शनिवार, 17 सितंबर 2011

कामता प्रसाद सिंह काम का आत्मदर्शन



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मंगलवार, 6 सितंबर 2011

शंकर दयाल सिंह : क्या सच क्या झूठ



आपातकाल के दौरान इमरजेसी: क्या सच और क्या झूठ किताब लिखकर इसका कच्चा चिठ्ठा खोलने वाले बिहार के हरदिल अजीज अजीज सांसद और लेखक दिवंगत शंकर दयाल सिंह की बेहद लोकप्रिय किताब है। त्तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाक के बाल रहे शंकर दयाल जी इस किताब के चलते ही कांग्रेस पार्टी और श्रीमती गांधी की गुड बुक से बाहर हो गए। हर आदमी को अपना बनाकर उसके हो जाने वाले शंकर दयाल जी का मुस्कुराता चेहरा और जोरदार ठहाके आज भी लोगों को बरबस चौंका देती है। किसी मिठाई से भी ज्यादा मिठास भरे शंकर दयाल जी के इस साल जन्मदिन (27 दिसंबर) का 75वां साल है। जिसे अम़ृत महोत्सव की तरह एक महाउत्सव की तरह पूरे वर्ष मनाया जाएगा। इसे एक अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक राजनीतिक और पत्रकारिय जलसे के रूप में मनाने की योजनाओं पर काम चल रहाहै। कई किस्तों में सांसद और मंत्री रह चुके और कश्मीर नरेश के अलावा भारतीय साहित्यिक संबंध परिषद के अध्यक्ष के रूप में काम देख रहे डा. कर्ण सिंह इस आयोजन समिति के मुखिया है। देश के कई राज्यों के साथ ही विदेशों में भी कुछ कार्यक्रम कराने की योजनाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसमें खासतौर पर शंकर दयाल जी के पुत्र रंजन और राजेश के अलावा बेटी रश्मि सिंह की त्तत्परता लगन मेहनत और काम करने के अनथक प्रयासों का ही नतीजा है कि राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल इस अम़ृत महोत्सव का शुभारंभ करेंगी। सूर्य मंदिर के लिए जग विख्यात गांव कस्बा (जो नाम दे दे) देव में सूर्य मंदिर के बाद देव, भवानीपुर गांव के शंकर दयाल सिंह और इनके पिता कामता प्रसाद सिंह काम को ही लोग जानते और मानते रहे है। एक छोटे से गांव से बाहर निकल कर दुनियां भर में विख्यात होने वाले इस ग्रामीण धरती के सपूत जिसने अपनी कलम से पूरी दुनियां को रौंद डाला और अपनी मुस्कान से सबों को अपना बना लेने वाले इस जादूगर को अपने गांव देहात की जनता की तरफ से नमन। गांव के हर उस आदमी की तरफ से सलाम जिसके पास इस पिता पुत्र को लेकर दर्जनों कथा कहानी और संस्मरण आज भी जिंदा है। देव की हर आदमी की तरफ से मैं इस महा उत्सव की सफलता की कामना करता हूं। इस परिवार की तीसरी पीढी के  साथ हर समय हरदम जुड़े रहने की आंकाक्षा रहेगी, क्योंकि इसी बहाने शायद देव के लिए हमलोग कुछ काम आ सके।


लेखक सासंद और यायावर शंकर दयाल समारोह


जीवन भर यात्रा और कंही सुबह कहीं शाम बीताने वाले यायावर शंकर दयाल सिंह की मौत भी एक यायावर की तरह ही चलती रेल में हुई थी। बतौर सासंद अपनी जीवन यात्रा समाप्त करने वाले लेखक और बिहार में साहित्य और मंच को लेकर हमेशा सक्रिय रहने वाले शंकर दयाल सिंह 27 दिसंबर 2011 को 75 साल पूरे करते। निधन होने के बाद भी इनके सुयोग्य पुत्रों ने अपने पिता की याद में एक साल तक चलने वाले एक अमृत महोत्सव समारोह का आयोजन किया है। जिसकी शुरूआत राष्ट्रपति भवन में देश की पहली महिला राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल करेंगी।
शंकरदयाल सिंह के पुत्र रंजन कुमार सिंह ने बताया कि 27 दिसम्बर 2011 के बाद पूरे साल भर बिहार झारखंड़ यूपी और दिल्ली में दर्जनों कार्यक्रम होगें। जिसमें कवि सम्मेलन संगोष्ठी से लेकर सांस्कृतिक समारोह शामिल है। रंजन ने कहा कि इन कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाई जा रही है।
गौरतलब है कि लेखक और साहित्यकार कामता प्रसाद सिंह काम के पुत्र शंकर दयाल सिंह के साहित्य परिवार की यह तीसरी पीढ़ी है। रंजन ने बताया कि शंकर जी के गांव भवानीपुर, देव के कामता सेवा केंद्र से लेकर पिताजी की यादों से सराबोर उन तमाम स्थानों पर कोई ना कोई कार्यक्रम जरूर किया जाएगा। इस मौके पर स्मारिका और कई पुस्तकों के प्रकाशन की भी योजना है। रंजन के अनुसार सितम्बर 2011 तक साल दिसंबर 2012 तक चलने वाले सारे समारोहों को अंतिम रूप दे दिया जाएगा। यानी शंकर दयाल सिंह की यादों से नयी पीढ़ी को परिचित कराने की इस मुहिम को बच्चों समेत सभी उम्र के लोगों को साझेदार बनाया जाएगा कि वे भी इस मौके पर इस बहुमुखी तचनाकार पत्रकार लेखक और हरदिल अजीज राजनीतिक के बारे में अपने अनुभव को साझा कर सके।

सोमवार, 5 सितंबर 2011

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल-7




 साल के अंत तक पीएम बन सकते है राहुल ?

