देव औरंगाबाद बिहार 824202 साहित्य कला संस्कृति के रूप में विलक्ष्ण इलाका है. देव स्टेट के राजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह किंकर अपने जमाने में मूक सिनेमा तक बनाए। ढेरों नाटकों का लेखन अभिनय औऱ मंचन तक किया. इनको बिहार में हिंदी सिनेमा के जनक की तरह देखा गया. कामता प्रसाद सिंह काम और इनकi पुत्र दिवंगत शंकर दयाल सिंह के रचनात्मक प्रतिभा की गूंज दुनिया भर में है। प्रदीप कुमार रौशन और बिनोद कुमार गौहर की भी इलाके में काफी धूम रही है.। देव धरती के इन कलम के राजकुमारों की याद में .समर्पित हैं ब्लॉग.
सोमवार, 22 फ़रवरी 2016
हिन्दी उपन्यास का इतिहास
विषय सूची
भारतेन्दु युग
हिन्दी में भारतेन्दु से पूर्व जो कथात्मक पुस्तकें लिखी गयीं, वे आधुनिक उपन्यास और कहानी से मिलती-जुलती होने पर भी उनसे भिन्न थीं। वास्तव में उपन्यास और कहानी पश्चिमी साहित्य की देन है। भारतेन्दु-युग में जो उपन्यास लिखे गये, उनमें उपन्यास विद्या का उचित निर्वाह न होने के कारण उन्हें सच्चा उपन्यास नहीं कहा जा सकता है। सच तो यह है कि हिन्दी में वास्तविक उपन्यास की रचना सर्वप्रथम प्रेमचन्द ने ही की। यों, ऐतिहासिक दृष्टि से लाला श्रीनिवास दास का ‘परीक्षा-गुरु’ (1882 ई.) ही हिन्दी का पहला उपन्यास माना जाता है। यह पश्चिमी उपन्यास की शैली पर आधारित है और यथार्थ जीवन का चित्र भी प्रस्तुत करता है, परन्तु कला की दृष्टि से बहुत अपरिपक्व है। इसमें उपदेश की प्रवृत्ति प्रधान है।‘परीक्षा-गुरु’ के पूर्व भी ‘देवरानी-जेठानी’ (1872 ई.) ‘रीति-रत्नाकर’, ‘वामा शिक्षक’, ‘भाग्यवती’ आदि कुछ उपन्यास जैसी कथा-पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं परन्तु वे भी मुख्यतः शिक्षात्मक तथा अपरिपक्व हैं। भारतेन्दु ने भी 1866 ई. में कहानी ‘कुछ आप बीती कुछ जग बीती’ लिखने का यत्न किया था और ‘चन्द्र प्रभा और पूर्ण प्रकाश शीर्षक मराठी उपन्यास का अनुवाद व संशोधन भी किया था। उनकी प्रेरणा से राधा चरण गोस्वामी, गदाधर सिंह, राधाकृष्णदास, प्रतापनारायण मिश्र आदि ने बंगला के बहुत से उपन्यासों का हिन्दी में अनुवाद किया और मौलिक उपन्यास भी लिखे। इन लेखकों के अतिरिक्त बाबू कार्तिकप्रसाद खत्री, रामकृष्ण वर्मा आदि और भी कई लेखकों ने बंगला उपन्यासों का अनुवाद किया। अंग्रेजी से भी कुछ उपन्यासों का अनुवाद हुआ।
भारतेन्दु काल के मौलिक कथा-ग्रन्थों और उपन्यासों में महत्वपूर्ण हैं : ठाकुर जगमोहन सिंह का ‘श्याम स्वप्न’ (काव्यात्मक गद्य-कथा), पं. बालकृष्ण भट्ट रचित ‘नूतन ब्रह्मचारी’ तथा ‘सौ अजान और एक सुजान’ किशोरी लाल गोस्वामी का ‘स्वर्गीय कुसुम’, राधाचरण गोस्वामी का ‘विधवा-विपत्ति’, राधाकृष्ण दास का ‘निस्सहाय हिन्दू’, अयोध्यासिंह उपाध्याय का ‘प्रेमकांता’ और रत्नचंद प्लीडर प्रणीत ‘नूतन चरित्र’। ये सभी उपन्यास प्रायः सोद्देश्य तथा शिक्षाप्रद हैं, पर कला की दृष्टि से दुर्बल हैं। इनमें परिवार और समाज का साधारणतः अच्छा अंकन हुआ है। उच्च चरित्र, वीरता तथा प्रेम की कथा प्रस्तुत करने वाले कुछ ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे गये, परन्तु उनमें इतिहास के तथ्यों का ठीक निर्वाह नहीं हुआ है।
द्विवेदी युग
द्विवेदी युग में भी मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार के उपन्यासों का प्रकाशन हुआ। इस समय अधिकतर तिलस्म, ऐयारी, जासूसी और रोमांस के कथानक प्रस्तुत किए गए। उपन्यास घटना-प्रधान बना रहा। अंग्रेजी से भी साहसिक, जासूसी तथा प्रेमचर्या-प्रधान उपन्यासों का अनुवाद हुआ। इस युग के तीन उपन्यासकार बहुत प्रसिद्ध हैं : देवकीनन्दन खत्री, किशोरीलाल गोस्वामी और गोपालराम गहमरी। खत्री जी ने ‘चन्द्रकांता’, ‘चन्द्रकांता-संतति’ तथा ‘भूतनाथ’ नामक तिलस्म और ऐयारी के रोचक उपन्यास कई भागों में प्रकाशित किए। इन उपन्यासों के पहले भी भारतेन्दु काल में उन्होंने ‘नरेन्द्रमोहनी’, वीरेन्द्र वीर’ आदि उपन्यास लिखे थे। हरेकृष्ण जोहरी आदि कई लेखकों ने उनके अनुकरण पर तिलस्मी उपन्यास लिखे। बहुत लोगों ने उनके मनोरंजक उपन्यास पढ़ने के लिए ही हिन्दी सीखी।किशोरीलाल गोस्वामीने सामाजिक और ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। गोस्वामी जी के सामाजिक उपन्यास वस्तुतः नाम के ही सामाजिक हैं। उनमें समाज की बहुत ही स्थूल और ऊपरी झलक है, यथार्थ चित्रण नहीं। उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में इतिहास के तथ्यों का उचित निर्वाह नहीं हुआ। देशकाल का भी ध्यान उन्होंने कहीं-कहीं नहीं रखा। कुछ उपन्यासों में समाज की कुरीतियों पर प्रहार करने का यत्न किया गया और यत्र-तत्र राष्ट्र-प्रेम की भावना भी है। परन्तु गोस्वामी जी के अधिकांश उपन्यास उत्तेजक शृंगार से युक्त हल्के मनोरंजन के साधन हैं। गोस्वामी जी ने लगभग पैंसठ उपन्यास लिखे हैं। उनमें कुछ उपन्यासों के नाम हैं ‘कुसुमकुमारी’, ‘हृदयहारिणी’, ‘लबंगलता’, ‘रजिया बेगम’, ‘तारा’, ‘कनक कुसुम’, ‘मल्लिका देवी’, ‘राजकुमारी’, लखनऊ की कब्र’, ‘चपला’, ‘प्रेममयी’। जैसा कि नामों में प्रकट है ये उपन्यास नारी-प्रधान और शृंगारिक हैं। वास्तव में उनमें समाज और इतिहास के संदर्भ में कामुकता तथा विलासिता का अंकन हुआ है। उन्होंने ‘उपन्यास’ नामक पत्रिका भी निकाली थी जिसमें उनके पैंसठ छोटे-बड़े उपन्यास प्रकाशित हुए थे। आचार्य शुक्ल ने गोस्वामी जी के सम्बन्ध में लिखा है कि ‘इस द्वितीय उत्थानकाल के भीतर उपन्यासकार इन्हीं को कह सकते हैं, परन्तु वस्तुतः उपन्यासकार की सच्ची प्रतिभा इनमें भी नहीं है।’
