बुधवार, 26 मार्च 2014

क्या है कहानी की कहानी



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कथाकार (एक प्राचीन कलाकृति)
कहानी हिन्दी में गद्य लेखन की एक विधा है। उन्नीसवीं सदी में गद्य में एक नई विधा का विकास हुआ जिसे कहानी के नाम से जाना गया। बंगला में इसे गल्प कहा जाता है। कहानी ने अंग्रेजी से हिंदी तक की यात्रा बंगला के माध्यम से की। कहानी गद्य कथा साहित्य का एक अन्यतम भेद तथा उपन्यास से भी अधिक लोकप्रिय साहित्य का रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना तथा सुनना मानव का आदिम स्वभाव बन गया। इसी कारण से प्रत्येक सभ्य तथा असभ्य समाज में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में कहानियों की बड़ी लंबी और सम्पन्न परंपरा रही है। वेदों, उपनिषदों तथा ब्राह्मणों में वर्णित 'यम-यमी', 'पुरुरवा-उर्वशी', 'सौपणीं-काद्रव', 'सनत्कुमार- नारद', 'गंगावतरण', 'श्रृंग', 'नहुष', 'ययाति', 'शकुन्तला', 'नल-दमयन्ती' जैसे आख्यान कहानी के ही प्राचीन रूप हैं।
प्राचीनकाल में सदियों तक प्रचलित वीरों तथा राजाओं के शौर्य, प्रेम, न्याय, ज्ञान, वैराग्य, साहस, समुद्री यात्रा, अगम्य पर्वतीय प्रदेशों में प्राणियों का अस्तित्व आदि की कथाएँ, जिनकी कथानक घटना प्रधान हुआ करती थीं, भी कहानी के ही रूप हैं। 'गुणढ्य' की "वृहत्कथा" को, जिसमें 'उदयन', 'वासवदत्ता', समुद्री व्यापारियों, राजकुमार तथा राजकुमारियों के पराक्रम की घटना प्रधान कथाओं का बाहुल्य है, प्राचीनतम रचना कहा जा सकता है। वृहत्कथा का प्रभाव 'दण्डी' के "दशकुमार चरित", 'बाणभट्ट' की "कादम्बरी", 'सुबन्धु' की "वासवदत्ता", 'धनपाल' की "तिलकमंजरी", 'सोमदेव' के "यशस्तिलक" तथा "मालतीमाधव", "अभिज्ञान शाकुन्तलम्", "मालविकाग्निमित्र", "विक्रमोर्वशीय", "रत्नावली", "मृच्छकटिकम्" जैसे अन्य काव्यग्रंथों पर साफ-साफ परिलक्षित होता है। इसके पश्‍चात् छोटे आकार वाली "पंचतंत्र", "हितोपदेश", "बेताल पच्चीसी", "सिंहासन बत्तीसी", "शुक सप्तति", "कथा सरित्सागर", "भोजप्रबन्ध" जैसी साहित्यिक एवं कलात्मक कहानियों का युग आया। इन कहानियों से श्रोताओं को मनोरंजन के साथ ही साथ नीति का उपदेश भी प्राप्त होता है। प्रायः कहानियों में असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की और अधर्म पर धर्म की विजय दिखाई गई हैं।

परिभाषा

अमेरिका के कवि-आलोचक-कथाकार 'एडगर एलिन पो' के अनुसार कहानी की परिभाषा इस प्रकार हैः "कहानी वह छोटी आख्यानात्मक रचना है, जिसे एक बैठक में पढ़ा जा सके, जो पाठक पर एक समन्वित प्रभाव उत्पन्न करने के लिये लिखी गई हो, जिसमें उस प्रभाव को उत्पन्न करने में सहायक तत्वों के अतिरिक्‍त और कुछ न हो और जो अपने आप में पूर्ण हो।" हिंदी कहानी को सर्वश्रेष्ठ रूप देने वाले 'प्रेमचन्द' ने कहानी की परिभाषा इस प्रकार से की हैः "कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता।" हिन्दी के लेखकों में प्रेमचंद पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने तीन लेखों में कहानी के सम्बंध में अपने विचार व्यक्त किए हैं – ‘कहानी (गल्प) एक रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा-विन्यास, सब उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं। उपन्यास की भाँति उसमें मानव-जीवन का संपूर्ण तथा बृहत रूप दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता। वह ऐसा रमणीय उद्यान नहीं जिसमें भाँति-भाँति के फूल, बेल-बूटे सजे हुए हैं, बल्कि एक गमला है जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है।’ कहानी की और भी परिभाषाएँ उद्धृत की जा सकती हैं। पर किसी भी साहित्यिक विधा को वैज्ञानिक परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता, क्योंकि साहित्य में विज्ञान की सुनिश्चितता नहीं होती। इसलिए उसकी जो भी परिभाषा दी जाएगी वह अधूरी होगी।

