शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2021

शोध की खातिर किस दुनिया में ? कहां गए ?

प्रिय भारत! / शम्भू बादल 


प्रिय भारत! 

शोध की खातिर

किस दुनिया में ? 

कहां गए ?

साक्षात्कार रेणु से लेने ?

बातचीत महावीर से करने?

 त्रिलोचन - नागार्जुन से मिलने ?


 कविता - आलोचना 

जीवनी - संपादन 

ये भी तो थे साथ तुम्हारे 

इन्हें छोड़

 हमसे दूर

 बहुत दूर गए

 'चुपचाप'

अचानक यायावर


कैसी-कैसी बातें? 

किसकी - किसकी बातें? 

 साहित्य की अंत:कथा 

सच - झूठ का अंत:पुर 

खुली हंसी 

खुश की विधि 

लाएगा कौन ?

 'झेलते हुए', 'मैं हूं, यहां हूं' 

'बेचैनी', 'हाल - बेहाल'

बताएगा कौन ?


'कैसे जिंदा है आदमी' 

सवाल रख 

उत्तर जाने बिना 

अंतरलोक - यात्री

कैसे बन गए तुम ?

तुम्हारी कविता में 

कितनी बातें !

कितनी चिंता!


तुमने कहा था  

 'दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा'

और आज हो कर

 दिन को दुखी कर 

तुमने बता दिया 

    


 तुम्हारी कविता देख रहा हूं :


  दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा

                           - भारत यायावर


एक दृश्य है जो अदृश्य हो गया है

उसका बिम्ब मन में उतर गया है

मैं चुप हूँ

चुपचाप चला जाऊँगा

कहाँ

किस ओर

किस जगह

अदृश्य  !


किसी के मन में यह बात प्रकट होगी

कि एक दृश्य था

अदृश्य हो चला गया है !


अब उसके शब्द जो हवा में सनसनाते थे

किसी के साथ कुछ दूर घूम आते थे

उसके विचार कहीं मानो किसी गुफ़ा से निकलते थे

पहले गुर्राते थे

फिर गले लगाते थे

फिर कुछ चौंक - चौंक जाते थे

फिर बहुत चौंकाते थे


अब उसकी कहीं छाया तक नहीं है 

अब कोई पहचान भी नहीं है 

दृश्य में अदृश हो जाएगा 

कहीं नजर नहीं आएगा

युद्ध पीड़ित महिलाओ के दुख क़ो नया आयाम दिया है गरिमा ने / राकेश रेणु

 #माणिकचौक_1


कितने मित्रों का कर्ज़ है मुझ पर- प्रेम और भरोसे से आबद्ध! उनकी बेशक़ीमती किताबें आती हैं लेकिन अपनी काहिली में  उन पर दो शब्द भी नहीं लिख पाता। ख़ुद इस स्थिति को स्वीकार नहीं कर पा रहा। मेरे भीतर के क़ाहिल को अपनी तंद्रा तोड़नी होगी। भरोसे पर खरा उतरना होगा। इसलिए तय किया है कि इस पेज पर साथियों की किताबों में से पसंदीदा की थोड़ी-थोड़ी ही सही, चर्चा करता रहूँगा। इनमें अभी-अभी साया हुई किताबें होंगी और कुछ थोड़ी पुरानी भी, जैसेकि चार साल क़बल, 2017 में प्रकाशित प्रोफ़ेसर गरिमा श्रीवास्तव की ‘देह ही देश’ जिसे उन्होंने क्रोएशिया प्रवास डायरी कहा है। कहने को इस किताब के प्रकाशन के चार साल पूरे होने को हैं लेकिन इसकी चर्चा आज भी है, लंबे समय तक रहेगी क्योंकि इस तरह की पृष्ठभूमि वाली किताबें हिन्दी में कम ही लिखी जाती हैं।


‘देह ही देश’ को केवल डायरी कहना पर्याप्त नहीं है, इसे सीमित करना है। यह जितनी डायरी है उतना ही यात्रा वृत्तांत, जितनी आत्मकथा है उतना ही पत्र संवाद, जितनी स्मृति है उतनी ही पत्रकारिता। यह कुछ और ही चीज है- विरल रूप से तरल और सरल। सीधे हृदय में समाती, दुनियाभर का साक्षात्कार कराती, दुःख से संवाद करती, एकाकार कराती। लेखिका के ज़ेहन में वे सब चीज़ें हैं - कविता, कहानी, समालोचना, इतिहास और विमर्श - वे सबको साथ लेकर चलती हैं जो आमतौर पर स्त्रियों की ख़ूबी होती है। 


विद्वान कहते हैं, अनुभूति पहले आती है भाषा उसके बाद और अभिव्यक्ति उसके भी बाद। यह जो गहराई है इस पुस्तक की, अनुभूति की गहराई है, भाषा जिसे अभिव्यक्त करती है। लेखिका क्रोएशिया और बोस्निया हर्जेगोविना की युद्ध पीड़ित, बलत्कृत और तरह-तरह से दमित स्त्रियों की पीड़ाओं से इस क़दर बोसीदा हैं कि दर्द उनकी भाषा और अभिव्यक्ति में स्वत: चला आया है - पढ़ने वाले को भीतर तक भिंगोता, नम करता। वह स्वयं उस पीड़ा में डूबती-उतराती रहीं, इस हद तक कि बार-बार उनके अवसादग्रस्त हो जाने की आशंका पैदा हुई। अजनबी देश में अध्यापक-समालोचक की प्रचलित प्रकृति से अलग जैसा शोधपूर्ण लेखन उन्होंने किया है और उसके लिए जो यात्राएँ की, जिन-जिन जगहों पर गयी, मिलीं लोगों से, वे भी उनकी इसी गहरे इन्वॉल्मेंट की कहानी कहती हैं।


क्रोएशियाई बोस्नियाई स्त्रियों की यह लोमहर्षक गाथा ‘देह ही देश’ का मुख्य प्रतिपाद्य है। पुस्तक का तीन चौथाई और लेखिका के प्रवास के तीन चौथाई हिस्से की डायरी इनके वृत्तांतों और निहितार्थों से भरी है। लेखिका का स्त्री मन-मस्तिष्क इन स्त्रियों के मार्फ़त न केवल उनके मूल देश भारत, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप, एशिया और उससे भी बढ़कर पूरे विश्व की स्त्रियों की दशा का, उनके प्रति पितृसत्तात्मक समाज दृष्टि का विश्लेषण करता है।


किताब की पृष्ठभूमि में क्रोएशिया की राजधानी है जहाँ रहते हुए लेखिका योरोप के अल्पज्ञात पक्षों से अवगत होती हैं, 1992 से ’95 तक चले सर्बिया-क्रोएशिया-बोस्निया हर्ज़ेगोविना युद्ध के दौरान हुए अकल्पनीय दमन से अवगत होती हैं। इस युद्ध में सर्बियाई सैनिकों की बर्बरता जैसा दूसरा उदाहरण आधुनिक विश्व इतिहास में नहीं है। इस कल्पनातीत जेनोसाइड के मूल में अंध राष्ट्रवाद है, दूसरी राष्ट्रीयताओं को घृणित और त्याज्य मानने की प्रवृत्ति। इतिहास बार-बार हमें सावधान करता है कि राष्ट्रवाद की अति ऐसी ही विध्वंसक स्थितियाँ पैदा करती है। क्रोएशिया और बोस्निया के ख़िलाफ़ युद्ध का एकमात्र मक़सद क्रोएशियाई और बोस्नियाई लोगों, ख़ासकर मुसलमानों के जीवन को इतना दूभर बना देना था कि वे अपने घर, खेत, खलिहान छोड़कर भाग जाएँ जिससे कि बृहत्तर सर्बिया का सपना पूरा हो सके। 


दुनिया का इतिहास गवाह है कि सारे युद्ध स्त्रियों की देह पर ही लड़े गए। वही उनकी पहली और आख़िरी भोक्ता होती हैं। योद्धाओं का पौरुष औरतों के दमन से तुष्ट होता है। योद्धाओं का ही क्यों, पुरुष मात्र का! गहरी पीड़ा से भरकर गरिमा कहती हैं, ‘ऐसा क्यों होता है, युद्ध कहीं हो, किसी के भी बीच हो, मारी तो जाती हैं औरतें ही।’ और, ‘स्त्रियों की देह पर नियंत्रण करना युद्ध नीति का ही एक हिस्सा होता है जिससे तीन उद्देश्य सधते हैं - पहला, आम नागरिकों में भय का संचार, दूसरा नागरिकों का विस्थापन और तीसरा सैनिकों को बलात्कार की छूट देकर पुरस्कृत करना।’


बोस्निया सरकार ने इस युद्ध के दौरान 50,000 स्त्रियों के यौन शोषण की रिपोर्ट दी जबकि यूरोपियन यूनियन के जाँच कमीशन ने लगभग 20,000 से ऊपर स्त्रियों को बलत्कृत-घर्षित किए जाने की संख्या को प्रामाणिक माना। उन स्त्रियों को अकल्पनीय दैहिक शोषण और अमानवीय यातनाओं से दरपेश होना पड़ा। प्रतिरोध करने वाली स्त्रियों के स्तन काट लिए गए, अंग-भंग किया गया, यातना दे-दे कर मार डाला गया। यंत्रणादायी जीवन जीते हुए अनेक की मौत हो गई, अन्य अनेक पागल हो गईं या देह बाज़ारों में पहुँच गईं अथवा उन्हें देह व्यापार को ही अपना पेशा बनाना पड़ा। कुछ स्त्रियों ने अपने आत्मबल की बदौलत नए सिरे से जीवन आरंभ करने का संकल्प लिया हालाँकि अतीत की स्मृतियाँ उनका पीछा नहीं छोड़तीं। लेखिका खोज-खोजकर ऐसी स्त्रियों से मिलती हैं, उनकी कथाएँ जानने की कोशिश करती हैं और उन्हें अपनी डायरी का हिस्सा बनाती हैं। कुछ भी हो, अमानवीयता की शिकार हुई स्त्रियों की वास्तविक संख्या घोषित संख्या से कहीं बड़ी है।


प्रवास काल का पहला चौथाई दिसंबर (संभवतः 2008) से आरंभ होकर मई (संभवतः 2009) तक का समय है। इस अंश में लेखिका अपने देश से बाहर एक यूरोपीय देश की संस्कृति और समाज को समझने का यत्न करती हैं, बार-बार अपने देश से उनकी तुलना करती हैं। उनका संवेदनशील मन लौट-लौट आता है अपने देश, शांतिनिकेतन के कुंजों और भारत के दूसरे शहरों की गलियों में जहाँ से उनकी स्मृतियाँ जुड़ी हैं। दोनों भूभागों की आबोहवा, संस्कृति, लोग, रहन-सहन के तौर तरीक़ों के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश प्रवास काल और पुस्तक के पहले चौथाई का मुख्य प्रतिपाद्य है। एक प्रकार से इस पहले चौथाई में पर्याप्त विविधता है। इसमें लेखिका का स्त्री विमर्शकार है, उसका बहुपठित और बहुभाषी व्यक्तित्व है जो बांग्ला भाषा और कवींद्र रवींद्र से उनका लगाव है जो अनेक रूपों में - कविताओं और गाथाओं मैं प्रकट होता है। इसी चौथाई हिस्से में सिमोन-द-बोउवार हैं और जो लोग उन्हें नहीं जानते अथवा कम जानते हैं उनके लिए सिमोन के लेखन के साथ-साथ उनके व्यक्तिगत जीवन से अवगत कराने वाली झलकियाँ भी हैं।


‘देह ही देश’ को पढ़ने के बाद विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि गरिमा श्रीवास्तव यदि स्त्री विमर्शकार न होतीं तो बेहतर कवि होतीं, यदि कथेतर न लिखतीं तो बेहतर कथाकार होतीं। लेकिन वे एक साथ यह सब हैं। ‘देह ही देश’ इसकी पुष्टि करती है। उनके ज़ेहन में वे सब चीज़ें हैं - कविता, कहानी, समालोचना, इतिहास और विमर्श - वे सबको साथ लेकर चलती हैं जो आमतौर पर एक संवेदनशील विमर्शकार की ख़ूबी होती है। उन्होंने क्रोएशिया और बोस्निया की युद्ध पीड़ित स्त्रियों से के दुख को वैश्विक बनाया है और युद्ध के उद्योग को, युद्धों की तिजारत करने वाले लोगों को बेनक़ाब किया है।



👍🏼✌🏼👌

भारत यायावर का जाना / विजय केसरी

 भारत यायावर का जाना एक बड़ी अपूरणीय क्षति है।

 संपूर्ण साहित्य जगत आज स्तब्ध है ।

भारत यायावर का संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य को समर्पित रहा।

 वे मूलत: एक कवि थे ।

उन्होंने हिंदी साहित्य की सभी विधा पर  अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की थी ।

वे एक साहित्यकार की भूमिका में सबसे अलग और निराले थे।

 उन्होंने कविता लेखन, आलोचना, संस्मरण, समीक्षा, संपादन आदि तमाम विधाओं पर जमकर काम किया ।

उन्होंने देश के जाने-माने प्रख्यात साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेनू की कृतियों को देशभर से ढूंढ कर संग्रहित कर रत्नावली  प्रकाशित कर एक अद्वितीय कार्य किया।

 उन्होंने प्रख्यात साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनावाली का  संपादन कर इतिहास रच दिया।

वे झारखंड के जाने माने साहित्यकार राधा कृष्ण की रचनाओं को भी  ढूंढ कर रचनावली के कार्य में लगे थे। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित उनकी रचनाएं प्रकाशित हो रही थी।

 एक साथ कई पत्रिकाओं के प्रधान संपादक के रूप में भी अपने दायित्व का निर्वहन सफलतापूर्वक कर रहे थे। ऐसे साहित्यकार विरले ही पैदा होते हैं।

 इनका संपूर्ण जीवन  हिंदी साधना और सेवा में बीता।

 उनके जाने से हिंदी साहित्य संसार सुना हो गया है।

 ऐसा प्रतीत होता है।

नहीं रहे भारत यायावर / मुकेश प्रत्यूष

 भारत यायावर नहीं रहे। 


आज दिन में फोन  किया। स्वीच आफ आया। अंदेशा हुआ शायद अस्पताल गए  हों लेकिन  शाम होते-होते उनके निधन की सूचना आ गई।  


वर्षों से रात में दस बजे के बाद यह कहते हुए  कि मुझे रात में नींद बहुत कम आती है बिना किसी संकोच के घ॔टो  फोन पर समकालीन  साहित्य की, घर-परिवार की बात करने वाले सबसे पुराने मित्र चले गए। 


मेरी पहली  कविता उन्होंने ही  1978 में  ने नवतारा में  प्रकाशित की  थी। हमारी  मित्रता  की शुरुआत वहीं से  हुई । जब वे फणीश्वरनाथ रेणु रचनावली का संपादन कर रहे थे तो उनके  संबंध में जानकारियों ,  उनकी रचनाओं की तलाश  में प्रायः  पटना आते थे । पटना  रेणुजी की कर्मभूमि रही है। पटना में उनके मित्रों की संख्या बहुत ज्यादा  थी। यायावरजी अक्‍सर मुझे भी साथ  ले लेते। कभी मुझे समय नहीं होता तो वे मेरी साइकिल लेकर चले जाते और देर रात में वापस आते।  रेणुजीके प्रति वे अपने अंतिम दिनों तक समर्पित रहे। हर बातचीत  में उनपर अपने काम की प्रगति की जानकारी जरूर  देते। 


अंतिम मुलाकात  दो वर्ष  पहले हजारीबाग में हुई थी। पहुंचते ही उन्हें फोन किया।  वे खुश भी हुए  और दुखी भी कि मैं इतने कम समय के  लिए  क्यों  आया।  मिलने आए। अपना नया काव्य  संग्रह कविता फिर भी मुस्कुराएगी दी। हमने फिर  हिलने का वायदा किया लेकिन कोरोना के कारण न वे आ पाए, न मैं जा पाया। 


पिछले कुछ  महीनों से वे अस्वस्थ चल रहे थे। हमेशा कहते खड़ा होने या बैठने में दिक्कत होती है। लेकिन  हजारीबाग से बाहर कहीं जाकर  ईलाज करवाने को तैयार नहीं होते।  


मर्माहत हूं।

बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

प्रेम? / ओशो

 बहुत समय पहले, च्वांग्त्सु नाम का एक विचारक हुआ। एक रात्रि में, एक झोपड़े के पास निकलता था। उसके भीतर..एक प्रेमी और प्रेयसी की बातें चलती थीं, उनको झोपड़े के बाहर से अचानक सुन लिया। वह प्रेयसी अपने प्रेमी को कहती थी कि तुम्हारे बिना मैं एक क्षण भी नहीं जी सकती हूं। तुम्हारा होना ही मेरा जीवन है। च्वांग्त्सु मन में सोचने लगा, किसी का जीवन किसी दूसरे के होने में कैसे हो सकता है? अगर मैं आपसे कहूं कि आपके होने में ही मेरा जीवन है, और अगर मेरा कोई जीवन होगा तो वह छाया का जीवन होगा कि क्योंकि आपके होने में मेरा जीवन कैसे हो सकता है? जो लोग भी अपने जीवन को किसी और में रख देते हैं, वे लोग छाया का जीवन जीते हैं..चाहे धन में, चाहे यश में, चाहे मित्रों में, चाहे प्रियजनों में। जो दूसरों में अपने जीवन को रख देता है उसका खुद का जीवन छाया का जीवन हो जाता है। उसका जीवन वास्तविक नहीं हो सकता। उसका जीवन झूठा होगा। जैसे कोई वृक्ष कहे किसी दूसरे वृक्ष से कि तुम्हारी जड़ें ही मेरी जड़ें हैं और अपनी जड़ों को भूल जाए, तो यह वृक्ष थोड़े ही दिनों में कुम्हला जाएगा, मुर्झा जाएगा और सूख जाएगा। क्योंकि दूसरे की जड़ें दूसरे की ही होंगी, इस वृक्ष की नहीं हो सकेंगी। च्वांग्त्सु ने लौट कर अपने शिष्यों को कहा कि आज मैंने एक अदभुत सत्य अचानक सुन लिया है। एक प्रेयसी अपने प्रेमी को कहती थी, तुम्हारे होने में मेरा जीवन है। जहां-जहां कोई व्यक्ति यह कहता हो कि फलां चीज के होने में मेरा जीवन है, वहीं जानना कि जीवन असत्य है और झूठा है। जीवन अपने होने में होता है, किसी और के होने में संभव नहीं है।