गोपालराम गहमरी ‘जासूस’ नामक पत्रिका प्रकाशित करते थे, जिसमें उनके साठ के लगभग उपन्यास छपे। अंग्रेजी के जासूसी उपन्यासों के अनुकरण पर उन्होंने ‘जासूस की भूल’, ‘घर का भेदी’, ‘अद्भुत खून’, ‘भोजपुर की ठगी’, आदि रहस्यपूर्ण, साहसिक और डकैती तथा ठगी की कथाएं निर्मित कीं। वैसे उन्होंने जासूसी उपन्यासों के क्षेत्र में भी आदर्श के निर्वाह और लोकोपकार की भावना के समावेश का यत्न किया और आदर्श जासूसों की सृष्टि की। गहमरी जी ने वंगला से गृहस्थ जीवन-सम्बन्धी कुछ उपन्यासों का अनुवाद भी किया था। दूसरी ओर द्विवेदी युग में कुछ ऐसे उपन्यासकार भी हुए, जिन्होंने अपनी रचनाओं में नैतिकता का ध्यान रखते हुए स्वच्छ-स्वस्थ सामग्री प्रस्तुत की। इस तरह के उपन्यासकारों में उल्लेखनीय हैं : हरिऔध, लज्जाराम मेहता और ब्रजनन्दन सहाय। हरिऔध जी ने ‘ठेठ हिन्दी का ठाठ’ और ‘अधखिला फूल’ लिखकर इनमें मुहावरेदार ठेठ भाषा का नमूना भी पेश किया। मेहता जी ने सुधारवादी दृष्टिकोण से ‘आदर्श हिन्दू’, ‘आदर्शदम्पति’ और ‘हिन्दू गृहस्थ आदि उपन्यास लिखे। ब्रजनन्दन सहाय के ‘सौन्दर्योपासक’ में काव्य का आनन्द मिलता है। स्पष्ट है कि गोस्वामी जी, गहमरी जी और खत्री जी के उपन्यासों में जहाँ स्थूल सौन्दर्य और उत्तेजक शृंगारिकता प्रस्तुत है वहाँ इन उपन्यासकारों के ग्रन्थ ‘उपदेशात्मक भावना की छटा दिखाने वाले या काव्यात्मक है। मानव चरित्र और मानव जीवन के सच्चे चित्रण और उपन्यास-काल की पूर्णता की ओर इस समय तक किसी का भी यथोचित ध्यान नहीं गया था। इस काल में किशोरीलाल गोस्वामी के अतिरिक्त कुछ और लेखकों ने भी ऐतिहासिक उपन्यास लिखें। इनमें उल्लेखनीय हैं : गंगाप्रसाद गुप्त का ‘वीर पत्नी’ और ‘मिश्रबंधुओं के विक्रमादित्य’, चन्द्रगुप्त मौर्य’ तथा ‘पुष्य मित्र’।
द्विवेदी युग में भी अधिकतर साधारण जनता के मनोरंजन और मनोविनोद के लिए घटना प्रधान उपन्यास ही लिखे गये। उनमें कथा का रस तो है, किन्तु चरित्र-चित्रण का सौन्दर्य, समाज का सही अंकन और उपन्यास का परिपक्व शिल्प नहीं। इस समय के उपन्यासकारों को न तो मानव-जीवन का और न मानव-स्वभाव का सूक्ष्म एवं व्यापक ज्ञान था और न उपन्यास की कला से ही उनका अच्छा परिचय था। इस काल में अधि कतर प्रेमप्रधान, साहसिक तथा विस्मयकारक (तिलस्मी-जासूसी) उपन्यास ही लिखे गये। ऐतिहासिक, शिक्षात्मक और काव्यात्मक उपन्यास भी लिखे गये, परन्तु कम। पात्र अधिकतर सौंदर्य के प्रति आकर्षित होने वाले विलासी प्रेमी-प्रेमिका और राजकुमार-राजकुमारी हैं या पिफर ऐयार तथा जासूस। इस काल के उपन्यास भारतेन्दु काल के उपन्यासों की अपेक्षा रोचक और मनोरंजक अधिक हैं। शिक्षा देने की प्रवृत्ति भी कम है। प्रतापनारायण मिश्र, गोपालराम गहमरी, ईश्वरीप्रसाद शर्मा, हरिऔध, कार्तिकप्रसाद खत्री, रूपनारायण पाण्डेय, रामकृष्ण वर्मा आदि साहित्यकारों ने बंगला, अंग्रेजी और उर्दू आदि भाषाओं के उपन्यासों का अनुवाद किया। आचार्य शुक्ल का कथन है कि हिन्दी के मौलिक उपन्यास-सृजन पर इन अनुवाद कार्यों का अच्छा प्रभाव पड़ा और इसके कारण हिन्दी उपन्यास का आदर्श काफी ऊँचा हुआ।
प्रेमचन्द युग
द्विवेदी युग के अन्त तक (1917 ई. तक) हिन्दी के मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार के उपन्यास काफी संख्या में लिखे जा चुके थे। मौलिक उपन्यास अनेक प्रकार के और अनेक विषयों पर थे। उपन्यास क्रमशः जीवन और समाज के निकट आ रहा था, परन्तु अब भी उसमें बहुत-सी, त्रुटियां थी। प्रेमचन्द के समय से विशेष कर उनके ‘सेवासदन’ के प्रकाशन काल (सन् 1918 ई.) से हिन्दी-कथा साहित्य में एक नये युग का आरम्भ होता है। प्रेमचंदने ही उपन्यास में मानव मन का स्वाभाविक एवं सजीव अंकन आरम्भ किया। उन्होंने ही पहली बार हिन्दी उपन्यास में घटना और चरित्र का संतुलन स्थापित कर मनोविज्ञान का उचित समावेश किया। उन्होंने ही समाज की समस्याओं को सर्वप्रथम कथा-साहित्य में स्थापित किया। उन्होंने जीवन और जगत के विविध क्षेत्रों का, समाज के विभिन्न वर्गों का ग्रामीण तथा नागरिक क्षेत्रों की बहुत-सी दशाओं तथा परिस्थितियों का सूक्ष्म निरीक्षण कर व्यापक अनुभव प्राप्त किया था। मनोविज्ञान के वे पंडित थे। मानव-स्वभाव के विविध पक्षों से भली-भांति परिचित थे। उपन्यास-कला का भी उन्हें बहुत अच्छा ज्ञान था। पश्चिम के ताल्सताय, दोस्तोवस्की, तुर्गनेव, गोर्की, अनातोले प्रफांस आदि महान उपन्यासकारों की रचनाओं का भी उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया था।प्रेमचन्द प्रारम्भ में उर्दू के लेखक थे और कहानियां लिखते थे। उर्दू में उनके कुछ उपन्यास भी प्रकाशित हुए थे। बाद में उन्होंने हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया। उनके महत्वपूर्ण उपन्यास हैं : सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगलसूत्र (अपूर्ण)। प्रेमचन्द उपन्यास को मनोरंजन की वस्तु नहीं मानते थे। वे अपने उपन्यासों द्वारा भारतीय जनता के जागरण और सुधार तथा निर्माण की भावना का प्रसार करना चाहते थे। प्रेमचन्द मानवतावादी सहृदय व्यक्ति थे। वे गरीबी में पले थे, गरीबों के दुःख-दर्द को समझते थे। समाज के निम्न वर्ग से उन्हें सहानुभूति थी। जीवन के अन्तिम समय में, जैसा कि उनके अन्तिम उपन्यासों (‘गोदान’ और ‘मंगलसूत्र’) से प्रकट है, उनका झुकाव साम्यवाद की ओर हो गया था और वे सच्चे अर्थ में यथार्थवादी और प्रगतिशील हो गये थे। अपनी पुस्तकों में प्रेमचन्द ने किसानों की आर्थिक दशा, जमीदारों और पुलिस के अत्याचारों, ग्रामीण जीवन की कमजोरियों, समाज की कुरीतियों, शहरी समाज की कमियों, विधवाओं और वेश्याओं की समस्याओं, नारी की आभूषणप्रियता, मध्यवर्ग की झूठी शान और दिखावे की प्रवृत्ति, सम्मिलित हिन्दू-परिवार में नारी की दयनीय स्थिति आदि प्रश्नों और पक्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने कई उपन्यासों में गांव और शहर की कहानी, ग्रामीण और नागरिक जीवन की झांकी साथ-साथ प्रस्तुत की है। उनके उपन्यासों में कथानक सुगठित है चरित्र-चित्रण प्रायः मनोविज्ञान के अनुकूल सजीव और स्वाभाविक है। संवाद पात्रों और परिस्थितियों के अनुसार हैं और भाषा सरल एवं व्यवहारिक है।