कहानी के तत्व

रोचकता, प्रभाव तथा वक्‍ता एवं श्रोता या कहानीकार एवं पाठक के बीच यथोचित सम्बद्धता बनाये रखने के लिये सभी प्रकार की कहानियों में निम्नलिखित तत्व महत्वपूर्ण माने गए हैं कथावस्तु, पात्र अथवा चरित्र-चित्रण, कथोपकथन अथवा संवाद, देशकाल अथवा वातावरण, भाषा-शैली तथा उद्देश्य। कहानी के ढाँचे को कथानक अथवा कथावस्तु कहा जाता है। प्रत्येक कहानी के लिये कथावस्तु का होना अनिवार्य है क्योंकि इसके अभाव में कहानी की रचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कथानक के चार अंग माने जाते हैं - आरम्भ, आरोह, चरम स्थिति एवं अवरोह। कहानी का संचालन उसके पात्रों के द्वारा ही होता है तथा पात्रों के गुण-दोष को उनका 'चरित्र चित्रण' कहा जाता है। चरित्र चित्रण से विभिन्न चरित्रों में स्वाभाविकता उत्पन्न की जाती है। संवाद कहानी का प्रमुख अंग होते हैं। इनके द्वारा पात्रों के मानसिक अन्तर्द्वन्द एवं अन्य मनोभावों को प्रकट किया जाता है। कहानी में वास्तविकता का पुट देने के लिये देशकाल अथवा वातावरण का प्रयोग किया जाता है। प्रस्तुतीकरण के ढंग में कलात्मकता लाने के लिए उसको अलग-अलग भाषा व शैली से सजाया जाता है। कहानी में केवल मनोरंजन ही नहीं होता, अपितु उसका एक निश्‍चित उद्‍देश्य भी होता है।

हिन्दी कहानी का इतिहास

१९१० से १९६० के बीच हिन्दी कहानी का विकास जितनी गति के साथ हुआ उतनी गति किसी अन्य साहित्यिक विधा के विकास में नहीं देखी जाती। सन १९०० से १९१५ तक हिन्दी कहानी के विकास का पहला दौर था। मन की चंचलता (माधवप्रसाद मिश्र) १९०७ गुलबहार (किशोरीलाल गोस्वामी) १९०२, पंडित और पंडितानी (गिरिजादत्त वाजपेयी) १९०३, ग्यारह वर्ष का समय (रामचंद्र शुक्ल) १९०३, दुलाईवाली (बंगमहिला) १९०७, विद्या बहार (विद्यानाथ शर्मा) १९०९, राखीबंद भाई (वृन्दावनलाल वर्मा) १९०९, ग्राम (जयशंकर 'प्रसाद') १९११, सुखमय जीवन (चंद्रधर शर्मा गुलेरी) १९११, रसिया बालम (जयशंकर प्रसाद) १९१२, परदेसी (विश्वम्भरनाथ जिज्जा) १९१२, कानों में कंगना (राजाराधिकारमण प्रसाद सिंह) १९१३, रक्षाबंधन (विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक') १९१३, उसने कहा था (चंद्रधर शर्मा गुलेरी) १९१५, आदि के प्रकाशन से सिद्ध होता है कि इस प्रारंभिक काल में हिन्दी कहानियों के विकास के सभी चिह्न मिल जाते हैं। प्रेमचंद के आगमन से हिन्दी का कथा-साहित्य आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की ओर मुड़ा। और प्रसाद के आगमन से रोमांटिक यथार्थवाद की ओर। चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' की कहानी 'उसने कहा था' में यह अपनी पूरी रंगीनी में मिलता है। सन १९२२ में उग्र का हिन्दी-कथा-साहित्य में प्रवेश हुआ। उग्र न तो प्रसाद की तरह रोमैंटिक थे और न ही प्रेमचंद की भाँति आदर्शोन्मुख यथार्थवादी। वे केवल यथार्थवादी थे – प्रकृति से ही उन्होंने समाज के नंगे यथार्थ को सशक्त भाषा-शैली में उजागर किया। १९२७-१९२८ में जैनेन्द्र ने कहानी लिखना आरंभ किया। उनके आगमन के साथ ही हिन्दी-कहानी का नया उत्थान शुरू हुआ। १९३६ प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हो चुकी थी। इस समय के लेखकों की रचनाओं में प्रगतिशीलता के तत्त्व का जो समावेश हुआ उसे युगधर्म समझना चाहिए। यशपाल राष्ट्रीय संग्राम के एक सक्रिय क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे, अतः वह प्रभाव उनकी कहानियों में भी आया। अज्ञेय प्रयोगधर्मा कलाकार थे, उनके आगमन के साथ कहानी नई दिशा की ओर मुड़ी। जिस आधुनिकता बोध की आज बहुत चर्चा की जाती है उसके प्रथम पुरस्कर्ता अज्ञेय ही ठहरते हैं। अश्क प्रेमचंद परंपरा के कहानीकार हैं। अश्क के अतिरिक्त वृंदावनलाल वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, इलाचन्द्र जोशी, अमृतलाल नागर आदि उपन्यासकारों ने भी कहानियों के क्षेत्र में काम किया है। किन्तु इनका वास्तविक क्षेत्र उपन्यास है कहानी नहीं। इसके बाद सन १९५० के आसपास से हिन्दी कहानियाँ नए दौर से गुजरने लगीं। आधुनिकता बोध की कहानियाँ या नई कहानी नाम दिया गया।

