शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

दशरथ मांझी पर उपन्यास




दशरथ माझी के जीवन पर आधारित उपन्यास का अंश

 पिछले दिनों एक खबर आई कि एक प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ने दशरथ माझी के जीवन पर आधारित फिल्म बनाई है. दशरथ माझी सचमुच एक यादगार चरित्र है, जिसने पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बना दिया था. फिल्म के बारे में पढ़ा ही था कि वरिष्ठ कवि-लेखक निलय उपाध्याय ने दशरथ मांझी के जीवन पर लिखा उपन्यास भेज दिया. उपन्यास अभी छपा नहीं है. लेकिन कह सकता हूँ कि दशरथ मांझी के बहाने बिहार के जीवन, समाज, राजनीति को लेकर एक शानदार उपन्यास है. मैं प्रकाशक तो हूँ नहीं कि छापकर आपके लिए उपन्यास पेश कर सकूँ. लेकिन आपके लिए उसका एक अंश तो प्रस्तुत कर ही सकता हूँ. 
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पहाड़ पर आगे की चट्टानें कैसी हैं और उन्हें कैसे काटा जाय, सोच भी नहीं पाए थे दशरथ किपूरे बिहार पर अकाल की भयानक छाया मड़राने लगी। गांव में जिन लोगों के पास रेडियो था, उनके दरवाजे पर सुवह शाम अकाल का समाचार सुनने वाले लोगों की भीड लग जाती । सूचना के साथ अफ़वाहों ने भी जोर पकड लिया था । यह तय कर पाना मुश्किल था कि घटनाओं की इस भीड में कौन सी सूचना सही है और कौन सी अफ़वाह। इन हालातों में दशरथ ने पहाड़ काटने का काम पूरी तरह बन्द कर दिया क्योंकि पहाड़ से अधिक गांव के लोगों के जिन्दा रहने की जरूरत उनके जेहन में बस गई थी ।
बिहार में लोग खेती को सरगसरा कहते थे। मतलब आसमान से अगर बारिश होगी तो फ़सल होगी नहीं तो नहीं होगी।पिछले साल बारिश कम हुई थी जिसके कारण फसल आधी से भी कम हुई । लोगों को उम्मीद थी कि अगले साल अच्छी बारिश होगी और फसलें हो जाएगी तो गए साल की भरपायी हो जाएगी और जीवन पटरी पर आ जाएगा मगर दूसरे साल तो एक दम ही बारिश नहीं हुई ।
यह गलहौर गांव की ही नहीं पूरे बिहार में जहां अकाल का तांडव पसरा था, की कहानी थी ।खेत बूंद- बूंद पानी के लिए तरस कर परती ही रह गए थे।इलाके के जितने भी गड्ढे, पोखर और ताल तलैया थे सब सूख गए थे ।खेतों में लहलहाती फ़सलों की जगह बडी बडी दरारें पडी थी।सूखे कीचड की पपडी के बीच चौडी चौडी दरारें बहुत भयानक लग रही थी। जिन किसानों ने कहीं कहीं रोपाई की थी , वे अब खेत में रोपे गए धान को छिल छिलकर मवेशियो को खिला रहे थे क्योंकि उनके लिए कहीं चारा नहीं बचा था। धान होने से तो रहा कम से कम मवेशियों की जान तो बच जाए।
कई जगह खेतॊं में बगीचों में मरे हुए जानवरों पर मंडराते और मांस नोच नोच खाते गिद्ध दिखाई दे जाते, जिनकी कुत्तों के साथ जंग चलती रहती। जगह जगह मरे हुए चूहे दिखाई पड़ते ।
कई लोगों के घर तो कई दिनों से चूल्हा नहीं जला ।
गलहौर के कई लोगों को पहली बार इस बात का पता तब चला कि मुखिया और बडे किसानों से अलग कोई सरकार है जो आफत के समय में लोगों की मदद करती है,जब राहत की सामग्री लेकर गांव में एक गाड़ी आयी । गाडी के साथ उसके अफ़सर भी आए थे। अफ़सर के सामने मुखिया ने गांव के बाहर लोगों को बुलाकर लाईन में खड़ा कर दिया और बारी बारी से चावल चना गुड सलाई जैसी चीजे बांटी जाने लगी। कुछ देर बाद जब लोगों को लगा कि चीजे पर्याप्त मात्रा में नहीं है और कतार में पीछे खडे आदमी के पास पहुंचते पहुंचते खतम हो जाएगी तो लोग अपना आपा खो बैठे और लूटपर उतारू हो गए। किसी को कुछ मिला किसी को कुछ नहीं मिला और लोग आपस में ही लडने लगे।इसका प्रभाव यह हुआ कि मुखिया और अफ़सर के बीच जाने कौन सी खिचडी पकी कि आगे राहत का कोई भी सामान आता तो वह गांव वालों के पास आने के बजाए सीधे मुखिया के पास चला जाता। कुछ दिन के बाद सामग्री का गांव में आना ही बंद हो गया। सामग्री लेकर गाड़ी ज्योंहि गया से निकालतीआस पास के इलाके के लोग छापामार सैनिक की तरह गाड़ी को घेर लेते और उसे लूट लेते । किसी को किसी पर भरोसा नहीं रह गया था।
 इन हालातो में भी दशरथ अकेले आदमी थे जिनकी बात गांव के लोग मानते और फ़ैसला उन पर छोड़ देते ।दशरथ सोच रहे थे कि ब्लाक पर चलकर कुछ करना चाहिए ताकि फ़िर से राहत सामग्री की गाडियां ले आई जा सके और लोगों की जान बच सके।
ब्लाक पर इलाके से आए हुए लोगों की भीड़ लगी थी और चारो ओर गहमा गहमी का वातावरण था । दशरथ के वहां पहुंचने के कुछ देर पहले ग्रामीणों ने ब्लाक के चावल का गोदाम लूट लिया था और चारों ओर अफरा तफरी मची थी।हालात ऎसे थे किब्लाक का कोई अधिकारी किसी बात का जबाब देने के लिए तैयार नहीं था।
पूरे दिन दशरथ प्रयास करते रहे मगर कोई सफलता हाथ नहीं लगी और हारकर वापस गलहौर चले आए।
कलका हाल देखकरउनके भीतर कहीं कोई उम्मीद नहीं बची थी मगर लगे रहने पर हीं कुछ हो सकता था, और इसके अलावे कोई रास्ता भी तो नहीं था ,सोचकर वे आज भी ब्लाक पर जाने के लिए तैयार थे ।अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई तो उन्हें लगा कि झौरी और छेदी आ गए ,मगर सामने का दृष्य देखकर कांप गए। रमिया उनकी पत्नी पिंजरी को सम्भालते बच्ची को गोद में लिए घर में आई थी। पिंजरी पास आयी, अजीब सी कतार निगाहों से दशरथ को देखा और बेहोश हो गई।