प्रेमचन्द की उपन्यास-कला की मुख्य विशेषताएं हैं : व्यापक सहानुभूति-विशेषकर शोषित किसान, मजदूर और नारी का सहानुभूतिपूर्ण चित्रण, यथार्थवाद अर्थात् उपन्यास में जीवन का यथार्थ चित्रण, मानव-जीवन और मानव-स्वभाव की अच्छी जानकारी होने से सजीव पात्रों और सजीव वातावरण का निर्माणऋ चरित्र-चित्रण में नाट्कीय कथोपकथनात्मक तथा घटनापरक पद्धतियों का उपयोग, समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि पात्रों की सृष्टि, अपने व्यक्तित्व को पात्रों से पृथक रखकर उन्हें प्रायः अपनी सहज-स्वच्छन्द गति से चलने देना, अनेकानेक सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं का चित्रण, समाज के साथ पारिवारिक जीवन की सुन्दर अभिव्यक्ति, मानव-कल्याण की ओर संकेत करने वाले नैतिक आदर्शों की प्रतिष्ठा और सरल व्यावहारिक भाषा का संग्रह। प्रेमचन्द युग के अन्य उल्लेखनीय उपन्यासकार हैं। विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक, प्रसाद, निराला, सुदर्शन, चतुरसेन शास्त्री, वृन्दावन लाल वर्मा, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, सियारामशरण गुप्त, पांडेय बेचन शर्मा ‘उर्ग्र’, भगवती प्रसाद वाजपेयी, गोविन्दवल्लभ पंत, राहुल सांकृत्यायन और जैनेन्द्र। कोशिक जी के उपन्यास ‘मां’ और भिखारिणी नारी-हृदय का मनोवैज्ञानिक चित्र प्रस्तुत करते हैं। आचार्य चतुरसेन ने नारी की समस्या पर ‘हृदय की परख’, ‘हृदय की प्यास’, ‘अमर अभिलाषा’ आदि उपन्यास प्रारम्भ में लिखे थे। बाद में उनके बहुत से सामाजिक ऐतिहासिक और वैज्ञानिक उपन्यास प्रकाशित हुए। उनके कुछ उल्लेखनीय उपन्यास हैं : ‘गोली’, ‘वैशाली की नगर वधू’ ‘वयं’ रक्षामः’ ‘सोमनाथ’ ‘महालय’, ‘सोना और खून’ तथा ‘खग्रास’। वृन्दावनलाल वर्मा ने इतिहास के तथ्यों की पूर्णतः रक्षा करते हुए कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की है। उन्होंने ‘विराटा की पद्मिनी’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कचनार’, ‘मृगनयनी’, ‘माधवजी सिंधिया’ आदि उच्चकोटि के ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। हिन्दी के कुछ अन्य उल्लेखनीय ऐतिहासिक उपन्यास हैं। जयशंकर प्रसाद का ‘इरावती’ (अधूरा), हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘वाणभट्ट की आत्मकथा’ और ‘चारु चन्द्रलेख’, चतुरसेन का ‘वैशाली की नगरवधू’, ‘राजसिंह’, ‘सोमनाथ’, ‘सह्याद्रि की चट्टानें’, सेठ गोविन्ददास का ‘इन्दुमती’, राहुल सांकृत्यायन के ‘सिंह सेनापति’, ‘जय यौधेय’, सत्यकेतु दिद्यालंकार का ‘आचार्य चाणक्य’, रांगेय राघव का ‘अंधा रास्ता’, उमाशंकर का ‘नाना फड़नवीस’ तथा ‘पेशवा की कंचना’।
प्रसाद जी ने ‘इरावती’ के पहले ‘कंकाल’ और ‘तितली’ नामक दो उपन्यास और लिखे थे, ‘कंकाल’ में हिन्दू नारी की असहाय स्थिति और धार्मिक पाखंड पर प्रकाश डाला गया है। ‘तितली’ में नारी-हृदय की महत्ता के उद्घाटन के साथ-साथ ग्राम-सुधार और यथास्थिति के विरुद्ध आन्दोलन की भावना है। प्रसाद जी मूलतः कवि हैं। उनके उपन्यासों में भी प्रायः जीवन की काव्यात्मक और भावपूर्ण व्याख्या मिलती है। निराला जी ने भी ‘अप्सरा’ ‘अल्का’, ‘निरूपमा’ आदि उपन्यास लिखे। इनके उपन्यासों में भी प्रसाद जी की भांति रोमांटिक वातावरण है। नारी को निराला जी ने महत्वपूर्ण स्थान दिया है। श्री प्रतापनारायण श्रीवास्तव के प्रारम्भिक उपन्यासों में ‘विदा’, ‘विसर्जन’ और ‘विजय’ उल्लेखनीय हैं।
सियारामशरण गुप्तके ‘गोद’, ‘अन्तिम आकांक्षा’ और ‘नारी’ उपन्यासों में नारी-जीवन और उसकी सामाजिक स्थिति का मार्मिक अंकन हुआ है। साधारण मनुष्य में भी उच्च गुण दिखाने में गुप्त जी निपुण है। पांडेय बेचन शर्मा ‘उर्ग्र’ के प्रारम्भिक उपन्यासों में पत्रात्मक शैली में लिखे ‘चन्द हसीनों के खतूत’ का विशिष्ट स्थान है। इसमें हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रश्न उपस्थित करते हुए प्रेम का महत्व दिखाया गया है। उनके ‘दिल्ली का दलाल’, ‘बुधुआ की बेटी’, ‘जीजी जी’ आदि उपन्यासों में दुष्टों द्वारा भोली युवतियों को फंसाएं जाने की कथाएं हैं। सभ्य समाज की भीतरी दुर्बलताओं और दुष्प्रवृत्तियों का उन्होंने अच्छा उद्घाटन किया है। भगवती प्रसाद वाजपेयीके ‘प्रेममयी’, ‘अनाथ स्त्री’, ‘त्यागमयी’, ‘पतिता की साधना’ आदि शुरू के उपन्यासों में स्त्री-पुरुष के रूपाकर्षण और प्रेम के चित्र हैं। उनके ‘गुप्त धन’, ‘चलते-चलते’, ‘पतवार’, ‘उनसे न कहना’, ‘रात और प्रभाव’, ‘टूटते बन्धन’ आदि कई उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। गोविन्दवल्लभ पंतके ‘सूर्यास्त’, ‘प्रतिमा’, आदि उपन्यास काफी पहले प्रकाशित हुए थे। बाद में भी उनके ‘जल समाधि’, ‘नारी के सपने’, ‘मैत्रेय’ आदि उपन्यास निकले हैं।
जैनेन्द्र के परख (सन् 1929 ई.) से हिन्दी उपन्यास के क्षेत्र में एक नई प्रवृत्ति का आरम्भ होता है। वस्तुतः यह उपन्यास एक लम्बी कहानी है जिसमें कट्टो नाम की देहातिन बालविधवा के भावुकतापूर्ण आत्मसमर्पण का चित्रण किया गया है। जैनेन्द्र ने आगे चलकर कई महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक उपन्यास ‘सुनीता’, ‘सुखदा’, ‘त्यागपत्र’, विवर्त्त’ आदि लिखे, जिनमें प्रायः स्त्री का पर-पुरुष की ओर झुकाव दिखाकर आधुनिक नारी के कुण्ठाग्रस्त मन पर प्रकाश डाला है। मनोविश्लेषण की इस प्रवृत्ति का विकास किया इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेयने। प्रेमचन्द काल के उत्तरार्ध में इस क्षेत्र में आने वाले अन्य प्रतिभाशाली उपन्यासकार हैं। ऋषभचरण जैन (कैंदी गदर, भाई, भाग्य, रहस्यमयी, तपोभूमि, बादशाह की बेटी, सत्याग्रह, दिल्ली का व्यभिचार आदि), भगवतीचरण वर्मा (पतन, तीन वर्ष, चित्रलेखा, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, सबहिं नचावत राम गुसाईं) राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह (राम-रहीम, पुरुष और नारी, टूटा तारा, सूरदास, संस्कार आदि)
इस काल में जो उपन्यास लिखे गए, उन्हें चार वर्गों में विभिक्त किया जा सकता है : यथार्थवादी सामाजिक उपन्यास ऐतिहासिक उपन्यास, स्वच्छन्दतापरकउपन्यास और मनोवैज्ञानिकउपन्यास। उपन्यास-लेखन की बहुत-सी शैलियों (ऐतिहासिक, आत्मकथात्मक, पत्रात्मक आदि) का प्रयोग हुआ है। इस काल में यूरोप की अनेक समृद्ध भाषाओं (रूसी, अंग्रेजी, प्रफांसीसी आदि) से उपन्यासों का अनुवाद भी हुआ।
