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गुलज़ार ने हाल ही में दूरदर्शन के लिए प्रेमचंद की बीसियों कहानियों को एक श्रंखला के तौर पर फ़िल्माया है. उन कहानियों के संवाद और स्क्रिप्ट लिखने के साथ साथ उन्होंने इन का निर्देशन भी किया है.
प्रेमचंद की 125वीं जयंती वर्ष के मौक़े पर आयोजित एक समारोह के दौरान मिर्ज़ा एबी बेग ने गुलज़ार से मुलाक़ात की और प्रेमचंद से जुड़ी उनकी यादों को उन्ही की ज़ुबानी सुना.
'प्रेमचंद
से जीवन में मेरी मुलाक़ात तीन बार हुई है, एक बार उस समय जब मैं ने अपने
पिता को देखा कि वह मेरी तीसरी क्लास की उर्दू की किताब से माँ को एक कहानी
सुना रहे हैं और दोनों रो रहे है.
वह
कहानी प्रेमचंद की ‘हज्जे अकबर’ थी. उसके बाद मेरी माँ मुझे हमेशा वह
कहानी पढ़ के सुनाने को कहती और पढ़ते पढ़ते हम इतना रोते कि कहानी अधूरी
रह जाती. यह कहानी आज तक हम दोनों से पूरी पढ़ी ना जा सकी.
यह
वह पल था जब मुंशी प्रेमचंद ने पहली बार मुझे छुआ. फिर ईदगाह पढ़ी तो लगा
कि यह तो अपनी ज़िंदगी से बहुत क़रीब है, उसे पढ़ के ऐसा लगा कि अगर हम भी
मेले गए होते तो मैंने भी हामिद की तरह चिमटा ही खरीदा होता.
प्रेमचंद
से मेरी दूसरी मुलाक़ात कॉलेज में हुई जब मैंने कई अलग-अलग तरह के लेखकों
को पढ़ा. प्रेमचंद को मैंने हिंदी और उर्दू दोनों में पढ़ा और उन्हें फिर
से पढ़ा तो पता चला कि इसका एक और भी पहलू है, यानी सामाजिक पहलू.
अगर कोई किरदार ऐसा है तो क्यों है? यह है वह दूसरा लेवेल जहाँ हम प्रेमचंद से मिलते हैं.
प्रेमचंद
से तीसरी बार उस समय मिला जब गोदान और ग़बन पर फिल्में बनीं, यानी एक
फ़िल्मकार की हैसियत से अब जाकर हमारी मुलाक़ात प्रेमचंद से हुई.
हम
किसी भी साहित्यकार से कई स्तर पर मिलते हैं, ग़ालिब से उस वक़्त मिले जब
मौलवी साहब शेर पढ़ते और मतलब बताते और कहते कि चचा ने कहा है, उस समय
ग़ालिब हमें चचा ही लगते थे, फिर जब बड़े होकर ग़ालिब को पढ़ा तो उनकी
शख़्सियत हमारे ऊपर खुलती गई.
टेलीविज़न सीरीज़ के
लिए प्रेमचंद की कहानियाँ चुनते वक़्त हमने दो चीज़ों को ध्यान में रखा,
ऑडियो और विज़ुअल. इन दोनों को ही सामने रख कर हमने प्रेमचंद की कहानियों
का इंतिख़ाब किया. और दूसरे यह कि आज उसका क्या प्रासंगिकता है.
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जैसे सौ साल पहले थीं.
यह
बात एक लेखक के लिए प्रतिष्ठा की बात है कि उसकी कहानियाँ सौ वर्ष बाद भी
जीवित हैं, लेकिन सामाजिक तौर पर यह अफ़सोसनाक बात है कि वे हालात अभी तक
नहीं बदले, ग़रीबी अब भी वैसी ही है जैसी कि प्रेमचंद ने बयान की थी.
मैं
प्रेमचंद को इसलिए भी क़रीब पाता हूँ क्योंकि मेरा और उनका हिंदू-मुसलमान
का साझा कल्चर है. उनके यहाँ किसान किसान था, हिंदू या मुसलमान नहीं.
