मंगलवार, 31 मार्च 2020

महामारी / लेखक के नाम का उल्लेख नहीं है।



^महामारी^
~~~~~~
एक बार एक राजा के राज्य में महामारी फैल गयी। चारो ओर लोग मरने लगे। राजा ने इसे रोकने के लिये बहुत सारे
उपाय करवाये मगर कुछ असर न हुआ और लोग मरते रहे। दुखी राजा ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। तभी अचानक आकाशवाणी हुई। आसमान से आवाज़ आयी कि हे राजा तुम्हारी राजधानी के
बीचो बीच जो पुराना सूखा कुंआ है अगर
अमावस्या की रात को राज्य के प्रत्येक
घर से एक – एक बाल्टी दूध उस कुएं में
डाला जाये तो अगली ही सुबह ये महामारी समाप्त हो जायेगी और
लोगों का मरना बन्द हो जायेगा।
राजा ने तुरन्त ही पूरे राज्य में यह
घोषणा करवा दी कि महामारी से बचने के लिए अमावस्या की रात को हर घर से कुएं में एक-एक बाल्टी दूध डाला जाना अनिवार्य है । अमावस्या की रात जब लोगों को कुएं में दूध डालना था उसी रात राज्य में रहने वाली एक चालाक एवं कंजूस बुढ़िया ने सोंचा कि सारे लोग तो कुंए में दूध डालेंगे अगर मै अकेली एक
बाल्टी "पानी" डाल दूं तो किसी को क्या पता चलेगा। इसी विचार से उस कंजूस बुढ़िया ने रात में चुपचाप एक बाल्टी पानी कुंए में डाल दिया। अगले दिन जब सुबह हुई तो लोग वैसे ही मर रहे थे। कुछ
भी नहीं बदला था क्योंकि महामारी समाप्त नहीं हुयी थी। राजा ने जब कुंए
के पास जाकर इसका कारण जानना चाहा तो उसने देखा कि सारा कुंआ पानी से भरा हुआ है।
दूध की एक बूंद भी वहां नहीं थी।
राजा समझ गया कि इसी कारण से
महामारी दूर नहीं हुई और लोग
अभी भी मर रहे हैं।
दरअसल ऐसा इसलिये हुआ
क्योंकि जो विचार उस बुढ़िया के मन में
आया था वही विचार पूरे राज्य के
लोगों के मन में आ गया और किसी ने
भी कुंए में दूध नहीं डाला।
मित्रों , जैसा इस कहानी में हुआ
वैसा ही हमारे जीवन में
भी होता है। जब
भी कोई ऐसा काम आता है जिसे बहुत सारे
लोगों को मिल कर करना होता है
तो अक्सर हम अपनी जिम्मेदारियों से यह
सोच कर पीछे हट जाते हैं कि कोई न कोई तो कर ही देगा और
हमारी इसी सोच की वजह से
स्थितियां वैसी की वैसी बनी रहती हैं।
अगर हम दूसरों की परवाह किये बिना अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने लग जायें तो पूरे देश में भी ऐसा बदलाव ला सकते हैं जिसकी आज हमें ज़रूरत है।
               
                🙏Jai Mata Di🙏

कुछ कथा - कविताएं




: ए गमे दिल क्या करूँ


रवि अरोड़ा

असरार उल हक़ यानि मजाज़ लखनवी मेरे पसंदीदा शायरों में से एक हैं । बेबसी से उपजे आक्रोश को उनसे बेहतर शायद ही कोई शायर व्यक्त कर सका होगा । मशहूर फ़िल्मी गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख़्तर के मामा और जानिसार अख़्तर के साले मजाज़ साहब की एक मशहूर नज़्म है- ए गमे दिल क्या करूँ , ए वहशते दिल क्या करूँ । सन 1953 में फ़िल्म ठोकर के लिए इसे तलत महमूद ने गाकर अमर कर दिया । हताशा में आदमी क्या कुछ सोचता है और किस किस का दामन चाक कर देना चाहता है , इस  ख़याल को अदबी दुनिया में शायद यह नज़्म ही पहली बार लाती है । यह नज़्म पिछले पाँच दिनो से मेरे भी दिलो दिमाग़ पर तारी है । बेशक मजाज़ साहब की तरह मैं नहीं कह सकता कि मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने , सैकड़ों सुल्तान-ए-जाबिर हैं नज़र के सामने ,सैकड़ों चंगेज़ ओ नादिर हैं नज़र के सामने । मगर मन का भाव तो कुछ एसा ही है । अब देखिये न कोरोना के आतंक के चलते अपने अपने घर लौटने को सड़कों पर उतरे ये लाखों लोग क्या आसमान से आ गये ? ये लोग दिल्ली एनसीआर में आख़िर कहीं तो रहते होंगे ? इनका कोई तो मकान मालिक होगा, कोई तो होगा जिसकी नौकरी ये लोग बजाते थे , कोई तो पड़ोस में रहता होगा ? क्या एसा कोई नहीं था जो हाथ पकड़ कर इन्हें रोक लेता और कहता कि कहाँ जाते हो , संकट में हम तुम्हें यूँ अकेला कैसे छोड़ दें ?

