बुधवार, 30 दिसंबर 2020

दो लघुकथाएँ

 मेरी दो लघुकथाएं रोटी । मार्स स्टूडियो ने स्वरबद्ध की है। दोनों लघुकथाएं लॉकडाउन के दौरान मजदूर पलायन के समय व्याप्त माहौल पर लिखी गई थी। प्रस्तुत है। 



कथा  एक।  :


रात गहरा गई थी। सड़क पर चलते-चलते बहुत दिन हो गए थे। कुछ पक्का पता भी नहीं था। बस यही याद है कि चलते  समय रात को चांद इतना बड़ा नजर नहीं आता था। पर अब तो आसमान पर थाली सा, गोलाकार उदास चांद अटका हुआ था।  घर अभी दूर था। रास्ते समझ में भी नहीं आ रहे थे। बस सर्पीली सड़कें जिधर मुड़ती थी, वे मुड़ जाते थे। दिन में भी शहर और गाँव,  सोए-सोए लगते थे। पर एक सैलाब साथ था। उन्हीं की तरह आंशकित और सहमा हुआ, उसी से थोड़ी हिम्मत मिलती थी।


                        वो अकेली नहीं थी। साथ में पति और छोटा बच्चा भी था। रात को चलते-चलते, सड़क के किनारे एक पेड़ से साईकिल टिकाकर वहीं जमीन पर लेट गए थे। साइकल के पीछे गृहस्थी का सामान बंधा हुआ था। खाने को आज कुछ नहीं था। पति को कुछ देर भूख लगी। पर फिर थकान ने भूख पर विजय पाई और वो सो गया। बच्चा, दिन भर साईकिल के डंडे पर बैठा रहता था। सो उतना नहीं थका था। उसे भूख लग रही थी। ‘माँ, भूख लग रही है। रोटी दे न।’


                          रोटी थी भी नहीं। आज रोटी नसीब नहीं हुई थी। ‘देख, सामने चाँद, कितना गोल है। तुझे चंदा मामा बहुत अच्छा लगता है न।’


                            ‘माँ, ये चाँद भी रोटी जैसा ही लग रहा है न बिल्कुल गोल। तू ऐसी ही रोटी बनाती है न। एक रोटी दे दे न।’


                             ‘देख, इधर पेड़ कैसे हिल रहे हैं। गाँव में अपने आँगन में भी पेड़ हैं।’


                               ‘माँ, पेड़ों पर फल लगते हैं न। मैंने किताबों में देखे हैं। कितने सुंदर लगते हैं। माँ, ये भी रोटी की तरह होते हैं क्या। इनसे भी भूख खत्म हो जाती है। माँ, रोटी दे दे न।’


                                                            ‘      रोटी-रोटी, बार-बार एक ही बात। दस साल का हो गया। मेहनत नहीं करता। दिन भर साईकिल पर चढ़ा रहता है। कल से पैदल चलना। देख, मेहनत करने से कैसी नींद आ जाती है। देख तेरे बापू को।’


                            बच्चा सहमकर चुप हो गया। उसे भूख का हल मिल गया था।


 


 कथा दो:               


                        स्वर्ग के रास्ते में दो आत्माऐं मिल गई। सड़क पर चलते-चलते मौत हो गई थी।


                                                     ‘क्या हुआ, तुम कैसे मरी।’ पहली ने कहा।


                                           ‘पता नहीं, तीन दिन से भूखी थी। धूप में चक्कर आया और गिर गई।


                           ’चल झूठी। यहाँ परलोक में तो झूठ मत बोल। तेरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में तो दिल का दौरा पड़ने का कारण मृत्यु बताई गई है।’


                                                            ‘पता नहीं। मुझे तो बस भूख का ही पता है। तीन दिन से कुछ खाया नहीं था। हालत तो बहुत खराब थी। पर चलना जरूरी था। अब बच्चे के पाँव में भी छाले पड़ गए थे। उसे भी गोदी में उठा रखा था।’


                                                            ‘बाई, यह परलोक है। दुनिया के छल-प्रपंच तो वहीं छोड़ दे। अखबार में साफ लिखा है। तेरे आँचल में दो रोटी बंधी थी।’


                                                            पहली आत्मा उदास हो गई बोली। ‘ मैं कब मना कर रही। रोटी तो थी। पर वो मैंने अपने बच्चे के लिए बचाकर रखी थी। कमबख्त लाश के साथ रोटी भी ले गए। पता नहीं सुबह छुटका भूखा ही रह गया होगा।’


                          दूसरी आत्मा चुपचाप चलने लगी।


 


                    


                      


           


 


                                                                                                                                            


                      


        


 


 


                                                            ‘

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

जो हरि इच्छा

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳/💐 हरि_इच्छा*💐💐


प्रस्तुति - कृष्णा  मेहता 




एक बार भगवान विष्णु गरुड़जी पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर जा रहे थे। रास्ते में गरुड़जी ने देखा कि एक ही दरवाजे पर दो बारातें ठहरी थीं। मामला उनके समझ में नहीं आया, फिर क्या था, पूछ बैठे प्रभु को। 


गरुड़जी बोले ! प्रभु ये कैसी अनोखी बात है कि विवाह के लिए कन्या एक और दो बारातें आई हैं। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ रहा है, प्रभु बोले- हाँ एक ही कन्या से विवाह के लिए दो अलग-अलग जगह से बारातें आई हैं।


 एक बारात पिता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है, और दूसरी माता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है। यह सुनकर गरुड़जी बोले- आखिर विवाह किसके साथ होगा ? 


प्रभु बोले- जिसे माता ने पसन्द किया और बुलाया है उसी के साथ कन्या का विवाह होगा, क्योंकि कन्या का भाग्य किसी और के साथ जुड़ा हुआ है,,,, भगवान की बातें सुनकर गरुड़जी चुप हो गए और भगवान को बैकुंठ पर पहुँचाकर कौतुहल वश पुनः उसी जगह आ गए जहाँ दोनों बारातें ठहरी थीं।

          

गरुड़जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं माता के बुलाए गए वर को यहाँ से हटा दूँ तो कैसे विवाह संभव होगा, फिर क्या था; उन्होंने भगवद्विधान को देखने की जिज्ञासा के लिए तुरन्त ही उस वर को उठाया और ले जाकर समुद्र के एक टापू पर धर दिए। 


ऐसा कर गरुड़जी थोड़ी देर के लिए ठहरे भी नहीं थे कि उनके मन में अचानक विचार दौड़ा कि मैं तो इस लड़के को यहाँ उठा लाया हूँ पर यहाँ तो खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में इस निर्जन टापू पर तो यह भूखा ही मर जाएगा और वहाँ सारी बारात मजे से छप्पन भोग का आनन्द लेंगी, यह कतई उचित नहीं है, इसका पाप अवश्य ही मुझे लगेगा। 