समालोचना

कहानी एक अत्यंत लोकप्रिय विधा के रूप में स्वीकृत हो चुकी है। प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाओं में, पाठकीय माँग के फलस्वरूप, कहानियों का छापा जाना अनिवार्य हो गया है। इस देश की प्रत्येक भाषा में केवल कहानियों की पत्रिकाएँ भी संख्या में कम नहीं हैं। रहस्य, रोमांस और साहस की कहानियों के अतिरिक्त उनमें जीवन को गंभीर रूप में लेने वाली कहानियाँ भी छपती हैं। साहित्यिक दृष्टि से इन्हीं का महत्व है। ये कहानियाँ चारित्रिक विशेषताओं, ‘मूड’, वातावरण, जटिल स्थितियों आदि के साथ सामाजिक-आर्थिक जीवन से भी संबंद्ध होती हैं। सामानयतः कहानी मीमांसा के लिए छः तत्वों का उल्लेख किया जाता है – 1.कथावस्तु, 2.चरित्र-चित्रण, 3. कथोपकथन, 4.देशकाल, 5. भाषाशैली और 6. उद्देश्य। किंतु इन प्रतिमानो का प्रयोग नाटक और उपन्यासों के लिए भी होता है। ऐसी स्थिति में भ्रांति की सृष्टि हो सकती है। लेकिन इसका परिहार यह कह कर लिया जाता है कि कहानी की कथावस्तु इकहरी होती है। चरित्र के लिए किसी पहलू का चित्रण होता है। कथोपकथन अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म तथा मर्मस्पर्शी होता है। कहानी में एक देश और एक काल की ज़रूरत होती है। सन साठ के बाद की कहानियों का तेवर बदला हुआ है। इन कहानियों को साठोत्‍तरी कहानी कहा जाता है। इस दौर में कई कहानी आंदोलन चले जिनमें अकहानी, सहज कहानी,सचेतन कहानी,समांतर कहानी और सकिय कहानी आंदोलन प्रमुख थे। बाद में जनवादी कहानी आंदोलन में इनका समाहार हो जाता है। नब्‍बे के दशक की कहानी और 21 वीं सदी के पहले दशक की कहानी का अभी तक समुचित मूल्‍यांकन नहीं हो पाया है लेकिन उनमें वैश्‍वीकरण,सूचना तंत्र और बाजारवाद की अनुगँज साफ सुनी जा सकती है।

इन्हें भी देखें

बाह्य सूत्र

बशीर बद्र की शायरी




परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता ।

बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समन्दर से मिला, दरिया नहीं रहता ।

