शनिवार, 30 अक्तूबर 2021

 कहानी


एक दिन एक किसान का गधा कुएँ में गिर गया ।वह

गधा घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान

सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे

क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं। अंततः उसने

निर्णय

लिया कि चूंकि गधा काफी बूढा हो चूका था,अतः उसे

बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था;और इसलिए

उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।

किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए

बुलाया। सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में

मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही गधे कि समझ में

आया कि यह क्या हो रहा है ,वह और ज़ोर-ज़ोर से

चीख़ चीख़ कर रोने लगा । और फिर ,अचानक वह

आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।

सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे।

तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से

सन्न रह गया। अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े

की मिट्टी के साथ वह गधा एक आश्चर्यजनक

हरकत कर रहा था। वह हिल-हिल कर उस

मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम

बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।

जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर

फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर

उस मिट्टी को गिरा देता और एस सीढी ऊपर चढ़

आता । जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए

वह गधा कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर

कूदकर बाहर भाग गया।

ध्यान रखो ,तुम्हारे जीवन में भी तुम पर बहुत तरह

कि मिट्टी फेंकी जायेगी ,बहुत तरह कि गंदगी तुम

पर गिरेगी। जैसे कि ,तुम्हे आगे बढ़ने से रोकने के

लिए कोई बेकार में

ही तुम्हारी आलोचना करेगा ,कोई

तुम्हारी सफलता से ईर्ष्या के कारण तुम्हे बेकार में

ही भला बुरा कहेगा । कोई तुमसे आगे निकलने के

लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो तुम्हारे

आदर्शों के विरुद्ध होंगे। ऐसे में तुम्हे हतोत्साहित

होकर कुएँ में ही नहीं पड़े

रहना है बल्कि साहस के साथ हिल-हिल कर हर

तरह कि गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख

लेकर,उसे सीढ़ी बनाकर,बिना अपने

आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे

बढ़ाते जाना है।

अतः याद रखो !जीवन में सदा आगे बढ़ने के लिए

१)नकारात्मक विचारों को उनके विपरीत

सकारात्मक विचारों से विस्थापित करते रहो।

२)आलोचनाओं से विचलित न हो बल्कि उन्हें

उपयोग में लाकर अपनी उन्नति का मार्ग प्रशस्त

करो।

अनुनय / राकेश रेणु

 अनुनय*


उदास किसान के गान की तरह

शिशु की मुस्कान की तरह

खेतों में बरसात की तरह

नदियों में प्रवाह की तरह लौटो।

 

लौट आओ

जैसे लौटती है सुबह

अँधेरी रात के बाद

जैसे सूरज लौट आता है

सर्द और कठुआए मौसम में

जैसे जनवरी के बाद फरवरी लौटता है

पूस-माघ के बाद फागुन वैसे ही

वसंत बन कर लौटो तुम!

 

लौट आओ

पेड़ों पर बौर की तरह

थनों में दूध की तरह

जैसे लौटता है साइबेरियाई पक्षी सात समुंदर पार से

प्रेम करने के लिए इसी धरा पर

प्रेमी की प्रार्थना की तरह

लहराती लहरों की तरह लौटो!

 

लौट आओ

कि लौटना बुरा नहीं है

यदि लौटा जाए जीवन की तरह

हेय नहीं लौटना 

यदि लौटा जाए गति और प्रवाह की तरफ

न ही अपमानजनक है यह

यदि सँजोये हो सृजन के अंकुर। 


लौटने से ही सम्भव हुईं

ऋतुएँ, फसलें, जीवन, दिन-रात

लौटो, लौटने में हैं संभावनाएँ अनंत। 


*राकेशरेणु

जन्मदिन मुबारक हो क्षमा जी / विवेक शर्मा /

 प्रसिद्ध लेखक,संपादक और पत्रकार क्षमा शर्मा जी का आज (30 अक्तूबर) जन्म दिन है। उन्हें 1986 में हिन्दुस्तान अखबार को ज्वाइन करने से पहले पढ़ा था। जब HT house में जाकर नौकरी करने लगा तो उनसे मिला। वह नंदन में थीं। उस पहली मुलाकात के बाद से ही वह मेरी मार्गदर्शक, संरक्षक और शुभचिंतक बन गईं। कह सकता हूं कि क्षमा जी ने मुझे और मेरे जैसे दर्जनों पत्रकारों को अपनी लेखनी से प्रभावित और प्रेरित किया। मुझे जिन लोगों ने लिखना सिखाया उनमें वह भी हैं। हालांकि मैं उनके मेयार का कभी बन नहीं सका।


क्षमा जी  भाषा की शुचिता और शुद्धता की प्रबल पक्षधर रही हैं। वह लगातार बिल्कुल नए विषयों पर लिखती रहती हैं। उनके विषय चौंकाते हैं। उनके विषयों को पढ़कर रश्क होता है कि यह विषय हमें क्यों नहीं समझ आया।


 क्षमा जी ने मुझे लगभग 30 साल पहले कहा था कि विवेक, तुम किताब लिखो। मैं कह सकता हूं कि मुझे किताब लिखने के बारे में सबसे पहले उन्होंने ही कहा था। उसके कई सालों के बाद मैंने किताब लिखने के बारे में विचार किया और अब तक तीन किताबें लिखीं। उन्होंने पेड़ों और परिंदों पर भी खूब लिखा है। तोतों पर खासतौर पर। उनके कई विषयों को देखकर मैंने भी लिखने की कोशिश की।


क्षमा जी की सलाह पर ही मैंने अपने जीवन का पहला बैंक अकाउंट हिन्दुस्तान टाइम्स हाउस के आगे सूर्य किरण बिल्डिंग में बैंक आफ बड़ौदा की ब्रांच में खुलवाया। उन्होंने मेरे फॉर्म को देखा और उस पर अपने साइन किए। क्षमा शर्मा के दस कहानी संग्रह, चार उपन्यास और स्त्री-विमर्श से सम्बन्धित पाँच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वह नंदन पत्रिका की लंबे समय तक संपादक रहीं। जब नंदन अपने चालीस पूरे कर रही थी तब उन्होंने मेरे से कहा कि मैं नंदन के चार दशकों के सफर पर लिखूं।

मैं क्षमा जी पर लिखते हुए उनके पुत्र के विवाह को नहीं भूल सकता। विवाह का कार्यक्रम दिन में  प्रगति मैदान के एक रेस्तरां में था। वह सच में पावर वैंडिग थी। वहां पर राजेन्द्र यादव, अरुंधति राय, निर्मल वर्मा, मनोहर श्याम जोशी, नामवर सिंह, प्रभाष जोशी समेत शब्दों के संसार के सब खास नाम उपस्थित थे। विवाह के समय दिल्ली में जाड़ा दस्तक देने लगा था। उस खुशगवार मौसम में शिखर लेखकों के साथ सुस्वादु डिशेज का आनंद लेने का सुख दिव्य था। मेजबान के तौर पर श्री सुधीश पचौरी सर और क्षमा जी सब अतिथियों से बार-बार मिल रहे थे। फिर उस तरह के विवाह में शामिल होना नसीब नहीं हुआ।


क्षमा जी, Kshama Sharma , जन्म दिन पर आपको फिर से शुभकमनाएं। चमकता रहे आपके शब्दों का संसार।

बुधवार, 27 अक्तूबर 2021

दुख का कारण

 *याद रखना, अपेक्षा से भरा हुआ चित्त निश्चित ही दुखी होगा।*


मैंने सुना है कि एक आदमी बहुत उदास और दुखी बैठा है। उसकी एक बड़ी होटल है। बहुत चलती हुई होटल है। और एक मित्र उससे पूछता है कि तुम इतने दुखी और उदास क्यों दिखाई पड़ते हो कुछ दिनों से? कुछ धंधे में कठिनाई, अड़चन है? उसने कहा, बहुत अड़चन है। बहुत घाटे में धंधा चल रहा है। मित्र ने कहा, समझ में नहीं आता, क्योंकि इतने मेहमान आते—जाते दिखाई पड़ते हैं! और रोज शाम को जब मैं निकलता हूं तो तुम्हारे दरवाजे पर होटल के तख्ती लगी रहती है नो वेकेंसी को, कि अब और जगह नहीं है, तो धंधा तो बहुत जोर से चल रहा है! उस आदमी ने कहा, तुम्हें कुछ पता नहीं। आज से पंद्रह दिन पहले जब सांझ को हम नो वेकेंसी की तख्ती लटकाते थे, तो उसके बाद कम से कम पचास आदमी और द्वार खटखटाते थे। अब सिर्फ दस पंद्रह ही आते हैं। पचास आदमी लौटते थे पंद्रह दिन पहले; जगह नहीं मिलती थी। अब सिर्फ दस पंद्रह ही लौटते हैं। धंधा बड़ा घाटे में चल रहा है।


मैं एक घर में मेहमान था। गृहिणी ने मुझे कहा कि आप मेरे पति को समझाइए कि इनको हो क्या गया है। बस, निरंतर एक ही चिंता में लगे रहते हैं कि पांच लाख का नुकसान हो गया। पत्नी ने मुझे कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि नुकसान हुआ कैसे! नुकसान नहीं हुआ है। मैंने पति को पूछा। उन्होंने कहा, हुआ है नुकसान, दस लाख का लाभ होने की आशा थी, पांच का ही लाभ हुआ है। नुकसान निश्चित हुआ है। पांच लाख बिलकुल हाथ से गए।


अपेक्षा से भरा हुआ चित्त, लाभ हो तो भी हानि अनुभव करता है। साक्षीभाव से भरा हुआ चित्त, हानि हो तो भी लाभ अनुभव करता है। क्योंकि मैंने कुछ भी नहीं किया, और जितना भी मिल गया, वह भी परमकृपा है, वह भी अस्तित्व का अनुदान है।


कठोपनिषद 


ओशो

*संकलन-रामजी 🙏🌹🌹*


शिव-विष्णु



एक बार भगवान नारायण अपने वैकुंठलोक में सोये हुए थे. स्वप्न में वो क्या देखते है कि करोड़ो चन्द्रमाओ कि कन्तिवाले, त्रिशूल-डमरू-धारी, स्वर्णाभरण -भूषित, संजय-वन्दित , अणिमादि सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनंदातिरेक से उन्मत होकर उनके सामने नृत्य कर रहे है, उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष-गदगद से सहसा शैयापर उठकर बैठ गये और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे. 


उन्हें इस प्रकार बैठे देखर श्री लक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि "भगवान! आपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है?" भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे. 


अंत में कुछ स्वस्थ होने पर वे गदगद-कंठ से इस प्रकार बोले - "हे देवि! मैंने अभी स्वप्न में भगवान श्री महेश्वर का दर्शन किया है, उनकी छबी ऍसी अपूर्व आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी. मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है. अहोभाग्य! चलो, कैलाश में चलकर हमलोग महादेव के दर्शन करते है .  


यह कहकर दोनों कैलाश की और चल दिए. मुश्किल से आधी दूर ही गये होंगे की देखते है भगवान शंकर स्वयं गिरिजा के साथ उनकी और आ रहे है, अब भगवान के आनंद का क्या ठिकाना? मानो घर बैठे निधि मिल गई. पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले. मानो प्रेम और आनंद का समुन्द्र उमड़ पड़ा. एक दुसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आन्दाश्रू बहने लगे और शरीर पुलकायमान हो गया. दोनों ही एक दुसरे से लिपटे हुए कुछ देर मुक्वत खड़े रहे. प्रश्नोतर होनेपर मालूम हुए की शंकर जी ने भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न देखा मानो विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे है, जिस रूप में वे अब उनके सामने खड़े थे. दोनों के स्वप्न का वृतांत अवगत होने पर दोनों ही लगे एक दुसरे से अपने यहाँ लिवा ले जाने का आग्रह करने.. नारायण कहते वैकुण्ठ चलो और शम्भू कहते कैलाश की और प्रस्थान कीजिये. दोनों के आग्रह में इतना अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहाँ चला जाये?


 इतने में ही क्या देखते है वीणा बजाते, हरिगुण गाते नारद जी कही से आ निकले. बस, फिर क्या था? लगे दोनों ही उनसे निर्णय कराने कि कहाँ चला जाये? बेचारे नारद जी स्वयं परेशान थे उस अलौकिक मिलन को देखकर , वे तो स्वयं अपनी सुध-बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने. अब निर्णय कौन करे? 


अंत में यह तय हुई कि भगवती उमा जो कह दे वही ठीक है. भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रही, अंत में दोनों को लक्ष्य करके बोली -"हे नाथ! हे नारायण! आपलोगों के निश्छल, अनन्य एवम अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके निवास-स्थान अलग-अलग नहीं है, जो कैलास है वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है वही कैलाश है, केवल नाम में ही भेद है. यही नहीं , मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में दो है. और तो और, मुझे तो अब यह स्पष्ट दिखने लगा ही आपके भार्याये भी एक ही है, दो नहीं. जो मै हु वही श्रीलक्ष्मी है और जो श्रीलक्ष्मी है वही मै हु.. केवल इतना ही नहीं, मेरी तो अब यह दृढ धारणा हो गई है कि आपलोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह मानो दुसरे के प्रति ही करता है, एक की जो पूजा करता है, वह स्वाभाविक ही दुसरे कि भी करता है और जो एक को अपूज्य मानता है वह दुसरे कि भी पूजा नहीं करता... मै तो यह समझती हु कि आप दोनों में जो भेद मानता है, उसका चिरकालतक घोर पतन होता है, मै देखती हु कि आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्र्वच्चना कर रहे है, मुझे चक्कर में डाल रहे है, मुझे भुला रहे है. अब मेरी यह प्रार्थना है कि आपलोग दोनों ही अपने-अपने लोक को पधारिये .. श्रीविष्णु यह समझे कि हम शिवरूप में से वैकुण्ठ जा रहे है और महेश्वर यह माने कि हम विष्णुरूप से कैलाश गमन कर रहे है .. इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा कि प्रशंसा करते हुए दोनों अपने अपने लोक को चले गये. 


 लौटकर जब विष्णु वैकुण्ठ पहुंचे तो श्री लक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि - 'प्रभु! सबसे अधिक प्रिय आपको कौन है? इस पर भगवान बोले - 'प्रिय! मेरे प्रियतम केवल श्री शंकर है, देहधारियो को अपने देह कि भांति वे मुझे अकारण ही प्रिय है, एक बार मै और शंकर दोनों ही पृथ्वी पर घुमने निकले, मै अपने प्रियतम की खोज में इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में देश-देशांतर में भटक रहा होगा, वही मुझे अकारण प्रिय होगा. थोड़ी देर के बाद ही मेरी श्री शंकर जी से भेंट हो गई. ज्यो ही हमलोगों की चार आँखे हुई कि हमलोग पुर्वजन्मअर्जित विद्या कि भांति एक दुसरे कि प्रति आक्रष्ट हो गये "वास्तव में मै ही जनार्दन हु. और मै ही महादेव हु, अलग-अलग दो घडो में रखे हुए जल कि भांति मुझमे और उनमे कोई अंतर नहीं है, शंकरजी के अतिरिक्त शिवकी अर्चा करनेवाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है, इसके विपरीत जो शिव कि पूजा नहीं करतेवे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते...

