गुरुवार, 23 सितंबर 2021

घास का तिनका और दशरथ वचन

 रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जिससे ज्यादातर लोग अनजान हैं l


 प्रस्तुति - सत्यनारायण प्रसाद अनंत 


रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी। रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था, लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी। यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को 

भ्रमित करने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ,

रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी ने उससे कहा आप  तो राम का वेश धर कर गये थे, फिर क्या हुआ।

रावण बोला जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी ।

रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जिस जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका, उन्हें रावण भी कैसे समझ पाता !

रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर-घूर कर देखने लगती हो,

क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है?  रावण के 

इस प्रश्न को सुनकर माँ सीता जी बिलकुल चुप हो गयी और उनकी

आँखों से आसुओं की धार बह पड़ी।

इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि

जब श्री राम जी का विवाह माँ सीता जी के साथ हुआ,तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ। बहुत उत्सव मनाया गया।    *प्रथानुसार नव वधू विवाह पश्चात जब ससुराल आती है तो उसके हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है, ताकि जीवन भर घर पर मिठास बनी रहे* 

इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथों से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार, राजा दशरथ एवं तीनों रानियों  सहित चारों भाईयों और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे।

माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया। सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली,सीता जी बड़े गौर स सब देख रही थी।

ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया जिसे माँ सीता जी ने देख लिया। लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें ये प्रश्न आ गया। माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा  वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया। सीता जी ने सोचा 'अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा'।

लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी 

के इस चमत्कार को देख रहे थे। फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुचकर माँ सीता जी को बुलवाया ।

फिर उन्होंने सीताजी जे कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था ।

आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना।

आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना।

इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी।

*तृण धर ओट कहत वैदेही*

*सुमिरि अवधपति परम् सनेही*


*यही है उस तिनके का रहस्य* ! 

इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर 

सकती थी, लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही !

ऐसी विशलहृदया थीं हमारी जानकी माता !


🙏🏻🙏🏻💐जय जय सीताराम💐🙏🏻🙏🏻

यूं हवाओं को बदनाम न कर / सुनील सक्सेना



                           


       :- सुनील सक्सेना                         


        वे पैदाइशी शायर हैं । उनके खानदान में उनसे पहले न कोई शायर हुआ न कोई अफसाना निगार  । यानी नेपोटिज्‍म वाला कोई चक्‍कर नहीं है । वे जन्‍म के समय जब  रोए थे,  तो उनका रूदन  शायराना अंदाज में हुआ था । उनके रोने का लहजा ऐसा मानो  किसी गजल को तरन्‍नुम में पढ़ रहे हों ।  वे जितने जोर से रोते घरवाले उन्‍हें चुप करने के लिए उतनी ही जोर से तालियां बजाते ।  उन्‍हें लगता कि उनका  शेर  मुक्‍कमल हो गया । वे रोना बंद कर देते थे । उनकी इस जन्‍मजात प्रतिभा को देखते हुए घरवालों ने उनका  नाम ही “शायर” रख दिया । शायर नाम होने का फायदा ये हुआ कि वे शायरी करें या न करें, पर वे  शायर हैं । 


        उम्र के साथ उनकी मकबुलियत बढ़ने लगी । शोहरत की ये फितरत होती है कि वो फनकार से अपनी कीमत वसूलती है । कुछ झण्‍डाबरदार हिंदी- उर्दू को लेकर मैदान में उतर गये । भाषाएं जहर बुझे तीरों की तरह मारक होती हैं । सीधे दिल पर चोट करती हैं । जुबानों की नूराकुश्‍ती में सियासतदानों को गहरी दिलचस्‍पी होती है । जब मजहब और कौम के मसाइल ठंडे पड़ जाते हैं तब भाषा की चिंगारी से शोले भड़काकर हाथ सेंके जाते हैं ।  सो जनाब शायर को अपने वतन के प्रति निष्‍ठा, देशभक्ति साबित करने के लिए शायरी के साथ-साथ कविता में भी हाथ आजमाना पड़ा । चुनांचे वे कवि भी हो गये ।


        आज शायर साहब कुछ उदास दिखे  । न… न… इसलिए नहीं कि शेर के काफिये नहीं मिल रहे हैं, या कविता का विषय नहीं सूझ रहा है,  या बिम्‍ब नहीं रच पा रहे हैं, या छंद नहीं बन रहा है, या तुकबंदी नहीं जम रही है, या अकविता टाइप की रचना नहीं रच पा रहे हैं, या वे कई दिनों से कहीं छप नहीं रहे हैं,  काव्‍य गोष्‍ठी नहीं हो रही है, कवि सम्‍मेलन और मुशायरे बंद हैं,  ऐसी कोई वजह नहीं है । शायर साहब की उदासी का सबब ये है कि कोरोना की तीसरी लहर में अब “हवाओं” को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है ।


        हवाओं पर ये तोहमत लगाई जा रही है कि “कोरोना वायरस” हवाओं का  हमसफर है । वो हवाओं के साथ रहता है, उठता है, बैठता चलता है, मरता नहीं, वो जावेद है, अमर है । हवाएं जिधर का रूख अख्तियार कर लें, कोरोना वायरस उसी ओर चल देता है । इसलिए हवाओं से बचें । घर में परदानशीं बनकर रहें ।


        अब ये भी खूब रही कि निजाम अपनी नाकामयाबियों  का इल्‍जाम हवाओं पर लगा दे ।  ये वही हवाएं है जब लहर बनकर चलती हैं तो सत्‍ता पलट देती हैं । ये वो हवाएं हैं जिसने माशुका की जुल्‍फें लहराई तो काली घटा छा गई । ये वही हवाएं हैं जिसने महबूबा का आंचल जरा सा  ढलका दिया और कयामत आ गई । ये वही हवा है जिसने प्रेयसी के संगेमरमर बदन को छुआ और चमन में बहार आगई ।  जनाब शायर ये सब सोचकर व्‍यथित हैं ।


        शायर साहब की शरीक-ए-हयात ने पूछा – “ये क्‍या रोनी सूरत बना रखी है जनाब ने ? मिजाज तो ठीक हैं ?”


        वे बोले – “बस पूछो मत बेगम,  अब तो हद हो गई..”  


        “आपने हद अभी देखी ही कहां हैं मियां । हद की कोई हद नहीं होती जनाबे आली । एक हद पार होती है, तो नई हद बन जाती है..” बेगम ने हद को परिभाषित करते हुए शायर साहब को काढ़े का गिलास थमा दिया ।     


        “बेगम ! ये कैसा निजाम है..? उन्‍होंने फरमाया घर में रहो । हम रहने लगे । दो गज की दूरी रखो, हमने रख ली । अब हवाओं पर इल्‍जाम ? कल कोई दानिशमंद खोज कर लेगा कि कोरोना देखने से फैलता है, तो आंख पर पट्टी बांध लो । कोई साइंसदां रिसर्च में ये बतायेगा कि कोरोना सुनने से फैलता है,  कान में रूई डालकर रखो । सुनना बंद कर दो । मतलब न बोलो, न सुनो, न देखो । जो हो रहा है, उसे बस सहते रहो । खामोश रहो । तमाशबीन बनकर अपनी तबाही का मंजर देखते रहो । ये कहां का इंसाफ है बेगम ?” जनाब शायर का गला दर्द से भर गया ।


        “मियां ये सियासत है । आप भी कहां दीवारों से अपना सर फोड़ रहे हैं । चलिए उठिये । भूल गये आज आपको फेसबुक पर “लाइव” गजल पढ़नी है ।” बेगम ने लेपटॉप ऑन किया । शायर साहब लाइव हो गये इस शेर के साथ “न लगा अपनी हार का इल्‍जाम मेरे सिर पर, अभी बाकी है उसका फैसला  इसी सरजमीं पर”


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बुधवार, 22 सितंबर 2021

उजाला या अँधेरा: / मुकेश कुमार

बात यही कोई पचीस-तीस साल पुरानी है जब गाँव में सही से सड़क भी नहीं बनी थी और ना ही हर तरफ बिजली पहुँच पायी थी. 

हाँ गाँव के कुछ धनी लोग जरुर थे जिन्होंने बिजली के लिए जनरेटर और मनोरंजन के लिए टीवी का इंतजाम कर रखा था. अधिकतर लोग सरकारी नौकरी वाले ही थे, उनका ऑफिस कस्बे में था सो सारी उपलब्ध सुविधाओं का पुरा खबर रहता था उन्हें.

अँधेरा हुआ नहीं की फट-फट की आवाज़ से गूंजने लगती थी उनके घर के बगल वाली झोपडी जिसमे जनरेटर रखा होता था. 


वो अँधेरा भी कमाल का था, एक ही समय में गाँव को दो हिस्सों में बाँट जाता था. एक तरफ जहाँ ढिबरी जलती हुई दिखती तो दूसरी तरफ़ जगमगाती रौशनी में चमकता हुआ सब कुछ. 

गाँव के दोनों तरफ दूर से देखो तो लगता था मानो वो जनरेटर ढिबरी की रौशनी का मजाक उडा रहा हो.

एक तरफ जगमगाती रौशनी में लोग खेलते या फिर जमावड़ा लगा कर बैठे नज़र आते, तो दुसरी तरफ़ क्या हो रहा है ए बता पाना भी मुश्किल.


गाँव के दुसरे हिस्से को देख ऐसा लगता था मानो अँधेरे को गुलाम बना रखा हो उन्होंने, जब तक मन करे तब तक अँधेरे को चीरते हुए बड़ी-बड़ी बत्तियां जलाते और फिर बड़े से कमरे में रखी हुई टीवी पर सब एक साथ फिल्म देखने का लुत्फ़ उठाते थे. उस समय टीवी पर सिर्फ़ दूरदर्शन आता था, शुक्रवार की शाम को चित्रहार पर नए-पुराने गाने और रात को पुरानी फ़िल्में.


इधर गाँव के दूसरे तरफ ढिबरी की रौशनी में कुछ औरतें खाना पकाती, कुछ बुजुर्ग रिश्तों को अपनी अनुभव देते, कुछ लोग बच्चे को पढ़ाते नजर आते थे.

जो बच्चे बड़े थे वो अपने से छोटे बच्चों को भी पढ़ा रहे थे. रौशनी तो ज्यादा नहीं होती है ढिबरी से लेकिन हाँ जब अगल-बगल हर तरफ ढिबरी जलती हुई नज़र आती तो लगता था जैसे दिवाली की रात हो. 

वक़्त गुजरता रहा और बच्चे बड़े होते गए गाँव के इस तरफ भी और उस तरफ भी. गाँव के स्कूल के स्कूल से पढ़ाई पूरी होते ही दोनों तरफ के बच्चों ने कस्बे के हाई स्कूल में दाखिला लिया. यहाँ भी दोनों तरफ के बच्चों ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली और कॉलेज के लिए दूसरे शहर भी गए.

वक़्त जितना लगना था उतना ही लगा और फिर दोनों तरफ के कुछ बच्चों ने अपनी उच्चतम पढ़ाई पूरी कर ली.


गाँव के इस तरफ वाले बच्चों ने ज्यादा मेहनत की इसलिए उनमे से एक जिला अधिकारी बन गया और उसकी पहली पोस्टिंग उसी के जिले में हुई. 

उस अधिकारी के देख-रेख के वजह से काफी कम समय में ही उस गाँव के दोनों तरफ की सारी सड़कें पक्की बन गयी और हर तरफ बिजली भी आ गयी.


एक दिन वो जिला-अधिकारी अपने गाँव आया हुआ था तो उस से मिलने कुछ लोग उस तरफ से भी आये. 

अधिकारी से मिल कर जाते वक़्त उस तरफ के एक बुजुर्ग ने पूछा "बेटे तुम ढिबरी में पढ़ते हुए बड़े अधिकारी बन गए और हमारे बच्चे तेज़ रौशनी में भी पढ़ कर कुछ ना बन सके ऐसा क्यों?"