हजारों शेर मेरे सो गये काग़ज़ की कब्रों में
अजब मां हूं कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता ।

तुम्हारा शहर तो बिल्कुल नये अन्दाज़ वाला है
हमारे शहर में भी अब कोई हमसा नहीं रहता ।

मोहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ रहती है
कोई इन्सान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता ।

कोई बादल हरे मौसम का फ़िर ऐलान करता है
ख़िज़ा के बाग में जब एक भी पत्ता नहीं रहता ।

-
बशीर बद्र

2

कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई खौफ दिल में ज़रा न हो
मुझे अपनी कोई ख़बर न हो, तुझे अपना कोई पता न हो ।

वो फिराक हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो ।

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में न क़ैद कर, जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो ।

वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, तेरी बरकतों की बहार से
जहाँ कोई शाख हरी न हो, जहाँ कोई फूल खिला न हो ।


तेरे इख्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे
यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो ।

कभी हम भी जिस के क़रीब थे, दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे
मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो ।

-
बशीर बद्र

3
बशीर का जादूः

कहीं चांद राहों में खो गया कहीं चांदनी भी भटक गयी
मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गयी ।

तेरे हाथ से मेरे होठ तक वही इंतज़ार की प्यास है
तेरे नाम की जो शराब थी कहीं रास्ते में छलक गयी ।

मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में
मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गयी ।

कभी हम मिले तो भी क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गयी ।

मुझे पढ़ने वाला पढ़े भी क्या मुझे लिखने वाला लिखे भी क्या
जहाँ नाम मेरा लिखा गया वहां रोशनाई उलट गयी ।

तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं
तेरी याद शाख-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गयी ।

4


बशीर बद्र की एक प्यारी रचना :

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो ।

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो ।

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो ।

मुझे इश्तहार-सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो ।

कभी हुस्न-ए-पर्दानशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में
जो मैं बन-सँवर के कहीं चलूँ, मेरे साथ तुम भी चला करो ।

ये ख़िज़ाँ की ज़र्द-सी शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आँसुओं से हरा करो ।

नहीं बे-हिजाब वो चाँद-सा कि नज़र का कोई असर नहीं
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो ।

5
सरे राह कुछ भी कहा नहीं, कभी उसके घर में गया नहीं
मैं जनम-जनम से उसी का हूँ, उसे आज तक ये पता नहीं ।

उसे पाक़ नज़रों से चूमना भी इबादतों में शुमार है
कोई फूल लाख क़रीब हो, कभी मैंने उसको छुआ नहीं ।

ये ख़ुदा की देन अजीब है, कि इसी का नाम नसीब है
जिसे तूने चाहा वो मिल गया, जिसे मैंने चाहा वो मिला नहीं ।

इसी शहर में कई साल से मेरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं, मुझे उनका कोई पता नहीं ।

6

मेरे पसंदीदा शायर डॉ. बशीर बद्र की एक खूबसूरत रचना :

है अजीब शहर की ज़िन्दगी, न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार- सी दोपहर, कहीं बदमिज़ाज- सी शाम है ।

कहाँ अब दुआओं की बरकतें, वो नसीहतें वो हिदायतें
ये ज़रूरतों का खुलूस है, ये मतालबों का सलाम है ।

यूँ ही रोज़ मिलने की आरजू, बड़ी रख- रखाव की गुफ्तगू
ये शराफतें नहीं बेग़रज़, उसे आपसे कोई काम है ।

वो दिलों में आग लगायेगा, मैं दिलों की आग बुझाऊंगा
उसे अपने काम से काम है, मुझे अपने काम से काम है ।

न उदास हो न मलाल कर, किसी बात का न खयाल कर
कई साल बाद मिले हैं हम, तेरे नाम आज की शाम है ।

कोई नग्मा धूप के गाँव- सा, कोई नग्मा शाम की छाँव- सा
ज़रा इन परिंदों से पूछना, ये कलाम किस का कलाम है ।






