मंगलवार, 22 जुलाई 2014

संतकवि कबीर


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कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। ये सिकन्दर लोदी के समकालीन थे। कबीर का अर्थ अरबी भाषा में महान होता है। कबीरदास भारत के भक्ति काव्य परंपरा के महानतम कवियों में से एक थे। भारत में धर्म, भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा बिना कबीर की चर्चा के अधूरी ही रहेगी। कबीरपंथी, एक धार्मिक समुदाय जो कबीर के सिद्धांतों और शिक्षाओं को अपने जीवन शैली का आधार मानते हैं,

जीवन

काशी के इस अक्खड़, निडर एवं संत कवि का जन्म लहरतारा के पास सन् १३९८ में ज्येष्ठ पूर्णिमा को हुआ। जुलाहा परिवार में पालन पोषण हुआ, संत रामानंद के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। कबीर ने हिंदू-मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया। कबीर की वाणी उनके मुखर उपदेश उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी में देखें जा सकते हैं। गुरु ग्रंथ साहब में उनके २०० पद और २५० साखियां हैं। काशी में प्रचलित मान्यता है कि जो यहॉ मरता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। रूढ़ि के विरोधी कबीर को यह कैसे मान्य होता। काशी छोड़ मगहर चले गये और सन् १५१८ के आस पास वहीं देह त्याग किया। मगहर में कबीर की समाधि है जिसे हिन्दू मुसलमान दोनों पूजते हैं।

मतभेद भरा जीवन

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हिंदी साहित्य में कबीर का व्यक्तित्व अनुपम है। गोस्वामी तुलसीदास को छोड़ कर इतना महिमामण्डित व्यक्तित्व कबीर के सिवा अन्य किसी का नहीं है। कबीर की उत्पत्ति के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे जगद्गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उसी ने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। कतिपय कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुई। एक प्राचीन ग्रंथ के अनुसार किसी योगी के औरस तथा प्रतीति नामक देवाङ्गना के गर्भ से भक्तराज प्रहलाद ही संवत् १४५५ ज्येष्ठ शुक्ल १५ को कबीर के रूप में प्रकट हुए थे।
कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से उन्हें हिंदू धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पञ्चगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी गंगास्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल 'राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया।
कबीर के ही शब्दों में- 'हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये'।
अन्य जनश्रुतियों से ज्ञात होता है कि कबीर ने हिंदू-मुसलमान का भेद मिटा कर हिंदू-भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयंगम कर लिया।
जनश्रुति के अनुसार उन्हें एक पुत्र कमाल तथा पुत्री कमाली थी। इतने लोगों की परवरिश करने के लिये उन्हें अपने करघे पर काफी काम करना पड़ता था। ११९ वर्ष की अवस्था में उन्होंने मगहर में देह त्याग किया।

धर्म के प्रति

साधु संतों का तो घर में जमावड़ा रहता ही था। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- 'मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।'उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मसजिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे।
कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। एच.एच. विल्सन के अनुसार कबीर के नाम पर आठ ग्रंथ हैं। विशप जी.एच. वेस्टकॉट ने कबीर के ८४ ग्रंथों की सूची प्रस्तुत की तो रामदास गौड़ ने 'हिंदुत्व' में ७१ पुस्तकें गिनायी हैं।

वाणी संग्रह

कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और साखी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है।कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रूप में देखते हैं।यही तो मनुष्य के सर्वाधिक निकट रहते हैं।
वे कभी कहते हैं-
'हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया' तो कभी कहते हैं, 'हरि जननी मैं बालक तोरा'।
और कभी "बडा हुआ तो क्या हुआ जैसै"
उस समय हिंदू जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है।
वृद्धावस्था में यश और कीर्त्ति की मार ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने बनारस छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं इसी क्रम में वे कालिंजर जिले के पिथौराबाद शहर में पहुँचे। वहाँ रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहाँ के संत भगवान् गोस्वामी के जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी ने उन के मन पर गहरा असर किया-
'बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान। करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।'
वन से भाग कर बहेलिये के द्वारा खोये हुए गड्ढे में गिरा हुआ हाथी अपनी व्यथा किस से कहे ?
सारांश यह कि धर्म की जिज्ञासा सें प्रेरित हो कर भगवान गोसाई अपना घर छोड़ कर बाहर तो निकल आये और हरिव्यासी सम्प्रदाय के गड्ढे में गिर कर अकेले निर्वासित हो कर असंवाद्य स्थिति में पड़ चुके हैं।
मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने एक साखी हाजिर कर दी-
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार। वा ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार।।