अब मैं क्या बताऊँ काका आपके उम्र को देखते हुए "छोटी मुँह और बड़ी बात हो जाएगी" 

लेकिन आपने पुछा है तो बताना जरुरी है ताकि उस तरफ़ के बच्चों में भी सुधार हो और कुछ करने का जज़्बा जागे.

काका, जहाँ अँधेरा होता है वहिं लोग रौशनी की तलाश में निकलते हैं.

हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं था इसलिए हमने सिर्फ़ अपना सम्मान पाने पर ध्यान दिया और आपके बच्चों के पास सब कुछ पहले से ही था इसलिए उन्होंने कुछ पाने पर ध्यान नहीं दिया.


अनजान लेखक (मुकेश कुमार)

भावना संवेदना

 !! संवेदनशीलता !!

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एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,”चिट्ठी ले लीजिये।” अंदर से एक बालिका की आवाज आई,”आ रही हूँ।” लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा,”अरे भाई! मकान में कोई है क्या,अपनी चिट्ठी ले लो।” 


लड़की की फिर आवाज आई,”पोस्टमैन साहब,दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ।” पोस्टमैन ने कहा,”नहीं,मैं खड़ा हूँ,रजिस्टर्ड चिट्ठी है,पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।” करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। 


पोस्टमैन इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे,सामने थी। पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। 


हफ़्ते, दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, पोस्टमैन एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता। एक दिन कन्या ने पोस्टमैन को नंगे पाँव देखा। 


दीपावली नजदीक आ रही थी। उसने सोचा पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ। एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया,तब उस लड़की ने, जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये। 


दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना? 


पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ। उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,”कौन?” पोस्टमैन,उत्तर मिला। 


बालिका हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,”अंकल,मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है।” पोस्टमैन ने कहा,”तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो,तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूँ?” कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें।” ठीक है कहते हुए पोस्टमैन ने पैकेट ले लिया। बालिका ने कहा,”अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना।


घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया,क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे।उसकी आँखें भर आई। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए।

 पोस्टमास्टर ने कारण पूछा, तो पोस्टमैन ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,”आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?”


संवेदनशीलता का यह श्रेष्ठ दृष्टांत है। संवेदनशीलता… यानि,दूसरों के दुःख-दर्द को समझना,अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें सम्मलित होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।

 ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें।

 संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है,अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है।


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

सेंधा नमक के फायदे

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     *🎊आज का सामान्य ज्ञान🎊*


*🎛️क्या आपको पता है खाने में श्रेष्ठ नमक कौन-सा होता है?🎛️*


आयुर्वेद के अनुसार सेंधा नमक सर्वश्रेष्ठ है । लाखों वर्ष पुराना समुद्री नमक जो पृथ्वी की गहराई में दबकर पत्थर बन जाता है, वही सेंधा नमक है । यह रुचिकर, स्वास्थ्यप्रद व आँखों के लिए हितकर है ।


*🔮सेंधा नमक के लाभ👉🏻*

जहां विज्ञान बताता है कि आधुनिक आयोडीनयुक्त नमक श्रेष्ठ है वहीँ भारत का प्राचीन आयुर्वेद कहता है कि आयोडीनयुक्त नमक से सेंधा नमक श्रेष्ठ है । यह कोशिकाओं के द्वारा सरलता से अवशोषित किया जाता है । शरीर में जो 84 प्राकृतिक खनिज तत्त्व होते हैं, वे सब इसमें पाये जाते हैं ।


*(1)* शरीर में जल-स्तर का नियमन करता है, जिससे शरीर की क्रियाओं में मदद मिलती है ।


*(2)* रक्तमें शर्करा के प्रमाण को स्वास्थ्य के अनुरूप रखता है ।


*(3)* पाचन संस्थान में पचे हुए तत्त्वों के अवशोषण में मदद करता है ।


*(4)* श्वसन तंत्र के कार्यों में मदद करता है और उसे स्वस्थ रखता है ।


*(5)* साइनस की पीड़ा को कम करता है ।


*(6)* मांसपेशियों की ऐंठन को कम करता है ।


*(7)* अस्थियों को मजबूत करता है ।


*(8)* स्वास्थ्यप्रद प्राकृतिक नींद लेने में मदद करता है ।


*(9)* पानी के साथ यह रक्तचाप के नियमन के लिए आवश्यक है ।


*(10)* मूत्रपिंड व पित्ताशय की पथरी रोकने में रासायनिक नमक की अपेक्षा अधिक उपयोगी ।




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होनी अनहोनी होनी

 ••।। हाेनी, होकर रहती है ।।••


एक समय की बात है। एक बहुत ही ज्ञानी पण्डित था। वह अपने एक बचपन के घनिष्‍ट मित्र से मिलने के लिए किसी दूसरे गाँव जा रहा था जो कि बचपन से ही गूंगा व एक पैर से अपाहिज था। उसका गांव काफी दूर था और रास्‍ते में कई और छोटे-छोटे गांव भी पडते थे।


पण्डित अपनी धुन में चला जा रहा था कि रास्‍ते में उसे एक आदमी मिल गया, जो दिखने मे बडा ही हष्‍ठ-पुष्‍ठ था, वह भी पण्डित के साथ ही चलने लगा। पण्डित ने सोचा कि चलो अच्‍छा ही है, साथ-साथ चलने से रास्‍ता जल्‍दी कट जायेगा। पण्डित ने उस आदमी से उसका नाम पूछा तो उस आदमी ने अपना नाम महाकालबताया। पण्डित को ये नाम बडा अजीब लगा, लेकिन उसने नाम के विषय में और कुछ पूछना उचित नहीं समझा। ‍दोनों धीरे-धीरे चलते रहे तभी रास्‍त में एक गाँव आया। महाकाल ने पण्डित से कहा- तुम आगे चलो, मुझे इस गाँव मे एक संदेशा देना है। मैं तुमसे आगे मिलता हुं।


“ठीक है” कहकर पण्डित अपनी धुन में चलता रहा तभी एक भैंसे ने एक आदमी को मार दिया और जैसे ही भैंसे ने आदमी को मारा, लगभग तुरन्‍त ही महाकाल वापस पण्डित के पास पहुंच गया।


चलते-चलते दोनों एक दूसरे गांव के बाहर पहुंचे जहां एक छोटा सा मन्दिर था। ठहरने की व्‍यवस्‍था ठीक लग रही थी और क्‍योंकि पण्डित के मित्र का गांव अभी काफी दूर था साथ ही रात्रि होने वाली थी, सो पण्डित ने कहा- रात्रि होने वाली है।  पूरा दिन चले हैं, थकावट भी बहुत हो चुकी है इसलिए आज की रात हम इसी मन्दिर में रूक जाते हैं। भूख भी लगी है, सो भोजन भी कर लेते हैं और थोडा विश्राम करके सुबह फिर से प्रस्‍थान करेंगे।


महाकाल ने जवाब दिया- ठीक है, लेकिन मुझे इस गाँव में किसी को कुछ सामान देना है, सो मैं देकर आता हुं, तब तक तुम भोजन कर लो, मैं बाद मे खा लुंगा।”


और इतना कहकर वह चला गया लेकिन उसके जाते ही कुछ देर बाद उस गाँव से धुंआ उठना शुरू हुआ और धीरे-धीरे पूरे गांव में आग लग गई थी । पण्डित को आर्श्‍चय हुआ। उसने मन ही मन सोचा कि- जहां भी ये महाकाल जाता है, वहां किसी न किसी तरह की हानि क्‍यों हो जाती है? जरूर कुछ गडबड है।


लेकिन उसने महाकाल से रात्रि में इस बात का कोई जिक्र नहीं किया। सुबह दोनों ने फिर से अपने गन्‍तव्‍य की ओर चलना शुरू किया। कुछ देर बाद एक और गाँव आया और महाकाल ने फिर से पण्डित से कहा कि- पण्डित जी… आप आगे चलें। मुझे इस गांव में भी कुछ काम है, सो मैं आपसे आगे मिलता हुँ’।


इतना कहकर महाकाल जाने लगा। लेकिन इस बार पण्डित आगे नहीं बढा बल्कि खडे होकर महाकाल को देखता रहा कि वह कहां जाता है और करता क्‍या है।


तभी लोगों की आवाजें सुनाई देने लगीं कि एक आदमी को सांप ने डस लिया और उस व्‍यक्ति की मृत्‍यु हो गई। ठीक उसी समय महाकाल फिर से पण्डित के पास पहुंच गया। लेकिन इस बार पण्डित को सहन न हुआ। उसने महाकाल से पूछ ही लिया कि- तुम जिस गांव में भी जाते हो, वहां कोई न कोई नुकसान हो जाता है? क्‍या तुम मुझे बता सकते हो कि आखिर ऐसा क्‍याें होता है?


महाकाल ने जवाब दिया: पण्डित जी… आप मुझे बडे ज्ञानी मालुम पडे थे, इसीलिए मैं आपके साथ चलने लगा था क्‍योंकि ज्ञानियाें का संग हमेंशा अच्‍छा होता है। लेकिन क्‍या सचमुच आप अभी तक नहीं समझे कि मैं कौन हुँ?


पण्डित ने कहा: मैं समझ तो चुका हुँ, लेकिन कुछ शंका है, सो यदि आप ही अपना उपयुक्‍त परिचय दे दें, तो मेरे लिए आसानी होगी।


महाकल ने जवाब दिया कि- मैं यमदूत हुँ और यमराज की आज्ञा से उन लोगों के प्राण हरण करता हुँ जिनकी आयु पूर्ण हो चुकी है।


हालांकि पण्डित को पहले से ही इसी बात की शंका थी। फिर भी महाकाल के मुंह से ये बात सुनकर पण्डित थोडा घबरा गया लेकिन फिर हिम्‍मत करके पूछा कि- अगर ऐसी बात है और तुम सचमुच ही यमदूत हो, तो बताओ अगली मृत्‍यु किसकी है?


यमदूत ने जवाब दिया कि- अगली मृत्‍यु तुम्‍हारे उसी मित्र की है, जिसे तुम मिलने जा रहे हो और उसकी मृत्‍यु का कारण भी तुम ही होगे।


ये बात सुनकर पण्डित ठिठक गया और बडे पशोपेश में पड गया कि यदि वास्‍तव में वह महाकाल एक यमदूत हुआ तो उसकी बात सही होगी और उसके कारण मेरे बचपन के सबसे घनिष्‍ट मित्र की मृत्‍यु हो जाएगी। इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने मित्र से मिलने ही न जाऊं, कम से कम मैं तो उसकी मृत्‍यु का कारण नहीं बनुंगा। तभी महाकाल ने कहा कि-


तुम जो सोंच रहे हो, वो मुझे भी पता है लेकिन तुम्‍हारे अपने मित्र से मिलने न जाने के विचार से नियति नहीं बदल जाएगी। तुम्‍हारे मित्र की मृत्‍यु निश्चित है और वह अगले कुछ ही क्षणों में घटित होने वाली है।


महाकाल के मुख से ये बात सुनते ही पण्डित को झटका लगा क्‍योंकि महाकाल ने उसके मन की बात जान ली थी जो कि किसी सामान्‍य व्‍यक्ति के लिए तो सम्‍भव ही नहीं थी। फलस्‍वरूप पण्डित को विश्‍वास हो गया कि महाकाल सचमुच यमदूत ही है। इसलिए वह अपने मित्र की मृत्‍यु का कारण न बने इस हेतु वह तुरन्‍त पीछे मुडा और फिर से अपने गांव की तरफ लौटने लगा।


परन्‍तु जैसे ही वह मुडा, सामने से उसे उसका मित्र उसी की ओर तेजी से आता हुआ दिखाई दिया जो कि पण्डित को देखकर अत्‍यधिक प्रसन्‍न लग रहा था। अपने मित्र के आने की गति को देख पण्डित को ऐसा लगा जैसे कि उसका मित्र काफी समय से उसके पीछे-पीछे ही आ रहा था लेकिन क्‍योंकि वह बचपन से ही गूूंगा व एक पैर से अपाहिज था, इसलिए न तो पण्डित तक पहुंच पा रहा था न ही पण्डित को आवाज देकर रोक पा रहा था।