रविवार, 23 मार्च 2014

परम्पराओं की नए ढंग से प्रस्तुति जरूरी





कुचीपुड़ी नृत्यांगना शांता रति परंपरागत नृत्य में नए डिजाइन के साथ परीक्षण कर रही हैं. उनका कहना है कि दर्शकों का ध्यान बहुत अधिक देर तक बांधे रखना मुश्किल होता जा रहा है.
खजुराहो के प्रसिद्ध खजुराहो नृत्य महोत्सव में बारिश के कारण कार्यक्रम मंदिर के पीछे बने खुले मंच पर करना असंभव था, इसलिए उसे शेड के नीचे कामचलाऊ मंच बनाया गया. कार्यक्रम के दौरान भी बूंदाबांदी जारी थी. कलाकारों से अनुरोध किया गया कि वे अपनी-अपनी प्रस्तुतियों को काट दें और कम समय लें. इन विषम परिस्थितियों में भी कुचीपुड़ी शैली की प्रसिद्ध नृत्यांगना शांता रति ने एकदम अभिभूत करने वाला नृत्य प्रस्तुत किया और सभी कलप्रेमियों का मन मोह लिया. उनके पिता सिंगापुर में एक सफल व्यवसायी थे और कलाओं में उनकी गहरी रुचि थी. उनकी मां कर्नाटक संगीत में प्रशिक्षित थीं. प्रस्तुत है शांता रति से हुई बातचीत के कुछ अंश:
आप तो सिंगापुर में पली-बढ़ीं. फिर नृत्य में और वह भी कुचीपुड़ी में आपकी रुचि कैसे पैदा हुई? क्या आपने दूसरी नृत्य शैलियां भी सीखीं?
मैं पांच साल की थी जब मेरे माता पिता ने मुझे भरतनाट्यम सीखने भेजा क्योंकि उस कच्ची उम्र में भी मेरे कानों में जैसा भी संगीत पड़ता था, चीनी, मलय, पश्चिमी पॉप या भारतीय, तो मेरे पैर उस पर थिरकने लगते थे. बाद में मेरे पिता ने नोटिस किया कि मैं चीनी ऑपेरा को बहुत ध्यान से देखती हूं. उन्होंने कहा कि इसी से मिलता जुलता एक भारतीय नृत्य है कथकलि. क्या मैं उसे सीखना चाहूंगी? मैंने खुशी-खुशी हामी भर दी और सात साल की उम्र से मैं कथकलि सीखने लगी. कुचीपुड़ी की तरफ तो मुझे पद्मविभूषण से अलंकृत गुरु राजा-राधा रेड्डी ने खींचा जब मैं बीस साल पूरे कर चुकी थी. बस तब से मैं इसी की होकर रह गई. बाद में मैंने चेन्नई में गुरु वेम्पति चिन्न सत्यम से इस शैली में उच्च प्रशिक्षण प्राप्त किया.
शास्त्रीय नृत्य वास्तव में है क्या? कुचीपुड़ी को तो काफी बाद में इस श्रेणी में शामिल किया गया.
देखिये, सभी शास्त्रीय नृत्य लोक परम्पराओं से निकले हैं. बाद में इन्हें नाट्यशास्त्र के अनुसार नियमों में बांधा गया. कुछ शैलियों को इस कारण पहले मान्यता मिल गई क्योंकि उन्हें सही किस्म के कलाकारों और संगठनों ने आगे बढ़ाया. कुचीपुड़ी शैली इस दृष्टि से बाद में मान्यता पा सकी.
आपने इस शैली में क्या परिवर्तन किए हैं? मैंने नोटिस किया कि आपकी प्रस्तुति की संरचना बहुत ही कसी हुई और सुगठित थी और उसमें कुछ भी अनावश्यक नहीं था.
कुचीपुड़ी में कुछ भी नया करने का मेरा कोई दावा नहीं है. हां, मेरी यह कोशिश जरूर रही है कि मैं इसमें भारत के अन्य स्थानों की साहित्यिक कृतियों का समावेश करूं क्योंकि मुझे लगता है कि कुचीपुड़ी में इन सभी अलग-अलग तरह की खुशबुओं को अपने में समेटने की क्षमता है.
कोरियोग्राफी में मेरी कोशिश है कि मैं कुचीपुड़ी में अंतर्निहित विशिष्ट गुणों पर किसी तरह का प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नए डिजाइन और नए आइटम पेश करूं और नृत्य रचनाओं को जितना संभव है उतना सरल और सुस्पष्ट रखूं क्योंकि आजकल दर्शकों का ध्यान बहुत अधिक देर तक बांधे रखना मुश्किल होता जा रहा है और वे संक्षिप्त प्रस्तुतियों को अधिक पसंद करते हैं.
एकदम युवा दर्शकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा है? उनमें शास्त्रीय नृत्य के प्रति कितना अनुराग है? और उन्हें इस ओर आकर्षित करने के लिए क्या किया जा सकता है?
नए दर्शकों विशेषकर युवाओं तक नृत्य को पहुंचाने के उद्देश्य से ही मैंने अंतरा प्रतिष्ठान की स्थापना की है और मैंने स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों के बीच भी अनेक प्रस्तुतियां की हैं ताकि उन्हें हमारे शास्त्रीय नृत्यों के व्यक्तित्व को समृद्ध करने वाले गुणों से परिचित कराया जा सके. और हमेशा ही उनसे मुझे अविश्वसनीय रूप से उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिली है. अनेक ने सीखना शुरू किया, अन्य अनेक जो सीखना छोड़ चुके थे फिर से सीखने लगे. बहुतों ने कहा कि उन्हें पता ही नहीं था कि हमारे नृत्य रूपों में इतनी गहराई और सौंदर्य है. मेरा मानना है कि एक बार युवाओं में नृत्य को जानने की उत्सुकता और इच्छा पैदा होने के बाद उन्हें हम कोई भी रूपाकार दे सकते हैं. आने वाली पीढ़ियों को तैयार करने के लिए लगन के साथ सतत प्रयास करते रहने की जरूरत है.
शास्त्रीय नृत्य के किसी भी कलाकार के सामने आज किस किस्म की चुनौतियां हैं?
पहली तो यही तय करना है कि किस किस्म का विषय दर्शकों को रुचिकर होगा और उसमें उनकी कल्पनाशक्ति को कैसे सक्रिय और उत्तेजित किया जा सकता है. एकल प्रस्तुति डेढ़-दो घंटे चलती है इसलिए दर्शकों को बांध कर रखना भी एक बड़ी चुनौती है. प्राचीन नृत्य शैलियों की भाषा और मुहावरे में नए विषयों की अभिव्यक्ति कैसे की जाए और दर्शकों को किस तरह नृत्य का गुणी पारखी और भविष्य का आयोजक कैसे बनाया जाये, ये चुनौतियां भी हैं.
इंटरव्यू: कुलदीप कुमार
संपादन: महेश झा