कबीर के राम

कबीर के राम तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। कबीर के राम इस्लाम के एकेश्वरवादी, एकसत्तावादी खुदा भी नहीं हैं। इस्लाम में खुदा या अल्लाह को समस्त जगत एवं जीवों से भिन्न एवं परम समर्थ माना जाता है। पर कबीर के राम परम समर्थ भले हों, लेकिन समस्त जीवों और जगत से भिन्न तो कदापि नहीं हैं। बल्कि इसके विपरीत वे तो सबमें व्याप्त रहने वाले रमता राम हैं। वह कहते हैं
व्यापक ब्रह्म सबनिमैं एकै, को पंडित को जोगी। रावण-राव कवनसूं कवन वेद को रोगी।
कबीर राम की किसी खास रूपाकृति की कल्पना नहीं करते, क्योंकि रूपाकृति की कल्पना करते ही राम किसी खास ढाँचे (फ्रेम) में बँध जाते, जो कबीर को किसी भी हालत में मंजूर नहीं। कबीर राम की अवधारणा को एक भिन्न और व्यापक स्वरूप देना चाहते थे। इसके कुछ विशेष कारण थे, जिनकी चर्चा हम इस लेख में आगे करेंगे। किन्तु इसके बावजूद कबीर राम के साथ एक व्यक्तिगत पारिवारिक किस्म का संबंध जरूर स्थापित करते हैं। राम के साथ उनका प्रेम उनकी अलौकिक और महिमाशाली सत्ता को एक क्षण भी भुलाए बगैर सहज प्रेमपरक मानवीय संबंधों के धरातल पर प्रतिष्ठित है।
कबीर नाम में विश्वास रखते हैं, रूप में नहीं। हालाँकि भक्ति-संवेदना के सिद्धांतों में यह बात सामान्य रूप से प्रतिष्ठित है कि ‘नाम रूप से बढ़कर है’, लेकिन कबीर ने इस सामान्य सिद्धांत का क्रांतिधर्मी उपयोग किया। कबीर ने राम-नाम के साथ लोकमानस में शताब्दियों से रचे-बसे संश्लिष्ट भावों को उदात्त एवं व्यापक स्वरूप देकर उसे पुराण-प्रतिपादित ब्राह्मणवादी विचारधारा के खाँचे में बाँधे जाने से रोकने की कोशिश की।
कबीर के राम निर्गुण-सगुण के भेद से परे हैं। दरअसल उन्होंने अपने राम को शास्त्र-प्रतिपादित अवतारी, सगुण, वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षक राम से अलग करने के लिए ही ‘निर्गुण राम’ शब्द का प्रयोग किया–‘निर्गुण राम जपहु रे भाई।’ इस ‘निर्गुण’ शब्द को लेकर भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं। कबीर का आशय इस शब्द से सिर्फ इतना है कि ईश्वर को किसी नाम, रूप, गुण, काल आदि की सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता। जो सारी सीमाओं से परे हैं और फिर भी सर्वत्र हैं, वही कबीर के निर्गुण राम हैं। इसे उन्होंने ‘रमता राम’ नाम दिया है। अपने राम को निर्गुण विशेषण देने के बावजूद कबीर उनके साथ मानवीय प्रेम संबंधों की तरह के रिश्ते की बात करते हैं। कभी वह राम को माधुर्य भाव से अपना प्रेमी या पति मान लेते हैं तो कभी दास्य भाव से स्वामी। कभी-कभी वह राम को वात्सल्य मूर्ति के रूप में माँ मान लेते हैं और खुद को उनका पुत्र। निर्गुण-निराकार ब्रह्म के साथ भी इस तरह का सरस, सहज, मानवीय प्रेम कबीर की भक्ति की विलक्षणता है। यह दुविधा और समस्या दूसरों को भले हो सकती है कि जिस राम के साथ कबीर इतने अनन्य, मानवीय संबंधपरक प्रेम करते हों, वह भला निर्गुण कैसे हो सकते हैं, पर खुद कबीर के लिए यह समस्या नहीं है।
वह कहते भी हैं
“संतौ, धोखा कासूं कहिये। गुनमैं निरगुन, निरगुनमैं गुन, बाट छांड़ि क्यूं बहिसे!” नहीं है।
प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने कबीर के राम एवं कबीर की साधना के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है : " कबीर का सारा जीवन सत्‍य की खोज तथा असत्‍य के खंडन में व्‍यतीत हुआ। कबीर की साधना ‘‘मानने से नहीं, ‘‘जानने से आरम्‍भ होती है। वे किसी के शिष्‍य नहीं, रामानन्‍द द्वारा चेताये हुए चेला हैं।उनके लिए राम रूप नहीं है, दशरथी राम नहीं है, उनके राम तो नाम साधना के प्रतीक हैं। उनके राम किसी सम्‍प्रदाय, जाति या देश की सीमाओं में कैद नहीं है। प्रकृति के कण-कण में, अंग-अंग में रमण करने पर भी जिसे अनंग स्‍पर्श नहीं कर सकता, वे अलख, अविनाशी, परम तत्‍व ही राम हैं। उनके राम मनुष्‍य और मनुष्‍य के बीच किसी भेद-भाव के कारक नहीं हैं। वे तो प्रेम तत्‍व के प्रतीक हैं। भाव से ऊपर उठकर महाभाव या प्रेम के आराध्‍य हैं ः-
‘प्रेम जगावै विरह को, विरह जगावै पीउ, पीउ जगावै जीव को, जोइ पीउ सोई जीउ' - जो पीउ है, वही जीव है। इसी कारण उनकी पूरी साधना ‘‘हंस उबारन आए की साधना है। इस हंस का उबारना पोथियों के पढ़ने से नहीं हो सकता, ढाई आखर प्रेम के आचरण से ही हो सकता है। धर्म ओढ़ने की चीज नहीं है, जीवन में आचरण करने की सतत सत्‍य साधना है। उनकी साधना प्रेम से आरम्‍भ होती है। इतना गहरा प्रेम करो कि वही तुम्‍हारे लिए परमात्‍मा हो जाए। उसको पाने की इतनी उत्‍कण्‍ठा हो जाए कि सबसे वैराग्‍य हो जाए, विरह भाव हो जाए तभी उस ध्‍यान समाधि में पीउ जाग्रत हो सकता है। वही पीउ तुम्‍हारे अर्न्‍तमन में बैठे जीव को जगा सकता है। जोई पीउ है सोई जीउ है। तब तुम पूरे संसार से प्रेम करोगे, तब संसार का प्रत्‍येक जीव तुम्‍हारे प्रेम का पात्र बन जाएगा। सारा अहंकार, सारा द्वेष दूर हो जाएगा। फिर महाभाव जगेगा। इसी महाभाव से पूरा संसार पिउ का घर हो जाता है।
सूरज चन्‍द्र का एक ही उजियारा, सब यहि पसरा ब्रह्म पसारा।
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जल में कुम्‍भ, कुम्‍भ में जल है, बाहर भीतर पानी
फूटा कुम्‍भ जल जलहीं समाना, यह तथ कथौ गियानी।"