                            Ram Ram ji

सबसे बड़ा सिपाहिया

 एक बार एक दरोगा जी का मुंह लगा नाई पूछ बैठा -


"हुजूर मैंने सुना है कि पुलिस वाले रस्सी का साँप बना देते हैं....आख़िर कैसे ?"


दरोगा जी बात को टाल गए।


लेकिन नाई ने जब दो-तीन बार यही सवाल पूछा तो दरोगा जी ने मन ही मन तय किया कि इस भूतनी वाले को बताना ही पड़ेगा कि रस्सी का साँप कैसे बनाते हैं !


लेकिन प्रत्यक्ष में नाई से बोले - "अगली बार आऊंगा तब

बताऊंगा !"


इधर दरोगा जी के जाने के दो घंटे बाद ही 4 सिपाही नाई

की दुकान पर छापा मारने आ धमके - "मुखबिर से पक्की खबर मिली है, तू हथियार सप्लाई करता है। तलाशी लेनी है दूकान की !" 


तलाशी शुरू हुई ... 


एक सिपाही ने नजर बचाकर हड़प्पा की खुदाई से निकला जंग लगा हुआ असलहा छुपा दिया ! 


दूकान का सामान उलटने-पलटने के बाद एक सिपाही चिल्लाया - "ये रहा रिवाल्वर"


छापामारी अभियान की सफलता देख के नाई के होश उड़ गए - "अरे साहब मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता ।


आपके बड़े साहब भी मुझे अच्छी तरह पहचानते हैं !"


एक सिपाही हड़काते हुए बोला - "दरोगा जी का नाम लेकर बचना चाहता है ? साले सब कुछ बता दे कि तेरे गैंग में कौन-कौन है ... तेरा सरदार कौन है ... तूने कहाँ-कहाँ हथियार सप्लाई किये ... कितनी जगह लूट-पाट की ... 

तू अभी थाने चल !"


थाने में दरोगा साहेब को देखते ही नाई पैरों में गिर पड़ा - "साहब बचा लो ... मैंने कुछ नहीं किया !" 


दरोगा ने नाई की तरफ देखा और फिर सिपाहियों से पूछा - "क्या हुआ ?"


सिपाही ने वही जंग लगा असलहा दरोगा के सामने पेश कर दिया - "सर जी मुखबिर से पता चला था .. इसका गैंग है और हथियार सप्लाई करता है.. इसकी दूकान से ही ये रिवाल्वर मिली है !"


दरोगा सिपाही से - "तुम जाओ मैं पूछ-ताछ करता हूँ !"


सिपाही के जाते ही दरोगा हमदर्दी से बोले - "ये क्या किया तूने ?"


नाई घिघियाया - "सरकार मुझे बचा लो ... !"


दरोगा गंभीरता से बोला - "देख ये जो सिपाही हैं न .. एक नंबर के बदमाश हैं ...मैंने अगर तुझे छोड़ दिया तो ये मेरी शिकायत ऊपर अफसर से कर देंगे ... 

इनकी जेब में कुछ डालनी ही पड़ेगी ... 

मैं तुझे अपनी गारंटी पर दो घंटे का समय देता हूँ , जाकर किसी तरह बीस हजार का इंतजाम कर .. 

पांच - पांच हजार चारों सिपाहियों को दे दूंगा तो वो मान जायेंगे !"


नाई रोता हुआ बोला - "हुजूर मैं गरीब आदमी बीस हजार कहाँ से लाऊंगा ?"


दरोगा डांटते हुए बोला - "तू मेरा अपना है इसलिए इतना सब कर रहा हूँ , तेरी जगह कोई और होता तो तू अब तक जेल पहुँच गया होता ...जल्दी कर वरना बाद में मैं कोई मदद नहीं कर पाऊंगा !"


नाई रोता - कलपता घर गया ... अम्मा के कुछ चांदी के जेवर थे ...चौक में एक ज्वैलर्स के यहाँ सारे जेवर बेचकर किसी तरह बीस हजार लेकर थाने में पहुंचा और सहमते हुए बीस हजार रुपये दरोगा जी को थमा दिए !


दरोजा जी ने रुपयों को संभालते हुए पूछा - "कहाँ से लाया ये रुपया?"


नाई ने ज्वैलर्स के यहाँ जेवर बेचने की बात बतायी तो दरोगा जी ने सिपाही से कहा - "जीप निकाल और नाई को हथकड़ी लगा के जीप में बैठा ले .. दबिश पे चलना है !"


पुलिस की जीप चौक में उसी ज्वैलर्स के यहाँ रुकी !


दरोगा और दो सिपाही ज्वैलर्स की दूकान के अन्दर पहुंचे ...


दरोगा ने पहुँचते ही ज्वैलर्स को रुआब में ले लिया - "चोरी का माल खरीदने का धंधा कब से कर रहे हो ?"


ज्वैलर्स सिटपिटाया - "नहीं दरोगा जी, आपको किसी ने गलत जानकारी दी है!"

दरोगा ने डपटते हुए कहा - "चुप ~~~ बाहर देख जीप में हथकड़ी लगाए शातिर चोर बैठा है ... कई साल से पुलिस को इसकी तलाश थी ... इसने तेरे यहाँ जेवर बेचा है कि नहीं ? तू तो जेल जाएगा ही .. साथ ही दूकान का सारा माल भी जब्त होगा !" 


ज्वैलर्स ने जैसे ही बाहर पुलिस जीप में हथकड़ी पहले नाई को देखा तो उसके होश उड़ गए, 


तुरंत हाथ जोड़ लिए - "दरोगा जी जरा मेरी बात सुन लीजिये!


कोने में ले जाकर मामला एक लाख में सेटल हुआ ! 


दरोगा ने एक लाख की गड्डी जेब में डाली और नाई ने जो गहने बेचे थे वो हासिल किये, फिर ज्वैलर्स को वार्निंग दी - "तुम शरीफ आदमी हो और तुम्हारे खिलाफ पहला मामला था , इसलिए छोड़ रहा हूँ ... आगे कोई शिकायत न मिले !"


इतना कहकर दरोगा जी और सिपाही जीप पर बैठकर

रवाना हो गए !


थाने में दरोगा जी मुस्कुराते हुए पूछ रहे थे - "अब बता गधे, तेरे को समझ में आया कि रस्सी का सांप कैसे बनाते हैं ?? " 


नाई सिर नवाते हुए बोला - "हाँ माई-बाप समझ गया !"


दरोगा हँसते हुए बोला - "भूतनी के, ले संभाल अपनी अम्मा के गहने और एक हजार रुपया और जाते-जाते याद कर ले ...हम सिर्फ़ रस्सी का सांप ही नहीं बल्कि जरूरत पड़ने पर नेवला .. अजगर ... मगरमच्छ...औऱ डायनासोर तक बनाते हैं ..नहीं तो अपराध नियंत्रण कैसे होगा बे......?????"

झूठ का जाल / ओशो

 मुल्ला नसरूद्दीन का एक युवती से नया-नया प्रेम हुआ था। युवती ने एक दिन बातों-बातों में कहा कि कभी हमारे घर आइए न!


नसरूद्दीन बोला: ‘जरूर-जरूर, क्यों नहीं!’


दूसरे दिन मुल्ला युवती का पता लेकर बहुत खोजे, लेकिन मकान कुछ ऐसा कि मिले ही न। आखिर एक वृद्ध व्यक्ति को रोककर मुल्ला ने पूछा कि बड़े मियां, क्या आप बता सकते हैं कि ये मिस सलमा कहां रहती हैं?


वृद्ध ने ऊपर से नीचे तक नसरूद्दीन को देखा और पूछा कि क्या मैं आपका परिचय जान सकता हूं कि आप कौन हैं?


नसरूद्दीन बोला: ‘जी, मैं उनका भाई हूं।’


वृद्ध बोला: ‘बड़ी खुशी हुई आपसे मिलकर। आइए-आइए, मैं उसका पिता हूं!’ झूठ कितनी देर चलेगी? एक कदम भी न चली और चारों खाने चित हो गए! अब पिता जी से ही मिलना हो गया, जिनका पहले कभी दर्शन ही न हुआ था। और एक झूठ निकलती है तो पीछे हजार झूठें निकल आती हैं, क्योंकि एक झूठ को सम्हालने के लिए और झूठों की जरूरत पड़ती है। झूठ की एक खूबी है कि तुम्हें एक झूठ को अगर सम्हालना हो तो उसके सहारे के लिए दस झूठें खड़ी करनी पड़ती हैं। फिर हर दस झूठ को सम्हालने के लिए और दस-दस झूठें। इसका कोई अंत नहीं है।


सत्य की एक खूबी है: सत्य अकेला खड़ा हो जाता है। उसके लिए किसी सहारे की कोई जरूरत नहीं होती। सत्य अपना सहारा है। यही तो उसकी स्वतंत्रता है। यही तो उसका बल है, उसकी प्रतिभा है, उसकी ओजस्विता है। झूठ को तो लाख उपाय करो, तुम्हें और झूठ लाने ही पड़ेंगे। और कहीं न कहीं तुम फंस जाओगे, क्योंकि झूठ का इतना बड़ा जाल तुम सम्हाल न पाओगे।

ओशो

रविवार, 24 अक्तूबर 2021

रवि अरोड़ा की नजर से

 ठहरे हुए लोग / रवि अरोड़ा


बचपन से ही माता पिता के साथ गुरुद्वारों में माथा टेकने जाता रहा हूं ।  गुरुद्वारा परिसर में किसी निहंग सिख के दिखने पर माता पिता मुझे सिखाते थे कि इन्हे सत श्री अकाल कहो । पूछने पर वे बताते थे कि ये हमारी कौम के सिपाही हैं और गुरु गोविंद सिंह जी के आदेश पर ही हमारी रक्षा के लिए इन्होंने यह वेश धारण किया है । हालांकि मेरा बाल मन उनसे डरता था । जाहिर है कि सिर से पांव तक नीले कपड़े , लंबी खुली दाढ़ी, हाथों में बरछा, कमर में लंबी तलवार और खंडा किसी बाल मन को भयभीत करने के लिए काफी ही होता था । थोड़ा बड़ा हुआ तो उनका उजड्ड आचरण भी डराने लगा ।  बंगला साहिब अथवा हरमंदिर साहिब जैसे किसी गुरुद्वारे के सरोवर में स्नान करते समय श्रद्धालुओ के प्रति उनका अपमानजनक व्यवहार भी सीख देता था कि इनसे दूर ही रहा जाए । थोड़ा बड़ा हुआ तो मन में सवाल उठने लगा कि आज जब देश आजाद है । हमारे पास अपनी सरकार, पुलिस , सेना और पूरा तंत्र है , फिर ये लोग अब किसकी रक्षा कर रहे हैं और किससे कर रहे हैं ? 


डेढ़ साल पहले कोरोना काल में पटियाला की एक सड़क पर जब कर्फ्यू पास दिखाने को कहने पर एक निहंग ने पुलिस कर्मी का हाथ काट दिया तो मुझ जैसे तमाम लोगों की पुख्ता राय बनी कि ये लोग सिख तालिबानी हैं और देर सवेर देश को इनके बाबत भी कुछ सोचना पड़ेगा । हाल ही में किसान आंदोलन के बीच एक दलित लखबीर सिंह की निहंगों ने जिस तरह से नृशंस हत्या की और पुलिस, प्रशासन , तमाम सरकारें , सभी राजनीतिक दल मुंह में दही जमा कर बैठ गए । जिस तरह से लखबीर के अंतिम संस्कार को रोका गया और उसके परिजनों को कोई धार्मिक आयोजन भी नहीं करने दिया गया । यही नहीं कोई राजनैतिक कार्यकर्ता तो दूर कोई गांव वाला भी मृतक के परिजनों को सांत्वना देने नहीं गया, उससे सवाल उठने लगा है कि चंद सिरफिरे ही अतिवादी हैं अथवा अपना यह पूरा मुल्क ही इन अंधेरी गलियों की ओर चल पड़ा है ? क्या सचमुच अन्य मुल्कों की तरह यहां भी इंसानी मन की तमाम कोमल भावनाएं अब इतिहास होने की कगार पर हैं ? 


 बेशक किसी धार्मिक पुस्तक का अपमान नहीं होना चाहिए मगर क्या इंसानी जीवन का इस वहशियाना तरीके से  होना चाहिए ?  अभी तक कोई सबूत नहीं मिला है कि लखबीर ने गुरु ग्रंथ साहब की बेअदबी की । एक वीडियो कहता है कि वह अपमान करने वाला था तो एक वीडियो कहता है कि वह ग्रंथ साहब को उठा कर ले जाना चाहता था । एक वीडियो में तो दसवें गुरु की पुस्तक सर्बलोह के अपमान की बात की गई है और अभी तक यह भी स्पष्ट नही हो रहा कि अपमान ग्रंथ साहब का हुआ अथवा होने वाला था या सर्बलोह का ? जाहिर है कि सर्ब लोह की वह मान्यता नहीं है जो गुरु ग्रंथ साहब की है । सर्ब लोह जैसे तो अनेक ग्रंथ सिख धर्म में हैं , जिन्हे आदर तो दिया जाता है मगर पूजा नहीं जाता ।  घटना के बाद सामने आए तमाम वीडियो में निहंग जिस प्रकार अपनी बहादुरी का बखान कर रहे हैं , उससे क्या यह सवाल नहीं उठता कि बेहद समझदार सिख कौम इन जंगलियों से अपने को कब तक जोड़े रखेगी ? क्या कौम के रहनुमाओं को सोचना नहीं चाहिए कि इतिहास में कहीं ठहरे हुए ये लोग उनकी तमाम सिफतों पर पानी क्यों फेर रहे हैं ? इन निहंगों की इस करतूत को देख कर क्या मेरे जैसे तमाम अज्ञानियों के मन में यह सवाल नही उठेगा कि क्या ये निहंग भी उसी सिख कौम के हिस्सा हैं जिसने आतातायियो से सदियों हमारी रक्षा की , आजादी के लिए सर्वाधिक कुर्बानियां दीं और आज भी कोरोना जैसी महामारी में सेवा के सर्वोत्तम कार्य कर नित नई मिसाल पेश कर रहे हैं ?

रवि अरोड़ा की नजर से.....