फिर और भी आश्चर्यजनक बात घटी..कुछ समय बीत जाने के बाद च्वांग्त्से एक पहाड़ के करीब से गुजरता था और उसने एक स्त्री को एक कब्र के पास बैठे हुए देखा। यह तो कोई अनहोनी बात न थी।


च्वांग्त्सु ने जाकर पूछा कि बात क्या है? उस स्त्री ने कहाः मेरे पति को मरे दो ही दिन हुए और मुझे एक नये प्रेमी के प्रेम में पड़ जाना हो गया है। तो कम से कम पति की कब्र सूख जाए, उतनी देर तक रुकना जरूरी है। इसलिए कब्र को सुखा रहे हैं। च्वांग्त्सु वापस लौटा, उसने अपने शिष्यों से कहाः आज एक और नये सत्य का अनुभव हुआ। जो लोग कहते हैं, तुम्हारे बिना न जी सकेंगे, वे तुम्हारे मरने के बाद तत्क्षण अपने जीने के लिए कोई और कारण खोज लेंगे, कोई और उपाय खोज लेंगे। अभी एक स्त्री अपने पति की कब्र को पंखा कर रही थी, क्योंकि कब्र जल्दी सूख जाए ताकि वह नये प्रेम की दुनिया में प्रवेश कर सके।


जो जीवन दूसरों पर जीता है वह उनके हट जाने पर तत्क्षण दूसरे मुद्दे, दूसरे कारण खोज लेगा। और यह भी स्मरण रखें कि ऐसा जीवन प्रतिक्षण बदलता हुआ जीवन होगा, क्योंकि छाया का जीवन स्थिर जीवन नहीं हो सकता। आप जहां जाते हैं वहां आपकी छाया चली जाती है। सुबह, मैंने सुना है, एक चींटी अपने छेद से बाहर निकली, उसने देखा, सूरज उग रहा है, उसकी बड़ी लंबी छाया बन रही है।


उसने कहाः आज तो मुझे बहुत भोजन की जरूरत पड़ेगी। बहुत भोजन की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि छाया उसकी बड़ी थी और उसने सोचा, इतनी बड़ी मेरी देह है आज मुझे भोजन की जरूरत पड़ेगी। दोपहर तक वह भोजन खोजती रही, तब तक सूरज ऊपर चढ़ गया, छाया छोटी हो गई। दोपहर उसने सोचा था, आज थोड़ा सा भी मिल जाए तो भी काम चल जाएगा। जो छाया सुबह बड़ी थी, वह दोपहर सिकुड़ कर छोटी हो गई। जो छाया बहुत बड़ी बनती थी, अंधकार में बिल्कुल नहीं बनेगी।

ओशो

मन में है आकाश कम नहीं / रतन वर्मा



जीवन में अवसाद बहुत, पर,

सपनों के सौगात कम नहीं,

कंट भरी है राह, परन्तु ,

मन में है आकाश कम नहीं !


पंछी बन उड़ना जो चाहूं,

पर डैनें हैं बोझल -बोझल,

नैन पपीहरा चांद निहारे,

चंदा दिखता मद्धम -मद्धम,


चलना चाहूं, पकड़ उंगली,

उसमें भी झटकार कम नहीं ! 

कंट भरी है राह, परन्तु,

मन में है आकाश कम नहीं !


जीवन का यह ताना -बाना , 

चलता रहा सदा मनमाना,

कहां चाल में चूक हो गयी,

अपना खास हुआ बेगाना !


हमने प्यार लुटाया जी भर,

बदले में दुत्कार कम नहीं,

कंट भरी है राह परन्तु ,

मन में है आकाश कम नहीं !

जीवन का टॉनिक*_ / प्रस्तुति - शैलेन्द्र किशोर जारूहार

 😴🤔😴


*


   *मैं अपने विवाह के बाद. अपनी पत्नी के साथ शहर में रह रहा था।* 


*बहुत साल पहले पिताजी मेरे घर आए थे। मैं उनके साथ सोफे पर बैठा बर्फ जैसा ठंडा जूस पीते हुए अपने पिताजी से विवाह के बाद की व्यस्त जिंदगी, जिम्मेदारियों और उम्मीदों के बारे में अपने ख़यालात का इज़हार कर रहा था और वे अपने गिलास में पड़े बर्फ के टुकड़ों को स्ट्रा से इधर-उधर नचाते हुए बहुत गंभीर और शालीन खामोशी से मुझे सुनते जा रहे थे।*

        

*अचानक उन्होंने कहा- "अपने दोस्तों को कभी मत भूलना। तुम्हारे दोस्त उम्र के ढलने पर पर तुम्हारे लिए और भी महत्वपूर्ण और ज़रूरी हो जायेंगे। बेशक अपने बच्चों, बच्चों के बच्चों को भरपूर प्यार  देना मगर अपने पुराने, निस्वार्थ और सदा साथ निभानेवाले दोस्तों को हरगिज़ मत भुलाना। वक्त निकाल कर उनके साथ समय ज़रूर बिताना। उनके घर खाना खाने जाना और जब मौक़ा मिले उनको अपने घर खाने पर बुलाना।*   

*कुछ ना हो सके तो फोन पर ही जब-तब, हालचाल पूछ लिया करना।"*      


*मैं नए-नए विवाहित जीवन की खुमारी में था और पिताजी मुझे यारी-दोस्ती के फलसफे समझा रहे थे।* 


*मैंने सोचा-  "क्या जूस में भी नशा होता है जो पिताजी बिन पिए बहकी-बहकी बातें करने लगे? आखिर मैं अब बड़ा हो चुका हूँ, मेरी पत्नी और मेरा होने वाला परिवार मेरे लिए जीवन का मकसद और सब कुछ है।* 


*दोस्तों का क्या मैं अचार डालूँगा?"*

      

*लेकिन फ़िर भी मैंने आगे चलकर एक सीमा तक उनकी बात माननी जारी रखी।*

 *मैं अपने गिने-चुने दोस्तों के संपर्क में लगातार रहा।* 


 *समय का पहिया घूमता रहा और मुझे अहसास होने लगा कि उस दिन पिता 'जूस के नशे' में नहीं थे बल्कि उम्र के खरे तजुर्बे  मुझे समझा रहे थे।*  


*उनको मालूम था कि उम्र के आख़िरी दौर तक ज़िन्दगी क्या और कैसे करवट बदलती है।*    


*हकीकत में ज़िन्दगी के बड़े-से-बड़े तूफानों में दोस्त कभी नाव बनकर, कभी पतवार बनकर तो कभी मल्लाह बनकर साथ निभाते हैं और कभी वे आपके साथ ही ज़िन्दगी की जंग में कूद पड़ते हैं।* 


*सच्चे दोस्तों का काम एक ही होता है- दोस्ती निभाना।* 


*ज़िन्दगी के पचास साल बीत जाने के बाद मुझे पता चलने लगा कि घड़ी की सुइयाँ पूरा चक्कर लगाकर वहीं पहुँच गयीं हैं जहाँ से मैंने जिंदगी शुरू की थी।*  


 *विवाह होने से पहले मेरे पास सिर्फ दोस्त थे।* 


*विवाह के बाद बच्चे हुए।* 


*बच्चे बड़े हो हुए। उनकी जिम्मेदारियां निभाते-निभाते मैं बूढ़ा हो चला।* 

*बच्चों के विवाह हो गए और उनके अलग परिवार और घर बन गए।* 

*बेटियाँ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गयीं।*  

*उसके बाद उनकी रुचियाँ, मित्र-मंडलियाँ और जिंदगी अलग पटरी पर चलने लगीं।*

            

*अपने घर में मैं और मेरी पत्नी ही रह गए।*


*वक्त बीतता रहा।*

 

*नौकरी का भी अंत आ गया।*

 

*साथी-सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी मुझे बहुत जल्दी भूल गए।* 


 *जो मालिक कभी छुट्टी मांगने पर मेरी मौजूदगी को कम्पनी के लिए जीने-मरने का सवाल बताता था, वह मुझे यूं भूल गया जैसे मैं कभी वहाँ काम करता ही नहीं था।*


*एक चीज़ कभी नहीं बदली- मेरे मुठ्ठी-भर पुराने दोस्त।* 


*मेरी दोस्ती न तो कभी बूढ़ी हुई न ही रिटायर।*


*आज भी जब मैं अपने दोस्तों के साथ होता हूँ, लगता है अभी तो मैं जवान हूँ और मुझे अभी बहुत साल और ज़िंदा रहना चाहिए।*   


*सच्चे दोस्त जिन्दगी की ज़रुरत हैं, कम ही सही कुछ दोस्तों का साथ हमेशा रखिये।*           


*वे कितने भी अटपटे, गैरजिम्मेदार, बेहूदे और कम अक्ल क्यों ना हों, ज़िन्दगी के खराब वक्त में उनसे बड़ा योद्धा और चिकित्सक मिलना नामुमकिन है।*


*अच्छा दोस्त दूर हो चाहे पास हो, आपके दिल में धड़कता है।* 


*सच्चे दोस्त उम्र भर साथ रखिये और हर कीमत पर यारियां बचाइये।*

 *ये बचत उम्र-भर आपके काम आयेगी,,,!!!*

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प्यार से वो ह़लाल करता है। / अखिलेश श्रीवास्तव चमन

 मेरा का़तिल बड़ा रहम दिल है,

प्यार से वो ह़लाल करता है।



जी, यह मेरी ही एक ग़ज़ल की लाइनें हैं जो आज गाजियाबाद से लखनऊ की यात्रा में बहुत शिद्दत से जेहन में कौंध रही हैं।

गाजियाबाद में मेरा बेटा रहता है इसलिए यहाँ आना जाना लगा रहता है। मैं हमेशा शताब्दी एक्सप्रेस से यात्रा करता हूँ। कोरोना से पहले लगभग आठ सौ किराया था जिसमें अखबार, पानी की बोतल, चाय, नाश्ता और खाना भी मिलता था। सीनियर सिटीजन की 40 प्रतिशत छूट के बाद लगभग साढ़े चार सौ किराया लगता था। उतने में चाय नाश्ता करते, खाते, पीते आ जाते थे। कोरोना में ट्रेन बंद हो गई थी। जब दोबारा शुरू हुई तो चाय, नाश्ता, खाना, पानी मिलना बंद हो गया, सीनियर सिटीजन की छूट समाप्त कर दी गई और किराए में मात्र लगभग ढ़ाई गुने की वृद्धि हो गई। आज अपने झोले में घर से पानी की बोतल और नाश्ता, खाना लेकर 1100/- रुपये किराए में जा रहा हूँ। याद आ रहे हैं वे दिन जब रेल किराए में यदि दो रुपए, चार रुपए की भी वृद्धि हो जाती थी तो हंगामा खड़ा हो जाता था,विरोधी दल रेल रोकने लगते थे और  अखबार वाले उसे मुख पृष्ठ की खबर बना देते थे । लेकिन आज साढ़े चार सौ का टिकट ग्यारह सौ का हो गया, सारी सुविधाएं भी समाप्त कर दी गईं लेकिन कहीं सुगबुगाहट तक नहीं है।  न तो विरोधी पार्टियों और न ही मीडिया किसी के भी कानों पर जूँ नहीं रेंग रहा है। ऐसा शायद इसलिए है कि बोलना राष्ट्रहित के प्रतिकूल है। तभी मैंने लिखा है-----


देश के विकास में बाधा जुबान है

चुप ही बैठिए, नहीं सवाल कीजिए।


वैसे अगर देखें तो एक तरह से सरकार का यह कदम जन कल्याणकारी ही है। किराया अधिक होगा तो लोग यात्रा नहीं करेंगे और यात्रा नहीं करेंगे तो वे कोरोना, मार्ग दुर्घटना तथा चोरी, पाकेटमारी आदि से सुरक्षित रहेंगे। तो एक बार प्रेम से बोलिए जय श्रीराम।

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

रिश्ते ही रिश्ते वाले प्रो. अरोड़ा / अनामी शरण बबल

 वाह प्रो. अरोड़ा 🙏🏿. 1984 में जब पहली बार मैं दिल्ली के  लिए चला तो कालका मेल के साथ सफर  आरंभ किया औऱ मुग़ल सराय में सुबह हो गयी. इसके बाद शाम होते होटे टूंडला स्टेशन  पार किया. यूपी के न जाने कितने स्टेशन गांव देहात शहर से रेल गुजरती रही मग़र रेल पटरियों के करीब के दीवारों पर केवल एक ही  विज्ञापन लिखा देखा. रिश्ते  ही रिश्ते  प्रो. अरोड़ा 28 रैगर पूरा delhi 110055  रेल में बैठा मैं बिस्मित प्रो अरोड़ा की प्रचार शैली पर मुग्ध था.  पहली बार दिल्ली आ रहा था मगर दिल्ली आने से पहले ही मेरे लिए एक हीरो की तरह प्रो. अरोड़ा का उदय हो चुका था. दिल्ली में बैठे एक आदमी की ताक़त औऱ काम के फैलाव क़ो लेकर मैं अचंभित सा था. उस समय मेरी उम्र 19 साल की थी लिहाज़ा समझ से अधिक उमंग  उत्साह भरा था. प्रो अरोड़ा औऱ विवाह का यह स्टाइल दोनों मेरे लिए नये थे. प्रो. अरोड़ा से मिलने  इंटरव्यू करने की चाहत मन में जगी थी मगर पहली बार दिल्ली जाने औऱ उसके भूगोल से अनजान  मैं इस चाहत क़ो मन में ही दबा सा दिया, अलबत्ता मेरे दिमाग़ पर प्रो. अरोड़ा छा  गये थे. राधास्वामी सतसंग सभा दयालबाग़ के करोलबाग़ ब्रांच का सतसंग हॉल के ऊपर वाले गेस्ट रूम मेरा पहला पड़ाव बना था. अगले दिन सुबह सुबह दिल्ली का मेरा दोस्त अखिल अनूप / अब ( अनूप शुक्ला ) भगवान दास मोरवाल के साथ मिलने आ गया. उल्लेखनीय है कि करीब 30-32'साल के बाद पालम गांव के अपने घर पर मोरवाल जी ने बताया कि अखिल के साथ मैं ही मिलने करोलबाग़ आया था.  यह सुनकर मैं खुश भी हुआ औऱ अफ़सोस  भी यह हुआ कि उस समय मैं मोरवाल जी क़ो जानता भी नहीं था. हा तो मैं करोलबाग़ के 28  के एकदम पास मे ही टिका था तो यह जानते ही दोपहर के बाद अपने पड़ोसी प्रो.  अरोड़ा के घर के बाहर  काल बेल बजा कर खड़ा था. घर सामान्य सा ही था तभी दरवाजा खुला औऱ एक अधेड़ सा आदमी ने दरवाजा खोला. नमस्कार उपरांत मैंने कहा  मैं अनामी शरण  बबल  पत्रकार, देव औरंगाबाद बिहार से आया हूँ.. दो दिन पहले ही पहली बार दिल्ली आया औऱ मुगलसराय के बाद से लेकर दिल्ली तक आपके दीवारों पर लिखें आपके विज्ञापनो क़ो देखते देखते आपसे मिलने कि चाहत हुई. मेरी बातों क़ो सुनकर वे  खिलखिला कर हंस पड़े औऱ तुरंत मुझे अंदर आने के लिए कहते हुए रास्ता छोड़ दी. विदेशो में भी शादी कराने का दावा करने वाले प्रो. अरोड़ा  ने बताया कि इनके माध्यम से विवाहित  कुछ जोड़े विदेशो में भी है औऱ उनकी मदद से ही कुछ विदेशी जोड़ो कि भी शादियां हुई है लिहाज़ा विज्ञापन कि शब्दावली में विदेश भी जुड़ गया. सहज सरल मीठे स्वभाव के प्रो. अरोड़ा से कोई एक घंटे तक बात की इस दौरान उन्होंने चाय औऱ नाश्ता भी कराया.  मैंने उनसे कहा भी की ट्रेन यात्रा के  दौरान आप मेरे दिमाग़ पर हीरो की तरह छा गये थे मगर आपसे मेरी मुलाक़ात होगी यह सोचा भी नहीं था. मेरी बातें सुनकर वे खुश होते मुस्कुराते सहज भाव से अपने बारे में बताते.  मैं विज्ञापनो के इस राजकुमार प्रो अरोड़ा की सरलता पर चकित था दिल्ली से बिहार लौटने के बाद प्रो. अरोड़ा  के इंटरव्यू क़ो कई अखबारों में छपवाया. ढेरों लोगों क़ो प्रो. अरोड़ा के बारे में बताया. प्रो. अरोड़ा  के पास सारे कतरन भेजा. कई पत्रचार भी हुए औऱ अक्सर धन्यवाद ज्ञापन के पत्र मेरे पास आए, जिसमें दिल्ली आने पर मिलने के लिए वे जरूर लिखते थे.  जुलाई 1987  से तो मैं दिल्ली में आ गया औऱ 1990  से दिल्ली का ही हो गया.  मगर प्रो. अरोड़ा से फिर कभी मिल नहीं सका.  विवेक जी आपने प्रो. अरोड़ा पर लिख कर दिल्ली की पहली यात्रा के साथ उनसे हुई 37+साल पहले की मोहक यादों क़ो जिंदा कर दिया  बहुत सुंदर लिखा है आपने औऱ कमैंट्स लिखने के बहाने मैंने भी प्रो. अरोड़ा पर  पूरा रामायण  लिख गया. वाह शुक्ला जी गज़ब ✌🏼👌👍🏼

केदारनाथ की लीला

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*" केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "*


*एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए।* *आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।*

 *पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ?* *उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।*

 *बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।*

*उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है।  आपकी भक्ति को प्रणाम🙏🏿🙏🏿🙏🏿🙏🏿🙏🏿


कमलेश सिंघल द्वारा संकलित 11 लोकगीत


1.