अब
'नमक का दरोग़ा' को ही ले लें, इस में दो सिपाही हैं वज़ीर ख़ान और बदलू
सिंह, यहाँ सिपाही सिपाही है उसका हिंदू या मुसलमान होना नहीं नज़र आता है.
मेरी
फ़िल्मों में भी ऐसा ही है, मेरी फिल्म 'लेकिन' में अमजद साहब जब नमाज़
पढ़ने जाते हैं तो उस वक़्त पता चलता है कि अच्छा यह मुसलमान हैं और इनकी
बीवी हिंदू है, बड़ा ख़ूबसूरत है यह हमारा मिलाजुला कल्चर.
हालाँकि
प्रेमचंद को पढ़ते पढ़ते मैं कई जगह उन से उलझ गया कि क्या एक ही तरह के
पात्र को बार बार ले आते हैं. और मेरी यह कविता प्रेमचंद से उसी टकराव को
ज़ाहिर करती है'.
कविता
प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ़ बहुत है... |
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देव औरंगाबाद बिहार 824202 साहित्य कला संस्कृति के रूप में विलक्ष्ण इलाका है. देव स्टेट के राजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह किंकर अपने जमाने में मूक सिनेमा तक बनाए। ढेरों नाटकों का लेखन अभिनय औऱ मंचन तक किया. इनको बिहार में हिंदी सिनेमा के जनक की तरह देखा गया. कामता प्रसाद सिंह काम और इनकi पुत्र दिवंगत शंकर दयाल सिंह के रचनात्मक प्रतिभा की गूंज दुनिया भर में है। प्रदीप कुमार रौशन और बिनोद कुमार गौहर की भी इलाके में काफी धूम रही है.। देव धरती के इन कलम के राजकुमारों की याद में .समर्पित हैं ब्लॉग.
गुरुवार, 17 जनवरी 2013
प्रेमचंद को गुलज़ार ने कैसे जाना
शनिवार, 12 जनवरी 2013
जोहांसबर्ग में नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन
जनता जनार्दन डेस्क ,
Sep 22, 2012, 16:55 pm IST
Keywords: Pravin Shah Govardhan Preneet Kaur South Africa World Hindi Conference Johannesburg प्रवीण गोवर्धन शाह प्रणीत कौर दक्षिण अफ्रीका विश्व हिन्दी सम्मेलन जोहांसबर्ग
Keywords: Pravin Shah Govardhan Preneet Kaur South Africa World Hindi Conference Johannesburg प्रवीण गोवर्धन शाह प्रणीत कौर दक्षिण अफ्रीका विश्व हिन्दी सम्मेलन जोहांसबर्ग
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दक्षिण अफ्रीका के वित्त मंत्री प्रवीण गोवर्धन शाह इस सम्मेलन के मुख्य अतिथि हैं। मॉरीशस के कला व संस्कृति मंत्री मुकेश्वर चुनी भी विशेष तौर पर कार्यक्रम में उपस्थित हुए हैं।
हिन्दी को विश्व भाषा बनाने का सपना लेकर 1975 में नागपुर से शुरू हुई इस यात्रा के मौजूदा पड़ाव जोहांसबर्ग में देश और दुनिया के हिंदी के अनेक विद्वान, विचारक, जानकार, पत्रकार और साहित्यकार शिरकत कर रहे हैं जो तीन दिन तक हिंदी के प्रचार और प्रसार के तमाम आयामों पर चर्चा करेंगे।
सम्मेलन के पहले दिन तीन सत्रों का आयोजन किया गया है। पहले सत्र में महात्मा गांधी की भाषा दृष्टि और वर्तमान का संदर्भ विषय पर, दूसरे सत्र में अफ्रीका में हिंदी शिक्षण-युवाओं का योगदान और तीसरे सत्र में सूचना प्रौद्योगिकी-देवनागरी लिपि और हिंदी का सामथ्र्य विषय पर चर्चा होगी।
दक्षिण अफ्रीका में हो रहे इस सम्मेलन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत में पहली बार हिंदी के लिए राष्ट्रभाषा का प्रयोग करने वाले महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका को प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल किया था।