लेकिन जैसे ही वह पण्डित के पास पहुंचा, अचानक न जाने क्‍या हुआ और उसकी मृत्‍यु हो गर्इ। पण्डित हक्‍का-बक्‍का सा आश्‍चर्य भरी नजरों से महाकाल की ओर देखने लगा जैसे कि पूछ रहा हो कि आखिर हुआ क्‍या उसके मित्र को। महाकाल, पण्डित के मन की बात समझ गया और बोला-


तुम्‍हारा मित्र पिछले गांव से ही तुम्‍हारे पीछे-पीछे आ रहा था लेकिन तुम समझ ही सकते हो कि वह अपाहिज व गूंगा होने की वजह से ही तुम तक नहीं पहुंच सका। उसने अपनी सारी ताकत लगाकर तुम तक पहुंचने की कोशिश की लेकिन बुढापे में बचपन जैसी शक्ति नहीं होती शरीर में, इसलिए हृदयाघात की वजह से तुम्‍हारे मित्र की मृत्‍यु हो गई और उसकी वजह हो तुम क्‍योंकि वह तुमसे मिलने हेतु तुम तक पहुंचने के लिए ही अपनी सीमाओं को लांघते हुए तुम्‍हारे पीछे भाग रहा था।


अब पण्डित को पूरी तरह से विश्‍वास हो गया कि महाकाल सचमुच ही यमदूत है और जीवों के प्राण हरण करना ही उसका काम है। चूंकि पण्डित एक ज्ञानी व्‍यक्ति था और जानता था कि मृत्‍यु पर किसी का कोई बस नहीं चल सकता व सभी को एक न एक दिन मरना ही है, इसलिए उसने जल्‍दी ही अपने आपको सम्‍भाल लिया लेकिन सहसा ही उसके मन में अपनी स्‍वयं की मृत्‍यु के बारे में जानने की उत्‍सुकता हुई। इसलिए उसने महाकाल से पूछा- अगर मृत्‍यु मेरे मित्र की होनी थी, तो तुम शुरू से ही मेरे साथ क्‍यों चल रहे थे?


महाकाल ने जवाब दिया- मैं, तो सभी के साथ चलता हुं और हर क्षण चलता रहता हुं, केवल लोग मुझे पहचान नहीं पाते क्‍योंकि लोगों के पास अपनी समस्‍याओं के अलावा किसी और व्‍यक्ति, वस्‍तु या घटना के संदर्भ में सोंचने या उसे देखने, समझने का समय ही नहीं है।


पण्डित ने आगे पूछा- तो क्‍या तुम बता सकते हो कि मेरी मृत्‍यु कब और कैसे होगी?


महाकाल ने कहा- हालांकि किसी भी सामान्‍य जीव के लिए ये जानना उपयुक्‍त नहीं है, क्‍योंकि कोई भी जीव अपनी मृत्‍यु के संदर्भ में जानकर व्‍यथित ही होता है, लेकिन तुम ज्ञानी व्‍यक्ति हो और अपने मित्र की मृत्‍यु को जितनी आसानी से तुमने स्‍वीकार कर लिया है, उसे देख मुझे ये लगता है कि तुम अपनी मृत्‍यु के बारे में जानकर भी व्‍यथित नहीं होगे। सो, तुम्‍हारी मृत्‍यु आज से ठीक छ: माह बाद आज ही के दिन लेकिन किसी दूसरे राजा के राज्‍य में फांसी लगने से होगी और आश्‍चर्य की बात ये है कि तुम स्‍वयं खुशी से फांसी को स्‍वीकार करोगे। इतना कहकर महाकाल जाने लगा क्‍योंकि अब उसके पास पण्डित के साथ चलते रहने का कोई कारण नहीं था।


पण्डित ने अपने मित्र का यथास्थिति जो भी कर्मकाण्‍ड सम्‍भव था,  किया और फिर से अपने गांव लौट आया। लेकिन कोई व्‍यक्ति चाहे जितना भी ज्ञानी क्‍यों न हो, अपनी मृत्‍यु के संदर्भ में जानने के बाद कुछ तो व्‍यथित होता ही है और उस मृत्‍यु से बचने के लिए कुछ न कुछ तो करता ही है सो पण्डित ने भी किया।


चूंकि पण्डित विद्वान था इसलिए उसकी ख्‍याति उसके राज्‍य के राजा तक थी। उसने सोंचा कि राजा के पास तो कई ज्ञानी मंत्राी होते हैं आैर वे उसकी इस मृत्‍यु से सम्‍बंधित समस्‍या का भी कोई न कोई समाधान तो निकाल ही देंगे। इसलिए वह पण्डित राजा के दरबार में पहुंचा और राजा को सारी बात बताई। राजा ने पण्डित की समस्‍या को अपने मंत्रियों के साथ बांटा और उनसे सलाह मांगी।


अन्‍त में सभी की सलाह से ये तय हुआ कि यदि पण्डित की बात सही है, तो जरूर उसकी मृत्‍यु 6 महीने बाद होगी लेकिन मृत्‍यु तब होगी, जबकि वह किसी दूसरे राज्‍य में जाएगा। यदि वह किसी दूसरे राज्‍य जाए ही न, तो मृत्‍यु नहीं होगी। ये सलाह राजा को भी उपयुक्‍त लगी सो उसने पण्डित के लिए महल में ही रहने हेतु उपयुक्‍त व्‍यवस्‍था करवा दी। अब राजा की आज्ञा के बिना कोई भी व्‍यक्ति उस पण्डित से नहीं मिल सकता था लेकिन स्‍वयं पण्डित कहीं भी आ-जा सकता था ताकि उसे ये न लगे कि वह राजा की कैद में है। हालांकि वह स्‍वयं ही डर के मारे कहीं आता-जाता नहीं था।


धीरे-धीरे पण्डित की मृत्‍यु का समय नजदीक आने लगा और आखिर वह दिन भी आ गया, जब पण्डित की मृत्‍यु होनी थी। सो, जिस दिन पण्डित की मृत्‍यु होनी थी, उससे पिछली रात पण्डित डर के मारे जल्‍दी ही सो गया ताकि जल्‍दी से जल्‍दी वह रात और अगला दिन बीत जाए और उसकी मृत्‍यु टल जाए। लेकिन स्‍वयं पण्डित को नींद में चलने की बीमारी थी और इस बीमारी के बारे में वह स्‍वयं भी नहीं जानता था, इसलिए राजा या किसी और से इस बीमारी का जिक्र करने अथवा किसी चिकित्‍सक से इस बीमारी का र्इलाज करवाने का तो प्रश्‍न ही नहीं था।


चूंकि पण्डित अपनी मृत्‍यु को लेकर बहुत चिन्तित था और नींद में चलने की बीमारी का दौरा अक्‍सर तभी पडता है, जब ठीक से नींद नहीं आ रही होती, सो उसी रात पण्डित रात को नींद में चलने का दौरा पडा, वह उठा और राजा के महल से निकलकर अस्‍तबल में आ गया। चूंकि वह राजा का खास मेहमान था, इसलिए किसी भी पहरेदार ने उसे न ताे रोका न किसी तरह की पूछताछ की। अस्‍तबल में पहुंचकर वह सबसे तेज दौडने वाले घोडे पर सवार होकर नींद की बेहोशी में ही राज्‍य की सीमा से बाहर दूसरे राज्‍य की सीमा में चला गया। इतना ही नहीं, वह दूसरे राज्‍य के राजा के महल में पहुंच गया और संयोग हुआ ये कि उस महल में भी किसी पहरेदार ने उसे नहीं रोका न ही कोई पूछताछ की क्‍योंकि सभी लोग रात के अन्तिम प्रहर की गहरी नींद में थे।


वह पण्डित सीधे राजा के शयनकक्ष्‍ा में पहुंच गया। रानी के एक ओर उस राज्‍य का राजा सो रहा था, दूसरी आेर स्‍वयं पण्डित जाकर लेट गया। सुबह हुई, तो राजा ने पण्डित को रानी की बगल में सोया हुआ देखा। राजा बहुत क्रोधित हुआ। पण्डित काे गिरफ्तार कर लिया गया।


पण्डित को तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह आखिर दूसरे राज्‍य में और सीधे ही राजा के शयनकक्ष में कैसे पहुंच गया। लेकिन वहां उसकी सुनने वाला कौन था। राजा ने पण्डित को राजदरबार में हाजिर करने का हुक्‍म दिया। कुछ समय बाद राजा का दरबार लगा, जहां राजा ने पण्डित को देखा और देखते ही इतना क्रोधित हुआ कि पण्डित को फांसी पर चढा दिए जाने का फरमान सुना दिया।


फांसी की सजा सुनकर पण्डित कांप गया। फिर भी हिम्‍मत कर उसने राजा से कहा कि- महाराज… मैं नहीं जानता कि मैं इस राज्‍य में कैसे पहुंचा। मैं ये भी नहीं जानता कि मैं आपके शयनकक्ष में कैसे आ गया और आपके राज्‍य के किसी भी पहरेदार ने मुझे रोका क्‍यों नहीं, लेकिन मैं इतना जानता हुं कि आज मेरी मृत्‍यु होनी थी और होने जा रही है।


राजा को ये बात थोडी अटपटी लगी। उसने पूछा- तुम्‍हें कैसे पता कि आज तुम्‍हारी मृत्‍यु होनी थी? कहना क्‍या चाहते हो तुम?


राजा के सवाल के जवाब में पण्डित से पिछले 6 महीनों की पूरी कहानी बता दी और कहा कि- महाराज… मेरा क्‍या, किसी भी सामान्‍य व्‍यक्ति का इतना साहस कैसे हो सकता है कि वह राजा की उपस्थिति में राजा के ही कक्ष में रानी के बगल में सो जाए। ये तो सरासर आत्‍महत्‍या ही होगी और मैं दूसरे राज्‍य से इस राज्‍य में आत्‍महत्‍या करने क्‍यों आऊंगा।


राजा को पण्डित की बात थोडी उपयुक्‍त लगी लेकिन राजा ने सोंचा कि शायद वह पण्डित मृत्‍यु से बचने के लिए ही महाकाल और अपनी मृत्‍यु की भविष्‍यवाणी का बहाना बना रहा है। इसलिए उसने पण्डित से कहा कि – यदि तुम्‍हारी बात सत्‍य है, और आज तुम्‍हारी मृत्‍यु का दिन है, जैसाकि महाकाल ने तुमसे कहा है, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु का कारण मैं नहीं बनुंगा लेकिन यदि तुम झूठ कह रहे हो, तो निश्चित ही आज तुम्‍हारी मृत्‍यु का दिन है।


चूंकि पडौस्‍ाी राज्‍य का राजा उसका मित्र था, इसलिए उसने तुरन्‍त कुछ सिपाहियों के साथ दूसरे राज्‍य के राजा के पास पत्र भेजा और पण्डित की बात की सत्‍यता का प्रमाण मांगा।


शाम तक भेजे गए सैनिक फिर से लौटे और उन्‍होंने आकर बताया कि- महाराज… पण्डित जो कह रहा है, वह सच है। दूसरे राज्‍य के राजा ने पण्डित को अपने महल में ही रहने की सम्‍पूर्ण व्‍यवस्‍था दे रखी थी और पिछले 6 महीने से ये पण्डित राजा का मेहमान था। कल रात राजा स्‍वयं इससे अन्तिम बार इसके शयन कक्ष में मिले थे और उसके बाद ये इस राज्‍य में कैसे पहुंच गया, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। इसलिए उस राज्‍य के राजा के अनुसार पण्डित को फांसी की सजा दिया जाना उचित नहीं है।


लेकिन अब राजा के लिए एक नई समस्‍या आ गई। चूंकि उसने बिना पूरी बात जाने ही पण्डित को फांसी की सजा सुना दी थी, इसलिए अब यदि पण्डित को फांसी न दी जाए, तो राजा के कथन का अपमान हो और यदि राजा द्वारा दी गई सजा का मान रखा जाए, तो पण्डित की बेवजह मृत्‍यु हो जाए।


