सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

राजेन्द्र यादव की विरासत

साहित्य



भारत यायावर


राजेन्द्र यादव अस्सी की उम्र पार करने के बाद भी साहित्य में सक्रिय हैं. कहानियाँ तो दो-चार वर्षों में एक-दो अब भी लिख डालते हैं और 'चालीस बरस पहले' के अपने यौन-संबंधों को याद कर लेते हैं. किन्तु 'हंस' में हर महीना अपना संपादकीय अवश्य लिखते हैं. संपादकीय स्तम्भ का शीर्षक है- 'मेरी, तेरी, उसकी बात'. किन्तु, प्राय: उनका लेख एकालाप ही होता है, उसमें 'तेरी' और 'उसकी बात' नहीं होती. वे 'अपनी बात' ही लिखते हैं और 'दिल से' लिखते हैं. 'हंस' का हर पाठक उसे पढ़ता है. पढ़ते हुए मेरा भी पच्चीसवाँ वर्ष गुजर रहा है, और अगस्त, 1986 ई. में मैं जवान था, अब बूढ़ा हो रहा हूँ. किन्तु एक ताजगी के साथ 'मेरी, तेरी ....' हर महीने पढ़ता हूँ. गुनता हूँ. राजेन्द्र यादव के दुख, खीझ और गुस्से को समझता हूँ और गहराई से अनुभव करता हूँ.
राजेंद्र यादव
हिन्दी में, नहीं दिल्ली में, दो बुजुर्ग साहित्यकार हैं- नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव ! ( वैसे तो दिल्ली में बुजुर्ग साहित्यकार कई हैं. मसलन, रामदरश मिश्र. ये चालीस वर्षों से वृद्ध दीख रहे हैं और इन्होंने साहित्य की हर विधा में विपुल साहित्य लिखा है और अच्छा लिखा है. फिर, कुँवरनारायण, जो चिंतक कवि हैं और ज्ञानपीठ से नवाजे जा चुके हैं. साहित्यिक दुनिया से कुछ ऊपर रहते हैं. केदारनाथ सिंह भी अस्सी की उम्र के करीब हैं लेकिन कोई उनको बुजुर्ग नहीं समझता, वे चिर नवीन हैं. लेकिन, चर्चा सिर्फ दो की ही होती है - नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव. ये हिन्दी साहित्य में 'मील के पत्थर' हैं और दोनों मठाधीश या महंत हैं. 'पाखी' ने नामवर सिंह पर एक स्थायी महत्व का बड़ा विशेषांक निकाला है और अब राजेन्द्र यादव की बारी है.) इन दोनों को दिल्ली की प्राय: साहित्यिक गोष्ठियों, पुस्तक-विमोचन-समारोहों में आदर के साथ बुलाया जाता है. कई सम-सामयिक विषयों पर इनके विचार लिए जाते हैं, इनके साक्षात्कार प्रकाशित होते हैं. कभी-कभी किसी 'विवाद-प्रसंग' में टेली-मिडिया में भी इनकी पूछ होती है.

हिन्दी साहित्य की वर्तमान अवस्था में वृद्धावस्था के ये दो सुमन हैं, जिनके आशीर्वचनों को लोग अपने गले में लटकाये फिरते हैं. इन्हें माल, मान, यश हद से ज्यादा (बेहद) मिला.

नामवर सिंह को हिन्दी से, हिन्दी वालों से कोई शिकायत नहीं, किन्तु राजेन्द्र यादव को है. उनकी शिकायतों की फेहरिश्त लम्बी है. उनकी पहली शिकायत है कि हिन्दी वाले हर विषय पर उनकी राय क्यों पूछते हैं ? क्या वृद्ध होने का यह अभिशाप नहीं है ? दिसम्बर, 2010 की 'मेरी, तेरी ....' में वे लिखते हैं - ''वरिष्ठ और बुजुर्ग होने का यही अभिशाप है कि दुनिया के हर विषय पर आपकी राय होनी ही चाहिए. शायद यही आक्रमण नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी पर भी रोज होता होगा, वे मुझसे ज्यादा प्रबुद्ध और आर्टिकुलेट (शब्दवीर !) हैं. लेकिन मैं इधर बार-बार उन्हीं सवालों और जवाबों के दुहराव से आजिज आ गया हूँ: न कोई नई बात, न कोई मौलिक कोण-खास तौर से साहित्य-केंद्रित लोगों के पास तो निश्चय ही कुछ भी विचारोत्तोजक नहीं बचा है. सभी कुछ पूर्व-ज्ञात और घिसा-पिटा है.''
राजेन्द्र यादव इस 'घिसे-पिटे' हिन्दी साहित्य से आजिज आ गए हैं. वे मानते हैं कि हिन्दी की गोबर-पट्टी में पिछड़ेपन की बदबू से बजबजाते परिवेश की एक तरफ घिनौनी तस्वीर है और दूसरी तरफ- ''अपने छायावादी संसार में आंतरिक सुकून खोजते निरुपाय बुद्धिजीवी अपनी-अपनी पुस्तकों और गोष्ठियों में छटपटाते अकेलों की यह बेचैन भीड़, आपस में संवाद खोजती और फिर कछुए की तरह वापस खोल में सिमटती हुई.''