दक्षिण अफ्रीका में भारत के उच्चायुक्त वीरेंद्र गुप्ता ने सम्मेलन में आए लोगों का स्वागत करते हुए कहा, "दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के बारे में एक महत्वपूर्ण बात कही जाती है कि भारत ने एक बैरिस्टर को दक्षिण अफ्रीका भेजा था और दक्षिण अफ्रीका ने उन्हें महात्मा बनाकर भारत वापस भेजा।"
उन्होंने कहा कि गांधीजी की वजह से दक्षिण अफ्रीका और भारत में आत्मीय संबंध है और इस सम्मेलन के जोहांसबर्ग में आयोजन से हिंदी के माध्यम से दोनों देशों के संबंधों को और प्रगाढ़ किए जाने का प्रयास किया जाएगा।
सम्मेलन का उद्घाटन करने के बाद अतिथियों के स्वागत में डरबन स्थित भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के शिक्षकों और छात्रों के एक दल ने हिंदी में स्वागत गान किया। इसके बाद पारम्परिक दक्षिण अफ्रीका स्वागत गान किया गया।
जनसाधारण की भाषा नहीं बन पाती सरकारी भाषा
विश्व हिन्दी सम्मेलन :
ब्रजेन्द्र नाथ सिंह ,
Sep 24, 2012, 11:55 am IST
Keywords: South Africa JohannesBurg Ninth World Hindi Conference Celebrated Novelist Mahatma Gandhi International Hindi University Vibhuti Narayan Rai VC Language दक्षिण अफ्रीका जोहान्सबर्ग नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन प्रख्यात कथाकार महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय कुलपति विभूति नारायण राय भाषा
Keywords: South Africa JohannesBurg Ninth World Hindi Conference Celebrated Novelist Mahatma Gandhi International Hindi University Vibhuti Narayan Rai VC Language दक्षिण अफ्रीका जोहान्सबर्ग नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन प्रख्यात कथाकार महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय कुलपति विभूति नारायण राय भाषा
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राय ने यह बात सम्मेलन स्थल के शांति कक्ष में आयोजित 'महात्मा गांधी की भाषा दृष्टि और वर्तमान का संदर्भ' विषयक परिसंवाद सत्र में अध्यक्षीय टिप्पणी के दौरान कही।
उन्होंने कहा कि भाषा से ही राजा का जनता के साथ रिश्ता कायम होता है। जब हम गांधीजी की भाषा दृष्टि पर सोचते हैं तो हमें दूसरी भाषाएं सीखने के लिए उदार होना होगा।
आलोचक कृष्णदत्त पालीवाल ने कहा कि गांधी का चिंतन परम्परागत होते हुए भी क्रांतिकारी चिंतन है। गांधीजी की मुख्य चिंता थी कि अंग्रेजी कहीं देश की राष्ट्रभाषा न बन जाए। गांधीजी मानते थे कि हिन्दी कई बोलियों की संगम है और भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली भाषा है।
वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने अपनी बात की शुरुआत महात्मा गांधी द्वारा भरूच में हिन्दी भाषा को लेकर उठाए गए पांच सवालों से की। उपाध्याय ने हिन्दी समाज की खामियों को रेखांकित करते हुए कहा, "हमने अपनी बोलियों और उर्दू से एक तरह से कन्नी काट ली है।"