सरकारों को गाली देते देते कभी कभी ख़ुद को गरियाने का भी मन करता है । हम किसी सरकार से कम निकम्मे हैं क्या ? सरकारें तो हमेशा भिखमँगा समाज ही चाहती हैं । एसे लोग ही सत्ता तक पहुँचते हैं जो तमाम शक्तियाँ अपनी मुट्ठी में रखने का ख़्वाब देखते हैं । समाज नपुंसक हो यही इनकी सबसे बड़ी ख़्वाहिश होती है । मगर क्या सारा दोष इन्हीं लोगों का है , हमारी क्या कोई भूमिका नहीं ? इन्हें इतनी ताक़त दी किसने ? याद तो कीजिये एक दौर में सरकारों को कोई पूछता तक नहीं था । सत्ता में कौन नेता आया और कौन गया, लोगों को पता भी नहीं होता था । हर गाँव की अपनी एक व्यवस्था थी जिसमें किसी सरकार की कोई भूमिका ही नहीं होती थी । मगर आज क्यों ये लोग हमारे माई बाप हो गये और हर बात पर हम इनका मुँह ताकते हैं ? क्या सब कुछ यही लोग करेंगे , हमारी कोई भूमिका नहीं ? ये जो लाखों लोग सड़कों पर भूखे प्यासे उतरे , ये कौन थे ? अवश्य ही इनमे कोई हमारा ड्राईवर होगा , हमरे घर में चौका-बर्तन करने वाली बाई होगी, हमारी दुकान का छोटू होगा अथवा हमारी फ़ैक्ट्री का कोई कर्मचारी होगा ।  यक़ीनन हमने उन्हें हाथ पकड़ कर नहीं रोका और उन्होंने हमसे विदा लेने का फ़ैसला लिया ।
इंसान का जीवन ख़ुशहाल बनाने को सारी दुनिया में माथापच्ची हुई । सत्ता किस तरह संचालित हो और किसके हाथ में हो इस पर सदियों तक तजुर्बे हुए और फिर लोगबाग़ इस नतीजे पर पहुँचे कि लोकतंत्र ही सबसे बेहतर तरीक़ा है । शुक्र है कि हमने भी लोकतंत्र का मार्ग चुना मगर क्या यही लोगतंत्र है ? जिसमें लोक की कोई भूमिका ही न हो और पाँच साल में एक बार वोट देने के अतिरिक्त उसका कोई दायित्व ही न हो ? कैसा समाज गढ़ लिया है हमने अपना जिसमें हमारी कोई ज़िम्मेदारी ही नहीं और अपने निजी दुःख सुख के लिए भी हम सरकार की ओर मुँह उठा कर देखते हैं ? बुरा मत मानिये हालात यही रहे तो समाज से कई मजाज़ फिर उठ खड़े होंगे और कहते फिरेंगे- बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ ,उसका गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ , तख़्त-ए-सुल्ताँ क्या मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ । ए गमे दिल क्या करूँ , ए वहशते दिल क्या करूँ ।।



*गाजियाबाद शहर की स्थिति:-*

*पुलिस खड़ी है डगर डगर।*
*तुम ना जाना विजय नगर।।*

*मिलेगा बस.. डंडों का फाइन*
*पहुँच ना जाना, पुलिस लाइन ।।*

*लट्ठ सज़ा रखे हैं : हर मोड़ पर।*
*निकलो तो सही..चौधरी मोड़ पर।।*

*मार मार के कर देंगे, तबियत हरी।*
*घूमना मत तुम, कालका गढ़ी ।।*

*तुम्हे उठा के पटक देंगे :  धड़ाम।*
*जो ग़लती से पहुचे तुम - नन्दग्राम ।।*

*ना पैदल निकलो. ना मचाना गदर।*
*पड़ेंगे लट्ठ अगर दिखे, रामनगर।।*

*मारमार कर सुजा देंगे हाथ पांव।*
*जो बेवजह पहुंच जाओगे, कोटगाँव ।।*

*इतना पिटोगे कि ना उठ पाओगे कल।*
*बस ग़लती से जाकर देखो संतोष मेडिकल।।*

*लट्ठ भी पड़ते है और जाता है खचेडा *
*ग़लती से पहुँच मत जाना डुण्डाहेडा ।।*

*डर रहा है आदमी काँप रहा थर-थर  ।*