दशरथ उसे उठाकर कमरे में ले गए। बिस्तर पर लिटाया, चेहरे पर पानी का छींटा मारा । पिंजरी को होश तोजल्दी ही आ गया मगर वह फ़ूट फ़ूटकर रोने लगी । दशरथ ने प्यार से पूछा-का हुआ पिंजरी?
पिजरी के मुंह से बोल नहीं फ़ूटे।
बहुत दिनों के बाद किसी ने पिजरी को धान कूटने के लिए बुलाया था। गई तो मालकिन अकेली थी,कहा कि अभी किसी काम में लगी हूं ,शाम को आ जाना। वहां से लौटकर अपने टोले के पास आयी तो देखा कि जूना की बछिया बाहर खड़ी है। बछिया भले जूना की थी मगर पिजरी रोज उसे कवरा देती थी। बछिया ने पिजरी को इस तरह देखा जैसे वह कुछ कह रही हो और ज्योहि पिजरी ने प्यार से उसका सिर सहलाया कि बछिया खडी खडी जमीन परलुढ़क गई। देखते देखते उसका जीभ बाहर निकल आया और वह मर गई। यह देख पिजरी की सांस टंग गई लगा जैसे वह खुद ही बेहोश हो जाएगी। रमिया ने बच्ची को सम्भाला और किसी तरह उसे घर लेकर आयी थी।
पिजरी बिस्तर पर थी। उसका बदन बुखार से गरम हो गया था। छेदी और झौरी आए तो पिंजरी का बुखार काफी तेज हो चुका था । दशरथ समझ नहीं पाए कि क्या करे जिस हाल में पिजरी थी ,जाना अपराध जैसा लग रहा था।
दशरथ को असमंजस में पडा देख पिंजरी ने कहा-मेरी चिन्ता मत करो मैं ठीक हूं
मगर उसका हाल देख दशरथ को जाना गवारा नहीं हुआ।रमिया के कहने पर दशरथ का ढाढस बंधा।ब्लाक पर जाना जरुरी था क्योकि सबकी उम्मीदें उन पर ही टिकी थी। वे पिजरी को काम पर न जाने का निर्देश देकर चले गए।
ब्लाक पर इलाके के दूर दराज के गांव से आए लोग अफसरों को, कर्मचारियों को गालियां बक रहे थे और राहत सामग्री की चोरी का इल्जाम लगा रहे थे। अखबारों मे रोज ही इस लूट और मरने वालो की खबर छप रही थी । शाम हुई तो अचानक दशरथ की निगाह उस पत्रकार पर पडी जिसने बुधुआ के जलने पर मदद किया था। वह जब चाहता, अफसरों के कमरे मे चला जाता और बाहर आ कर लोगों से बात कर पूछता कि उसके गांव में क्या हुआ।
दशरथ को लगा किशायद वह उनकी कोई मदद कर सके।
पास जाते ही उसने दशरथ को पहचान लिया - दशरथ जी आप ..?
दशरथ ने अपने गांव का हाल सुनाया तो वह बोल पडा-लगभग सारे गांव का तो यही हाल है लेकिन कल मै आपको पूरी सूचना दूंगा। सरकार की ओर से एक योजनाआई है कि गांव में काम पैदा करो ...लोगों से काम कराओ और उसकी मजदूरी दो। यह योजना आपके गांव के लिए भी आयी होगी। दशरथ झौरी और छेदी को इस बात को यकीन हुआ कि पत्रकार की मदद से अब गांव वालों के लिए वे कुछ कर सकेंगे। कल आने का वादा कर जल्दी से गलहौर के लिए रवाना हो गये।
दशरथ के मना करने के बाद भी पिंजरी हाथ आए काम को छोडना नहीं चाहती थी। कहीं से काम की खबर मिली तो दोपहर बाद फ़िर काम पर जाने के लिए तैयार हो गई। रमिया भाभी ने पिंजरी का देह छूकर देखा, बुखार उतर गया था इस लिए उसे भी कोई आपत्ति नही हुई। पिंजरी का ही ऐसा व्यवहार है कि ऐसे हालात में भी उसे कुछ न कुछ काम मिल जाता है, वरना काम कौन देता है आजकल।पिंजरी और रमिया गांव के बबूआन टोल में पहुंची तो देख कर भौचक रह गई कि मांझी टोल का सबसे बुजुर्ग जितिया गमछा पसार कर भीख मांग रहा है।
पिंजरी और रमिया की आंख भर आई।
जितिया का भरा पूरा परिवार था । भले ही उसके नाती पोते अलग अलग रहते थे ,मगर वे दोनों जून जितिया को बहुत आदर के साथ खाना देते थे और उसका खयाल रखते थे। मगर अब तो हालत ही कुछ और थे। जीवन भर स्वाभिमान के साथ जीने वाले जीतिया को बडे लोगों के टोले मे भीख मांगने पर मजबूर होना पडा था और कोई कुछ दे नहीं रहा था।
बगल से गुजरी तो जितिया पता नहीं क्यो पिजरी और रमिया को जाते हुए बडे गौर से निहार रहा था।
रमिया के साथ पिंजरी ढेके पर बैठी धान कूट रही थी। उनके सधे हुए पांव ढेके के लतमरूआ पर जाते, नीचे की ओर दबाव बनाते, ढेके का मूसल वाला सिरा उपर की ओर उठता, पैरों का दबाव कम हो जाता और मूसल धान पर गिरता। थोड़ा सा चावल बिखर जाता जिसे हर कुछ देर के बाद पिंजरी या तो रमिया जाकर ठीक कर देती । रमिया ने पिंजरी की ओर देखा तो वह बात समझ कर ढेका से नीचे उतर गई...।ओखल के पास बिखरे हुए चावलों को एकत्रित करके ओखल के बीच में कर दिया और एक नजर अपनी डेढ़ साल की बच्ची पर डाला जो आंगन में सो रही थी।
झिंगुरी सिंह की बहू ससुराल गई थी और उनकी पत्नी दूसरे कमरे में बैठी गाय के दूध को बिलोकर मट्ठा निकाल रही थी ।इधर पिंजरी और रमिया अपने काम में मसगुल थे । रमिया ने ओखल के चावल पर नज़र डाल कर कहा-अब फटक लेते हैं।
पिंजरी ने कहा-दो चार मुसर और गिर जाने दो, चावल में चमक आ जाएगी।
एकाएक दोनों की नजर सामने गई और जैसे भक्क मार गया। वे कुछ समझ नहीं पायी कि कब जितिया माझी बिजली की तेजी से आंगन में समाया ,एक पल के लिए नज़र घुमाकर उचक्के की तरह चारों ओर देखा। एका एक उसकी नजर आंगन में  सोयी पिंजरी की बच्ची पर टिक गई। मन ही मन उसने कुछ फ़ैसला लिया। बच्ची को एक हाथ से बिजली की गति से उठाया और आगे बढ़ता हुआ ढेके तक आ गया।