मुझे इसके लिए भी खाने का कुछ इंतजाम तो करना ही चाहिए, यदि विधि का विधान देखना है तो थोड़ा परिश्रम तो मुझे करना ही पड़ेगा। और ऐसा विचार कर वे वापस उसी स्थान पर फिर से आ गए।

           

इधर कन्या के घर पर स्थिति यह थी कि वर के लापता हो जाने से कन्या की माता को बड़ी निराशा हो रही थी। परन्तु अब भी वह अपने हठ पर अडिग थी। अतः कन्या को एक भारी टोकरी में बैठाकर ऊपर से फल-फूल, मेवा-मिष्ठान आदि सजा कर रख दिया, जिसमें कि भोजन-सामग्री ले जाने के निमित्त वर पक्ष से लोग आए थे। 


माता द्वारा उसी टोकरी में कन्या को छिपाकर भेजने के पीछे उसकी ये मंशा थी कि वर पक्ष के लोग कन्या को अपने घर ले जाकर वर को खोजकर उन दोनों का ब्याह करा देंगे। माता ने अपना यह भाव किसी तरह होने वाले समधि को सूचित भी कर दिया।

          

अब संयोग की बात देखिये, आंगन में रखी उसी टोकरी को जिसमे कन्या की माता ने विविध फल-मेवा, मिष्ठानादि से भर कर कन्या को छिपाया था, गरुड़जी ने उसे भरा देखकर उठाया और ले उड़े। उस टोकरी को ले जाकर गरुड़जी ने उसी निर्जन टापू पर जहाँ पहले से ही वर को उठा ले जाकर उन्होंने रखा था, वर के सामने रख दिया। 

        

इधर भूख के मारे व्याकुल हो रहे वर ने ज्यों ही अपने सामने भोज्य सामग्रियों से भरी टोकरी को देखा तो उसने टोकरी से जैसे ही खाने के लिए फल आदि निकालना शुरू किया तो देखा कि उसमें सोलहों श्रृंगार किए वह युवती बैठी है जिससे कि उसका विवाह होना था। गरुड़जी यह सब देख कर दंग रह गए। 


उन्हें निश्चय हो गया कि :–‘हरि इच्छा बलवान।’


*‘राम कीन्ह चाहैं सोई होई, करै अन्यथा आस नहिं कोई।’*

           

 फिर तो शुभ मुहुर्त विचारकर स्वयं गरुड़जी ने ही पुरोहिताई का कर्तव्य निभाया। वेदमंत्रों से विधिपूर्वक विवाह कार्य सम्पन्न कराकर वर-वधु को आशीर्वाद दिया और उन्हें पुनः उनके घर पहुँचाया।

           

तत्पश्चात प्रभु के पास आकर सारा वृत्तांत निवादन किए और प्रभु पर अधिकार समझ झुंझलाकर बोले- "प्रभो- आपने अच्छी लीला की, सारे विवाह के कार्य हमसे करवा दिये।" भगवान गरुड़जी की बातों को सुनकर मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे।     



*नित याद करो मन से शिव को* 💥🧚🏻‍♂️

*सदैव प्रसन्न रहिये!!*

*जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!*



*💐💐हरि_इच्छा*💐💐




एक बार भगवान विष्णु गरुड़जी पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर जा रहे थे। रास्ते में गरुड़जी ने देखा कि एक ही दरवाजे पर दो बारातें ठहरी थीं। मामला उनके समझ में नहीं आया, फिर क्या था, पूछ बैठे प्रभु को। 


गरुड़जी बोले ! प्रभु ये कैसी अनोखी बात है कि विवाह के लिए कन्या एक और दो बारातें आई हैं। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ रहा है, प्रभु बोले- हाँ एक ही कन्या से विवाह के लिए दो अलग-अलग जगह से बारातें आई हैं।


 एक बारात पिता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है, और दूसरी माता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है। यह सुनकर गरुड़जी बोले- आखिर विवाह किसके साथ होगा ? 


प्रभु बोले- जिसे माता ने पसन्द किया और बुलाया है उसी के साथ कन्या का विवाह होगा, क्योंकि कन्या का भाग्य किसी और के साथ जुड़ा हुआ है,,,, भगवान की बातें सुनकर गरुड़जी चुप हो गए और भगवान को  बैकुंठ पर पहुँचाकर कौतुहल वश पुनः उसी जगह आ गए जहाँ दोनों बारातें ठहरी थीं।

          

गरुड़जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं माता के बुलाए गए वर को यहाँ से हटा दूँ तो कैसे विवाह संभव होगा, फिर क्या था; उन्होंने भगवद्विधान को देखने की जिज्ञासा के लिए तुरन्त ही उस वर को उठाया और ले जाकर समुद्र के एक टापू पर धर दिए। 


ऐसा कर गरुड़जी थोड़ी देर के लिए ठहरे भी नहीं थे कि उनके मन में अचानक विचार दौड़ा कि मैं तो इस लड़के को यहाँ उठा लाया हूँ पर यहाँ तो खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं है,  ऐसे में इस निर्जन टापू पर तो यह भूखा ही मर जाएगा और वहाँ सारी बारात मजे से छप्पन भोग का आनन्द लेंगी, यह कतई उचित नहीं है,  इसका पाप अवश्य ही मुझे लगेगा। 


मुझे इसके लिए भी खाने का कुछ इंतजाम तो करना ही चाहिए, यदि विधि का विधान देखना है तो थोड़ा परिश्रम तो मुझे करना ही पड़ेगा। और ऐसा विचार कर वे वापस उसी स्थान पर फिर से आ गए।

           

इधर कन्या के घर पर स्थिति यह थी कि वर के लापता हो जाने से कन्या की माता को बड़ी निराशा हो रही थी। परन्तु अब भी वह अपने हठ पर अडिग थी। अतः कन्या को एक भारी टोकरी में बैठाकर ऊपर से फल-फूल, मेवा-मिष्ठान आदि सजा कर रख दिया, जिसमें कि भोजन-सामग्री ले जाने के निमित्त वर पक्ष से लोग आए थे। 


माता द्वारा उसी टोकरी में कन्या को छिपाकर भेजने के पीछे उसकी ये मंशा थी कि वर पक्ष के लोग कन्या को अपने घर ले जाकर वर को खोजकर उन दोनों का ब्याह करा देंगे। माता ने अपना यह भाव किसी तरह होने वाले समधि को सूचित भी कर दिया।

          

अब संयोग की बात देखिये, आंगन में रखी उसी टोकरी को जिसमे कन्या की माता ने विविध फल-मेवा, मिष्ठानादि से भर कर कन्या को छिपाया था, गरुड़जी ने उसे भरा देखकर उठाया और ले उड़े। उस टोकरी को ले जाकर गरुड़जी ने उसी निर्जन टापू पर जहाँ पहले से ही वर को उठा ले जाकर उन्होंने रखा था, वर के सामने रख दिया। 