*जो भूल के पहुंच गया है,घण्टाघर ।।*

🙏🏻🙏🏻



*इसलिये, मित्रों : घर पर बैठने मे ही शराफ़त है,*

राधास्वामी

सोमवार, 30 मार्च 2020

सरस सरल सुगम सुंदर उक्तियां







प्रस्तुति - कृति /सृष्टि /दृष्टि /अम्मी और मेहर

😷🧴😷🧴🧴



*रेस चाहे गाड़ियों की हो या ज़िंदगी की  ,  जीतते वही लोग हैं जो सही वक़्त पे गियर बदलते  है    ••*
                👉🏻    *शायद*     👈🏻


🧴😷🧴😷🧴😷🧴😷🧴😷🧴😷🧴😷

*👌

पुराने लोग भावुक थे,*
*तब वो संबंध को संभालते थे।*

*बाद मे लोग प्रॅक्टिकल हो गये*
*तब वो संबंध का फायदा उठाने लग गए।*

*अब तो लोग प्रोफेशनल हो गए*
*फायदा अगर है तो ही संबंध बनाते है*
          ..🌹सुप्रभात 🌹


🙏🏼🌺🙏🏼🌺🙏🏼🌺🙏🏼🌺🙏🏼


*जिन्दगीं को देखने का*
              *सबका*
*अपना अपना नजरिया होता है*

*कुछ  लोग  भावना  में  ही*
*दिल की बात कह देते है,*
              *और...*
   *कुछ  लोग  गीता  पर  हाथ*
   *रख कर भी सच नहीं बोलते*

* Good Morning *


*वक्त नाजुक है ,*
*संभल कर रहिये ,*
*ये युद्ध थोड़ा अलग है ,*
*अलग थलग रहकर लड़िये।*

*दुश्मन इतना सूक्ष्म है ,*
*जो दिखाई भी नहीं देता ,*
*हराने का अचूक अस्त्र ,*
*हर जगह साफ़ सफाई रखिये।*

*संकट भारी है ,*
*लेकिन गुजर जायेगा ,*
*संयम और धैर्य से ही ,*
*इस दुश्मन को हराया जायेगा।*

*खुद बचेंगे ,*
*दूसरे खुदबखुद बचेंगे ,*
*इस लड़ाई में अब ,*
*यत्र सर्वत्र सबका सहयोग चाहिये


😊


आत्मप्रेम
कोई मामूली बात नहीं है।
आत्मप्रेम जीवन में
बड़े सौभाग्य से घटित होता है।
आत्मप्रतिरोध,अहंकार है।
सर्वत्र आत्मप्रतिरोध की शिक्षा है।
इसलिए आत्मप्रेम करने और
इसके लिए प्रोत्साहित करनेवाले को,
अपना परम हितैषी समझना चाहिए।
आत्म प्रेम, प्रेम का सर्वोपरि रुप है।
यही भेद रहित सर्वव्यापी प्रेम है।
पूरी तरह से इसमें डूब जाइये।
आत्मा का आनंद स्वयँ प्रकट हो जायेगा,
ढूंढना नहीं पड़ेगा।
ऐसा आदमी जहाँ भी होगा
आनंद ही बिखेरेगा
हरि ओम

🙏


 🍃🌾🌾

        *30 March 2020*
    *🍁 आज की प्रेरणा 🍁*

दूसरों के द्वारा यदि आप अपना आदर चाहते हैं तो पहले दूसरों का आदर करें।

👉 *आज से हम* सभी का आदर करें...

🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃

*#वज़न तो सिर्फ हमारी*
*इच्छाओं का है,*
*बाकी #ज़िन्दगी तो बिल्कुल*
*#हल्की फुल्की ही है*

*#जय जिनेन्द्र*👍🙏🏻
[30/03, 09:15] anami sharan: *

🙏🏻🙏🏻सुबह का प्यारभरा वंदन🙏🏻🙏🏻*



*वो कागज की दौलत ही क्या*
           *जो पानी से गल जाये और*
             *आग से जल जाये*

         *दौलत तो दुआओ की होती हैं*
            *न पानी से गलती हैं*
              *न आग से जलती हैं...*                                                                                                   
         *आनंद लूट ले बन्दे,*
           *प्रभु की बन्दगी का।*
             *ना जाने कब छूट जाये,*
               *साथ जिन्दगी का।।*
 
*"ईश्वर से मेरी एक ही प्रार्थना है..*
*"महंगी घड़ी" सबको दे देना* !
