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मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

परसाई के लिए कोई जगह नहीं /रामस्वरूप दीक्षित

व्यंग्य-परसाई के लिए कोई जगह नहीं /रामस्वरूप दीक्षित  हम तो परसाई जी को कभी पढते ही नहीं । उनकी जो किताबें थीं , उन्हें उन लोगों को दान कर दिया , जिनमें बिगड़ने की ललक थी। बाद में पता भी चल गया कि वे पूरी तरह से बिगड़ चुके हैं। और जिला प्रशासन और सत्ता दल के नेताओं की नाक में दम किये हुए हैं। बहुत बार पुलिस से भी रूबरू हुए , मगर गनीमत रही कि उन्होने अपने बिगड़ने की असली वजह नहीं बताई । बरना आंच मुझ पर भी आना तय था। परसाई को पढ़ते हैं तो हमें लगता  है कि हमें व्यंग्य लिखना छोड़कर किसी कीर्तन मंडली में भरती होकर मंजीरे बजाना चाहिए , पर चूंकि अपनी दुकान चल निकली है तो वापस होना भी सम्भव नहीं।  परसाई जी को पढ़ते हैं तो हमारे हाथ पत्थर उठाने को लालायित होने लगते हैं , जो हमारे माला पहनाने वाले स्वभाव के विरुद्ध है। कहते हैं कि आदमी को अपने स्वभाव के साथ ही रहना चाहिए , किसी दूसरे का स्वभाव उसे नहीं अपनाना चाहिए। हम भी अपना स्वभाव छोड़ने वाले नहीं। हमें नहीं लिखना परसाई जैसा । न सत्ता या व्यवस्था का विरोध करना है। जब सरकार की तरफदारी करने पर भी व्यंग्यकार समझे जा रहे और खूब इनाम खिताब मिल रहे तो को

चार दुर्लभ गुण

 🍃🍃🍃● चार दुर्लभ गुण प्रस्तुति -- उपेंद्र पाण्डेय +रामेश्वर दयाल +रास बिहारी + अशोक सिंह +...... *1. धन के साथ पवित्रता,* *2. दान के साथ विनय,* *3. वीरता के साथ दया,* *4. अधिकार के साथ सेवाभाव।*                एक  पर्यटक, ऐसे शहर मे आया जो शहर उधारी में डूबा हुआ था !          पर्यटक ने *Rs.500* का नोट होटल रेस्टोरेंट  के काउंटर पर रखे और कहा :- मैं जा रहा हूँ आपके होटेल के अंदर कमरा पसंद करने !           होटल का मालिक फ़ौरन भागा घी वाले के पास और उसको *Rs.500* देकर घी का हिसाब चुकता कर लिया !           घी वाला भागा दूध वाले के पास और जाकर *Rs.500* देकर दूध का हिसाब पूरा करा लिया !           दूध वाला भागा गाय वाले के पास और गायवाले को *Rs 500* देकर दूध का हिसाब पूरा करा दिया !                  गाय वाला भागा चारे वाले के पास और चारे के खाते में *Rs.500* कटवा आया !           चारे वाला गया उसी होटल पर ! वो वहां कभी कभी उधार में रेस्टोरेंट मे खाना खाता था !   *Rs.500* देके हिसाब चुकता किया !              पर्यटक वापस आया और यह कहकर अपना *Rs.500* का नोट ले गया कि उसे कोई रूम पसंद नहीं आया !

ना पीने की कसम

 🥃  45 दिन ड्राई क्या हुए  🥃   🥃  प्रस्तुति -  रास बिहारी + रामेश्वर दयाल + अशोक सिंह +............. दो दोस्तों ने कसम खाई कि, *अब कभी शराब 🥃 🚫नही पियेंगे।*  🥃   इधर कसम खाई उधर शराब बिकनी शुरू। 🙄🤭 अब दोनों पड़े असमंजस में, करें तो क्या करें?? एक ने सलाह दी कि   🥃   *"पीने की कसम खाई है वाइन शॉप पर जाने की तो नहीं.."* आखिर दोनों वाईन शॉप पर गए, बोतल ली, घर पर लाकर बैठ गए।  🥃   अब लत और जोर मारने लगी, तो दूसरा बोला कि *"भाई, पीने की कसम खाई हैं, बोतल खोलने की तो नहीं.."* आखिर बोतल 🍾 खोली गई, ग्लास, 🥂 नमकीन..🍟 पत्नी 👩🏼‍🦰 खुद दे गयी,   🥃   🥃   🥃   🥃   लेकिन कसम के कारण आगे नही बढ़े, फिर एक बोला कि  *"भाई पीने की कसम खाई हैं, जाम बनाने की तो नहीं।"* लॉजिक जंच गई शराब डाली गई। *दो पटियाला पैग* बनाये गए। अब दोनों मायूस, कसम के हाथों मजबूर। 😬😫 जामों को देखते हुए बैठे रहे। समय ⌛ बीतता रहा बीतता रहा। नशा बड़े बड़ों को गुलाम बना लेता हैं। *पर ये दोनों पक्के थे, कसम ली तो तोड़ नहीं सकते थे..!* चाहे कुछ हो जाए। फिर पता नही क्या हुआ कि... दोनों एक साथ