यह कहना और सुनना इस समय बड़ा अजीब सा लग सकता है कि इस साल के अंत तक राहुल बाबा और प्रियंका गांधी की पोलिटिकल पारी शुरू हो जाएगी। पोलिटिक्स की घुट्टी तो इन्हें बचपन (1985 से) से दी जा रही है, मगर सोनिया की बीमारी के बाद सारा परिदृश्य बदल चुका है। खासकर विकीलिप्स द्वारा राहुल गांधी के पीएम नहीं बनने की घोषणा के बाद गांधी परिवार इस मामले में करारा जवाब देने को बावला सा है। देश की हालात और मनमोहन सरकार की लगातार गिरती रेटिंग के बाद गांधी परिवार भी इसके लिए राजी हो गया है कि राहुल प्रियंका को प्रधान और उप प्रधान मंत्री बनाकर देश की जिम्मेदारी दे दी जाए। बस इंतजार कीजिए यदि देश में सबकुछ सामान्य रहा तो सोनिया गांधी के भारत आते ही बहुत कुछ बदल और बदला बदला सा माहौल बन और बनाया जा सकता है। अपनी सेहत को देखते हुए मैडम पार्टी नेतृत्व की बागडोर भी प्रियंका गांधी को किसी मौके पर सौंप सकती है। यानी नए साल 2012 में चौथी पीढी के आने पर बहुत कुछ ऐसा होगा जिसके बाबत ज्यादातर कांग्रेसियों ने सोचा भी नहीं था। यानी यूपी में बीएसपी की छोटी बहन बनकर सत्ता में रहने पर भी कांग्रेस गंभीर है।

मनमोहक बदला

हमारे प्रधानमंत्री जी यदि खामोश रहते है तो इससे उनको कमजोर और दब्बू समझने की भूल करने वाले तमाम लोग सावधान। हमारे मन साहब इतनी सफाई से वार करते है कि सांप भी मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती। पहले रामदेव और अब टीम अन्ना के लोग सरकार पर चिल्लाने के बहाने मन सरकार पर उत्पीड़न और तबाह करने का आरोप लगाना चालू कर दिया है। अरविंद केजरीवील किरण बेदी से लेकर प्रशांत भूषण तक सरकार पर जानबूझ कर लपेटने चपेटने और तंग करने का राग अलाप रहे है।  लड़की वेश में जान बचाकर रामलीला मैदान से भागे रामदेव भी अब मनमोहन सरकार पर देख लेने और तंग करने या दुश्मनी निकालने जैसे अलंकार लगा रहे है। रामदेव तो सरकार को सीधे धमका रहे है कि अगली बार आंदोलन को कुचलना महंगा पड़ेगा। बाबा रामदेव जी क्या आप दिल्ली में अगली दफा भी कोई धरना आंदोलन प्रदर्शन कर लेने का सपना ( मुंगेरी लाल के हसीन सपने) देख रहे है ? अन्ना साहब भी अपने प्यारे पंचों की हालात देखकर सरकार की नीयत पर आग बबूला हो रहे है।  मगर कमाल है कि मन साहब खामोशी के साथ अपना काम लगातार कर और करा रहे है। यानी शांत रहकर दूसरों को अशांत (तबाह) करने की मनमोहक कला{अदा) में माहिर होना है तो सरदार जी की निंदा करने की बजाय उनको अपना गुरू बनाना ही ज्यादा सार्थक होगा।



ईमानदारी का दिखावा

हमारे सबसे ईमानदार पीएम मनमोहनजी ने अपनी और अपने सहयोगी मंत्रियों की संपति की घोषणा कराके वाकई ईमानदारी का नेक प्रदर्शन किया है। सबसे अमीर मंत्रियों में कमलनाथ अव्वल रहे, पीएम होकर भी मनमोहनजी उनके सामने पानी भरते दिखे।भारत जैसे गरीब देश जहां पर 86 करोड़ मोबाईल और 10 करोड़ लैप्टॅाप और नेट यूजर के बाद भी 52 फीसदी लोगों को दो वक्त खाना नसीब नहीं होता। एक तरफ ऐसे लोगों की तादाद भी काफी हो गई है जिनका सालाना वेतन करोड़ों में है तो दूसरी तरफ भारत की 80 फीसदी आबादी आज भी 10 हजार से कम पगार पाता है। भारत जैसे गरीब देश के अमीर(बेईमान) सांसदों की सूची मन को उत्साहित करने की बजाय टीस देती है कि तमाम संसाधनों पर यह कैसी कुंडली पड़ गयी है कि नेता नौकरशाह दलाल और बेईमानों के अलावा सामान्य लोगों को गरीबी के जाल से बाहर निकलना दूभर हो गया है। मंत्रियों की सूची से वाहवाही लूट रहे मनमोहन जी विकीलिप्स के खुलासे और सूची पर गौर फरमाएंगे जिसमें आपके आदर्श गांधी परिवार के खरबों रूपये बैंकों में पड़े है। वहीं इस सूची में सबसे बड़ी दलाल (कालगर्ल) नीरा राड़िया के नाम करीब 300 लाख करोड़ रूपए जमा है। आपकी ईमानदारी कहां तेल लेने गई थी मनमोहन साहब ?