         *लेकिन.....*
*"मुश्किल घड़ी" किसी को न  देना*

       *🌹🌹सुप्रभात🌹🌹*

*🌺🌺आपका दिन मंगलमय हो🌺🌺*




_*रिश्तों*_
_*को जोड़े रखने के लिए...*_

_*कभी*_
_*अंधा,*_
_*कभी गुंगा,*_
_*और कभी बहरा होना पड़ता है...*



मौजूदा हालात पर कुछ कहने की कोशिश...
*उनके माथे पे बोझ और पांव में छाले है*
*हां वही लोग जो मेहनत से कमाने वाले है*

*कहां जाएंगे,क्या खाएंगे,क्या होगा*
*हाल सारा अब तो क़िस्मत के हवाले है*

*हालात से मजबूर पेशे से मजदूर*
*भूख और ग़रीबी ने पोसे और पाले है*

*रोटी की अहमियत क्या ख़ाक समझेंगें*
*जिनके पास ज़रूरत से ज़्यादा निवाले है*

*कान ना बहरे हो जाएं कहीं सुनकर*
*चाहे जिधर देखो बस दर्द है नाले है*

*चाल चली जाती हैं सोच समझ कर*,
*भीख के सिक्के भी वक़्त आने पे उछाले है*

*उनको अपना हक़ है क्यूं नहीं हासिल*,
*क्या हुआ?क्यूं ज़ुबां पे सबकी अब ताले है*
@अपर्णा


 💐*

*अभ्यास हमें बलवान बनाता है* ,
    *दुःख हमें इंसान बनाता है*,
  *हार हमें विनम्रता सिखाती है*,
              *जीत हमारे*
     *व्यक्तित्व को निखारती है*,
                  *लेकिन*
         *सिर्फ़ विश्वास ही है*,
                  *जो हमें*
    *आगे बढने की प्रेरणा देता है*.
              *इसलिए हमेशा*
  *अपने लोगों पर अपने आप पर*
         *और अपने ईश्वर पर*
      *विश्वास रखना चाहिए*

*🙏🏻शुभ प्रभात् 🙏🏻*


*आपका आज का दिन शुभ हो*



ना इलाज है ना दवाई है,*

*ए इश्क तेरे टक्कर की बला आई है...*
[31/03, 11:03] anami sharan: *शहरों का यूं विरान होना भी*,
*क्या गजब कर गया*
*सदियों से तन्हा पड़े घरों को*,
*जैसे आबाद कर गया*।।

🙏🙏🙏🙏🙏



*✍️छाछ में मक्खन हो तो कोई बाधा नहीं,लेकिन मक्खन में छाछ नहीं होनी चाहिए!*

 *कोयले में हीरा आ जाये तो कोई बाधा नहीं,लेकिन हीरा लेते हुए कोयला नहीं आना चाहिए!*

*जहर में मिलावट हो तो कोई बाधा नहीं,लेकिन मीठाई में जहर की मिलावट नहीं होनी चाहिये!*

*पानी में नाव हो तो कोई बाधा नहीं,लेकिन नाव में पानी नहीं होना चाहिये!*

*इसी तरह*
*संसार में रहते हुए प्रभु की याद आती है तो कोई बाधा नहीं,* *परंतु*
*प्रभु भक्ति में संसार की याद नहीं आनी चाहिए..!!*
            🌻🌻🌻🌻🌻🌻
*✍️विचारों को वश में रखिये*
    *"वो तुम्हारें शब्द बनेंगे"*
*शब्दों को वश में रखिये*
    *"वो तुम्हारें कर्म बनेंगे"*
*कर्मों को वश में रखिये*
    *"वो तुम्हारी आदत बनेंगे"*
*आदतों को वश में रखिये*
    *"वो तुम्हारा चरित्र बनेगा"*
*चरित्र को वश में रखिये*
  *"वो तुम्हारा भाग्य बनेंगे..!!*
  *🙏🏿🙏🏾🙏🏼जय जय श्री राधे*🙏🏽🙏🏻🙏




*🙏🏻🙏🏻सुबह का प्यारभरा वंदन🙏🏻🙏🏻*