        

इधर भूख के मारे व्याकुल हो रहे वर ने ज्यों ही अपने सामने भोज्य सामग्रियों से भरी टोकरी को देखा तो उसने टोकरी से जैसे ही खाने के लिए फल आदि निकालना शुरू किया तो देखा कि उसमें सोलहों श्रृंगार किए वह युवती बैठी है जिससे कि उसका विवाह होना था। गरुड़जी यह सब देख कर दंग रह गए। 


उन्हें निश्चय हो गया कि :–‘हरि इच्छा बलवान।’


*‘राम कीन्ह चाहैं सोई होई, करै अन्यथा आस नहिं कोई।’*

           

 फिर तो शुभ मुहुर्त विचारकर स्वयं गरुड़जी ने ही पुरोहिताई का कर्तव्य निभाया। वेदमंत्रों से विधिपूर्वक विवाह कार्य सम्पन्न कराकर वर-वधु को आशीर्वाद दिया और उन्हें पुनः उनके घर पहुँचाया।

           

तत्पश्चात प्रभु के पास आकर सारा वृत्तांत निवादन किए और प्रभु पर अधिकार समझ झुंझलाकर बोले- "प्रभो- आपने अच्छी लीला की, सारे विवाह के कार्य हमसे  करवा दिये।" भगवान गरुड़जी की बातों को सुनकर मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे।     




*नित याद करो मन से शिव को* 💥🧚🏻‍♂️


*सदैव प्रसन्न रहिये!!*

*जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!*

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

कुछ कविताएं

 उसने फैला ली ना सनसनी , /.विवेक रंजन श्रीवास्तव 


उत्तेजना और उन्माद !


एक ही धर्मस्थल पर 


हरे और भगवे झंडे 


लहराकर ! 


पता नही इससे , 


 मिले कुछ वोट या नही !


 


पर हाँ 


आम आदमी की सुरक्षा और समाज में


शांति व्यवस्था के नाम पर 


हमारी मेहनत के करोड़ो रुपये 


व्यर्थ बहाये हैं  ,


तुम्हारे इस जुनून के एवज में !



बंद रहे हैं स्कूल और कालेज 


और नही मिल पाई उस दिन 


गरीब को रोजी , 


क्योकि ठप्प थी प्रशासनिक व्यवस्था !


टीवी चैनल इस आपाधापी को 


ब्रेकिंग न्यूज बनाकर , विज्ञापनो के जरिये 


रुपयो में तब्दील कर रहे थे .



मेरी अलमारी में रखी 


कुरान , गीता और बाइबिल 


पास पास यथावत साथ साथ शांति से रखी थीं . 


सैनिको के बैरक में बने एक कमरे के धर्मस्थल में 


विभिन्न धर्मो के प्रतीक भी ,


सुबह वैसे ही थे , जैसे रात में थे .


 


पर इस सबमें 


सबसे बड़ा नुकसान हुआ मुझे 


जब मैंने अपने किशोर बेटे 


की फेसबुक पोस्ट देखी 


जिसमें उसने 


उलझे हुये नूडल्स को 


धर्म निरूपित किया , और लिखा 


कि उसकी समझ में धर्म ऐसा है , क्या फिर भी हमें  


धार्मिक होना चाहिये ? 


मैं अपने बेटे को धर्म की 


व्याख्या समझा पाने में असमर्थ हूं !



तुमने धर्म में हमारी आस्था की चूलें 


हिलाकर अच्छा नही किया !!


धर्म तो सहिष्णुता , सहअस्तित्व और सदाशयता 


सिखाने का माध्यम होता है . है ना ! 


गजब है , एक ही स्थल पर दोनो की आस्था है


फिर भी , बल्की इसीलिये , उनमें परस्पर विवाद है . 


यदि शिरडी , काशी और काबा हो सकता है साथ साथ !


तो मथुरा और धार क्यों नही ? 



धर्म तो सद्भावना का संदेश होता है ! 


धर्म के नाम पर 


कट्टरता, जड़ता और असहिष्णुता फैलाना


कानूनन जुर्म होना चाहिये 


किसी भी सभ्य समाज में !


तभी बच्चे धर्म को उलझे हुये नूडल्स नही 


बूंदी के बंधे हुये लड्डू सा समझ पायेंगे !! 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

जबलपुर


2



मौत  / 

: मौत! अभी मत आना मेरे पास

-अशोक मिश्र

मौत! अभी मत आना मेरे पास

फुरसत नहीं है

तुम्हारे साथ चलने की

लेकिन यह मत समझना

कि मैं डरता हूं तुमसे

कई काम पड़े हैं बाकी अभी

वो जो गिलहरी

बना रही है अपने बच्चों के लिए घरौंदा

ठीक से बन तो जाए।

फुरसत नहीं है मुझे

तब तक/जब तक

इस धरती पर भूखा सोता है

एक भी बच्चा, स्त्री, पुरुष।

अभी श्रम की सत्ता

पूंजी की सत्ता को नहीं कर पाई है परास्त

पूंजी की सत्ता के खिलाफ

बिछा तो लूं विद्रोह की बारूद

कर लूं तैयार एक हरावल दस्ता

पूंजी की सत्ता के खिलाफ।

फिर तुम्हारे साथ

मैं खुद चल पडूंगा सहर्ष

मुझे मत डराओ अपनी थोथी कल्पनाओं से

स्वर्ग-नर्क, पुनर्जन्म

या फिर उन कपोल कल्पित कथाओं से

जो रच रखे हैं

तुम्हारे नाम पर धर्म के ठेकेदारों ने।

मैं जानता हूं

मृत्यु कुछ नहीं

एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में

रूपांतरण मात्र है, बस।

मौत कहां होगी मेरी

मैं तो एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में

बदलकर भी रहूंगा जीवित

विचार के रूप में

किस्सों के रूप में

कहानियों के रूप में

लेकिन हां,

मत आना अभी

फुरसत नहीं है मेरे पास

बच्चे थोड़ा बड़े तो हो जाएं।


3


 कविता .गर्म चाय की प्याली हो.../ नेहा नाहटा


हिदायत नही है यह 

साफ साफ शब्दों में वार्निंग दे रहा हूं , मिसेज नाहटा ...

आज से बिलकुल बन्द है 

आपकी चाय ,

क्लिनिक में गर्दन झुकाए 

बैमन सुन रही थी मैं 

और चेतावनी दे रहा था 

मेरा डॉक्टर .....


बार बार के अल्टीमेटम और 

हाइपर एसिडिटी के बावजूद 

रोज सुबह गटक ही लेती हूं चाय 

अपने फेवरेट मग में ,

बचपन से सुनती जो आयी हूं ,

कड़वाहट मार देती है कड़वाहट को

जहर काटता है जहर को..