वहीं, प्रख्यात आलोचक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि गांधीजी आज की पीढ़ी के लिए बीते दिनों की चीज हैं, जबकि आज भी हम विचार के लिए गांधी के पास जाते हैं। गांधी की चेतना की डोर समाज से जुड़ी हुई थी। गांधी इस देश की आत्मा के पर्याय थे। गांधी सत्ता की राजनीति में भरोसा नहीं करते थे।
उम्र के 90वें पड़ाव पर नीरज का कारवां
जनता जनार्दन डेस्क ,
Jan 04, 2013, 13:07 pm IST
Keywords: Personality of wandering Poet Gopaldas Neeraj Youth 4 January 1925 Uttar Pradesh Delhi Compositions Country - The World His Fans Warhorse Film World Legendary Director Actor Educator Writer व्यक्तित्व से यायावर महाकवि गोपालदास नीरज युवा काल 4 जनवरी 1925 उत्तर प्रदेश में इटावा रचनाओं देश-दुनिया प्रशंसक बनाया। उनके प्रशंसकों में दिग्गज राजनेता फिल्मी दुनिया दिग्गज निर्देशक अभिनेता शिक्षाविद् साहित्यकार
Keywords: Personality of wandering Poet Gopaldas Neeraj Youth 4 January 1925 Uttar Pradesh Delhi Compositions Country - The World His Fans Warhorse Film World Legendary Director Actor Educator Writer व्यक्तित्व से यायावर महाकवि गोपालदास नीरज युवा काल 4 जनवरी 1925 उत्तर प्रदेश में इटावा रचनाओं देश-दुनिया प्रशंसक बनाया। उनके प्रशंसकों में दिग्गज राजनेता फिल्मी दुनिया दिग्गज निर्देशक अभिनेता शिक्षाविद् साहित्यकार
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मेरी आवाज में आवाज मिलाते रहिए’
- नीरज
व्यक्तित्व से यायावर महाकवि गोपालदास नीरज का युवा काल बेहद कठिनाइयों के बीच गुजरा था। 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश में इटावा के पुरावली में जन्मे नीरज ने पढ़ाई के साथ-साथ अजीविका के लिए सिनेमा हॉल पर नौकरी भी की। बाद के वर्षों में नीरज की रचनाओं ने देश-दुनिया के लोगों को उनका प्रशंसक बनाया। उनके प्रशंसकों में दिग्गज राजनेता, फिल्मी दुनिया के दिग्गज निर्देशक, अभिनेता, शिक्षाविद्, साहित्यकार, आदि शामिल हैं।
नीरज से जुड़े कुछ प्रसंग
1998 में अगस्त का महीना। गर्म दिन के बाद रात को स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में दिल्ली के लाल किले पर कवि सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। रात लगभग 9.30 बजे का समय है। अध्यक्षता गोपाल दास ‘नीरज’ कर रहे हैं। तत्कालीन कैबिनेट मंत्री मुरली मनोहर जोशी वीआईपी दर्शक दीर्धा से ही अपने संबोधन में कहते हैं कि ‘यह मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है कि आज मेरे समक्ष मेरे हमेशा से ही प्रिय रहे नीरज जी काव्य पाठ करेंगे। नीरज जी को सुनना एक विलक्षण अनुभव होता है।’
खुद को आने से नहीं रोक पाए राज्यपाल
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी एक दीक्षांत समारोह में आते हैं और कहते हैं कि ‘इस कार्यक्रम के विषय में जब सुना कि नीरज जी अध्यक्षता करेंगे तो मैं खुद को यहां आने से रोक न सका’। ऐसा ही कुछ सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कुछ दिन पहले हुए एक दीक्षांत समारोह में कहा।
नीरज की प्रमुख रचनाएं
कविता संग्रह
:- 'दर्द दिया', 'प्राण गीत', 'आसावरी', 'बादर बरस गयो', 'दो गीत', 'नदी किनारे', 'नीरज की गीतिकाएं', संघर्ष, विभावरी, नीरज की पाती, लहर पुकारे, मुक्तक, गीत भी अगीत भी इत्यादि।