राम और लछमन दोनों भैया दोनों ही वन को जायँ

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

एक बन चाले, दो बन चाले, तीजे पै लगि आई प्यास 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

ना यहाँ कूआ, ना यहाँ जोहड़, ना यहाँ समंद तलाब 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

छोटा सा बच्चा जल भर लाया, पीओ सिरी भगवान 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

तेरे हाथ कौ बच्चा जल ना पीऊँ, पिता कौ नाम बताय 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

पिता अपने कौ नाम ना जानूँ, सीता मेरी माय  

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

ले चल रे बच्चा वाई रे कुटरिया में, जामें तेरी माय 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

उठ ले री माता सिर नै ढक ले, बाहर खड़े भगवान 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

ऐसे पति कौ बच्चा मुख ना देखूँ, नाय दिखाऊँ आप  

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

फट गयी धरती समा गई सीता, खड़े लखावैं भगवान 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2


2


मेरे सिर पै बंटा-टोकनी, मेरे हाथ में नेजू-डोल, मैं पतली सी कामनी

एक राह मुसाफिर दूर के, छोरी एक घूँट नीर पिलाय, हम परदेसी दूर के,

छोरे ना मेरी डूबै बालटी,छोरे ना मेरा नवै सरीर, मैं पतली सी कामनी

मेरे सिर पै बंटा-टोकनी, मेरे हाथ में नेजू-डोल, मैं पतली सी कामनी

छोरे किसके हो तुम पावने, छोरे किसके हो लणिहार, मैं पतली सी कामनी

मेरे सिर पै बंटा-टोकनी, मेरे हाथ में नेजू-डोल, मैं पतली सी कामनी

छोरी बाप तेरे के पावने, छोरी तेरे सै लणिहार, हम परदेसी दूर के

छोरे इब मेरी डूबे बालटी, छोरे इब मेरा नवै सरीर, मैं पतली सी कामनी

मेरे सिर पै बंटा-टोकनी, मेरे हाथ में नेजू-डोल, मैं पतली सी कामनी


3


: सासुल पनिया कैसे जाऊँ रसीले दोउ नैना

रसीले दोउ नैना, रसीले दोउ नैना

सासुल पनिया कैसे जाऊँ रसीले दोउ नैना

तुम ओढो चटक चुनरिया सिर पै धर लो गागरिया 

छोटी नणदी ले जाओ साथ, रसीले दोउ नैना 

सासुल पनिया कैसे जाऊँ रसीले दोउ नैना

मैंने ओढ़ी चटक चुनरिया सिर धर लई नीर गगरिया 

छोटी नणदी ले लई साथ, रसीले दोउ नैना 

सासुल पनिया कैसे जाऊँ रसीले दोउ नैना

नन्दी बैठो कदम की छैयाँ, मैं भर लाऊँ ठंडा पनिया 

नणदी घर मत कहियौ जाय, रसीले दोउ नैना 

सासुल पनिया कैसे जाऊँ रसीले दोउ नैना 

मेरी नणदी असल छिनरिया, वा नै जाय सिखाइ अपनी मैया 

मैया भाभी के दो यार, रसीले दोउ नैना 

सासुल पनिया कैसे जाऊँ रसीले दोउ नैना 

फागन में ब्याह कराऊँ बैसाख मे गौना लाऊँ 

नणदी फिर ना लउँ तेरौ नाम, रसीले दोउ नैना 

सासुल पनिया कैसे जाऊँ रसीले दोउ नैना


4



 मेरा नौ डांडी का बीजणा, हे मेरा नौ डांडी का बीजणा 

मेरे सुसरे ने दिया घड़वाय, झणाझण बाजै बीजणा


मेरी सास कहे बहू पीस ले, मेरे राजा जी हिला गए हाथ,

छाले पड़ जा हाथ में, मेरा नौ डांडी का बीजणा


मेरे जेठ ने दिया घड़वाय, झणाझण बाजै बीजणा 

मेरी जेठाणी कहे बेबे छान ले, मेरे राजा जी हिला गए हाथ,

धौली हो जा चून में, मेरा नौ डांडी का बीजणा 

मेरे देवर ने दिया घड़वाय, झणाझण बाजै बीजणा

मेरी दौरानी कहे जीजी गूंध ले, मेरे राजा जी हिला गए हाथ,

उँगली मुड़ जा चून में, मेरा नौ डांडी का बीजणा

मेरे नणदोई ने दिया घड़वाय,झणाझण बाजै बीजणा

मेरी नणद कहे भाभी पोय ले, मेरे राजा जी हिला गए हाथ,

उँगली जल जा आग में

मेरा नौ डांडी का बीजणा, हे मेरा नौ डांडी का बीजणा

5


: कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी 

बुला गई राधा प्यारी, बुला गई राधा प्यारी

कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी

जब कान्हा तोहे भूख लगैगी -2

माखन मिसरी खा जइयो, बुला गई राधा प्यारी

कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी

जब कान्हा तोहे प्यास लगैगी -2

ठंडौ पानी पी जइयो, बुला गई राधा प्यारी

कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी

जब कान्हा तोहे ठण्ड लगैगी -2

काली कमलिया ले जइयो, बुला गई राधा प्यारी

कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी

जब कान्हा तोहे गरमी लगैगी -2

मोर कौ पंखा ले जइयो, बुला गई राधा प्यारी

कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी

जब कान्हा तोहे नींद लगैगी -2

झालर तकिया ले जइयो, बुला गई राधा प्यारी

कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी


6



: उठो-उठो दयानंद बीर भतेरे दिन सो लिए मेरे राम -2

दयानंद उठे ढड़ती सी रात, बनखंड की राही हो लिए मेरे राम

बनखंड के मा धौड़ी-धौड़ी गाय, आँसू तो गेरै मोरनी मेरे राम

तू क्यों रोवै धौड़ी-धौड़ी गाय, सेवा तो तेरी मैं करूं मेरे राम -2

सोने की तेरी सिंघनी घड़ाय, चाँदी की तेरी बिजनखुरी मेरे राम

रहने को तोकू गउशाला बनवाय, खाने को तोकू दाल चने की हो राम

जीवै-जीवै दयानंद तेरे पूत, सेवा तो तैने बहुत करी मेरे राम -2

उठ-उठ दयानंद बीर भतेरे दिन सो लिए मेरे राम


7



मनिहारे का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया -2

झोली कंधे धरी उसमें चूड़ी भरी -2

गलियों में शोर मचाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

छलिया का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

राधा ने सुनी ललिता से कही -2

मोहन को तुरत बुलाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

मनिहारे का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया -2

चूड़ी लाल नहीं पहरूँ, चूड़ी हरी नहीं पहरूँ

मुझे स्याम रंग है भाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

राधा पहरन लगी, स्याम पहराने लगे -2

राधा ने हाथ बढाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

राधा कहने लगी तुम हो छलिया बड़े 

धीरे से हाथ दबाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

मनिहारे का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया -2

छलिया का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया -2


8



अरी मै तो ओढ़ चुनरिया जाऊँगी मेले में

अरे मेरे बाँके साँवरिया मिलियौ अकेले में

सास मेरी त्योहारों के दिन गीलौ गोबर पथवावै

बर्तन भांडे चूल्हा चौका अरी जी गोबर पथवावै

हे री मेरा जी घबरावै घर के झमेले में

अरी मैं तो ओढ़ चुनरिया जाऊँगी मेले में

अरे मेरे बाँके साँवरिया मिलियौ अकेले में

चार पैसे की बिंदिया खरीदी दो पैसे का सुरमा

हलवा पूरी खाई मुफत में,मुफत में खाया खुरमा

अरी मैंने पान चबाया खोटे से धेले में

अरी मैं तो ओढ़ चुनरिया जाऊँगी मेले में

अरे मेरे बाँके साँवरिया मिलियौ अकेले में

रथ में ना बैठूँ मोटर में ना बैठूँ

अरी मैं तो सैर करूँगी बैठ के ठेले में

अरी मैं तो ओढ़ चुनरिया जाऊँगी मेले में

अरे मेरे बाँके साँवरिया मिलियौ अकेले में


9



दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै -2

चोरी करने गए बरसाने -2

वहाँ पै हो गयी भोर, पकड़ लियौ राधे नै

दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै

चोर-चोर सब कोई चिल्लावैं -2

ये तो निकरौ नन्दकिसोर, पकड़ लियौ राधे नै

दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै

कोई सखी मारै कोई धमकावै -2

दियौ राधे ने झकझोर, पकड़ लियौ राधे नै 

दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै

अबकी बार बचा लै राधे -2

फिर ना आउँ तेरी ओर, पकड़ लियौ राधे नै

दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै


10




मन्नै आवै हिचकी, परदेस गए बालम की याद सतावै हिचकी 

मन्नै आवै हिचकी, परदेस गए बालम की याद सतावै हिचकी

सुनो सहेली बात मेरी, मैं बात कहूँ सूँ साँच-2 

इब कै बालम घर आजा, मैं हँस-हँस कर ल्यूँ बात 

मन्नै आवै हिचकी, परदेस गए बालम की याद सतावै हिचकी 

म्हारे आँगन बेरनी रे, उस पै बोल्या काग-2 

सोने की तेरी चोंच मढा दूँ, पिया बुला दे आज  

मन्नै आवै हिचकी, परदेस गए बालम की याद सतावै हिचकी 

उड़ उड़ काग मँडेरे तै, साजन का बेरा ल्या-2 

मेरा हिया उमगता आवै सै, मेरी हिचकी बढती जा 

मन्नै आवै हिचकी, परदेस गए बालम की याद सतावै हिचकी 

म्हारे आँगन बेरनी के मीठे-मीठे बेर

इबके बालम घर आजा मैं नहीं जाण दूँ फेर 

मन्नै आवै हिचकी, परदेस गए बालम की याद सतावै हिचकी 

सुनो सहेली बात मेरी मैं बात कहूँ सूँ साँच-2 

इबके बालम घर आजा मैं भेल्ली बाँटू पाँच 

मन्नै आवै हिचकी, परदेस गए बालम की याद सतावै हिचकी



11




: पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

हाय, पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

बिंदी बनवा दे चाहे टीका बनवा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

चूड़ी बनवा दे चाहे कंगन बनवा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

बाली बनवा दे चाहे झुमके बनवा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

कालर बनवा दे चाहे पैंडल बनवा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

तगड़ी घड़वा दे चाहे गुच्छा घड़वा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

चुटकी घड़वा दे चाहे पायल घड़वा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की


कमलेश सिंघल द्वारा संकलित सम्पादित  लोक गीत संग्रह लोकगीत मंजरी  से साभार 🙏🏿🙏🏿



सोमवार, 18 अक्तूबर 2021

किशोर कुमार कौशल के दोहे

 .                  दोहे

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कलियाँ चटकी और फिर,खिले फूल ही फूल।

छूकर वासंती हवा,राह गए हम भूल।।


कोयल कूकी डाल पर,भूली पीर तमाम।

पीले पत्ते छोड़कर,फिर बौराया आम।।


जाडे़ की जकड़न हटी,आया फागुन मास।

खिला गाल के भाल पर,जीवन का उल्लास।।


शीतकाल कर अलविदा,आता मृदुल वसंत।

फूलों ने खिलकर कहा,रहो सदा रसवंत।।


जीवन का मेला लगा,बिखरे रंग हजार।

तू भी कोई छाँट ले,क्यों बैठा मन मार।।


सरसों से गेहूँ कहे,अल्हड़ उमर सँभाल।

खिले फूल के खेत में,और खिल उठे गाल।।


कुछ यौवन कुछ लाज से,लाल हुए जब गाल।

फागुन कहे वसंत से,किसने मला गुलाल।।


प्रिय तुम जब मुसका उठी,फैला प्रेम-प्रकाश।

घर-आँगन हँसने लगा,खिल-खिल उठे पलाश।।


फागुन के ये चार दिन,बोल प्यार के बोल।

मस्ती के माहौल में,तू भी मस्ती घोल।।


कुछ मिट्टी ने रस दिया,कुछ वासंती घाम।

कुछ कोयल की कूक से,हुए रसीले आम।।


मधुवन में मधुकर करे,मधुर-मधुर गुंजार।

सिमटे कलिका-कामिनी,लोक-लाज के भार।।


छिटक छरहरी चाँदनी,झाँके मधुवन बीच।

मादकता मधुमास की,प्रीत रही है सींच।।


आई उनकी याद तो,महका हरसिंगार।

आहट सुनकर द्वार पर,मन में बजा सितार।।


*    *    *    *    *    *    *    *

 







.                दोहे

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मैं नन्हा सा दीप हूँ,करता तनिक उजास।

सूरज कहकर क्यों करे,जग मेरा उपहास।।


घर-बाहर सब एक है,मन को रखिए शुद्ध।

घर में रहो कबीर से,बाहर जैसे बुद्ध।।


सुविधाओं का आपने,लगा लिया अंबार।

खिलता जीवन-पुष्प तो,झंझाओं के पार।।


तीन पीढि़याँ एक छत,रहे मौज से खूब।

अब सबके कमरे अलग,फिर भी जाते ऊब।।


नई सदी से विश्व ने,यह पाया उपहार।

बात-बात पर आदमी,लड़ने को तैयार।।


सबसे ऊँचा द्वार है,मानवता का द्वार।

सबसे अच्छा धर्म है,तेरा-मेरा प्यार।।


जीवन जीने के लिए,चुनिए मुश्किल ढंग।

संकट में खिलते सदा,इंद्रधनुष के रंग।।


*  *  *  *  *  *  *  *  *  *

--किशोर कुमार कौशल

   9899831002

ठहरे हुए लोग / रवि अरोड़ा

 

बचपन से ही माता पिता के साथ गुरुद्वारों में माथा टेकने जाता रहा हूं ।  गुरुद्वारा परिसर में किसी निहंग सिख के दिखने पर माता पिता मुझे सिखाते थे कि इन्हे सत श्री अकाल कहो । पूछने पर वे बताते थे कि ये हमारी कौम के सिपाही हैं और गुरु गोविंद सिंह जी के आदेश पर ही हमारी रक्षा के लिए इन्होंने यह वेश धारण किया है । हालांकि मेरा बाल मन उनसे डरता था । जाहिर है कि सिर से पांव तक नीले कपड़े , लंबी खुली दाढ़ी, हाथों में बरछा, कमर में लंबी तलवार और खंडा किसी बाल मन को भयभीत करने के लिए काफी ही होता था । थोड़ा बड़ा हुआ तो उनका उजड्ड आचरण भी डराने लगा ।  बंगला साहिब अथवा हरमंदिर साहिब जैसे किसी गुरुद्वारे के सरोवर में स्नान करते समय श्रद्धालुओ के प्रति उनका अपमानजनक व्यवहार भी सीख देता था कि इनसे दूर ही रहा जाए । थोड़ा बड़ा हुआ तो मन में सवाल उठने लगा कि आज जब देश आजाद है । हमारे पास अपनी सरकार, पुलिस , सेना और पूरा तंत्र है , फिर ये लोग अब किसकी रक्षा कर रहे हैं और किससे कर रहे हैं ? 


डेढ़ साल पहले कोरोना काल में पटियाला की एक सड़क पर जब कर्फ्यू पास दिखाने को कहने पर एक निहंग ने पुलिस कर्मी का हाथ काट दिया तो मुझ जैसे तमाम लोगों की पुख्ता राय बनी कि ये लोग सिख तालिबानी हैं और देर सवेर देश को इनके बाबत भी कुछ सोचना पड़ेगा ।


हाल ही में किसान आंदोलन के बीच एक दलित लखबीर सिंह की निहंगों ने जिस तरह से नृशंस हत्या की और पुलिस, प्रशासन , तमाम सरकारें , सभी राजनीतिक दल मुंह में दही जमा कर बैठ गए । जिस तरह से लखबीर के अंतिम संस्कार को रोका गया और उसके परिजनों को कोई धार्मिक आयोजन भी नहीं करने दिया गया । यही नहीं कोई राजनैतिक कार्यकर्ता तो दूर कोई गांव वाला भी मृतक के परिजनों को सांत्वना देने नहीं गया, उससे सवाल उठने लगा है कि चंद सिरफिरे ही अतिवादी हैं अथवा अपना यह पूरा मुल्क ही इन अंधेरी गलियों की ओर चल पड़ा है ? क्या सचमुच अन्य मुल्कों की तरह यहां भी इंसानी मन की तमाम कोमल भावनाएं अब इतिहास होने की कगार पर हैं ? 