न चाहते हुए भी 

चढ़ा देती हूं चाय उबलने ,

चाय की भाप के साथ उड़ जाते  हैं

मेरे दबे ,उमड़ते - घुमड़ते जज्बात

तूफ़ान उठाती तन्हाईयाँ   ,

सारी वेदना 

हो जाती है वाष्पित,


चाय की चुस्कियां चूस लेती है 

मेरी तमाम चुभन ,

भर देती है स्फूर्ति  

ताकि  पूरे दिन लड़ सकू खुद से ,

इस बैगेरत जमाने से 

कुछ दगाबाज रिश्तो से 

पीठ में ख़ंजर घोंपते अपनों से 

और दोस्ती का दम भरते दोगलों से भी..


चाय का घूँट भरते ही

चुटकियों में चार्ज हो जाती है मेरी चपलता

अगले चौबीस घण्टो तक जिन्दा रहती है 

मुझमे चंचलता 

चाय को चाय नही 

संजीवनी समझती हूं तभी ,

बेदर्द जमाने में 

चंद सांसो के लिए लड़ते 

किसी वेंटिलेटर की संज्ञा देती हूं इसे


सब समझाते हैं मुझे

क्यों ! अपने लिवर को यातना देती हो तुम,

कैसे बताऊँ उनको , 

नही मैं बेवफा..

यतीम नही होने दे सकती चाय को ,

जो साथ रही है सदा 

मेरा यकीन बनकर..


तोहमतें ,उलाहने,शिकायते,

तहरीरें ,तकरारें सब सुड़क लेती हूं 

इस एक चाय के प्याले में 

और बटोर लेती हूं चंद खुशियाँ , 

घोल लेती हूं थोड़ी सी मिठास अपने लिए 

और कुछ खास अपनों के लिए भी ,


महकाती है 

चाय की खुश्बू 

हर पल मुझे

ताकि महकता रहे मेरा वजूद 

मेरे मरने के बाद भी..