 बात सिर्फ चोले की नहीं है /  रवि अरोड़ा



इस बात को कई साल हो गए । हिंदी भवन में किसी सेठ की उठावनी का कार्यक्रम था । धार्मिक गतिविधियों के संचालन के लिए सेठ के परिजनों ने एक नामी गिरामी सन्यासी को बुलाया हुआ था । इस सन्यासी ने अपने संबोधन में सेठ अथवा धर्म कर्म पर कम बोला और हिंदुओं के सिर पर मंडरा रहे कथितखतरे के बाबत अधिक कहा । सन्यासी बोला कि इस खतरे से बचने का एक ही तरीका है कि हिंदू अपनी आबादी बढ़ाएं और दस दस बच्चे पैदा करें । कार्यक्रम खत्म होते ही सन्यासी बड़ी शान से मंच के नीचे उतरा और यह उम्मीद लगाए हुए था कि लोग बाग उसकी शान में कसीदे पढ़ेंगे और उसे हाथों हाथ लेंगे मगर हुआ इसके उलट । पब्लिक संन्यासी पर चढ़ दौड़ी और उसकी शिक्षा, धर्मकर्म और उसकी राजनीतिक सामजिक समझ से संबंधित अनेक तीखे सवाल कर डाले। बाद के दिनों में मैंने देखा कि नासमझी की बातें करने वाला वही सन्यासी अपने तीखे बयानों और नित नए विवादों के चलते बड़ा आदमी हो गया । तीन दिन पहले पता चला कि उसे अब साधुओं के बड़े अखाड़े द्वारा महामंडलेश्वर बनाया गया है । चलिए कोई बात नहीं मगर यह क्या , आज ही अखबार में खबर छपी की स्थानीय पुलिस ने उस संन्यासी पर गुंडा एक्ट लगाने की तैयारी कर ली है ? मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मेरे हिंदू धर्म में ये हो क्या रहा है ? धर्म और नासमझी का चोली दामन का साथ तो शुरू से ही रहा ही है । धर्म और राजनीति का घालमेल भी बहुत पुराना हो गया मगर देखते ही देखते धर्म और अपराध कैसे आपस में जुड़ गए ? 


वैसे तो गेरुए वस्त्र की अस्मिता पर दाग कोई नई बात नही है । हत्या, बलात्कार और दंगे फसाद जैसे संगीन अपराधों में न जाने कितने साधु सन्यासी अब सलाखों के पीछे हैं । ऐसे ऐसे कथित संत भी जेलों में बंद हैं जिनके पांव प्रधानमंत्री तक छूते थे । मगर अब बात कुछ ज्यादा ही बिगड़ती जा रही है । गेरुआ वस्त्र पहले लोग अरबों रुपयों का व्यापार कर रहे हैं । भगवा चोला धारण किए लोग मंत्री मुख्यमंत्री बन गए । चलिए यहां तक तो फिर भी हजम हुआ मगर अब ये क्या हो रहा है ? प्रतिष्ठित महामंडलेशेवर का पद और गुंडा एक्ट एक साथ ? मै तो अब तक यही समझता था कि जो गुंडा है वह महामंडलेश्वर नही हो सकता और जो महामंडलेश्वर है वह गुंडा कैसे हो सकता है मगर क्या करूं अखबारों की खबरें तो यही सब बता रही हैं । 


जानकर बताते हैं कि देश में साधु संन्यासियों की संख्या एक करोड़ से अधिक हैं । इनमें पांच लाख से अधिक तो नागा बाबा ही हैं । जाहिर है कि ये बाबा लोग कोई काम धाम नही करते और इनका खर्च धर्मानुयायी लोग उठाते हैं । किसी गरीब देश में इतनी बड़ी श्रम शक्ति का यूं जाया होना कोई अच्छी बात तो नहीं है मगर फिर भी यह मुल्क खुशी खुशी इसे स्वीकार किए हुए हैं । हजारों सालों की परंपरा और संस्कार का ही असर है कि सब कुछ समझते हुए भी गेरुआ वस्त्र पहने व्यक्ति को देखते ही आम भारतीय के हाथ उसके पैरों की ओर बढ़ जाते हैं । किसी आशीर्वाद की आकांक्षा में यथोचित भेंट पूजा भी लोग बाग करते हैं । ऐसे में क्या ऐसे वस्त्र धारण किए लोगों का कर्तव्य नहीं कि वे अपने चोले के सम्मान की रक्षा करें ? वे कब समझेंगे कि उनके सम्मान से पूर्व उनके वस्त्रों का सम्मान हो रहा है और इस वस्त्रों की गरिमा बनाए रखना उनका पहला कर्तव्य है । गेरुआ वस्त्र पहले हुए हर इंसान को क्या यह सोचना नही चाहिए कि उसकी किसी ऐसी वैसी हरकत से उसका पूरा वर्ग शर्मिंदा हो सकता है ? आपकी आप जाने मगर मुझे तो यही लगता है कि इस देश में सफेद खादी के कपड़ों को जैसे नेताओं ने बदनाम कर दिया है और खादी पहने व्यक्ति को देखते ही लोग उसे चोर समझने लगते हैं । उसी प्रकार आज के अनेक साधु सन्यासी भी गेरुआ वस्त्रों की गरिमा खत्म करने पर लगे हैं और कोई बड़ी बात नहीं कि भविष्य मेंइस वस्त्रों को देखते ही लोगबाग भयभीत होने लगें ।



भारत जी, यह कैसा रुठना !!/ श्याम बिहारी श्यामल

 


अग्रज रचनाकार भारत यायावर जी के आकस्मिक निधन की सूचना वज्रपात की तरह है.....


हमारा कोई चार दशकों का संपर्क-सम्बन्ध रहा.... तब जबकि उनकी प्रतिभा हज़ारीबाग़ में उदित हो रही थी और मैं पलामू में क़लम-कागज़ पकड़ना सीख रहा था.... 


अस्सी के दशक के आरंभ में प्रलेस के डाल्टनगंज में आयोजित राज्य सम्मेलन के मंच पर उन्हें पहली बार ग़ज़लगो के रूप में देखा था. 

 

कोयल तट पर टाऊन हॉल के प्रशाल में उन्होंने मंच से अपनी ग़ज़ल प्रस्तुत की थी--


... "...शब्द बिखरे पड़े हैं जोड़िए / सन्नाटा बहुत है तोड़िए "


उनकी यह ग़ज़ल डाल्टनगंज से ही गोकुल बसंत के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ' सार्व' में छपी थी. बाद में 'रेणु रचनावली' और 'महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली' के रूप में उन्होंने हिंदी साहित्य को अमूल्य योगदान दिया, जिसका महत्व शब्द संसार ने अनुभूत किया और मान दिया. 


वह अस्सी के दौर में उभरे हिंदी के कवियों में प्रमुख हैं. सबसे हाल में उनकी लिखी 'रेणु' की जीवनी हिंदी साहित्य को उनका बड़ा योगदान है. इसका दूसरा भाग भी लिखने की उन्होंने घोषणा की थी.... ओफ्फ... उन्हें नियति ने इसका अवकाश नहीं दिया...


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रचनात्मकता के अपने दायरों में कई तरह की स्वाभाविक दुर्भाग्यपूर्ण धुंध उतरती रहती है... बिना कुछ कहे-सुने भी आपस में दूरियां-नजदीकियां बनती-बिगड़ती रहती हैं...लेखकों के बीच चाहे-अनचाहे अबोलापन पनपता रहता है ! ......


पता नहीं किस बात को लेकर पिछले दिनों भारत यायावर अचानक मुझसे खिंच गए. 


मैं हर दो-चार दिन पर उन्हें नम्बर मिलाता, वे कॉल ही नहीं उठाते थे. एक दिन उनके भतीजे कथाकार सुबोध सिंह शिवगीत से संपर्क हुआ. 


शिवगीत जी ने उनके घर पहुंच कर उनसे बात करवाई. फोन पर भारत जी बताने लगे कि वे बीमार हो गए थे इसलिए कॉल नहीं उठा रहे थे. हक़ीकत जबकि यह नहीं थी. वे दरअसल नाराज़ या रुठे थे...


उनकी रुठने की आदत यह हृदय विदारक दृश्य उपस्थित कर देगी, सोचा न था...


....अग्रज, यह अच्छा नहीं किया !


...... नमन !!!!!!!!! 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🙏

Anil Janvijay Jyotish Joshi

फणीश्वरनाथ रेणु : जन्मशती पर नमन

 

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पूर्णिया जिला के ही रेणु थे। जिला जब बँट गया तो अब अररिया के कहलाते हैं। पर बचपन से रेणु को हमलोग अपने ही जिला का मानते रहे हैं। जब जिला बांटा गया तब भी रेणु नहीं बंट सके ,दिल में ही रह गए ! आंचलिकता के कथाकार अंचल में नहीं बंटे। तो रेणु न केवल हमारे थे बल्कि वो जन जन के थे। पर पूर्णिया जिले में रहने के कारण लोग उन्हें अपने घर का ही समझते थे। उनके कथा पात्र भी घर घर में मिल जाते थे। कुछ तो असली पात्र ही मिल जाते थे। नक्षत्र मालाकार आदि पात्र वहाँ लोगों ने देखा भी जो उनकी रचनाओं में जीवंत थे। 

रेणु के बाल लंबे थे। पंत जैसे। तो हम सब जब बच्चे थे तो उनको कवि समझते थे। बाद में पता चला कि ये तो कथाकार हैं तो थोड़ा आश्चर्य हुआ ! मेरे भी बाल लंबे थे स्कूल टाइम में। मैं भी अपने स्कूल का एक छोटा मोटा रेणु ही था। कुछ लोग बोलता भी था ,देखो अपने रेणु जी आ रहे हैं। कोई हास से ,कोई उपहास से तो कोई गम्भीरता से बोलता था पर जो भी बोलता था "निम्मने" लगता था। 

मैं भी साहित्य रसिक था। कथा-साहित्य खूब पढ़ता था। रेणु को भी खूब पढ़ा। उनकी रचनाओं पर बनी फिल्में भी खूब देंखी। "मारे गए गुलफ़ाम उर्फ तीसरी कसम" पर बनी फिल्म भारतीय सिनेमा जगत का मील का पत्थर है। अभिनय ,गीत ,संगीत ,फोटोग्राफी, संवाद, निर्देशन हर मामले में सर्वश्रेष्ठ। फिल्मों के अध्येताओं को "तीसरी कसम" जरूर देखनी चाहिए। 

रेणु लेखक तो थे ही एक सामाजिक योद्धा भी थे। विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर खूब लिखे। राजनीति में भी रुचि रखते थे। चुनाव में खड़े भी हुए पर हार गए। इमरजेंसी का विरोध किये। कई बार जेल की यात्रा की। रेणु में एक और बात थी। रसिया थे वे। मजाकिया भी खूब। "दिनमान" में बिहार की बाढ़ पर लिखे भी। उसी वक्त साली के लिए लिखे कि यह "केलि कुंजिका" होती है। मैं भी जब बड़की भउजी की छोटकी बहिन फुलवा को केलि कुंजिका कहता हूँ तो वह फुल के कुप्पा हो जाती है!

रेणु का व्यक्तित्व हँसोड़ था। मस्त,जिंदादिल भी। कुछ कुछ लापरवाह भी। मानो यायावर हों ! रेणु पर बहुत लोगों ने कार्य किया है। यायावर शब्द से याद आया ,हजारीबाग के कवि,लेखक भारत यायावर जी ने भी रेणु पर गम्भीर कार्य किया है। उनसे कई बार बातचीत भी हुई तो जाना कि उनका कार्य कितना महत्वपूर्ण है। इसे सभी को पढ़ने की भी जरूरत है । अभी Kishan Kaljayee जी ने भी अपनी पत्रिका का रेणु पर केंद्रित विशेष अंक निकाला है, उसे भी पढ़ने की  जरूरत है। बहुत अंक निकले हैं उनपर केंद्रित। उन्हें पढ़िए। अद्भुत, अनजानी कहानियां मिलेगी पढ़ने को! वैसे रेणु की रचनाओं को तो पढ़े ही , जरूर से जरूर !

एक बात भूल गया कहना ,रेणु परवल की सब्जी ,भुजिया खाने के दीवाने थे। दिल्ली जैसे शहर में भी परवल की खोजायी हो जब वो दिल्ली जाते थे ।  पर तब बहुत ही कठिन था इसका मिलना। सब्जी वाला भी बोले, परवल क्या होता है?


रेणु अब नहीं हैं। सौ वर्ष हो गया उनके जन्म का। पर नहीं रहते भी हमारे दिल में रहते नजर आते हैं।हर प्रेमी की आहों में,भावों में रेणु हैं। तो वो गए नहीं हैं ,रहेंगे सदा हमाiरे जीवन में। हिरामन अभी भी उनको खोज रहा है तो उनको जाना कहाँ है, यहीं रहना है,हमारे बीच ही !

आज रेणु को याद करते उनके जन्मशती पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ! 

सादर....🌹🙏🌹


© डॉ. शंभु कुमार सिंह

4 मार्च ,21 / पटना 

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#इश्श

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(नीचे तस्वीरों में एक असली रेणु और एक नकली रेणु !)