 बेशक किसी धार्मिक पुस्तक का अपमान नहीं होना चाहिए मगर क्या इंसानी जीवन का इस वहशियाना तरीके से  होना चाहिए ?  अभी तक कोई सबूत नहीं मिला है कि लखबीर ने गुरु ग्रंथ साहब की बेअदबी की । एक वीडियो कहता है कि वह अपमान करने वाला था तो एक वीडियो कहता है कि वह ग्रंथ साहब को उठा कर ले जाना चाहता था । एक वीडियो में तो दसवें गुरु की पुस्तक सर्बलोह के अपमान की बात की गई है और अभी तक यह भी स्पष्ट नही हो रहा कि अपमान ग्रंथ साहब का हुआ अथवा होने वाला था या सर्बलोह का ? जाहिर है कि सर्ब लोह की वह मान्यता नहीं है जो गुरु ग्रंथ साहब की है । सर्ब लोह जैसे तो अनेक ग्रंथ सिख धर्म में हैं , जिन्हे आदर तो दिया जाता है मगर पूजा नहीं जाता ।  घटना के बाद सामने आए तमाम वीडियो में निहंग जिस प्रकार अपनी बहादुरी का बखान कर रहे हैं , उससे क्या यह सवाल नहीं उठता कि बेहद समझदार सिख कौम इन जंगलियों से अपने को कब तक जोड़े रखेगी ?


क्या कौम के रहनुमाओं को सोचना नहीं चाहिए कि इतिहास में कहीं ठहरे हुए ये लोग उनकी तमाम सिफतों पर पानी क्यों फेर रहे हैं ? इन निहंगों की इस करतूत को देख कर क्या मेरे जैसे तमाम अज्ञानियों के मन में यह सवाल नही उठेगा कि क्या ये निहंग भी उसी सिख कौम के हिस्सा हैं जिसने आतातायियो से सदियों हमारी रक्षा की , आजादी के लिए सर्वाधिक कुर्बानियां दीं और आज भी कोरोना जैसी महामारी में सेवा के सर्वोत्तम कार्य कर नित नई मिसाल पेश कर रहे हैं ?

रविवार, 17 अक्तूबर 2021

प्रेम की ऊर्जा* / भक्ति सूत्र / ओशो

 


तुम पैदा हुए हो प्रेम की किसी ऊर्जा से। सारे जगत का खेल चलता है प्रेम की ऊर्जा से। अब तो वैज्ञानिकों को भी शक होने लगा है कि शायद जिसे वे गुरुत्वाकर्षण कहते हैं पृथ्वी का, वह पृथ्वी का प्रेम हो! और जिसे वे ऋण और धन विद्युत का आकर्षण कहते हैं, वह शायद विद्युतीय प्रेम हो! शायद जिसे वे तारों के बीच का संबंध और जोड़ कहते हैं, वह भी चुंबकीय प्रेम हो! शायद अणु-परमाणु जिससे गुंथे हैं–टूटकर छितर नहीं जाते, वह भी प्रेम की ही गांठ हो, वह भी प्रेम का ही गठबंधन हो! होना भी चाहिए, क्योंकि आदमी कुछ अलग-थलग तो नहीं। आया है इसी विराट से, जाएगा, इसी विराट में। जहां से आदमी आता है, वहीं से पौधे आते हैं, वहीं से पत्थर आते हैं। जरूर कोई चीज तो समान होनी ही चाहिए। स्रोत समान है तो कुछ चीज तो समान होनी ही चाहिए। तभी तो तुम पत्थर के पास बैठकर भी अजनबी अनुभव नहीं करते। वृक्ष के पास बैठकर भी अपनापन अनुभव करते हो। सागर भी बुलाता है। हिमालय से भी बात हो जाती है। आकाश को देखते हो तो भी संबंध बनता है, परिवार मालूम होता है।


अस्तित्व परिवार है। और अगर परिवार को तुम समझो, तो परिवार को जोड़नेवाला सेतु और धागे का नाम ही प्रेम है।


इसलिए जीसस का वचन अनूठा है, जब जीसस ने कहा: परमात्मा प्रेम है। जीसस ने यह कहा कि परमात्मा को छोड़ दो तो भी चलेगा, प्रेम को मत छोड़ देना। परमात्मा को भूल जाओ, कुछ हर्जा न होगा; प्रेम को मत भूल जाना। प्रेम है तो परमात्मा हो ही जाएगा। और अगर प्रेम नहीं है तो परमात्मा पत्थर की तरह मंदिरों में पड़ा रह जाएगा, मुर्दा, लाश होगी उसकी, उससे जीवन खो जाएगा।


भक्ति का सारा सूत्र प्रेम है। और प्रेम से सब निकला है पदार्थ ही नहीं, परमात्मा भी। परमात्मा प्रेम की आत्यंतिक नियति है–अंतिम खिलावट! आखिरी ऊंचाई! संगीत की आखिरी छलांग! परमात्मा प्रेम का ही सघन रूप है। प्रेम को समझा तो परमात्मा को समझा। प्रेम को न समझ पाए तो परमात्मा से चूक हो जाएगी।


भक्ति सूत्र 


ओशो

अकेले../ प्रेम रंजन अनिमेष*

 

                              🌿

कौन  सच का  साथ देगा  चल अकेले 

इस  अँधेरे  में  दिया  बन  जल अकेले 


हो गयीं बेख़्वाब  अब आँखें  सभी की

ख़वाब है तू  या कि आँसू  पल अकेले 


सारी  दुनिया  के  लिए  किरणें लुटाता

है  बना  सूरज  अगर  तो  ढल अकेले 


चाहता  है   भूख  वो   सबकी  मिटाना

पक  रहा  हाँड़ी में  जो  चावल अकेले 


दिल बड़ा है और ये दुनिया भी फिर क्यों 

खिल रहा  इसमें कोई  शतदल अकेले


कर्म किसका धर्म किसका मर्म किसका

डाल  पर  पंछी  कुतरता  फल  अकेले 


ज़िंदगी  की   मुश्किलों  के   सामने  है  

प्यार का  सच्चा खरा  इक पल अकेले


हो भला जग का ये जिम्मा हर किसी का

पड़ता  क्यों  माथे  पे  तेरे  बल  अकेले


छाँव और पानी  लिये  जाये  सभी तक

आसमां  का   आख़िरी  बादल  अकेले


है   बची   उम्मीद   जैसे   सूने   घर   में    

खेलता   बच्चा   कोई   चंचल   अकेले


बाँट लो  जीवन ये  जितना  बाँट सकते

मिलना  होगा   मौत  से  केवल  अकेले

 

हूँ मैं लौ  'अनिमेष'  वो  जिसको जुगाये 

आँधियों  के बीच  इक  आँचल  अकेले

                              🪔

                                ✍️ *प्रेम रंजन अनिमेष*

राम शबरी संवाद

 एक टक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद वृद्धा भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे :-


*"कहो राम !  शबरी की कुटिया को ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ  ?"*


राम मुस्कुराए :-  *"यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य ?"*


*"जानते हो राम !   तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्मे भी नहीं थे|*   यह भी नहीं जानती थी, कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? *बस इतना ज्ञात था, कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।*


राम ने कहा :- *"तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था, कि राम को शबरी के आश्रम में जाना है”|*


"एक बात बताऊँ प्रभु !   *भक्ति में दो प्रकार की शरणागति होती हैं |   पहली  ‘वानरी भाव’,   और दूसरी  ‘मार्जारी भाव’*|


*”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न...  उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है, और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है|  दिन रात उसकी आराधना करता है...”* (वानरी भाव)


पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया|  *”मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी,   जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न,   वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी,   और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है...   मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना..."* (मार्जारी भाव)


राम मुस्कुरा कर रह गए |


भीलनी ने पुनः कहा :- *"सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न...   “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम,   कहाँ घोर दक्षिण में मैं”|   तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य,   मैं वन की भीलनी...   यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते ?”*


राम गम्भीर हुए | कहा :-


*भ्रम में न पड़ो मां !   “राम क्या रावण का वध करने आया है” ?*


*रावण का वध तो,  लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर भी कर सकता है|*


*राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है,   तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों के बाद भी,  जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे,   कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था”|* 


*जब कोई  भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं !   यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ,   एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है|*


*राम वन में बस इसलिए आया है,   ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाय,   तो उसमें अंकित हो कि ‘शासन/प्रशासन/सत्ता’ जब पैदल चल कर वन में रहने वाली समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है”|*

(अंत्योदय)


*राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया हैं  मां।*

माता शबरी एकटक राम को निहारती रहीं।


राम ने फिर कहा :-


*राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता ! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है,   भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए”|*


*राम निकला है,   ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है”|*


*राम निकला है, कि ताकि “भारत विश्व को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है”।*


*राम आया है,   ताकि “भारत विश्व को बता सके कि अन्याय और आतंक का अंत करना ही धर्म है”।*


*राम आया है,   ताकि “भारत विश्व को सदैव के लिए सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है, कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय”।* 


और


*राम आया है,   ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं”।*


शबरी की आँखों में जल भर आया था|

उसने बात बदलकर कहा :-  "बेर खाओगे राम” ?


राम मुस्कुराए,   "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां"


शबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया|


राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा :- 

"बेर मीठे हैं न प्रभु” ?


*"यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां ! बस इतना समझ रहा हूँ,  कि यही अमृत है”|*


सबरी मुस्कुराईं, बोलीं :-   *"सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम"*

 


*अखंड भारत-राष्ट्र के महानायक, मर्यादा-पुरुषोत्तम, भगवान श्री राम को बारंबार सादर वन्दन !*

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गालिब के साथ सर सैयद अहमद / विवेक शुक्ला

 

मिर्जा मोहम्मद असादुल्लाह बेग खान यानी मिर्जा गालिब और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के  फाउंडर सर सैयद अहमद खान दिल्ली वाले थे। दोनों पड़ोसी भी थे। सर सैयद अहमद ‎‎ ( जन्म 17 अक्टूबर 1817 - 27 मार्च 1898) ने दिल्ली के महत्वपूर्ण स्मारकों पर ‘असरारुस्नादीद’ ( इतिहास के अवशेष) नाम से महत्वपूर्ण किताब भी लिखी। इसकी प्रस्तावना गालिब ने नहीं लिखी थी। हालांकि उन्होंने ‘आईंने अकबरी’ की प्रस्तावना लिखी थी। उसका सर सैयद ने फारसी से उर्दू में अनुवाद किया था।

 ‘असरारुस्नादीद’ दो खंडों में छपी थी। इसका प्रकाशन 1842 में हुआ था। इसमें दिल्ली की 232 ऐतिहासिक इमारतों पर विस्तार से लिखा गया है।असरारुस्नादीद में जिन स्मारकों का जिक्र किया है, उनमें से कइयों को गोरों ने सन 1857 की क्रांति के बाद नेस्तानाबूत कर दिया था।


फिर सन 1911 में दिल्ली के राजधानी बनने के बाद भी कई स्मारक तोड़ दिए गए।  सर सैयद अहमद महरौली स्थित हौज ए शम्सी का जिक्र करते हैं। 800 साल पुराना राष्ट्रीय महत्व का यह ऐतिहासिक तालाब है। अफसोस कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इसकी कायदे से सुध नहीं ली। एएसआई की संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल यह तालाब बदहाल है।


 वे असरारुस्नादीद में  बाग ए नजीर का भी जिक्र करते हैं। ये भी महरौली इलाके में है।ये अब भी बेहतर तरीके से मेनटेन हो रहा है।जो घर था सर सैयद अहमद का 


दरियागंज में अब बंद हो गए गोलचा सिनेमा के पीछे चलिए। आप कुछ देर में पहुंच जाते हैं सर सैयद अहमद रोड पर। हर वक्त रौनक रहती है यहां। इसी जगह पर है मुसलमानों को तालीम की रोशनी दिखाने वाले शख्स सर सैयद अहमद का जन्म स्थान।


 ये बात दीगर है कि अब किसी अनजान शख्स के लिए सर सैयद अहमद के पुश्तैनी घर को खोजना लगभग असंभव है। बमुश्किल ही कोई मिल पाता है, जिसे मालूम होता है उनका घर। ये लगभग एक हजार गज में है। इसमें ही सर सैयद अहमद का जन्म हुआ था। उनके परिवार की दिल्ली में खासी प्रतिष्ठा थी। इसी में उनके बचपन के शुरूआती साल बीते।


पर अब उनके घर के अवशेष भी नहीं बचे हैं। लंबे समय तक लगभग उजाड़ रहा यह घर। इधर गायें-भैंसें बंधी रहती थीं। बीते कुछ समय के दौरान सर सैयद अहमद के घर को जमींदोज करके बन गए हैं सुंदर फ्लैट। हर फ्लैट की कीमत एक-डेढ़ करोड़ रुपये से कम नहीं होगी। अफसोस इसके बाहर किसी ने एक पत्थर ( Plaque) लगवाने की भी कोशिश नहीं हुई की ताकि पता चल जाए कि क्यों ये स्थान है खास है।


 दरियागंज से दिल्ली विधानसभा के सदस्य  शोएब इकबाल दावा करते हैं कि उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के दिल्ली में रहने वाले पुराने छात्रों से सर सैयद अहमद के घर को स्मारक या लाइब्रेयरी में तब्दील करने के संबंध में बार-बार बात की।  आरिफ मोहम्मद खान, मुफ्ती मोहम्मद सईद समेत बहुत से असरदार नेताओं से मिले भी। 


लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। सब वादे करके भूल गए। एक-दो सामाजिक संगठनों ने भी कोशिशें कि सर सैयद अहमद के जन्म स्थान को स्मारक बनाने के लिए। अफसोस वो कोशिशें भी नाकाफी ही सिद्ध हुईं।


सर सैयद अहमद खान को आमतौर पर  अलीगढ़ के साथ जोड़कर देखा जाता है। इसकी वजह वाजिब है। आखिर उन्होंने वहां  एक यूनिवर्सिटी की स्थापना की। पर वे थे तो दिल्ली वाले। दिल्ली में उनका बचपन गुजरा।  वे इसी दिल्ली में यमुना में तैराकी करने बराबर जाया करते थे।  उनके पिता  की तुगलाकाबाद में जमीनें हुआ करती थीं। इसलिए वे अपने परिवार की जमीनों को  देखने के लिए तुगलकाबाद जाया करते थे। 

Vivekshukladelhi@gmail.com

ABCD........ Z/ देवी देवताओं के नाम

 हम सबको A B CD तो आती है लेकिन  abcd देवीओ के नाम जुडे है वो बहोत ही कम लोगों को पता है।  नवरात्रोत्सव निमित्त देवीओ ना नाम जान लो।


ooooO

(  🌼 )  Ooooo

 \       (    (  🌼  )

   \    )     )      /

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                ︶


A=अम्बे.   👣

     B=भवानी 👣

        C=चामुंडा 👣

             D=दुर्गा 👣

                E=एकरूपी 👣

                  F=फरसाधारणी 👣

                       G=गायत्री 👣

                           H=हिंगलाज  👣

                                I=इंद्राणी 👣

                                    J=जगदंबा 👣

                                K=काली 👣

                               L=लक्ष्मी 👣

                          M=महामाया 👣

                      N=नारायणी 👣

                O=ॐकारणी 👣

            P=पद्मा👣

               Q=कात्यायनी 

                    R=रत्नप्रिया 👣

                         S=शीतला 👣

                           T=त्रिपुरासुंदरी 👣

                                 U=उमा.     👣

                                  V=वैष्णवी 👣

                                       W=वराही 👣

                                         Y=यति 👣

                                            Z=ज़य्वाना 👣


​ll सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्य त्र्यम्बके

गौरी नारायणी नमस्तुते ll


🙏🌹🙏🏻

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

जबलपुर का यह चेहरा / टिल्लन रिछारिया

 संस्कारधानी जबलपुर यानी साहित्य , संस्कृति , राजनीति की विशिष्टम हस्तियों की कर्मभूमि । ... सेठ गोविन्ददास , द्वारिका प्रसाद मिश्र  , महर्षि महेश योगी , आचार्य रजनीश , फ़िल्म अभिनेता प्रेमनाथ , कालिका प्रसाद दीक्षित , हरिशंकर परसाई , रामेश्वर शुक्ल  ' अंचल ' कैलाश नारद आदि के कियाकलापों से प्रेरित उत्प्रेरित उत्सवप्रिय जबलपुर के आत्मीय जन जो एक बार आप से मिले तो जीवनभर सुख दुख के साथ बने रहते है । बड़े प्रेमिल लोग । ज्ञानयुग प्रभात के  दफ्तर के आसपास की चाय पान की दूकानीं आर सिंधी ढाबा अभी भी याद है ।रातबिरात कबि ढाबे पर जाओ कुछ न कुछ बना कर जरूर खिलाता था । चाय पान की दूकान पर एक दो दिन न जा पाओ तो  शिकायत  , कहां थे जनाब , दो दिन से दिखे नहीं ! ...दफ्तर के बगल के पान की दूकान वाले ने दूसरे दी ही हमारा स्वागत करते हुए कहा ।... आप टिल्लन जी ...वो पूनम ढिल्लन जी का फोन आया था , कह रही थीं , भाई साहब का ख्याल रखना । ...मैने कहा,शुक्रिया ,  हाँ  यार वो राखी भी भेजी है आपके लिए अभी लाता हूँ । जबलपुर ज्यादा देर तक अजाना नहीं रहने देता । जल्दी आत्मसात कर लेता है । ...jaari hai

महाराणा सांगा

 राजस्थान के सबसे बड़े और साहसी शूरवीरों में से एक महाराणा सांगा को आज भी उनके बलिदान के लिए पूजा जाता है। मेवाड़ के पूर्व शासक एवं महाराणा प्रताप के पूर्वज राणा सांगा ने मेवाड़ में 1509 से 1528 तक शासन किया। राणा सांगा ने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सभी राजपूतों को एकजुट किया। राणा सांगा सही मायनों में एक बहादुर योद्धा व शासक थे जो अपनी वीरता और उदारता के लिये प्रसिद्ध थे। सांगा उस समय के सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे। उन्होंने दिल्ली, गुजरात व मालवा मुगल बादशाहों के आक्रमणों से अपने राज्य की बहादुरी से ऱक्षा की।