पत्र संकलन
:- लिख लिख भेजूं पाती
आलोचना
:- पंत कला काव्य और दर्शन।
दोहों में
:- नीरज के दोहे
गीतों में
:- कारवां गुज़र गया,
:- खग उड़ते रहना जीवन भर,
:- छिप छिप अश्रु बहाने वालों,
:- धरा को उठाओ,
:- नीरज गा रहा है,
:- बसंत की रात,
:- मुझको याद किया जाएगा,
:- लेकिन मन आज़ाद नहीं है,
:- सांसों के मुसाफ़िर।
पुरस्कार एवं सम्मान
गोपालदास नीरज को कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
:- विश्व उर्दू परिषद पुरस्कार
:- पद्म श्री सम्मान (1991), भारत सरकार
:- यश भारती और एक लाख रुपये का पुरस्कार (1994), उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
:- पद्म भूषण सम्मान (2007), भारत सरकार
:- फिल्म फेयर पुरस्कार
नीरज को फ़िल्म जगत में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्नीस सौ सत्तर के दशक में लगातार तीन बार यह पुरस्कार दिया गया। उनके द्वारा लिखे गये
पुरस्कृत गीत हैं:-
:- (1970) काल का पहिया घूमे रे भइया! (फ़िल्म: चन्दा और बिजली)
:- (1971) बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं (फ़िल्म: पहचान)
:- (1972) ए भाई! ज़रा देख के चलो (फ़िल्म: मेरा नाम जोकर)
बुधवार, 9 जनवरी 2013
भारत में अंग्रेज़ी बनाम हिंदी / मार्क टली
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पुरालेख
तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार
।
हिंदी लिंक ।
हमारे लेखक ।
लेखकों
से
SHUSHA HELP // UNICODE HELP पता- teamabhi@abhivyakti-hindi.org |
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युनिवर्सिटी प्रेस, मैकमिलन
आदि समेत अंग्रेज़ी के भारतीय प्रकाशक।
भारतीय भाषाओं के लिए केवल एक हॉल था। दिल्ली में, जहाँ मैं रहता हूँ उसके आस-पास अंग्रेज़ी पुस्तकों की तो दर्जनों दुकाने हैं, हिंदी की एक भी नहीं। हक़ीक़त तो यह है कि दिल्ली में मुश्किल से ही हिंदी पुस्तकों की कोई दुकान मिलेगी। टाइम्स आफ इंडिया समूह के समाचारपत्र नवभारत टाइम्स की प्रसार संख्या कहीं ज़्यादा होने के बावजूद भी विज्ञापन दरें अंग्रेज़ी अख़बारों के मुकाबले अत्यंत कम हैं।
इन तथ्यों के उल्लेख का एक
विशेष कारण है।
हिंदी दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली पाँच भाषाओं में से एक है। जबकि भारत में बमुश्किल पाँच प्रतिशत लोग अंग्रेज़ी समझते हैं। कुछ लोगों का मानना है यह प्रतिशत दो से ज़्यादा नहीं है। नब्बे करोड़ की आबादी वाले देश में दो प्रतिशत जानने वालों की संख्या 18 लाख होती है और अंग्रेज़ी प्रकाशकों के लिए यही बहुत है। यही दो प्रतिशत बाकी भाषा-भाषियों पर अपना प्रभुत्व जमाए हुए हैं। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं पर अंग्रेज़ी के इस दबदबे का कारण गुलाम मानसिकता तो है ही, उससे भी ज़्यादा भारतीय विचार को लगातार दबाना और चंद कुलीनों के आधिपत्य को बरकरार रखना है।
इंग्लैंड में मुझसे अक्सर
संदेह भरी नज़रों से यह सवाल पूछा जाता है तुम क्यों भारतीयों
को अंग्रेज़ी के इस वरदान से वंचित करना चाहते हो जो इस समय
विज्ञान, कंप्यूटर, प्रकाशन और व्यापार की अंतर्राष्ट्रीय