नेहा नाहटा


4


 गेंहू की व्यथा-


गर्मी में तपने के बाद

जब आया बरसात।

सीलन और कीड़ो-मकोड़ो से

एक किसान ने संभाले रखा

मुझे धरोहर बनाकर।।


उसे फिक्र जो थी मेरी। 

मेरी वंशावली बढ़ाने की।।

और उन करोडों भूखे 

क्षुधा को संतृप्त करने की


सच कहूँ तो-आज के दौर में

ऐसा परमार्थ कौन करता है जी।

लोग तो फिराक में लगे रहते है

कि कब मौका मिले

और  उड़ा दें गर्दन धड़ से अलग।


सर्दी शुरू होते ही डाल दिया गया

धरती के गर्भ में।।


मैं बहुत खुश था

यह अवसर पाकर ।

पूरा करूं फर्ज

अपनी वंशावली बढ़ाकर।

एक किसान के अहसानों का

जिसने संजोया मुझे पसीना बहकर ।।


भर सकूँगा उनकी क्षुधा।

और पूरा कर सकूँगा

कभी न पूरा होने वाले

एक किसान के अरमानों को।।


एक से अनेक बन अब,

यद्यपि झेलने पड़े हमें

सर्दी,धूप,आंधी और ओले।

हममें से कितने उखड़ गए थे

और कितने अब भी हवा में डोले।।


लेकिन इन थपेड़ो को झेलते हुए

अब भी हमारी हर सांस

बस एक किसान के

अहसानों की ही गाथा बोले।


जिसने सहकर अनेकों कठिनाई

हमारे चिन्ता में दिन-रात डोले।।

इस संघर्ष की लड़ाई में

यद्यपि विजय भी हमारी हुई।।


अब तो काट,छांट और तिनका-तिनका जोड़कर

पहुँच चुके थे मंडी ।

होने पालनहार के लिए नीलाम

ताकि उसके अरमानों का पूरा कर

सांस ले अब ठंड़ी।।


लेकिन अब भी कुछ बाकी था अंजाम।

गिरते-पड़ते ।धूल-कंकड़ संग सड़ते।

अपने अस्तित्व के लिए लगातार लड़ते।

लम्बे बहस और तिरस्कार के बीच बिके।

दलालों को दलाली खिलाकर, सहकर बेशर्मी  ।

तब जाकर हम सरकारी गोदाम में टिके।।


एक लम्बे कैद के बाद

अब जाकर जगी है कुछ आस।

छोटे-बड़े  समूहों में बंटकर

अब हम पहुँच चुके थे

सरकारी सस्ते गल्ले के पास।।


मन ही मन खुशी के मारे अब झूम रहे थे।

अपने पालनहारों के क्षुधा भरने को

आतुर एक - दूजे का माथा चुम रहे थे।।


लेकिन पूरा हो न सका

ये भी हमारा आखिरी सपना।

इतना खुदक़िस्मत कहाँ थे हम गेंहू कि

काम आ सके उनके दुर्दिनों में

 जो कभी बहा दिए थे खून-पसीना अपना।


रात को ही हम गेंहू 

भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ चुके थे

कोटेदार ने पहले ही हाथ साफ कर दिया अपना।

लगता है हम गेंहू के नसीब में ही

 लिखा है बार-बार बिकना।।


                             " विनोद विमल बलिया


5


 अलका  जैन आनंदी       

   दोहे  *गुरु*

गुरुवर मुझको ज्ञान दो, बने कलम पहचान । 

मन के तम को दूर कर, दूर करो अज्ञान ।।


ज्ञान गुरू देते सदा ,जाने यह संसार ।

होते सपने सच तभी, सुनलें गुरू पुकार।।


 गुरु की कृति अनमोल है, सही गलत पहचान ।

सदा रखो संभालकर, बनो नेक इंसान।।


नौका करते पार हैं, गुरु हैं खेवनहार।

करें दुखों का अंत ये, भव से करते पार।।


मेरे गुरुवर आपने, भरे ज्ञान भंडार।  

सत्य राह पर हम चलें, मिले आपका प्यार।। 


बादल आया झूम के, मनवा करता गान।

 रोम-रोम हर्षित हुआ, भरे खेत खलियान।।


 बागों में झूले पड़े, धरा रचाएँ रास।

 इस *सावन* के मास में,सोम रहा दिन खास।।


 बादल काले घिर गए ,वर्षा हुई अपार ।

हृदय खुशी से अब भरा, साजन मेरा प्यार ।।


कोयल कू कू कर रही, मीठी है आवाज ।

दादुर की आवाज से, होता बेहद शोर।।


सावन आया झूम के, लगती सुखद फुहार ।

 मोर नाचता बाग में, अपनी बाँह पसार।।


 छम छम वर्षा हो रही, बाहर मचता शोर।

 साजन आते पास जब, मन में प्रेम हिलोर।।

आनंदी


6



 जेब खाली है अगर जज़्बात का क्या कीजिये

 पुरसुकूं दिन ही नहीं तो रात का क्या कीजिये


मर रहे हैं भूख से नवजात माँ की गोद में

ज्ञान वाली आसमानी बात का क्या कीजिये।


सोचिए जुम्मन पदारथ जॉन इब्लिस बैठकर

देश के बिगड़े हुए हालात का क्या कीजिये।


मर्म की सूखी नदी तक बूंद भी आनी नहीं

सागरों पर हो रही बरसात का क्या कीजिये।


उम्र सारी काटली है सिर्फ तनहा ही अगर

आज मैयत पर सजी बारात का क्या कीजिये।


उम्र भर एहसान ढोएं और हासिल कुछ नहीं

हक अगर मिलता नहीं खैरात का क्या कीजिये।


कट रही है आपकी भी बस यही तो है बहुत

जिंदगी की दौड़ में सह मात का क्या कीजिये।

#चित्रगुप्त


6


आपका हौसला बढाने के लिए एक कविता*

*यूं ही हंसने के लिए दिल पर न लिजिएगा* / सुनीता शानू 


सुनो सुनो रे एडमिन जी

माफ करो तुम एडमिन जी

जब चाहे जोड़ लो हमको

जब चाहे तुम मुक्त करोगे

तुम तानाशाह बनकर

हम पर हरदिन राज करोगे

हिटलर जैसे एडमिन जी

अकड़े अकडे़ एडमिन जी 

तुम चाहो तो दांत हिलाएं

तुम चाहो तो चुप हो जाएं

उल्टी सीधी कविता पर

तुम चाहो तो कमेंट लगाएं

नही चलेगी मनमानी जी

अगर करोगे बेईमानी जी

सुनो सुनो रे एडमिन जी

अब जाने भी दो एडमिन जी

सुनीता शानू

रॉन्ग नंबर/ चित्रगुप्त

 रॉन्ग नंबर / चित्रगुप्त 

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ट्रेंग ट्रेंग..... अननोन नंबर देखकर थोड़ा सोचा फिर फोन उठा लिया। 


"हेलो...."


"इत्ती देर से फोन कर रही हूँ आखिर उठा काहे नहीं रहे थे? किसी नजारे को देखने में मगन थे क्या?"


"अनजान नंबर से काल आ रही थी तो......"


 बात पूरी होने से पहले ही काट दी गई--


"इसका मतलब मेरा नंबर भी सेव नहीं है क्या तुम्हारी मोबाइल में...? तुम्हें क्या तुम्हें तो अपनी सीता गीता रीता से फुरसत मिले तब न...जनाब के मोबाइल में दुनिया जहान का नंबर सेव रहता है बस बीवी का ही नंबर नहीं रहता.... तुम बाकी छोड़ो ये तो घर आओ फिर निपट लूँगी... सामान नोट करो वो लेकर आ जाना" मैडम  का जोश मिनट दर मिनट बढ़ता ही जा रहा था।


"जी बोलिये..."


"बड़ा जी जी कर रहे हैं आज फिर चढ़ा ली क्या..." इस बार तिलमिलाहट में दांत पीसने की आवाज भी सुनी जा सकती थी।


"जी..."


" रहोगे अपनी मां की तरह ढपोरशंख ही, जैसे वो दिन भर राम राम करती फिरती हैं लेकिन खटमल की तरह खून पीने का एक भी मौका नहीं छोड़ती...हुंह तुम सामान लिखो और लेकर घर आओ फिर बताती हूँ।"


"जी"


"फिर जी.... तुमको न तुम्हारी बहन का जीजा बना दूंगी सामान लिखो...." वो लगभग चिल्लाते हुए बोले जा रही थीं।


"बताइए"


"आलू पांच किलो, टमाटर एक पौवा, सोया वाला साग एक गड्डी, सौ ग्राम धनिया पत्ती, एक पाव लहसुन, आधा किलो प्याज..... लिख रहे हो न?" उसने फिर दांत पीसा...


"लिख रहा हूँ....."


"लिख रहे हो तो हूँ हाँ कुछ तो बोलो.... किस्मत फूट गई मेरी जो तुम्हारे जैसे निकम्मे से शादी हुई...लिखो ... साबूदाना एक किलो, चीनी दो किलो, चायपत्ती एक पैकिट.....ठीक है इतना लेकर आ जाओ बाकी घर मे आकर पर्चा बना लेना फिर जाना" लंबी सांसें छोड़ते हुए मोहतरमा की लिस्ट समाप्त हुई।


"जी सामान तो ले आऊंगा पर घर का पता तो बता दो"


"घर का पता.... तुम सुमित के पापा नहीं बोल रहे"


"नहीं.... हेलो ...हेलो ..."


उसके बाद फोन कट गया,, अब काल बैक कर रहा हूँ  तो उठ नहीं रहा....बिजी बता रहा है। मैं यहाँ बैठा उन भाई साब की खैर मना रहा हूँ जिनका नंबर अब लगा होगा...

#चित्रगुप्त

संजीव शुक्ला का एक व्यंग्य

 अपना एक व्यंग्य निवाण टाइम्स में।/ संजीव शुक्ला 


जुझारूलाल प्रवक्ता बनना चाह रहे थे। यह उनकी दिली तमन्ना थी, बल्कि उनका तो खुला मानना था कि क्षेत्र की जनता और पार्टी का बहुमत भी उनको प्रवक्ता के रूप में देखना चाहता है। इस पद के लिए वह अपने को सर्वथा उपयुक्त व्यक्ति मानते थे, पर उनका दुर्भाग्य देखिये कि पार्टी के शीर्ष गुट में उनके सब विरोधी जमे थे। क्या जीवन व्यर्थ ही जायेगा यह चिंता उन्हें दिन-रात खाए डाल रही थी। प्रवक्ताई का आकर्षण उन्हें तबसे अपने में दबोचे हुए है जबसे उन्होंने मीडिया वालों को प्रवक्ता से महज एक बाइट के लिए माइक और कैमरे के साथ गिरते-पड़ते दौड़ते देखा है। पत्रकारों-मीडियाकर्मियों का प्रवक्ता से साक्षात्कार हेतु घण्टों राह तकना और फ़िर अचानक उनके कार्यालय से प्रकट होने का अंदाज़ उन्हें घायल कर जाता!! यह पद उन्हें पार्टी के शीर्ष-नेतृत्व से भी ज़्यादा आकर्षित करता। कारण वह किसी पचड़े में .....…...