उनकी खीझ का दूसरा कारण है कि विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभाग अभी तक पुराने साहित्य से चिपके हुए हैं. इस तरह वे आधुनिक नहीं हैं. 'पाखी' के जनवरी, 2011 अंक में प्रकाशित 'संवाद' में वे कहते हैं- ''सन् सैंतालीस से पहले का या बीसवी सदी से पहले का जो साहित्य है, वह सब हमें छोड़ देना चाहिए क्योंकि उस जबान को जिसमें वह लिखा गया, कोई नहीं समझता.''

अब पहले वाक्य पर गौर करें. यहाँ दो विकल्प हैं - सैंतालीस के पहले और दूसरा बीसवीं शताब्दी के पहले. यदि सैंतालीस के पहले के साहित्य को छोड़ दिया जाए तो महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी जैसे आलोचक, प्रेमचन्द, अज्ञेय, जैनेन्द्र, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा जैसे कथाकार, मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, दिनकर, बच्चन जैसे कवि को भी छोड़ देना पड़ेगा. इससे हंगामा मच सकता है.

यदि बीसवीं शदी के पूर्व के साहित्य को छोड़ दिया जाए तो मध्यकालीन लोकभाषाओं में रचित भक्ति-साहित्य और भारतेन्दुयुगीन साहित्यकार छुट जाएँगे. यादवजी मानते हैं कि जो पुराना सामंती या धर्माधारित है, उसे सिर्फ इतिहास की चीज बना देना चाहिए और उसे अल्मारियों में बन्द कर देना चाहिए. पर यादवजी की बात कोई मानता नहीं. वे हिन्दीवाले, गोबरपट्टी के लोग कब आधुनिक होंगे? वे अभी तक कबीर, सूर, तुलसी से लिपटे हैं.

नामवर सिंह 'कबीर का दुख' लेख लिख रहे हैं, मैनेजर पाण्डेय सूर पर किताब छपवा रहे हैं और क्या हो गया इस प्रतिभाशाली प्रखर आलोचक को, जो 'अकथ कहानी प्रेम की' शीर्षक देकर कोई मजेदार कहानी नहीं लिखकर कबीर का एक नया पाठ-विश्लेषण कर रहा है ? इस पुरुषोत्तम अग्रवाल की बुद्धि क्यों भ्रष्ट हो गई? और वह दलित चिन्तक डॉ. धर्मवीर 'जारज-सम्बन्ध' खोजता फिर रहा है, वह तो ठीक, किन्तु कबीर पर इतनी सारी पुस्तकें क्यों लिख डाली ? एक तो कबीर की भाषा को समझना मुश्किल है. अहिन्दी भाषी लोग 'गुरु गोविन्द दोऊ' का मतलब 'गुरुगोविन्द अंकल' समझते हैं !

बेचारे राजेन्द्र यादव इस तरह की आलोचना से क्षुब्ध हैं. अब उनकी सुनिए. क्या कह रहे हैं वे- ''इस बासीपने को सबसे ज्यादा समृद्ध किया है विश्वविद्यालयों से जुड़े तथाकथित आलोचकों ने. कोई कबीर का कबाड़ा करने पर तुला है तो कोई भारतेन्दु-मैथिलीशरण को धोबीपाट दे रहा है. किसी को निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय ने काटा है तो कोई नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल के प्राण लिए ले रहा है. चार कवियों का शताब्दी वर्ष क्या हुआ, अशोक वाजपेयी विस्मरण के खिलाफ झंडा लेकर निकल पड़े; मुक्तिबोध, अज्ञेय, नागार्जुन और केदारनाथ के कीर्तन कराने. अब जिसे देखो, वह इन्हीं में से किसी पर जगराता आयोजित कर रहा है.''
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