तुस्सी ग्रेट हो गोदरेज
सरकारी धन और नाना प्रकार के हथकंड़ों से मालदार होने वाले (बेशर्म) नेताओ नौकरशाहों कुछ तो सबक लो। मुबंई शहर को बचाने और आम जनता के साथ शहर की आबोहवा को बेहतर रखने के लिए गोदरेज की मालकिन उधोगपति  आदि गोदरेज ने सरकार को 1750 एकड़ भूमि देने की पेशकश की है। गोदरेज समूह के पास मुबंई में 3500 एकड़ जमीन है। इस जमीन की कीमत लगाना किसी भी चार्टर अकांऊटेंट के लिेए  भी आज काफी कठिन है। जनता और शहर की फ्रिक् रखने वाली गोदरेज समूह की मालकिन वाकई श्रद्धा और आदर की पात्र बन जाती है। यकीन करना मुश्किल सा लगता है कि जिस देश में एक एक इंच जमीन के लिेए दूसरों की जान लेने वाले इसी देश में गोदरेज जैसा भी एक आदर्श समूह है जो अरबों खरबों की जमीन को केवल जनता और शहर की सेहत के लिए देने पर गंभीर है। तुस्सी ग्रेट हो आदि गोदरेज जी। आपकी जितनी भी तारीफ की जाए वो सब कम है।


जेड सिक्योरिटी में अन्ना

जन लोकपाल बिल के बूते देश भर में अपनी धाक जमाने वाले अन्ना हजारे को सरकार ने जेड ग्रेड की सुरक्षा प्रदान की है और श्रीमान अन्ना ने इसे स्वीकार भी लिया। यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है कि जनता के बूते जनता द्वारा जनता के लिए जनसंघर्ष करने वाले अन्ना को अब इसी जनता से क्या खौफ होने लगा कि एकाएक मंदिर में खुले  आम रहने वाले अन्ना को सरकारी सुरक्षा की जरूरत आ पड़ी। अन्ना को सरकार के इस कवच को उतार फेंकना चाहिए। उन्हें बूझना होगा कि यह सुरक्षा नहीं फंदा है जिसमें उलझ कर रह गए तो जनता पीछे छूट जाएगी और अन्ना आगे निकल जाएंगे, जहां पर वे खुद को सरकारी साजिश के शिकार माने जाएगे। यानी अन्ना को अब आगे का रास्ता तय करना होगा कि बगैर खतरे के कौन सा रास्ता सबसे सेफ रहेगा।


माकन खेल (फेल) और राजीव पास

जनाधार विहीन होने के बाद भी समय और सामने वाले की औकात को भांपने में हमेशा फिस्सडी रह गए अजय माकन हर बार चौबे बनने की फिराक में मात खा जाते है। हर विवाद के मौके पर अपनी टांग अड़ाने वाले माकन खेल नीति बनाने के नाम पर पत्रकारों के पत्रकार और नेताओं के नेता के रूप में (कु) विख्यात राजीव शुक्ला से जा उलझे। देश की सबसे अमीर खेल बोर्ड बीसीसीआई को सरकारी फंदे में लाने का प्लान बनाया था। मगर बीसीसीआई के उपाध्यक्ष राजीव शुक्ल के पावर को जानकर भी अनदेखा कर गए माकन इस बार भी चारो तरफ बुरी तरह चित हो गए। अपने दिवंगत चाचू ललित माकन के नाम और काम का फसल काट रहे अजय माकन अपनी कुटिलता से तो अपने चाचा की बेटी के अधिकारों को तो दबा देते है, मगर बुलडोजर राजीव के सामने माकन साहब आपकी दाल नहीं गल सकती। मौका पड़ने पर तो अपने राजीव साहब मनमोहन जी से भी जबरन कोई काम करवा सकते है। माकन भाई ज्यादा उलझने की बजाय अपनी नौकरी की सलामती मनाते रहने में ही बुद्धिमानी है।





इरादा तो नेक है

दो विचारवान लोग जब एक साथ बैठते हैं तो कुछ ना कुछ भला ही होता है। खासकर बिहार के सीएम नीतीश कुमार और ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश एक साथ मंत्रणा करना तो और खास हो जाता है। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए बीपीएल आयोग बनाने के सुझाव को जयराम ने औपचारिक तौर पर मान लिया। अब देखना है कि जयराम इसे किस शक्ल में प्रस्तुत करके बीपीएल के नीते रहने वाले करोड़ों लोगों के कल्याण का श्री गणेश  कब कहां और किस तरह करते है।


संकट में बीएसएनएल

देश की सबसे बड़ी सरकारी दूरसंचार कंपनी संकट में है। घाटे से वह इस कदर परेशान हो गई है कि देश भर के 25 हजार कर्मचारियों की छंटनी पर गंभीर है। हालांकि उसके पास करीब 75 हजार कर्मचारी अभी भी फालतू है। डॅाट ने इस पर रोक लगाते हुए वीआरएस स्कीम लाने का सुझाव दिया है। सरकारी लापरवाही और घोर गलाकाट कंपीटिशन में भी बीएसएनएल के करोड़ो लाईने बेकार पड़ी है। लोग सरकारी सेवा से उबकर निजी शरणों में जा रहे है। और अपने संचार मंत्री कपिल सिब्बल साहब को सरकारी उपक्रमों की बदहाली तबाह नहीं करती है. सिब्बल साहब कुछ तो शर्म करो वकील साहब कि दम तोडने जा रही बीएसएनएल को फिर से खड़ा किया जा सके। डॅाट के अलावा कैग से भी लताड़ खाने के बाद भी वकील साहब के साथ साथ बीएसएनएल
के नौकरशाहों को इसकी बदहाल होती हालत पर ध्यान नहीं जा रहा।

योगानंद का कांग्रेसी खेल

दिल्ली के सभी विधायकों में सबसे ज्यादा विद्वान लेखक के रूप में विख्यात और दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष डा.योगानंदशास्त्री से तो किसी को ऐसी उम्मीद ही नहीं थी। लोकसभा और राज्यसभा के सांसद सदन को नहीं चलने दे रहे है। दोनें सदनों के अध्यक्ष परेशान हो रहे है, मगर दिल्ली विधानसभा को इसके अध्यक्ष डा.योगानंद शास्त्री ही चलने नहीं दे रहे है। एक तो सत्र इतना छोटा रखा जाता है कि जब तक हवा माहौल गरमाता है, तभी सत्र खत्म हो जाता है। इस बार तो बीजेपी सीएम के इस्तीफे को लेकर ज्यादा हल्ला बोलने के लिए तैयार थी, तभी शास्त्री ने मार्शलों की मदद से 23 विधायको को पूरे सत्र के लिए सदन से निकाल बाहर करके सीएम को साफ सुरक्षित बचा लिया। सदन में वैसे भी विधायकों से ज्यादा दंगल मार्शल करते है, क्योंकि कहीं कुछ हंगामा हुआ नहीं कि विधानसभा अध्यक्षों द्वारा मार्शलों को सदन में दौड़ा दिया जाता है। शास्त्री जी पढ़े लिखों पर एक कहावत है कि पढ़ा लिखा मूरख। क्या देहाती मुहाबरा आपके ऊपर सटीक नहीं जम रहा है?