*कोई तराज़ू नहीं होता*
 *रिश्तों का वज़न तोलने के लिए..*
 *परवाह बताती है, कि*
 *ख्याल का पलड़ा कितना भारी है ||*

      *रब ने सभी को*
*धनुष के आकार के होंठ दिये है......*
   *मगर इनसे शब्दों के बाण*
           *ऐसे  छोड़िये..*
*जो सामने वाले के दिल को छू जाये*
   *ना की दिल को छेद जाये*

*पहाड़ो पर बैठ कर तप करना सरल है...*
*लेकिन परिवार मे सबके बीच रहकर धीरज बनाये रखना कठिन है...*
*और यही तप है।*

*"अपनों में रहे, अपने मे नही"।*

        *🌹🌹सुप्रभात🌹🌹*

*🌺🌺आपका दिन मंगलमय हो🌺🌺*

*🌷🌷घर रहे और स्वस्थ रहे🌷🌷*


राधास्वामी
राधास्वामी
राधास्वामी
।।।।।।।।।




दोहा छंद / दिनेश श्रीवास्तव




           "अपना भारत देश"
            ----------------------


सभी स्वस्थ सानंद हों,ईश हरे त्रय ताप।
विकट समय है देश का,मिटे सभी संताप।-१

कभी अँधेरा था कहाँ,इतना बड़ा महान।
रोक सका है आज तक,होता रहा विहान।।-२

संचित भारत देश में,पुन्य प्रसून अगाध।
भष्म सभी होंगे यहाँ, इनसे शीघ्र निदाध।।३


ऋषि मुनियों की भूमि है,अति पवित्र यह देश।
इसके कण कण में भरा,जिजीविषा संदेश।।-४

धैर्य धरा धरती यहाँ,रत्नों की है खान।
पूरित करती है सदा,खान पान अनुपान।।-५

गंगा जल से है जहाँ, बनता अमृत योग।
रोग शोक शीतल करे,करता सदा निरोग।-६

देता हो जिस देश को,सूरज  दिव्य प्रकाश।
निश्चित ही होगा यहाँ, कृमि अणुओं का नाश।।-७

पवन जहाँ इस देश को,देता मलय समीर।
आशंका निर्मूल है,होगा स्वस्थ शरीर।।-८

पत्ता पत्ता है जहाँ, औषधि का भंडार।
देने को आतुर सदा,वृक्ष हमे उपहार।।-९

ऐसे भारत देश में,होगा शीघ्र विनाश।
यहाँ गले में आज जो,फँसा 'कोरोना' फाँस।।-१०

कुछ दिन की ही बात है,घर मे रहो 'दिनेश'।
शीघ्र स्वस्थ हो जाएगा,अपना भारत देश।।-११

                     दिनेश श्रीवास्तव

                     २९ मार्च २०२०
                         7.०० सायं

मंगलवार, 17 मार्च 2020

भगवान ने बनाया?




प्रस्तुति - कृति शरण /सृष्टि शरण।

भगवान ने पहले
गधे को बनाया
और कहा तुम गधे होगे |
तुम सुबह से शाम तक
बिना थके काम करोगे |
तुम घास खाओगे और
तुम्हारे पास अक्ल नहीं होगी
और तुम 50 साल जियोगे |”
गधा बोला –
मै 50 साल नहीं जीना चाहता |
ये बहुत ज्यादा है |
आप मुझे 20 साल ही दें |
भगवान ने कहा तथास्तु
———————————
भगवान ने फिर कुत्ते को बनाया –
और कहा तुम कुत्ते होगे|
तुम घर की रखवाली करोगे |
तुम आदमी के दोस्त होगे |
तुम वह खाओगे
जो आदमी तुम्हे देगा |
तुम 30 वर्ष जियोगे|”
कुत्ता बोला –
मै 30 साल नहीं जीना चाहता |
ये बहुत ज्यादा है |
आप मुझे 15 साल ही दें |
भगवान ने कहा तथास्तु...