C के चक़्कर में फंसे

 गांव की नई नवेली दुल्हन अपने पति से अंग्रेजी भाषा सीख रही थी, लेकिन अभी तक वो 'C' अक्षर पर ही अटकी हुई है...क्योंकि, उसकी समझ में नहीं आ रहा कि 'C' को कभी 'च' तो कभी 'क' तो कभी 'स' क्यूं बोला जाता है? एक दिन वो अपने पति से बोली, आपको पता है, चलचत्ता के चुली भी च्रिचेट खेलते हैं... पति ने यह सुनकर उसे प्यार से समझाया , यहां 'C' को "च" नहीं "क" बोलेंगे। इसे ऐसे कहेंगे, "कलकत्ता के कुली भी क्रिकेट खेलते हैं। "पत्नी पुनः बोली "वह कुन्नीलाल कोपड़ा तो केयरमैन है न? "पति उसे फिर से समझाते हुए बोला, "यहां "C" को "क" नहीं "च" बोलेंगे। जैसे, चुन्नीलाल चोपड़ा तो चेयरमैन है न... थोड़ी देर मौन रहने के बाद पत्नी फिर बोली,"आपका चोट, चैप दोनों चॉटन का है न ? "पति अब थोड़ा झुंझलाते हुए तेज आवाज में बोला, अरे तुम समझती क्यूं नहीं, यहां 'C' को "च" नहीं "क" बोलेंगे...ऐसे, आपका कोट, कैप दोनों कॉटन का है न. .. पत्नी फिर बोली - अच्छा बताओ, "कंड

मां का मन / विजय केसरी

 कहानी  =  मां का मन  /  विजय केसरी अब सरस्वती देवी अपने मोहल्ले की सबसे बुजुर्ग महिला हो गई । उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद वह पूरी तरह स्वस्थ है। उन्हें किसी भी तरह की कोई गंभीर बीमारी नहीं है । वह अंग्रेजी दवा ना के बराबर ही लेती है। उसे इंजेक्शन लिए वर्षों  बीत गए ।  मौसम बदलने पर उन्हें खांसी, सर्दी, बुखार जरूर लग जाया करता है, किन्तु वह घरेलू दवा खाकर ही ठीक हो जाती है। सरस्वती देवी की उम्र लगभग बिरासी वर्ष हो गई है । जब वह मात्र चौदह वर्ष की थी, तभी विवाह होकर इस मोहल्ले में आई थी। तब से लेकर अब तक वह अपने खानदानी मकान पर ही है। उसने अपने बलबूते खपरैल मकान को आज दो तल्ला मकान में तब्दील कर दिया  । मकान में सारे सुख - सुविधा की चीजें लगा दी । सरस्वती देवी इस मोहल्ले की पहली बहु थी, जिसने ससुराल से मैट्रिक की परीक्षा पास  की थी । आगे वह पढ़ना चाहती थी । लेकिन गरीबी और गृहस्थी के कामों के कारण उसकी आगे की पढ़ाई नहीं हो पाई  थी । आगे की पढ़ाई के लिए उसने कोशिश भी की थी, लेकिन घर के सदस्यों के सपोर्ट नहीं मिलने की वजह से वह चाह कर भी पढ़ाई जारी नहीं रख पाई थी।  धीरे धीरे सरस्