महावीर प्रसाद द्विवेदी पर कुछ विचार / भारत यायावर

 


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 महावीर प्रसाद द्विवेदी एक ऐसे साहित्यकार थे, जो बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रूचि रखते थे। उन्होंने ‘सरस्वती’ का अठारह वर्षों तक संपादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया था। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने समालोचना की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे भाषाशास्त्री थे, अनुवादक थे, वैय्याकरणिक थे, इतिहासज्ञ थे, अर्थशास्त्री थे तथा विज्ञान में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे।


 महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी के पहले साहित्यकार थे, जिनको ‘आचार्च’ की उपाधि मिली थी। इसके पूर्व संस्कृत में आचार्यों की एक परम्परा थी। मई, 1933 ई॰ में नागरी प्रचारिणी सभा ने उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में एक बड़ा साहित्यिक आयोजन कर द्विवेदी का अभिनन्दन किया था एवं उनके सम्मान में ‘द्विवेदी अभिनन्दन ग्रंथ’ का प्रकाशन कर, उन्हें समर्पित किया था। इस अवसर पर द्विवेदी जी ने जो अपना वक्तव्य दिया था, वह ‘आत्म-निवेदन’ नाम से प्रकाशित हुआ था। इस ‘आत्म-निवेदन’ में वे कहते हैं - “मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ?“ 


 महावीर प्रसाद द्विवेदी ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। द्विवेदीजी ने लिखा है - “पहले तीन सिद्धांतों के अनुकूल आचरण करना तो सहज था; पर औथे के अनुकूल सचेत रहना कठिन था। तथापि सतत् अभ्यास से उसमें भी सफलता होती गई। तारबाबू होकर भी, टिकट बाबू, मालबाबू, स्टेशन मास्टर, यहाँ तक कि रेल पटरियाँ बिछाने और उसकी सड़क की निगरानी करने वाले प्लेट-लेयर ;च्मतउंदमदज ूंल प्देचमबजवतद्ध तक का भी काम मैंने सीख लिया। फल अच्छा ही हुआ। अफसरों की नजर मुझ पर पड़ी। मेरी तरक्की होती गई। वह इस तरह कि एक दफे छोड़कर मुझे तरक्की के लिए दरख्वास्त नहीं देनी पड़ी।“ द्विवेदी जी 15 रु॰ मासिक पर रेलवे में बहाल हुए थे और जब उन्होंने 1904 ई॰ में नौकरी छोड़ी उस वक्त उन्हें 150 रु॰ मूल वेतन एवं 50 रु॰ भत्ता मिलता था, यानी कुल 200 रु॰। उस जमाने में यह एक बहुत बड़ी राशि थी। वे 18 वर्ष की उम्र में रेलवे में बहाल हुए थे। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था और 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपांतर है। इसका प्रकाशन 1889 में हुआ। इसमें द्विवेदी जी ने सभी पद्यरचनाओं का भावार्थ खड़ी बोली गद्य में भी किया है। उन्होंने इसकी भूमिका में लिखा है - “इस कार्य में हुशंगाबादस्थ बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ का जो साम्प्रत मध्यप्रदेश राजधानी नागपुर में विराजमान हैं, मैं परम कृतज्ञ हूँ।“ अपने ‘आत्म-निवेदन’ में उन्होंने लिखा है - “बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।“ 1889 से 1892 ई॰ तक द्विवेदी जी की इस प्रकार की कई पुस्तकें प्रकाशित हुई - विनय-विनोद, विहार-वाटिका, स्नेहमाला, ऋतु तरंगिनी, देवी स्तुति शतक, श्री गंगालहरी आदि। 1896 ई॰ में इन्होंने लाॅर्ड बेकन के निबन्धों का हिन्दी में भावार्थमूलक रूपान्तर किया, जो ‘बेकन-विचार-रत्नावली’ पुस्तक में संकलित हैं। 1898 ई॰ में इन्होंने ‘हिन्दी कालिदास की आलोचना’ लिखी, जो हिन्दी की पहली आलोचनात्मक पुस्तक है। 1899 ई॰ में श्रीहर्ष के नैषधीयचरितम पर इन्होंने ‘नैषष-चरित-चर्चा’ नामक आलोचनात्मक एवं गवेषणात्मक पुस्तक लिखी। यह सिलसिला जो शुरू हुआ, वह 1930-31 ई॰ तक चला और द्विवेदी जी की कुल पचासी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 


 जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। अपने प्रकाण्ड पांडित्य के कारण इन्हें ‘आचार्य’ कहा जाने लगा। उनके व्यक्तित्व के बारे में आचार्य किशोरी दास वाजपेयी ने लिखा है - “उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ।“ द्विवेदी जी का मानना था कि “ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है।“ द्विवेदी जी स्वयं तो एक ‘महान् ज्ञान-राशि’ थे ही उनका सम्पूर्ण वांगमय भी संचित ज्ञानराशि है, जिससे होकर गुजरना अपनी जातीय परम्परा को आत्मसात करते हुए विश्वचिंतन के समक्ष भी होना है। डाॅ॰ रामविलास शर्मा ने द्विवेदी जी के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा है - “द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए।“


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 ऐसे महान् ज्ञान-राशि के पुंज थे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी। किन्तु रामविलास शर्मा के पूर्व जितने भी आलोचक हुए, उन्होंने द्विवेदी जी का उचित मूल्यांकन तो नहीं ही किया, अपितु उनका अवमूल्यन ही किया। इन महान् आलोचकों में रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी एवं हजारीप्रसाद द्विवेदी प्रमुख हैं। 

 रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में द्विवेदीजी पर जो टिप्पणी की है, उसपर एक नजर डालें: “द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के संपादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है।“ 

 इसी प्रसंग में रामचन्द्र शुक्ल आगे लिखते हैं - “कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबंधों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है।“


 अब आप देखें कि महावीर प्रसाद द्विवेदी के लेखन के प्रति रामचन्द्र शुक्ल की ये टिप्पणी पढ़कर हिन्दी का कोई भी पाठक उससे विरक्त होगा या आशक्त। रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास को हिन्दी के विद्यार्थी वर्षों से आप्त वचनों की तरह याद करते आ रहे हैं। ऐसे में मूल पाठ से उनके आप्त वाक्यों का यदि मिलान कर परीक्षण न किया जाए, तो अनर्थ होगा ही। 


 रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के सबसे बड़े समालोचक, सबसे बड़े साहित्येतिहास-लेखक। इसी इतिहास में वे महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक योगदान को सिर्फ भाषा-परिष्कारकत्र्ता के रूप में स्वीकार करते हैं। उनके शब्द हैं “यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गंभीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया।“ अब पाठक स्वयं रामचन्द्र शुक्ल की उपरोक्त पंक्तियों को देखें। क्या यहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबा कर कसे गये हैं ? क्या यहाँ ‘बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर नहीं कही गई हैं’ ? क्या शुक्लजी ‘मोटी अक्ल के पाठकों के लिए’ ही ये सब लिख रहे हैं ? दरअसल शुक्ल जी जिस आलोचना-पद्धत्ति का सहारा लेकर उक्त बातें लिख रहे थे, उसे अंग्रेजी में श्रनकपबपंस ब्तपजपबपेउ और हिन्दी में निर्णयात्मक आलोचना कहते हैं और इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि इसने आलोचना के क्षेत्र में आलोचकों का ध्यान ऐतिहासिक युग, वातावरण एवं जीवन से हटाकर अधिकांशतः कलापक्ष तक ही सीमित कर दिया है। कलापक्ष की ओर ध्यान देने वाले आलोचकों का कहना है कि युगीन परिस्थितियाँ, युगीन चेतना और युग सत्य निरंतर परिवर्तनशील है अतएव इन्हें आधार नहीं बनाया जा सकता। उनकी परिवर्तनशीलता के कारण इन्हें साहित्य का स्थायी मानदण्ड नहीं स्वीकार किया जा सकता। लेकिन इसी के साथ यह भी सत्य है कि ऐसी दशा में निर्णयात्मक आलोचना का कोई मूल्य नहीं रहेगा। इसका मुख्य कारण है ऐसे आलोचक का रचनाकार और रचना पर फतवे जारी करना। रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में ऐसे फतवे जगह-जगह भरे पड़े हैं। उन्होंने कृतियों के महत्त्व को उनके कलापक्ष के कारण स्वीकार किया। उनका कलावादी दृष्टिकोण ‘रस-मीमांसा’ के काव्यशास्त्रीय आधार से निर्मित हुआ था। यही कारण है कि उन्होंने द्विवेदी जी के विचारों को, उनके संचित ज्ञान-राशि पर ध्यान नहीं दिया और उनकी भाषा पर विचार किया। ‘मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर’ - यह अभिव्यक्ति की प्रणाली पर बात की जा रही है, जो निस्संदेह भाषा है। जब द्विवेदी जी मूर्ख या मोटे दिमाग वालों के लिए लिखते थे और मोटी तरह से लिखते थे तो उन्होंने भाषा परिष्कार कैसे किया ? जिस लेखक की भाषा की सतही समझ होगी, वह दूसरे लेखकों की भाषा को दुरूस्त कैसे करेगा ? पुनः रामचन्द्र शुक्ल की बातों पर विचार करें - महावीर प्रसाद द्विवेदी ने शाश्वत साहित्य या स्थायी साहित्य नहीं लिखा। उनका महत्त्व भाषा-सुधार में है और उनकी भाषा कैसी है - मोटी अक्लवालों के लिए है। इसतरह की असंगत बातों से आचार्य शुक्ल का इतिहास भरा हुआ है। किसी आलोचक ने इसकी अब तक ढंग से समीक्षा भी नहीं लिखी है और यह हिन्दी साहित्य का अब तक श्रेष्ठ इतिहास बना हुआ है। हिन्दी के पाठक इसमें दिये हुए फतवों को आप्त वचनों की तरह याद करते रहते हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा लिखते हुए लिखा है - “इसतरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे।“ 


 सन् 1933 ई॰ में आचार्य द्विवेदी को नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा अभिनन्दन ग्रंथ भेंट किया गया। इसकी प्रस्तावना श्यामसुन्दर दास एवं राय कृष्णदास के नाम से प्रकाशित हुई, किन्तु यह लिखा गया था नन्ददुलारे वाजपेयी के द्वारा। इसलिए यह 1940 ई॰ में प्रकाशित वाजपेयी जी की पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य: बीसवीं शताब्दी’ में संकलित है। इसमें यह विचार किया गया है कि स्थायी या शाश्वत साहित्य में द्विवेदी जी का साहित्य परिगणित हो सकता है या नहीं। इस दृष्टिकोण से महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित सम्पूर्ण साहित्य को अयोग्य ठहरा दिया गया। सिर्फ उनके द्वारा सम्पादित ‘सरस्वती’ के अंकों को ही महत्त्व दिया गया। 

 1952 ई॰ में हजारीप्रसाद द्विवेदी की ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ नामक पुस्तक छपी। इसमें एक जगह वे लिखते हैं - “पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई।“ अब सवाल यह उठता है कि यदि महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबन्ध गम्भीर नहीं हैं तो उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में सहायता कैसे पहुँचाई ? 


 ये तमाम बातें महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक योगदान पर धूल डालने की कोशिश थी। किन्तु, ऐसे रचनाकार भी थे जो द्विवेदीजी के महत्त्व को रेखांकित कर रहे थे, उनमें प्रमुख थे - प्रेमचंद, निराला और पंत। मैथिलीशरण गुप्त तो उनके शिष्य थे ही। पंत ने 1931-32 में द्विवेदी जी पर दो कविताएँ लिखीं। सुमित्रानंदन पंत की कविता की चार पंक्तियाँ देखें -


आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर

भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर,

दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर

उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर


 1933 ई॰ में प्रेमचंद ने ‘हंस’ का द्विवेदी जी पर विशेषांक निकाला। वह भी अप्रैल एवं मई के दो अंकों में। अप्रैल, 1933 के ‘हंस’ की सम्पादकीय में प्रेमचंद लिखते हैं - “आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया।“ 

 यह था आचार्य द्विवेदी का ऐतिहासिक योगदान। इसी क्रम में आगे प्रेमचंद द्विवेदी जी का शब्द-चित्र इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं - “द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवत्र्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है।“ 


 मई, 1933 के ‘हंस’ की सम्पादकीय पुनः प्रेमचंद ने आचार्य द्विवेदी पर लिखा एवं उनके महत्त्व को सही ढंग से प्रतिपादित किया। वे कहते हैं - “द्विवेदी जी का जीवन - साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक  लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी।“


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 ‘सरस्वती’ पत्रिका इलाहाबाद के इंडियन प्रेस से छपती थी, किन्तु द्विवेदी जी कानपुर के निकट के एक गाँव जूही में रहकर उसका सम्पादन करते थे। वे खपड़ैल के एक मकान में रहते थे। प्रेमचन्द ने जिस कुटिया का उल्लेख किया है, वह यही है। अब जूही कानपुर शहर का एक मुहल्ला हो गया है। प्रेमचन्द ने द्विवेदी जी के महत्त्व को सही रूप में प्रतिपादित किया है। उनका महत्त्व ज्ञान-विज्ञान का प्रसार कर हिन्दी जनता में जागृति लाने को लेकर था। बाद में रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ नामक पुस्तक लिखकर द्विवेदी जी के ऐतिहासिक योगदान को उसी रूप में व्याख्यायित किया, जिसे प्रेमचन्द उसी वक्त पहचान रहे थे। वे शाश्वत साहित्य या कलात्मक साहित्य की दृष्टि से द्विवेदी जी के साहित्य को नहीं देख रहे थे।


 मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से इलाहाबाद के लेखकों ने इलाहाबाद में ‘द्विवेदी-मेला’ का आयोजन किया था। इसमें महावीर प्रसाद द्विवेदी को सम्मानित करने पूरा हिन्दी जगत उमड़ पड़ा था। कहते हैं, इतना बड़ा लेखकों का जमावड़ा पहली बार इस अवसर पर हुआ। इसके केन्द्र में द्विवेदी जी थे। वे हिन्दी लेखकों के परम आदरणीय ऐतिहासिक पुरुष की तरह उपस्थित थे। निराला ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में ‘आचार्य अमर हों !’ नामक टिप्पणी में उनका जो शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है, वह बेहद जीवंत और यथार्थ है - “उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की           प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है।“


 कहना न होगा कि रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी और हजारीप्रसाद द्विवेदी के विचारों के बरक्स प्रेमचंद एवं निराला ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक योगदान को, उनके अमर व्यक्तित्व की अमिट छाप को सही रूप में समझा और मूल्यांकित किया। 


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 महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी के पहले लेखक थे, जिन्होंने अपनी जातीय परम्परा का गहन अध्ययन ही सिर्फ नहीं किया था, उसे आलोचनात्मक दृष्टि से भी देखा था। उन्होंने वेदों से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक के संस्कृत-साहित्य की निरन्तर प्रवहमान धारा का अवगाहन किया था एवं उपयोगिता तथा कलात्मक योगदान के प्रति एक वैज्ञानिक नजरिया अपनाया था। जब द्विवेदी जी देखते हैं कि वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा बढ़ रही है, लोग वेदों का अध्ययन न कर इसे ईश्वरकृत मान सिर्फ पूजन-आराधन कर रहे हैं, तो वे क्षुब्ध होते हैं। उनके शब्द देखिए - “वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ।“ 

 उस समय क्या आज भी यह मान्यता बहुतेरे लोगों में मिलेगी कि “वैदिक ऋषि मंत्र-द्रष्टा थे। उन्होंने योगबल से ईश्वर से प्रत्यादेश की तरह वैदिक मंत्र प्राप्त किये हैं।“ द्विवेदी जी इस मान्यता का खण्डन करते हुए आगे लिखते हैं - “यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है।“ 


 यह था उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उन्मेष, जो हिन्दी-साहित्य में पहले-पहल महावीर प्रसाद द्विवेदी के चिन्तन एवं लेखन के द्वारा प्रस्फुटित हुआ था। पाठक द्विवेदीजी के उपरोक्त मंतव्य से यह न समझें कि वे वेदों को निरर्थक समझते थे। उनका स्पष्ट मत था कि वेद पूजा-पाठ करने की चीज नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक महत्त्व के ग्रंथ हैं। वेदों का अध्ययन हमें अवश्य करना चाहिए और इस दृष्टिकोण से कि “वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है।“  