यह भी देखें

भक्ति काल
भक्त कवियों की सूची
हिंदी साहित्य

बाहरी कड़ियां

सोमवार, 21 जुलाई 2014

जैनेन्द्र कुमार





मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
आनंदी लाल
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जैनेंद्र कुमार
उपनाम: जैनेन्द्र कुमार
जन्म: 2 जनवरी 1905
कौड़ियालगंज अलीगढ़ भारत
मृत्यु: 24 दिसंबर 1988
नई दिल्ली
कार्यक्षेत्र: व्यापार, पत्रकारिता, लेखन
राष्ट्रीयता: भारतीय
भाषा: हिन्दी
काल: आधुनिक काल
विधा: गद्य
विषय: कहानी, उपन्यास, निबंध, संपादन व अनुवाद
साहित्यिक
आन्दोलन
:
प्रगतिवादी
इनसे प्रभावित: साठोत्तर हिंदी उपन्यास
लेखन
प्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में जैनेंद्रकुमार (२ जनवरी, १९०५- २४ दिसंबर, १९८८) का विशिष्ट स्थान है। वह हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक के रूप में मान्य हैं। जैनेंद्र अपने पात्रों की सामान्यगति में सूक्ष्म संकेतों की निहिति की खोज करके उन्हें बड़े कौशल से प्रस्तुत करते हैं। उनके पात्रों की चारित्रिक विशेषताएँ इसी कारण से संयुक्त होकर उभरती हैं। जैनेंद्र के उपन्यासों में घटनाओं की संघटनात्मकता पर बहुत कम बल दिया गया मिलता है। चरित्रों की प्रतिक्रियात्मक संभावनाओं के निर्देशक सूत्र ही मनोविज्ञान और दर्शन का आश्रय लेकर विकास को प्राप्त होते हैं।[1]