थैली नंबर तीन -/: सुनील सक्‍सेना

थैली नंबर तीन/ : सुनील सक्‍सेना “ये रहा तुम्‍हारा ब्रेड ऑमलेट, जल्‍दी से फिनिश करो । तुम्‍हारी ऑनलाइन क्‍लास का टाइम हो रहा है…” - मंजू ने प्‍लेट डाइनिंग टेबल पर रखी और किचन की ओर दौड़ी, तबतक तवे पर पड़ा ऑमलेट जल चुका था । इधर अंश ने ब्रेड का टुकड़ा मुंह में रखा ही था कि ब्रेड में बदबू महसूस हुई । उसे उबकाई आने लगी । “क्‍या हुआ…?” “मम्‍मी ये ब्रेड खराब है । अजीब सी महक आरही है । मुझे नहीं खाना…” “मैं देख रही हूं खाने-पीने के मामले में आजकल तुम ज्‍यादा ही मीनमेख निकालने लगे हो । कल ही तो ताजा ब्रेड लाई हूं । इतनी जल्‍दी कैसे खराब हो जाएगी ? इस लॉकडाउन में ब्रेकफास्‍ट खाने को मिल रहा है न तुम्‍हें इसलिए दिमाग सड़ गया है तुम्‍हारा…” “बिलिव मी मम्‍मी । मैं सच कह रहा हूं । आप खुद सूंघ कर देख लो…” “ठीक है । ऑमलेट खा लो । अभी चंदाबाई आएगी ब्रेड में उसे दे दूंगी । एक उसके बच्‍चे हैं कुछ भी खानेपीने को दे दो कभी कोई शिकायत नहीं करते हैं । हमारे बच्‍चे । हमें ये नहीं खाना । ये नहीं पीना…” -  मंजू मन ही मन बड़बड़ा रही थी । “मम्‍मी प्‍लीज ये ब्रेड चंदा को मत देना । पुट इट इन डस्‍टबिन ।” “अंश…बस अब

प्रो. सुरेंद्र स्निग्ध

 आज बिहार के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं अध्यापक प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध की पुण्यतिथि है।  उनका चले जाना साहित्यिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक क्षति है, जिसकी भरपायी क्या साहित्य-संस्कृति विरुद्ध समय में आसान है? विद्याभूषण लिखते हैं – सुरेन्द्र स्निग्ध के साहित्यिक-कर्म और जीवन-कर्म में कोई द्वैत न था। वे जो लिखते थे, जो वर्ग में पढ़ाते थे कमोबेश निजी जिन्दगी में वैसे ही थे। सत्य, संघर्ष और प्रेम उनके जीवन का दर्शन था और अपने साहित्य में वे इसी जीवन-दर्शन को ’रचते-गढ़ते‘ रहे। ऐसे संक्रांत समय में जब सच को पूरी निडरता और बेलौसपन के साथ अभिव्यक्त करनेवालों की संख्या घटती जा रही है या वे रूढ़िग्रस्त शक्तियों के प्रहार और आक्षेप से खामोश कर दिए जा रहे हैं, उनका यूँ अचानक चले जाना किसी हादसे से कम नहीं है। सर्वेश्वर ने ठीक ही कहा है-     “तुम्हारी मृत्यु में     प्रतिबिम्बित है हम सबकी मृत्यु     कवि कहीं अकेला मरता है!” साभार नरेंद्र कुमार ✌️👌🙏

मुहबरों में खान पान

 *हिंदी का थोडा़ आनंद लीजिए* ....*मुुस्कुराइए* * * * * *हिंदी के मुहावरे, बड़े ही बावरे हैं,* *खाने पीने की चीज़ों से भरे हैं...* *कहीं पर फल हैं तो कहीं आटा-दालें हैं,* *कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले हैं ,* *चलो, फलों से ही शुरू कर लेते हैं,* *एक-एक कर सबके मज़े लेते हैं...* *आम के आम और गुठलियों के भी दाम मिलते हैं,* *कभी अंगूर खट्टे हैं,* *कभी खरबूजे, खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं,* *कहीं दाल में काला है,* *तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती है,* *कोई डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाता है,* *तो कोई लोहे के चने चबाता है,* *कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,* *कोई दाल भात में मसूरचंद बन जाता है,* *मुफलिसी में जब आटा गीला होता है,* *तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है,* *सफलता के लिए कई पापड़ बेलने पड़ते हैं,* *आटे में नमक तो चल जाता है,* *पर गेंहू के साथ, घुन भी पिस जाता है,* *अपना हाल तो बेहाल है, ये मुंह और मसूर की दाल है,* *गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं,* *और कभी गुड़ का गोबर कर बैठते हैं,* *कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है,* *कभी ऊँट के मुंह में जीरा है,* *कभी कोई जले पर नमक छिड़कता