छुट्टी लेने के सौ बहाने

मेहनती जापानियों के बारे में एक किस्सा मशहूर कि एक जापानी को हर शुक्रवार के दिन बदन दर्द करने लगता था और रविवार को यही दर्द खुद ब खुद खत्म हो जाता। वह एक मनोचिकित्सक के पास गया तो उसने बताया कि अगले दो दिनों की छुट्टी के अहसास से ही बदन में दर्द जाग जाता था और अगले दिन फिर काम करने की लगन से रविवार को बदन तरोताजा हो जाता था। इसके विपरीत ज्यादातर भारतीयों को सोमवार को काम के नाम से ही बुखार चढ़ जाता है और शुक्रवार से ही मौज मस्ती मनाने के नाम पर वे मगन हो जाते है। भले ही यह भारतीयों के निकम्मेपन और आलस स्वभाव पर एक मजाक हो मगर एक सर्वेक्षण में इस बहाने पर मुहर लग चुकी है कि बहाने बाजी से छुट्टियां लेनें में सबसे अव्वल होते है भारतीय। क्या इस पर कोई शर्मिदा होने के लिए राजी है?

रेप का कोई शेप नहीं

सचमुच आदमी से ज्यादा नंगा और दरिंदा (जानवर भी कह ले) कोई और नहीं होता। कोई अपनी मासूम बेटी के साथ बाप तो कोई चाचा कोई फूफा कोई भाई, मौसा तो कोई पड़ोसी नाबालिग रिश्तेदारों और लड़कियों की इज्जत अस्मत के डकैत बन बैठे है। उम्र 55 की और नजर बचपन पर। हम किस युग में जी रहे है, यह पता नहीं। इस गंगा यमुना और सरस्वती जैसी नदियों और संबंधों की गरिमा के लिए जान तक कुर्बान कर देने वाले इस देश में काम का खुमार कुछ इस कदर हावी हो गया है कि लोग अब तमाम रिश्ते नातों और उम्र का लिहाज तक भूल गए है। 91 फीसदी कम उम्र की लड़कियां अपने घर में ही सुरक्षित नहीं है।

कुमाता का एक शर्मनाक चेहरा

कहा जाता है कि पूत कपूत हो सकता है। बाप सांप हो सकता है पर माता कुमाता नहीं हो सकती। शायद इसी वजह से माता का स्थान सबसे उपर है। मगर आज के युग में कुमाताओं की भी कोई कमी नहीं रह गई। दिल्ली की ही एक नीरा नामक माता ने अपने प्यार में अड़चन बन रहे 19 साल के बेटे को दो लाख की सुपारी देकर हत्या करवा दी। सात माह तक यह मामला छिपा भी रहा, क्योंकि दोस्त हत्यारों ने चेहरा इतना कुचलकर हरिद्वार की तरफ फेंक आए थे कि पुलिस को लाश तो मिली, मगर पहचान जाहिर नहीं हो सकी। अपने पति को जूती समझने वाली नीरा का इश्क चल भी रहा था कि एकाएक दो लड़के पुलिस के हत्थे चढे और पुलिसिया मारपीट में  कुमाता का चाल चरित्र चेहरा चालाकी पर से पर्दा उठ गया। अपने आशिक के साथ हवालात की रोटियां खा रही कुमाता पर क्या किसी को कोई सहानुभूति है ?

आशिक बनने से पहले सावधान

अगर आप किसी से प्यार करने जा रहे हो तो सावधान। अब जमाना बदल गया है। आपकी प्रेमिका भी वैसी नहीं रही कि जबतक इश्क किया, किया। और मौज मस्ती के बाद जब चाहा तो फिर छोड़ दिया। और लड़कियां भी मन दबाकर बेवफाई की पीड़ा को पी जाए। जी नहीं, अब तो लड़कियां भी सबक सीखाना जान गई है। नोएडा की एक लड़की तो आशिक के दफ्तर के बाहर धरने पर बैठ गई,तो दूसरी  लड़की ने अपने प्रेमी के चेहरे पर तेजाब फेंक कर चेहरा ही बदरंग कर दिया। और अपने प्रेमी की बेवफाई से परेशान होकर एक कन्या तो बाकायदा बारात लेकर लड़के के घर पर जा धमकी। परिवार वालों ने अपनी इज्जत(?)  को बचाने के लिए दुल्हा के रूप में आई दुल्हन को घर में लाकर बहू बनाया। अपनी प्रेमिका को गर्भवती बनाने के बाद रफूचक्कर हो गए आशिक को तो और बुरा अंजाम भुगतना पड़ा। अदालत में गुहार लगाकर बाकायदा पुलिस सुरक्षा के साथ अपने ससुराल में जाकर बैठ गई । ससुराल में ही चांद सा बेटे को दादा दादी के बीच जन्म देकर आज घर में राज कर रही है और आशिक महाराज अपनी जान बचाने के लिए मामले को रफा दफा करके सबके सामने सिर नवाकर बैठ गए। यानी प्यार करने से पहले आशिकों को सोच लेना होगा कि धोखा देना अब इतना आसान नहीं है।

यह कैसी साफगोई?