प्रेमचन्दोत्तर युग
प्रेमचन्द के बाद हिन्दी उपन्यास कई मोड़ों से गुजरता हुआ दिखाई पड़ता है। सन् ‘40 से’ 50 तक की कालावधि के उपन्यास मुख्यतः प्रफायड और मार्क्स की विचारधारा से, सन् ‘50 से’ 60 तक के उपन्यास प्रयोगात्मक विशेषताओं से और सन् ‘60 से अब तक के उपन्यास आधुनिकतावादी विचारधारा से प्रभावित हैं। प्रेमचन्द समाज की स्वीकृत मान्यताओं के भीतर संघर्ष करते रहे। किन्तु प्रथम महायुद्ध के बाद पश्चिम के पुराने मूल्यों का तेजी के साथ विघटन हुआ। प्रफायड ने काम-सम्बन्धी मान्यताओं को नैतिकता-अनैतिकता से परे बताकर सामाजिक नैतिकता के आगे प्रश्नचि” लगा दिया। पूंजीवादी समाज में व्यक्ति-चेतना उभर कर सामने आई। मार्क्स ने समष्टि चेतना पर विशेष बल दिया। हिन्दी उपन्यास इन विचारधाराओं से प्रभावित हुए बिना न रहा। फलस्वरूप सन् ‘50 के बाद उपन्यासकारों का ध्यान व्यक्ति और समाज की मुक्ति की ओर गया। किन्तु स्वतंत्रता के बीस वर्षों बाद भी मानव जीवन में एक विशेष प्रकार की कुण्ठा, निराशा, त्रास, अर्थहीनता आदि की अनुभूति होने के कारण सन् ‘60 के बाद के उपन्यासों में इन्हीं मनोदशाओं का चित्रण किया गया। प्रेमचन्द-युग में ही जैनेन्द्र ने प्रफायड से प्रभावित होकर मानव-चरित्र के स्थान पर व्यक्ति-चरित्र की सृष्टि की थी। किन्तु सन् ‘51 में अज्ञेय के ‘शेखर : एक जीवनी’ के प्रकाशन के साथ ही हम उपन्यास की दिशा में एक नया मोड़ पाते हैं। अज्ञेयके तीन उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। : ‘शेखर : एक जीवनी’ (दो भाग), ‘नदी के द्वीप’ और ‘अपने-अपने अजनबी’। पहले दो उपन्यासों में व्यक्तिपात्रों के मनो विश्लेषण की प्रवृत्ति है। तीसरी रचना में कोई सम्बद्ध कथानक नहीं है। अज्ञेय ने उपन्यास को पात्र-प्रधान बनाया और सामाजिक मानव के स्थान पर व्यक्ति-मानव के अन्तर्मन का विश्लेषण करने का यत्न किया।इलाचन्द्र जोशी को उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा ‘संन्यासी’ (1914) उपन्यास-प्रकाशन के द्वारा मिली। इस उपन्यासो में ही पहली बार मनोविश्लेषणात्मक पद्धति की विकृति देखी जा सकती है। ‘संयासी’ के अतिरिक्त ‘पर्दे की रानी’ (1941), ‘प्रेत और छाया’ ‘निर्वासित’, ‘मुक्तिपथ’ (1950) ‘सुबहके भूले’ (1957), ‘जिप्सी’, ‘जहाज का पंछी’ (1955) और ‘ऋतुचक्र’ उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उनके उपन्यासों की विकास-यात्रा में ‘मुक्तिपथ’ एक नए मोड़ की सूचना देता है। ‘मुक्तिपथ’ के पूर्ववर्ती उपन्यास ग्रन्थियों के विश्लेषण पर आधारित है। उनकी भाव-भूमियाँ एकांगी, संकुचित और छोटी हैं। ‘मुक्तिपथ’ तथा उसके बाद जो उपन्यास लिखे गये, उनमें परिदृष्य का विस्तार और सामाजिकता का समावेश दिखाई पड़ता है।
प्रेमचन्दोत्तर उपन्यासकारों में अपनी विशिष्ट विचारधारा, ईमानदारी और सर्जनात्मक शक्ति के कारण यशपालने स्वतंत्र व्यक्तित्व बना लिया। ऐतिहासिक दृष्टि से यशपाल को प्रेमचन्द उपन्यास-परम्परा की अगली कड़ी के रूप में माना जा सकता है। यशपाल का प्रारम्भिक जीवन क्रांतिकारी दल से सम्बद्ध था। वे इसके सक्रिय सदस्य थे, इसके लिए उन्हें चौदह वर्ष का कारावास भी मिला। कारावास काल में उनका सारा समय अध्ययन-मनन में व्यतीत हुआ। इसी समय मार्क्सवादी विचारधारा का इन पर गहरा प्रभाव पड़ा। साहित्य के क्षेत्र में उतरने पर उन्होंने इसी विचारधारा को आगे बढ़ाया। उनके उपन्यास हैं : ‘अमिता’, ‘दिव्या’, ‘दादा कामरेड’ (1941), ‘देशद्रोही’ (1943), ‘पार्टी कामरेड’ (1946), ‘मनुष्य के रूप में’ (1949), ‘झूठा सच’ : प्रथम भाग, ‘वतन और देश’ (1958), दूसरा भाग ‘देश का भविष्य’ (1960)।
रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ यशपाल की परम्परा में आते हैं। चढ़ती धूप, नई इमारत, उल्का और मरुप्रदीप उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। पर इनमें द्वन्द्वात्मक चेतना पूरे तौर पर नहीं उभरती। भगवतीचरण वर्मा प्रेमचन्दीय परम्परा के उपन्यासकार हैं। सन् ‘50 तक यह परम्परा चलती रही प्रेम चन्द ने अपने साहित्य में समसामयिक समस्याओं को चित्रित किया और वर्मा जी परिवर्तमान ऐतिहासिक धारा को मध्यमवर्ग के माध्यम से अंकित करते रहे हैं : मुख्यतः ‘40 के बाद लिखे गये उपन्यासों में। इनमें टेढ़े-मेढ़े रास्ते’, ‘आखिरी दाव’ ‘भूले-बिसरे-चित्र’, ‘सामर्थ्य और सीमा’, ‘सबहिं नचावत राम गुसाईं’, मुख्य हैं। उपेन्द्रनाथ अश्कको प्रेमचन्द-परम्परा का उपन्यासकार कहा जाता है। पर वे समग्र रूप से प्रेमचन्दीय परम्परा से नहीं जुड़ पाते। जहाँ तक मध्यवर्गीय परिवारों और व्यक्तियों की परिस्थितियों, समस्याओं और परिवेश का सम्बन्ध है, वहाँ तक वे प्रेमचन्दीय परम्परा के उपन्यासकार हैं प्रेमचन्द की अपेक्षा अधिक यथार्थवादी, इसलिए प्रामाणिक भी। प्रेमचन्द के वैविध्य और जीवन-चेतना का इनमें अभाव है। ‘सितारों के खेल’ के बाद इनके कई उपन्यास प्रकाशित हुए हैं : गिरती दीवारें, ‘गर्म राख’ ‘बड़ी-बड़ी आँखे’, पत्थर अल पत्थर’, ‘शहर में घूमता आइना’ और ‘एक नन्हीं किन्दील’। ‘गिरती दीवारें’ इनका सर्वोत्तम उपन्यास है। गर्म राख, बड़ी-बड़ी आँखे, पत्थर अल पत्थर सुगठित उपन्यासों की श्रेणी में रखे जायेंगे। अन्तिम दोनों उपन्यास ‘गिरती दीवारें’ का विस्तार हैं।
प्रेमचन्द के उपन्यासों में सामाजिक समस्याओं के आवर्त में पड़ा व्यक्ति कभी अपने को उनके अनुरूप ढालता है कभी उनसे आहत होता है, कभी छोटे-मोटे सुधारों के द्वारा समाज का परिष्कार करता है। वहाँ समाज प्रधान है, व्यक्ति गौण। मनोवैज्ञानिक उपन्यासकारों ने व्यक्ति की सनकों, अन्तर्द्वन्द्वों को समाज से अधिक महत्व दिया है।
अमृतलाल नागरके उपन्यासों में व्यक्ति और समाज के सापेक्षिक सम्बन्धों को चित्रित किया गया है। ‘नवाबी मसनद’, ‘सेठ बाँकेमल’, ‘महाकाल’, ‘बूंद और समुद्र’, शतरंज के मोहरे’, ‘सुहाग के नूपुर’, ‘एकदा नैमिषारण्ये’ और ‘मानस का हंस’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं। अपने विस्तार और गहराई के कारण ‘बूंद और समुद्र’ विशेष महत्वपूर्ण बन पड़ा है।