 इस प्रकार द्विवेदी जी वेदों से संस्कृत-साहित्य की जो परंपरा या इतिहास है, उस पर गवेषणात्मक, विवेचनात्मक एवं आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करते हैं। वे संस्कृत-साहित्य के महत्त्व पर विस्तार से विचार करते हुए बताते हैं कि संस्कृत-साहित्य विस्तृत एवं विविध आयामी है। 1891 ई॰ तक कोई चालीस हजार संस्कृत-गं्रथों की नामावली तैयार हो चुकी थी। फिर भी कितने ही ग्रंथों के नाम तो उसमें शामिल ही नहीं हो पाये थे। इस विपुल साहित्य के शोध और अवगाहन के फलस्वरूप ही प्राचीन भारत का इतिहास-लेखन संभव हो सका। किन्तु यह कार्य विदेशी विद्वानों ने किया था। भारत के संस्कृज्ञ इन ग्रंथों के प्रति अगाध श्रद्धा-भक्ति रखते थे। वे देव-स्वरूप हो गये थे। वेदों को तो ईश्वरकृत माना ही जाता था, रामायण, महाभारत, पुराण तो श्रद्धेय ग्रंथ थे ही, कालिदास, अश्वघोष, भारवि, श्रीहर्ष, दण्डी, बाणभट्ट आदि के ग्रंथों के प्रति भी यही भक्तिपरक अवधारणा थी। द्विवेदी जी ने इनकी ऐतिहासिकता को दृष्टि में रखकर तटस्थ विवेचन किया है और इनकी असंगतियों को भी दर्शाया है। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हमारे देश में इसतरह के विचारकों का अभाव था। हिन्दी में सिर्फ पांडेय रामावतार शर्मा ही ऐसे विचारक थे जो द्विवेदी जी के समानधर्मा थे। उन्होंने लिखा है - “इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें।“


 द्विवेदी जी ने 1899 ई॰ में श्रीहर्ष के महाकाव्य ‘नैषधीयचरितम्’ पर अपनी पहली आलोचनात्मक पुस्तक लिखी - ‘नैषध-चरित-चर्चा’। यह हिन्दी में लिखी संस्कृत साहित्य पर पहली आलोचना-पुस्तक है। इसमें उन्होंने श्रीहर्ष के समय आदि का निरूपण करते हुए उनकी कविता का यथार्थ विवेचन किया है। इस विवेचन में श्रीहर्ष की काव्य-प्रतिभा का विश्लेषण करते हुए उन्होंने उनकी कमजोरियों पर भी ऊंगली रखी है। इस पुस्तक पर कई संस्कृतज्ञ विज्ञानों ने प्रत्यालोचना लिखी। इनमें प्रमुख थे - माधव प्रसाद मिश्र। ये उस समय काशी से प्रकाशित ‘सुदर्शन’ मासिक पत्रिका के संपादक थे। इन्होंने जून, 1900 ई॰ के ‘सुदर्शन’ में ‘नैषध-चरित-चर्चा’ की लम्बी समीक्षा लिखी और महावीर प्रसाद द्विवेदी पर बहुत सारे आरोप लगाये। द्विवेदी जी ने उनके आरोपों के उत्तर एक लम्बा लेख लिखकर दिया, जो अक्टूबर, 1900 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ। द्विवेदी जी का यह लेख संस्कृत-साहित्य के उनके गहन अध्ययन एवं संस्कृत-साहित्य के देशी-विदेशी विद्वानों के शोध-पूर्ण कार्यों का व्यौरा देने वाला है। फिर उन्होंने लगातार संस्कृत-साहित्य का अन्वेषण, विवेचन और मूल्यांकन किया। उन्होंने संस्कृत के कुछ महान् महाकाव्यों का औपन्यासिक रूप में हिन्दी में रूपान्तर भी किया, जिनमें रघुवंश, कुमार संभव, मेघदूत, किरातार्जुनीय प्रमुख हैं। श्रीहर्ष ने  ‘नैषधीय-चरितम्’ में कुछ दिक्पालों और कलियुग को पात्र बनाया है। उन्हें कलियुग के वर्णन में कई दिलचस्प प्रसंग दिखाई पड़े, जिसे उन्होंने ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में वर्णन किया है। द्विवेदी जी श्रीहर्ष के कलियुग-प्रसंग के द्वारा वैदिक रीति-रिवाज या मान्यताओं को कलियुग यानी आज के पूंजीवादी चरित्र के बरक्स खड़ा करते हैं। दोनों में वाद-विवाद, तर्क-वितर्क होते हैं। द्विवेदी जी लिखते हैं - “इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय।“ 


 द्विवेदी जी वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए ही कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना करते हैं। कलियुग के एक प्रतिनिधि के कुछ आक्षेप वैदिक देवताओं के समक्ष इस प्रकार रखे जाते हैं - “आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ?“ फिर अगला तर्क है जाति-शुद्धि एवं कुल की निष्कलंकता-विषयक। फिर उसी संदर्भ में आगे का तर्क - “स्त्री-संसर्ग को भारी पाप समझा जाता है। तुम इन्द्र को अहल्या की याद दिला देना। जिस काम में तुम्हारे राजा का इतना उत्साह उससे तुम्हारी इतनी घृणा ! तुम पूरे राज-विद्रोही हो। पीनलकोड में राज-विद्रोहियों के लिए कितनी कड़ी सज़ा का विधान है, यह बात किसी वकील से तो पूछ लेते।“ फिर अगला तर्क सुनिए - “तुम्हारे वेद कहते हैं, पाप करने से अगले जन्म में ताप और पुण्य करने से सुख होता है। पर इस जन्म में उसका उलटा प्रत्यक्ष देख पड़ता है। अगम्यागमन से सुख होता है या नहीं ? अरे, फिर क्यों प्रत्यक्ष प्रमाण को न मानकर जन्म-जन्मान्तर की न देखी हुई कपोल कल्पित बातों पर विश्वास करते हो ? इसका कहीं ठिकाना है कि मरकर फिर जन्म होगा। ..... यज्ञों में हिंसा क्यों करते हो ..... हिंसा से पाप होता है या नहीं ? वैदिक हिंसा से पाप नहीं होता, यह विचार क्या संदेह से खाली नहीं है ?“ फिर अगला आक्षेप - “जिस तरह हो सके सुख-प्राप्ति की चेष्टा करो। .... श्राद्ध में ब्राह्मण-भोजन से मृत प्राणी की तृप्ति होती है - ये सब धूर्तों की बातें हैं। उनकी प्रतारणा के फंदे में पड़कर अपना सर्वनाश न करो। ... फूल को अगर तोड़ना ही है तो तोड़कर अपने सिर पर रक्खो - अपने ही ऊपर चढ़ाओ। पत्थरों पर क्यों उन्हें चढ़ाते फिरते हो ? वाह री तुम्हारी मूर्तिपूजा ! ... अरे मूर्खों, वेदों में और अधिक क्या रक्खा हुआ है ? फिर उनपर इतनी श्रद्धा क्यों ? ..... तुम लोग तो पशुओं से भी गये-बीते जान पड़ते हो, क्योंकि ब्रह्मा आदि देवताओं और व्यास आदि द्विजों के बनाये ग्रंथों पर तुम आँख मूँदकर विश्वास करते हो। उन्होंने लिख दिया है - ‘गो प्रणमेत्’ अर्थात् गाय को नमस्कार करना चाहिए। बस, तुम लगे पशुओं के सामने हाथ जोड़ने। अरे क्या तुम गाय, भैंस से भी तुच्छ हो जो किसी के कहने मात्र से उनको नमस्कार करने दौड़ते हो ? क्यों तुम व्यर्थ दान देते फिरते हो ? दान देने से लक्ष्मी प्रसन्न नहीं होती .... बलि ने सर्वस्व दान देकर क्या पाया ? केवल बंधन ! क्या तुम भी यही चाहते हो ?“ इस प्रकरण के अंत में यह संदेश: इन सब ढकोसलों को छोड़ों। ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ का अंतिम प्रसंग कलियुग का निषध देश के भ्रमण का है, जहाँ वह वैदिक कर्मकाण्ड के नाम पर ऐसे-ऐसे घृणित और कुत्सित कर्म होते हुए देखता है कि उसके मन में यह विचार उठता है - यह क्रिया-काण्ड तो भाँड़ों का अकांडतांडव है। अश्वमेध-यज्ञ में, यजमान की पत्नी को, अश्व के प्रजोत्पादक अंग से, अपने अवयव-विशेष का संस्पर्श कराना पड़ता है। ... जिन वेदों में इसतरह की बातें हैं उनका कर्ता ईश्वर कदापि नहीं हो सकता। हाँ, किसी भाँड़ ने उन्हें बनाया हो सकता है।


 द्विवेदीजी श्रीहर्ष के कलियुग-प्रसंग का वर्णन कर वही अपनी पुरानी धारणा को दुहरा रहे थे - वेद ईश्वर निर्मित नहीं हैं। उनमें जो धर्म-कर्म, रीति-रिवाज, यज्ञ, देवी-देवता का चित्रण है, वह मात्र ऐतिहासिक दृष्टि से जानने-समझने के लिए - आचरण करने के लिए नहीं। जो लोग सनातन-धर्म की दुहाई वेदों को लेकर किया करते हैं, उन्हें वेदों के संबंध में द्विवेदी जी के किये गये विचारों को गहराई से समझना चाहिए। उनके इस तरह के क्रांतिकारी विचारों के कारण ही उन्हें नास्तिक कहा जाता था। अपने समय के संस्कृतज्ञ विद्वानों के इस आक्षेप का उत्तर वे ‘कथऽहम् नास्तिक’ शीर्षक संस्कृत भाषा में लिखी कविता में दे चुके थे। इसी संदर्भ में उनकी ‘विधि-विडम्बना’ कविता को भी पढ़ना चाहिए। वे तथाकथित देव-वाणी ही नहीं, ईश्वर की भी आलोचना करते हैं और अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हैं। ‘विधि-विडम्बना’ कविता ‘सरस्वती’ के मई 1901 ई॰ में प्रकाशित हुई थी। यह कविता ब्रह्मा या विधाता की आलोचना बड़े ही तीखे स्वर में करती है। इसके प्रारम्भ की ये पंक्तियाँ -


अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार

क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार।


 आगे उन्होंने विधाता की विडम्बनाओं का मजाक उड़ाते हुए सृष्टि-रचना में हुई गड़बड़ियों को विनोद के लहजे में प्रस्तुत किया है -


नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं,

सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ?

घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ?

चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक।

दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है,

कुत्सित-कम्र्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है।

मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार !

तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !!

शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, 

लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार !


 इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार ! 


 द्विवेदी जी को इसीलिए नास्तिक कहा जाता था और वह भी उनके प्रांरभिक साहित्यिक जीवन के समय ही। द्विवेदी जी की कविताओं में भी एक तीखा आलोचनात्मक स्वर जगह-जगह दिखलाई पड़ता है। उनकी अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में उस समय के लेखकों का भरपूर मजाक उड़ाया गया है -


शब्द-शास्त्र है किसका नाम ?

इस झगड़े से जिसे न काम,

नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है।

इधर-उधर से जोड़-बटोर, 

लिखते हैं जो तोड़-मरोड़,

इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं।

अपनी पुस्तक की सानन्द

स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द,

अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं

निज मुख से जो गुण विस्तार

करते सदा पुकार-पुकार,

ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं।

किसी समालोचक के द्वार

सिर घिस-घिसकर बारम्बार

निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं।


 द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।

 ऐसा अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। और इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी।


 द्विवेदी जी अपने अन्य समकालीन कवियों की तरह प्रारम्भ में ब्रजभाषा में कविताएँ लिखते थे। जिस ब्रजभाषा में शंृगार और भक्ति की कविताओं की एक समृद्ध परम्परा रही है, उसमें उन्होंने पहले-पहल यथार्थवादी कविताएँ लिखीं। ‘भारत-दुर्भिक्ष’ (1897) एवं ‘त्राहि ! नाथ !! त्राहि !!!’ (1897) ऐसी ही कविताएँ हैं। इन कविताओं में जीवन-यथार्थ का दारुण चित्रण हुआ    है -


गली-गली कंगाल पेट पर हाथ दोऊ धरि धावैं,

अन्न अन्न पानी पानी कहि शोर प्रचण्ड मचावैं।

बालक, युवा, जरठ, नारी, नर भूख-भूख कहि गावैं,

अविरल अश्रुधार आँखिन ते बारंबार बहावैं।


 अब इस तरह के चित्रण का निराला की ‘भिक्षुक’ आदि कविताओं से मिलान कर देखिए। इसी क्रम में आगे की पंक्तियाँ -


मिलै घास भूसा नहि ढूँढ़े मूसा घर तजि भागे

रूपिया अश्व, अठन्नी महिष, बैल चवन्नी लागे।


 द्विवेजी जी की खड़ी बोली हिन्दी में लिखी पहली कविता है - ‘प्लेगस्तवराज’। यह गद्य में लिखी हुई हिन्दी की भी पहली कविता है। यह बेहद आश्चर्य का विषय है कि द्ववेदी जी खड़ी बोली हिन्दी में जो पहली कविता लिखते हैं, वह गद्य में और उसे कविता मानते हुए अपने कविता-संग्रह ‘काव्य-मंजूषा’ में स्थान भी देते हैं। इस कविता को बालमुकुन्द गुप्त ने 19 मार्च, 1900 ई॰ के ‘भारत मित्र’ में प्रकाशित किया था। गुप्त जी को यह बहुत पसंद भी था। उन्होंने लिखा है - “जितने लेख आपने ‘भारत मित्र’ में लिखे उन सबमें यही हमें पसंद आया और इसी की बाहर से भी प्रशंसा हुई।“ यानी ‘प्लेगस्तवराज’ कविता को उस समय काफी ख्याति मिली थी। इस कविता का विषय तो शीर्षक से ही स्पष्ट है। अब सवाल यह उठता है कि प्लेग नामक महामारी का स्तवन क्यों किया गया ? स्तोत्र-काव्य की संस्कृत में एक लम्बी परम्परा है। स्वयं द्विवेदी जी ने स्तोत्र-काव्य लिखे थे। पर यह किस प्रकार का स्तोत्र-काव्य है ? प्लेग की महिमा एवं उसके गुणों का गान करने से भाषा में एक विशेष प्रकार की भंगिमा पैदा हो गयी है, जिसका दर्शन हिन्दी में पहली बार इस कविता में दिखलाई पड़ता है। प्लेग की स्तुति करते हुए कहीं-कहीं अंग्रेजी राज की छवि उजागर होने लगती है, वह क्या अनायास है ? ये पंक्तियाँ देखिए - “आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना  प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। .... “ (यहाँ अरबी शब्द ‘नक़ीब’ का प्रयोग द्विवेदी जी ने किया है, जिसका अर्थ है - वह व्यक्ति जो किसी राजा-महाराजा की सवारी के समय आगे-आगे आवाज़ लगाते चलता है।) यह कविता संस्कृत से शुरू होती है और संस्कृत में ही समाप्त। बीच में हिन्दी रूप है। भारत में अंग्रेजीराज के स्थापित होने के बाद अकाल और महामारी पूरे हिन्दुस्तान में बहुत अधिक बढ़ गया था। इसके फलस्वरूप 19वीं शताब्दी में ही पचास लाख से अधिक भारतीय मर गये थे। द्विवेदी की ‘भारत दुर्भिक्ष,’ ‘त्राहि ! नाथ !! त्राहि !!!’ तथा ‘प्लेगस्तवराज’ कविताओं में अकालपीड़ित और महामारी ग्रस्त वैसे ही हिन्दुस्तान का यथार्थ चित्रण है। अंग्रेजी राज में सामान्य भारतीय जनता लगातार भूख और कुपोषण का शिकार हो रही थी। उसकी दरिद्रता के पीछे यह कारण था -


धड़ाधड़ धार रूपयों की बही है

विलायत ओर सीधी जा रही है


 ये पंक्तियाँ ‘स्वदेशी वस्त्र का स्वीकार’ कविता की हैं, जो ‘सरस्वती’ के जुलाई, 1903 ई॰ के अंक में प्रकाशित हुई थी। इसमें द्विवेदी जी बताते हैं कि असगर, विसेसर और काली जैसे श्रमजीवी इसलिए मर रहे हैं क्योंकि ग्राँट, ग्राहम और राली जैसे अंग्रेज अपना घर भर रहे हैं -

महा अन्याय हा हा हो रहा है !