 नेतृत्व की जिम्मेदारी सबको साथ लेकर के चलने की होती है। वह अपनी ऊर्जा सबको मनाकर साथ रखने में नहीं खर्च करना चाहते थे।  उनका स्पष्ट मानना था कि वह इसके लिए नहीं बने हैं। उनकी मेधा का सही उपयोग तो नीतियों के निर्माण और उनकी व्याख्या में हो सकता है। फ़िर जिस चीज के लिए उन्होंने बरसों से तपस्या की उसे क्या यूँ ही छोड़ दें? आख़िर इसके लिए उन्होंने क्या नहीं किया! वह अपने जीवन के तमाम बसन्त (ऐसा उनका अपना मानना था)  शीर्ष नेतृत्व की गणेश-परिक्रमा में गुजार चुके थे। अपने से दस साल छोटे नेताओं तक को उन्हें दद्दा कहना पड़ा। पान-पुड़िया का कोई शौक न रखने के बावजूद जेब मे तुलसी और रजनीगंधा का पैकेट रखना पड़ा!!

उनका बन्द कमरे में प्रवक्ताई अंदाज़ में घण्टों बोलने का अभ्यास प्रवक्ता बनने की साधना का ही एक भाग था।  हर बात पर पार्टी का खुलकर बचाव करना, आरोपों को विपक्षियों की साज़िश बताना, विपक्षी दल के सदस्य को बोलने न देना और अच्छी-भली बहस को दंगल में तब्दील कर देना उनका दलीय धर्म बन चुका था। वे विपक्षियों को अब देशद्रोही और चरित्रहीन तक कहने लगे। विपक्षियों को धिक्कारने में जीवंतता लाने के लिए अब वे घर में भी सबको धिक्कारने लगे थे। कई बार घर के सदस्यों को ही विपक्षी मान उन्हें बोलने न देते।

 कुलमिलाकर बिना पद के ही वह प्रवक्ता के चरित्र को जी रहे थे। पर इंतजार की भी कोई हद होती है। कल के लौंडे प्रवक्ता बनते जा रहे थे और जुझारूलाल अभी भी प्रवक्ताई के लिए जूझ रहे थे। वह तो कहिए कि राजनीति में रिटायरमेंट की कोई अवधि नहीं होती। आदमी मरते दम तक जनसेवा की शपथ ले सकता है। सो उम्मीदों पर वे पार्टी में जमे थे। पर इधर मार्गदर्शक मंडल की स्कीम ने उनको अंदर तक हिला दिया था। उनको डर था कि देर-सबेर हर पार्टी इस अच्छी स्कीम को लपकने की कोशिश करेगी, इसलिए अब वह निराश से हो गए थे। "नर हो न निराश करो मन को" का नियमित पारायण करने के बावजूद अब उन्हें इससे कोई ऊर्जा नहीं मिलती। उल्टे अब इसे नियमित पढ़ने से बची-खुची ऊर्जा के भी क्षय होने की आशंका होने लगी। उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा देने का मन बना लिया। उनके पुराने मित्र होने के नाते मैंने उनको यह कदम उठाने से रोका। 

कहा; आप तो ऐसे न थे ! आप तो कह रहे थे कि, 'अब यहाँ से हमारी लाश ही उठेगी, मैं दलबदल नही करता।'....  वह थोड़ी देर चुप रहे फ़िर उन्होंने अपने दर्द को आवाज दी और कहा कि आप हमें अब भी जिंदा मानते हैं। अरे भाई! हम तो इस पार्टी में जिंदा लाश हैं और ऐसा कहकर वे निढाल होकर सोफे पर एक तरफ संभलते हुए लुढ़क से गये !!! 

करीबी होने और आँखों के लिहाज के चलते मैंने उत्साह भरा। मैंने कहा दिल न छोटा करिये। पद ही सब कुछ नहीं होता और फिर आप तो राजनीति में सेवा के लिए आए थे न!!


 उन्होंने कहा काहे की सेवा.... हम सर्वहारा वर्ग के उत्थान के लिए राजनीति में आए थे, आज हमारी खुद की हालत सर्वहारा वर्ग जैसी हो गयी है। जो खुद का उत्थान न कर सका वह दूसरों का क्या करेगा?? दरवाजे पर एक सरकारी नल तक न लगवा सका। अब और ज्यादा न कहलवाइये अपने ऊपर घिन आने लगी है, कहते-कहते वह भावुक हो उठे। मैंने उनको समझाना चाहा कि पार्टी छोड़ने पर आपका पहला जैसा सम्मान न रहेगा। वह विमर्श की मुद्रा में आ गए और कहने लगे भाई! आप इतिहास उठा के देखिये। सुभाष, लोहिया, जेपी, चंद्रशेखर और वी.पी.सिंह आदि सबने अपनी-अपनी पार्टी छोड़ी और नई पार्टी बनाई। किसका सम्मान कम हुआ आप ही बताइए? बल्कि मेरा तो मानना है कि पार्टी छोड़ने के बाद ही उनकी इज्ज़त बढ़ी ही है। और आजकल तो थोक में लोग बदलते हैं। कई बार तो मूल पार्टी में संस्थापक ही बचता है, बाकी सब निकल लेते हैं। तर्क अकाट्य थे, सो मानना पड़ा। पर मैंने सवाल उठाया कि पार्टी छोड़ने की वजह भी तो बतानी पड़ेगी जनता को। 

उन्होंने कुशल राजनीतिज्ञ की भाँति मुस्कुराकर कहा कि मैं कल ही एक बयान जारी करूँगा की पार्टी में लोकतंत्र नहीं रह गया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो अब पार्टी में बची ही नहीं। वह सिद्धांतों से भटक सिर्फ़ सत्तावादी राजनीति करने लगी है। पार्टी में अब व्यक्ति-पूजा का बोलबाला है। मेरे जैसे स्वाभिमानी, सिद्धांतवादी लोगों का यहाँ रुकना अब संभव नहीं। मैं जान दे सकता हूँ, पर अपने उसूलों से समझौता नहीं कर सकता। वह वसीम बरेलवी को गाने लगे, " उसूलों पे जहाँ आंच आए टकराना जरूरी है" वह अब पूरी तरह रौ में आ चुके थे।


 लेकिन मैंने उन्हें लगभग रोकते हुए कहा कि कुछ समय पहले तो आप शीर्ष नेतृत्व के बारे में कह रहे थे कि उनकी छवि हमारे हृदय में उसी तरह बसती है, जिस तरह हनुमान के हृदय में राम-सिया। यह भी तो व्यक्ति पूजा ही हुई।


वह फिर भावुक हो गए, कहने लगे कि अब जब वही राम न रहे तो हम हनुमान जी की पूँछ कहाँ तक पकड़े रहेंगे। 


'अब न रहे वो पीने वाले अब न रही वो मधुशाला' कहकर वह अपने समर्थन में बच्चन साहब को घसीट लाए.