ढेके का मूसल ज्योंहि उपर उठा उसने बच्ची को ओखल में डाल दिया ।
सबकुछ इतना जल्दी और इस तरह पलक झपकते हुआ कि पिंजरी के मुंह से बस एक घूटी सी चीख निकली और दोनो अपनी जगह पर जैसे काठ हो गई।
ओखल में पड़ी पिंजरी की नन्ही सी बच्ची जोर जोर से रो रही थी और जितिया ओखल का चावल हाथ से निकालकर कभी गमछे मे डालता, कभी मुंह में और पागलों की तरह हंसता ।पिंजरी और रमिया के पांव ढेंकी के लतमरुआ पर जोर से जमे थे, कही जरा सी चूक हुई तो इतने भारी ढेके का इतना बड़ा मूसल बच्ची के उपर जा गिरेगा ।रमिया और पिंजरी दोनों के चेहरे उड़ गए थे और वे समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे ।
जितिया कभी चावल गमछे में उठाता, कभी फांकता और कभी कहकहे लगाता। बच्ची के रोने और उसके कहकहे की आवाज सुन कमरे में दूध बिलोती झिंगुरी सिंह की पत्नी बाहर निकलकर आयी और सामने का दृष्य देखकर उनके मुंह से चीख निकल गई।
जितिया ने उन्हे चीखते देखा तो उसके चेहरे पर भय की लकीरे दौड़ गयी और उसी तरह कभी चावल फाकता, कभी हंसता जितिया तेजी के साथ घर से बाहर निकल गया। झिंगुरी सिंह की पत्नी शोर मचाते हुए  जितिया के पीछे भागती चली गई । यह देख पिंजरी को जैसे काठ मार गया था। उसके पांव अब भी ढेके के लतमरूआ पर पूरे ताकत से जमे थे।
रमिया ने उससे कहा-जाओ पहले बच्ची को उठाओ
मगर पिंजरी को जैसे सुनाई ही नहीं पड़ा। वह डर रही थी कि कही नीचे उतरी, दबाव कम पड़ा और बच्ची के उपर मुसल गिरा तो क्या होगा। उसकी हालत रोने रोने जैसी हो गई।
रमिया ने ज़ोर दे कर कहा-जाओ, मेरा यकीन करो
कई बार उसने कहा तो पिंजरी ने पहले अपना एक पांव हटाया । वजन का अनुमान किया । ढेके का मूसल अब भी उपर की तरफ टंगा था। उसे अब यकीन हो रहा था कि रमिया पूरा वजन सम्भाल लेगी तो डरते डरते दूसरा पांव हटाया और झपटकर रोती हुई बच्ची को ओखल के भीतर से निकाल सीने से चिपका लिया।बच्ची अब भी जार बेजार रो रही थी।आहिस्ता से मूसल गिराकर रमिया भी उसके पास आ गई। बच्ची को सलामत देख राहत की सांस ली ।
तभी उन्हें बाहर कहीं शोर और जोरो की चीख सुनाई पडी और वे बाहर निकल गई।
बाहर निकलने के बाद पिंजरी ने जो कुछ देखा वह दिल को दहला देने वाला था। जितिया उसी तरह गमछे से कच्चा चावल निकाल मुंह मे फाकता, अट्ठहास करता भाग रहा था और उसके पीछे गांव के आठ दस लोग लाठी लेकर भाग रहे थे। अंततः जितिया गिर गया और उसके उपर लाठियों की बरसात होने लगी। सबसे आश्चर्यजनक बात थी कि लाठियो का प्रहार उसपर लगातार हो रहा था मगर वह उससे जरा भी विचलित हुए बिना गमछे की झोली से चावल मुंह में डाल रहा था और इस तरह हंस रहा था जैसे पेट भरने की खुशी मौत के गम से बहुत बडी हो।
उसके शरीर मे कई जगह से खून रिस रहा था मगर वह इस तरह बेताब था जैसे मरने से पहले पूरा चावल खा जाना चाहता था। आखिरी मुट्ठी मुंह में जाने के ठीक पहले उसके सिर पर लाठी का जोरदार वार हुआ, उससे भभक कर खून गिरने लगा और जब मुट्ठी का चावल उसके मुंह मे गया, पूरी तरह खून से सन चुका था। जितिया मर गया मगर देखने से ऐसा लगता था जैसे मरने से पहले भरपेट चावल खा लेने का संतोष उसके चेहरे पर था। यह दृष्य देखकर पिजरी और रमिया कांप गई और मुंह में आंचल ठुसकर सुबकते हुए माझी टोल की ओर भागी।
पिंजरी घर आई तो देखा कि दशरथ ब्लाक से आ चुके थे। दशरथ को यह जानकर संतोष हुआ था कि पिंजरी का बुखार उतार चुका है, मगर उसके काम पर जाने से नाराज़ थे। पिंजरी ने रोते हुए जितिया के बारे में बताया तो दशरथ कांप गये मगर कुछ नही कहा। मौत की आरही अनगिनत सूचनाओं की तरह ये भी महज एक सूचना थी। इस वक्त किसी की मौत पर रोने से ज़्यादा ज़रुरी था ज़िन्दा लोगों को मौत केमुंह में जाने से रोकना।
अगले दिन जब दशरथ निश्चित समय से पहले ब्लाक पर पहुंच गए ।थोड़ी देर इंतजार के बाद पत्रकार भी आ गया। उसका चेहरा उतरा हुआ था।
दशरथ आगे बढ़कर बोल पड़े -का हुआ ।
पत्रकार एकाएक उनकी बातों का जबाब नहीं दे सका। दशरथ को लगा जरूर कोई ऐसी बात है जो उनके लिए अच्छी नहीं है। राजबरन भी साथ में आया था वह बोल पड़ा-कुछ गड़बड़ तो नही हो गया...पत्रकार साहेब....
पत्रकार ने लंबी सांस लेकर कहा-हां गडबड तो हो गया है
उसकी बात सुनकर सबकी आंखे फटी रह गई चेहरे का रंग उड़ गया-क्या हो गया?
आपके गांव के लिए चार हजार रूपये आए थे। उसे गांव में ही किसी काम का सृजन कर मजदूरों के बीच बांटना था। मगर वे खतम हो चुके हैं ।
दशरथ ने पूछा- कैसे खतम हो गये ? किसी और गांव में दे दिया क्या?
इस बार उसने साफ़ साफ़ कहा- नहीं, उसे आपके ही मुखिया जी ने निकलवा लिया है और वहां आफ़ीस मे इस तरह के कगाजात अंगूठे के निशान के साथ पेश किए जा चुके हैं कि वह पैसा गांव के मजदूरों के बीच बांट दिया गया है।
