सोमवार, 23 सितंबर 2013

रामधारी सिंह दिनकर की याद में




जब से पढ़ना सीखा है तब से इनकी कविता प्रिय रही, समझने लगा तो सबसे प्रिय हो गई। पढ़ते ही याद हो जाना इनकी कविताओं का सहज गुण है।
आज राष्ट्रकवि की जयंती है तो इनकी एक कविता आप सबको भी पढ़वानी बनती है।

जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है
भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है
वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है

उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है
तलवार प्रेम से और तेज होती है!

छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है
मरता है जो एक ही बार मरता है

तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे!

स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है

वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे!
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1 टिप्पणी:

  1. वाह! वाह .
    सार्थक, संदेशात्मक... बहुत खुबसूरत...
    ईद एवं गणेश चतुर्थी की सादर बधाई...

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