———————————
फिर भगवान ने बन्दर को बनाया –
और कहा तुम बन्दर होगे |
तुम एक डाली से दूसरी में
उछलते कूदते रहोगे |
तुम 20 वर्ष जियोगे |”
तो बन्दर बोला – मै
20 साल नहीं जीना चाहता |
ये बहुत ज्यादा है |
आप मुझे 10 साल ही दें |
भगवान ने कहा तथास्तु……
आखिर में भगवान ने
आदमी को बनाया –
और कहा तुम आदमी होगे |
तुम धरती के सबसे अनोखे जीव होगे|
तुम अपनी अकलमंदी से
❤सभी जानवरों के मास्टर होगे|
❤तुम दुनिया पे राज करोगे |
❤तुम 20 साल जियोगे |”
💙तो आदमी ने जवाब दिया –
💙20 साल तो बहुत कम है|
💙आप मुझे 30 साल दे
💙जो गधे ने मना कर दिए,
💙15 साल कुत्ते को नहीं चाहिए थे,
💗10 साल बन्दर ने मना कर दिए,
💗वह भी दे दें|
💗भगवान ने कहा तथास्तु…
💗और तीनो जानवरों के साल
💗(30 साल, 15 साल, 10 साल),
💜 जो की जानवरों ने माना कर दिए थे,
💜आदमी को मिल गए |
💜तब से आज तक आदमी
💜20 साल इन्सान की तरह जीता है|
💜शादी करता है और
💛30 साल गधो की तरह बिताता है|
💛काम करता है और
💛अपने ऊपर सारा भोझ उठाता है |
💛और फिर उसके
💛बच्चे जब बड़े हो जाते है तो
💖वह 15 साल कुत्ते की तरह
💖घर की रखवाली करता है,
💖बच्चे जो उसे दे देते है
💖वह खा लेता है |
💖उसके बाद जब वह
💚रिटायर हो जाता है| तो
💚वह 10 साल बन्दर की तरह
💚जीवन बिताता है
💚एक घर से दूसरे घर या
💚अपने एक बेटे या बेटी के घर से
❤दूसरे बेटा या बेटी के घर पर
❤अता- जाता रहता है और
❤नए – 2 तरीके अपनाता है
❤अपने पोतो को खुश करने मे
❤और कहानी सुनाने में !!!!!!

👍 ये ही जीवन की सच्चाई है...

शनिवार, 29 जुलाई 2017

पत्रकारिता के विविध आयाम







रेडियो पत्रकारिता
          संचार के आधुनिक माध्यमों में रेडियो ने अपने वर्चस्व और महत्व को बरकरार रखा है। रेडियो अपनी विकास यात्रा के स्वर्णिम चरणों को पूरा करता हुआ आज एक नए मुकाम को हासिल कर चुका है। रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों का श्रोताओं पर सबसे ज्यादा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। भारत जैसे विकासशील देश में आज भी 80 प्रतिशत जनसंख्या गांव में निवास कर रही है। जहां रेडियो ही ज्ञान, सूचना और मनोरंजन का सबसे सुलभ, सस्ता और आसान साधन है।
     पं. इन्द्र विद्यावाचस्पति के अनुसार ‘‘पत्रकारिता पांचवा वेद है जिसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान संबंधी बातों को जानकर अपने बंद मस्तिष्क को खोलते हैं।’’
      डॉ. शंकर दयाल शर्मा- ‘‘पत्रकारिता पेशा नहीं जनता की सेवा  का माध्यम है।’’
 पत्रकारिता का स्वरूप एवं उसके प्रकार
पत्रकारिता एक बहुआयामी विषय है। अतः इसके विविध स्वरूपों तथा  प्रकारों के अनुभव भावोत्पादक फोटो पत्रकारिता ही प्रभावी हो सकती है। इसका संक्षिप्त ज्ञान प्रदान करने हेतु पत्रकारिता के स्वरूप तथा इसके विविध प्रकारों की सूक्ष्म व्याख्या निम्न प्रकार प्रस्तुत की जा रही है-

1. राजनीतिक पत्रकारिता
राजनीतिक पत्रकारिता का प्रारम्भ स्वाधीनता पूर्व हो चुका था। भारतीयों द्वारा प्रकाशित कोई भी पत्र ऐसा नहीं था, जिनमें अंग्रेजी हुकूमत की ज्यादतियों का चित्रण न हो। सभी भारतीय समाचार-पत्र ‘स्वाधीनता मिशन’ से प्रेरित थे। वह देश को राजनीतिक रूप से गुलाम नहीं रखना चाहते थे। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश में लोकतन्त्र की स्थापना हुई। शासन की इस व्यवस्था में पत्रकारिता का राजनीतिक दायित्व बहुत बढ़ गया। समाचार-पत्र वस्तुतः शासक और शासित के मध्य की एक अटूट कड़ी बन गए।