शाहरूख खान भी प्रचार प्रसार के लिए वो तमाम हथकंड़ों का सहारा लेना चालू कर दिया है। अपनी एरोगैंसी के लिेए बदनाम और इसी के चलते कई घरेलू संबंधों को खो चुके खान इस समय दबंग और थ्रीइडियट से पीछे चल रहे है। तो नाम और गप्प शप्प में बने रहने के लिे किंग खान ने अपने सेक्स लाईफ के अनुभवों को सार्वजनिक करने लगे है। अपनी इमेज को लेकर सावधान खान को सबों के सामने बिपाशा और डिनो मारिया के ( रंगरलियों) ब्लू फिल्म का तो खुलासा करके बिपाशा को शर्मसार (मौज मजा बन जाता है सार्वजनिक होने पर सजा) कर दिया, मगर अपने उन तमाम संगीनियों को छिपा गए। अलबता यह कहना नहीं भूले कि मजा तो केवल मनपंसदीदा पार्टनर के साथ ही आता है। गौरी सावधान । खान में अब रावण जैसे किंग के गुण दिखने लगे है। क्या होगा जब रावण सबके सामने होगा।


शंकर दयाल सिंह : क्या सच क्या झूठ

आपातकाल के दौरान इमरजेसी: क्या सच और क्या झूठ किताब लिखकर इमरजेसी और संजय गांधी का कच्चा चिठ्ठा खोलने वाले बिहार के हरदिल अजीज लोकप्रिय सांसद और लेखक दिवंगत शंकर दयाल सिंह की बेहद लोकप्रिय किताब है। त्तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाक के बाल रहे शंकर दयाल जी इस किताब के चलते ही कांग्रेस पार्टी और श्रीमती गांधी की गुड बुक से बाहर हो गए। हर आदमी को अपना बनाकर उसके हो जाने वाले शंकर दयाल जी का मुस्कुराता चेहरा और जोरदार ठहाके आज भी लोगों को बरबस चौंका देती है। किसी मिठाई से भी ज्यादा मिठास भरे शंकर दयाल जी के इस साल 75 वां जन्मदिन (27 दिसंबर) है। जिसे अम़ृत महोत्सव की तरह एक महाउत्सव के रूप में पूरे वर्ष मनाया जाएगा। इसे एक अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक राजनीतिक और पत्रकारिय जलसे के रूप में मनाने की योजना पर काम चल रहा है। कई किस्तों में सांसद और मंत्री रह चुके और कश्मीर नरेश के अलावा भारतीय साहित्यिक संबंध परिषद के अध्यक्ष डा. कर्ण सिंह इस आयोजन समिति के मुखिया है। देश के कई राज्यों के साथ ही विदेशों में भी कुछ कार्यक्रम कराने की योजनाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसमें खासतौर पर शंकर दयाल जी के पुत्र रंजन और राजेश के अलावा बेटी रश्मि सिंह की त्तत्परता लगन मेहनत और काम करने के अनथक प्रयासों का ही नतीजा है कि राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल इस अम़ृत महोत्सव का शुभारंभ करेंगी। सूर्य मंदिर के लिए जग विख्यात गांव कस्बा (जो नाम दे दे) देव में सूर्य मंदिर के बाद देव, भवानीपुर गांव के शंकर दयाल सिंह और इनके पिता कामता प्रसाद सिंह काम को ही लोग राष्ट्रीय स्तर पर जानते और मानते है। एक छोटे से गांव से बाहर निकल कर दुनियां भर में विख्यात होने वाले इस ग्रामीण धरती के सपूत जिसने अपनी कलम से पूरी दुनियां को रौंद डाला और अपनी मुस्कान से सबों को अपना बना लिया। सबों को अपना बनाकर उसका बन जाने वालो में एक इस जादूगर को अपने गांव देहात की जनता की तरफ से नमन। गांव के हर उस आदमी की तरफ से सलाम जिसके पास इस पिता पुत्र को लेकर दर्जनों कथा कहानी और संस्मरण आज भी मन में जिंदा है। देव के हर आदमी की तरफ से मैं इस महा उत्सव की सफलता की कामना करता हूं। शंकर दयाल सिंह के गांव शहर कस्बा देव का ही वाशिंदा होने के नाते यह हमलोग की जिम्मेदारी भी बन जाती है कि इस परिवार के साथ जुड़कर रहे ताकि इसी बहाने देव का भी कुछ कल्याण हो सके।


(दो सप्ताह से इस साप्ताहिक कॅालम को नियमित नहीं रख पा रहा हूं , इसके लिए क्षमा करे। मेरी कोशिश रहेगी कि यह कॅालम आप सब तक शनिवार को हर हाल में उपलब्ध हो सके।

बुधवार, 31 अगस्त 2011

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल-6






बस जल्द ही बढ़ने  वाला है रेल किराया

जनता जर्नादन होशियार,  बा मुलाहिजा सावधान । लालू ममता की दया धार अब बंद होने वाली है। सात साल के बाद एक बार फिर रेल किराया में बढ़ने का दौर चालू होने जा रहा है। बिहार को रसातल में ले जाने के लिए कुख्यात बदनाम लालू राबड़ी राज का कलंक अभी तक बरकरार है, इसके बावजूद एक रेल मंत्री के रूप में लालू ने कमाल किया और लगातार पांच साल तक रेल किराये को बढ़ने नहीं दिया। आय के अन्य संसाधनों को बढ़ाकर रेलवे को घाटे में नहीं आने दिया। लालू के बाद ममता बनर्जी ने भी लालू के पदचिन्हों पर चली, और किराये को नहीं बढ़ाया। मगर ममता पार्टी के प्रेशर से रेल मंत्री बने दिनेश त्रिवेदी ने दया करूणा प्रेम ममता और संवेदना को दरकिनार करते हुए रेल भाड़ा बढ़ाने का गेम चालू कर दिया है। संसाधनों को तलाश कर आय में चौतरफा बढ़ोतरी के उपायों में जुट गए है। रेल घाटे से बेहाल है, क्योंकि ममता दीदी ने रेल की बजाय वेस्ट बंगाल पर तो ध्यान दिया, मगर रेल को लेकर अपने कर्तव्य भूल गई। देश यूपीए और सरदार जी की गद्दी पर कोई खास संकट (अन्नामय की तरह) नहीं आया तो साल 2011 के अंत तक देश की जीवनरेखा माने जाने वाली रेल में सफर करना पहले से कुछ महंगा जरूर हो जाएगा।