जीवन परिचय

जैनेंद्र कुमार का जन्म २ जनवरी, सन १९०५, में अलीगढ़ के कौड़ियागंज गांव में हुआ।[2] उनके बचपन का नाम आनंदीलाल[3] था। इनकी मुख्य देन उपन्यास तथा कहानी है। एक साहित्य विचारक के रूप में भी इनका स्थान मान्य है। इनके जन्म के दो वर्ष पश्चात इनके पिता की मृत्यु हो गई। इनकी माता एवं मामा ने ही इनका पालन-पोषण किया। इनके मामा ने हस्तिनापुर में एक गुरुकुल की स्थापना की थी। वहीं जैनेंद्र की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा हुई। उनका नामकरण भी इसी संस्था में हुआ। उनका घर का नाम आनंदी लाल था। सन १९१२ में उन्होंने गुरुकुल छोड़ दिया। प्राइवेट रूप से मैट्रिक परीक्षा में बैठने की तैयारी के लिए वह बिजनौर आ गए। १९१९ में उन्होंने यह परीक्षा बिजनौर से न देकर पंजाब से उत्तीर्ण की। जैनेंद्र की उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हुई। १९२१ में उन्होंने विश्वविद्यालय की पढ़ाई छोड़ दी और कांग्रेस के असहयोग आंदोलन में भाग लेने के उद्देश्य से दिल्ली आ गए। कुछ समय के लिए ये लाला लाजपत राय के 'तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स' में भी रहे, परंतु अंत में उसे भी छोड़ दिया।
सन १९२१ से २३ के बीच जैनेंद्र ने अपनी माता की सहायता से व्यापार किया, जिसमें इन्हें सफलता भी मिली। परंतु सन २३ में वे नागपुर चले गए और वहाँ राजनीतिक पत्रों में संवाददाता के रूप में कार्य करने लगे। उसी वर्ष इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और तीन माह के बाद छूट गए। दिल्ली लौटने पर इन्होंने व्यापार से अपने को अलग कर लिया। जीविका की खोज में ये कलकत्ते भी गए, परंतु वहाँ से भी इन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। इसके बाद इन्होंने लेखन कार्य आरंभ किया। २४ दिसंबर १९८८ को उनका निधन हो गया। [4]

प्रकाशित कृतियाँ

उपन्यासः 'परख' (१९२९), 'सुनीता' (१९३५), 'त्यागपत्र' (१९३७), 'कल्याणी' (१९३९), 'विवर्त' (१९५३), 'सुखदा' (१९५३), 'व्यतीत' (१९५३) तथा 'जयवर्धन' (१९५६)।
कहानी संग्रहः 'फाँसी' (१९२९), 'वातायन' (१९३०), 'नीलम देश की राजकन्या' (१९३३), 'एक रात' (१९३४), 'दो चिड़ियाँ' (१९३५), 'पाजेब' (१९४२), 'जयसंधि' (१९४९) तथा 'जैनेंद्र की कहानियाँ' (सात भाग)।
निबंध संग्रहः 'प्रस्तुत प्रश्न' (१९३६), 'जड़ की बात' (१९४५), 'पूर्वोदय' (१९५१), 'साहित्य का श्रेय और प्रेय' (१९५३), 'मंथन' (१९५३), 'सोच विचार' (१९५३), 'काम, प्रेम और परिवार' (१९५३), तथा 'ये और वे' (१९५४)।
अनूदित ग्रंथः 'मंदालिनी' (नाटक-१९३५), 'प्रेम में भगवान' (कहानी संग्रह-१९३७), तथा 'पाप और प्रकाश' (नाटक-१९५३)।
सह लेखनः 'तपोभूमि' (उपन्यास, ऋषभचरण जैन के साथ-१९३२)।
संपादित ग्रंथः 'साहित्य चयन' (निबंध संग्रह-१९५१) तथा 'विचारवल्लरी' (निबंध संग्रह-१९५२)। (सहायक ग्रंथ- जैनेंद्र- साहित्य और समीक्षाः रामरतन भटनागर।)