भाषा बन चुकी है? तुम क्यों दंभी-देहाती (स्नॉब नेटिव) बनते जा
रहे हो? मुझे बार-बार यह बताया जाता है कि भारत में संपर्क
भाषा के रूप में अंग्रेज़ी क्यों ज़रूरी है, गोया यह कोई
शाश्वत सत्य हो। इन तर्कों के अलावा जो बात मुझे अखरती है वह
है भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेज़ी का विराजमान होना। क्यों कि
मेरा यकीन है कि बिना भारतीय भाषाओं के भारतीय संस्कृति ज़िंदा
नहीं रह सकती।
आइए शुरू से विचार करते हैं।
सन 1813 में ईस्ट इंडिया कंपनी के बीस साल चार्टर का नवीकरण
करते समय साहित्य को पुनर्जीवित करने, यहाँ
की जनता के ज्ञान को बढ़ावा देने और विज्ञान को प्रोत्साहन
देने के लिए एक निश्चित धनराशि उपलब्ध कराई गई। अंग्रेज़ी का
संभवतः सबसे खतरनाक पहलू है अंग्रेज़ी वालों में कुलीनता या
विशिष्टता का दंभ।
कोढ़ में खाज का काम अंग्रेज़ी पढ़ाने का ढंग भी है। पुराना पारंपरिक अंग्रेज़ी साहित्य अभी भी पढ़ाया जाता है। मेरे भारतीय मित्र मुझे अपने शेक्सपियर के ज्ञान से खुद शर्मिंदा कर देते हैं। अंग्रेज़ी लेखकों के बारे में उनका ज्ञान मुझसे कई गुना ज़्यादा है। एन. कृष्णस्वामी और टी. श्रीरामन ने इस बाबत ठीक ही लिखा है जो अंग्रेज़ी जानते हैं उन्हें भारतीय साहित्य की जानकारी नहीं है और जो भारतीय साहित्य के पंडित हैं वे अपनी बात अंग्रेज़ी में नहीं कह सकते। जब तक हम इस दूरी को समाप्त नहीं करते अंग्रेज़ी ज्ञान जड़ विहीन ही रहेगा। यदि अंग्रेज़ी पढ़ानी ही है तो उसे भारत समेत विश्व के बाकी साहित्य के साथ जोड़िए न कि ब्रिटिश संस्कृति के इकहरे द्वीप से।
चलो इस बात पर भी विचार कर
लेते हैं कि अंग्रेज़ी को कुलीन लोगों तक मात्र सीमित करने की
बजाय वाकई सारे देश की संपर्क भाषा क्यों न बना दिया जाए?
नंबर एक, मुझे नहीं लगता कि इसमें सफलता मिल पाएगी (आंशिक रूप से राजनैतिक कारणों से भी), दो, इसका मतलब होगा भविष्य की पीढ़ियों के हाथ से उनकी भाषा संस्कृति को जबरन छीनना। निश्चित रूप से भारतीय राष्ट्र की इमारत किसी विदेशी भाषा की नींव पर नहीं खड़ी हो सकती। भारत, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया की तरह महज़ भाषाई समूह नहीं है। यह उन भाषाओं की सभ्यता है जिसकी जड़ें इतनी गहरी है कि उन्हें सदियों की औपनिवेशिक गुलामी भी नहीं हिला पाई।
संपर्क भाषा का प्रश्न
निश्चित रूप से अत्यंत जटिल है। यदि हिंदी के लंबरदारों ने यह
आभास नहीं दिया होता कि वे सारे देश पर हिंदी थोपना चाहते हैं
तो समस्या सुलझ गई होती। अभी भी देर नहीं हुई है। हिंदी को अभी
भी अपने सहज रूप में ही बढ़ाने की ज़रूरत है और साथ ही
प्रांतीय भाषाओं को भी, जिससे कि यह भ्रम न फैले कि अंग्रेज़ी
साम्राज्यवाद की जगह हिंदी साम्राज्यवाद लाया जा रहा है।
यहाँ सबसे बड़ी बाधा हिंदी के
प्रति तथाकथित कुलीनों की नफ़रत है। आप बंगाली, तमिल या
गुजराती पर नाज़ कर सकते हैं पर हिंदी पर नहीं। क्यों कि
कुलीनों की प्यारी अंग्रेज़ी को सबसे ज़्यादा खतरा हिंदी से
है। भारत में अंग्रेज़ी की मौजूदा स्थिति के बदौलत ही उन्हें
इतनी ताक़त मिली है और वे इसे इतनी आसानी से नहीं खोना चाहते।
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