राणा सांगा अदम्य साहसी थे। एक भुजा, एक आंख खोने व अनगिनत ज़ख्मों के बावजूद उन्होंने अपना धेर्य और पराक्रम नहीं खोया। सुलतान मोहम्मद शासक माण्डु को युद्ध में हराने व बन्दी बनाने के बाद उन्हें उनका राज्य पुन: उदारता के साथ सौंप भी दिया, यह उनकी महानता और बहादुरी को दर्शाता है।


फरवरी 1527 ई. में खानवा के युद्ध से पूर्व बयाना के युद्ध में राणा सांगा ने मुगल सम्राट बाबर की सेना को परास्त कर बयाना का किला जीता। इस युद्ध में राणा सांगा के कहने पर राजपूत राजाओं ने पाती पेरवन परम्परा का निर्वाहन किया। बयाना के युद्ध के पश्चात 17 मार्च, 1527 ई. में खानवा के मैदान में ही राणा साांगा जब घायल हो गए थे तब उन्हें बाहर निकलने में कछवाह वंश के पृथ्वीराज कछवाह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा पृथ्वीराज कछवाह द्वारा ही राणा सांगा को घायल अवस्था में काल्पी (मेवाड़) नामक स्थान पर पहुंचाने में मदद दी गई। ऐसी अवस्था में राणा सांगा पुन: बसवा आए जहा सांगा की 30 जनवरी, 1528 को मृत्यु हो गयी। लेकिन राणा सांगा का विधि विधान से अन्तिम संस्कार माण्डलगढ (भीलवाड़ा) में हुआ। इतिहासकारों के अनुसार उनके दाह संस्कार स्थल पर एक छतरी बनाई गई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि वे मांडलगढ़ क्षेत्र में मुगल सेना पर तलवार से गरजे थे। युद्ध में महाराणा का सिर अलग होने के बाद भी उनका धड़ लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ।


एक विश्वासघाती के कारण वह बाबर से युद्ध जरूर हारे, लेकिन उन्होंने अपने शौर्य से दूसरों को प्रेरित किया। इनके शासनकाल में मेवाड़ अपनी समृद्धि की सर्वोच्च ऊंचाई पर था। एक आदर्श राजा की तरह सांगा ने अपने राज्य की रक्षा तथा उन्नति की। सांगा ने मुगलों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। वे मांडलगढ़ क्षेत्र में मुगल सेना पर तलवार से गरजे थे। युद्ध में महाराणा का सिर माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) की धरती पर गिरा, लेकिन घुड़सवार धड़ लड़ता हुआ चावण्डिया तालाब के पास वीरगति को प्राप्त हुआ।

हिंदी की कक्षा / गरिमा जैन

 

बात उन दिनों की है जब मैं कक्षा आठ में पढ़ा करती थी। उन दिनों मुझे याद है हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक में एक चैप्टर था जिसका नाम था ठूठा आम। हमारी हिंदी की अध्यापिका  को न जाने क्यों वही एक पाठ पढ़ाने का मन करता।


      कई हफ्तों से प्रथा चली आ रही थी कि मैम कक्षा में आती, सर्वप्रथम वह कुछ बच्चों को खड़ा करती जो पाठ्यपुस्तक लेकर नहीं आते थे। क्लास में ना जाने क्यों वह छोटी सी पतली सी किताब लगभग 15 से 20 बच्चे लाना रोजाना भूल ही जाते थे। उन सारे बच्चों को बाहर निकाला जाता और  ठूठा आम पाठ शुरू होता ।

लगभग आठ 10 लाइन पढ़ाई जाती कि बाहर खड़े बच्चे शोर मचाने लगते ।उन्हें चुप कराने के लिए मैम बाहर जाती। सजा के तौर पर हाथ ऊपर उठाने को भी कहती ।  वो अंदर आती और ठूठा आम पाठ लगभग एक पन्ना पूरा होता कि घंटी बज जाती। सारे बच्चे कोलाहल करने लगते।

उनका क्लास ऐसा होता था कि हमें पूरे दिन की थकान जैसे मिटा देता था ।गणित, विज्ञान के क्लास के बाद यह हिंदी की कक्षा हमें बड़ी मनोरम लगती। उसमें हमें अच्छा खासा मनोरंजन भी होता ।हम उस समय यह नहीं सोचते थे कि एग्जाम में हम क्या लिखकर आएगे। हमें तो बस हंसी ठिठोली से मतलब था ।

बात उस दिन की है जब ना जाने कैसे मैं भी पाठ्यपुस्तक ले जाना भूल गई। मैं कक्षा के अच्छे छात्रों में गिनी जाती थी और क्लास के बाहर कभी भी खड़ी नहीं हुई थी। मैं बड़ी असमंजस में पड़ गई कि अब मैं क्या करूं। मैम तो मुझे भी बाहर निकाल देंगी और हुआ भी वही। मैम ने कहा 

"आप अच्छी छात्रा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको छोड़ दूंगी आपको भी सब बच्चों के साथ कक्षा के बाहर खड़े होना होगा "

बचपन से लेकर आज तक मुझे सजा में कभी भी बाहर नहीं खड़ा होना पड़ा था ।आज जब मैं बाहर खड़ी हुई लगभग 15 बच्चों के साथ मुझे ऐसा लगा कि कोई मुझे पहचान ना ले। जब भी कोई टीचर मेरे पास से निकलती लगता है वह मुझ पर कोई टीका टिप्पणी ना कर दे ।जूनियर बच्चे निकलते तो वहां से कहते "अरे दीदी आज आप भी" तभी वहां से प्रिंसिपल निकले जो अक्सर उसी कक्षा के समय निकलते थे। मैं अपनी आंखें चुरा कर चेहरा नीचे झुका के खड़ी हो गई। मुझे लगा भगवान किसी तरह प्रिंसिपल मुझे ना देखें नहीं तो ऐसा ना हो कि अगले साल जब कैप्टन बनने का मौका आए तब मुझे इस चीज के लिए ना चुना जाए ।इस पर उनको यह बात याद रहे कि यह तो सजा के तौर पर बाहर खड़ी थी पर प्रिंसिपल  मेरे ठीक सामने खड़े हो गए और मुझसे ही पूछने लगे "क्या तुमने होमवर्क नहीं किया"

मैंने नज़रे बचाते हुए कहा कि नहीं मैं किताब लाना भूल गयी। उन्होंने कुछ नहीं कहा ,सब बच्चे को देखते हुए आगे बढ़ गए । मैं शर्म से पानी-पानी हो गई ।मुझे बार-बार अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था कि क्यों कल गृह कार्य करने के बाद मैंने हिंदी पाठ्यपुस्तक वापस  अपने बैग में नहीं रखी थी ।तभी मैम बाहर आई और सबको वहीं सजा मिली जो रोज मिलती थी। हाथ ऊपर करके खड़े होने की ।मैं भी अपने हाथ ऊपर करके खड़ी हो गई पर जैसे ही मैम कक्षा में प्रवेश करी बच्चों ने अपने हाथों निचे कर लिए ।मैं फिर असमंजस में पड़ गई ।मुझे क्या करना चाहिए? क्या मुझे अपने हाथों को ऊपर रखना चाहिए और आज्ञाकारी  बनना चाहिए या फिर जिंदगी के मजे लेने चाहिए ।आखिर में मैंने जिंदगी के मजे लेना ही ठीक समझा। अब मैं उन 15 बच्चों की जमात में शामिल हो गई थी। मेरी शर्म पानी भर रही थी ।जैसी मैम बाहर निकलती सब चुप हो जाते अंदर जाती तो फिर हँसी ठिठोली ।

मुझे वह कक्षा 8 आज तक याद है जबकि इस बात को बीते कई वर्ष हो चुके हैं ।जब भी मैं उस बात को याद करती हूं मेरे होठों पर मुस्कान आ जाती है ।कभी मुझे कोई सजा नहीं होती थी ,अभी थप्पड़ नहीं खाया था, डांट नहीं खाई थी लेकिन उस रोज क्लास के बाहर खड़े होकर जो आनंद मैंने प्राप्त किया था वह आनंद मुझे दोबारा फिर कभी नहीं मिला ठूठ आम पाठ मुझे आज भी बहुत याद आता है।

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2021

विज्ञान की कहानी

 विज्ञान की दुनिया का पहला शहीद (ब्रूनो) था


 यह कहानी निकोलस कॉपरनिकस (1473 -1543) से शुरू होती है। वे पोलैंड के रहने वाले थे । गणित व खगोल में इनकी रुचि थी। 


खगोल में अब तक हमारे पास टालेमी का दिया हुआ  ब्रह्मांडीय  मॉडल था। इसके अनुसार पृथ्वी स्थिर थी और केंद्र में थी व सभी अन्य खगोलीय पिंड इसके चारों ओर चक्कर  लगाते दर्शाए गए थे। विद्वानों ने इसका समय-समय पर अध्ययन किया था। गणितीय दृष्टि से कुछ दिक्कतें थी जो इस मॉडल से हल नहीं हो रही थी।


 कॉपरनिकस का मानना था कि यदि पृथ्वी की बजाए सूर्य को केंद्र में रख लिया जाए तो काफी  गणनाए सरल हो सकती हैं। कॉपरनिकस साधु स्वभाव का व्यक्ति था । वह समझता था कि यदि उसने अपना मत स्पष्ट कर दिया तो क्या कुछ हो सकता है। वह चर्च के गुस्से को समझता था, सो उसने चुप रहना उचित समझा। लेकिन उसने अध्ययन जारी रखे। वह बूढ़ा हो गया और उसे अपना अंत निकट लगने लगा। उसने मन बनाया कि वह अपना मत सार्वजनिक करेगा। 


उसने यह काम अपने एक शिष्य जॉर्ज जोकिम रेटिकस को सौंप दिया कि वह इन्हें छपवा दे। उसने यह काम अपने एक मित्र आंद्रिया आसियांडर के हवाले कर दिया। इन्होंने कॉपरनिकस की पुस्तक प्रकाशित करवा दी। यह उसी समय प्रकाशित हुई जब कॉपरनिकस मृत्यु शैया पर था। वह इसकी जांच पड़ताल नहीं कर सकता था। आंद्रिया आसियांडर एक धार्मिक व्यक्ति था। इसका मत कॉपरनिकस के मत से मेल नहीं खाता था। इन्होंने बिना किसी सलाह या इजाजत के पुस्तक में कुछ फेरबदल किए। उन्होंने पुस्तक  की भूमिका में यह लिख दिया कि कॉपरनिकस की यह सब कल्पना है, यथार्थ अध्ययन नहीं हैँ। पुस्तक के नाम में भी कुछ बदलाव किया। प्रकाशित होते ही यह चर्च की निगाह में आई। चर्च नहीं चाहता था कि किसी भी वैकल्पिक विचार की शुरुआत हो। चर्च ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया और सभी प्रतियां जब्त कर ली। किसी तरह कुछ प्रतियां बच गई। चर्च ने समझा अब बात आगे नहीं बढ़ेगी।          


कुछ समय तक सब शांत रहा। एक बार इटली का एक नवयुवक गीयरदानो ब्रूनो 1548 - 1600) चर्च में कुछ पढ़ रहा था, वह पादरी बनना चाहता था। किसी तरह उसके हाथ कॉपरनिकस की पुस्तक लग गई। इन्होंने यह पढी। इनकी इस पुस्तक में  दिलचस्पी बढ़ी। इन्होंने सोचा कि क्यों एक व्यक्ति किसी अलग विचार पर बहस करना चाहता है। इन्होंने इस विषय पर आगे अध्ययन करने का मन बनाया। पादरी बनने की उनकी योजना धरी की धरी रह गई। जैसे-जैसे वह अध्ययन करता गया उसका विश्वास मजबूत होता गया। वह भी चर्च की ताकत और गुस्से को समझता था। इसलिए उन्होंने इटली छोड़ दी। वह इस मत के प्रचार के लिए यूरोप के लगभग एक दर्जन देशों (प्राग , पैरिस, जर्मनी, इंग्लैंड आदि) में घूमा।


चर्च की निगाह हर जगह थी। कुछ विद्वान इसके मत से सहमत होते हुए भी चर्चा करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। चर्च की निगाह में ब्रूनो अब भगोड़ा था। वह जितना भी प्रचार करता चर्च की निगाह में उसका जुर्म उतना ही संगीन होता जाता था। वह छिपता तो भी कहां और कब तक? वैचारिक समझौता उसे मंजूर नहीं था। चर्च ने ब्रूनो को पकड़ने के लिए एक जाल बिछाया। एक व्यक्ति को तैयार किया गया कि वह ब्रूनो से पढ़ना चाहता है। फीस तय की गई। ब्रूनो ने समझा कि अच्छा है एक शिष्य और तैयार हो रहा है। ब्रूनो इस चाल को समझ नहीं पाया। उसने इसे स्वीकार किया और बताए पते पर जाने को तैयार हो गया। इस प्रकार वह चर्च के जाल में फंस गया। जैसे ही वह पते पर पहुंचा चर्च ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

          

चर्च ने पहले तो इन्हें बहुत अमानवीय यातनाएं दी। उसे एकदम से मारा नहीं। चर्च ने उसे मजबूर करना चाहा कि वह अपना मत वापस ले ले और चर्च द्वारा स्थापित विचार को मान ले। ब्रूनो अपने इरादे से टस से मस नहीं हुआ। चर्च ने लगातार 6 वर्ष प्रयास किए कि वह बदल जाए। उसे लोहे के संदूक में रखा गया जो सर्दियों में ठंडा और गर्मियों में गर्म हो जाता था। किसी भी तरह की यातनाएं उसके मनोबल को डिगा नहीं पाई। अब तक चर्च को भी पता चल चुका था कि ब्रूनो मानने वाला नहीं है। न्यायालय का ड्रामा रचा गया। चर्च ने सजा सुनाई कि इस व्यक्ति को ऐसे मौत दी जाए कि एक बूंद भी रक्त की न बहे। ब्रूनो ने इस फरमान को सुना और इतना ही कहा-' आप जो ये मुझे सजा दे रहे हो, शायद मुझसे बहुत डरे हुए हो'


17 फरवरी सन 1600 को ब्रूनो को रोम के Campo dei Fiori चौक में लाया गया। उसे खंभे से बांध दिया गया। उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया ताकि वह कुछ और न बोल सके। उसे जिंदा जला दिया गया।

 इस प्रकार ब्रूनो विज्ञान की दुनिया का पहला शहीद बना। 


लोग वर्षों से मान्यताओं, धारणाओं, प्रथाओं और भावनाओं के पीछे इतने पागल हैं कि वे अपने विचारों से अधिक न कुछ सुनना चाहते हैं और न देखना। बदलना व त्यागना तो उससे भी बड़ी चुनौती है। यह जो एक डर बनाया जाता है असल में वो कुछ लोगों के एकाधिकार के छिन जाने के कारण बनाया जाता है,  इसलिए वे इस डर को बनाये रखने की हिमायती है बशर्ते उसके पीछे कितनी ही कल्पनायें क्यों न गढ़नी पड़ जाए।


पोस्ट साभार :- श्री आर पी विशाल

राम -रावण युद्ध / साक्षी भल्ला

 राम और रावण का युद्ध अश्विन शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रारंभ हुआ था और दशमी को यह युद्ध समाप्त हुआ था।


रावण समझ चुका था कि राक्षसों का नाश हो गया है, मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिए मैं अब अपार माया रचूँ और मायावी युद्ध करूं॥ इधर इंद्र ने भगवान श्री राम के लिए तुरंत अपना रथ भेज दिया। (उसका सारथी) मातलि हर्ष के साथ उसे ले आया॥ उस दिव्य अनुपम और तेज के पुंज (तेजोमय) रथ पर कोसलपुरी के राजा श्री रामचंद्रजी हर्षित होकर चढ़े और रावण से युद्ध के लिए तैयार हुए।


रावण ने अपनी माया से भ्रम जाल फैलाने का प्रयत्न किया। श्री रामजी ने हँसकर धनुष पर बाण चढ़ाकर, पल भर में सारी माया हर ली। फिर श्री रामजी सबकी ओर देखकर गंभीर वचन बोले- हे वीरों! तुम सब बहुत ही थक गए हो, इसलिए अब (मेरा और रावण का) युद्ध देखो।


ऐसा कहकर श्री रघुनाथजी ने ब्राह्मणों के चरणकमलों में सिर नवाया और फिर रथ चलाया। तब रावण के हृदय में क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा।रावण क्रुद्ध होकर वज्र के समान बाण छोड़ने लगा। अनेकों आकार के बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वी में, सब जगह छा गए।


श्री रघुवीर ने अग्निबाण छोड़ा, (जिससे) रावण के सब बाण क्षणभर में भस्म हो गए। फिर उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी, (किन्तु) श्री रामचंद्रजी ने उसको बाण के साथ वापस भेज दिया॥ वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परन्तु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं।


रावण ने दस त्रिशूल चलाए और श्री रामजी के चारों घोड़ों को मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया। घोड़ों को उठाकर श्री रघुनाथजी ने क्रोध करके धनुष खींचकर बाण छोड़े।

श्री रामचंद्रजी ने उसके दसों सिरों में दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गए और सिरों से रक्त के पनाले बह चले।


रुधिर बहते हुए ही बलवान्‌ रावण दौड़ा। प्रभु ने फिर धनुष पर बाण संधान किया। श्री रघुवीर ने तीस बाण मारे और बीसों भुजाओं समेत दसों सिर काटकर पृथ्वी पर गिरा दिए। सिर और हाथ काटते ही फिर नए हो गए। श्री रामजी ने फिर भुजाओं और सिरों को काट गिराया। इस तरह प्रभु ने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे, परन्तु काटते ही वे तुरंत फिर नए हो गए।