कहें क्या कुछ नहीं जाता कहा है।

मरें असगर, विसेसर और काली,

भरे घर, ग्रांट, ग्राहम और राली।

 द्विवेदी जी की साम्राज्यवादी विरोधी चेतना यहाँ मुखर रूप में प्रकट हुई है, जबकि ‘प्लेगस्तवराज’ में यह चेतना मौन रूप में विद्यमान है।

 द्विवेदी जी ने बाल कविताएँ भी लिखी हैं। इन कविताओं की भाषा सहज और सरल है। ऐसी ही एक कविता है - ‘प्यारा वतन’। इसकी कुछ पंक्तियाँ देखें - 


 “कच्चा घर जो छोटा सा था

 पक्के महलों से अच्छा था 

 पेड़ नीम का दरवाजे पर, 

 सायबान से था वह बेहतर

 सब्ज खेत जो लहराते थे

 दिल को वे कैसे भाते थे

 फर्श मखमली जो बिछते हैं

 नहीं मुझे अच्छे लगते हैं।“


 प्रायः द्विवेदी-युग की कविताओं को इतिवृत्तात्मक कहकर विद्वानों ने चलता कर दिया है। ऐसे विद्वानों ने यह नहीं गौर किया कि ये आधुनिक युग के प्रारम्भिक चरण की कविताएँ हैं और आगे की कविता के प्रायः कई तत्त्व इनमें विद्यमान हैं। डाॅ॰ रामविलास शर्मा ने छायावादी कवियों, और खासकर निराला की कविता के वे स्रोत ढूँढ़ निकाले हैं, जो द्विवेदी जी के यहाँ मूल रूप से विद्यमान हैं। परवर्ती आलोचकों में डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव भी इस बात को स्थापित करते हुए लिखते हैं - “साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था।“


 द्विवेदी जी की कविताओं का ऐतिहासिक महत्त्व है। बीसवीं शताब्दी की कविता की भित्ति इन कविताओं की नींव पर ही खड़ी हुई है। उनकी कविताओं से उनकी मनःस्थितियाँ, विचारधारा एवं भावधारा का भी पता चलता है। उन्होंने आधुनिक कविता को न केवल ब्रजभाषा से मुक्त किया, वरन् शंृगार, अलंकार, समस्यापूर्ति और नायिका-भेद की पुरानी परिपाटी को ध्वस्त कर आधुनिक कविता के निर्माण के लिए एक साफ-सुथरे यथार्थवादी एवं प्रगतिशील रास्ते का निर्माण किया।


5

 महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आधुनिक भावबोध की कविताएँ लिखने के साथ ही अपने वैचारिक निबन्धों के द्वारा आधुनिक युग की कविता के लिए पृष्ठभूमि तैयार की थी। इस सन्दर्भ का उनका पहला वैचारिक निबन्ध ‘कवि-कत्र्तव्य’ जुलाई, 1901 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ। वे इस निबन्ध में कविता के छन्द, भाषा, अर्थ और विषय पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। इस सन्दर्भ में उनका पहला और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विचार यह है कि गद्य और पद्य दोनों में कविता हो सकती है। कविता का लक्षण जहाँ कहीं पाया जाये, चाहे पद्य में, चाहे गद्य में, वहीं कविता है। फिर वे हिन्दी के कवियों से नये-नये छंदों को अपनाने का आग्रह करते हैं। जिन छंदों में पहले ही विपुल कविताएँ हो चुकीं, उनके अलावा संस्कृत और उर्दू में भी कई लोकप्रिय छंद हैं, जिन्हें हिन्दी के कवियों को अपनाना चाहिए। वे हिन्दी कवियों से तुकों के बन्धन को छोड़ने का भी आग्रह करते हैं। वे कविता की भाषा सरल, बोधगम्य और बातचीत के स्तर पर रखने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि गद्य और पद्य की भाषा भी एक ही होनी चाहिए। तात्पर्य यह कि कविता की भाषा अब ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली होनी चाहिए। वे कविता के भाव या अर्थ के संदर्भ में कहते हैं कि अर्थ-सौरस्य ही कविता का प्राण है। यदि यह है तो छंद-अलंकार के बिना भी कविता की सार्थकता है। वे कविता के दो प्रमुख उद्देश्य स्वीकार करते हैं - मनोरंजन और उपदेश। कविता में कोई न कोई संदेश अवश्य होना चाहिए, जिससे समाज को आवश्यक दिशा-निर्देश मिले एवं उसे पढ़ते हुए आनंद या मनोरंजन भी हो। ‘कवि-कत्र्तव्य’ का दूसरा भाग जनवरी, 1911 ई॰ की ‘सरस्वती’ में ‘कवि का कत्र्तव्य’ शीर्षक से ‘विद्यानाथ’ छद्मनाम से प्रकाशित हुआ था। इसमें भी वे कहते हैं - “कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है।“  इस तरह वे ‘कला कला के लिए’ सिद्धांत को खारिज करते हैं। फिर वे कविता को ग्रहण करने के लिए ‘सहृदय’ की बात करते हैं। हिन्दी के कवियों का उल्लेख वे इन शब्दों में करते हैं - “कवि भी ‘धर्म-संस्थापनार्थाय’ उत्पन्न होते हैं। उनका काम केवल तुक मिलाना या ‘पावस पचासा’ लिखना ही नहीं। तुलसीदास ने कवि होकर वैष्णव धम्र्म की स्थापना की है, मत-मतान्तरों का भेद मिटाया है और ‘ज्ञान के पंथ को कृपाण की धार’ बताया है। प्रायः उसी प्रकार का काम, दूसरे रूप में सूरदास, कबीर और लल्लूलाल ने किया है। हरिश्चन्द्र ने शूरता, स्वदेश-भक्ति और सत्य, प्रेम का धम्र्म चलाया है। ...... हिन्दी के जितने प्रसिद्ध कवि हैं उन्होंने देश, काल, अवस्था और पात्र के अनुसार ही कविता की है।


 दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में उनका ‘कविता’ शीर्षक निबन्ध छपा। इसमें वे कविता को और गहराई से समझने का प्रयत्न करते हैं - “अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक।“ आगे वे ‘रामचरितमानस’ एवं श्रीधर पाठक के ‘एकांतवासी योगी’ की पंक्तियों का उदाहरण लेकर अपनी बातों को आगे बढ़ाते हैं। वे कहते हैं - “अन्तःकरण में रस उत्पन्न करके, और थोड़ी देर के लिए और बातों को भुलाकर, उदार विचारों में मन को लीन कर देना ही कविता का सच्चा पर्यवसान है। कविता द्वारा यह भासित होना चाहिए कि जो बात हो गई है वह अभी हो रही है, और जो दूर है वह बहुत निकट दिखलाई देती है।“ इस लेख के अंत में वे कविता की विशेषताएँ बताते हुए कहते हैं कि कविता में विश्रांति मिलती है। वह एक प्रकार का विराम-स्थान है। उससे मनोमालिन्य दूर होता है और थकावट कम हो जाती है। चक्की पीसते समय स्त्रियाँ, काम करने में मजदूर आदि परिश्रम कम होने के लिए, गीत गाते हैं। जैसे मनुष्यों के लिए गाने की जरूरत है, वैसे ही देश के लिए कविता की जरूरत है। प्रतिदिन नये-नये गीत बनते हैं और सब कहीं गाये जाते हैं। इसी नियमानुसार देश में समय-समय पर नयी-नयी कविताएँ हुआ करती हैं।


 यहाँ द्विवेदी जी ‘नयी कविता’ का प्रयोग कर रहे हैं। तात्पर्य यह कि हर समय कविताओं में नवीनता की उद्भावना आवश्यक है। कविता में रूप और वस्तु के स्तर पर परिवर्तन होते रहता है। एक समय की कविता अपनी पूर्ववर्ती कविता से नवीन होती है। यह नवीनता समय और जीवन के बदल जाने की द्योतक होती है। यहाँ आकर कविता का रूप काफी परिवर्तित हो जाता है। ‘कवि और कविता’ निबन्ध में वे बताते हैं कि कविता-प्रणाली के बिगड़ जाने पर यदि कोई नये तरह की स्वाभाविक कविता करने लगता है तो लोग उसकी निन्दा करते हैं। कुछ नासमझ और नादान आदमी कहते हैं, यह बड़ी भद्दी कविता है। कुछ कहते हैं यह कविता ही नहीं है। कुछ कहते हैं कि यह कविता तो ‘छन्दोदिवाकर’ में दिये गये लक्षणों से च्युत है, अतएव यह निर्दोष नहीं। बात यह है कि जिसे अब तक कविता कहते आये हैं, वहीं उनकी समझ में कविता है और सब कोरी काँव-काँव ! इसी लेख में आगे वे स्थापित करते हैं कि कविता और पद्य में अन्तर होता है। “किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। “जिस कवि में प्राकृतिक दृश्य और प्रकृति के कौशल देखने और समझने का जितना अधिक ज्ञान होता है वह उतना ही बड़ा कवि भी होता है।


 द्विवेदी जी ने ‘कविता’ शीर्षक निबन्ध में यह उल्लेख किया है कि देश में जैसे-जैसे सुधार अधिक होता है और विद्या-बुद्धि बढ़ती जाती है, वैसे ही वैसे कविता-शक्ति कम होती जाती है। रामचन्द्र शुक्ल ने इस बात को कुछ शब्द बदल कर रखा है कि सभ्यता के विकास के साथ कवि-कर्म मुश्किल होता जाता है। परन्तु द्विवेदी जी ने आगे चलकर इस मत का संशोधन किया है। उन्होंने कविता पर सबसे महत्त्वपूर्ण विचार ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में प्रस्तुत किया है, जो सितम्बर, 1920 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ था। इस निबन्ध में भारतीय एवं यूरोपीय कविता की परम्परा का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि जीवन की किन परिस्थितियों में एक खास प्रकार की कविता का जन्म होता है। समय के परिवर्तन के साथ कविता के भावों, विचारों और ढाँचों में भी अन्तर होता जाता है। भाषा की उन्नति के साथ-साथ कविता की भी उन्नत्ति होती है। विज्ञान के विकास से कला का ह्रास नहीं, प्रत्युत वृद्धि होती है। परन्तु कविता का सत्य विज्ञान या दर्शन का सत्य नहीं है और न उसमें वह सत्य है, जो किसी धर्म या मत विशेष से स्पष्ट किया जाता है। इसमें सत्य का प्रकाश कुछ दूसरी ही रीति से होता है। 


 पहले द्विवेदी जी मानते थे कि कविता का उद्देश्य मनोरंजन और शिक्षा देना है। परन्तु इस निबन्ध में वे अपने पुराने मत का संशोधन करते हुए कहते हैं, “कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे।“ यहाँ द्विवेदी जी मानो भावी स्वच्छंदतावादी या छायावादी कविता की पृष्ठभूमि तैयार करते-से लगते हैं। इस निबन्ध के अंत में वे भावी कविता के स्वरूप पर विचार करते हैं। वे कहते हैं कि जब भावों की वृद्धि होती है तब भाषा में रूपान्तर होता है। जब कोई भाषा भाव ग्रहण करने में असमर्थ होती है, तब उसका अन्त हो जाता है और उसका आसन दूसरी भाषा ले लेती है। यही कारण है कि भाषा एक-सी कभी नहीं रहती। 


 यहाँ द्विवेदी जी का आशय भाषा के स्वरूप से है। यानी हर युग की कविता एक नये प्रकार का शब्द-विन्यास, एक नयी अभिव्यंजना या सर्जना, अन्ततः एक नयी भाषा लेकर प्रकट होती है। “प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शंृगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का।“ यह है कविता की प्राचीन परम्परा। इसके बाद कविता के भावी स्वरूप पर वे प्रकाश डालते हैं। “बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स$अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है।“ यह है छायावादी कविता की विशेषता, जो उस वक्त शुरू ही हुई थी। 


 इस निबन्ध के अंत में भावी यथार्थवादी एवं प्रगतिशील कविता का सौंदर्यशास्त्र प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं - “अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा।“ यहाँ द्विवेदी जी ने ‘साधारण के सौंदर्य’ के उद्घाटन की जो बात कही है, वह उनके समय से बहुत आगे की बात है। द्विवेदी जी की इस स्थापना का श्रोत स्वयं उनका जीवन है। वे जहाँ एक ओर अपने समय में अपने विचारों के द्वारा एक युगान्तर उपस्थित कर हिन्दी भाषी क्षेत्र की जनता में नवजागरण की शुरुआत कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर किसानों के जीवन से घनिष्ठ रूप में जुड़े हुए थे। ‘सरस्वती’ के सम्पादन से अवकाश लेने के बाद उन्होंने अपने इलाके में ग्राम-पंचायत की स्थापना की थी और उसके सरपंच के रूप में किसानों की समस्याओं से गहराई से जुड़े रहे।

 ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में जो स्थापना द्विवेदी जी ने की है, उसी को रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में शब्द बदल कर रखा है। द्विवेदी जी के शब्द हैं - “क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं।“ अब रामचन्द्र शुक्ल के शब्द देखें - “देश में मुसलमानों का राज्य स्थापित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव-गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश न रह गया। ... इतने भारी राजनीतिक उलटफेर के पीछे हिन्दू जनसमुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी सी छाई रही। अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करूणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था ?“ हालाँकि इस स्थापना का खण्डन कई इतिहासकार कर चुके हैं। पर यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह स्थापना द्विवेदी 1920 में कर रहे थे, जिसे 1929 के इतिहास में शुक्ल जी दुहरा रहे थे।


 द्विवेदी जी के बहुत सारे विचार और काम आज भले ही अप्रासंगिक लग सकते हैं, परन्तु उनके समय में वे कितने क्रांतिकारी थे, यह हिन्दी साहित्य के इतिहास में गहरे उतरने वाले ही समझ सकते हैं। उनका एक प्रारम्भिक निबन्ध है -‘नायिका भेद’, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था। इसमें वे बताते हैं, “राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं।“ 