बिना बताये बिना अलविदा कहे / रवि अरोड़ा

 कुछ पता नहीं /  रवि अरोड़ा  चीलें सी घूम रही हैं आसमान में कुछ जानी पहचानी कुछ अनजान कब किस पर कौन झपट्टा मार दे कुछ नही पता दुःखदाई था मगर फिर भी तमाशा सा लगता था यह सबकुछ फिर एक दिन तुम्हे ले गई चील देखता ही रह गया मैं अवाक कहां ले गई पता नहीं ढूंढ रहा हूं इधर उधर ऊपर नीचे कोई सुराग नहीं  कोई खबर नही ++++++++++ जीवन में आंधी सी आई थी उसके साथ इकत्तीस साल पहले  झकझोर सा दिया था मेरा पूरा अस्तित्व मगर न जाने क्यों अब यूं ही फना हो गई  चुपके से अलविदा भी नही कहा इजाजत तो खैर वो कभी लेती ही नही थी बस डांटती ही रहती थी है हर पल  उसे बच्चों सा पालना पड़ता था मुझे  गिन कर खाता हूं रोटी सो बनाती थी बड़ी बड़ी रोटी दाल की कटोरी में नीचे छुपा देती थी घी मगर गिन कर देती थी मिठाई फिर धमका कर नपवाती भी थी शुगर +++++++++++++++ पक्की चुप्पो थी वो छुपाती थी अपनी ख्वाहिशें दिमाग भन्ना जाता था अंदाजा लगाते लगाते पता नही क्या नाटक था उसका घर खर्च से बचे पैसे चुपके से मेरे ही पर्स में डाल देती थी ताउम्र फक्कड़ ही मानती रही वो मुझे अपनी किटी के पैसों से भी लाती थी मेरा ही कुछ पता नही कैसे मुझे पैसे उधार द

आलोक यात्री

 📎 परेशानी हालात से नहीं, / ख़्यालात से खड़ी होती है करीब पचास दिन से मैं भी मौज़ूदा हालात से दो-चार हूं इस दौरान वक़्त के कई थपेड़े भी खाए आता जाता समय गाहे-बगाहे चपत सी मार कर भी गुज़रा अब भी वक़्त किसी न किसी तरह से चपत जड़ ही देता है शिकायत किससे करें गिला किससे... बस... शहरयार का कहा याद आ रहा है... "ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है हद-ए-निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है..."  मेरा मानना है कि परेशानी हालात से नहीं, ख़्यालात से खड़ी होती है हमारे इर्द-गिर्द हालात बेशक अच्छे नहीं हैं  लेकिन इन हालात को लेकर विभिन्न माध्यमों द्वारा जो ख़्यालात परोसे जा रहे हैं वह सिर्फ खौफ का पैराहन तैयार कर हमें पहनाते रहते हैं और हम कमीज़ के ऊपर कमीज़ की तरह डर के ऊपर डर ओढ़ते रहते हैं हर कोई अपने-अपने अंतर्द्वंद्व से आतंकित सा नज़र आता है अपनी पीड़ा सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने के प्रयास में खौफ के मंज़र में कुछ और इज़ाफा कर जाता है कई बार तो ऐसा लगता है कि उस परम शक्ति ने हमारी सलीब मुकर्रर कर रखी है  और हम अपनी सलीब पर खड़े-खड़े काल के अंतर में बेबसी से टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं

डॉ नागेश पाण्डेय संजय और बाल साहित्य

मान्यवर,?/ आपको इस श्रमसाध्य अद्यतन कार्य पर मेरी हार्दिक बधाई!  हिंदी बाल साहित्य पर वर्ष 2011 तक के 125 शोधप्रबंधों की विषयगत जानकारी पहली बार मेरे आलेख 'बाल साहित्य में अनुसंधान' शीर्षक से डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल द्वारा संपादित 'शोध दिशा', सितंबर 2011 (अंक 15)  में प्रकाशित हुई थी। उक्त आलेख मेरी पुस्तक 'बाल साहित्य : सृजन और समीक्षा' (2012) तथा आठ खण्डों में आए 'भारतीय बाल साहित्य कोश' (संपादक डॉ सुरेश गौतम) में भी संकलित है।  मैंने बाल साहित्य के क्षेत्र में सम्पन्न लघु शोध प्रबंधों पर पहली बार आलेख तैयार किया था, जो बाल वाटिका, जून 2004 अंक में डॉ.भैरूंलाल गर्ग जी ने प्रकाशित किया था। यह आलेख भी मेरी उक्त पुस्तक में संकलित है।  ध्यातव्य है, बाल साहित्य में शोध की शुरुआत 1952 में लघु शोध प्रबंध से ही हुई थी। बाद में भारत मे बाल साहित्य पर पी-एच.डी. उपाधि हेतु सबसे पहला शोध 1960 में कोलकाता विश्वविद्यालय से आशा गंगोपाध्याय ने बांग्ला में किया था। हिंदी में बाल साहित्य पर शोध की शुरुआत भले ही बाद में हुई किन्तु आज हिंदी में सर्वाधिक कार्य हो चुका है। 

बार बार याद आए वे दिन

 *बहुत सुंदर, जरूर पढ़ें, आप पहली लाइन पढ़ते ही खुद इसके मुख्य नायक हो जाएंगे*     😊😊🥰 बचपन में स्कूल के दिनों में क्लास के दौरान टीचर द्वारा पेन माँगते ही हम बच्चों के बीच राकेट गति से गिरते पड़ते *सबसे पहले उनकी टेबल तक पहुँच कर पेन देने की अघोषित प्रतियोगिता* होती थी।  जब कभी मैम किसी बच्चे को क्लास में कापी वितरण में अपनी मदद करने पास बुला ले, तो *मैडम की सहायता करने वाला बच्चा अकड़ के साथ "अजीमो शाह शहंशाह" बना क्लास में घूम-घूम* कर कापियाँ बाँटता और *बाकी के बच्चे मुँह उतारे गरीब प्रजा की तरह* अपनी चेयर से न हिलने की बाध्यता लिए बैठे रहते। *टीचर की उपस्थिति* में क्लास के भीतर *चहल कदमी की अनुमति कामयाबी की तरफ पहला कदम* माना जाता था।  उस मासूम सी उम्र में उपलब्धियों के मायने कितने अलग होते थे  A) टीचर ने क्लास में सभी बच्चों के बीच अगर हमें हमारे नाम से पुकार लिया ..... B) टीचर ने अपना रजिस्टर स्टाफ रूम में रखकर आने बोल दिया तो समझो कैबिनेट मिनिस्टरी में चयन का गर्व होता था। आज भी याद है जब बहुत छोटे थे तब बाज़ार या किसी समारोह में हमारी टीचर दिख जाए तो भीड़ की आड़ ले छिप

नीम बरगढ़ संवाद / बीना शर्मा

 सड़क विस्तार के लिए प्रस्तुति -  बीना शर्मा सारे पेड़ों के कटने के बाद  बस बचे हैं एक नीम और बरगद  जो अस्सी साल के साथ में  शोकाकुल हैं पहली बार नीम बोला  परसों जब हरसिंगार कटा था  तो बहुत रोया बेचारा  सारे पक्षियों ने भी शोर मचाया  गिरगिट ने रंग बदले   गिलहरयां फुदकी  मगर कुल्हाड़ी नहीं पसीजी  और फिर वो मेरे से दो पौधे छोड़कर  जब शीशम कटा ना  तो लगा कि मैं भी रो दूँगा  चिड़िया के घौसलो से अंडे गिर गए गिलहरियों को तो मैंने जगह दे दी  मगर तोते के बच्चे कोटर से गिरते ही मर गए बरगद कराहा  वो मेरे पास में आम, गुंजन और महुआ थे ना  बेचारे गिड़गिड़ाए कि हमारी सड़क वाली तरफ की टहनियां काट दो  सारे पक्षियों ने भी  चीं-चीं कर गोल-गोल चक्कर काटकर गुज़ारिश की  कि मत छीनो हमारा घर  पर पता नहीं ये आदमलोग  कौनसी ज़बान समझते हैं  धड़ाम करके कटकर ये नीचे गिरे  तो ज़मीन कंपकंपाई  मानो अपनी छाती पीट रही हो  नीम और बरगद बोले आपस में  ख़ैर जो हुआ सो हुआ  अब हम दोनों ही सम्भालेंगे  पक्षियों से लेकर  छाया में रूकने वालों को  अचानक बरगद बोला  ये लकड़हारे फिर लौट आए  कहीं हमें तो नहीं काटेंगे कहकर बरगद ने जोर