‘50 के बाद के दशक को आंचलिक उपन्यासों का दशक मान लिया जाता है। वस्तुतः इस समय के उपन्यासों वैयक्तिकता और सामाजिकता दोनों हैं। वैयक्तिक इसलिए कि वह पुराने नैतिक मूल्यों से मुक्त होकर खुले वातावरण में सांस लेना चाहता है, सामाजिक इसलिए कि अभी समाज को आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र होने में लम्बी मंजिल तय करनी थी। देश के विभाजन के कारण जो नई समस्याएं उत्पन्न हुई, उन्हें भी औपन्यासिक रूप दिया गया। प्रवृत्तिक दृष्टि से इस दशक के उपन्यासों को तीन प्रवृत्तियों में बांटा जा सकता है : ग्रामांचल के उपन्यास, मनोवैज्ञानिक उपन्यास और प्रयोगशील उपन्यास।
ग्रामांचल को ही समग्रता से चित्रित करने वाले उपन्यासों को ही आंचलिक कहकर आंचलिकता के अर्थ को सीमित कर दिया जाता है। फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आंचल’ के प्रकाशन के पूर्व नागार्जुन का ‘बलचनमा’ (1952) प्रकाशित हो चुका था। पर इसे आंचलिक नहीं कहा गया। यद्यपि इसमें आंचलिकता का कम रंग नहीं है। नागार्जुन के उपन्यासों में दरभंगा-पूर्णिया जिले का राजनीतिक-सांस्कृतिक साक्षात्कार होता है। इनका मार्क्सवादी दृष्टिकोण गाँव की कहानी पर आरोपित प्रतीत होता है। कथानक स्वयं विकसित न होकर पूर्वनिध ार्रित योजना के अनुसार चलता है। इसके फलस्वरूप उपन्यासों की सर्जनात्मकता शिथिल और अवरुद्ध हो जाती है। ‘बलचनमा’, ‘रतिनाथ की चाची’, ‘नई पौध’, ‘बाबा बटेसरनाथ’, ‘दुखमोचन’, ‘वरुण के बेटे’ आदि उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।
फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों को ही सर्वप्रथम आंचलिक उपन्यास की संज्ञा दी गयी क्योंकि स्वयं रेणु ने ही ‘मैला आंचल’ को आंचलिक उपन्यास कहा। ‘मैला आंचल’ के प्रकाशन के बाद ‘परती परिकथा’ प्रकाशित हुआ।
उदयशंकर भट्ट का ‘सागर, लहरे और मनुष्य’ (1955) में बम्बई के पश्चिमी तट पर बसे हुए बरसोवा गांव के मछुओं की जीवन-गाथा वर्णित है। रांगेय राघव का ‘कब तक पुकारूँ’ में जरायमपेशा नटों की जिन्दगी को उजागर किया गया है। नट-जीवन और आधुनिक जीवन की असंगतियों को चित्रित करते हुए लेखक ने उज्ज्वल भविष्य का संकेत किया है कि शोषण की घुटन सदैव नहीं रहेगी। भैरवप्रसाद गुप्त का ‘सत्ती मैया का चौरा’ मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखा गया ग्रामांचल का ही उपन्यास है।
सातवें दशक में भी ग्रामांचल को आधार बना कर राही मासूम रजा, शिवप्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र आदि ने उपन्यास लिखे। राही का ‘आधा गांव’ शिया मुसलमानों की जिन्दगी पर लिखा गया है और शिवसाद सिंह की ‘अलग-अलग वैतरणी’ में आधुनिकता-बोध को सन्न्विष्ट करने का प्रयास किया गया है। किन्तु इनके मूल स्वर त्रासद (ट्रेजिक) हैं। रामदरश मिश्र के ‘जल टूटता हुआ’ तथा ‘सूखता हुआ तालाब’ और देवेन्द्र सत्यार्थी का ‘रथ के पहिये’ ग्रामांचलीय उपन्यास हैं। श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’ पारंपरिक अर्थ में उपन्यास नहीं हैं। यद्यपि इसकी कथा ग्रामांचल से सम्बद्ध है। पिफर भी यह आंचलिक नहीं है। रिपोर्ताज शैली में लिखे गये इस उपन्यास में स्वतंत्र देश की नवीन व्यवस्थाओं का मखौल उड़ाया गया है।
छठे दशक में देवराज मुख्यतः मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार की श्रेणी में आते हैं। धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ मनोविज्ञान पर आधारित उपन्यास है, यद्यपि वह पांचवे दशक में प्रकाशित हुआ। भारती और देवराज दोनों के उपन्यासों का वातावरण महाविद्यालयीय है। ‘गुनाहों का देवता’ अपनी कैशोर्य भावुकता तथा रूमानियत के कारण काफी लोकप्रिय हुआ। ‘पथ को खोज’, ‘बाहर भीतर’, ‘रोड़े और पत्थर’, ‘अजय की डायरी’ और ‘मैं, वे और आप’ देवराज के उपन्यास हैं। इन सभी उपन्यासों की मूलवर्तिनी धारा है : विवाह के बाहर का प्रेम।
मन्मथनाथ गुप्त, भैरवप्रसाद गुप्त, अमृतराय, लक्ष्मीनारायण लाल, राजेन्द्र यादव आदि नवीन सामाजिक चेतना के उपन्यासकार हैं। भैरवप्रसाद गुप्त के ‘मशाल’, ‘गंगा मैया’, ‘सती मैया का चौरा’, अमृतराय के ‘बीज’, ‘नागफनी का देश’, ‘हाथी के दांत’ संघर्ष और प्रगति के मिथक के सूचक हैं। लक्ष्मीनारायण लाल के ‘ध रती की आँखें’, काले फूलों का पौधा’, रूपाजीवा’ में उपर्युक्त स्तर की सामाजिक चेतना को उभारने की कोशिश है। ‘काले फूलों का पौधा’ चरित्र-चित्रण, संस्कृति-संघर्ष और नव्यतर तकनीक के कारण विशिष्ट बन पड़ा है।
‘प्रेत बोलते हैं’, ‘सारा आकाश’, ‘उखड़े हुए लोग’ और ‘एक इंच मुस्कान’ राजेन्द्र यादव के उपन्यास हैं। ‘एक इंच मुस्कान’ यादव और मन्नू भंडारी का सहयोगी लेखन है। इसमें खंडित व्यक्तित्व वाले आधुनिक व्यक्तियों की प्रेम-त्रासदी (ट्रेजिडी) है। आधुनिक जीवन की इस त्रासदी को अंकित करने के कारण यह उपन्यास यादव के अन्य उपन्यासों की अपेक्षा कहीं अधिक समकालीन और महत्वपूर्ण है।
कविता में नए प्रयोगों के साथ-साथ कहानी-उपन्यास आदि में भी नये प्रयोग हुए हैं। अब कहानी का तत्व क्षीण हो गया है, कथानक का पुराना रूप विघटित होकर नया हो गया है। अब जिन्दगी पूरे तौर पर विश्लेषित न होकर चेतना प्रवाह, स्वप्न सृष्टि के साथ जुड़ गई है, प्रतीक, कालांतर आदि के द्वारा उपन्यासों में नए शिल्प के दर्शन हुए हैं। इस प्रयोग-संपर्क में प्रभाकर माचवे के परन्तु’, ‘साँचा’, और आभा’, भारतीका ‘सूरज का सांतवा घोड़ा’, गिरधर गोपाल का ‘चांदनी रात के खंडहर’, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का ‘सोया हुआ जल’ नरेश मेहता का ‘डूबते मस्तूल’ आदि अनेक प्रकार की विसंगतियों से भरे हुए प्रयोगशील उपन्यास हैं। उद्योगीकरण, महानगरीय सभ्यता, बदले हुए मानसिक परिवेश और भ्रष्ट व्यवस्था के कारण आज व्यक्ति यांत्रिक, अजनवी, अकेला या विद्रोही हो गया है। इसकी अभिव्यक्ति मुख्यतः साठोत्तरी साहित्य में होती है, भले ही उपन्यास, नाटक की अपेक्षा इसका तेवर कविता और कहानी में ही अधिक तेजस्वितापूर्ण दिखाई देता है। इस प्रकार के उपन्यासों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है :