राजा ने अपनी इस समस्‍या का जिक्र अपने अन्‍य मंत्रियों से किया और सभी मंत्रियों ने आपस में चर्चा कर ये सुझाव दिया कि- महाराज… आप पण्डित को कच्‍चे सूत के एक धागे से फांसी लगवा दें। इससे आपके वचन का मान भी रहेगा और सूत के धागे से लगी फांसी से पण्डित की मृत्‍यु भी नहीं होगी, जिससे उसके प्राण भी बच जाऐंगे।


राजा को ये विचार उपयुक्‍त लगा और उसने ऐसा ही आदेश सुनाया। पण्डित के लिए सूत के धागे का फांसी का फन्‍दा बनाया गया और नियमानुसार पण्डित को फांसी पर चढाया जाने लगा। सभी खुश थे कि न तो पण्डित मरेगा न राजा का वचन झूठा पडेगा। पण्डित को भी विश्‍वास था कि सूत के धागे से तो उसकी मृत्‍यु नहीं ही होगी इसलिए वह भी खुशी-खुशी फांसी चढने को तैयार था, जैसाकि महाकाल ने उसे कहा था।


लेकिन जैसे ही पण्डित को फांसी दी गई, सूत का धागा तो टूट गया लेकिन टूटने से पहले उसने अपना काम कर दिया। पण्डित के गले की नस कट चुकी थी उस सूत के धागे से और पण्डित जमीन पर पडा तडप रहा था, हर धडकन के साथ उसके गले से खून की फूहार निकल रही थी और देखते ही देखते कुछ ही क्षणों में पण्डित का शरीर पूरी तरह से शान्‍त हो गया। सभी लोग आश्‍चर्यचकित, हक्‍के-बक्‍के से पण्डित को मरते हुए देखते रहे। किसी को भी विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि एक कमजाेर से सूत के धागे से किसी की मृत्‍यु हो सकती है लेकिन घटना घट चुकी थी, नियति ने अपना काम कर दिया था।

                         ▪️▪️▪️

     जो होना होता है, वह होकर ही रहता है। हम चाहे जितनी सावधानियां बरतें या चाहे जितने ऊपाय कर लें, लेकिन हर घटना और उस घटना का सारा ताना-बाना पहले से निश्चित है जिसे हम रत्‍ती भर भी इधर-उधर नहीं कर सकते। इसीलिए ईश्‍वर ने हमें भविष्‍य जानने की क्षमता नहीं दी है, ताकि हम अपने जीवन को ज्‍यादा बेहतर तरीके से जी सकें और यही बात उस पण्डित पर भी लागु होती है। यदि पण्डित ने महाकाल से अपनी मृत्‍यु के बारे में न पूछा होता, तो अगले 6 महीने तक वह राजा के महल में कैद होकर हर रोज डर-डर कर जीने की बजाय ज्‍यादा बेहतर जिन्‍दगी जीता।


प्रकृति ने जो भी कुछ बनाया है और उसे जैसा बनाया है, वह सबकुछ किसी न किसी कारण से वैसा है और उसके वैसा होने पर सवाल उठाना गलत है क्‍योंकि हर व्‍यक्ति, वस्‍तु या स्थिति का सम्‍बंध किसी न किसी घटना से है, जिसे घटित होना है।


उदाहरण के लिए पण्डित की मृत्‍यु का सम्‍बंध उसके मित्र से था क्‍योंकि यदि वह उसके मित्र से मिलने न जा रहा होता, तो उसे रास्‍ते में महाकाल न मिलता और पण्डित उससे अपनी मृत्‍यु से सम्‍बंधित सवाल न पूछता। जबकि यदि पण्डित अपने मित्र से मिलने न जाता और पण्डित का मित्र बचपन से ही गूंगा व अपाहिज न होता, तो उसकी मृत्‍यु न होती क्‍योंकि उस स्थिति में वह अपने मित्र को पीछे से आवाज देकर रोक सकता था। यानी बपचन से प्रकृति ने उसे जो अपंगता दी थी, उसका सम्‍बंध उसकी मृत्‍यु से था।


इसी तरह से पण्डित को नींद में चलने की बीमारी है, इस बात का पता यदि स्‍वयं पण्डित को पहले से होता, तो वह इस बात का जिक्र राजा से जरूर करता, परिणामस्‍वरूप वह राजा के महल से निकलता तो कोई न कोई पहरेदार उसे जरूर रोक लेता अथवा राजा ने कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था जरूर की होती, ताकि पण्डित नींद में उठकर कहीं न जा सके।


यानी हर घटना के घटित होने के लिए प्रकृति पहले से ही सारे बीज बो देती है जो अपने निश्चित समय पर अंकुरित होकर उस घटना के घटित होने में अपना योगदान देते हैं। इसलिए प्रकृति से लडने का कोई मतलब नहीं है क्‍योंकि हमें नहीं पता कि किस घटना के घटित होने के लिए कौन-कौन से कारण होंगे और उन कारणों से सम्‍बंधित बीज कब, कहां और कैसे बोए गए हैं और इसी को हम सरल शब्‍दों में भाग्‍य कहते हैं।


ये कहानी आपको कैसी लगी? क्‍या आपने भी कभी ये महसूस किया है कि प्रकृति की सभी घटनाऐं पहले से निश्चित हैं और आपके कुछ करने अथवा न करने से कहीं कोई फर्क नहीं पडता बल्कि सबकुछ अपने आप अपने अनुसार घटित होता है?


🌹🌹जय जय श्री राम🌹🌹

(साभार- Sampurna Nand Pandey )

प्रेम

 ऎसा भी प्रेम  / Must read this moral story👇

       

एक फकीर बहुत दिनों तक बादशाह के साथ रहा बादशाह का बहुत प्रेम उस फकीर पर हो गया। 


प्रेम भी इतना कि बादशाह रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। 


कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते।


एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए। 


भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे।


 पेड़ पर एक ही फल लगा था।


 बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। 


बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया।


 फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला, 'बहुत स्वादिष्ट ऎसा फल कभी नहीं खाया। 


एक टुकड़ा और दे दें।


 दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। 


फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। 


इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए।


 जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा, 'यह सीमा से बाहर है। 


आखिर मैं भी तो भूखा हूं।


 मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।'.


और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। 


मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था।


राजा बोला, 'तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?' 


उस फकीर का उत्तर था, 


'जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं?


 सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले।


 दोस्तों जँहा मित्रता हो वँहा संदेह न हो ।

सोमवार, 20 सितंबर 2021

काक भशुण्डी प्रकरण

 एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।।

कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।।

कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।।

किन्तु

*कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा*। 

*सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा*।।

परिणाम ?

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्दपि सो सब भांति अयाना।।


श्रीराम जी के ये काकभुशुण्डि जी के प्रति उपरोक्त कथन आज भी प्रासंगिक है। 

कोई पुत्र बहुत शिक्षित हुआ,

कोई धनवान हुआ,

तो पिता के लिए गर्व की बात होती है किन्तु यदि वही उतना प्रिय नहीं जितना एक पिता के भक्त पुत्र । क्योंकि जो अधिक धनवान, विद्वान हुआ वह माता पिता को छोड़कर परदेश में बस जाएगा लेकिन सेवा वही करेगा जो धनवान, विद्वान, बुद्धिमान कम था और घर पर माता पिता के पास रहता हो।

आजकल काँपते हुए शरीर से भी बड़े गर्व से बताते हैं कि मेरा पुत्र अमेरिका में डॉक्टर है, किन्तु आप जब बिमार पड़ते हैं तो वो कितना काम आता है?

गुणवान धनवान है तो पितृभक्त नहीं,

(माता पिता के सेवा नहीं करता)

और जो सेवा करता है वह गुणवान धनवान नहीं,

यही तो है विषमता।

(गंगा जी में बहती लाशों में अधिकांश वैसे ही गुणवान धनवान संतान के माता पिता के रहते हैं।)

इसीलिए पितृ भक्त संतान भले ही समाज की दृष्टि में मूर्ख हो किन्तु पिता के लिए वही अत्यंत प्रिय है, उपयोगी है।

कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा।सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।

माता पिता के सेवा करने वाले संतान को दूसरा अन्य धर्म यहां तक कि भगवान के विग्रह सेवा करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि स्वयं भगवान उन माता पिता को माध्यम बनाकर प्रत्यक्ष आशीर्वाद दे रहे हैं -

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। 

जद्दपि सो सब भांति अयाना।।

ऐसे *अयाना* (तथाकथित अज्ञानी) पर भगवान भी न्योछावर।


बस भगवान के पवित्र भावना वाले निर्मल मन वाले सेवक ऐसे ही होते हैं 

🙏🙏🙏

सीताराम जय सीताराम

 सीताराम जय सीताराम

प्रार्थना

 हमारी प्रात: काल की प्रार्थना

💐🌷💐🌷💐🌷💐🌷💐

*श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।*

*बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।*

*बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।*

*बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।*

 

*चौपाई :*

 

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।

जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।


रामदूत अतुलित बल धामा।

अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

 

महाबीर बिक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी।।

 

कंचन बरन बिराज सुबेसा।

कानन कुंडल कुंचित केसा।।

 

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।

कांधे मूंज जनेऊ साजै।

 

संकर सुवन केसरीनंदन।

तेज प्रताप महा जग बन्दन।।

 

विद्यावान गुनी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर।।

 

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया।।

 

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

बिकट रूप धरि लंक जरावा।।

 

भीम रूप धरि असुर संहारे।

रामचंद्र के काज संवारे।।

 

लाय सजीवन लखन जियाये।

श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।

 

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

 

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।

 

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा।।

 

जम कुबेर दिगपाल जहां ते।

कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।

 

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।

राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

 

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।

लंकेस्वर भए सब जग जाना।।

 

जुग सहस्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

 

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।

 

दुर्गम काज जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

 

राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

 

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।

तुम रक्षक काहू को डर ना।।

 

आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनों लोक हांक तें कांपै।।

 

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।

महाबीर जब नाम सुनावै।।

 

नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा।।

 

संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

 

सब पर राम तपस्वी राजा।

तिन के काज सकल तुम साजा।

 

और मनोरथ जो कोई लावै।

सोइ अमित जीवन फल पावै।।

 

चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा।।

 

साधु-संत के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे।।

 

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता।।

 

राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा।।

 

तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम-जनम के दुख बिसरावै।।

 

अन्तकाल रघुबर पुर जाई।

जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।

 

और देवता चित्त न धरई।

हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।

 

संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

 

जै जै जै हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।

 

जो सत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई।।

 

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा।।

 

तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।। 

 

दोहा :

 

*पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।*

*राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।*

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रविवार, 19 सितंबर 2021

84 कोश की यात्रा का मतलब

 जानिए क्या है 84 #कोसी यात्रा और हर व्यक्ति को क्यों करनी चाहिए यह यात्रा?