प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरों को काट रहे हैं, क्योंकि कोसलपति श्री रामजी बड़े कौतुकी हैं। आकाश में सिर और बाहु ऐसे छा गए हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों।


देवलोक में सभी देवता यह स्थिति देखकर व्याकुल हो उठे और देवराज इंद्र ने ब्रह्मा के पास जाकर प्रभु श्री राम के वाणों के निष्फल होने का कारण पूछा।


ब्रम्हा जी ने कहा- हे देवेंद्र ! सुनो, रावण हृदय में बाण लगते ही मर जाएगा।


देवराज इंद्र पूछते हैं कि फिर रामजी उसके हृदय में बाण क्यों नही मारते हैं।


इंद्र- प्रभु उसके हृदय में बाण इसलिए नहीं मारते कि रावण के  हृदय में जानकीजी बसती हैं, और जानकी के ह्रदय में श्री राम बसते हैं। यही सोचकर इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हृदय में मेरा निवास है और अगर बाण मार दिया तो ब्रह्माण्ड ही नष्ट हो जायेगा।


यह वचन सुनकर इंद्र ने इसका उपाय पूछा ।


ब्रम्हा जी ने इंद्र को समझाते हुए कहा हे देवेंद्र संदेह का त्याग कर दो। सिरों के बार-बार काटे जाने से जब वह व्याकुल हो जाएगा और उसके हृदय से जानकी जी का ध्यान छूट जाएगा, तब सुजान (अंतर्यामी) श्री रामजी रावण के हृदय में बाण मारेंगे॥ 


श्री रामजी और रावण के युद्ध का चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पों तक गाते रहें, तो भी उसका पार नहीं पा सकते।


काटते ही सिरों का समूह बढ़ जाता है। शत्रु मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ। तब श्री रामचंद्रजी ने विभीषण की ओर देखा। विभीषण ने कहा प्रभु! इसके नाभिकुंड में अमृत का निवास है। हे नाथ! रावण उसी के बल पर जीता है।


विभीषण की बात सुनते ही श्री रघुनाथजी ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण लिए॥ कानों तक धनुष को खींचकर श्री रघुनाथजी ने इकतीस बाण छोड़े। 


खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।

रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥


भावार्थ:- कानों तक धनुष को खींचकर श्री रघुनाथजी ने इकतीस बाण छोड़े। वे श्री रामचंद्रजी के बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों॥


सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥

लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥


भावार्थ:- एक बाण ने नाभि के अमृत कुंड को सोख लिया। दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओं में लगे। बाण सिरों और भुजाओं को लेकर चले। सिरों और भुजाओं से रहित रुण्ड (धड़) पृथ्वी पर नाचने लगा॥


धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥

गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥


भावार्थ:- धड़ प्रचण्ड वेग से दौड़ता है, जिससे धरती धँसने लगी। तब प्रभु ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिए। मरते समय रावण बड़े घोर शब्द से गरजकर बोला- राम कहाँ हैं? मैं ललकारकर उनको युद्ध में मारूँ!॥


डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥

धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥


भावार्थ:- रावण के गिरते ही पृथ्वी हिल गई। समुद्र, नदियाँ, दिशाओं के हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे। रावण धड़ के दोनों टुकड़ों को फैलाकर भालू और वानरों के समुदाय को दबाता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा॥


मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा॥

प्रबिसे सब निषंग महुँ जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई॥


भावार्थ:- रावण की भुजाओं और सिरों को मंदोदरी के सामने रखकर रामबाण वहाँ चले, जहाँ जगदीश्वर श्री रामजी थे। सब बाण जाकर तरकस में प्रवेश कर गए। यह देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाए॥


तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन॥

जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा॥


भावार्थ:-रावण का तेज प्रभु के मुख में समा गया। यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए। ब्रह्माण्डभर में जय-जय की ध्वनि भर गई। प्रबल भुजदण्डों वाले श्री रघुवीर की जय हो॥


बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा॥


भावार्थ:- देवता और मुनियों के समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं- कृपालु की जय हो, मुकुन्द की जय हो, जय हो!॥


जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो।

खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो॥

सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही।

संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥


भावार्थ:- हे कृपा के कंद! हे मोक्षदाता मुकुन्द! हे (राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि) द्वंद्वों के हरने वाले! हे शरणागत को सुख देने वाले प्रभो! हे दुष्ट दल को विदीर्ण करने वाले! हे कारणों के भी परम कारण! हे सदा करुणा करने वाले! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो। देवता हर्ष में भरे हुए पुष्प बरसाते हैं, घमाघम नगाड़े बज रहे हैं। रणभूमि में श्री रामचंद्रजी के अंगों ने बहुत से कामदेवों की शोभा प्राप्त की॥


सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं।

जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उडुगन भ्राजहीं॥

भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने।

जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥


भावार्थ:- सिर पर जटाओं का मुकुट है, जिसके बीच में अत्यंत मनोहर पुष्प शोभा दे रहे हैं। मानो नीले पर्वत पर बिजली के समूह सहित नक्षत्र सुशो‍भित हो रहे हैं। श्री रामजी अपने भुजदण्डों से बाण और धनुष फिरा रहे हैं। शरीर पर रुधिर के कण अत्यंत सुंदर लगते हैं। मानो तमाल के वृक्ष पर बहुत सी ललमुनियाँ चिड़ियाँ अपने महान्‌ सुख में मग्न हुई निश्चल बैठी हों॥


कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।

भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॥


भावार्थ:- प्रभु श्री रामचंद्रजी ने कृपा दृष्टि की वर्षा करके देव समूह को निर्भय कर दिया। वानर-भालू सब हर्षित हुए और सुखधाम मुकुन्द की जय हो, ऐसा पुकारने लगे॥


भगवान श्री राम ने रावण का वध कर दिया। असत्य पर आज सत्य की जीत हुई है। बुराई पर अच्छे की जीत हुई है। अधर्म पर धर्म की जीत हुई है। 


विजय दशमी के इस मंगल पर्व पर आप सभी को दसों-दिशाओं से शान्ति, सुख, समृद्धि और सफलता प्राप्त हो ऐसी मेरी प्रार्थना एवं शुभकामनाएं


जय जय श्री राम❤️🙏

रावण_ऐसे_नहीं_मरेगा / प्रवीण परिमल

 

चाहे जैसी जुगत लगा लो ,

काटोगे सिर , फिर उभरेगा ।

नहीं मरेगा , नहीं मरेगा ,

रावण ऐसे नहीं मरेगा ।।


आग लगाओ डाल किरासन

जला नहीं पाओगे आसन ।

कोशिश है बेकार तुम्हारी ,

' फायर - प्रूफ ' बना सिंहासन ।


बहुत बड़ा मायावी है वह ,

जैसा चाहे रूप धरेगा ।

रावण ऐसे नहीं मरेगा !


छल - बल से जो कुर्सी पाए ,

नैतिकता के पाठ पढ़ाए ।

लेकिन मौका मिलते ही वो

पूरा मुल्क हजम कर जाए ।


काम अनैतिक करने वाला ,

सत्य - धर्म की बात करेगा ।

रावण ऐसे नहीं मरेगा !


अफसर , थानेदार , कलेक्टर

लूट रहे हैं , देखो जमकर ।

अभयदान हासिल है , क्योंकि --

हिस्सा लेते बाँट मिनिस्टर ।


' जिसकी लाठी , भैंस उसी की ' --

इस कथनी को सत्य करेगा ।

रावण ऐसे नहीं मरेगा !


गुंडागर्दी , टैक्स - उगाही...

झेल अयोध्या रही तबाही ।

हक हासिल छुट्टे साँढ़ों को ,

सारी धरती करें दमाही ।


अश्वमेध का घोड़ा ठहरा ,

खुल्लम - खुल्ला खेत चरेगा ।

रावण ऐसे नहीं मरेगा !


देख , हवस में आनन - फानन

हावी सब पर हुआ दशानन ।

पत्थर का इंसान हुआ है ,

सत्ता - सुख पाने के कारण ।


अपनी कोठी भरने वाला ,

जनता की परवाह करेगा ?

रावण ऐसे नहीं मरेगा !


सुनो , नाभि में अमृत जबतक ,

नहीं पराजित होगा तबतक ।

दैत्य न ऐसे मरने वाला ,

लहू पिलाओगे तुम कबतक ?


असुरशक्ति का स्वामी आखिर...

कुछ तो लीला और करेगा ।

रावण ऐसे नहीं मरेगा !


हममें , तुममें , उसमें बैठा ,

छद्म अहं के कारण ऐंठा ।

रावण धरकर रूप अनेकों ,

सबके भीतर गहरे पैठा ।


पहले अपने भीतर कोई

यदि रावण - वध नहीं करेगा ,

बाहर रावण नहीं मरेगा !!......


चाहे जैसी जुगत लगा लो ,

काटोगे सिर , फिर उभरेगा ।

नहीं मरेगा , नहीं मरेगा ,

रावण ऐसे नहीं मरेगा  !!

ऐसे रावण नहीं मरेगा !!!


#प्रवीण_परिमल

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2021

त्रिजटा - राक्षसी से साध्वी तक🙏/ साक्षी भल्ला

 


रामायण का यह एक ऐसा पात्र है जिसकी चर्चा बहुत कम होती है।



त्रिजटा को सीताजी ने बड़े प्रेम से मां कहा था। यह सौभाग्य और किसी को कभी नहीं मिला! सीताजी ने त्रिजटा से न केवल अपनी व्यथा सुनाई, बल्कि चिता जलाने के लिए मदद भी मांगी!त्रिजटा ने समझाया और मनाया।ठीक उसी तरह जैसे एक मां अपनी बेटी को डांटकर प्रेम से समझाती है।ये अवसर भी किसी और को नहीं मिला!

 श्रीराम को अवतार और सीताजी को उनकी शक्ति बताया गया है। परमशक्ति भी किसी से सहायता मांग बैठे, यह प्रसंग आपको कहीं नहीं मिलेगा!


ऐसे वर्णन मिलते हैं कि त्रिजटा एक राक्षसी थी! रावण की सेविका थी! लेकिन बाद में उसका एक आदर्श स्वरूप देखने को मिलता है!


त्रिजटा के पूर्वज शुरू से ही लंका राज्य के सेवक रहे थे। त्रिजटा ने भी कुलपरंपरा के अनुसार रावण की सेवा की। वृद्धा वस्था आने पर उसे एक आरामदायक और सम्मानित पद दिया गया। वह अशोकवाटिका में तैनात स्त्री पहरेदारों की प्रमुख बनी। यह वाटिका राजकुल की स्त्रियों के विहार और मनोरंजन के लिए बनी थी।

त्रिजटा का ये नाम क्यों पड़ा? दरअसल, उसमें तीन विशेषताएं थीं। वह ईश्वर में एवं अवतारों में विश्वास करती थी। अपने कार्यों में अति कुशल थी। उसमें अच्छे बुरे का विवेक था। अपने इन गुणों के चलते वह राक्षसों की भीड़ में बिल्कुल अलग दिखती थी! लंका के लोग व्यंग्य से उसे त्रिजटा कहते थे। राजकुमार विभीषण का प्रगाढ़ स्नेह उनपर था अतः परिहास में उन्हें विभीषण की पुत्री भी कहा जाता था 

अब एक दिलचस्प बात है! लंका में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं थी जो रावण से नाराज थे! राक्षस अविन्ध्य, ऋषि विश्रवा, मंत्री माल्यवंत, महर्षि पुलस्त्य और विभीषण आदि लोग रावण की नीतियों के खिलाफ थे!

परंतु ये लोग रावण से असहमत क्यों थे?क्योंकि रावण शक्ति के मद में पूरे विश्व से शत्रुता करता जा रहा था। उसने अयोध्या के सम्राट अनरण्य की हत्या की। देवराज इंद्र को बांधकर सरेआम अपमानित किया। महादेव के निवास स्थान कैलाश को उठाने की कोशिश की। सौतेले भाई कुबेर की पुत्रवधू पर अत्याचार किया। अपनी सगी बहन मीनाक्षी के पति कालकेय सम्राट विधुतजीव्ह को मारा।


रावण को ये सनक थी कि वह संसार की हर अद्वितीय वस्तु को लंका लाएगा। अपने पति की मृत्यु से विचलित उसकी बहन मीनाक्षी ने इसी को आधार बनाकर उसे सबक सिखाने की सोची।

यहां एक बात जानते हैं। अपने बहनोई को मारने के बाद रावण ने बहन मीनाक्षी को दंडकारण्य का राज्य दे दिया था। वह खर और दूषण की सहायता से राज्य करती थी। हाथ पैरों के नाखून बढ़ाते जाने की सनक के चलते उसे आदिवासी लोग शुपनखा भी कहते थे।


अपने वनवास के दौरान जब राम दंडकारण्य पहुँचे तो शुपनखा ने उनसे शत्रुता कर ली। युद्ध हुआ। खर दूषण मारे गए।

अब मौका मिल चुका था। वह लंका पहुंची।भरे राज्यदरबार में रोने- धोने और रावण को फटकारने के बाद कहा- " सीता सभी गुणों में एक अनन्य स्त्री है।ऐसा लगता है जैसे उसे खुद विधाता ने गढ़ा है। वह करोड़ों नारीरत्नों से भी बढ़कर है। उसे रावण के पास लंका में ही होना चाहिए"


रावण की मति मारी गयी।सीताजी का हरण हुआ। उन्हें अशोक वाटिका में रखा गया जो अंतः पुर का ही एक हिस्सा थी।

अब यहां से त्रिजटा की भूमिका शुरू होती है।त्रिजटा ने तीन स्तरों पर अपने कार्य किये।

सबसे पहले तो उसने श्रीराम की पत्नी और अयोध्या की महारानी जनकनंदिनी सीता को लंका की परिस्थिति समझाई। उन्हें एक विधान के बारे में बताया। दरअसल पुत्रवधू पर अत्याचार के बाद महर्षि पुलस्त्य,विश्रवा और नलकुबेर ने एक श्रापरूपी विधान बनाया था। इसके अनुसार रावण किसी स्त्री की अनुमति लिए बिना उसे नहीं अपना सकता था।त्रिजटा ने सीताजी से कहा कि वह किसी भी तरह के दबाव या डर में न आएं क्योंकि यह विधान उनकी रक्षा करेगा। उसने अन्य प्रहरियों को भी सीता को परेशान करने से रोका।


दूसरे स्तर पर त्रिजटा ने विभीषण,अविन्ध्य आदि प्रभावशाली लोगों को इसकी सूचना दी। अविन्ध्य उन्हें श्रीराम के बारे में समाचार भेजते थे। उन्होंने ही त्रिजटा को श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता के बारे मे बताया।इन समाचारों से वह सीता का मनोबल बनाये रखती थीं।


तीसरे स्तर पर उन्होंने राजकुल की स्त्रियों को विश्वास में लिया। उन्हें बताया कि सीताजी अयोध्या नरेश राम की पत्नी और मिथिला के सम्राट जनक की पुत्री हैं। ऐसी स्त्री का हरण विनाशकारी है। लंका की महारानी मंदोदरी ने सीता को छोड़ देने की सलाह अपने पति रावण को दी। मेघनाद की पत्नी सुलोचना ने खुलकर सीताजी का समर्थन किया।

 रावण की चतुराई धरी रह गयी। उसने बहुत गोपनीय ढंग से सीताहरण किया था।लेकिन सारी लंका जान गई।जल्दी ही हनुमान भी आ पहुंचे। अतुलित बल के धाम। श्रीरामचन्द्रजी के दूत। विभीषण ने उन्हें अशोकवाटिका में जाने की युक्ति बताई।


उस शाम को रावण भी वहां आया। धमकी दी।यदि एक महीने तक सीता ने निर्णय नहीं किया तो वह उनका वध कर देगा।उसके जाने के बाद त्रिजटा ने सीताजी को अपना सपना सुनाया।

श्रीरामचरितमानस के अनुसार त्रिजटा ने कहा- "

 सपने वानर लंका जारी, जातुधान सेना सब मारी"।

मतलब?

"वानर ने लंका में आग लगाई है और राक्षस सेना को मारा है"

अब एक सवाल लेते हैं। त्रिजटा ने ऐसा क्यों कहा? देखिए, इसे समझना बहुत ही सरल है।वह जानती थी कि राम के दूत जरूर आएंगे। उनके द्वारा कोई ऐसा कार्य जरूर होना चाहिए जिससे शासक वर्ग भयभीत हो उठे! रावण का मनोबल टूटना बहुत जरूरी था।यह कार्य आग ने किया।

रावण की प्रतिष्ठा उसकी अजेयता में थी। उसकी राजधानी में शत्रु द्वारा आग लगाने से उसकी यह प्रतिष्ठा धूल में मिल गयी। उसके मित्र राजाओं ने सोचा।जो अपनी राजधानी नहीं बचा सका, वो हमारी रक्षा कैसे करेगा! इसका नतीजा क्या निकला? श्रीराम की सेना पूरा दक्षिण भारत पार करती हुई समुद्र तट पर आ पहुँची।किसी राज्य ने उन्हें नहीं रोका।

आगे हम जानते हैं। भयंकर युद्ध हुआ। रावण ने जब पराजय होती देखी, तो मनोवैज्ञानिक अस्त्र चलाया। एक नकली मस्तक बनवाया जिसका चेहरा हूबहू श्रीराम के जैसा था। यह सिर अशोक वाटिका में सीता को भेजा गया।वह चाहता था कि निराश होकर सीताजी अपने प्राण दे दें। त्रिजटा ने रावण की माया भांप ली और सीताजी की रक्षा की।

युद्ध का परिणाम धर्म की विजय में हुआ। बल, छल और आडंबर पर आधारित राक्षसी संस्कृति नष्ट हुई। विभीषण सम्राट बने।

सत्ता परिवर्तन के उस दौर में त्रिजटा का कोई जिक्र नहीं आता! लंका के तमाम निवासियों ने नगर के बाहर जाकर रामजी के दर्शन किए। त्रिजटा नहीं गयी! शायद वो इस बात से दुखित थी कि सीता जैसी सत्यस्वरूपा स्त्री को अग्नि परीक्षा देने हेतु कहा गया था!