- (1) यौन विकृतियों में पनाह खोजने वाले उपन्यास : मोहन राकेशके ‘अन्धेरे बन्द कमरे’, ‘न आने वाला कल’ और ‘अन्तराल’, निर्मल वर्मा का ‘वे दिन’, महेन्द्र भल्ला का ‘एक पति के नोट्स’ राजकमल चौधरी के ‘मछली मरी हुई’ और ‘शहर था शहर नहीं था’, श्री कान्त वर्मा का ‘दूसरी बार’, ममता कालिया का ‘बेघर’, गिरिराज किशोर का ‘यात्राएं’ मणिमधुकर का ‘सफेद मेमने’, कृष्णा सोबती का’ सूरजमुखी अंधेरे के’ आदि उपन्यास इसी कोटि के हैं। इन उपन्यासों के प्रायः सभी नायक मानसिक दृष्टि से अनिर्णयात्मक, आत्म-निर्वासित और नपुंसक हैं। वे मुक्त होने की प्रक्रिया में ऐसी उलझन में फंस जाते हैं, जहां से उन्हें निष्कृति नहीं मिलती। इन उपन्यासों से आधुनिकता का जो चित्र प्रस्तुत किया गया है, उसमें स्त्री-शरीर ‘नशे’ या ‘ड्रग’ का काम करता है। राकेश को छोड़कर शेष उपन्यासों में प्रामाणिकता की भी कमी है।
- (2) दी हुई मानवीय स्थितियों में बेमेल व्यक्तियों को चित्रित करने वाले उपन्यास : इस श्रेणी में उषा प्रियंवदा का ‘रुकोगी नहीं राधिका’और मन्नू भंडारीके ‘आय बंटी’की गणना की जाएगी। इन उपन्यासों की आधारभूमियां ठोस और प्रामाणिक हैं।
- (3) व्यवस्था की घुटन को अपनी नियति मानने या उसके विरुद्ध युद्ध करने वाले उपन्यास : नरेश मेहता का ‘वह पथ बन्धु था’, गोविन्द मिश्र का वह ‘अपना चेहरा’, बदीउज्जमा का ‘एक चूहे की मौत’, काशीनाथ सिंहका ‘अपना मोर्चा,नरेन्द्र कोहली का ‘आश्रितों का विद्रोह’ आदि उपन्यास इस कोटि के अन्तर्गत आते हैं। लक्ष्मीकान्त वर्मा ने भी कई प्रयोगशील और प्रतिबद्ध उपन्यास लिखे हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि साठोत्तरी हिन्दी उपन्यास का युग प्रयोग का युग रहा। जीवन-मरण सम्बन्धी पुराने सभी मत मतान्तरों को चुनौती दी गई है। महानगरीय अकेलापन, अत्यधिक निकटता में अजनबी पन, विसंगति, संत्रास यांत्रिक तटस्थता आदि का चित्रण किया गया है। बाह्य यथार्थ की अपेक्षा आन्तरिक यथार्थ को अधिक महत्ता दी गई है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का ‘सोया हुआ लाल’, लक्ष्मी नारायण लाल का ‘हरा समन्दर गोपी चन्दर’ जैसे आधुनिक उपन्यासों में कथा का ह्रास हुआ है कथानक का नहीं। उपन्यासों में पीढ़ियों का वैचारिक मतभेद, पति-पत्नी, भाई-बहन, माँ-बाप के सम्बन्ध में दोहरा व्यक्तित्व, अन्तःबाह्य संघर्ष, मिल मालिक और मजदूरों का संघर्ष, कृषकों का जागरूक होना पुलिस की धांधलियाँ, महाजनों के धन शोषण के तरीके महानगर, कस्बे और गावों के परिवर्तन को समग्रता में रेखांकित किया गया है। उपन्यासों में पूर्वदीप्ति शैली, आत्म कथात्मक शैली, संकेत शैली, प्रतीक शैली द्वारा मानवीय संवेदना को उभारा गया है। विषय और शैली दोनों दृष्टियों से आज के उपन्यास समृद्ध दिखाई देते हैं।
स्त्री की नजर से हिंदी उपन्यास में देह व्यापार
: बटरोही / : June 2012
हिंदी उपन्यास
ये बातें मेरे दिमाग में एकाएक तब कौंधीं, जब पिछले दिनों मैंने प्रकाशन के ठीक दस साल बाद मधु कांकरिया का उपन्यास सलाम आखिरी (2002) नए सिरे से पढ़ा। इसी क्रम में मैं नई सदी के पहले दशक में पढ़ी गई उन किताबों को याद करने लगा था, जिन्होंने मेरे दिमाग में स्थायी असर डाला था। उस दौरान भी सलाम आखिरी ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मैं अपने ही समाज को एकदम अलग तरीके से महसूस करने लगा था। शर्म तो नहीं कहूंगा, पर खुद को बेगाना महसूस करने लगा। अपने जीवन काल में औरत और मर्दों के मैंने भी अनेक रूप देखे हैं, मगर इस रूप के (जो मेरे देखते-देखते और न चाहते, एक ‘समाज’ बन चुका था) मेरे लिए मनुष्य जाति से अलग कुछ और ही था, जिसे पशु-पक्षी या कीट-पतंगों के समाज की तरह भी रेखांकित नहीं किया जा सकता।
वेश्याएं हमारे समाज का ऐसा हाशिया हैं, जहां एक-दूसरे के पूरक समझे जाने वाले स्त्री और पुरुष आपस में ही नहीं, अपने से जुड़े समाज के लिए ऐसी गलाजत बनकर उभरते हैं, जिसके बारे में टिप्पणी करना बहुत मुश्किल काम है। इस समस्या को पुरुषों के द्वारा स्त्री को अपने उपभोग की वस्तु समझे जाने की मानसिकता की तरह ठीक ही देखा जाता रहा है, हालांकि आरंभ से ही इससे जुड़े दोनों पक्षों में कुछ ऐसे अंतर्विरोध उजागर होते रहे हैं, जिस कारण इसे किसी एक लिंग के शोषण की समस्या समझना भी इसका सरलीकरण करना होगा। उपन्यास पढऩे के बाद लगता है, वेश्यावृत्ति का ‘गलीज’ पक्ष मुख्य रूप से पुरुषों के द्वारा कम उम्र लड़कियों की आर्थिक मजबूरियों का फायदा उठाकर सामने आता है। मानव इतिहास इस बात का साक्षी है कि समर्थों की वेश्यावृत्ति को खराब नजरिए से कभी नहीं देखा गया है, कभी-कभी तो इसे खुद को आगे बढ़ाने के हथियार के रूप में अपनाया जाता रहा है। ऐसे में क्या यह सच नहीं है कि हमारे समाज में वेश्या का सामान्य अर्थ ‘कोठे वाली’ से लिया जाता है! लेकिन नए समाज में, जहां कोठे खत्म हो गए हों, मगर देह का शोषण पहले की तरह ही मौजूद हो, इस प्रवृत्ति को किस रूप में देखा जाए?
क्या इसे दास-प्रथा की तरह की समस्या मानें, जो अंतत: एक दिन हमारे सभ्य होते चले जाने के साथ ही लगभग खत्म हो गई। लेकिन सच यह भी है कि इस समस्या को लेकर जितनी ही हमारी और समाज की चिंताएं उभरने लगती हैं, उसकी शाखा-प्रशाखाओं के रूप में कितने ही दूसरे अंतर्विरोध उजागर होते दिखाई देने लगते हैं। जब कि वास्तव में ऐसा है नहीं। हमारे नए समाज में वेश्यावृत्ति के पक्ष में भी तर्क दिए जाते रहे हैं, जिनका विश्लेषण उपन्यास में ही अनेक अवसरों पर खुद लेखिका ने किया है, मगर उससे समस्या की जटिलता कहीं अधिक बढ़ी है। इसके अलावा इस बात की जरूरत भी है कि स्त्री और पुरुष के आपसी टकराव से अलग हटकर भी, इसे एक अभिशाप के रूप में देखा जाना चाहिए। यह ठीक है कि वेश्यावृत्ति का जन्म भूख, बेरोजगारी और अनियंत्रित आकांक्षा के गर्भ में से हुआ है, क्या इन तीनों विषमताओं के खत्म होते ही वेश्यावृत्ति समाप्त हो जाएगी?
