बन्द  स्मृतियों  के  द्वार 


जरूरी  है  थोड़ी  सी  उदासी  

कि बचाई  जा  सके 

अपने  अन्दर  की  आग 


जरूरी  है  थोड़ा -सा  सब्र 

हमारे  आस - पास  घटित  होते  

हर  गलत  बात  पर  

जताई  गई  

असहमति, प्रतिरोध  और  

भरपूर  लड़ी  गई  लड़ाई  के  बावजूद 

हारे -थके  और  चुक-से  जाने का  दंश 

बरदाश्त  करने  के  लिए  


और  बहुत  जरूरी  है  

थोड़ा सा साहस 

तब 

जब  हम  हों  नज़रबन्द 

या  हमें  रखा हो  युद्धबन्दी की  तरह 

आकाओं  के  रहम  पर  


बहुत  जरूरी  है  थोड़ा साहस  

कि कर  सकें  जयघोष

फाड़  सकें  अपना  गला  

और  

चिल्ला  सकें

इतनी  जोर  से  

कि फटने  लगे  धरती  का  सीना

और तड़क उठें 

 हमारे  दुश्मनों  के  माथे  की  नसें  

कि कोई बवण्डर

कोई  सुनामी तहस-नहस  कर  दें 

उनका  सारा  प्रभुत्व  ..


बहुत  ज़रूरी  है  ढ़ेर  सारा  साहस  

तब  जबकि  हम  जानते  हैँ  

हमारे  सामने है 

आग  का  दरिया 

और  हमारा  अगला  कदम  हमें  

धूँ- धूँ  कर  जला  देगा 


फिर  भी  

उस  आग  की  छाती  पर 

पैर  रखकर 

समन्दर  सा  उतर  जाने का 

साहस बहुत ज़रूरी  है |


जरूरी  है  बर्बर 

और  वीभत्स  समय  में 

फूँका  जाये  शंखनाद 

गायए जाएँ 

मानवता   के गीत 

और  लड़ी  जाए 

समानता और  नैतिकता  की  लड़ाई 


तभी  बचे  रह  सकते हैं   

हम  सब  

और  हमारे सपने 

हम  सब  के  बचे  रहने के  लिए  


बहुत  जरूरी  है  

थोड़ी -सी  उदासी ,

थोड़ा -सा  सब्र  और 

ढ़ेर  सारा  साहस----

----------------------

प्रेम  बहुत  दुस्साहसी  है 

************

प्रेम  बहुत  दुस्साहसी  है 

पार  कर  लेता  है 

डर  की  सारी  हदें 

वर्जनाओं  के  समन्दर 

अन्देशाओं  के  पर्वत 


और  ढ़ीठ की  तरह 

टिका  रहता  है 

अपनी  जगह 


कभी  ना  उखाड़ कर  

फेंके  जाने  वाले  

कील  की  तरह  

य़ा  फिर  एक  

धुरी  की  तरह  


और  नाचता  रहता  है  

अपने  हीं  गिर्द---

---------------------

मौन

****

तुमने 

जब  से  

मेरा  बोलना  

बन्द  किया  है ..


देखो

मेरा  मौन  

कितना  चीखने  लगा  है 


.गूँजने   लगी  है

 मेरी  असहमति

 और  ...


चोटिल  हो रहा  है 

 तुम्हारा  दर्प----

---------------//-------------------

परिचय

******

रंजिता सिंह 'फ़लक'

जन्मभूमि- छपरा (बिहार)

शिक्षा- रसायन शास्त्र से स्नात्कोत्तर 

* देश के 21 राज्यों में विगत तीन वर्षों से प्रसारित साहित्यिक पत्रिका 'कविकुंभ' की संपादक और  प्रकाशक l

*खबरी डॉट कॉम न्यूज  पोर्टल की  सम्पादक और  प्रोपराईटर l

महिलाओं के पक्षधर संगठन

 'बिईंग वूमेन' की राष्ट्रीय अध्यक्ष।

* शायरा, लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता ।

प्रकाशन--

 देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्पेशल न्यूज, परिचर्चा, रिपोर्ताज, गीत-गजलों का विगत दो दशकों से अनवरत प्रकाशन।

दूरदर्शन ,आकाशवाणी और  चर्चित चैनल से कविता  पाठ 

किताबें 

शब्दशः कविकुंभ - बातें कही अनकही |

कविता संग्रह-

"प्रेम में पड़े रहना"

शीघ्र  प्रकाश्य  किताब "आलोचना  की  प्रार्थना सभा " में कविताओं पर  बात आलोचक समीक्षक  शहंशाह आलम द्वारा .

उपलब्धियां :~ 

*हरिद्वार लिट फेस्ट में  गुरुकुल  कांगरी  विश्वविधालय द्वारा  सम्मानित .

*2019 में अमर भारती  संस्थान द्वारा वर्ष  2018 का  'सरस्वती सम्मान ' |

*2019 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 'शताब्दी सम्मान

* बिहार दूरदर्शन, देहरादून दूरदर्शन, आकाशवाणी, दिल्ली आकाशवाणी, लखनऊ दूरदर्शन केंद्रों पर अनेक परिचर्चाओं में सहभागिता, कविता पाठ।  

* 2017 में कोलकाता, राजभाषा के सौजन्य से 'नारायणी' सम्मान।

* 2016 में दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित, वाणी प्रकाशन के 'शब्द गाथा' संकलन में देश के सर्वश्रेष्ठ समीक्षकों के रूप में चयनित एवं सम्मानित ।

फोन संपर्क~ 9548181083 

ई-मेल संपर्क -

kavikumbh@gmail.com

Khabrinews@gmail.com

शोध की खातिर किस दुनिया में ? कहां गए ?

प्रिय भारत! / शम्भू बादल  प्रिय भारत!  शोध की खातिर किस दुनिया में ?  कहां गए ? साक्षात्कार रेणु से लेने ? बातचीत महावीर से करने?  त्रिलोचन ...