वेद-पुराणों में ब्रज की 84 कोस की परिक्रमा का बहुत महत्व है, ब्रज भूमि भगवान श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति राधा रानी की लीला भूमि है। इस परिक्रमा के बारे में वारह पुराण में बताया गया है कि पृथ्वी पर 66 अरब तीर्थ हैं और वे सभी चातुर्मास में ब्रज में आकर निवास करते हैं। करीब 268 किलोमीटर परिक्रमा मार्ग में परिक्रमार्थियों के विश्राम के लिए 25 पड़ावस्थल हैं। इस पूरी परिक्रमा में करीब 1300 के आसपास गांव पड़ते हैं। कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी 1100 सरोवरें, 36 वन-उपवन, पहाड़-पर्वत पड़ते हैं। बालकृष्ण की लीलाओं के साक्षी उन स्थल और देवालयों के दर्शन भी परिक्रमार्थी करते हैं, जिनके दर्शन शायद पहले ही कभी किए हों। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालुओं को यमुना नदी को भी पार करना होता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने मैया यशोदा और नंदबाबा के दर्शनों के लिए सभी तीर्थों को ब्रज में ही बुला लिया था। 84 कोस की परिक्रमा लगाने से 84 लाख योनियों से छुटकारा पाने के लिए है। परिक्रमा लगाने से एक-एक कदम पर जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।

शिवपूजन सहाय

 

शिवपूजन सहाय के सम्मान में जारी डाक टिकट


प्रारम्भिक शिक्षा आरा (बिहार) में हुई। फिर १९२१ से कलकत्ता में पत्रकारिता आरम्भ की। 1924 में लखनऊ में प्रेमचंद के साथ 'माधुरी' का सम्पादन किया। 1926 से 1933 तक काशी में प्रवास और पत्रकारिता तथा लेखन। 1934 से 1939 तक पुस्तक भंडार, लहेरिया सराय में सम्पादन-कार्य किया। 1939 से 1949 तक राजेंद्र कॉलेज, छपरा में हिंदी के प्राध्यापक रहे। 1950 से 1959 तक पटना में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक रहे। 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा दी. लिट्. की मानद उपाधि।

इनके लिखे हुए प्रारम्भिक लेख 'लक्ष्मी', 'मनोरंजन' तथा 'पाटलीपुत्र' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे। शिवपूजन सहाय ने 1934 ई. में 'लहेरियासराय' (दरभंगा) जाकर मासिक पत्र 'बालक' का सम्पादन किया। स्वतंत्रता के बाद शिवपूजन सहाय बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के संचालक तथा बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से प्रकाशित 'साहित्य' नामक शोध-समीक्षाप्रधान त्रैमासिक पत्र के सम्पादक थे।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

तलवार की धार में केवल अपनापन प्यार / हरीश पाठक

 रुला रहा है इशमधु तलवार का जाना

   इतनी बेरौनक सुबह पहले कभी नहीं आयी।कलमकार मंच के संयोजक निशान्त की खबर ने सन्निपात की स्थिति में ला दिया।दिग्गज पत्रकार,कथाकार व राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव ईशमधु तलवार का कल रात निधन हो गया।रात दो बजे उन्हें घर पर ही दिल का दौरा पड़ा और उनके पुत्र डॉ अनीश जब अस्पताल ले जा रहे थे तब रास्ते में ही उनका निधन हो गया।आज 11 बजे उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

      मेरे लिए यह स्तब्धकारी खबर है।कल उनसे दो बार बात हुई।हँसते खिलखिलाते तलवार की आवाज अब तक कानों में गूंज रही है।कल ही आयी किताब ' राजनीतिक कहानियों का सफर' (संपादक:तरसेम गुजराल,प्रकाशक:इंडिया नेटबुक्स) में उनकी कहानी 'जीरो लाइन' को शामिल किया गया था।उसके साथ ही दिसम्बर में आयोजित एक समारोह में  हम मिलनेवाले थे -उसको ले कर।अपने मित्र प्रेमचंद गांधी के साथ वे रात ग्यारह बजे तक चर्चारत थे।इस बुरी खबर पर यकीन ही नहीं हो पा रहा है।

     ईशमधु तलवार सक्रियता के पर्याय थे।'नवभारत टाइम्स' (जयपुर संस्करण) में मुख्य संवाददाता व ई टीवी (राजस्थान ) के संपादक रहे ईशमधु तलवार देश में पहली बार शुरू हुए समानांतर साहित्य उत्सव के जनक थे जिसके अब तक चार आयोजन हो चुके हैं।'लाल बजरी की सड़क' व 'रिनाला खुर्द' उनकी चर्चित पुस्तकें हैं।संगीतकार दान सिंह को गुमनामी के अंधेरे से निकाल कर चर्चा के केंद्र में लाने का जरूरी काम हिंदी के इस योद्धा पत्रकार ने ही किया था।

    आज सबसे मिलने जुलनेवाला और होंठो पर एक सतत मुस्कान रखनेवाला यह शख्स अचानक रुलाकर चला जायेगा उम्मीद नहीं थी।

   आप तो ऐसे नहीं थे तलवार साहब?

   इसी 14 अक्टूबर को हम आपका 65 वां जन्मदिन मनानेवाले थे।मेरे आपसे चार दशक से रिश्ते थे।जब आप अलवर में थे और मैं ग्वालियर में।आप 'पलाश' संस्था चलाते थे और मैं 'समानांतर कथाकार मंच' से जुड़ा था।

   झन झनाकर टूटी है रिश्तों की वह कड़ी जो बहुत आत्मीय और अपनी थी।कभी नहीं भूल सकता आपकी वह स्निग्ध मुस्कान जो तकलीफ में भी राहत देती थी।

   एक दिन में नहीं बनते Ish Madhu Talwar ।

   रुंधे गले व भारी मन से अलविदा दोस्त,अलविदा।

   आज दैहिक तौर पर तो आप जुदा हो गए पर मन और दिल से आपको भुला पाना नामुमकिन है।

   मेरे लिए तो बिलकुल नहीं।

एक थी बिट्टो रानी / सुभाष चंदर

 हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिका  'समकालीन भारतीय साहित्य' में हास्य कहानी 

एक थी बिट्टो रा

नी / सुभाष चंदर


एक लड़का और एक लड़की अगर  एक ही कॉलेज, एक ही क्लास और एक ही कोचिंग में पढ़ते हों । इश्किया फिल्में देखने के शौकीन भी हों और  प्रेम के देवी देवता गाहे बगाहे उनके दिल के दरवाजों की सांकल भी बजाते हों । उसके बाद  भी उन दोनों के बीच प्रेम ..इश्क.. लव जैसी कोई संभावना न बने तो यह कोई विश्वास करने लायक तो बात थी नहीं।  बस यूं समझिए, सावधानी हटने  और दुर्घटना घटने के इंतजार वाले मामला था।  बस जैसे ही इंतजार ख़तम हुआ, प्रेम की फिल्म चालू हो गई।सच कहें तो इसमें दोनों का कोई खास कसूर भी  नहीं था । लड़का अच्छा खासा स्मार्ट था। उसकी स्मार्टनेस में उसके ब्रांडेड कपड़ों के अलावा, नए ब्रांड के मोबाइल और महंगी मोटरसाइकिल का भी बड़ा हाथ था। आज के माहौल के हिसाब से यह सब नक्शेबाज़ी लड़के को  स्मार्ट  कहलाने की  की पूरी सुविधा प्रदान करती थीं।बाकी लड़के की नाक,कान आदि की गिनती भी पूरी थी । बस उसकी आंख में जरा सा  भेंगापन था जिसे उसने  ब्रांडेड चश्मे की सवारी गांठकर  ढक लिया था। इतनी सारी योग्यताएं होने के बावजूद, अगर लड़का आशिकी के ग्राउंड में कबड्डी ना खेलता तो  उसके लड़के होने और स्मार्ट होने पर धब्बा लग  जाने की पूरी संभावना थी।

 कुछ ऐसा ही मामला लड़की यानी बिट्टो रानी के साथ भी   था। बिट्टो रानी का  रंग  गोरा और दिमाग कोरा  था। अलबत्ता उसके दिल की पेन ड्राइव इश्किया  फिल्मों की स्टोरीज़ और उनके  डायलॉगों से ठसाठस भरी थी। ये सब गाहे-बगाहे उसे खुद की फिल्म का प्रोडक्शन करने के लिए उकसाते थे।सो कभी वह किसी  सुपात्र युवक को देखते ही आंखों को गिराने -उठाने की कवायद करती तो तभी पहले से सुलझी लटों को और सुलझाने की और कभी यूं ही किसी को देखकर शर्मा जाती तो कभी  मुस्कुरा भी  पड़ती । उसने सारे जतन करके देख लिए मगर उसे अपने मतलब का लव पार्टनर नहीं मिला।  पर उसने हिम्मत नहीं छोड़ी ,एक दिन उसकी प्रेमिल आंखों की वर्जिश का असली कद्रदान मिल ही गया।यह वही लड़का था जिसका हम ऊपर जिक्र कर चुके हैं।लडके के लव अकाउंट में इन दिनों कड़की चल रही थी।उसकी प्रेमिका नंबर सात सगाई हो जाने के कारण भूतपूर्व की पदवी को प्राप्त हो चुकी थी।सो उसे आशिकी के पार्टनर की सख्त जरूरत थी।उधर  बिट्टो रानी को भी कोई और नहीं मिल रहा था। एक दिन भगवान ने उन दोनों दुखी आत्माओं की सुन ही ली।हुआ यह कि एक दिन  क्लास में जब बिट्टो रानी अपनी आंखों को गिराने- उठाने की प्रैक्टिस कर रही थी तो उसने देखा कि उसकी क्लास का ही एक  लड़का उसे लगातार टकटकी लगाकर देखे जा रहा है। यह देखकर वह पहले सकपकाई, फिर शरमाई, फिर उसने आंखें झपका झपकाकर उसकी पूरी पर्सनैलिटी का अवलोकन किया,संतुष्ट होने के बाद उसने वहीं किया को उस ऐसे मौकों पर करना चाहिए था।  उसने लगभग दस मिनट लड़के को कनखियों से  देखा ।  फिर बाकायदा उसकी चश्मे के पीछे छिपी आंखों में आंखे डाल दीं। पहले राउंड में देखा देखी हुई,फिर,मोबाइल पर सुना सुनी हुई।  फिर मैसेंजर ,व्हाट्सएप से होती हुई यह यात्रा रेस्टोरेंट तक पहुंची।कहना न होगा कि अब दोनों लड़का -लड़की, बॉयफ्रैंड- गर्लफ्रैंड की पदवी को प्राप्त हो गए ।  

अब जैसा कि होता है छोटे शहरों के बगीचे में जब प्यार मोहब्बत के फूल खिलते हैं तो उनकी खुशबू आसपास के  भंवरों और मधुमक्खियों को पहले ही लग जाती है तो किसी भंवरे या मधुमक्खी ने आशिकी की यह कहानी मिर्च मसाला बुरककर लड़की के घरवालों की खिदमत में पेश कर दी।  

 खबर मिलते ही  घर में हंगामा मच गया।  मां ने अपने माथे पर हाथ मारा और गालियों से  बिट्टो रानी  की सेवा कर डाली । वहीं बाप ने यही काम एक झापड़ और जान से मार देने की धमकी के साथ संपन्न किया। जबकि छोटे भाई बहनों को कुछ तकनीकी कारणों से बहन की तरफ आंखें तरेरने  और बड़बड़ाने  से ही काम चलाना पड़ा।  इन सारी कार्रवाईयों का लब्बो लुआब यह रहा कि बिट्टो रानी ने उस लड़के से कभी न मिलने की कसम खा ली। कसम चूंकि विद्या रानी की थी सो घरवालों को विश्वास करना पड़ा। यह कसम पूरे चार दिन और सात घंटे टिकी । उसके बाद इश्क के कीड़े ने फिर काट खाया। अबकी बार बिट्टो रानी  और वो लड़का ना सिर्फ मिले बल्कि उन लोगों ने फैसला भी कर लिया कि वे इस जालिम दुनिया से कहीं दूर भाग जाएंगे । तय भी हो गया कि अगले हफ्ते ही बिट्टो रानी  अपने बाप की तिज़ोरी और मां के गहनों के संदूक का बोझ कम करेंगी । उसके बाद वे सपनों की नगरी मुंबई को आबाद करेंगे। इसके बाद सुबुक सुबुक और कसम खाऊ कार्यक्रम के  बाद दोनों विदा हो लिए।  लड़की के मां-बाप को यह खबर भी प्राप्त हो गई। उन्होंने पहले बिब्बो रानी की चौकसी शुरू कर दी फिर   लड़के के पीछे जासूस लगा दिए । जासूस जो खबर लेकर आए वह काफी सनसनी खेज थी। जासूसों ने बताया कि लड़का अपनी जमीन के मुआवजे के पैसे ठिकाने लगाने के अलावा जो दूसरा महत्वपूर्ण काम करता है वह काम इश्कबाज़ी का है। इस फील्ड में उसने काफी नाम कमाया है। उसकी  सात  पूर्व प्रेमिकाएं इस बात की गवाही दे रही थी। उसके अलावा वह  सिगरेट तंबाकू ,शराब  के सेवन  से लेकर थाईलैंड  की यात्रा तक का पुण्य कमा चुका है। इस सबके अलावा भी बड़ी खतरनाक जानकारियां मिलीं।  बिट्टो रानी  के घरवालों का माथा जो था वह ठनक गया। उन्होंने बिट्टो   की मां को उस समझाने की जिम्मेदारी सौंप दी।