समालोचन

जैनेन्द्र अपने पथ के अनूठे अन्वेषक थे। उन्होंने प्रेमचन्द के सामाजिक यथार्थ के मार्ग को नहीं अपनाया, जो अपने समय का राजमार्ग था। लेकिन वे प्रेमचन्द के विलोम नहीं थे, जैसा कि बहुत से समीक्षक सिद्ध करते रहे हैं; वे प्रेमचन्द के पूरक थे। प्रेमचन्द और जैनेन्द्र को साथ-साथ रखकर ही जीवन और इतिहास को उसकी समग्रता के साथ समझा जा सकता है। जैनेन्द्र का सबसे बड़ा योगदान हिन्दी गद्य के निर्माण में था। भाषा के स्तर पर जैनेन्द्र द्वारा की गई तोड़-फोड़ ने हिन्दी को तराशने का अभूतपूर्व काम किया। जैनेन्द्र का गद्य न होता तो अज्ञेय का गद्य संभव न होता। हिन्दी कहानी ने प्रयोगशीलता का पहला पाठ जैनेन्द्र से ही सीखा। जैनेन्द्र ने हिन्दी को एक पारदर्शी भाषा और भंगिमा दी, एक नया तेवर दिया, एक नया `सिंटेक्स' दिया। आज के हिन्दी गद्य पर जैनेन्द्र की अमिट छाप है।--रवींद्र कालिया[5] जैनेंद्र के प्रायः सभी उपन्यासों में दार्शनिक और आध्यात्मिक तत्वों के समावेश से दूरूहता आई है परंतु ये सारे तत्व जहाँ-जहाँ भी उपन्यासों में समाविष्ट हुए हैं, वहाँ वे पात्रों के अंतर का सृजन प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि जैनेंद्र के पात्र बाह्य वातावरण और परिस्थितियों से अप्रभावित लगते हैं और अपनी अंतर्मुखी गतियों से संचालित। उनकी प्रतिक्रियाएँ और व्यवहार भी प्रायः इन्हीं गतियों के अनुरूप होते हैं। इसी का एक परिणाम यह भी हुआ है कि जैनेंद्र के उपन्यासों में चरित्रों की भरमार नहीं दिखाई देती। पात्रों की अल्पसंख्या के कारण भी जैनेंद्र के उपन्यासों में वैयक्तिक तत्वों की प्रधानता रही है।
क्रांतिकारिता तथा आतंकवादिता के तत्व भी जैनेंद्र के उपन्यासों के महत्वपूर्ण आधार है। उनके सभी उपन्यासों में प्रमुख पुरुष पात्र सशक्त क्रांति में आस्था रखते हैं। बाह्य स्वभाव, रुचि और व्यवहार में एक प्रकार की कोमलता और भीरुता की भावना लिए होकर भी ये अपने अंतर में महान विध्वंसक होते हैं। उनका यह विध्वंसकारी व्यक्तित्व नारी की प्रेमविषयक अस्वीकृतियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप निर्मित होता है। इसी कारण जब वे किसी नारी का थोड़ा भी आश्रय, सहानुभूति या प्रेम पाते हैं, तब टूटकर गिर पड़ते हैं और तभी उनका बाह्य स्वभाव कोमल बन जाता है। जैनेंद्र के नारी पात्र प्रायः उपन्यास में प्रधानता लिए हुए होते हैं। उपन्यासकार ने अपने नारी पात्रों के चरित्र-चित्रण में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है। स्त्री के विविध रूपों, उसकी क्षमताओं और प्रतिक्रियाओं का विश्वसनीय अंकन जैनेंद्र कर सके हैं। 'सुनीता', 'त्यागपत्र' तथा 'सुखदा' आदि उपन्यासों में ऐसे अनेक अवसर आए हैं, जब उनके नारी चरित्र भीषण मानसिक संघर्ष की स्थिति से गुज़रे हैं। नारी और पुरुष की अपूर्णता तथा अंतर्निर्भरता की भावना इस संघर्ष का मूल आधार है। वह अपने प्रति पुरुष के आकर्षण को समझती है, समर्पण के लिए प्रस्तुत रहती है और पूरक भावना की इस क्षमता से आल्हादित होती है, परंतु कभी-कभी जब वह पुरुष में इस आकर्षण मोह का अभाव देखती है, तब क्षुब्ध होती है, व्यथित होती है। इसी प्रकार से जब पुरुष से कठोरता की अपेक्षा के समय विनम्रता पाती है, तब यह भी उसे असह्य हो जाता है।