सलाम आखिरी विशेष रूप से इसलिए हमारा ध्यान आकर्षित करता है कि इस समस्या को कम से कम हिंदी में पहली बार एक औरत की आंख से देखा गया है। अंतत: वेश्यावृत्ति में दमन तो औरत का ही होता है, और यह दमन पुरुष की लिप्सा में से जन्म लेता है। समलिंगी वेश्यावृत्ति में भी मानसिकता के रूप में पुरुष की लिप्सा ही मौजूद रहती है, हालांकि लेस्बियन (स्त्री समलैंगिक) एकाएक इस तर्क को स्वीकार नहीं करेंगे। शायद इसीलिए इस समस्या के बारे में लिखना हमेशा से ही चुनौती-भरा काम रहा है, और जैसा कि इसके बारे में विस्तार से अध्ययन-मनन करने के बाद खुद लेखिका ने भी स्वीकार किया है, ‘कई विदेशी लेखकों तक ने इस विषय पर छद्म नाम से लिखा।’ इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि मधु कांकरिया के लिए इसे लिखना कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा।
उपन्यास के इसी असहज और प्रत्यक्षदृष्टा की तरह उठाए गए विषय की रचना-प्रक्रिया की चुनौतियों की ओर संकेत करती हुई लेखिका लिखती है, ”इस उपन्यास के दौरान लेखनी जैसे हाथों से छूट-छूट जाती थी। यहां पग-पग पर चुनौतियां थीं। प्रश्नों की नुकीली नोकें थीं। श्लीलता-अश्लीलता की चाबुकें थीं। संस्कार और संस्कृति के कठघरे थे। भाषा की अनावृत्ति का सवाल था।… एक आत्मसंघर्ष निरंतर चलता रहा – क्या रहे लेखिका की लक्ष्मण-रेखा?” प्रसंगवश, यहां पर यह स्पष्टीकरण देना गलत नहीं होगा कि ऐसा नहीं है कि वेश्याओं पर हिंदी में नहीं लिखा गया है, पुरुष-स्त्रियों दोनों के द्वारा लिखा गया है, मगर वह सारा विवेचन समस्या को दूर से, अकादमिक चिंता की तरह, एक सामाजिक विषय के रूप में देखकर लिखा गया है।
उपन्यास इसलिए भी उल्लेखनीय है कि यह न तो यथार्थ का कोरा विवरण है और न सामाजिक समस्याओं का प्रतीकीकरण। इसमें चित्रित घटनाओं को एक औरत ने उस सड़ांध के बीच जाकर प्रत्यक्ष देखा है। यह उस रूप में नरक को भोगना भले ही न हो, स्त्री के जीवन में अनचाहे, परिस्थितिवश पैदा हो गए नरक की व्यथा को भोगकर तो व्यक्त किया ही गया है। जिस ‘हिंदी समाज’ की सड़ांध के बीच इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र रचा गया है, वह ‘भारतीय’ या ‘वृहत्तर’ समाज से अलग है; जाहिर है कि इस रूप में उसकी समस्याएं और अंतर्विरोध भी अलग हैं। मानव-संस्कृतियों की हमने जो अलग-अलग स्वायत्त टुकडिय़ां तैयार की हैं, और उसे अपनी पहचान मानकर हम जिस तरह लड़ते रहे हैं, उसी का बहुत साफ आईना है वेश्याओं का संसार, लेकिन भिन्न रूपों में। फर्क यह है कि वेश्याओं के अपने स्वायत्त संसार की भाषा अलग होते हुए भी उनकी व्यथा एक है जब कि हमारे वास्तविक संसार में भाषाएं ही उनकी स्वायत्त ‘व्यथाओं’ को निर्मित करती हैं और एक-दूसरे को अपना दुश्मन बनाती हैं। लगभग यही स्थिति भारतीय समाज के बड़े छाते में रहने वाले हमारे पुरखों के सामंती समाज की भी है जिसमें कुलीनों के द्वारा देवभाषा संस्कृत और सामान्यों के द्वारा तद्भव भाषाओं का प्रयोग किया जाता था।
वेश्याओं से जुड़े इन बहुआयामी अंतर्विरोधों को लेकर लेखिका की चिंता को कोई भी कैसे अनदेखा कर सकता है: ”इन लालबत्ती इलाकों की संख्या खतरनाक गति से बढ़ रही है। पहले इने-गिने इलाके थे और वेश्याएं भी शाम ढले निकलना शुरू होती थीं। आज इलाके बहुत बढ़ गए हैं, और सुबह से लेकर गहराती रात तक गलियों के मुहाने तक ग्राहकों के इंतजार में प्रतीक्षा करतीं और कमर दुखाती जीवन से थकी-ऊबी, लिपी-पुती किशोरियां मिल जाएंगी। राष्ट्रीय महिला आयोग, 95-96 के अनुसार भारत के महानगरों में दस लाख से भी अधिक वेश्याएं हैं और पिछले साल से इसमें 20 प्रतिशत इजाफा हुआ है। इस समाचार पर गंभीर विचार करना तो दूर, संभ्रांत वर्ग यह मान बैठा है कि वेश्यावृत्ति बंद नहीं हो सकती। एक बौद्धिक से पूछा गया, ‘क्या वेश्या उन्मूलन संभव है?’ उसने जवाब दिया, ‘हां, संभव है, पर वह उसी प्रकार का होगा जिस प्रकार कि ‘सोसाइटी विदाउट ए गटर।’ इस भावशून्यता एवं भावनात्मक क्षरण के जवाब में यही कहा जा सकता है कि जनाब कभी यही तर्क दास प्रथा के लिए भी दिए जाते थे!…”
सलाम आखिरी की कहानी तीन स्वतंत्र कथाओं में रची गई है, हालांकि तीनों कथाएं एक-दूसरे के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई हैं। एक ओर हाशिए के इन लोगों को लेकर नायिका सुकीर्ति और मेघेन तथा विजय की बौद्धिक बहसें हैं, दूसरी ओर समानांतर चलते दो शेयर मार्केट हैं – एक ‘सट्टा बाजार के मुगले आजम’ मन्नालाल जी का और दूसरा कोठेवालियों का सड़ता-गंधाता शेयर बाजार, जो कभी चढ़ता नहीं लुढ़कता ही है। उपन्यास में 28 उप-कथाएं हैं जो मिलकर भारतीय समाज में सदियों से पनपते रहे देह-व्यापार की एक समानांतर सृष्टि की पुनर्रचना करती हैं: ”यह दुनिया कलकत्ता महानगर के विभिन्न दरवाजों – सोनागाछी, बहू बाजार, कालीघाट, बैरकपुर, खिदिरपुर आदि में खुलती है। यहां जीवन के कुरूप से कुरूप एवं भयंकर से भयंकर नग्न रूप मिल जाएंगे क्योंकि यहां संस्कृति, मर्यादा और परंपराओं का कोई डर नहीं है। बंधन नहीं है। इस रूप के बाजार का रूपविहीन जीवन अपने चरम रूप में आपके समक्ष खुलते थान की तरह बेशर्मी से खुला हुआ है।”
फिल्मी कमेंट्री की तरह का यह विवरण हिंदी की गंभीर मुखमुद्रा वाले पाठकों को कुछ हद तक हिकारत-भरा लग सकता है, मगर यह मेलोड्रामा उस यथार्थ से कहीं अधिक जटिल और वास्तविक है।
”…देखो, आज से पचास-पचपन वर्ष पीछे की ओर मुड़ो तो तुम पाओगी कि पुरुष इन जगहों पर सिर्फ इसलिए नहीं जाते थे कि वे काम के मारे होते थे। तब की उच्चकोटि की कलावती वेश्याएं जहां वासना का शमन करती थीं वहीं कला का भी उच्च कोटि का आनंद देती थीं। शेरो-शायरी, दोहे, कवित्त, मुहावरों और कहावतों का तो अक्षय कोष ही होता था उनके पास। उनकी संभाषण कला, हाजिरजवाबी, रसिक मिजाजी एवं नृत्य-संगीत आदि का मजा लूटते रईस, शौकीन एवं सुसंस्कृत व्यक्ति तक जाते थे वहां। और वह भी बिना विशेष अपराध-बोध के, खुले आम। और सिर्फ युवक ही नहीं, प्रौढ़ और बौद्धिक कला-मर्मज्ञ तक।… पर शहरी औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की आंधी के साथ ही कला, कला का हुनर और अदाकारी सिमटती चली गई और सिर्फ देह ही बची रह गई।… कला परिदृश्य से लगभग विलुप्त हो गई और बचा रह गया केवल शरीर… एक स्थूल शरीर… कलाहीन, रूपहीन रूप की हाट में बिकता एक रुग्ण शरीर।… (पृ. 59)
संसार की किस फैक्टरी में ढाली जाती हैं ये वेश्याएं? ये ढाली जाती हैं या समाज की खुशहाली अथवा परिवार की किलेबंदी के बाई-प्रोडक्ट के रूप में खुद-ब-खुद अंकुरित हो जाती हैं?