मां ने समझाया । कहा ,"अरी मान जा  बिट्टो। क्यों अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर रही है।लड़का आवारा है ।उसके कई लड़कियों के साथ संबंध है।"w

बिट्टो रानी  गर्व से  बोली, - "तो क्या हुआ ,ये तो उसकी स्मार्टनेस की निशानी है।"

मां ने माथे पर हाथ मार  लिया,पिनपिनाकर बोली ," अरी लड़की,  वो  कमीना  शराब पीता है। सिगरेट गांजा,कुछ नहीं छोड़ता।बेटी  तेरी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी।"

पर बिट्टो रानी  ने इस बात का भी कोई खास नोटिस नहीं लिया ,बोली ,- "मां बड़े घर के लोगों में तो ये शौक होते ही हैं।पहले राजा महाराजा भी तो यही सब करते थे। "

 ऐसे ही मां   तीर चलाती गई,बेटी उन्हें थोड़े  आत्मविश्वास और ज्यादा बेशर्मी  की ढाल से रोकती गई। इसी प्रकार मां  के पास  बुराइयों के जितने थान रखे थे ,बिट्टो ने अपने खास तर्कों की कैंची से सब काट डाले ।

हारकर मां ने  एटम बम छोड़ दिया, बोली," अरी, तुझे पता भी है कि वो लड़का एक  शादी पहले ही कर चुका है। पहली घरवाली को उसने छोड़ रखा है।अब क्या तू उसकी दूसरी घरवाली बनेगी ?"

यह जानकारी बिट्टो रानी  के लिए भी नई थी और थोड़ी झटकेदार भी। वह विचलित होने ही वाली थी कि तभी  हिंदी फिल्मों के दृश्यों ने उसे संभाल लिया। सो उसने इश्क की माला एक बार और जपी और  इस सवाल का  भी जवाब दे दिया ,बोली ,"अम्मा मैं सब संभाल लूंगी।मुझसे  ब्याह करते ही वे उससे तलाक ले लेंगे। विश्वास करो प्यार में बहुत ताक़त होती है।" इस डायलाग के बाद  उसने आगे घोषणा कर दी , अम्मा, चाहे तुम कुछ भी कर लो , शादी तो मैं उसी लडके से करूंगी वरना...।"

उसकी इस घोषणा के पीछे चिपकी 'वरना' को सुनते ही मां पिनक गई।सो उसने पहले राउंड में उसे  दर्जनभर गालियां बकीं। फिर उसके बालों को खींच खींच कर उनकी मजबूती टेस्ट की ।आखिर में  कुछ दुहत्थड उसकी कमर पर रसीद किए  पर बिट्टो रानी  की सुई वहीं की वहीं अटकी रही । मां आखिर में अपने सर पर हाथ मार कर चुप बैठ गई। इसके बाद बाप ने ड्यूटी संभाल ली । उसने लड़की में तब तक तमाचे बरसाए जब तक कि जब खुद ही थक हार कर निढाल नहीं हो गया। कहना न होगा कि छोटे भाई बहनों की कोसा कोसी, हिकारत वगैरह को तो बिट्टो रानी  यूं ही घोलकर पी गई। पर इतने सारे गंभीर प्रयासों की  चटनी चाटने के बाद भी उसने इश्क का पहाड़ा पढ़ना नहीं छोड़ा।

यह दृश्य देखकर बाप ने एकाध  बार बेटी को उसके इश्क समेत गंगा जी में फेंकने, जहर माहुर खिलाकर राम नाम सत्य करने आदि  पर भी विचार किया पर बैरी  बुढ़ापे और सफेदपोशी ने इस विचार को अमली जामा नहीं पहनने  दिया। हारकर बाप मंदिर में जाकर भगवान जी को मनौती बोल आया कि भगवान इस लड़की से मुक्ति दिला दो, पूरे पांच सौ एक रुपए का प्रसाद चढ़ाऊंगा। अब भगवान जाने क्या हुआ , भगवान जी को उस पर दया आ गई या उन्हें थोक में प्रसाद का ऑफर लुभा गया या जो कुछ भी जैसे भी हुआ। बिट्टो रानी  के बाप को एकाएक याद आया कि उनका एक  साला भी है जो चाकूबाजी बल्कि यों कहें कि उस्तरेबाज़ी के चक्कर में कई बार जेल की रोटियां तोड़ आया है। विवाह के बाद थोड़ा सुधर गया है पर गाहे-बगाहे अब भी खुराफातों की फसलें काट लेता है। उसने अपनी बीवी  यानी बिट्टो रानी  की मां से मिस्कोट की। उसने अपने भैया और बच्चों के  मामा को फोन कर दिया । बहन भाई में बातें हुई । तय हुआ कि बच्चों का मामा आएगा और डरा धमका कर ,मारपीट  करके किसी भी तरीके से बिट्टो रानी के इश्क का भूत उतार देगा।

अगले दिन दोपहर 3:00 बजे तक मामा पधार  गया । उसने अपनी बहन और जीजा देखे ।बिट्टो रानी यानी लड़की देखी, लड़की की आंखों का विश्वास देखा। उसे समझ में आ गया कि लड़की के इश्क का जोड़ शुद्ध फेविकोल से लगा है आसानी से नहीं छूटेगा। फिर भी उसने रस्म निभाने के लिए अपनी तरफ से लड़की को  समझाया, हड़काया, फिर धमकाया  पर बिट्टो पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वह इश्क की माला  ही जपती रही। यह सब देखकर मामा ने धीमे स्वर  में कुछ कहा जिसे सुनकर  मां की आंखें कानों तक फैल गई । वह रोने लगी। जबकि उसे सुनकर बाप ने सिर्फ इतना कहा,' जो चाहे कर लो पर मेरे घर की इज्जत को बचा लो' ।रास्ता साफ थाअब  जो कुछ करना था ,मामा को करना था।

 उसी रात को दस बजे मामा का काम शुरू हो गया।मामा उस्तरा लिए  के कमरे में घुसा।उसके पीछे पीछे लड़की का बाप ,मां और भाई थे। आते ही  मामा ने बिट्टो  के दोनों हाथों को जोर से पकड़ लिया।फिर  उसके भाई से बोला,"  मन्नू, जल्दी से इसके मुंह में कपड़ा ठूंस दें ।" मन्नू ने आज्ञा का पालन किया। फिर मामा अपने जीजा यानी बिट्टू बाप से मुखातिब हुआ, बोला",  जीजा उसके  पैर कस के पकड़ ले"। बाप ने बिट्टो  के पैरो को कसकर जकड़ लिया। बिन्नी ने छूटने को पूरा जोर लगा दिया। मामा जीजा को देखकर  चिल्लाया," जोर से पकड़ जीजा, तेरे खानदान की इज्जत का सवाल है, इसके लिए कुर्बानी तो देनी ही पड़ेगी। " कुर्बानी के नाम पर  के बाप और भाई के चेहरे  पर जहां कुर्बानी वाला तेज उभर आया ,वहीं बिट्टो  की मां की आंखों से बरसात शुरू हो गई।उसने अपने मुंह में अपनी साड़ी का पल्लू ठूंस लिया। ताकि सिसकियों के गमन का रास्ता बंद हो जाए।अब मामा ने उस्तरा उठा लिया और बिट्टो के सामने लहराया। उस्तरा देखते ही कुछ प्रतिक्रियाएं सामने आईं। बिट्टो ने भगवान को याद करना शुरू कर दिया। उसकी आंखें सफेद हो आईं। ।उसकी  मां की आंखों में दीनता नृत्य करने लगी, होठों से चीख का निकास होते होते बचा।  उधर लड़के के बाप और भाई की आंखों में खूनी लाली और बढ़ गई।  बस अभी उस्तरा चलेगा और लड़की समेत सारी आशिकी  खलास । सीधे नाक की प्लास्टिक सर्जरी का जुगाड़।  सर्जरी के बाद किसी को पता भी नहीं चलेगा कि नाक कटी भी थी या नहीं।वह सोच रहे थे ,साथ ही साथ भविष्य की एल्बम को फॉरवर्ड कर कर के देख भी रहे थे। इधर मामा अपना उस्तरा पैना  रहा था । मामा ने उसकी धार अंगुली से लगा कर चेक की फिर बिट्टो से सर्द स्वर में बोला, " लड़की आज के बाद तेरे इश्क की कहानी खत्म। अब देखता हूं कैसे भागती है तू उस आवारा लड़के के साथ।" यह सुनते ही बिब्बो रानी डर के मारे बेहोश हो गई।मामा यह देख कर संतुष्ट भया फिर उन लोगों की ओर मुंह करके बोला," सुनो तुम सब लोग अपनी आंखें बंद कर लो।  तुम यह दृश्य नहीं देख पाओगे और सुनो, जब मैं कहूं तभी अपनी आंखें खोलना।"

सबने धड़कते दिल से उसकी बात मान ली और आंखें बंद कर ली । मामा ने अपना काम शुरू कर दिया । थोड़ी देर तक मामा काम करता रहा। फिर उसने घोषणा कर दी कि अब सब अपनी आंखें खोल लो। लोगों ने खून सने दृश्य देखने की उम्मीद में जैसे ही आंखें खोली तो चौंक गए। बिट्टो रानी  के चेहरे पर तौलिया पड़ा था जिसके भीतर वह बाकायदा जिंदा थी ।उसकी बेहोशी टूट चुकी थी और  वह गों गों करके अपने जिंदा होने का सबूत  भी दे  रही थी। खून का कहीं नामोनिशान नहीं था । भाई ने शिकायत की नजरों से मामा की ओर देखा तो मामा ने शकुनी हंसते  हुए बिट्टो रानी  के चेहरे से तौलिया हटा दिया । दृश्य देखते ही सब चौंक पड़े ।नीचे बिट्टो रानी  का चेहरा पूरा साबुत था।आंख ,नाक,कान सबकी गिनती पूरी थी बस सिर के सफाचट था जिसकी गवाही सामने फर्श पर पड़े बाल दे रहे थे।मामा ने लड़की को घोटमुंडा बना दिया था। सभी मामा की और प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहे थे।

मामा ने उनकी हालत देखी तो जोर से हंसा फिर बोला, "जीजा अब बिट्टो को  आजाद कर दो ,फिर बिट्टो से बोला ,"जाओ , बिट्टो अब तुम आजाद हो।जाओ जहां जाना है चली जाओ।" फिर जरा रुककर बोला ," पर जाने से पहले एक बार आईने में खुद को जरुर देख लियो।" इतना सुनते ही बिट्टू सीधी आइने की और भागी। कुछ देर बाद उसके जोर-जोर से चीखने और मामा को कोसने की आवाज आई। पर सिर्फ आवाज ही आईं, वह बाहर नहीं आई   जबकि दरवाजे खुले हुए थे। इस पर मामा खुद उसके पास पहुंचा।उसका  मोबाइल उसके हवाले कर दिया और बोला ," चल  अब इसी मोबाइल से अपनी सेल्फी ले और उस लड़के को भेज दे । बिट्टो ने फोटो ली और लड़के को भेज दी ।साथ में रोते रोते मेसेज लिखा-,'देखो, मेरे मामा ने मेरा क्या हाल किया है। मामा सोचता है कि मेरे टकले हो जाने पर तुम मुझसे शादी नहीं करोगे। बताओ तुम मुझसे शादी करोगे ना ? जल्दी बोलो ताकि मैं घर से भागकर तुम्हारे साथ जिंदगी बिता सकूं l  मेरा तुम्हारे बिना जीना बहुत मुश्किल होता जा रहा है l '

तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी

 बिट्टो रानी 


 लड़के ने व्हाट्सएप पर बिट्टो रानी   का बिना बालों वाला  फोटो देखा तो डर गया, उसके बाद उसने नीचे लिखी हुई इबारत पढ़ी तो थोड़ा और डर गया। इस डर के माहौल में ही उसने टकली बिट्टो रानी के साथ फोटो शॉप से अपना ज्वाइंट फोटो तैयार किया। उस  फोटो को देखते ही उसकी हालत और खराब हो गई । वह इतना डर गया कि उसके कांपते हुए हाथ बिट्टो रानी  को  जवाब में सिर्फ एक ही शब्द लिख पाए ,वह शब्द था - सॉरी। इसे लिख कर उसने  बिट्टो रानी का नंबर ब्लॉक पर लगा दिया और सिगरेट सुलगाकर नई गर्लफ्रेंड की संभावना पर विचार करने लगा। 

इधर बिट्टो रानी  ने अपने लंबे मैसेज के जवाब में छोटा सा सॉरी पढ़ा तो वह  भिनक गई । उसने लड़के को फोन मिलाया। पर फोन एक बार टिन टिन कर के कट गया। बिट्टो रानी समझ गई कि लड़के ने फोन ब्लॉक पर लगा दिया है। यह ज्ञान प्राप्त होते ही बिट्टो रानी  रो पड़ी।पहले राउंड में वह रोई,  दूसरे राउंड में उसने मामा को और तीसरे राउंड में उसने लड़के और उसके खानदान  को गलियाना  शुरू किया।

 उसके बाद भी वह कई महीने तक तीनों टाइम पूरे नियम से लड़के और उसकी पुश्तों को गलियाती रही।यह  गाली  वाचन कार्यक्रम   तब तक जारी  रहा जब तक कि उसके  सर पर चोटी करने लायक बाल नहीं आ गए ।  बिट्टो रानी के बालवती हो जाने के बाद, एक दिन उसकी मां ने उससे  शादी की बाबत पूछा तो उसने पहले मन ही मन उस लड़के को फिर से  गलियाया, पर हां की चिड़िया उसने तब भी ना उड़ाई।  बस चुप्पी की चादर ओढ़े पड़ी रही। मां ने पहले माथा ठोकने का काम संपन्न किया फिर अपने भाई यानी बिट्टो के मामा को फोन कर दिया। मामा अगले ही दिन अपनी पैंतालीस  किलो की काया , गज भर लंबी जुबान और छुटन्ने से उस्तरे के साथ पधार गया। आते ही उसने उस्तरा लहराते हुए बिट्टो से वही सवाल पूछा ,

" का बिटिया , हमारे कहने से ब्याह करोगी या फिर उसी शादीशुदा  लफंगे से ब्याह का राग अलापोगी ? जल्दी बोलो ,हमारा उस्तरा तैयार है , अबकी बार भौं भी मूंड देंगे ,समझी ? 

 इतनी बड़ी धमकी के बाद भी , बिट्टो कुछ ना बोली ।बाप ने हड़का कर पूछा ,तो भी चुप्पी ओढ़े रही।

 फिर भाई ने भिनभिना कर पूछा। पहले  तो बिट्टो कुछ सोचती रही ,फिर बोली ," जो कहोगे ,वो मान लेंगे ? पर हमारी एक शर्त है।"

शर्त की बात सुनते ही भाई के गालों में भटूरे की हवा भर गई।

 फिर भी वह पिनपिनाकर बोला ," बक ,जल्दी क्या है तेरी शर्त ?"

बिट्टो ने उसकी नाराज़गी को कोई भाव नहीं दिया और  रहस्य भरे स्वर में बोली ,  ला, अपने काम इधर ला ।"

भाई नमक के लड्डू निगलते हुए, अपने कानों समेत उसके पास पहुंचा। बिट्टो ने उसके कान में कुछ फुसफुस की।भाई का बंद  मुंह खुल गया । वह खुशी से उछल गया । इसी उछलाहट में बोला , बिट्टो, तू सच बोल रही है ना ?

बिट्टो ने उसके सर पर हाथ रख दिया और अपने कमरे में प्रस्थान कर गई।

उसके जाते ही भाई ने बिट्टो की फुसफुस पहले मां के कानों में ट्रांसफर की। मां ने पिता के । आखिर में  मामा का नंबर आया । सबने अपने अपने कपड़े से  खुशी जाहिर करने का काम संपन्न किया । मां ने मन ही मन भगवान का प्रसाद बोला । बाप ने अलबत्ता  दोस्तों के साथ शाम की पार्टी का निर्णय लिया तो मामा ने चिरमिटी सी मूंछों पर ताव दिया और फिर उस्तरा पत्थर पैनाने लगा।क्या पता कल जरूरत पड़ जाए। 


अगले दिन कॉलेज के गेट के बाहर एक कार और उसके पीछे पीछे दर्जन भर मोटरसाइकिलें आकर रूकी। कार में  साक्षात बिट्टो रानी और मामा विद्यमान थे जबकि मोटरसाइकिलों पर भाई और उसके  दोस्त हाॅकियों  समेत मुस्तैद थे।

अब आगे आगे बिट्टो रानी और पीछे पीछे सारी फौज। बिट्टो के नेतृत्व में ऑपरेशन  हीरो खोज अभियान शुरू हुआ । पर कॉलेज में कहीं हीरो के दर्शन नहीं हुए। पर जैसे ही वे कॉलेज के गेट पर वापस आए। तभी हीरो महाशय भी अपनी महंगी मोटरसाइकिल औेर एक कन्या के साथ नमूदार हुए। कन्या निसंदेह उनकी नयी प्रेमिका की पोस्ट संभाल रही थी।इसकी  गवाही मोटरसाइकिल की सीट भी दे रही थी जिसमें दोनों के बीच में हवा के आने की भी  गुंजाइश नहीं छोड़ी गई थी।यह दृश्य देखकर बिट्टो रानी के कलेजे पर मीटर भर लंबा सांप फुफकार  गया। बस  बिट्टो का दिमाग घूम गया।उसने पहले भाई और उसकी टीम को इशारा किया। टीम ने हीरो के चारो ओर घेरा बना लिया।  उसके बाद बिट्टो रानी  सधे हुए कदमों से हीरो के सामने पहुंची।हीरो महाशय देखते ही सकपका गए। उनके पास जो भी   सिट्टी  और पिट्टी नाम की चीजें  थीं ,वे यकायक कहीं  गुम हो गईं। उन्होंने भागने के लिए पतली गली की तलाश करनी चाही पर बिट्टो की फौज ने तो सड़क घेर रखी थी,गली का रास्ता कहां मिलता ? अब तो हीरो के चेहरे पर पूरे साढ़े तीन बज गए। उन्होंने  बिट्टो रानी से अस्फुट स्वरों में कुछ माफी जैसा मांगा जिसके जवाब में बिट्टो  ने अपनी चप्पल निकाल ली और दनादन हीरो की खातिर करनी शुरू कर दी। हीरो के साथ वाली कन्या इस दृश्य को देखकर बिट्टो  पर बिफर  पड़ी। उसने इस कार्य में व्यवधान डालने की कोशिश की तो पहले बिट्टो ने उसके  झोटे पकड़कर,उसे  तीन चार झटके दिए। फिर उसके  कान के पास मुंह ले  जाकर बोली  ," क्यों री , ज्यादा नौटंकी मत कर ।तुझे पता भी है कि ये शादीशुदा है ?" उसके बाद भी वो जाने क्या बोलती रही । कन्या के चेहरे के रंग बदलते रहे। बिट्टो की बात खत्म होते ही कन्या ने पहले तो "नहीं ...नहीं.. ऐसा नहीं हो सकता' का जाप किया । फिर उसने हीरो का गिरेबान पकड़कर  उससे  कुछ पूछा ,हीरो ने शर्म से चेहरा झुका लिया। बस अब कन्या के पैरों से भी उसकी चप्पल निकल आई ।अब उसने भी हीरो की सुताई में अपना योगदान देना शुरू कर दिया । कुछ ही देर में हीरो महाशय की हालत खस्ता हो गई। उसके होठों से चीखें  और बदन से पकौड़ियां उभरने लगी।हीरो ने बचकर भागने की कोशिश की पर आसपास काफी भीड़ जमा थी। बचकर निकलना संभव न था। बिट्टो की फौज के कुछ सिपाही आराम से वीडियो बनाने में जुटे थे। यह देखकर हीरो की हालत और खराब हो गई।उसने आखिरी हथियार फेंकने की कोशिश की । किनमिनाता हुआ बोला ,"याद रखना बिट्टो , मैं तुम्हे छोडूंगा नहीं। तुम जानती हो ना, मैं क्या कर सकता हूं।" अपनी जान में तो उसने बहुत बड़ी धमकी दी थी, बिट्टो को डर जाना चाहिए था।पर पता नहीं क्यों, वह नहीं डरी उल्टे इस बात को सुनते ही उस में मरखनी गाय की आत्मा प्रवेश कर गई।उसने अपने हाथों को सींग जैसा बनाया और उनसे हीरो को धकिया दिया। वह जमीन पर गिर गया । उसके बाद बिट्टो  ने  लात घूंसो से उसकी सेवा की। इस सेवा से थक जाने  के बाद गरजकर बोली," सुन बे हीरो, तू क्या करेगा।पता नहीं ।पर ये जो तेरी पिटाई के वीडियो बन रहे हैं।इनका अचार ना पड़ेगा । इनकी एक कॉपी जाएगी तेरी बीवी को ,तेरे घरवालों को और एक जाएगी तेरे ससुराल वालों को । बाकी की कॉपी कॉलेज के स्टूडेंट्स में सर्कुलेट होंगी। सब को मालूम पड़ना चाहिए ना कि तू शादी शुदा होकर लड़कियों की ज़िन्दगी तबाह कर रहा है । " यह सुनते ही हीरो पर माफी मांगने का दौरा पड़ गया। वह रिरियाते हुए बोला," बिट्टो मुझे माफ़ कर दे। वीडियो कहीं मत भेजियो ,वरना मैं बर्बाद हो जाऊंगा।"कहकर वह बिट्टो के पैर पकड़ने लगा। इसके जवाब में बिट्टो रानी ने कसकर एक लात हीरो को जमा दी ।हीरो की नाक जमीन से माफी मांगने लगी।यह पवित्र दृश्य देखकर बिट्टो की आत्मा प्रसन्न हो गई। वह आगे बढ़ गई।उसके जाने के बाद  सेना ने अपने- अपने हिस्से की पिटाई पूरी की। यह काम हीरो के बेहोश हो जाने तक चलता रहा।इसके बाद सेना ने अपने ठिकानों की तरफ कूच कर दिया ।

आगे की कहानी में  बस इतना जुड़ा कि हीरो ने पहले तो अपनी मरहम पट्टी कराई । उसके बाद वह अपने गांव सिधार गया।  फिर वह उस कॉलेज में तो क्या शहर में भी नजर नहीं आया।

और अब सुनो बिट्टो  रानी की।

  कालांतर में   बिट्टो रानी को  राजकुमार नाम के आढ़ती लाला  से विवाह  करके लालाइन बनने का   सौभाग्य मिला। कुछ वर्षों के बाद उसने लाला के  पांच बच्चों की अम्मा बनने का गौरव भी प्राप्त  किया।अब वह बड़े नियम धर्म से  करवा चौथ का व्रत रखती है और टीवी - फिल्मों में प्यार करने वाले लड़के लड़कियों को देख कर उन पर खूब लानत बरसाती है।