यह सुन कर सबकी भौहें तन गई।लगा कि सबकी धमनियों में रक्त खौल रहा हो। छेदी ने कहा-मगर काम तो कुछ हुआ नही।
इसके बाद पत्रकार ने जिस रहस्य का उदघाटन किया, सबका मुंह खुला रह गया। कोई सोच भी नहीं सकता कि मुखिया घटियापन के इस हद तक जा सकता है।
पत्रकार ने कहा - यह मेरे लिए भी सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है कि पैसा के लिए जिस काम का विवरण दिया गया है वह काम कोई और नहीं आपके द्वारा की गई पहाड़ की कटाई है।
गांव के लोग सन्नाटे में आ गये।
दशरथ चकित थे। अपना खून पसीना एक कर दशरथ ने जिस पहाड़ को काटा था उसी के नाम पर मुखिया ने चार हजार रूपये हड़प लिए।मगर यह बहस का वक्त नहीं था।
दशरथ ने पूछा-अब क्या हो सकता है।
आप चिन्ता मत कीजिए मैं इसे अखबार में लिखूंगा और मुखिया को वह पैसा वापस करना पडेगा।इसका प्रमाण है कि मैं पहले भी इस मसले पर लिख चुका हूं।
पत्रकार ने इसका उपाय तो बताया मगर सबके चेहरे पर जो उम्मीद की लकीर खीची थी वह धूंधली पड़ गई।मुखिया की गांठ से पैसा निकालना आसान नहीं था। साथ आया राजबरन पासी इतना उतेजित हो गया कि वही पर चिल्ला चिल्ला कर मुखिया को गाली बकने लगा । दशरथ ने शांत किया और कहा कि गांव चलकर मुखिया से किसी तरह ये पैसा निकलवा जाय ताकि मजदूरो को उनको परिवारो को इस अकाल में बचाया जा सके।
दशरथ और रमिया की बात अनसुनी कर पिंजरी पंडिजी की बहू को तेल लगाने चली गई थी। लौट कर आ गई मगर आज वहां उसे कुछ नही मिला। उसने किसी से कुछ नहीं कहा मगर चलते हुए उसके पांव कांप रहे थे, चक्कर आ रहा था। एक बार ऐसा लगा जैसे चलते चलते गिर जाएगी । वह इस बात से बेहद निराश थी कि अब गांव में कोई काम नहीं मिलेगा। पता नही कैसे गुजारा होगा।आज वह इसी लिए काम पर गई थी कि जो कुछ मिलेगा उसे ही पकाएगी मगर कुछ मिला नहीं । संतोष था कि उसने एक मोटरी में चावल बांधकर धरन के उपर छुपाकर रखा था कि मुसीबत के दिनों मे काम आएंगे।
जिस दिन उसने ये चावल उपर रखा था, उसी समय पता नहीं कैसे उसके मन में न जाने कैसे यह ख्याल आ गया कि जिस दिन ये चावल खतम हो जाएगे उस दिन वह जिन्दा नहीं बचेगी। बचे हुए इस चावल से घर में चार लोगों का भोजन दस दिन तक तो चलेगा और इसके बाद जो होगा देखा जाएगा। आदमी के बस में जो हो वही तो कर सकता है।दशरथ की बातों से उसे एक उम्मीद बंध गई थी कि ब्लक वाला पैसा मिल जाए तो कुछ राहत होगी ।
घर आकर उसने चावल की हाड़ी थाल में उलट दियाऔर अनुमान किया तो चावल एक दिन से ज्यादा का नहीं था। पिंजरी ने सोंचा कि धरन पर बचा कर रखे गये चावल में से दो तीन दिन खाने भर चावल निकाल कर हाडी मे रख लें ताकि बार बार उतारने की नौबत नहीं आए। खटिया पर चढ कर घरन पर देखा तो उसके होश उड़ गए ।
वहां चावल की मोटरी ही नहीं थी।
इसका मतलब क्या हो सकता है? अभी तो इतना ज्यादा चावल था कि दस दिनो तक वह अपने पूरे परिवार को खिला सकती थी। एकाएक उसे ख्याल आया कि अभी तीन दिन पहले धनिया भाभी रो रही थी कि उनके पास एक जून का चावल नहीं है और उसके बाद से इस अकाल में भी जब पूरा गांव एक बेर खाकर जिन्दा है, कहां से दूनो बेर चावल बना रही हैं।
वह समझ गई कि ये काम और किसी का नहीं धनिया भाभी का है। मगर वह कुछ कह भी नहीं सकती थी इस ख्याल मात्र से ही उसे चक्कर सा आ गया कि कल सुबह क्या बनेगा ,क्या खिलाउंगी दशरथ और बच्चों को।कई दिनों से उसने अपनी खुराक में कटौती कर ली थी और आधा पेट ही खाती थी। उपर से कम्बख्त बुखार रोज आ ही जाता था। वह समझ नही पाई कि क्या करे।
दशरथ ब्लाक से लौट कर आए और जब उसे पता चला कि मुखिया ने वो सारे पैसे हड़प लिए है तो रही सही उसकी उम्मीद भी समाप्त हो गई। दशरथ ने गौर किया कि आज पिंजरी कुछ अधिक परेशान है लेकिन गांव के लोगों का हुजूम इस तरह उतेजित था कि वे एक पल भी रूक नहीं सके और लोगों के साथ मुखिया से मिलने के लिए चले गए।
पिंजरी का दिल तेजी से बैठा जा रहा था। जब से अकाल शुरू हुआ था, लोग चावल को धोते नहीं थे । पहले तो पिंजरीके घर से चावल पकने की गंध आती तो लोग बाहर बैठ जाते कि पिजरी बस माड़ दे देना और वह माड़ मे थोड़ा सा चावल मिलाकर दे देती।कुछ दिनों के बाद हालत ये हो गई कि चावल का धोवन मांगने के लिए भी लोग आकर दरवाज़े पर बैठ जाते ।
अब तक जिन हलातो से गुजरते वह गांव के लोगों को देख रही थी, क्या उसे भी उन्हीं हलातो से गुजरना पड़ेगा।
जब चावल को चूल्हे पर चढ़ा दिया और खाली हड़िया को देखा तो अजीब सी कसक उसके भीतर उठी। उसके मन मे गहरी निराशा भर गई। चावल का माड़ निकाला और किसी दिब्य वस्तु की तरह उसे संजो कर रख दिया । आज घर में सबकेा माड़ भात ही खाना होगा। रोज कही न कही से साग पात नोच ले आती थी और दशरथ के लिए बना देती थी मगर आज...। वह अपनी किस्मत पर रो पड़ी ।
दशरथ ने जिस तरह पिंजरी से वादा किया था कि वह उसके लिए पहाड़ काट कर रास्ता बना देगा उसी तरह उसने भी दशरथ से वादा किया था कि चाहे जो हो जाए, इस परिवार का बोझ तुम पर नही आने दूंगी।यह सोंच कर उसकी आंख भर आई कि अब कल क्या होगा। बार बार उसके जेहन में जितिया बाबा की मौत का चित्र उपस्थित हो जाता ।