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

झाँसी की रानी / सुभद्रा कुमारी चौहान






सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी |

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

कानपुर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी |

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़ ||

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई |

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया |

अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया ||

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात |

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार' |

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान |

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता कि चिंगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम ||

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में |

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार ||

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुह की खाई थी,
काना और मन्दरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी ||

पर पीछे ह्यूरोज आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार ||

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी ||

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

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जालियाँवाला बाग में वसंत

यहां कोकिला नहीं, काक हैं शोर मचाते |
काले-काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते ||
कलियाँ भी अधखिलीं, मिली है कंटक-कुल से |
वे पौधे, वे पूष्प, शुष्क हैं अथवा झुलसे ||

परिमल-हीन पराग दाग-सा बना पड़ा है |
हा ! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है ||
आओ प्रिय ऋतुराज ! किंतु धीरे से आना |
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना ||

वायु चले पर मंद चाल से उसे चलाना |
दुख की आहैं संग उड़ाकर मत ले जाना ||
कोकिल गावे, किंतु राग रोने का गावे |
भ्रमर करे गुंजार, कष्ट की कथा सुनावे ||

लाना संग में पुष्प, न हो वे अधिक सजीले |
हो सुगंघ भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले ||
किंतु न तुम उपहार भाव आकर दरसाना |
स्मृति की पूजा-हेतु यहाँ थोड़े बिखराना ||

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर |
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी लाकर ||
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं |
अपने प्रिय परिवार, देश से भिन्न हुए हैं ||

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना |
करके उनकी याद अक्ष्रु की ओस बहाना ||
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खाकर |
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जाकर ||

यह सब करना किंतु, बहुत धीरे से आना |
यह है शोक-स्थान, यहाँ मत शोर मचाना ||

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सुभद्राकुमारी चौहान की कविता
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1)      जालियाँवाला बाग में वसंत              
2)      झाँसी की रानी                 
3)      झाँसी की रानी की समाधि पर           
4)      इसका रोना         
5)      मेरा नया बचपन       