इसके बाद हमकुछ अस्पष्ट संकेत मिलते हैं । इनसे पता चलता है कि त्रिजटा ने अपने आपको धर्म और अध्यात्म में लीन कर लिया।

जो भी हो, माता सीता को त्रिजटा याद रहीं। एक कथा बताती है कि श्रीराम और माता सीता उससे मिलने हेतु लंका भी आये। त्रिजटा ने काशी में रहकर महादेव की भक्ति करने की इच्छा जताई। ऐसा ही हुआ।

कहते है काशी में आज भी त्रिजटा का एक मंदिर है। यह मंदिर काशी विश्वनाथ के पास है। साल में एक दिन यहां त्रिजटा की विशेष पूजा होती है। सुहागिन स्त्रियों द्वारा यहां सब्जियां चढ़ाकर अपने सुहाग की मंगलकामना की जाती है।

त्रिजटा की कथा बताती है कि परमशक्ति के साथ जुड़ाव और अच्छे लोगो की मदद करना कभी व्यर्थ नहीं जाता। माता सीता की मदद करके न केवल उसने अपने पूर्व जीवन का प्रायश्चित किया बल्कि श्रीराम की विजय में भी सहायक बनी। इस एक घटना ने लंकावासी राक्षसी त्रिजटा को काशीवासी साध्वी त्रिजटा में बदल दिया।


जय श्री राम❤️🙏🙏

श्री कृष्ण क़ो राम कथा सुनाना

 माता यशोदा का बाल गोपाल को श्री राम कथा सुनाना --


बाल कृष्ण की लीलाए बड़ी मनमोहनी है, बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी भगवान श्री कृष्ण की इन लीलाओ का चिंतन करते रहते है और इन्ही लीलाओ का चिंतन करते हुये अपनी देह का त्याग करते है भगवान की इन लीलाओ का चिन्तन स्वयं शिव शंकर जी भी करते है इसी तरह भगवान की एक बड़ी सुंदर लीला है आईये हम भी इसे पढकर इसका चिंतन करे ....


माता यशोदा अपने लाल को रात्रि में शयन से पूर्व, श्री राम-कथा सुना रहीं हैं- 


"सुनि सुत,एक कथा कहौं प्यारी" नटखट श्री कृष्ण भी कुछ कम नहीं, तुरन्त तत्पर हो गये भोली माता के मुँह से अपनी ही राम-कथा सुनने को, देखूँ तो माता कैसे सुनाती है? इतना ही नहीं बड़े प्रसन्न मन से ध्यानपूर्वक कथा भी सुन रहे हैं और साथ- साथ माता के प्रत्येक शब्द पर- "चतुर सिरोमनि देत हुँकारी" हुँकारी भी भरते जा रहें हैं कि माता का ध्यान कथा सुनाने से हटे नहीं।


माता यशोदा ने पूरी राम-कथा विस्तार पूर्वक सुनाई और नटखट लाल ने हुँकारी भर-भर के सुनी। कथा सुनाते-सुनाते माता यशोदा सीता-हरण प्रसंग पर पहुँची, 


माता ने कहा- "और तब रावण बलपूर्वक जानकी जी का हरण कर के ले जाने लगा........."


इतना सुनना था कि लाल की तो नींद भाग गई, तुरन्त उठ बैठे और ज़ोर से पुकार लगाई- "लक्ष्मण! लक्ष्मण! कहाँ हो? लाओ मेरा धनुष दो! धनुष! वाण दो!" 


माता भौचक्की !! हे भगवान ! ये क्या हो गया मेरे लाल को? आश्चर्य में भरकर अपने लला से पूछ बैठी- "क्या हो गया तुझे ? मैं तुझे कहानी सुना कर सुलाने का प्रयास कर रही हूँ और तू है कि उल्टे उठ कर बैठ गया।" 


मैया का लाडला नन्हा सा लाला बोला-"माँ ! सौमित्र से कहो मेरा धनुष-वाण लाकर दे मुझे। मैं अभी रावण का वध कर देता हूँ, मेरे होते कैसे सीता का हरण कर लेगा।" 


मैया अवाक ! हतप्रभ ! कैसी बातें कर रहा है यह।बोली-"उसे तो राम ने मारा था। राम त्रेतायुग में हुये थे और वे तो परमब्रह्म परमात्मा थे। तू क्यों उसे मारेगा?" " मैया के हृदय में हलचल मच गई, तनिक सा भय भी। नटखट कान्हा ने मैया की ओर देखा, मैया को कुछ अचम्भित कुछ भयभीत देख उन्हें आनन्द आया। 


मैया को और अचंम्भित करने के लिये बोले-"मैं ही तो राम हूँ,मैं ही त्रेतायुग में हुआ था और मैं ही परमब्रह्म परमात्मा हूँ।" अब मैया का धैर्य छूट गया, 


भय से विह्वल होकर बोली-"ऐसा मत बोल कनुआ....मत बोल। कोई भगवान के लिये ऐसा बोलता है क्या? पाप लगेगा।" 


नटखट कान्हा मैया की दशा देख, मन ही मन आन्नदित होते हुये बोले- "सच कह रहा हूँ मैया मैं राम और दाऊ भैया सौमित्र थे।" 


अब तो मैया के हृदय में यह शंका पूर्ण रूपेण घर कर गई कि मेरे लाला पर कोई भूतप्रेत आ गया है जो यह अंट-शंट बके जा रहा है। इसी बीच रोहिणी जी आ गईं और यशोदा जी को अति व्याकुल चिंतित व किंकर्तव्यविमूढ़ सा देख कर ढाढस बधाने लगीं- "संभव है आज दिन में किसी नाटक में इसे राम का पात्र दे दिया होगा, 


इसी से यह स्वयं को राम समझ बैठा है" "हाँ, यही हुआ होगा....है भी तो काला-कलूटा बिल्कुल राम की भाँति"- यशोदा जी की सांस में सांस आई। 


तभी नटखट नन्हे कान्हा पुनः कुछ तर्क प्रस्तुत करने को तत्पर हुये....कि झुझँलाई हुई मैया ने हाथ का थप्पड़ दिखाते हुये कहा- "चुप सोजा नहीं तो अभी एक कस के जड़ दूँगी। 


अब नटखट लला ने मैया के आँचल में दुबक कर चुपचाप सो जाने में ही अपनी भलाई समझी.....हाँ पिटना कोई समझदारी थोड़े ही है।


सूरदास जी का यह पद बहुत ही सुंदर है, जिसमे माता यशोदा अपने लाल को श्री राम कथा सुना रही हैं ....


सुनि सुत, एक कथा कहौं प्यारी।

कमल-नैन मन आनँद उपज्यौ, चतुर-सिरोमनि देत हुँकारी॥


दसरथ नृपति हती रघुबंसी, ताकैं प्रगट भए सुत चारी।

तिन मैं मुख्य राम जो कहियत, जनक-सुता ताकी बर नारी॥


तात-बचन लगि राज तज्यौ तिन, अनुज-घरनि सँग गए बनचारी।

धावत कनक-मृगा के पाछैं, राजिव-लोचन परम उदारी॥


रावन हरन सिया कौ कीन्हौ, सुनि नँद-नंदन नींद निवारी।

चाप-चाप करि उठे सूर-प्रभु लछिमन देहु, जननि भ्रम भारी॥


हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 🙏

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 🙏

बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

कवि घाघ के दोहे औऱ कहावते

 भविष्यवाणियां सटीक होती थीं, जो अनुभवी लोगों द्वारा समय-समय पर की जाती थीं। अकबर के समय के महाकवि घाघ ऐसे ही अनुभवी कवियों में माने जाते हैं । वह कृषि पंडित एवं व्यावहारिक पुरुष थे। उनका नाम भारतवर्ष के, विशेषत: उत्तरी भारत के, कृषकों के जिह्वाग्र पर रहता है। चाहे बैल खरीदना हो या खेत जोतना, बीज बोना हो अथवा फसल काटना, घाघ की कहावतें उनका पथ प्रदर्शन करती हैं। ये कहावतें मौखिक रूप में भारत भर में प्रचलित हैं।


आज के समय में टीवी व रेडियो पर मौसम संबंधी जानकारी मिल जाती है। लेकिन सदियों पहले न टीवी-रेडियो थे, न सरकारी मौसम विभाग। ऐसे समय में महान किसान कवि घाघ व भड्डरी की कहावतें खेतिहर समाज का पीढि़यों से पथप्रदर्शन करते आयी हैं।


बिहार और उत्तर प्रदेश के के गांवों में सर्वाधिक लोकप्रिय जनकवियों में कवि घाघ का नाम सर्वोपरि लोकप्रिय है। जहां वैज्ञानिकों के मौसम संबंधी अनुमान भी गलत हो जाते हैं, ग्रामीणों की धारणा है कि घाघ कहावतें प्राय: सत्‍य साबित होती हैं। पुराने समय में कम मानसून एवं सब बातों का पहले ही अनुमान लगाया करते थे और उसी के हिसाब से कृषक व अन्य लोग अपनी दिनचर्या तय करते थे।


परिचय:- घाघ के जन्मकाल एवं जन्मस्थान के संबंध में बड़ा मतभेद है। इनकी जन्मभूमि कन्नौज के पास चौधरी सराय नामक ग्राम बताई जाती है। शिवसिंह सरोज का मत है कि इनका जन्म सं. 1753 में हुआ था, किंतु पं.रामनरेश त्रिपाठी ने बहुत खोजबीन करके इनके कार्यकाल को सम्राट् अकबर के राज्यकाल में माना है। कन्नौज के पास चौधरीसराय नामक ग्राम के रहने वाले घाघ के ज्ञान से प्रसन्न होकर सम्राट अकबर ने उन्हें सरायघाघ बसाने की आज्ञा दी थी। यह जगह कन्नौज से एक मील दक्षिण स्थित है।घाघ और भड्डरी की कहावतें नामक पुस्तक में देवनारायण द्विवेदी लिखते हैं, ”कुछ लोगों का मत है कि घाघ का जन्म संवत् 1753 में कानपुर जिले में हुआ था। मिश्रबंधु ने इन्हें कान्यकुब्ज ब्राह्मण माना है, पर यह बात केवल कल्पना-प्रसूत है। यह कब तक जीवित रहे, इसका ठीक-ठाक पता नहीं चलता।”


संकलन: ‘’घाघ और भड्डरी’’:- घाघ और भड्डरी के जीवन के बारे में प्रामाणिक तौर पर बहुत ज्ञात नहीं है। उनके द्वारा रचित साहित्य का ज्ञान भी ग्रामीणों ने किसी पुस्तक में पढ़ कर नहीं बल्कि परंपरा से अर्जित किया है। कहावतों में बहुत जगह ‘कहै घाघ सुनु भड्डरी’, ‘कहै घाघ सुन घाघिनी’ जैसे उल्लेाख आए हैं। इस आधार पर आम तौर पर माना जाता है कि भड्डरी घाघ कवि की पत्नीर थीं। हालांकि अनेक लोग घाघ व भड्डरी को पति-पत्नीे न मानकर एक ही व्यपक्ति अथवा दो भिन्न-भिन्न व्यीक्ति मानते हैं।अभी तक घाघ की लिखी हुई कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं हुई।’घाघ’ और ‘भड्डरी’ जो उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में एक कृषि वैज्ञानिक के समकक्ष ही स्थान रखते हैं के दोहे आज भी किसानों ने आत्मसात किये हुए हैं. इन दोहों के माध्यम से सहज शब्दों में मौसम के पूर्वानुमान के संकेत दिए गए हैं.उनकी वाणी कहावतों के रूप में बिखरी हुई है, जिसे अनेक लोगों ने संग्रहीत किया है। इनमें रामनरेश त्रिपाठी कृत ‘घाघ और भड्डरी’ (हिंदुस्तानी एकेडेमी, 1931 ई.) अत्यंत महत्वपूर्ण संकलन है।


कृषि-ज्योतिष ज्ञान का परिचय:- भड्डरी की ही भाँति घाघ भी ज्योतिषी थे। किस मास में किधर से हवा चले तो कितनी वर्षा हो, अथवा किस मास की वर्षा से खेती में कीड़े लगेंगे, इसका अच्छा व्यावहारिक ज्ञान उन्हें था। आज भी किसान उनकी ऐसी कहावतों से लाभान्वित होते हैं।बैल ही खेती का मूलधार है, अत: घाघ ने बैलों के आवश्यक गुणों का सविस्तार वर्णन किया है। हल तैयार करने के लिये आवश्यक लकड़ी एवं उसके परिमाण का भी उल्लेख उनकी कहावतों में मिलता है। उपलब्ध कहावतों के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि घाघ ने भारतीय कृषि को व्यावहारिक दृष्टि प्रदान की। उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी और उनमें नेतृत्व की क्षमता भी थी। उनके कृषि संबंधी ज्ञान से आज भी अनेकानेक किसान लाभ उठाते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से उनकी ये समस्त कहावतें अत्यन्त सारगर्भित हैं, अत: भारतीय कृषिविज्ञान में घाघ का विशिष्ट स्थान हैं। घाघ के गहन कृषि-ज्ञान का परिचय उनकी कहावतों से मिलता है। माना जाता है कि खेती और मौसम के बारे में कृषि वैज्ञानिकों की भविष्यवाणियां झूठी साबित हो सकती है, घाघ की कहावतें नहीं। भारतीय ग्रामीण समाज आज भी कृषि विज्ञान की जटिलताओं से परे इन लोकोक्तियों में ही अपनी शंकाओं का समाधान ढूंढ़ता है, और आश्चर्यजनक रूप से हजारों साल के अनुभव के निचोड़ के रूप में ये लोकोक्तियाँ काफी हद तक सटीक भी बैठती हैं।

समय के साथ इनके स्वरुप में भी क्षरण से इंकार नहीं किया जा सकता। अतः यदि बौद्धिक वैज्ञानिक समुदाय इन परम्पराओं में छुपे वैज्ञानिक तथ्यों को उभारने की ओर केन्द्रित हो तो परंपरा और आधुनिक विज्ञान का यह संगम आम लोगों को ज्यादा लाभान्वित कर पायेगा। घाघ के कृषिज्ञान का पूरा-पूरा परिचय उनकी कहावतों से मिलता है। उनका यह ज्ञान खादों के विभिन्न रूपों, गहरी जोत, मेंड़ बाँधने, फसलों के बोने के समय, बीज की मात्रा, दालों की खेती के महत्व एवं ज्योतिष ज्ञान, शीर्षकों के अंतर्गत विभाजित किया जा सकता है। घाघ का अभिमत था कि कृषि सबसे उत्तम व्यवसाय है, जिसमें किसान भूमि को स्वयं जोतता है :


उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान।

खेती करै बनिज को धावै, ऐसा डूबै थाह न पावै।

उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो सँग रहा।

जो हल जोतै खेती वाकी और नहीं तो जाकी ताकी।

फसल बोने का काल एवं बीज की मात्रा:- घाघ ने फसलों के बोने का उचित काल एवं बीज की मात्रा का भी निर्देश किया है। उनके अनुसार प्रति बीघे में पाँच पसेरी गेहूँ तथा जौ, छ: पसेरी मटर, तीन पसेरी चना, दो सेर मोथी, अरहर और मास, तथा डेढ़ सेर कपास, बजरा बजरी, साँवाँ कोदों और अंजुली भर सरसों बोकर किसान दूना लाभ उठा सकते हैं। यही नहीं, उन्होंने बीज बोते समय बीजों के बीच की दूरी का भी उल्लेख किया है, जैसे घना-घना सन, मेंढ़क की छलांग पर ज्वार, पग पग पर बाजरा और कपास; हिरन की छलाँग पर ककड़ी और पास पास ऊख को बोना चाहिए। कच्चे खेत को नहीं जोतना चाहिए, नहीं तो बीज में अंकुर नहीं आते। यदि खेत में ढेले हों, तो उन्हें तोड़ देना चाहिए।आजकल दालों की खेती पर विशेष बल दिया जाता है, क्योंकि उनसे खेतों में नाइट्रोजन की वृद्धि होती है। घाघ ने सनई, नील, उर्द, मोथी आदि द्विदलों को खेत में जोतकर खेतों की उर्वरता बढ़ाने का स्पष्ट उल्लेख किया है। खेतों की उचित समय पर सिंचाई की ओर भी उनका ध्यान था।



मानसून का महत्त्व:- भारत आज भी किसानों का देश है, और किसानों के लिए मानसून का महत्त्व किसी से छुपा नहीं। सदियों से मानसून पर निर्भरता ने ही इसके पूर्वानुमानों के लिए आधुनिकतम तकनीकों की खोज के लिए प्रेरित किया, जो आज अन्तरिक्ष और उपग्रहों तक पहुँच गई है। परन्तु इससे पारंपरिक अनुभवों पर आधारित विज्ञान का महत्त्व कम नहीं हो जाता।अपने आकलनों के आधार पर भारतीय मौसम विज्ञान ने हाल ही में अनुमान व्यक्त किया है कि- ” इस साल मानसून पिछले साल कि तुलना में थोडा कमजोर रहेगा, लेकिन बारिश ‘सामान्य के करीब’ ही रहेगी. इस साल जून से सितम्बर के बीच दीर्घकालीन औसत (LPA) की 96% बारिश होगी।” आश्चर्यजनक रूप से झाड़खंड में ‘सरहुल पर्व’ के अवसर पर आदिवासी पुजारी जो ‘पाहन’ कहे जाते हैं कि मौसम की वार्षिक भविष्यवाणी की पारंपरिक प्रक्रिया भी ऐसी ही सम्भावना जताती है। अलग-अलग नक्षत्रों और माह में वायु तथा ग्रहों की स्थिति की ग्रामीण विवेचना भी मानसून पर पूर्वानुमान व्यक्त करती रही है।