सुंदत कांड के लाभ

 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक 10 फायदे* महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण पर आधारित तुलसीकृत महाकाव्य रामचरित मानस का पंचम सोपान है सुंदरकाण्ड। सुंदरकाण्ड में रामदूत, पवनपुत्र हनुमान का यशोगान किया गया है। आओ जानते हैं सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक लाभ।   1. सुंदरकाण्ड का पाठ सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। किसी भी प्रकार की परेशानी या संकट हो, सुंदरकाण्ड के पाठ से यह संकट तुरंत ही दूर हो जाता है।   2. सुंदरकांड के पाठ से भूत, पिशाच, यमराज, शनि राहु, केतु, ग्रह-नक्षत्र आदि सभी का भय दूर हो जाता है।   3. हनुमानजी के सुंदर काण्ड का पाठ सप्ताह में एक बार जरूर करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र, ज्योतिष के अनुसार भी विषम परिस्थितियों सुंदरकांड पाठ करने की सलाह दी जाती है। 4. जीवन में किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है तो आप संकल्प लेकर लगातार सुंदरकांड का पाठ करें। सुंदरकांड पाठ से एक नहीं बल्कि अनेक सैकड़ों समस्याओं का समाधान तुरंत मिलने लगता है।   5. श्रीराम चरित्र मानस को रचने वाले गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार हनुमान जी को जल्द प्रस

ख़ुशी की तलाश

 *मुस्कुराइए* / मनोज कुमार एक औरत बहुत महँगे कपड़े में अपने मनोचिकित्सक के पास गई और बोली "डॉ साहब ! मुझे लगता है कि मेरा पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। क्या आप मेरी खुशियाँ ढूँढने में मदद करेंगें?" मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं इस बूढी औरत से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।" तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।" मैं स्वयं के जीवन को समाप्त करने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन,एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंत

चिट्ठियाँ...! / मनोहर बिल्लोरे

 चिट्ठियाँ...! / मनोहर बिल्लोरे  -------------  चिट्ठियाँ लिखना-पढ़ना अब,   भूल गये  बहुत सारे लोग  पढ़ने-लिखने वालों की संख्या में  जबकि, हुआ है बेतहाशा इज़ाफा  सिर झुकाये तरह-तरह के कामों में  दिन भर डूबे रहने वाले व्यस्त-पस्त,  सनकी-सिरफिरे-से वे डाक-बाबू,  अब नहीं रहे...  सनसनी सी फैलाती, प्रतीक्षा की बेचैनी वह – बनी रहती थी जो – कहाँ बची अब  पाई-पठाई, लिखीं-पढ़ीं जातीं और  घर-घर में, चर्चा में रहती थीं,  जब – चिट्ठियाँ...! जो पढ़ा-लिखा नहीं था  वह भी  दूसरों से पढ़वा-लिखवा लेता था  अपने दुख-दर्द, भाव-अभाव,  हर्षोल्लास, अपनी आशा-निराशाएँ,  चिंताएँ, दिल्लगी, हास-परिहास,  ठिठोली, प्रेम-तरंगें, आलिंगन,  और ज्वार--भाटे सब समां जाते  इन दो पैसों की चिट्ठियों में… अनपढ़ डाकिया भी -   दूसरों से पढ़वा कर पते -  बाँट देता था  घर-घर में   तय समय पर  सही जगह     सही-सही डाक...   अब तो इस समय -   पुश किये जाते हैं चट-पट-पट…  मनचाहे नंबर और कर ली जाती  बातें, झट-पट जी भर-भर… चाहें जब,   जहाँ चाहें और हो इच्छा तो  चेहरे पर चमकने वाले हाव-भाव भी  देख सकते हैं  आमने-सामने अंतर्जाल के ज़रिये,  रेडियो-तरंगों