युवराज की छवि संवारने और दिखाने की मुहिम

अन्ना अनशन में देश एकजुट हो गया, मगर हमेशा की तरह दिल्ली में मौनी बाबा बने रहने वाले अपने युवराज यानी राहुल बाबा इस बार भी खामोशी के साथ हंगामा देखते रहे। देखते रहे अपनी पार्टी और पीएम की फजीहत। एक तरफ सरकार की पैंट गिल्ली होती रही तो दूसरी तरफ अन्ना की आंधी से पूरी सरकार का दम उखड़ती रही। हालात को हाथ से बाहर होते देख पर्दे के पीछे से कमान थामे राहुल बाबा को संसद में पूरा पक्ष रखना पड़ा। अन्ना के सामने सरकार को मत्था टेकना पड़ा। हालांकि ये सब हुआ तो राहुल बाबा के निर्देश पर ही। मगर जब पूरा देश अन्नामय होकर उल्लास मना रहा है तो सरकार को अगले साल होने वाले कई चुनावों की चिंता सताने लगी। लिहाजा लोकपाल बिल पर सरकार कोशिश करसरही है कि कुछ चक्कर इस तरह का चलाए कि लोकपाल मामले में अन्ना की जगह राहुल बाबा को भी पूरा श्रेय मिले, ताकि पार्टी सीना चौड़ा करके अन्ना का काउंटर कर सके।


भाई ने भाई को मारा( पछाड़ा)


कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी किसी भी पार्टी के नेता से मात खा जाए या पस्त हो जाए तो चलता है। मगर खासतौर पर अपने चचेरे भाई वरूण गांधी से पस्त हो जाए यह खुद राहुल प्रियंका सोनिया समेत पार्टी को कतई बर्दाश्त नहीं होता। कई मामलों में वरूण से मात गए राहुल बाबा  की अपने भाई के सामने बोलती ही बंद हो गई। खासकर कई साल तक इंतजार के बाद भी शादी नहीं करने पर इसी साल छोटे भाई ने बनारस में शादी करके बड़ी मम्मी के दुखते रग पर हाथ रख दिया। पूरे देश में इस शादी से ज्यादा चर्चा सोनिया राहुल प्रियंका के इसमें शरीक नहीं होने से हुआ। अब ताजा मामला अन्ना आंदोलन का है कि युवा भीड़ अंत तक अपने युवा नेता राहुल बाबा को तलाशती ही रही, मगर वे नहीं आए, मगर वरूण की सक्रिय मौजूदगी ने एक बार फिर अपने बड़े भाई को पछाड़ ही दिया।.


बहनजी की सक्रियता आई काम

पंजा पार्टी में मैडम अम्मा हैं तो प्रियंका वाड्रा गांधी पूरे पार्टी के लिए बहनजी है। हालांकि वे राहुल गांधी की सगी बहन है, पर पूरे पार्टी ने इन्हें अपनाया और माना। इस समय पार्टी सुप्रीमों और इनका मम्मी जब देश से बाहर है तो पार्टी का सारा काम पर्दे के पीछे बहनजी के हाथ में है। देश की जनता के मूड को भांपना और अन्ना की ताकत के सामने सरकार के घुटने टेकने की कवायद और चालाकी सब भाई-बहनों के निर्देश पर हुए। हालांकि पार्टी सुप्रीमों द्वारा गठित कोर कमेटी को साथ लेकर तमाम फैसले हुए मगर कुल मिलाकर पार्टी और टीम पीएम के कोरे ज्ञान ने दिखा और बता दिया कि अपन सरदार जी विवेक पूर्वक और अपने मन से काम करने में एकदम कोरे कागज है। पीएम के नासमझी पर बहनजी ने कई बार रोष भी जताया। अब देखना है कि देश में खराब हुई पार्टी और सरकार की छवि को युवराज के सहारे ठीक करने की मुहिम में क्या अपने सरदार जी भी कदमताल कर पाएंगे ?  

पार्टी का आत्ममंथन

अन्ना हजारे का अनशन भले ही खत्म हो गया हो, मगर पंजा पार्टी में आत्ममंथन का दौर चालू हो गया है। अन्ना हजारे को हल्केपन से आंकने की भूल से लेकर अनशन के दौरान गलत बयानी और नेताओं के उग्र तेवर से होने वाले नुकसाल की समीक्षा की जा रही है। कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी,से लेकर प्रणव मुखर्जी,लुबोधकांत सहाय दिग्गी राजा से लेकर तमाम नेताओं के बयानों पर यही वोग समीक्षा करने में लगे है। खासकर प्रियंका और राहुल नेताओं द्वारा अन्ना की फौज को कमतर आंकने की भूल को माफ करने के मूड में नहीं है। अगले साल होने वाले यबपी समेत कई राज्यों के चुनाव और समाज में पार्टी की इमेज को लेकर एक गुप्त रिपोर्ट मंगवा रही है। इस बाबत एक सर्वे भी कराने पर जोर दिया जा रहा है। खासकर यूपी में अन्ना के बाद की हालात को जानने के लिए बाबा उतावले है कि सालों की मेहनत का कोई असर अभी बाकी है या अन्ना की आंधी में सब धुल(उखड़) गया। (खबर लिखने के बाद पता चला कि बेकाबू होकर बोलने में उस्ताद अपने मनीष तिवारी पर कैंची चल गई है)