उसके सिर का चक्कर बहुत तेज होता जा रहा था।
रोज वह बच्चो को थोड़ा देर से खिलाती थी, महज इसलिए कि रोज वे चार बार खाते थे अब दो बार खाने लगे थे। बच्चों को बुलाकर खिला दिया और चावल देखा तो बस दशरथ के खाने भर था। उसे कमरे में ले गई और छिपाकर रख दिया। चुप चाप बैठ गई । बुधुवा दौड़ता आया और पिंजरी से चिपक गया। दूसरे पल अलग हुआ-अरे मां तुमको तो बुखार है। देह भाथी जैसा जल रहा है।
पिंजरी को बुखार की जरा भी परवाह नहीं थी ।
उसके सिर का चक्कर और तेज हो गया। लगा कि पूरा छप्पर गोल गोल घुमकर नाच रहा है। मन जाने कैसा तो होने लगा। वह जाकर बिस्तर पर लेट गई और बुधुआ से रमिया भाभी को बुलाने के लिए कहा ।बुधुआ दौड़ा दौड़ा गया तो रमिया आ गई। रमिया के आने के बाद पिंजरी अपने आप पर काबू नहीं रख सकी और रो पड़ी।रमिया ने उसका हाल देखा और हतप्रभ रह गई।
महज दो घंटों में पिंजरी की आंखो के नीचे काला गड्ढा पड़ गया था और चेहरा पूरा पीला पड गया था। वह पिजरी थी ही नहीं जिसे रमिया भाभी ने सुबह तक देखा था-अरे का हो गया तुमको ।
रमिया तेजी से आगे बढी और पिंजरी का माथा छू लिया-अरे बाप देह मे तो जैसे आग लगी हुई है।
उसने बुधुआ से कहा-पानी ले आ
बुधुआ जल्दी से पानी ले आया और रमिया अपना आंचल भीगाकर उसके सिर के आस पास पोछने लगी ताकि उसका बुखार उतर जाय । बुधुआ को मुखिया के पास जाकर दशरथ को बुलाने को कहा। पिंजरी की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी और रमिया समझ नही पा रही थी कि क्या करे। पिंजरी ने जैसे कराहते हुए कहा-दशरथ को बुलवा दो दीदी...
रमिया ने कहा-घबरा मत बुधुवा गया है... आता ही होगा दशरथ
मगर पिंजरी ने नही सुना।
अपनी रौ में दशरथ को बुलवा दो दीदी... कहती रही और एकाएक बेहोश हो गई।बेहोशी में भी लगातार दशरथ दशरथ बड़ बड़ा रही थी।
रमिया भाभी ने देखा कि पिंजरी के दांत चढ गये हैं। तुरत उसने पिंजरी के कान में मुंह लगा कर फ़ूंक मारना आरम्भ किया। तीसरे फ़ूंक के बाद पिजरी का मुंह भक से खुल गया और वह होश में आ गयी।
होश में आते ही पूछा-दशरथ आया कि नही।
रमिया ने कहा-आ जाएगा, जल्दी आ जाएगा... तू चिन्ता मत कर
पिंजरी की आंख से आंसू की एक रेखा अविरल प्रवाहित होने लगी-नही आएगा दीदी...
आएगा ज़रुर आएगा।
पिंजरी ने रमिया का हाथ पकड लिया और कहा-दीदी दशरथ के लिए खाना बनाकर रख दिया है आए तो जरूर खिला देना ।
इतना कहने के बाद पिंजरी इस तरह सांस लेने लगी जैसे उसकी सांस उखड रही हो- दीदी...आप से कहा था न मैने, जिस दिन मेरे हाड़ी का चावल खतम हो जाएगा उस दिन मैं जिन्दा नहीं बचूंगी। मेरी हांडी का चावल खतम हो गया है दीदी...
रमिया समझ रही थी कि पिंजरी की आवाज में गति नहीं थी एक ठहराव था वह बहुत सम्भल सम्भलकर बोल रही थी ।
जो बनाकर रखा है खिला देंगी न...मेरे दशरथ को
जिस वक्त अपने जीवन की पूरी विकलता के साथ पिंजरी यह बात रमिया से कह रही थी दशरथ पीछे आकर खड़ा हो गया था।
रमिया ने कहा-हां हां खिला दूगी । तू घबराती क्यो है सब ठीक हो जाएगा।
अचानक उसकी नज़र दशरथ पर पडी और उत्साहित होकर कहा-देख तेरा दशरथ आ गया । आ दशरथ तू ही समझा इसे ।
सामने का दृष्य देखकर दशरथ की भी आंखे भर आयी थी वह सीधे पिंजरी के सिरहाने आ गया और उसके सिर को अपनी गोद में ले लिया -तू काहे घबराती है रे सब ठीक हो जाएगा।
दशरथ के गोद में सिर रखे पिंजरी ने दशरथ को देखा।
हल्के से मुस्काई और एक टक उसे ऐसे देखते रही जैसे आखिरी बार देख रही हो ।
दशरथ से रहा नहीं गया बोल पड़े-काहे परेशान होती हो सब ठीक हो जाएगा।
पिंजरी के भीतर जाने कहां से ताकत फ़ूट पड़ी-अब ठीक नहीं होगा दशरथ ...। अब कुछ ठीक नहीं होगा।
पिंजरी के हाथ दशरथ के चेहरे की ओर बढ गये-मुझे माफ कर देना... दशरथ, मैं अपना वादा नहीं निभा पायी। बहुत कोशिश की निभाने की... मगर हार गई
इस बार उसने रमिया भाभी की ओर देखा-भाभी हड़िए में भात रखा है और कटोरे में माड... अब कभी दशरथ के लिए खाना बनाने नहीं आऊंगी..मेरे हाथ का बना आखिरी खाना दशरथ को जरूर खिला देना ।
खिला दूंगी-कह कर रमिया भाभी रोने लगी।
इसके बाद पिंजरी की आंखे किसी और दिशा मे मुड़ी और उसने दशरथ की गोद मे दम तोड़ दिया।
पिंजरी की मौत की खबर पूरे गांव में पसर गई।
देखते देखते पिंजरी को देखने के लिए गांव के लोगों की भीड लग गई। लोग जब वहां पहुंचे तो देखा कि बरामदे में ढेंकी के समानान्तर पिंजरी की लाश पडी थी। लाश से लिपट कर बुधुवा और शनिचरी रो रहे थे। पिंजरी की डेढ साल की बच्ची रमिया भाभी की गोद में थी और दशरथ पिंजरी की लाश की बगल में बैठे उसके हाथ का बना मांड और भात इस तरह खा रहे थे जैसे और कोई नही पिंजरी उन्हे बैठ कर खिला रही हो...।
बाहर कोई चिल्ला रहा था कि गांव के माझी टोल के लोग मुखिया के घर को लूट रहे हैं।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