खादों के संबंध में विचार:- खादों के संबंध में घाघ के विचार अत्यंत पुष्ट थे। उन्होंने गोबर, कूड़ा, हड्डी, नील, सनई, आदि की खादों को कृषि में प्रयुक्त किए जाने के लिये वैसा ही सराहनीय प्रयास किया जैसा कि 1840 ई. के आसपास जर्मनी के सप्रसिद्ध वैज्ञानिक लिबिग ने यूराप में कृत्रिम उर्वरकों के संबंध में किया था। घाघ की निम्नलिखित कहावतें अत्यंत सारगर्भित हैं :


खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत।

गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै।

सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनो पावै।

गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली।

वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा।


गहरी जुताई:- घाघ ने गहरी जुताई को सर्वश्रेष्ठ जुताई बताया। यदि खाद छोड़कर गहरी जोत कर दी जाय तो खेती को बड़ा लाभ पहुँचता है :

छोड़ै खाद जोत गहराई, फिर खेती का मजा दिखाई।

बांध न बाँधने से भूमि के आवश्यक तत्व घुल जाते और उपज घट जाती है। इसलिये किसानों को चाहिए कि खेतों में बाँध अथवा मेंड़ बाँधे,

सौ की जोत पचासै जोतै, ऊँच के बाँधै बारी।

जो पचास का सौ न तुलै, देव घाघ को गारी।।

सुकाल:-सर्व तपै जो रोहिनी, सर्व तपै जो मूर।

परिवा तपै जो जेठ की, उपजै सातो तूर।।

यदि रोहिणी भर तपे और मूल भी पूरा तपे तथा जेठ की प्रतिपदा तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे।

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।

तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।

यदि शुक्रवार के बादल शनिवार को छाए रह जाएं, तो भड्डरी कहते हैं कि वह बादल बिना पानी बरसे नहीं जाएगा।

भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।

ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।।

यदि भादो सुदी छठ को अनुराधा नक्षत्र.पड़े तो ऊबड़-खाबड़ जमीन में भी उस दिन अन्न बो देने से बहुत पैदावार होती है।

अद्रा भद्रा कृत्तिका, अद्र रेख जु मघाहि।

चंदा ऊगै दूज को सुख से नरा अघाहि।।

यदि द्वितीया का चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र, कृत्तिका, श्लेषा या मघा में अथवा भद्रा में उगे तो मनुष्य सुखी रहेंगे।

सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय।

घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।।

यदि पूस की अमावस्या को सोमवार, शुक्रवार बृहस्पतिवार पड़े तो घर घर बधाई बजेगी-कोई दुखी न दिखाई पड़ेगा।

सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय।

महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।।

यदि श्रावण कृष्ण पक्ष में दशमी तिथि को रोहिणी हो तो समझ लेना चाहिए अनाज महंगा होगा और वर्षा स्वल्प होगी, विरले ही लोग सुखी रहेंगे।

पूस मास दसमी अंधियारी।बदली घोर होय अधिकारी।

सावन बदि दसमी के दिवसे।भरे मेघ चारो दिसि बरसे।।

यदि पूस बदी दसमी को घनघोर घटा छायी हो तो सावन बदी दसमी को चारों दिशाओं में वर्षा होगी। कहीं कहीं इसे यों भी कहते हैं-‘काहे पंडित पढ़ि पढ़ि भरो, पूस अमावस की सुधि करो।

पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी जाज।

मेघ होय तो जान लो, अब सुभ होइहै काज।।

यदि पूस सुदी सप्तमी, अष्टमी और नवमी को बदली और गर्जना हो तो सब काम सुफल होगा अर्थात् सुकाल होगा।

अखै तीज तिथि के दिना, गुरु होवे संजूत।

तो भाखैं यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत।।

यदि वैशाख में अक्षम तृतीया को गुरुवार पड़े तो खूब अन्न पैदा होगा।

अकाल और सुकाल:- सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।

बरसै तो झुरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।

यदि सावन सुदी सप्तमी को आधी रात के समय बादल गरजे और पानी बरसे तो झुरा पड़ेगा; न बरसे तो समय अच्छा बीतेगा।

असुनी नलिया अन्त विनासै। गली रेवती जल को नासै।।

भरनी नासै तृनौ सहूतो। कृतिका बरसै अन्त बहूतो।।

यदि चैत मास में अश्विनी नक्षत्र बरसे तो वर्षा ऋतु के अन्त में झुरा पड़ेगा; रेतवी नक्षत्र बरसे तो वर्षा नाममात्र की होगी; भरणी नक्षत्र बरसे तो घास भी सूख जाएगी और कृतिका नक्षत्र बरसे तो अच्छी वर्षा होगी।

आसाढ़ी पूनो दिना, गाज बीजु बरसंत।

नासे लच्छन काल का, आनंद मानो सत।।

आषाढ़ की पूणिमा को यदि बादल गरजे, बिजली चमके और पानी बरसे तो वह वर्ष बहुत सुखद बीतेगा।

वर्षा:- रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय।

कहै घाघ सुने घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।।

यदि रोहिणी बरसे, मृगशिरा तपै और आर्द्रा में साधारण वर्षा हो जाए तो धान की पैदावार इतनी अच्छी होगी कि कुत्ते भी भात खाने से ऊब जाएंगे और नहीं खाएंगे।

उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि।

भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।।

उत्तर नक्षत्र ने जवाब दे दिया और हस्त भी मुंह मोड़कर चला गया। चित्रा नक्षत्र ही अच्छा है कि प्रजा को बसा लेता है। अर्थात् उत्तरा और हस्त में यदि पानी न बरसे और चित्रा में पानी बरस जाए तो उपज अच्छी होती है।

खनिके काटै घनै मोरावै। तव बरदा के दाम सुलावै।।

ऊंख की जड़ से खोदकर काटने और खूब निचोड़कर पेरने से ही लाभ होता है। तभी बैलों का दाम भी वसूल होता है।

हस्त बरस चित्रा मंडराय।घर बैठे किसान सुख पाए।।

हस्त में पानी बरसने और चित्रा में बादल मंडराने से (क्योंकि चित्रा की धूप बड़ी विषाक्त होती है) किसान घर बैठे सुख पाते हैं।

हथिया पोछि ढोलावै।घर बैठे गेहूं पावै।।

यदि इस नक्षत्र में थोड़ा पानी भी गिर जाता है तो गेहूं की पैदावार अच्छी होती है।

जब बरखा चित्रा में होय। सगरी खेती जावै खोय।।

चित्रा नक्षत्र की वर्षा प्राय: सारी खेती नष्ट कर देती है।

जो बरसे पुनर्वसु स्वाती। चरखा चलै न बोलै तांती।

पुनर्वसु और स्वाती नक्षत्र की वर्षा से किसान सुखी रहते है कि उन्हें और तांत चलाकर जीवन निर्वाह करने की जरूरत नहीं पड़ती।

जो कहुं मग्घा बरसै जल।सब नाजों में होगा फल।।

मघा में पानी बरसने से सब अनाज अच्छी तरह फलते हैं।

जब बरसेगा उत्तरा। नाज न खावै कुत्तरा।।

यदि उत्तरा नक्षत्र बरसेगा तो अन्न इतना अधिक होगा कि उसे कुते भी नहीं खाएंगे।

दसै असाढ़ी कृष्ण की, मंगल रोहिनी होय।

सस्ता धान बिकाइ हैं, हाथ न छुइहै कोय।।

यदि असाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी को मंगलवार और रोहिणी पड़े तो धान इतना सस्ता बिकेगा कि कोई हाथ से भी न छुएगा।

असाढ़ मास आठें अंधियारी। जो निकले बादर जल धारी।।

चन्दा निकले बादर फोड़।साढ़े तीन मास वर्षा का जोग।।

यदि असाढ़ बदी अष्टमी को अन्धकार छाया हुआ हो और चन्द्रमा बादलों को फोड़कर निकले तो बड़ी आनन्ददायिनी वर्षा होगी और पृथ्वी पर आनन्द की बाढ़-सी आ जाएगी।

असाढ़ मास पूनो दिवस, बादल घेरे चन्द्र।

तो भड्डरी जोसी कहैं, होवे परम अनन्द।।

यदि आसाढ़ी पूर्णिमा को चन्द्रमा बादलों से ढंका रहे तो भड्डरी ज्योतिषी कहते हैं कि उस वर्ष आनन्द ही आनन्द रहेगा।

पैदावार:- रोहिनी जो बरसै नहीं, बरसे जेठा मूर।

एक बूंद स्वाती पड़ै, लागै तीनिउ नूर।।

यदि रोहिनी में वर्षा न हो पर ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र बरस जाए तथा स्वाती नक्षत्र में भी कुछ बूंदे पड़ जाएं तो तीनों अन्न (जौ, गेहूं, और चना) अच्छा होगा।

जोत:- गहिर न जोतै बोवै धान।सो घर कोठिला भरै किसान।।

गहरा न जोतकर धान बोने से उसकी पैदावार खूब होती है।

गेहूं भवा काहें। असाढ़ के दुइ बाहें।।

गेहूं भवा काहें। सोलह बाहें नौ गाहें।।

गेहूं भवा काहें। सोलह दायं बाहें।।

गेहूं भवा काहें। कातिक के चौबाहें।।

गेहूं पैदावार अच्छी कैसे होती है ? आषाढ़ महीने में दो बांह जोतने से; कुल सोलह बांह करने से और नौ बार हेंगाने से; कातिक में बोवाई करने से पहले चार बार जोतने से।

गेहूं बाहें।धान बिदाहें।।

गेहूं की पैदावार अधिक बार जोतने से और धान की पैदावार विदाहने (धान का बीज बोने के अगले दिन जोतवा देने से,यदि धान के पौधों की रोपाई की जाती है तो विदाहने का काम नहीं करते, यह काम तभी किया जाता है जब आप खेत में सीधे धान का बीज बोते हैं) से अच्छी होती है।

गेहूं मटर सरसी। औ जौ कुरसी।।

गेहूं और मटर बोआई सरस खेत में तथा जौ की बोआई कुरसौ में करने से पैदावार अच्छी होती है।

गेहूं गाहा, धान विदाहा। ऊख गोड़ाई से है आहा।।

जौ-गेहूं कई बांह करने से धान बिदाहने से और ऊख कई बार गोड़ने से इनकी पैदावार अच्छी होती है।

गेहूं बाहें, चना दलाये। धान गाहें, मक्का निराये। ऊख कसाये।

खूब बांह करने से गेहूं, खोंटने से चना, बार-बार पानी मिलने से धान, निराने से मक्का और पानी में छोड़कर बाद में बोने से उसकी फसल अच्छी होती है।

पुरुवा रोपे पूर किसान। आधा खखड़ी आधा धान।।

पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने पर आधा धान और आधा पैया (छूछ) पैदा होता है।

पुरुवा में जिनि रोपो भैया। एक धान में सोलह पैया।।

पूर्वा नक्षत्र में धान न रोपो नहीं तो धान के एक पेड़ में सोलह पैया पैदा होगा।

बोवाई:- कन्या धान मीनै जौ। जहां चाहै तहंवै लौ।।

कन्या की संक्रान्ति होने पर धान (कुमारी) और मीन की संक्रान्ति होने पर जौ की फसल काटनी चाहिए।

कुलिहर भदई बोओ यार। तब चिउरा की होय बहार।।

कुलिहर (पूस-माघ में जोते हुए) खेत में भादों में पकने वाला धान बोने से चिउड़े का आनन्द आता है-अर्थात् वह धान उपजता है।

आंक से कोदो, नीम जवा। गाड़र गेहूं बेर चना।।

यदि मदार खूब फूलता है तो कोदो की फसल अच्छी है। नीम के पेड़ में अधिक फूल-फल लगते है तो जौ की फसल, यदि गाड़र (एक घास जिसे खस भी कहते हैं) की वृद्धि होती है तो गेहूं बेर और चने की फसल अच्छी होती है।

आद्रा में जौ बोवै साठी। दु:खै मारि निकारै लाठी।।

जो किसान आद्रा में धान बोता है वह दु:ख को लाठी मारकर भगा देता है।

आद्रा बरसे पुनर्वसुजाय, दीन अन्न कोऊ न खाय।।

यदि आर्द्रा नक्षत्र में वर्षा हो और पुनर्वसु नक्षत्र में पानी न बरसे तो ऐसी फसल होगी कि कोई दिया हुआ अन्न भी नहीं खाएगा।

आस-पास रबी बीच में खरीफ। नोन-मिर्च डाल के, खा गया हरीफ।।

खरीफ की फसल के बीच में रबी की फसल अच्छी नहीं होती।

अर्थ के साथ कहावतें:- यहां हम महाकवि घाघ की कुछ कहावतें व उनका अर्थ प्रस्तुडत कर रहे हैं :

सावन मास बहे पुरवइया। बछवा बेच लेहु धेनु गइया।।

अर्थात् यदि सावन महीने में पुरवैया हवा बह रही हो तो अकाल पड़ने की संभावना है। किसानों को चाहिए कि वे अपने बैल बेच कर गाय खरीद लें, कुछ दही-मट्ठा तो मिलेगा।

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय। तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।

अर्थात् यदि शुक्रवार के बादल शनिवार को छाए रह जाएं, तो भड्डरी कहते हैं कि वह बादल बिना पानी बरसे नहीं जाएगा।

रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय। कहै घाघ सुन घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।।

अर्थात् यदि रोहिणी पूरा बरस जाए, मृगशिरा में तपन रहे और आर्द्रा में साधारण वर्षा हो जाए तो धान की पैदावार इतनी अच्छी होगी कि कुत्ते भी भात खाने से ऊब जाएंगे और नहीं खाएंगे।

उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि। भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।।

अर्थात् उत्तरा और हथिया नक्षत्र में यदि पानी न भी बरसे और चित्रा में पानी बरस जाए तो उपज ठीक ठाक ही होती है।

पुरुवा रोपे पूर किसान। आधा खखड़ी आधा धान।।

अर्थात् पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने पर आधा धान और आधा खखड़ी (कटकर-पइया) पैदा होता है।

आद्रा में जौ बोवै साठी। दु:खै मारि निकारै लाठी।।

अर्थात् जो किसान आद्रा नक्षत्र में धान बोता है वह दु:ख को लाठी मारकर भगा देता है।दरअसल कृषक कवि घाघ ने अपने अनुभवों से जो निष्कोर्ष निकाले हैं, वे किसी भी मायने में आधुनिक मौसम विज्ञान की निष्पतत्तियों से कम उपयोगी नहीं हैं।

उदाहरण- (i) “आषाढ़ मास पूनो दिवस, बदल घेरे चन्द्र, तो भड्डरी जोषी कहें, होवे परम आनंद”।

अर्थात्, यदि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को चंद्रमा बादलों से ढाका रहे तो उस वर्ष अच्छी वर्षा होगी.

(ii) ” सावन मास बहे पुरवाई, बैल बेच खरीदो गाई “।

यानी, यदि सावन मास में पूर्व हवा बहे तो बारिश की संभावना कम है।

कहावतों की बानगी:-

० दिन में गरमी रात में ओस , कहे घाघ बरखा सौ कोस !

० खेती करै बनिज को धावै, ऐसा डूबै थाह न पावै।

० खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत।

० उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो संग रहा।

० जो हल जोतै खेती वाकी, और नहीं तो जाकी ताकी।

० गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै।

० सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनो पावै।

० गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली।

० वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा।

० छोड़ै खाद जोत गहराई, फिर खेती का मजा दिखाई।

० सौ की जोत पचासै जोतै, ऊँच के बाँधै बारी

जो पचास का सौ न तुलै, देव घाघ को गारी।।

० सावन मास बहे पुरवइया ,बछवा बेच लेहु धेनु गइया।

० रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय

कहै घाघ सुन घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।।

० पुरुवा रोपे पूर किसान , आधा खखड़ी आधा धान।

० पूस मास दसमी अंधियारी. बदली घोर होय अधिकारी।

० सावन बदि दसमी के दिवसे. भरे मेघ चारो दिसि बरसे।

० पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी जाज. मेघ होय तो जान लो, अब सुभ होइहै काज।

०सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात, बरसै तो झुरा परै, नाहीं समौ सुकाल।

० रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय, कहै घाघ सुने घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।

० भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय, ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।

० अंडा लै चीटी चढ़ै, चिड़िया नहावै धूर , कहै घाघ सुन भड्डरी वर्षा हो भरपूर ।

० दिन में बद्दर रात निबद्दर , बहे पूरवा झब्बर झब्बर

कहै घाघ अनहोनी होहिं, कुआं खोद के धोबी धोहिं ।

० शुक्रवार की बादरी, रहे शनिचर छाय। ….कहा घाघ सुन घाघिनी, बिन बरसे ना जाय।।

० काला बादल जी डरवाये, भूरा बादल पानी लावे

० तीन सिंचाई तेरह गोड़,तब देखो गन्ने का पोर

शोध की खातिर किस दुनिया में ? कहां गए ?

प्रिय भारत! / शम्भू बादल  प्रिय भारत!  शोध की खातिर किस दुनिया में ?  कहां गए ? साक्षात्कार रेणु से लेने ? बातचीत महावीर से करने?  त्रिलोचन ...