संदर्भ

  1. वर्मा, धीरेन्द्र (१९८५). हिन्दी साहित्य कोश भाग-२. वाराणसी, भारत: ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी, उ.प्र.. प॰ २१९-२२०-२२१.
  2. "पद्मभूषण जैनेंद्र कुमार" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). जैनसमाज.ऑर्ग. अभिगमन तिथि: २००७.
  3. "जैनेन्द्र: अप्रतिम कथा शिल्पी" (पीएचपी). याहू जागरण. अभिगमन तिथि: २००९.
  4. ११०१०३.htm "पद्मभूषण जैनेंद्र कुमार" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). जैनसमाज.ऑर्ग. अभिगमन तिथि: २००७.
  5. "स्वगत (संपादकीय)" (एचटीएम). वागर्थ. अभिगमन तिथि: २००७.

बाहरी कड़ियाँ

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

आजादी के बाद का भारत




प्रस्तुति--- स्वामी शरण ,

 

स्वतन्त्रता के बाद भारत का संक्षिप्त इतिहास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

१९४७ से १९५०

  • देश आजाद: १४ अगस्त १९४७ को जैसे ही घड़ी की सुई मे रात के १२ बजे, प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू ने देश के स्वतंत्र होने की घोषणा की।
  • शोक की लहर: ३० जनवरी १९४८ को उस समय सारे देश में शोक की लहर दौड़ गई, जब नाथूराम गोड्से ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी।
  • भारत-पाकिस्तान के बीच प्रथम युद्ध: देश विभाजन के बाद नए पड़ोसी बने पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। यह लड़ाई ३१ दिसम्बर, १९४८ को समाप्त हुई और इसमें दोनों देशों के लगभग १५००-१५०० सैनिक मारे गए तथा पाकिस्तान ने कश्मीर के एक भूभाग पर अधिकार कर लिया।
  • भारत बना गणतंत्र: संविधान सभा द्वारा १९४९ में पारित किए जाने के बाद २६ जनवरी, १९५० को पहली बार देश का संविधान स्वीकार किया गया।
  • जेल की बैरक में आईआईटी की स्थापना: सन् १९५० में पश्चिम बंगाल के खड़गपुर के निकट हुबली जेल के परिव्यक्त बैरक में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के रूप में देश के पहले तकनीकी उच्च शिक्षा संस्थान की नींव डाली गई।

१९५० से १९७०

१९७० से १९८०


भारत के प्रथम परमाणु परीक्षण के बाद पोखरण का एक दृश्य।

१९८० से १९९०


भोपाल गैस कांड स्मारक।
  • सड़क पर उतरी मारुति: १९८४ में ८०० सीसी की मारुति कार लांच हुई, जिसने देश में वाहन क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया।
  • शाह बानो मामला: इस विवादास्पद मामले में उच्चतम न्यायालय ने मुस्लिम बोर्ड के निर्णय को पलटते हुए शाह बानो को गुजारा भत्ता देने को कहा लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिम कार्यकर्ताओं के दबाव के आगे राजीव गांधी सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय को प्रभावहीन बनाया।
  • कनिष्क बमकांड: २३ जून, १९८५ को बब्बर खालसा के आतंकवादियों ने आयरलैंड से टोरंटो आ रहे एयर इंडिया के विमान को बम से उड़ा दिया, जिसमें सवार सभी ३२९ यात्री मारे गए।
  • असम समझौता: १९८५ में राजीव गांधी सरकार और असम के चरमपंथी गुटों में ऐतिहासिक समझौते से यह आस बंधी थी कि इस राज्य में शांति हो जाएगी, लेकिन ऐसा पूरी तरह संभव नहीं हो सका।
  • भारत-श्रीलंका शांति समझौता: भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जेआर ने १९८७ में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता एक भूल साबित हुआ और इसके चलते श्रीलंका में हिंसक आंदोलन जोर पकड़ने लगा।
  • मताधिकार की आयु सीमा घटी: १९८८ में राजीव गांधी सरकार ने मतदान के लिए न्यूनतम आयु सीमा २१ वर्ष से घटाकर १८ वर्ष कर दी।
  • पृथ्वी प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण: भारत ने पूर्णतया स्वदेशी तकनीक पर आधारित बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र का १९८८ में सफल परीक्षण किया।
  • आरक्षण का पेंच: अगस्त १९९० में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए २७ प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान लागू कर दिया।