शासक दल की नीतियों से जन-मानस को रू-ब-रू करवाना और जन-मानस की भावनाओं को शासक दल तक पहुँचाना पत्रकारों का प्रमुख दायित्व हो गया। वर्तमान में सभी समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ व सूचना के अन्य साधन अपने इस उत्तरदायित्व को भली प्रकार निभा रहे हैं। इसका सम्पूर्ण श्रेय पत्रकारिता को जाता है। राजनीतिक समाचारोंे लिए प्रमुख पत्रिकाओं में इण्डिया टुडे, द वीक, आउटलुक, द टाइम आदि प्रमुख हैं।

2. सामाजिक पत्रकारिता
 सामाजिक कुरीतियों व अन्धविश्वासों पर जहाँ पत्रकारिता ने कठोरतम वार किए हैं, वहीं लोगोंं को एक नई जीवन शैली में ढालने का कार्य भी किया है। सामाजिक आस्थाओं-अनास्थाओं, समानताओं-विषमताओं और सामाजिक संकीर्णताओं का विशद विश्लेषण और प्रसारण रेडियो एवं समाचार-पत्रों द्वारा निरंतर हो रहा है। इसी विश्लेषण का परिणाम है कि लोगों के जीवन-मूल्य परिवर्तित हुए हैं। उनके विचारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आए हैं। उनके सोचने और कार्य करने का ढंग बदला है। लेकिन अभी भी सामाजिक सौहार्दता स्थापित करने की दिशा में पत्रकारिता के समक्ष गम्भीर चुनौतियाँ हैं।
3. आर्थिक पत्रकारिता
विश्व में औद्योगिक क्रान्ति के बाद ही पूँजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद जैसे नए चिन्तन ने विश्व के विभिन्न देशों को विशिष्ट राजनीतिक विचार धारा के तहत लामबन्द किया और अपने दर्शन के प्रचार व प्रसार हेतु समाचार-पत्रों को माध्यम बनाया।
      औद्योगिक युग में किसी राष्ट्र से अथवा व्यक्ति विशेष की सफलता अर्थ के समुचित नियोजन और प्रबन्धन से सम्भव है और यह कार्य समाचार-पत्र और पत्रिकाओं के माध्यम से जितने प्रभावी

4. धार्मिक पत्रकारिता
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात धार्मिक पत्रकारिता में अमूलचूल परिवर्तन हुआ। बृहद् स्तर पर अनेक धार्मिक पत्रिकाएँ जैसे अखण्ड ज्योति, वेद अमृत, साधना-पथ, ओशो टाइम्स, मन्त्र-तन्त्र-यन्त्र आदि पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन आरम्भ हुआ। ये पत्रिकाएँ आज भी लोकप्रिय हैं और इनके पाठकों की संख्या अच्छी है।

5. फिल्मी पत्रकारिता
आरम्भ में फिल्म या चलचित्र सम्बन्धी समाचारों के लिए दैनिक, साप्ताहिक या अन्य पत्रिकाओं में कुछ पृष्ठ निर्धारित होते थे। कालान्तर पर चलचित्रों के विकास एवं उनकी बढ़ती लोकप्रियता के समक्ष स्थापित प्रकाशन संस्थानों ने अलग से साप्ताहिक और मासिक फिल्म पत्रिकाओं का प्रकाशन अंग्रेजी, हिन्दी व अन्य भाषाओं में प्रारम्भ कर दिया। आज फिल्मी पत्रिकाओं में फिल्म फेयर, स्टार-डस्ट, शो-टाइम और सिने ब्लिट्ज आदि प्रमुख हैं। रेडियो पर फिल्मी गाने और वालीबुड की जानकारी देने वाले कई कार्यक्रम प्रसारित किए जाते है।

6. खेल-पत्रकारिता
पूर्व में खेल समाचारों को विशेष महत्व नहीं दिया जाता था। अंग्रेजी के समाचार-पत्र क्रिकेट समाचारों को विशेष  रूप से संकलित किया करते थे। खेलों के प्रति पाठकों की बढ़ती रुचि देखकर लगभग सभी समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं में खेल समाचारों का समावेश होने लगा। समाचार-पत्रों के लिए खेल एक अलग विधा या बीट बन गई। खेल समाचारों  के संकलन के लिए विशेष संवाददाताओं की नियुक्ति के मार्ग प्रशस्त हुए।
      वर्तमान में खेल जगत् के समाचारों के प्रकाशन हेतु साप्ताहिक व मासिक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही है। इनमें न केवल क्रिकेट, हॉकी, फुटबाल जैसे आउट-डोर गेम्स, अपितु अनेक इन-डोर गेम्स के वश्वस्तरीय समाचारों का प्रकाशन हो रहा है। खेल-पत्रिकाओं में क्रिकेट सम्राट, क्रिकेट, स्पोट्र्स स्टार तथा गोल्फ डाइजेस्ट आदि प्रमुख हैं।

7. शिक्षा पत्रकारिता