 द्विवेदी जी के समय की कविता की एक स्थिति तो यह थी, दूसरी समस्यापूर्ति की थी। उनके समय में ही उर्दू वालों की नकल पर कवि-सम्मेलनों की शुरुआत हो चुकी थी, जिससे कविता की पतनशीलता और बढ़ गयी। जनवरी, 1926 ई॰ में कविकिंकर नाम से महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक एक लेख लिखा। इसके प्रारम्भ में वे महान् कवियों की विशेषता बताते हुए कहते हैं, “प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है।“ लेकिन इसके उलट बहुत सारे या बहुतायत में कवि थे जो समस्यापूर्ति, नायिका-भेद एवं शंृगारिकता की धारा बहा रहे थे और ऐसी कविताएँ कवि-सम्मेलनों का आधार थीं। द्विवेदी जी कहते हैं, “अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है।“ 


 इन कवि-सम्मेलनों में एक प्रवृत्ति और जोर मारती हुए फिर से दिखाई पड़ने लगी थी और वह थी ब्रजभाषा की रीतिवादी कविता की पुनस्र्थापना। वे इस पर प्रहार करते हुए कहते है, “ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं।“


 द्विवेदी जी के समय में ही कवियों में दलबन्दी शुरू हो गयी थी। ऐसे कवियों पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं, “कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े।“ फिर वे भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं, “दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ?“ आज हिन्दी के साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों में दलबन्दी की स्थिति चरम पर है। क्या इससे साहित्य और देश का भला हो सकता है ? मई, 1927 ई॰ की ‘सरस्वती’ में द्विवेदी जी का ‘आजकल के हिन्दी-कवि और कविता’ शीर्षक प्रसिद्ध निबन्ध सुकविकिंकर छद्म नाम से छपा था, जिसमें छायावाद के नाम से प्रचलित रहस्यवादी, नकली एवं छद्म कविता की आलोचना है।


साभार भारत यायावर  सर

भारत यायवर / chandreshwrn

 विनम्र श्रद्धांजलिः नहीं रहे हिन्दी के मूर्धन्य कवि-गद्यकार भारत यायावरa

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मेरे बहुत ही प्रिय, अग्रज समान, हिन्दी कवि,जीवनीकार

,संपादक,आलोचक व विनोबा भावे विश्वविद्यालय ,हज़ारीबीग,झारखंड में हिन्दी के हाल 

ही में, बमुश्किल कोई 22 दिन पहले अवकाशप्राप्त करने वाले प्रोफेसर भारत यायावर  नहीं रहे | इधर उनसे मेरा निरंतर मोबाइल एवं सोशल मीडिया के ज़रिए संपर्क-संवाद बना हुआ था | उनसे मेरी पहली मुलाक़ात जून 1992 में जलेस के बिहार राज्य सम्मेलन में हज़ारीबाग में हुई थी | तारीख़ भूल रहा हूँ | उस सम्मेलन में 'हंस' के संपादक प्रख्यात कथाकार-विमर्शकार राजेन्द्र यादव,जनवादी कहानीकार-उपन्यासकार इसराइल,समकालीन चर्चित कथाकार संजीव,प्रख्यात आलोचक डॉ.चंद्रभूषण तिवारी व डॉ.नंदकिशोर नंदन आदि शामिल हुए थे | उसी सम्मेलन में  आरा के सुपरिचित जनवादी  कहानीकार डॉ.नीरज सिंह को जलेस का प्रांतीय सचिव चुना गया था और डॉ.चंद्रभूषण तिवारी कुल एक दशक तक बिहार के सचिव पद पर सक्रिय रहकर उसके दायित्व से अलग हुए थे | वे प्रथम व संस्थापक सचिव थे | उनदिनों मैं बेरोज़गार था और नवंबर,1991 में 'भारत में जन नाट्य आंदोलन' पर पी-एच.डी. कर वल्लभ विद्यानगर से अपने गाँव लौटा था | इस सम्मेलन के कुछ दिन पहले ही 15 मई,1992 को मुझे दूसरे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी | जो हो,मेरे शोधनिर्देशक थे प्रसिद्ध आलोचक डॉ.शिवकुमार मिश्र | 

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बहरहाल,इधर मैंने भारत यायावर जी को जून,2021में Rashmi Prakashan Lucknow से प्रकाशित अपना तीसरा कविता संग्रह 'डुमराँव नज़र आएगा' भेजा था तो उन्होंने तत्काल मोबाइल पर बधाई दी थी और कहा था कि इसपर आगे विस्तार से लिखूँगा | एक फ़ेसबुक पर छोटी टिप्पणी भी लिखी थी |

वे बहुत ही ज़िंदादिल व विनोदी स्वभाव के इंसान थे | वे रेणु की जीवनी लिख रहे थे | वे नामवर सिंह की जीवनी पर भी काम कर चुके थे | वे महावीर प्रसाद ग्रंथावली संपादित कर चुके थे | वे लेखन के मोरचे पर सतत सक्रिय थे | वे अंतिम सांस तक लेखन से जुड़े रहे | कल जब उन्होंने अपने अस्वस्थ होने की ख़बर फ़ेसबुक पर दी तो मैंने उनके स्वस्थ होने के लिए शुभकामनाएँ दी थी | मैंने यह तो कदापि नहीं सोचा था कि वे इतना शीघ्र हमारे बीच से अनुपस्थित हो जायेंगे | अभी उन्होंने उमाशंकर सिंह परमार की एक हाल ही की पोस्ट पर जो मेरे संग्रह पर थी,तीख़ा कटाक्ष किया था | वे हमेशा व्यंग्य व हँसी-मज़ाक की फूलझड़ी छोड़ते रहते थे | वे अपने विरोधियों की परवाह न करते हुए सतत लिखने-पढ़ने से मतलब रखते थे | वे लेखक संगठनों की गंदी राजनीति से ऊबे हुए थे | उनका मानना था कि जो लिखता है वही लेखक होता है | देर-सबेर उसका मूल्यांकन होना ही है | सिर्फ़ लेखक संगठन की सदस्यता ग्रहण करने से कुछ नहीं होता है | 

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कहीं न कहीं वे अपनी उपेक्षा से अंदर से बेचैन थे | वे अपने जीते-जी जिस सम्मान या हक़ से जुड़े सुख को हासिल करना चाहते थे,वह अभी नहीं नहीं मिल सका था | जो हो, भारत यायावर  का इस उम्र में असमय जाना हिन्दी संसार में एक शून्य पैदा कर गया है | उनको मेरी विनम्र श्रद्धांजलि | उनके शोकसंतप्त परिवार को इस विषम दुःख को सहने की शक्ति मिले | नीचे उनकी एक टिप्पणी उनके फ़ेसबुक वॉल से दे रहा हूँ जिसमें उन्होंने #सुख पर विचार क्या है |

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" सुख क्या है?"

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भारत यायावर (23--12--2019)


हर मनुष्य का अपना अलग सुख होता है।

सुख वह अनुभूति है जो तन-मन को अच्छी लगे।

सुख वह है जो हमारे अनुकूल हो।

कामना की पूर्ति होने से जो आनन्द मिले, वह सुख है। कष्टों से छुटकारा मिलना भी सुख है।

बेचैनी से छटपटाते हुए आदमी को जब चैन मिले तो सुख है। उपयुक्त साधन का मिल जाना भी सुख है। भूखे को भरपेट भोजन मिलना उसके लिए सुख है। किसी प्रिय से अचानक भेंट हो जाना भी सुख है।

अलभ्य, अकल्पित का मिलना भी सुख है।

लेकिन विचारों की दुनिया में भटकने वाले लोगों का सुख क्या है?

एक बार हजारी प्रसाद द्विवेदी से नामवर सिंह ने पूछा ।  द्विवेदी जी ने जवाब दिया, अपने को समझा जाना सबसे बड़ा सुख है।

हर विचारक की यह पीड़ा होती है कि उसे ठीक से समझा नहीं गया। 

रचनाकार की पीड़ा होती है कि उसका ठीक से मूल्यांकन नहीं किया गया। 

अब कोई हो कि उन्हें समझ पाए और मूल्यांकन कर पाए, तभी तो उनको सुख मिलेगा। 

ज़्यादातर लेखकों को तो छपकर ही सुख मिल जाता है। 

भवानी प्रसाद मिश्र ने नए लेखकों को उत्साहित करते हुए कहा है :

      " लिखे जाओ!

       पत्र-पत्रिकाओं में दिखे जाओ!

       इतना ही काफी है

       बस है!

        छपना ही आधुनिक रस है!" 

                       🔘

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2021

शोध की खातिर किस दुनिया में ? कहां गए ?

प्रिय भारत! / शम्भू बादल 


प्रिय भारत! 

शोध की खातिर

किस दुनिया में ? 

कहां गए ?

साक्षात्कार रेणु से लेने ?

बातचीत महावीर से करने?

 त्रिलोचन - नागार्जुन से मिलने ?


 कविता - आलोचना 

जीवनी - संपादन 

ये भी तो थे साथ तुम्हारे 

इन्हें छोड़

 हमसे दूर

 बहुत दूर गए

 'चुपचाप'

अचानक यायावर


कैसी-कैसी बातें? 

किसकी - किसकी बातें? 

 साहित्य की अंत:कथा 

सच - झूठ का अंत:पुर 

खुली हंसी 

खुश की विधि 

लाएगा कौन ?

 'झेलते हुए', 'मैं हूं, यहां हूं' 

'बेचैनी', 'हाल - बेहाल'

बताएगा कौन ?


'कैसे जिंदा है आदमी' 

सवाल रख 

उत्तर जाने बिना 

अंतरलोक - यात्री

कैसे बन गए तुम ?

तुम्हारी कविता में 

कितनी बातें !

कितनी चिंता!


तुमने कहा था  

 'दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा'

और आज हो कर

 दिन को दुखी कर 

तुमने बता दिया 

    


 तुम्हारी कविता देख रहा हूं :


  दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा

                           - भारत यायावर


एक दृश्य है जो अदृश्य हो गया है

उसका बिम्ब मन में उतर गया है

मैं चुप हूँ

चुपचाप चला जाऊँगा

कहाँ

किस ओर

किस जगह

अदृश्य  !


किसी के मन में यह बात प्रकट होगी

कि एक दृश्य था

अदृश्य हो चला गया है !


अब उसके शब्द जो हवा में सनसनाते थे

किसी के साथ कुछ दूर घूम आते थे

उसके विचार कहीं मानो किसी गुफ़ा से निकलते थे

पहले गुर्राते थे

फिर गले लगाते थे

फिर कुछ चौंक - चौंक जाते थे

फिर बहुत चौंकाते थे


अब उसकी कहीं छाया तक नहीं है 

अब कोई पहचान भी नहीं है 

दृश्य में अदृश हो जाएगा 

कहीं नजर नहीं आएगा

युद्ध पीड़ित महिलाओ के दुख क़ो नया आयाम दिया है गरिमा ने / राकेश रेणु

 #माणिकचौक_1


कितने मित्रों का कर्ज़ है मुझ पर- प्रेम और भरोसे से आबद्ध! उनकी बेशक़ीमती किताबें आती हैं लेकिन अपनी काहिली में  उन पर दो शब्द भी नहीं लिख पाता। ख़ुद इस स्थिति को स्वीकार नहीं कर पा रहा। मेरे भीतर के क़ाहिल को अपनी तंद्रा तोड़नी होगी। भरोसे पर खरा उतरना होगा। इसलिए तय किया है कि इस पेज पर साथियों की किताबों में से पसंदीदा की थोड़ी-थोड़ी ही सही, चर्चा करता रहूँगा। इनमें अभी-अभी साया हुई किताबें होंगी और कुछ थोड़ी पुरानी भी, जैसेकि चार साल क़बल, 2017 में प्रकाशित प्रोफ़ेसर गरिमा श्रीवास्तव की ‘देह ही देश’ जिसे उन्होंने क्रोएशिया प्रवास डायरी कहा है। कहने को इस किताब के प्रकाशन के चार साल पूरे होने को हैं लेकिन इसकी चर्चा आज भी है, लंबे समय तक रहेगी क्योंकि इस तरह की पृष्ठभूमि वाली किताबें हिन्दी में कम ही लिखी जाती हैं।


‘देह ही देश’ को केवल डायरी कहना पर्याप्त नहीं है, इसे सीमित करना है। यह जितनी डायरी है उतना ही यात्रा वृत्तांत, जितनी आत्मकथा है उतना ही पत्र संवाद, जितनी स्मृति है उतनी ही पत्रकारिता। यह कुछ और ही चीज है- विरल रूप से तरल और सरल। सीधे हृदय में समाती, दुनियाभर का साक्षात्कार कराती, दुःख से संवाद करती, एकाकार कराती। लेखिका के ज़ेहन में वे सब चीज़ें हैं - कविता, कहानी, समालोचना, इतिहास और विमर्श - वे सबको साथ लेकर चलती हैं जो आमतौर पर स्त्रियों की ख़ूबी होती है। 


विद्वान कहते हैं, अनुभूति पहले आती है भाषा उसके बाद और अभिव्यक्ति उसके भी बाद। यह जो गहराई है इस पुस्तक की, अनुभूति की गहराई है, भाषा जिसे अभिव्यक्त करती है। लेखिका क्रोएशिया और बोस्निया हर्जेगोविना की युद्ध पीड़ित, बलत्कृत और तरह-तरह से दमित स्त्रियों की पीड़ाओं से इस क़दर बोसीदा हैं कि दर्द उनकी भाषा और अभिव्यक्ति में स्वत: चला आया है - पढ़ने वाले को भीतर तक भिंगोता, नम करता। वह स्वयं उस पीड़ा में डूबती-उतराती रहीं, इस हद तक कि बार-बार उनके अवसादग्रस्त हो जाने की आशंका पैदा हुई। अजनबी देश में अध्यापक-समालोचक की प्रचलित प्रकृति से अलग जैसा शोधपूर्ण लेखन उन्होंने किया है और उसके लिए जो यात्राएँ की, जिन-जिन जगहों पर गयी, मिलीं लोगों से, वे भी उनकी इसी गहरे इन्वॉल्मेंट की कहानी कहती हैं।


क्रोएशियाई बोस्नियाई स्त्रियों की यह लोमहर्षक गाथा ‘देह ही देश’ का मुख्य प्रतिपाद्य है। पुस्तक का तीन चौथाई और लेखिका के प्रवास के तीन चौथाई हिस्से की डायरी इनके वृत्तांतों और निहितार्थों से भरी है। लेखिका का स्त्री मन-मस्तिष्क इन स्त्रियों के मार्फ़त न केवल उनके मूल देश भारत, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप, एशिया और उससे भी बढ़कर पूरे विश्व की स्त्रियों की दशा का, उनके प्रति पितृसत्तात्मक समाज दृष्टि का विश्लेषण करता है।