शंकर दयाल सिंह जी की स्मृति में राजभाषा पुरस्कार


28 July 2012 at 14:41
देश भर के लगभग एक दर्जन सरकारी उपक्रमों ने साहित्यकार-सांसद स्वर्गीय शंकर दयाल सिंह जी की स्मृति में राजभाषा पुरस्कार / सम्मान योजना की शुरुआत करने का निर्णय लिया है. स्वर्गीय सिंह संसदीय राजभाषा समिति के उपाध्यक्ष थे और इसकी तीसरी उपसमिति के संयोजक भी. इस नाते देश भर के सरकारी उपक्रमों से उनका गहरा रिश्ता था और इन उपक्रमों में राजभाषा के कार्यों को गति देने में उनका बड़ा योगदान रहा था. उनकी प्रेरणा से ही अनेको लोक उपक्रमों में हिंदी पत्रिकाएँ शुरू हो सकी थी.
भारत सरकार के भारी उद्योग और लोक उद्यम मंत्रालय ने सभी सरकारी उपक्रमों को पत्र लिख कर स्वर्गीय शंकर दयाल सिंह जी के ७५वे सालगिरह के उपलक्ष्य में इस कर्मठ हिंदीसेवी की स्मृति में ऐसी योजना चलाने की सलाह दी थी जिससे कि सरकारी कर्मचारियों को राजभाषा में कार्य करने की प्रेरणा मिल सके. स्वर्गीय शंकर दयाल सिंह जी का मानना था कि हम अपनी भाषा को छोड़ कर सार्वजनिक, सरकारी अथवा व्यक्तिगत कार्यों में हिंदी का प्रयोग न करें, तभी भारत बच सकेगा अन्यथा वह अपनी अस्मिता खो देगा. वह सरकारी हिंदी को बोलचाल की हिंदी के समान बनाना चाहते थे और भाषा में किसी भी तरह के आडम्बर के खिलाफ थे.
जिन लोक उपक्रमों ने अपने-अपने यहाँ ऐसी योजना लागू कर दी है उनमे प्रमुख हैं स्टेट ट्रेडिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया (नई दिल्ली), ड्रेजिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (विशाखापत्तनम), एचएल लाइफकेयर लिमिटेड (तिरुवनंतपुरम), एनएचडीसी (भोपाल), भारतीय कंटेनर निगम लिमिटेड (नई दिल्ली), पीईसी लिमिटेड (नई दिल्ली) तथा भारत संरचना वित्त कंपनी लिमिटेड (नई दिल्ली). इन सभी ने राजभाषा में प्रशंसनीय कार्य के लिए अपने किसी एक कर्मी को शंकर दयाल सिंह स्मृति सम्मान / पुरस्कार देने की घोषणा की है. ये पुरस्कार हर वर्ष हिंदी दिवस पर दिए जायेंगे.
इनके अलावा भारत प्रतिभूति मुद्रण एवं मुद्रा निर्माण निगम ने राजभाषा में प्रशंसनीय कार्य करने वाली इकाई के लिए शंकर दयाल सिंह चल वैजयंती आरम्भ किया है. इस के साथ ही वह अपने किसी एक कर्मी को शंकर दयाल सिंह स्मृति प्रशस्ति पत्र तथा नगद पुरस्कार भी देगा. इसी तरह नेशनल सीड्स कारपोरेशन लिमिटेड ने अखिल भारतीय स्तर पर अपने कर्मियों के बीच शंकर दयाल सिंह स्मृति निबंध प्रतियोगिता का शुभारंभ किया है.
यह पहला अवसर है जबकि किसी हिंदी सेवी के सम्मान में इतने व्यापक स्तर पर पुरस्कार योजनाएं शुरू की गई हों. इस वर्ष शंकर अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर आयोजन समिति का गठन किया गया है, जिसके अध्यक्ष सम्माननीय डॉक्टर कर्ण सिंह जी हैं. अब तक दिल्ली के अलावा गोवा, इंदौर तथा औरंगाबाद (बिहार) में क्रमशः शंकर अमृत महोत्सव समिति, गोमांतक हिंदी विद्यापीठ, श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति तथा शंकर अमृत महोत्सव उपसमिति (औरंगाबाद) के तत्वावधान में इसके कार्यक्रम आयोजित हो चुके हैं. एक कार्यक्रम राष्ट्रपति भवन में महामहिम (पूर्व) राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटील के सान्निध्य में भी हो चुका है. शंकर अमृत महोत्सव नई दिल्ली में २७ दिसम्बर २०११ को स्वर्गीय सिंह के ७५वे जन्मदिन से शुरू हुआ था और २७ दिसम्बर २०१२ तक चलेगा.