उन्होंने कहा कि आपको पता है कि राम हनुमानजी से बगैर पूछे कोई काम नहीं करते थे। यह था जलवा उनका। 


लेकिन उनकी बात अलग थी, मैंने उन्हें टोकते हुए कहा..


"क्या अलग बात थी. वे लगभग खीजते हुए बोले। मेरे अंदर तो आपको कोई अच्छाई दिखती ही नहीं।"


नहीं मेरा मतलब यह नहीं था, मैंने बात घुमाई।

 मैंने कहा- "हनुमानजी के अंदर कोई पद की लालसा नहीं थी। बस सेवा-भाव से थे।"

जुझारूलाल ने समझाते हुए कहा कि वह वानर थे और तिस पर घर न घरवाली। उनको किस चीज की जरूरत। रहने के लिए पेड़ बहुत। भैय्या यहाँ परिवारदार आदमी तिस पर पापी पेट का सवाल! वे दीनता पर उतर आए। और रही बात सेवा की तो जितनी सेवा मैंने इनकी (पार्टी-प्रमुख) की' उतनी तो अपने बाप तक की नहीं की। मुझे उनसे सहानुभूति हो आई।


 मैंने बात बदलते हुए एक बड़े राष्ट्रीय दल का नाम लिया और बताया कि वहाँ जुगाड़ लगाइये। बात बन सकती है। वहाँ कुछ संभावनाएं हैं। पर वह मायूस हो गए उन्होंने बताया कि वहां हमारे लिए कुछ नहीं होगा और फ़िर वहां घुसना भी तो आसान नहीं। उन्होंने बताया- "आपको तो पता ही है कि अभी हाल ही में एक बहस के दौरान उनके नेता जो बार-बार अभिव्यक्ति की आजादी मुद्दा उठाकर हमको बोलने नहीं दे रहे थे, को हमने वहीं पटक के मारा था। हमने पूछा था और चाहिए आजादी ???"

ख़ैर, सो अब अपनी वहाँ कहाँ गुंजाइश ??


फ़िर उन्होंने खुद ही संभावनाओं को ख़त्म करते हुए कहा- "अब किसी के दरवाजे पर नहीं जाऊँगा, मैं खुद की पार्टी बनाऊंगा और खुद ही प्रवक्ता बनूँगा।" अब मेरे के पास उन्हें शुभकामनाएं देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था .......


        - संजीव शुक्ल

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

सुरेश कांत की नजर में व्यंग्य

 दोस्तो, हास्य और व्यंग्य के संबंध में बहुत-से विचार आए। उनमें कुछ व्यवस्थित और मौलिक भी थे, जैसे जयप्रकाश पांडेय जी के विचार। मेरे भी इस संबंध में कुछ विचार हैं, जिनसे आपका सहमत होना बिलकुल भी आवश्यक नहीं है। मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि फेसबुक पर आते ही मेरे विचारों को व्यंग्यकार विभिन्न मंचों पर अपने विचारों के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं। इससे मुझे अपने विचारों के सही होने की पुष्टि मिलती है।   

बहरहाल, अपने विचार प्रस्तुत करने से पहले मैं उनकी पूर्वपीठिका या नींव के रूप में कुछ बिंदु प्रस्तुत करूँगा।

1. हास्य व्यंग्य का सहोदर है। ‘सहोदर’ का मतलब ‘भाई’ होता है, लेकिन सिर्फ ‘भाई’ नहीं होता, बल्कि एक ही माता के उदर को साझा करने वाला (सह+उदर) ‘सगा भाई’ होता है। इसीलिए दोनों में कुछ साम्य मिलते हैं, जिनसे भ्रमित होकर कुछ लोग दोनों को एक ही समझने तक की गलती कर बैठते हैं। आखिर, जुड़वाँ न होने पर भी भाइयों की शक्ल आपस में काफी मिलती-जुलती है। एक माँ की संतान जो ठहरे!   

2. हास्य व्यंग्य का सगा भाई ही नहीं है, बल्कि उसका ‘अग्रज’ भी है, इसलिए वह व्यंग्य पर अकसर हावी होने, उस पर अपना अधिकार जमाने की कोशिश करता है।

3. हास्य का कोई उद्देश्य नहीं होता, सिवा हँसाने के सिवा, लेकिन ‘हँसाना’ उद्देश्य न होकर हास्य का गुण या धर्म होता है। अब (भारत में) यदि किसी की नाक पकौड़े जैसी है, तो हास्य को उसी में हँसाने के लिए बहुत-कुछ मिल जाता है, जबकि इसमें उस व्यक्ति-विशेष का कोई ‘दोष’ नहीं होता। जायसी के संबंध में एक जनश्रुति है। वही जायसी, जिनकी काव्य-कला के पीछे रामचंद्र शुक्ल ने कबीर तक को ‘डंप’ कर दिया था। कहते हैं कि वे जायसी कुछ कुरूप थे। एक बार वे शेरशाह के दरबार में गए। शेरशाह उनके ‘भद्दे’ चेहरे को देखकर हँस पड़ा। यह हास्य था, जो जायसी के चेहरे की कुरूपता ने उपजाया था। जायसी ने अत्यंत शांत स्वर में बादशाह से पूछा, ‘मोहि का हँसेसि कै कोहरहिं?’ यानी तू मुझ पर हँस रहा है या उस कुम्हार पर, जिसने मुझे गढ़ा है? यह व्यंग्य था, जिसका परिणाम यह निकला कि बादशाह बहुत लज्जित हुआ और उसने क्षमा माँगी। जमाने-जमाने की बात है! ऐसा ही प्रसंग अष्टावक्र ऋषि के संबंध में भी मिलता है।

4. व्यंग्य का एक स्पष्ट उद्देश्य होता है और वह है असंगति, विसंगति, अन्याय, अत्याचार आदि के खिलाफ आवाज उठाना, कमजोर की आवाज बनना (न कि उसकी गलतियाँ निकालने का परिश्रम करके कथित रूप से ‘तटस्थ’ बनने की कोशिश करना)।

5. स्तरीय हास्य रचना कोई आसान काम नहीं है, समस्या सिर्फ यह है कि वह अधिक देर तक स्तरीय रह नहीं पाता, ‘निरुद्देश्य’ होने के कारण बड़ी जल्दी ट्रैक से उतर जाता है, फूहड़ हो जाता है। व्यंग्य के साथ आने पर वह उसे भी अपनी संगति से प्रभावित करने की कोशिश करता है। इसीलिए व्यंग्य में हास्य से परहेज रखने की बात की जाती है।

इन बिंदुओं से आप हास्य और व्यंग्य का अंतर समझ गए हॉगे।

अब सवाल यह उठता है कि व्यंग्यकार हास्य और व्यंग्य को लेकर खेमे में क्यों बँट जाते हैं। मेरा विचार है ऐसा केवल वही व्यंग्यकार करता है, जो असल में व्यंग्यकार नहीं है, पर जो किसी तरह, या जिसने किसी तरह, अपने को व्यंग्यकार ‘मनवा’ लिया है। वरना ये दोनों अलग-अलग विधाएँ हैं, जिन्हें अपने-अपने सामर्थ्य और रुचि के अनुसार अलग-अलग लोग लिखते हैं। 