अन्ना के सामने सब ढेर


महाराष्ट्र में जनसंघर्ष करने वाले अन्ना हजारे की मार्च 2011 तक नेशनल इमेज होने के बाद भी लोकप्रिय नहीं थे। खासकर धाक और प्रभाव के मामले में भी अन्ना को कोई खास महत्व नहीं दिया जाता था। मगर, एक गांधीवादी अहिंसक आंदोलनकारी की साफ सुथरी छवि होने के कारण ही दिल्ली के नेताओं को अन्ना की जरूरत पड़ी। अप्रैल में अपने मजबूत इरादे और आत्मबल से सरकार को मजबूर करने वाले अन्ना रातोरात इतने लोकप्रिय हो गए कि लोग इन्हें आज तो गांधी जैसा मानने लगे है। देश विदेश की मीडिया में सराहे जा रहे अन्ना के सामने सारे धूमिल से हो गए है। चाहे खिलाड़ी हो या अभिनेता कोई भी इनके सामने टीक नहीं पा रहा । अन्ना के पीछे पूरा देश देखकर तो सारे हैरान है कि इस 74 साल के नौजवान ने इतनी बड़ी लकीर खिंच दी है कि इसके सामने तो अभी कोई नहीं ठहरता।
           
ये तो होना ही था

अन्ना हजारे की दादागिरी नुमा गांधीगिरी जिसे अब अन्नागिरी के नाम से पुरा देश जानता, मानता और अपनाया है। अन्ना की छवि देश के दूसरे गांधी के रूप में उभरी। लोकप्रियता के चरम पर स्थापित अन्ना की इस लोकप्रियता से बौखलाए टीम अन्ना के (खुद को अन्ना से ज्यादा महान मानने वाले) सदस्यों में स्वामी अग्निवेश और रामदेव बाबा का हश्र सारा देश देख रहा है।  बंधुआ मुक्ति मोर्चा और अंग्रेजी विरोध समेत पांच तारा होटलों के बाहर प्रदर्शन करने वाले को तरजीह देने की बजाय अन्नागान सो तो बौखलाना ही था। इस भीड़ में कोई घास भी ना डाले इससे बेहतर है कि कपिल (?) मुनि की गोद में बैठकर मलाई ही चाटे। यही हाव योगगुरू रामदेव का हुआ। अन्ना के अप्रैल वाले अन्नागिरी से परेशान बाबा कालाधन के खिलाफ जोरदार हंगामे के साथ अन्ना को डाउन दिखाना चाहते थे। पर रामलीला मैदान में राम(देव) लीला क्या हुआ  यह सारा देश जानता है। अपने लालच और स्वार्थ वश अन्ना के साथ आने वालों का राज खुल गया। वाचाल रामदेव की बोलती ही बंद हो गई है। देखना है कि सरकारी मेहमान बनने की लालसा वाले अग्निवेश का क्या होता है। चाहे जो हो , मगर बंधुआ मुक्ति मोर्चा के पुरोधा अब खुद सरकारी बंधुआ होते जा रहे है।

मनमोहन पर मनमोहनी कविता

अन्ना आंदोलन के दौरान युवाओं ने कविता पैरोडी और हास्य व्यंग्य से जमकर उल्लास मनाया। अपने सरदारजी यानी पीएम मनमोहन सिंह सबों के सबसे पंसदीदा थे। मुन्नी बदनाम होने के बाद मुन्ना बदनाम हुआ की तर्ज पर लोगों ने अपने मुन्ना यानी मनमोहन जी पर कुछ इस तरह वार किया।

मुन्ना बदनाम हुआ मैडमजी आईसी(कांग्रेस आई) के लिए।
अपनी इज्जत का फलूदा बनाया मैडमजी आईसी के लिए।।

 राजा ने जमकर टूजी मे इजी करप्शन किया
 सुरेश शीला पर आपने एक्शन नहीं लेने दिया
 सालों की इमेज का काम तमाम किया मैडमजी आईसी के लिए।।

मनमोहन पर एक और गाने का मजा ले

अली बाबा 40 चोर की बात हुई पुरानी।
नए जमाने में है अब तो नयी कहानी .।।
मॅाल मोबाइल मेट्रो की मौज है
और सबसे ईमानदार पीएम की टोली में 40 चोरों की फौज है।।  



और जो अन्नागिरी से बच गए (लात जूता खाने से)

अन्ना हजारे भले ही सरकार के लिए सिरदर्द बन गए हो, मगर कुछेक लोगों के लिए तो अन्ना तारणहार बन गए। उनके मन में यह सोचकर ही दिल बैठ जाएगा कि यदि अन्ना महाराज का अनशन नहीं चल रहा होता तो इंगलैंड में गोरों के हाथों बुरी तरह शर्मनाक मात खाने के बाद अपन हिन्दुस्तान के पागल क्रिकेट प्रेमी इन क्तिकेटरों की क्या गत करते। अगर आपको कुछ याद नहीं है तो 2007 में विश्वकप के पहले ही दौर में बाहर होने के बाद तो सारे क्रिकेटरों को अपने फैन से चोर की तरह छिपछिपा कर घर पहुंचना  पड़ा था। किसी के घर के बाहर होलिका दहन की गई को किसी के घर को ही फूंकने की कोशिश की गई। मगर धोनी के धुरंधरों का ये सौभाग्य ही रहा कि हारे भी इस कदर कि खुद ही शर्मसार हो गए मगर अन्ना की आंधी में ज्यादातर भारतीय युवाओं ने क्रिकेट में देश की भारी पराजय को कोई भाव ही नहीं दिया।

कामनवेल्थ के चोरों मिला जीवनदान

पानी अब इतना महंगा औक दुर्लभ होता जा रहा है कि पानी की तरह पैसा बर्बाद करने का मुहाबरा भी गलत दिखने लगा है। सरकारी पैसे को अनाप शनाप खर्चे करने वालों में दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित भी अन्ना अनशन से बच गई। एक तरफ अन्ना और दूसरी तरफ सोनिया का इलाज कराने अमरीका जाना भी शीला को लाईफ मिलने का कारण बन गया। अपन पीएम साहब तो दबंग है नहीं कि मैडम के बगैर कुछ कर सके। यानी अन्ना को सरकार चाहे जितना कोस ले मगर वाकई अन्ना कितनों के लिए धन्ना बन गए। जय हो जय हो अन्ना हजारे जी जय हो।