१९९० से २०००

२००० से २०१०

  • भारतीय संसद भवन पर हमला: १३ दिसंबर, २००१ को आतंकवादियों ने संसद भवन पर हमला किया, लेकिन देश के बहादुर सिपाहियों ने अपनी प्राणों की आहुति देकर भी आतंकवादियों के इरादों को विफल कर दिया।
  • तहलका कांड: तहलका डॉटकॉम ने स्टिंग ऑपरेशन के द्वारा रक्षा सौदों के लिए सांसदों और सैन्य अधिकारियों को घूस लेते हुए उजागर किया।
  • गोधरा जनसंहार: गुजरात के गोधरा में २७ फरवरी, २००२ को हिंदू तीर्थयात्रियों से भरी एक ट्रेन की बोगी को कुछ असामाजिक तत्वों ने जला डाला और जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप अगले ही दिन पूरे राज्य में दंगे भड़क उठे।
  • कल्पना चावला का दुखद अंत: अंतरिक्ष पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा साबित हुई। ३ फरवरी, २००३ के दिन पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते समय कोलंबिया शटल यान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कल्पना सहित इसमें सवार सातों अंतरिक्ष यात्री मारे गए।
  • सहवाग बनें `मुल्तान का सुल्तान´: २००४ में पाकिस्तान के विरुद्ध मुल्तान टेस्ट में सहवाग शानदार तिहरा शतक जमाने वाले पहले क्रिकेटर बने।
  • भारत-अमेरिका परमाणु समझौता: २००५ में भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ऐतिहासिक असैन्य परमाणु सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए।
  • सूचना का अधिकार: २००५ के सूचना के अधिकार कानून ने सरकारी बाबुओं को जवाबदेह बनाया।
  • ११/७, मुंबई की उपनगरीय रेलों में श्रृंखलाबद्ध बम विस्फ़ोट: ११ जुलाई, २००६ को एक बार फिर मुंबई आतंकवादियो के निशाने पर आ गई। शाम के समय अपने घरों को लौट रहे लोकल ट्रेन के खचाखच भरे डिब्बों में २० मिनट के अंतराल पर हुए सात बम धमाको में २५० लोग मारे गए।
  • टाटा ने कोरस को खरीदा: २००७ में किसी भारतीय कंपनी द्वारा अब तक के सबसे बड़े अधिग्रहण के रूप में टाटा स्टील ने एंग्लो-डच कंपनी कोरस को खरीद लिया।
  • पहली महिला राष्ट्रपति: महाराष्ट्र की पहली महिला राज्यपाल बनने वाली प्रतिभा पाटील ने २५ जुलाई २००७ को देश की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की।
  • मुंबई २६/११: एक बार फिर राष्ट्र की वित्तीय राजधानी पर आतंकवादियों का हमला। बुधवार, २६ नवंबर, २००८ की रात लगभग १० पाकिस्तानी आतंकवादी आधुनिक हथियारों से युक्त होकर चर्चगेट स्टेशन, कामा अस्पताल, और ताज और ओबेरॉय-ट्रायडैन्ट में घुसे। ३ दिन तक चले कमांडो ऑपरेशन में २०० से अधिक लोग मारे गए, और १० में से नौ आतंकवादी भी। एक आतंकवादी, अजमल कसाब को जीवित पकड़ लिया गया।

२०१० से अब तक

  • भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे का आन्दोलन : अगस्त २०११ में

इन्हें भी देखें

बाहरी कड़ियाँ

दिक्चालन सूची

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...