शिक्षा सम्बन्धी समाचारों का संकलन और उनका प्रकाशन वर्तमान में पत्रकारिता की एक स्वतन्त्र और सशक्त विधा या बीट बन गई है। दैनिक समाचार-पत्र में तो बेसिक, माध्यमिक उच्च एवं तकनीकी शिक्षा से सम्बन्धित समाचार देखने को मिलते ही हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा पर अलग से मासिक पत्रिकाएं जैसे एजूकेशन टुडे, वल्र्ड आॅफ बी स्कूल भी नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है। अब शिक्षा भी पत्रकारिता का एक अभिन्न अंग बन गई है। रेडियो पर कई शैक्षणिक कार्यक्रम प्रसारण के साथ-साथ ज्ञानवाणी जैसा एक रेडिया चैनल स्वतंत्र कार्यरत है।

8. साहित्यिक पत्रकारिता
स्वाधीनता से पूर्व साहित्यिक पत्रकारिता का जन्म हो चुका था। हिन्दी के विद्वान जैसे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बालकृष्ण भट्ट तथा प्रताप नारायण मिश्र आदि ने मासिक पत्रिकाओं का प्रकाशन साहित्य-सृजन को गति देने की दृष्टि से किया। विशुद्ध रूप से साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं पाठकों को रास नहीं आईं और धीरे-धीरे  धनाभाव के कारण यह लुप्त होती गई। लेकिन पिछले दो दशकों में साहित्यिक पत्रिकाओं की बाढ़-सी आ गई है।
               
9. औद्योगिक पत्रकारिता
उद्योग पत्रकारिता का विकास डेढ़ दशक पहले हुआ है। पूर्व में उद्योग संबंधी समाचार दैनिक अखबारों और पत्रिकाओं मेंं जरूरत के हिसाब से छापे जाते थे। लेकिन वर्तमान में व्यापार संबंधी समस्त समाचारों के लिए एक या दो पेज रिजर्व कर दिए गए। इसके अलावा वर्तमान में कई अखबार व्यापार समाचार के लिए प्रकाशित किए जा रहे हैं। हालांकि अभी तक रेडियो में इन समाचारों को कोई अलग स्थान नहीं दिया गया फिर भी रेडियो बुलेटिन में व्यापार समाचार को समाहित करने का चलन बदस्तूर जारी है।

10. चिकित्सा पत्रकारिता
वर्तमान में सभी समाचार पत्र अपने पाठकों को उनके स्वास्थ्य, रोगों और निदान के बारे में प्रतिदिन जागरुक करने का कार्य कर रहे हैं। रेडियो की बात करें तो आकाशवाणी पर लगभग रोजाना स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। हालांकि बुलेटिन में बड़ी खबर होने पर ही इस तरह की चिकित्सकीय समाचारों को सम्मलित किया जाता है। रेडियो पर स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम स्रोताओं के हित में बनाए जा रहे है

11. कृषि पत्रकारिता
जैसा कि माना जाता है कि हमारा देश एक कृषि प्रधान राष्ट्र है और रेडियो के दो तिहाई श्रोता भी कृषक हैं। आकाशवाणी पर फसलों की बुवाई, कटाई, मिजाई और फसलों को खराब करने वाले रोगों एवं कीटनाशकों की जानकारी प्रसारित की जाती है। इसके अलावा जमीन की उपजाऊ क्षमता बढ़ाना, खरपतवार कम करना, खेती या बीज के लिए लोन लेना आदि बातों की जानकारी के लिए कृषक वर्ग रेडियो पर ही आश्रित हैं।

12. खोजी पत्रकारिता
पत्रकारिता की यह विधा शुरूआती दौर में अखबारों में उपयोग लाई जाती थी। बाद में टीवी में इसका प्रयोग होने लगा। हालांकि रेडियो बुलेटिन में खोजी खबरें न के बराबर होती हैं।

13. पर्यावरण पत्रकारिता
पर्यावरण से संबंधित खबरें और लेख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में तो आते ही हैं लेकिन रेडियो में इन्हें विशेष स्थान दिया जाता है। रेडियो पर पर्यावरण संबंधी कई तरह की जानकारी कार्यक्रमों के रूप में श्रोताओं के लिए प्रसारित की जाती हैं। रेडियो बुलेटिन के अंत में मौसम संबंधी जानकारी प्रतिदिन दी जाती हैं। रेडियो पर पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने एवं पर्यावरण पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव से लोगों को अवगत कराने के लिए कई प्रोग्राम प्रसारित किए जा रहे है।

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कूट नीति

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