नवाकुंरों के जज्बे को सलाम

करीब पांच माह (एक्जाम और एडमिशन) के अंतराल के बाद वर्ष 2011-12 में मीडिया छात्रों को पढ़ाने का खाता दयालबाग एजूकेशनल इंस्टीट्यूट (डीइआई) से शुरू हुआ। दिल्ली की अपेक्षा छोटे और मीडिया के लिहाज से बेहद कम साधनों वाले शहर में रहकर  मीडिया में कैरियर बनाने की तैयारी करना हमेशा कठिन होता है। पत्रकारिता के बारे में सैद्धांतिक तौर से ज्यादा नहीं जानने के बाद भी इनके उत्साह और कुछ कर गुजरने की लालसा देखकर मन संतुष्ट हुआ। चाहे अतुल से लेकर पवन बघेल, पूजा मनवानी, मोनिका ककरवानी, श्वेता सारस्वत, रेणु सिंह, अंशिका चतुर्वेदी हो या नेहा सिंह। यानी कुल आठ छात्रों के मिजाज को देखना उत्साहवर्द्धक लगा। वहीं मीडिया के प्रति लड़कियों की जीवटता उत्साह (भले ही लगन कहना अभी जल्दबाजी होगी) को देखना और भी ज्यादा अनोखा और सुखद लगा कि इस बार आठ छात्रों में छह लड़कियां है। इनके जज्बे को सलाम करता हूं। साथ ही इनके हेड ज्योति कुमार वर्मा जी और इनके तमाम साथियों से  अपेक्षा करूंगा कि वे इन्हें इस तरह तराशें ताकि उत्साह ज्ञान और अनुभव से ये भावी पत्रकार खुद को निखार सके। सबों के उज्जवल और बेहतर भविष्य की कामना के साथ मीडिया या पत्रकारिता में स्वागत है।

भारत में सूर्य मंदिरों की सूची

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यह सूची भारत में सूर्य - मंदिरों की है:-

कोणार्क में सूर्य देव

मार्तंड, कश्मीर
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देव सूर्य मंदिर


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यह बिहार के देव (औरंगाबाद जिला) में स्थित सूर्य मंदिर है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख ना होकर पश्चिमाभिमुख है। यह मंदिर अपनी अनूठी शिल्प कला के लिए प्रख्यात है। पत्थरों को तराश कर बनाए गए इस मंदिर की नक्काशी उत्कृष्ट शिल्प कला का नमूना है। यहाँ छठ पर्व के अवसर पर भारी भीड़ उमड़ती है।

अनुक्रम

[छुपाएँ]

[संपादित करें] मंदिर का निर्माण

प्रचलित मान्यता के अनुसार इसका निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया है। इस मंदिर के बाहर संस्कृत में लिखे श्लोक के अनुसार 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेतायुग के गुजर जाने के बाद राजा इलापुत्र पुरूरवा ऐल ने इस सूर्य मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया था। शिलालेख से पता चलता है कि पूर्व 2007 में इस पौराणिक मंदिर के निर्माणकाल का एक लाख पचास हजार सात वर्ष पूरा हुआ। पुरातत्वविद इस मंदिर का निर्माण काल आठवीं-नौवीं सदी के बीच का मानते हैं।

[संपादित करें] स्थापत्य

कहा जाता है कि सूर्य मंदिर के पत्थरों में विजय चिन्ह व कलश अंकित हैं। विजय चिन्ह यह दर्शाता है कि शिल्प के कलाकार ने सूर्य मंदिर का निर्माण कर के ही शिल्प कला पर विजय प्राप्त की थी। देव सूर्य मंदिर के स्थापत्य कला के बारे में कई तरह की किंवदंतियाँ है।
मंदिर के स्थापत्य से प्रतीत होता है कि मंदिर के निर्माण में उड़िया स्वरूप नागर शैली का समायोजन किया गया है। नक्काशीदार पत्थरों को देखकर भारतीय पुरातत्व विभाग के लोग मंदिर के निर्माण में नागर एवं द्रविड़ शैली का मिश्रित प्रभाव वाली वेसर शैली का भी समन्वय बताते है।

[संपादित करें] प्रतिमाएँ

मंदिर के प्रांगण में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल, मध्याचल तथा अस्ताचल के रूप में विद्यमान हैं। इसके साथ ही वहाँ अद्भुत शिल्प कला वाली दर्जनों प्रतिमाएं हैं। मंदिर में शिव के जांघ पर बैठी पार्वती की प्रतिमा है। सभी मंदिरों में शिवलिंग की पूजा की जाती है। इसलिए शिव पार्वती की यह दुर्लभ प्रतिमा श्रद्धालुओं को खासी आकर्षित करती है।

[संपादित करें] मंदिर का स्वरूप

मंदिर का शिल्प उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर से मिलता है। देव सूर्य मंदिर दो भागों में बना है। पहला गर्भ गृह जिसके ऊपर कमल के आकार का शिखर है और शिखर के ऊपर सोने का कलश है। दूसरा भाग मुखमंडप है जिसके ऊपर पिरामिडनुमा छत और छत को सहारा देने के लिए नक्काशीदार पत्थरों का बना स्तम्भ है। तमाम हिन्दू मंदिरों के विपरीत पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर देवार्क माना जाता है जो श्रद्धालुओं के लिए सबसे ज्यादा फलदायी एवं मनोकामना पूर्ण करने वाला है।

[संपादित करें] रख-रखाव

इस मंदिर के देखभाल का दायित्व देव सूर्य मंदिर न्यास समिति का है।

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...