भगवान,  तुमने जैसे बिट्टो रानी के दिन फेरे,ऐसे सबके फेरियो। 


मोब :9311660057

बुधवार, 15 सितंबर 2021

साथ का सुख साथ साथ

प्रस्तुति - सिन्हा आत्म स्वरूप


,,बहू अपनी मां से कहती है,. क्या बताऊँ मम्मी, आजकल तो ,बासी कढ़ी में भी उबाल आया हुआ है| जबसे पापा जी रिटायर हुए है , दोनों लोग फिल्मी हीरो हीरोइन की तरह दिन भर अपने बगीचे में ही झूले पर विराजमान रहते हैं| न अपने बालों की सफेदी का लिहाज है और ना ही बहू-- बेटे का इस उम्र में लिहाज | दोनों मेरी और नवीन की बराबरी कर रहे हैं| ठीक है मां मैं आपसे बाद में बात करती हूं शायद सासुमा आ रही हैं।"

सासु मां ने बहू की बातें कमरे के बाहर सुन ली थी, पर नज़रअंदाज़ करते हुए खामोशी से चाय बहू सोनम को दे दी|

सासू मां बहू सोनम को चाय देने के पश्चात पति देव अशोक जी के लिए चाय ले जाने लगी, ऐसा देखकर बहू सोनम के चेहरे पर व्यंगात्मक मुस्कान तैर गयी| पर सासू मां, समझदारी दिखाते हुए बहू की इस नाजायज हरकत को नज़र अंदाज़ करते हुए सिर झुकाए वहां से निकल गईं|

पति के रिटायर होने के बाद कुछ दिन से उनकी यही दिनचर्या हो गयी थी| आजकल सासुमा प्रभा जी अपने पति देव अशोक जी को उनकी इच्छानुसार अच्छे से तैयार होकर अपने घर के सबसे खूबसूरत हिस्से में अपने पति देव के साथ झूले में बैठ कर उनको कंपनी देती थी। यह झूला मकान की एक खाली जगह में लगा हुआ था। जिसके चारों तरफ बगीचा था। प्रभाजी ने सारी उम्र तो उनकी बच्चों के लिए लगा दी थी|

पाण्डेय विला...दोमंजिला कोठीनुमा घर अशोक और प्रभा का जीवन भर का सपना था, जो उन्होंने बड़ी मेहनत से साकार किया था। घर का बगीचा 20 by 20 गज़ की कच्ची जगह में था। यह वास्तव में प्रभा के सपनोँ का बगीचा| यंहा तरह तरह की बेले, कई प्रकार के पौधे, हरसिंगार का घनेरा पेड़, और एक छोटा सा टैंक था जिसमें कमल के फूल खिले रहै थे| जाड़े में तो रँग बिरंगे फूल डहेलिया, गुलाब, पैंजी और तमाम किचन गार्डन की सब्जियां चार चाँद लगा देतीं थी।

बगीचे में धनिया, पोदीना मेंथी की बहार रहती| तरह तरह के फूलों की खुशबू से पूरा घर और अशोक बाबू और पत्नी प्रभा सकारात्मक ऊर्जा से हमेशा सराबोर रहते थे। ऐसे मनमोहक वातावरण में वहां पर लगा झूला मन को असीम शांति प्रदान करता। यहां का वातावरण इतना सुखद में और शांति मय था कि कोई भी यहां पर बैठता तो उसकी उठने की इच्छा ही नहीं होती थी| जाड़ों में वहीँ तसले में आग जलती और भुने आलू,शकरकन्द के मज़े लिये जाते थे। और बरसात में सुलगते कोयलों पर सिंकते भुट्टे का आनंद लिया जाता था।

पहले वह और अशोक इस मनमोहक जगह में कम समय के लिए ही बैठ पाते थे। प्रभा अनमनी होतीं तो अशोक बड़े ज़िंदादिल शब्दों में कहते, "पार्टनर रिटायरमेंट के बाद दोनों इसी झूले पर साथ बैठेंगे और खाना भी साथ में ही खायेंगे| आपकी हर शिकायत हम दूर कर देँगे| फ़िलहाल हमें बच्चों के लिये जीना है| बच्चों के कैरियर पर बहुत कुछ बलिदान करना पड़ा, खेर अब बेटा अच्छी नौकरी में था और बेटी भी अपने घर की हो चुकी थी |

रिटायरमेंट के बाद घर में थोड़ी रौनक रहने लगी थी, अशोक जी को भी घर में रहना अच्छा लग रहा था| पहले तो बड़े पद पर थे तो कभी उनके कदम घर में टिकते ही नहीँ थे| गाँव से आकर शहर में बसेरा बनाना आसान न था, लेकिन किसी तरह चार सौ गज़ ज़मीन कर ली| सहधर्मिणी प्रभा जी भी सहयोगी महिला थीं तो मन्ज़िल और आसान हो गयी| अब दोनों पति पत्नी आराम के पलों को सँजो लेना चाहते थे

लेकिन उनकी बहू सोनम अपने पति नवीन को उसके माता पिता के लिये ताने देने का कोई मौका न छोड़ती|

उसने उस कोने के बागीचे से छुटकारा पाने के लिये नवीन को एक रास्ता सुझाते हुए कहा,"क्योँ न हम बड़ी कार खरीद लें...नवीन"| "आईडिया तो अच्छा है पर रखेंगे कहाँ एक कार रखने की ही तो जगह है घर में",नवीन थोड़ा चिंतित स्वर में बोला|

"जगह तो है न, वो गार्डन तुम्हारा..जहाँ आजकल दोनों लव बर्ड्स बैठते हैं।" सोनम व्यागतमक स्वर में बोली|

"थोड़ा तमीज़ से बात करो," नवीन क्रोध से बोला। लेकिन फिर भी सोनम ने अपने पति को पापा जी से बात करने का मन बना लिया।

अगले दिन नवीन कुछ कार की तस्वीरों के साथ शाम को अपने पिता के पास गया और बोला, " पापा !मैं और सोनम एक बड़ी गाड़ी खरीदना चाहते हैं "

"पर बेटा एक बड़ी गाड़ी तो घर में पहले ही है, फिर उस नई गाड़ी की रखेंगे भी कहाँ?" अशोक जी ने प्रश्न किया| "ये जो बगीचा है यहीँ गैराज बनवा लेंगे वैसे भी सोनम से तो इसकी देखभाल होने से रही और मम्मी कब तक देखभाल करेंगी? इन पेड़ों को कटवाना ही ठीक रहेगा| वैसे भी ये सब जड़े मज़बूत कर घर की दीवारें कमज़ोर कर रहें है|"

यह सुनकर प्रभा तो वहीँ कुर्सी पर सीना पकड़ कर बैठ गईं, अशोक जी ने क्रोध को काबू में करते हुए कहा, मुझे तुम्हारी माँ से भी बात करके थोड़ा सोचने का मौका दो| क्या पापा... मम्मी से क्या पूछना ..वैसे भी इस जगह का इस्तेमाल भी क्या है नवीन थोड़ा चिड़चिड़ा कर बोला| "आप दोनों दिन भर इस जगह बगैर कुछ सोचे समझे,चार लोगों का लिहाज किये बग़ैर साथ में बैठे रहते हैं| अब आप दोनों कोई बच्चे तो नहीं हो | लेकिन आप दोनों ने दिन भर झूले पर साथ बैठे रहने का रिवाज बना लिया है और ये भी नहीँ सोचते कि चार लोग क्या कहेंगे| इस उम्र में मम्मी के साथ बैठने की बजाय आप अपनी उम्र के लोगों में उठा बैठी करेंगे तो वो ज़्यादा अच्छा लगेगा न कि ये सब।" और वह दनदनाते हुए अंदर चला गया| अंदर सोनम की बड़बड़ाहट भी ज़ारी थी।

अशोक जी कड़वी सच्चाई का एहसास कर रहे थे। आज के पहले जब कभी पत्नी ने अपने मन की कही तो उन्होंने उन्हें ही सामन्जस्य बिठाने की सीख दी| पर आज की बात से तो उनके साथ प्रभा जी भी सन्न रह गईं, अपने बेटे के मुँह से ऐसी बातें सुनकर दोनों को दिल भर आया था और टूट भी चुका था। रिटायरमेंट को अभी कुछ ही समय हुआ जो थोड़ा सकून से गुजरा था। पहले की ज़िन्दगी तो भागमभाग में ही निकल गयी थी, बच्चों के लिए सुख साधन जुटाने में|

नवीन और सोनम ने उस शाम खाना बाहर से ऑर्डर कर दिया पर प्रभा से न खाना खाया गया और न उन्हें नींद आयी| नींद तो अशोक को भी नहीँ आ रही थी और वो प्रभा की मनोस्थिति भी समझ रहे थे | अशोक जी आज पूरी रात ऊहापोह में लगे रहे, कुछ सोचते रहे, कुछ समझते रहे और कुछ योजना बनाते रहे । लेकिन सुबह जब वे उठे तब बड़े शांत और प्रसन्न थे।

वे रसोई में गये और खुद चाय बनाई | कमरे में आकर पहला कप प्रभा को उठा कर पकड़ाया और दूसरा खुद पीने लगे| आपने क्या सोचा?प्रभा ने रोआंसे लहज़े में पूछा| मैं सब ठीक कर दूँगा बस तुम धीरज रखो,अशोक बोले| पर हद से ज़्यादा निराश प्रभा उस दिन पौधों में पानी देने भी न निकलीं,और न ही किसी से कोई बात की|

दिन भर सब सामान्य रहा,लेकिन शाम को अपने घर के बाहर To Let का बोर्ड टँगा देख नवीन ने भौंचक्के स्वर में अशोक से प्रश्न किया,"पापा माना कि घर बड़ा है पर ये To Let का बोर्ड किसलिए"? " अगले महीने मेरे स्टाफ के मिस्टर गुप्ता रिटायर हो रहें है,तो वो इसी घर में रहेँगे", उन्होंने शान्ति पूर्ण तरीके से उत्तर दिया| हैरान नवीन बोला, "पर कहाँ?" "तुम्हारे पोर्शन में",अशोक जी ने सामान्य स्वर में उत्तर दिया| नवीन का स्वर अब हकलाने लगा था,"और हम लोग " "तुम्हे इस लायक बना दिया है दो तीन महीने में कोई फ्लैट देख लेना या कम्पनी के फ्लैट में रह लेना,अपनी उम्र के लोगों के साथ | "अशोक एक- एक शब्द चबाते हुए बोल रहे थे| हम दोनों भी अपनी उम्र के लोगों में उठे बैठेंगे। तुम्हारी माँ की सारी उम्र सबका लिहाज़ करने में निकल गयी| कभी बुजुर्ग तो कभी बच्चे| अब लिहाज़ की सीख तुम सबसे लेना बाकी रह गया थी| "पापा मेरा वो मतलब नहीँ था",नवीन सिर झुकाकर बोला|

नही बेटा तुम्हारी पीढ़ी ने हमें भी प्रैक्टिकल बनने का सबक दे दिया, जब हम तुम दोनों को साथ देखकर खुश हो सकते है तो तुम लोगों को हम लोगों से दिक्कत क्योँ है| "? इस मकान को घर तुम्हारी माँ ने बनाया, ये पेड़ और इनके फूल तुम्हारे लिए माँगी गयी न जाने कितनी मनौतियों के साक्षी हैं, तो यह अनोखा कोना छीनने का अधिकार में किसी को भी नहीं दूँगा| पापा आप तो सीरियस हो गये, नवीन के स्वर अब नम्र हो चले थे| न बेटा... तुम्हारी मां ने जाने कितने कष्ट सहकर, कितने त्याग कर के मेरा साथ दिया आज इसी के सहयोग से मेरे सिर पर कोई कर्ज़ नहीँ है| इसलिये सिर्फ ये कोना ही नहीं पूरा घर तुम्हारी माँ का ऋणी है| । घर तुम दोनों से पहले उसका है, क्योंकि जीभ पहले आती है, न कि दाँत| जब मंदिर में ईश्वर जोड़े में अच्छा लगता है तो मां बाप साथ में बुरे क्योँ लगते हैं? ज़िन्दगी हमें भी तो एक ही बार मिली है| इसलिए हम इसे अपने हिसाब से एंजॉय करना चाहते हैं,,,

घास का तिनका और दशरथ वचन

 रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जिससे ज्यादातर लोग अनजान हैं l  प्रस्तुति - सत्यनारायण प्रसाद अनंत  रावण ने जब माँ सीता जी का हर...