रविवार, 29 सितंबर 2013

राष्ट्रीय सेमिनार व कार्यशाला (20-21 सितंबर, 2013)




23 August 2013 at 20:44
राष्ट्रीय सेमिनार व कार्यशाला (20-21 सितंबर, 2013) 
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा महाराष्ट्र

हिंदी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया पर आधारित राष्ट्रीय विचारगोष्ठी की तारीख तय कर ली गयी है। यह सेमिनार 20-21 सितंबर, 2013 को आयोजित होगा। इस सेमिनार के प्रस्तावित प्रारूप का संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत है:
  • हिंदी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया पर आधारित राष्ट्रीय विचारगोष्ठी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा आयोजित की जा रही है।
  • सेमिनार स्थल वर्धा विश्वविद्यालय का प्रांगण होगा, जो महाराष्ट्र में नागपुर से सत्तर किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
  • इस बार जिस विषय पर चर्चा होगी वह है- सोशल मीडिया के बढ़ते प्रयोग के बीच हिंदी ब्लॉगिंग की प्रास्थिति। (Status of Hindi Blogging vis-a-vis Rise of Social Media.
  • कार्यक्रम में देश भर के नामचीन ब्लॉगर्स, मीडिया विशेषज्ञों, तकनीकी जानकारों व हिंदी ब्लॉगिंग में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के बीच निम्नलिखित महत्वपूर्ण और गंभीर मुद्दों पर तीन सत्रों में चर्चा करायी जाएगी- 
    1. ब्लॉग, फेसबुक, ट्विट्टर की तिकड़ी एक दूसरे के विकल्प हैं या पूरक। इनमें आपसी प्रतिद्वंद्विता के परिणाम स्वरूप एक-दूसरे को पछाड़ने की प्रवृत्ति है या इनका एक सकारात्मक सह-अस्तित्व बना रहेगा।
    2. हिंदी ब्लॉगों और सोशल मीडिया पर जो लिखा जा रहा है उसमें क्या साहित्यिक कोटि की सामग्री भी है? ब्लॉग पोस्ट की सामग्री स्थापित साहित्यिक/ गैर साहित्यिक विधाओं को प्रस्तुत करने का एक माध्यम भर है या यह स्वयं में एक नयी विधा है। जिस प्रकार साहित्य के विकास के लिए उसका आलोचना शास्त्र विकसित हो चुका है वैसे ही ब्लॉग पर प्रकाशित विविध सामग्रियों के मूल्यांकन व पहचान के लिए क्या कोई कसौटी तैयार की जा सकती है?
    3. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रयोग को देखते हुए लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों, संस्थानों व राजनैतिक सामाजिक जीवन जीने वाले व्यक्तियों ने इससे जुड़कर अपनी बात प्रसारित करना शुरू कर दिया है। देश के राजनैतिक परिदृश्य में सोशल मीडिया की भूमिका कैसी है और इसके क्या आयाम हैं इसपर भी चर्चा होगी।
    4. पत्रकारिता और जनसंचार संबंधी पाठ्यक्रमों में ब्लॉगिंग के विषय को अध्ययन के लिए जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि इस पाठ्यक्रम को पूरा करके निकलने वाले सभी विद्यार्थी पत्रकार या अन्य प्रकार के प्रसारक बनने का व्यवसाय चुनते हैं। इनमें से कोई भी अपना ब्लॉग और फेसबुक/ ट्विट्टर एकाउन्ट खोले बिना नहीं रह सकता।
  • इस अवसर पर आमंत्रित अतिथियों द्वारा अध्ययन पत्र पढ़े जाएंगे और उनपर खुली बहस होगी।
  • हिंदी ब्लॉगिंग को अंतर्जाल प्रयोक्ताओं के लिए सुलभ और लोकप्रिय बनाने के लिए एक समुन्नत ब्लॉग एग्रीगेटर की महती आवश्यकता है। अब बंद हो चुके ‘ब्लॉगवाणी’ व ‘चिठ्ठाजगत’ जैसे संकलक विकसित करने वाले तकनीकी विषेषज्ञों के सहयोग से एक ऐसा एग्रीगेटर हिंदी विश्वविद्यालय की वेबसाइट के माध्यम से प्रारंभ करने की कोशिश की जा रही है जो इस आवश्यकता को पूरा कर दे। इसके लिए सभी सुधी जनों से ठोस सुझाव आमंत्रित हैं।
  • दो दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन अनुभवी विशेषज्ञों के माध्यम से एक कार्यशाला आयोजित कर हिन्दी चिठ्ठाकारी के तकनीकी कौशल और ब्लॉग प्रबन्धन के उपयोगी सूत्र इच्छुक विद्यार्थियों और अन्य पंजीकृत अभ्यर्थियों  को सिखाये जाएंगे।
  • कार्यशाला में प्रतिभाग के इच्छुक अभ्यर्थियों को निर्धारित प्रारूप पर सूचना प्रेषित करते हुए अपना पंजीकरण कराना होगा। पंजीकरण का कार्य सामान्यतः पहले आओ-पहले पाओ नियम के आधार पर किया जाएगा। निर्धारित संख्या पूरी हो जाने पर पंजीकरण का कार्य कभी भी बन्द किया जा सकता है।
  • प्रत्येक पंजीकृत अभ्यर्थी को रु. १००/- मात्र पंजीकरण शुल्क कार्यशाला प्रारम्भ होने से पहले जमा करना होगा। इसे वि.वि. के नाम से रेखांकित बैंक ड्राफ़्ट प्रेषित करते हुए अथवा वि.वि. के काउण्टर पर सीधे नकद जमा किया जा सकता है।
  • पंजीकृत अभ्यर्थियों को उनके पंजीकरण के सम्बन्ध में सूचना उनके द्वारा बताये गये ई-मेल पते पर भेंजी जाएगी। पूर्ण रूप से भरे गये पंजीकरण फॉर्म डाक द्वारा अथवा ई-मेल द्वारा सीधे विश्वविद्याल में श्री जगदीप सिंह डांगी- एसोसिएट प्रोफेसर को प्राप्त कराये जा सकते हैं।
  • एतद्‌ द्वारा प्रस्तावित विषय के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन पत्र आमन्त्रित किए जा रहे हैं। आशा है हमारे सुधी ब्लोगर्स इस विषय पर अपने विचारों को सुव्यवस्थित ढंग से लिपिबद्ध करके पूरी तैयारी से आएंगे और इस सम्मेलन को एक गम्भीर बहस का मंच बनाएंगे। यदि आप अपनी प्रस्तावित विषयवस्तु की जानकारी पहले से उपलब्ध करा दें तो हमें वार्ताकार और विषय के अनुसार कार्यक्रम निर्धारित करने में सुविधा होगी। अंतिम समय में किसी प्रकार की आकस्मिक प्रस्तुति के प्रस्ताव पर विचार किया जाना सम्भव नहीं होगा। प्रथम आगत-प्रथम स्वागत का सिद्धान्त भी हमारा मार्गदर्शन करेगा।
  • सम्मेलन में विश्वविद्यालय द्वारा आमन्त्रित प्रतिभागियों को आने-जाने हेतु अधिकतम ए.सी. तृतीय श्रेणी के किराये और वर्धा में ठहरने व भोजन इत्यादि की व्यवस्था वि.वि. द्वारा की जाएगी।
  • संयोजक से सम्पर्क का पता:
          सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
          मोबा.08765923780
          ई-मेल: sstwardha@gmail.com
                    sstripathi3371@gmail.com
  • आयोजन तिथि दुबारा नोट कीजिए- 20-21 सितंबर, 2013 (शुक्रवार- शनिवार)
आशा है कि यह सम्मेलन एक बार फिर हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया में निरंतर हो रही प्रगति का साक्षी बनेगा और यहाँ होने वाला विचार मंथन हिंदी चिठ्ठाकारी की दिशा बताने वाला एक मील का पत्थर साबित होगा। सेमिनार के संबंध में आपके सुझाव हमारा अमूल्य मार्गदर्शन कर सकते हैं। इस आयोजन पर आपकी  टिप्पणियों, ई-मेल संदेशों व फोन के माध्यम से  आपके सुझावों व रचनात्मक विचारों का स्वागत है।
-संयोजक
  • Vinod Vishwakarma Shubhkamnayen.
  • Jaikumar Jha वाह क्या बात है ....See Translation
  • Jaikumar Jha इस कार्य शाला में भयंकर सामाजिक असमानता तथा धन कुबेरों का धन सूअर बन जाने की हवस को वेब मिडिया व ब्लॉग कैसे कम करने में अहम् भूमिका निभा सकता है इस विषय पर भी चर्चा हो तो ठीक रहेगा ...See Translation
  • DrKavita Vachaknavee ढेरों शुभकामनाएँ। फिर एक बड़ी लकीर ! .... और रह जाएँगे पीछे लकीर पीटने वालेSee Translation
  • Praveen Trivedi उम्मीद है कि ....... एक बड़ी बहस होगी .....पढने और सुनने को मिलेगी!See Translation
  • Hemant Kumar सिद्धार्थ जी ये तो आपने एक अच्छी खबर सुनायी----आब ये जरूर है कि इसमें हिन्दी ब्लागिंग और सोशल मीडिया से जुड़े कौन कौन से महारथी पहुंचेंगे या किन्हें महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय निमन्त्रित करने योग्य समझेगा----कार्यक्रम की सफ़लता के लिये अग्रिम शुभकामनाएं स्वीकारिये।See Translation
  • सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी Hemant Kumar इस सेमिनार ने सबको खुला अवसर दिया है इसमें भाग लेने के लिए। बस पहला कदम हमने बढ़ाया है। दूसरा कदम आपको बढ़ाना है। जी हाँ, आपको भी अवसर मिल सकता है। अपनी रुचि तो व्यक्त कीजिए। दिये गये विषयों में से किसी एक पर अपने विचार आलेख-बद्ध करके भेज दी...See More
  • प्रमेन्द्र प्रताप सिंह हिंदी के उत्थान में कुछ नए प्रयास आयेगे तो अच्छा होगा..
  • Suresh Chiplunkar समस्त शुभकामनाएँ... आयोजन सफल होगा विश्वास है. पिछले सेमीनार की मधुर यादों के साथ हम भी लाईव रिपोर्टिंग अपने पीसी पर देखेंगे ही...

