शुक्रवार, 29 मार्च 2024

प्रभा वर्मा और केरल साहित्य हिंदी और मीडिया में योगदान

 प्रस्तुति - केरल यूनिवर्सिटी

 (हिंदी विभाग)


कवि, साहित्यकार, गीतकार प्रभा वर्मा,  पारंपरिक मीडिया के साथ साथ इलेक्ट्रॉनिक  मीडिया में काम करने वाले मीडियाकर्मी तथा एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं । वे समकालीन मलयालम साहित्य के महत्वपूर्ण स्वारों में से एक हैं। उनकी कविताएं परंपरा एवं आधुनिकता का समुचित समागम प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक और विधि संबंधी उपाधि प्राप्त की है। मलयालम और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में समान रूप से अधिकार रखने वाले इस द्विभाषिक साहित्यकार ने इस वर्ष अपने सृजनात्मक लेखन के पचास वर्ष पूर्ण किए हैं। ऐतिहासिक पंपा नदी के तट पर बसे तिरुवल नामक कस्बे में उनका जन्म सन् १९५९ में हुआ था। उनकी कविताएं अपने कोमल रोमानी भावों, काव्य बिंबों के एक विशिष्ट संगुम्फन, मौलिक और रचनात्मक अख्यान की क्षमता, दार्शनिक अन्तर्दृष्टि और जीवन के व्यापक अर्थों की एक गहरी समझ के लिए सुविख्यात हैं । उनकी काव्य प्रज्ञा अनुभववाद और प्रयोगवाद का एक अद्भुत सामंजस्य प्रकट करती है। अपने सांस्कृतिक विरासत में व्याप्त सूक्ष्म यथार्थ को आत्मसात् करते हुए वह ऐसी आधुनिक संवेदना को जन्म देते हैं जो न केवल समकालीन पीढ़ी बल्कि आने वाले कल के लिए भी उतनी ही प्रेरणादायी है।


उनके साहित्यिक योगदान में तीस से अधिक पुस्तकें शामिल हैं, जिसके अंतर्गत लगभग दर्जन भर कविता संग्रह, तीन काव्यात्मक उपन्यास, समकालीन  सामाजिक राजनैतिक परिवेश और साहित्य पर आठ पुस्तकें, सात आलोचनात्मक निबंध संग्रह, मीडिया संबंधित एक विश्लेषणात्मक पुस्तक, एक अंग्रेजी उपन्यास,  एक संस्मरण और एक यात्रा वृतांत आते हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक मलयालम उपन्यास और प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतकार शादकला गोविंदा मरार के जीवन पर आधारित शादकलम नामक एक पटकथा भी लिखी है। 


उनकी प्रसिद्ध रचनायें, मुख्यतः काव्याखिकाओं में  ‘श्यामामाधवम’ (सांवले भगवान का विलाप), कनल चिलंब (अग्नि पायल) और रौद्र सातविकम आदि को गिना जा सकता है। ‘श्यामामाधवम’ पंद्रह अध्यायों वाली ऐसी पुस्तक है जो भगवान कृष्ण के पृथ्वी पर  अवतरित जीवन में आये पात्रों पर आधारित पुनर्रचना है। कनल चिलंब सात अध्यायों में प्रेम, वासना, शक्ति, कौतूहल, प्रतिशोध और व्यभिचार की कथा है। 


उनका पुरस्कृत छंदबध उपन्यास रौद्र सातविकम राजनीति और सत्ता, व्यक्ति और राज्य, कला और शक्ति के संबंधों में व्याप्त अंतर्विरोधों की एक विशिष्ट शैली में विश्लेषण करता है । यह किताब काल और गति की अवधारणा से परे धर्म और धर्मिकताओं को पुनर्व्याख्यायिक करता है।प्रत्येक व्यक्ति धर्म की अवधारणा से अवगत है  लेकिन वह इसका अभ्यास करने में विफल रहता है। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि अधर्म क्या है...फिर भी वह इससे विरक्त नहीं रहता। 


इस पुस्तक में धर्म संबंधी इस विरोधभास की दार्शनिक, रचनात्मक व्याख्या के साथ इस विषय में अन्य दूरदर्शी आयामों को अभिव्यक्त किया गया है। संक्षेप में रौद्र सातविकम अपने महाकाव्यात्मक स्वरूप में एक आधुनिक महाकाव्य है। रौद्र और सात्विकम  जैसे  विरोधी पर्याय वाले  दो संस्कृत शब्दों से गढ़े गये  इस शीर्षक का सामान्य अनुवाद सतोगुणी क्रोध के तौर पर किया जा सकता है।

हर व्यक्ति जीवन की उतार चढ़ाव वाली परिस्थितियों के मध्य जूझते हुए जिन दो विरोधाभासी भावों का किसी न किसी समय अनुभव करता है, उनके रचनात्मक समेकन द्वारा गठित इस नए शब्द से लेखक की काव्य प्रज्ञा लक्षित की जा सकती है। प्रभा वर्मा कहते हैं कि “बरसे बिना बादल, खिले बिना कली और रोदन बिना वेदनामय हृदय के पास अन्य कोई विकल्प नहीं बचता है, कविता भी इसी तरह जन्म लेती है।”

प्रभा वर्मा को सत्तर से अधिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय साहित्य अकादमी सम्मान, रजत कमल राष्ट्रीय फिल्म सम्मान, केरल साहित्य अकादमी सम्मान, केरल संगीत नाटक अकादमी सम्मान, केरल राजकीय फिल्म सम्मान, वायलार सम्मान, पद्मप्रभा पुरुष्कार इत्यादि सम्मिलित हैं। उन्होंने मोहिनीअट्टम और भरतनाट्यम के लिए दर्जनों कार्नाटिक संगीत कृतियों, भजनों, और पद्मों को शब्दबध कर शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अपना महान योगदान दिया है। 

वर्तमान में वह केरल के मुख्यमंत्री के मीडिया सचिव के रूप में कार्यरत हैं।

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