           
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झाँसी की रानी की समाधि पर

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी |
सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी |
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी |

बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से |
मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ||
रामी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी |
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ||

इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते |
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ||
पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी |
स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ||

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी |
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ||
यह समाधि यह चिर समाधि है , झाँसी की रानी की |
अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

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इसका रोना

तुम कहते हो - मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है |
मैं कहती हूँ - इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है ||
सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे |
बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे || 1 ||

ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो |
यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो ||
कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है |
छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभाड़ कर लाया है || 2 ||

हँसी बाहरी, चहल-पहल को ही बहुधा दरसाती है |
पर रोने में अंतर तम तक की हसचल मच जाती है ||
जिससे सोई हुई आत्मा जागती है, अकुलाती है |
छुटे हुए किसी साथी को अपने पास बुलाती है || 3 ||

मैं सुनती हूँ कोई मेरा मुझको अहा ! बुलाता है |
जिसकी करुणापूर्ण चीख से मेरा केवल नाता है ||
मेरे उपर वह निर्भर है खाने, पीने, सोने में |
जीवन की प्रत्येक क्रिया में, हँसने में ज्यों रोने में || 4 ||

मैं हूँ उसकी प्रकृति संगिनी उसकी जन्म-प्रदाता हूँ |
वह मेरी प्यारी बिटिया है मैं ही उसकी प्यारी माता हूँ ||
तुमको सुन कर चिढ़ आती है मुझ को होता है अभिमान |
जैसे भक्तों की पुकार सुन गर्वित होते हैं भगवान || 5 ||

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            मेरा नया बचपन

बार-बार आती है मुझको, मधुर याद बचपन तेरी |
गया ले गया तु जीवन की, सबसे मस्त खुशी मेरी |
चिंतारहित खेलना-खाना, वह फिरना निर्भय स्वच्छंद |
कैसे भूला जा सकता है, बचपन का अतुलित आनंद |
            ऊँच नीच का ज्ञान नहीं था, छुआछूत किसने जानी |
            बनी हुई थी आह, झोपड़ी और चीथड़ों में रानी |

किए दूध के कुल्ले मैंने, चुस अँगुठा सुधा पिया |
किलकारी कल्लोल मचाकर, सूना घर आबाद किया |
रोना और मचल जाना भी, क्या आनंद दिखाते थे |
बड़े-बड़े मोती से आँसू, जय माला पहनाते थे |
            मैं रोई मा काम छोड़ कर, आई, मुझको उठा लिया |
            झाड़-पोछ कर चुम-चुम, गीले गालों को सुखा दिया |

आ जा बचपन ! एक बार फिर, दे-दे अपनि निर्मल शान्ति |
व्याकुल व्याथा मिटाने वाली, वह अपनी प्राकृत विश्रांति |
वह भोली-सी मधुर सरलता, वह प्यारा जीवन निष्पाप |
क्या फिर आकर मिटा सकेगा, तू मेरे मन का संताप ?
            मैं बचपन का बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी |
            नंदन वन-सी फूल उठी यह, छोटि सी कुटिया मेरी |

"माँ ओ" कह कर बुला रही थी, मिट्टी खा कर आई थी |
कुछ मुँह में कुछ हात में, मुझे खिलाने आई थी |
पुलक रहे थे अंग, दृंगों में, कौतूहल था छलक रहा |
मुँह पर थी आह्लाद लालिमा, बिजय गर्व था झलक रहा |
             मैंने पूछा यह "क्या लाई ?" बोल उठी वह "माँ काओ" |
             हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से, मैं ने कहा - "तुम्ही खाओ |"

पाया मैंने बचपन फिर से, बचपन बेटी बन आया |
उसकी मंजुल मूर्ति देख कर, मुझमें नवजीवन आया |
मैं भी उसके साथ खेलती, खाती हूँ तुतलाती हूँ |
मिलकर उसके साथ स्वयं, मैं भी बच्ची बन जाती हूँ |
             जिसे खोजती थी बरसों से, अब जा कर उसको पाया |
             भाग गया था मुझे छोड़ कर, वह बचपन फिर से आया |

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मिलनसागर

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...