सोमवार, 23 सितंबर 2013

रामधारी सिंह दिनकर की याद में




जब से पढ़ना सीखा है तब से इनकी कविता प्रिय रही, समझने लगा तो सबसे प्रिय हो गई। पढ़ते ही याद हो जाना इनकी कविताओं का सहज गुण है।
आज राष्ट्रकवि की जयंती है तो इनकी एक कविता आप सबको भी पढ़वानी बनती है।

जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है
भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है
वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है

उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है
तलवार प्रेम से और तेज होती है!

छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है
मरता है जो एक ही बार मरता है

तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे!

स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है

वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे!
See translation

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

गजल / सारिका चौधरी


देखो हम कुछ नहीं बोलेंगे .....देखो हम कुछ नहीं बोलेंगे
आँखों आँखों में तोलेंगे ....पर मुंह से कुछ नहीं बोलेंगे

चाहे चीनी सैनिक आ जाएँ ....और हमको आँख दिखा जाएँ
ये देश है देखो हिजड़ों का ...ये सोच के सड़क बना जाये

वो सूअर का बच्चा पाकिस्तान ...जब तब देखो घुस आता है
धोखे से मेरे वीरों के ...सिर अलग -थलग कर जाता है

रोते हैं कितने देश भक्त ....आसूँ हो गये हैं जैसे रक्त
क्या करें की कैसे ले बदला ...यहाँ युवा हैं अपने में ही मस्त

सोयी पड़ी दस जनपथ है .... ये धरती खून से लथपथ है
पर मौनी कुछ नहीं बोलेगा ...आँखों - आँखों में तोलेगा

ना नेता अब कुछ बोलेंगे ...वो अपने वोट को तोलेंगे
क्यूँ मरे गिरों की बात करें ....तब तक वो चैन से सो लेंगे

मेरे देश भक्त मेरे वीरों से ....नेता के बच्चे अच्छे हैं
सिर कट गये तो कट जाने दो ..... क्या वो दस जनपथ के बच्चे हैं

अब समझ गयी है दुनिया भी ....भारत में हिजड़े बसते हैं
चाहे कितने जूत बजा जाओ ...ये बेशर्मों से हँसते हैं

अब तो आवाज़ उठानी है ....बड़ी दूर तलक पहुंचानी है
नेता की तरफ नहीं देखो ....इस जाति में ही बेईमानी है

चीनी संसद में घुस जाएगा ....फिर इतना वो भुस भर जाएगा
वो पाक सूअर भी आयेगा ...और मुंह पर मूत के जाएगा

और संसद सर झुकाएगा .... उनके सम्मान में गायेगा
सज रही गली मेरी अम्मा ...सुनहरे गोटे में
सज रही गली मेरी अम्मा ..... सुनहरे गोटे में .................

सारिका चौधरी

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...