जय महावीर ज्ञान गुण सागर / कृष्ण मेहता

 *हनुमानजी के जीवन में ज्ञान, कर्म* *और भक्ति की समग्रता विद्यमान है।*    °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "°       रामराज स्थापना पश्चात श्री हनुमानजी को वापस भेजने की आवश्यकता भगवान् राम नहीं समझते हैं। उनके संदर्भ में प्रभु दूसरी बात सोचते हैं। *कई लोग ऐसे होते हैं कि जिनमें सामीप्य के कारण रस का अभाव हो जाता है। अधिक पास रहने से उन्हें बहुत लाभ नहीं होता। क्योंकि पास रहने से लाभ उठाने वाले मैंने बिरले ही व्यक्ति देखे हैं, बहुधा हानि उठाने वाले ही अधिक देखे हैं। लोग बहुधा आश्चर्य करते हैं कि बड़े-बड़े महात्माओं के अत्यन्त पास रहने वाले व्यक्तियों का स्वभाव बड़ा विचित्र होता है। बड़े-बड़े तीर्थों में रहने वाले व्यक्तियों का आचरण तीर्थ के आदर्श से बिल्कुल भिन्न होता है। इसका रहस्य यही है कि जैसे कोई व्यक्ति प्रतिदिन किसी एक ही वस्तु का भोजन करे तो धीरे-धीरे उसे उस वस्तु का स्वाद आना बन्द हो जाता है। इसी प्रकार से कोई व्यक्ति अगर बहुत लम्ब

मेरी प्यारी दोनों माताएं/ विजय केसरी

 "मातृ दिवस' पर गुरुदेव भारत यायावर  की 'मां' शीर्षक  कविता पढ़ कर अपनी दोनों माताएं याद आ गईं। अब दोनों माताएं स शरीर इस दुनिया में नहीं हैं। फिर भी हम सभी भाई-बहन उनके होने का एहसास हमेशा महसूस करते हैं। जब भी हम सब भाई बहन किसी मुसीबत में होते हैं , तो हमारी दोनों माताएं पीठ पीछे खड़ी होती है। गुरुदेव की कविता की पंक्तियां मन को छूती है। उनकी कविता पढ़ने के बाद कुछ पंक्तियां दोनों माताओं के श्री चरणों में अर्पित है। मेरी प्यारी दोनों  माताएंv यह ईश्वर की कृपा है, मुझे एक नहीं, दो - दो माताओं का, प्यार मिला। सर आप ट्यूशन पढ़ाने, हमारे घर आते थे, दोनों माताओं से मिलते थे, मेरी दोनों  माताओं का स्नेह प्राप्त करते थे। एक मां ने मुझे जन्म दिया, दूसरी मां ने लालन-पालन किया, दोनों माताओं की कृपा सदा, मुझ पर बनी रही। सिर्फ मुझ पर ही नहीं, बल्कि सभी भाई - बहनों पर, दोनों माताओं की कृपा, सदा समान बनी रही। समय के साथ दिन बीतते गए, हम बच्चे बड़े होते गए, दोनों माताओं की उम्र बढ़ती गई, मां - मां बनती गई । दोनों माताओं के आंचल में, हम बच्चे बसते  गए, जरा सी नजरों से दूर होते, मात

सलाह नहीं साथ चाहिए

 *प्रेरक कहानी*        एक बार एक पक्षी समुंदर में से चोंच से पानी बाहर निकाल रहा था। दूसरे ने पूछा भाई ये क्या कर रहा है। पहला बोला समुंदर ने मेरे बच्चे डूबा दिए है अब तो इसे सूखा कर ही रहूँगा। यह सुन दूसरा बोला भाई तेरे से क्या समुंदर सूखेगा। तू छोटा सा और समुंदर इतना विशाल। तेरा पूरा जीवन लग जायेगा। पहला बोला *देना है तो साथ दे*। सिर्फ़ *सलाह नहीं चाहिए*। यह सुन दूसरा पक्षी भी साथ लग लिया। ऐसे हज़ारों पक्षी आते गए और दूसरे को कहते गए *सलाह नहीं साथ चाहिए*। यह देख भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी भी इस काम के लिए जाने लगे। भगवान बोले तू कहा जा रहा है तू गया तो मेरा काम रुक जाएगा। तुम पक्षियों से समुंदर सूखना भी नहीं है। गरुड़ बोला *भगवन सलाह नहीं साथ चाहिए*। फिर क्या ऐसा सुन भगवान विष्णु जी भी समुंदर सुखाने आ गये। भगवान जी के आते ही समुंदर डर गया और उस पक्षी के बच्चे लौटा दिए।  आज इस संकट के समय में भी देश को हमारी सलाह नहीं साथ चाहिए। आज सरकार को कोसने वाले नहीं समाज के साथ खड़े हो कर सेवा करने वाले लोगों की आवश्यकता है ।इसलिए सलाह नहीं साथ दें।  *जो साथ दे दे सारा भारत, तो फिर से मुस्क