किताब की पृष्ठभूमि में क्रोएशिया की राजधानी है जहाँ रहते हुए लेखिका योरोप के अल्पज्ञात पक्षों से अवगत होती हैं, 1992 से ’95 तक चले सर्बिया-क्रोएशिया-बोस्निया हर्ज़ेगोविना युद्ध के दौरान हुए अकल्पनीय दमन से अवगत होती हैं। इस युद्ध में सर्बियाई सैनिकों की बर्बरता जैसा दूसरा उदाहरण आधुनिक विश्व इतिहास में नहीं है। इस कल्पनातीत जेनोसाइड के मूल में अंध राष्ट्रवाद है, दूसरी राष्ट्रीयताओं को घृणित और त्याज्य मानने की प्रवृत्ति। इतिहास बार-बार हमें सावधान करता है कि राष्ट्रवाद की अति ऐसी ही विध्वंसक स्थितियाँ पैदा करती है। क्रोएशिया और बोस्निया के ख़िलाफ़ युद्ध का एकमात्र मक़सद क्रोएशियाई और बोस्नियाई लोगों, ख़ासकर मुसलमानों के जीवन को इतना दूभर बना देना था कि वे अपने घर, खेत, खलिहान छोड़कर भाग जाएँ जिससे कि बृहत्तर सर्बिया का सपना पूरा हो सके। 


दुनिया का इतिहास गवाह है कि सारे युद्ध स्त्रियों की देह पर ही लड़े गए। वही उनकी पहली और आख़िरी भोक्ता होती हैं। योद्धाओं का पौरुष औरतों के दमन से तुष्ट होता है। योद्धाओं का ही क्यों, पुरुष मात्र का! गहरी पीड़ा से भरकर गरिमा कहती हैं, ‘ऐसा क्यों होता है, युद्ध कहीं हो, किसी के भी बीच हो, मारी तो जाती हैं औरतें ही।’ और, ‘स्त्रियों की देह पर नियंत्रण करना युद्ध नीति का ही एक हिस्सा होता है जिससे तीन उद्देश्य सधते हैं - पहला, आम नागरिकों में भय का संचार, दूसरा नागरिकों का विस्थापन और तीसरा सैनिकों को बलात्कार की छूट देकर पुरस्कृत करना।’


बोस्निया सरकार ने इस युद्ध के दौरान 50,000 स्त्रियों के यौन शोषण की रिपोर्ट दी जबकि यूरोपियन यूनियन के जाँच कमीशन ने लगभग 20,000 से ऊपर स्त्रियों को बलत्कृत-घर्षित किए जाने की संख्या को प्रामाणिक माना। उन स्त्रियों को अकल्पनीय दैहिक शोषण और अमानवीय यातनाओं से दरपेश होना पड़ा। प्रतिरोध करने वाली स्त्रियों के स्तन काट लिए गए, अंग-भंग किया गया, यातना दे-दे कर मार डाला गया। यंत्रणादायी जीवन जीते हुए अनेक की मौत हो गई, अन्य अनेक पागल हो गईं या देह बाज़ारों में पहुँच गईं अथवा उन्हें देह व्यापार को ही अपना पेशा बनाना पड़ा। कुछ स्त्रियों ने अपने आत्मबल की बदौलत नए सिरे से जीवन आरंभ करने का संकल्प लिया हालाँकि अतीत की स्मृतियाँ उनका पीछा नहीं छोड़तीं। लेखिका खोज-खोजकर ऐसी स्त्रियों से मिलती हैं, उनकी कथाएँ जानने की कोशिश करती हैं और उन्हें अपनी डायरी का हिस्सा बनाती हैं। कुछ भी हो, अमानवीयता की शिकार हुई स्त्रियों की वास्तविक संख्या घोषित संख्या से कहीं बड़ी है।


प्रवास काल का पहला चौथाई दिसंबर (संभवतः 2008) से आरंभ होकर मई (संभवतः 2009) तक का समय है। इस अंश में लेखिका अपने देश से बाहर एक यूरोपीय देश की संस्कृति और समाज को समझने का यत्न करती हैं, बार-बार अपने देश से उनकी तुलना करती हैं। उनका संवेदनशील मन लौट-लौट आता है अपने देश, शांतिनिकेतन के कुंजों और भारत के दूसरे शहरों की गलियों में जहाँ से उनकी स्मृतियाँ जुड़ी हैं। दोनों भूभागों की आबोहवा, संस्कृति, लोग, रहन-सहन के तौर तरीक़ों के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश प्रवास काल और पुस्तक के पहले चौथाई का मुख्य प्रतिपाद्य है। एक प्रकार से इस पहले चौथाई में पर्याप्त विविधता है। इसमें लेखिका का स्त्री विमर्शकार है, उसका बहुपठित और बहुभाषी व्यक्तित्व है जो बांग्ला भाषा और कवींद्र रवींद्र से उनका लगाव है जो अनेक रूपों में - कविताओं और गाथाओं मैं प्रकट होता है। इसी चौथाई हिस्से में सिमोन-द-बोउवार हैं और जो लोग उन्हें नहीं जानते अथवा कम जानते हैं उनके लिए सिमोन के लेखन के साथ-साथ उनके व्यक्तिगत जीवन से अवगत कराने वाली झलकियाँ भी हैं।


‘देह ही देश’ को पढ़ने के बाद विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि गरिमा श्रीवास्तव यदि स्त्री विमर्शकार न होतीं तो बेहतर कवि होतीं, यदि कथेतर न लिखतीं तो बेहतर कथाकार होतीं। लेकिन वे एक साथ यह सब हैं। ‘देह ही देश’ इसकी पुष्टि करती है। उनके ज़ेहन में वे सब चीज़ें हैं - कविता, कहानी, समालोचना, इतिहास और विमर्श - वे सबको साथ लेकर चलती हैं जो आमतौर पर एक संवेदनशील विमर्शकार की ख़ूबी होती है। उन्होंने क्रोएशिया और बोस्निया की युद्ध पीड़ित स्त्रियों से के दुख को वैश्विक बनाया है और युद्ध के उद्योग को, युद्धों की तिजारत करने वाले लोगों को बेनक़ाब किया है।



👍🏼✌🏼👌

भारत यायावर का जाना / विजय केसरी

 भारत यायावर का जाना एक बड़ी अपूरणीय क्षति है।

 संपूर्ण साहित्य जगत आज स्तब्ध है ।

भारत यायावर का संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य को समर्पित रहा।

 वे मूलत: एक कवि थे ।

उन्होंने हिंदी साहित्य की सभी विधा पर  अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की थी ।

वे एक साहित्यकार की भूमिका में सबसे अलग और निराले थे।

 उन्होंने कविता लेखन, आलोचना, संस्मरण, समीक्षा, संपादन आदि तमाम विधाओं पर जमकर काम किया ।

उन्होंने देश के जाने-माने प्रख्यात साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेनू की कृतियों को देशभर से ढूंढ कर संग्रहित कर रत्नावली  प्रकाशित कर एक अद्वितीय कार्य किया।

 उन्होंने प्रख्यात साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनावाली का  संपादन कर इतिहास रच दिया।

वे झारखंड के जाने माने साहित्यकार राधा कृष्ण की रचनाओं को भी  ढूंढ कर रचनावली के कार्य में लगे थे। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित उनकी रचनाएं प्रकाशित हो रही थी।

 एक साथ कई पत्रिकाओं के प्रधान संपादक के रूप में भी अपने दायित्व का निर्वहन सफलतापूर्वक कर रहे थे। ऐसे साहित्यकार विरले ही पैदा होते हैं।

 इनका संपूर्ण जीवन  हिंदी साधना और सेवा में बीता।

 उनके जाने से हिंदी साहित्य संसार सुना हो गया है।

 ऐसा प्रतीत होता है।

नहीं रहे भारत यायावर / मुकेश प्रत्यूष

 भारत यायावर नहीं रहे। 


आज दिन में फोन  किया। स्वीच आफ आया। अंदेशा हुआ शायद अस्पताल गए  हों लेकिन  शाम होते-होते उनके निधन की सूचना आ गई।  


वर्षों से रात में दस बजे के बाद यह कहते हुए  कि मुझे रात में नींद बहुत कम आती है बिना किसी संकोच के घ॔टो  फोन पर समकालीन  साहित्य की, घर-परिवार की बात करने वाले सबसे पुराने मित्र चले गए। 


मेरी पहली  कविता उन्होंने ही  1978 में  ने नवतारा में  प्रकाशित की  थी। हमारी  मित्रता  की शुरुआत वहीं से  हुई । जब वे फणीश्वरनाथ रेणु रचनावली का संपादन कर रहे थे तो उनके  संबंध में जानकारियों ,  उनकी रचनाओं की तलाश  में प्रायः  पटना आते थे । पटना  रेणुजी की कर्मभूमि रही है। पटना में उनके मित्रों की संख्या बहुत ज्यादा  थी। यायावरजी अक्‍सर मुझे भी साथ  ले लेते। कभी मुझे समय नहीं होता तो वे मेरी साइकिल लेकर चले जाते और देर रात में वापस आते।  रेणुजीके प्रति वे अपने अंतिम दिनों तक समर्पित रहे। हर बातचीत  में उनपर अपने काम की प्रगति की जानकारी जरूर  देते। 


अंतिम मुलाकात  दो वर्ष  पहले हजारीबाग में हुई थी। पहुंचते ही उन्हें फोन किया।  वे खुश भी हुए  और दुखी भी कि मैं इतने कम समय के  लिए  क्यों  आया।  मिलने आए। अपना नया काव्य  संग्रह कविता फिर भी मुस्कुराएगी दी। हमने फिर  हिलने का वायदा किया लेकिन कोरोना के कारण न वे आ पाए, न मैं जा पाया। 


पिछले कुछ  महीनों से वे अस्वस्थ चल रहे थे। हमेशा कहते खड़ा होने या बैठने में दिक्कत होती है। लेकिन  हजारीबाग से बाहर कहीं जाकर  ईलाज करवाने को तैयार नहीं होते।  


मर्माहत हूं।

बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

प्रेम? / ओशो

 बहुत समय पहले, च्वांग्त्सु नाम का एक विचारक हुआ। एक रात्रि में, एक झोपड़े के पास निकलता था। उसके भीतर..एक प्रेमी और प्रेयसी की बातें चलती थीं, उनको झोपड़े के बाहर से अचानक सुन लिया। वह प्रेयसी अपने प्रेमी को कहती थी कि तुम्हारे बिना मैं एक क्षण भी नहीं जी सकती हूं। तुम्हारा होना ही मेरा जीवन है। च्वांग्त्सु मन में सोचने लगा, किसी का जीवन किसी दूसरे के होने में कैसे हो सकता है? अगर मैं आपसे कहूं कि आपके होने में ही मेरा जीवन है, और अगर मेरा कोई जीवन होगा तो वह छाया का जीवन होगा कि क्योंकि आपके होने में मेरा जीवन कैसे हो सकता है? जो लोग भी अपने जीवन को किसी और में रख देते हैं, वे लोग छाया का जीवन जीते हैं..चाहे धन में, चाहे यश में, चाहे मित्रों में, चाहे प्रियजनों में। जो दूसरों में अपने जीवन को रख देता है उसका खुद का जीवन छाया का जीवन हो जाता है। उसका जीवन वास्तविक नहीं हो सकता। उसका जीवन झूठा होगा। जैसे कोई वृक्ष कहे किसी दूसरे वृक्ष से कि तुम्हारी जड़ें ही मेरी जड़ें हैं और अपनी जड़ों को भूल जाए, तो यह वृक्ष थोड़े ही दिनों में कुम्हला जाएगा, मुर्झा जाएगा और सूख जाएगा। क्योंकि दूसरे की जड़ें दूसरे की ही होंगी, इस वृक्ष की नहीं हो सकेंगी। च्वांग्त्सु ने लौट कर अपने शिष्यों को कहा कि आज मैंने एक अदभुत सत्य अचानक सुन लिया है। एक प्रेयसी अपने प्रेमी को कहती थी, तुम्हारे होने में मेरा जीवन है। जहां-जहां कोई व्यक्ति यह कहता हो कि फलां चीज के होने में मेरा जीवन है, वहीं जानना कि जीवन असत्य है और झूठा है। जीवन अपने होने में होता है, किसी और के होने में संभव नहीं है।


फिर और भी आश्चर्यजनक बात घटी..कुछ समय बीत जाने के बाद च्वांग्त्से एक पहाड़ के करीब से गुजरता था और उसने एक स्त्री को एक कब्र के पास बैठे हुए देखा। यह तो कोई अनहोनी बात न थी।


च्वांग्त्सु ने जाकर पूछा कि बात क्या है? उस स्त्री ने कहाः मेरे पति को मरे दो ही दिन हुए और मुझे एक नये प्रेमी के प्रेम में पड़ जाना हो गया है। तो कम से कम पति की कब्र सूख जाए, उतनी देर तक रुकना जरूरी है। इसलिए कब्र को सुखा रहे हैं। च्वांग्त्सु वापस लौटा, उसने अपने शिष्यों से कहाः आज एक और नये सत्य का अनुभव हुआ। जो लोग कहते हैं, तुम्हारे बिना न जी सकेंगे, वे तुम्हारे मरने के बाद तत्क्षण अपने जीने के लिए कोई और कारण खोज लेंगे, कोई और उपाय खोज लेंगे। अभी एक स्त्री अपने पति की कब्र को पंखा कर रही थी, क्योंकि कब्र जल्दी सूख जाए ताकि वह नये प्रेम की दुनिया में प्रवेश कर सके।


जो जीवन दूसरों पर जीता है वह उनके हट जाने पर तत्क्षण दूसरे मुद्दे, दूसरे कारण खोज लेगा। और यह भी स्मरण रखें कि ऐसा जीवन प्रतिक्षण बदलता हुआ जीवन होगा, क्योंकि छाया का जीवन स्थिर जीवन नहीं हो सकता। आप जहां जाते हैं वहां आपकी छाया चली जाती है। सुबह, मैंने सुना है, एक चींटी अपने छेद से बाहर निकली, उसने देखा, सूरज उग रहा है, उसकी बड़ी लंबी छाया बन रही है।


उसने कहाः आज तो मुझे बहुत भोजन की जरूरत पड़ेगी। बहुत भोजन की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि छाया उसकी बड़ी थी और उसने सोचा, इतनी बड़ी मेरी देह है आज मुझे भोजन की जरूरत पड़ेगी। दोपहर तक वह भोजन खोजती रही, तब तक सूरज ऊपर चढ़ गया, छाया छोटी हो गई। दोपहर उसने सोचा था, आज थोड़ा सा भी मिल जाए तो भी काम चल जाएगा। जो छाया सुबह बड़ी थी, वह दोपहर सिकुड़ कर छोटी हो गई। जो छाया बहुत बड़ी बनती थी, अंधकार में बिल्कुल नहीं बनेगी।

ओशो

काश........

( *धीरे धीरे पढ़े.... पूरा पढ़कर बहुत सकूं मिलेगा ✍🏻✍🏻*) प्रस्तुति  - सीताराम मीणा  ▪︎प्यास लगी थी गजब की मगर पानी मे जहर था... पीते तो मर...