लेकिन चूँकि ये सहोदर हैं, इसलिए दोनों अनायास ही एक-दूसरे को ओवरलैप करते हैं। यहीं व्यंग्यकार को सजग रहना पड़ता है, क्योंकि हास्य के साथ आकर व्यंग्य तो उसकी गुणवत्ता बढ़ा देता है, किंतु व्यंग्य के साथ आकर हास्य उसकी गुणवत्ता घटा सकता है, और घटा सकता क्या, घटा ही देता है।

शुद्ध हास्य पढ़कर आपका मनोरंजन तो हो सकता है, किंतु अंत में ’तो क्या?’, ‘मिला क्या?’ जैसे प्रश्न खड़े हो जाते हैं, जबकि व्यंग्य पढ़कर आदमी का मनोरंजन भले हो, पर उसमें स्थितियों के प्रति आक्रोश, असहमति और सक्रियता भी उत्पन्न होती है।

ध्यान रहे, व्यंग्य साहित्य है और सरस होना साहित्य का अनिवार्य गुण-धर्म है—रसो वै स:! व्यंग्य में र्स नहीं होगा, तो उसे साहित्य से खारिज कर दिया जाएगा। लेकिन वह ‘रस’ फूहड़ता से नहीं आता. व्यंग्य अपना रस स्वयं उत्पन्न करता है। वह हास्य जैसा लग सकता है, पर होता नहीं है।  

रही बात यह कि व्यंग्य में हास्य और हास्य में व्यंग्य होना चाहिए या नहीं, या होंना चाहिए तो कितना? तो यह व्यंग्यकार नहीं, रचना तय करती है। जब रचना यह तय करती है, रचनाकार नहीं, और रचनाकार रचना को ऐसा करने देता है, उसमें बाधा नहीं डालता, रेलगाड़ी के ड्राइवर की तरह केवल जरूरत पड़ने पर ही हस्तक्षेप करता है, तो व्यंग्य में हास्य और हास्य में व्यंग्य बिलकुल सही मात्रा में आता है, अन्यथा रचनाकार द्वारा जबरन ‘घुसेड़ा’ गया हास्य व्यंग्य की गरिमा नष्ट करने में देर नहीं लगाता।

यह भी गौरतलब है कि व्यंग्य में जो हास्य आता है, वह हूबहू वैसा ही हास्य नहीं होता, जैसा वह शुद्ध हास्य में होता है। मेरे विचार से उसे हास्य कहा भी नहीं जाना चाहिए।    

बहुत कम प्रतिभाएँ हास्य से व्यंग्य उत्पन्न कर पाती हैं। रवींद्रनाथ त्यागी शायद इसके अकेले उदाहरण हैं।

बातें बहुत-सी हैं, लेकिन समय हो रहा है, और मेरी तबीयत भी ठीक नहीं है, इसलिए फिलहाल इतना ही।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

पहले मैं.....

 "पहले मैं ही जाऊंगी"


सुनो, हर वक्त,

 पहले तुम पहले तुम करते हो ना,

जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना,

तब भी पहले मैं ही जाऊंगी....


मुझे आदत नहीं बिल्कुल,

तुम बिन रहने की...

जिंदगी के सारे दर्द,

अकेले सहने की....


सुनो, हर सांस

 साथ निभाया है ना तुमने..

जब सांस टूटने लगे ना,

तो पहले मैं ही जाऊंगी...


जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना,

तब भी पहले मैं ही जाऊंगी...


सुनो, इस आंगन में,

 तुम ही लेकर आए थे..

इस आंगन से,

तुम ही लेकर जाना....

साथ निभाया तो, है अब तक तुमने...

अंत तक तुम ही साथ निभाना...


तेरे साथ ही,

 इस आंगन में आई थी...

तेरे साथ ही,

 इस आंगन से जाऊंगी.....


जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना,

तब भी पहले मैं ही जाऊंगी...


जिंदगी बाहों में ही गुजारी है तेरे,

मौत भी बाहों में ही आएगी...

पहली बार तुमने ही मांग भरी थी ना,

अंतिम बार भी, तेरे हाथों से ही भरी जाएगी...


सुनो, हर बात तुम्हारी मानी है,

इसमें एक भी नहीं मानूंगी....


जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना,

तब भी पहले मैं ही जाऊंगी....

       रीना झा शर्मा ©®.

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

पहले सी बात नहीं / महाकवि अज्ञात

जाने क्यूँ,*

*अब शर्म से,*

*चेहरे गुलाब नहीं होते।*


*जाने क्यूँ*,

*अब मस्त मौला *मिजाज नहीं होते।*


*पहले बता दिया करते थे*, 

*दिल की बातें*,


*जाने क्यूँ,अब चेहरे,*

*खुली किताब नहीं होते।*


*सुना है,बिन कहे,*

*दिल की बात, समझ लेते थे*


*गले लगते ही,*

*दोस्त,*

*हालात समझ लेते थे।*


*तब ना फेस बुक था,*

*ना स्मार्ट फ़ोन*,

*ना ट्विटर अकाउंट,*


*एक चिट्टी से ही,*

*दिलों के जज्बात, समझ लेते थे।*


*सोचता हूँ,*

*हम कहाँ से कहाँ* 

*आ गए,*


*व्यावहारिकता सोचते सोचते,*

*भावनाओं को खा गये।*


*अब भाई भाई से*,

*समस्या का *समाधान,कहाँ पूछता है,*


*अब बेटा बाप से,*

*उलझनों का निदान,*

*कहाँ पूछता है*


*बेटी नहीं पूछती,*

*माँ से गृहस्थी के सलीके,*


*अब कौन गुरु के*,

*चरणों में बैठकर*,

*ज्ञान की परिभाषा सीखता है।*


*परियों की बातें,*

*अब किसे भाती है,*


*अपनों की याद*,

*अब किसे रुलाती है,*


*अब कौन,*

*गरीब को सखा बताता है,*


*अब कहाँ,*

*कृष्ण सुदामा को गले लगाता है*


*जिन्दगी में,*

*हम केवल *व्यावहारिक हो गये हैं,*

*मशीन बन गए हैं हम सब,*

 

*इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!....*

            🙏 😊😊😊

सेवा धर्म ही असली भक्ति*

 *एक शहर में अमीर सेठ रहता था।  वह बहुत फैक्ट्रियों का मालिक था। एक शाम अचानक उसे बहुत बैचेनी होने लगी। डॉक्टर को बुलाया गया सारी जाँचें करव...