कुटनी मीना की कहानी
”आध्यात्मिक तल्लीनता के साथ ही भात के बड़े-बड़े गोले बना-बना कर खा रही है मीना। बगल के तख्ते पर आराम फरमाती एक लाइनवाली। उसके करीब दीवार से सटकर बैठी कोई दूसरी लड़की हाथों की उंगलियों में नेल-पॉलिश लगाती हुई। एकदम कच्ची उम्र की ताजी, जैसे अभी-अभी अंडे से फूटी हो।… छह लाइनवालियां इस चकले में। अधिया सिस्टम के अंतर्गत मीना की जी-हजूरी में। कच्ची कचनार नूरी। झिलमिल कृष्णा। हल्ला वेश्या रमा। पुराना चावल नलिनी। तेजपत्ता जूली। दरिद्रता की तरह दयनीय चंपा। सिवाय जूली के सभी अलसाए और आराम के मूड में।…
”मलिन चेहरा, सूजी आंखों के पपोटे एवं थके तन के साथ एकदम तमतमाए मूड में है जूली। कल रात चूहे की-सी शक्ल वाले मिनमिनाते एक ग्राहक ने विकल वासना के आवेग में उसे भरपूर साथ न देने के कारण एवं उसे मनमानी करने से रोक दिए जाने के कारण भरपूर चांटा मार दिया था। उसने कमरे से बाहर निकलते ही शिकायत की थी मालकिन से – साले ने मुझे बाप का माल समझकर बॉक्सिंग बैग की तरह पीटा था।…
”पचास प्रतिशत मालकिन और पचास प्रतिशत मौसी के भावयोग से मीना उसे कभी धमकाती और कभी समझाते हुए कह रही थी ‘कैसी माथाफिरी तुम। अभी नेई-नेई हो ना… आस्ते-आस्ते सब बूझोगी। कोई भी गिराहक इस कदर ठंडी ठस्स मूरती से प्रेम नहीं करना चाहता… पैसा देता तो मजे के लिए ही ना… खाली गोल-गोल गुलवा से बात नहीं बनती।… थोड़ी बहुत ऐक्टिंग तो इस लाइन में करनी ही पड़ती है… सभी कोई करती हैं। तुम भी कोई सीता-सावित्री तो हो नहीं। …
”…टीवी पर अब चैनल बदल गया था। … इस बार ध्यान से देखा सुकीर्ति ने- लगभग नूरी जितनी ही छोटी, मासूम-सी कृष्णा। फर्क इतना ही कि जहां नूरी रूप-रंग में सामान्य थी, कृष्णा खासी खूबसूरत थी। वेश्या की प्रचलित छवि से जब किसी प्रकार तालमेल नहीं बैठा पाई वह तो हठात् मुंह से निकल गया उसके, यह बच्ची, यहां?…
”…मीना, चंपा, रमा सब हंस पड़ीं, ‘जिसे आप बच्ची समझ रही हैं, वह खुद एक बच्ची की मां है, हर महीने हजार रुपए भेजती है उसे। यह खुद इक्कीस वर्ष की है।… मीना अपनी ठेठ चकले की मालकिन की मुद्रा में उसे तौलती-परखती उसके अंग-विशेषों पर गौर फरमाती पास बैठी रमा से कहने लगी- पांच वर्ष होए गिएछे एक्खाने ऐछे… एक्खुन तो भालो ही आच्छे। (पांच वर्ष हो गए है आए, अभी तक तो अच्छी ही है।)
”… अब इस तस्वीर के दूसरे पहलू पर!… आज कुटनी बनी मीना की कहानी उन लोगों से भी दयनीय थी, जिन्हें वह आज मौसी बनकर समझा रही थी। ”अतीत के सागर में उठती हुई लहरों, झिलमिलाती कोई अधूरी, कोई पूरी तस्वीरों को याद करती हुई मीना वेश्या बनने की अपनी कहानी बताती है—
”बंगाल के तलहटी गांव में हम चार बहनें और तीन भाई थे। मैं सबसे बड़ी, हाथ को ऊंचा कर बताती है, कितनी बड़ी, तकरीबन साढ़े दस-ग्यारह वर्ष की। खपरैल की छतवाला कच्चा- पक्का हमारा छोटा-सा घर था। अच्छे से याद है जब कभी जोर-जोर से आंधी चलती, मां को पहली चिंता यही सताती कि उसे घर फिर से बनाना पड़ेगा।
”घर में सदैव चिक-चिक मची रहती। हर चीज का टोटा – आए दिन मारपीट। चौबीस घंटे की हाय! हाय! खाने वाले इतने जन और कमाने वाला सिर्फ बाप। एक बार बाबा (पिता) के दोस्त ने मुझे पास के ही गांव में किसी घर में चौका-बर्तन का काम धरा दिया।… एक-एक करके तीनों घरों में चौका बरतन करती, कपड़े धोती, एक घर में एक छोटा बच्चा भी था। मुझे घिन लगती थी उसका गू-मूत उठाने में फिर भी मुझे यह सब करना पड़ता।… एक बार एक प्याली टूट गई तो मालकिन ने झोंटा पकड़ लिया, कान मरोड़ दिया और पैसे काट लिए।… कुछ दिन मैं घर पर ही रही कि तभी एक जनानी आई, उसने कहा कि तुम्हें ऐसा काम दिलवा दूंगी, जिसमें तुम्हें कम-से-कम खटनी पड़ेगी। पगार और खुराकी भी अच्छी मिलेगी, बस तुम्हें पांच-छह बरस की एक बच्ची की देखभाल करनी पड़ेगी। लेकिन इसके लिए तुम्हें कलकत्ता रहना होगा।…
”मैं उस जनानी के साथ कलकत्ता चली आई। आते वक्त पिता ने गांव का पता कई बार बुला-बुला कर मुझे रटवा दिया, वहां तीन गांवों के बीच एक डाकखाना था। बुखार में भी बाबा अढ़ाई कोस चलकर तीन पोस्टकार्ड खरीदकर लाए, और मुझे पकड़ाया कि मैं बीच-बीच में अपनी खबर देती रहूं। मां के पास एक छिपाकर रखी हुई चप्पल थी, मां ने मुझे दे दी। पुतुल के पास एक बढिय़ा फूल कढ़ी फ्रॉक थी, जिसे वह हमेशा मुझसे छिपाकर रखती कि कहीं मैं पहन न लूं, उसने वह मुझे दे दी। सबको रोते-बिलखते छोड़ मैं उस जनानी के साथ कलकत्ता चली आई। अपने वादे के मुताबिक उस जनानी ने मुझे काम दिलवा दिया। यहां मैं सचमुच आराम में थी। बस एक बच्ची के साथ खेलना, उसे नहलाना और खिलाना। लेकिन फिर भी मन खराब रहता, अपना गांव खींचता था हर पल। …
”…तब तक मैं कुछ नहीं जानती थी। उस आदमी ने मुझे उसके कमरे में आने के लिए कहा। … मैं नहीं समझी कि यह बुलावा मेरी बर्बादी का था। उसने मुझे एक टॉफी दी, ठीक वैसी ही टॉफी वह अपनी बच्ची के लिए भी लाता था। टॉफी को देखकर मुझे फिर अपने भाई-बहनों की याद सताने लगी, मेरी आंखें भर आईं, मैंने रुंधे गले से कहा, मुझे कुछ दिनों के लिए अपने गांव जाना है। उसने कहा, हां, कल ही तुम्हारे जाने की व्यवस्था करता हूं, बस थोड़ी देर तुम लेट जाओ और साथ में ही उसने मुझे आहिस्ता से बिस्तर पर धकेल दिया। … मैं मां-दुर्गा, मां-दुर्गा का जाप करती रही और वह मुझे लूटता रहा।… फिर तो प्राय: हर रात उसकी लड़की बगल के कमरे में सोई रहती, तो वह मेरे साथ यही शहरी खेल खेलता, मैं रोती, विरोध करती तो वह धमकाता कि किसी को भी कहा तो चोरी करने के आरोप में पुलिस को पकड़वा दूंगा। …
”उस रात उसे तेज बुखार था, बस इसी का फायदा उठाकर मैं हिम्मत करके घर से भाग गई। मुझे तब तक यह भी नहीं पता था कि हर जगह के लिए अलग-अलग टिरेन होती है। मैंने सोचा कि टिरेन में बैठने-भर से मैं अपने गांव पहुंच जाऊंगी। बस मुझे स्टेशन का ध्यान रखना है। लेकिन मेरे पास टिकट नहीं था और न पैसे, इस कारण टीटी को देखते ही मेरी हवा निकलने लगी। मैं धार-धार रोने लगी। वहीं पर बैठे एक मुसाफिर ने मुझे बचा लिया और अपने घर ले गया। मैंने उसे सारी आपबीती सुना दी। बाद में मुझे पता चला कि वह रेलवे कर्मचारी था एवं जहां वह मुझे ले गया, वह रेलवे क्वार्टर था। एक रात उस नामर्द ने अपनी जात बता ही दी और मुझ पर किरपा करने की कीमत वसूल ली। उसके बाद उसने मुझसे कहा … तुम वेश्या हो गई हो। …छह महीने तक भोग-भाग कर, अघाकर एक रात वह भी मुझे इन्हीं अंधेरी गलियों में बेच गया।…
”मैं चाहती तो भाग भी सकती थी, पर तब तक मैं भागते-भागते बहुत थक गई थी।… पूरी तरह निराशा और अंधकार में डूबा मेरा मन समझ चुका था कि ई हरामखोर दुनिया से मुझे अब कुछ मिलना नहीं है। यहां सभी मर्द हरामी हैं। … अपने मां-बाप का धियान कर, उनसे मन-ही-मन माफी मांगकर मैंने अपनी नई बनी चकले की मालकिन द्वारा दी गई नई साड़ी पहन ली और वेश्यावृत्ति कबूल कर ली।”… और बोलते-बोलते छाती को चीरकर उसकी रुलाई फूट पड़ी थी।…
मिथक-पात्र बनाम वास्तविक पात्र
इन दिनों जिस स्त्री-विमर्श की खास चर्चा है, मधु कांकरिया का विमर्श उसमें छिपे विभ्रम और अंतर्विरोधों को काफी हद तक दूर करता है। हालांकि सलाम आखिरी में लेखिका ने कहीं ऐसा दावा नहीं किया है, न कहीं पर उनकी ऐसी मंशा व्यक्त हुई है। उपन्यास स्त्री-अस्मिता के प्रश्न को लेकर ही लिखा गया है, कई जगह बेहद भावनाशील प्रसंग आए हैं, संवादों में कहीं-कहीं भावुकता भी दिखाई देती है, लेकिन उपन्यास कहीं पर ‘लाउड’ या अतार्किक नहीं लगता। उपन्यास की नायिका सुकीर्ति का पक्ष तो लेखिका का अपना ही है, अनेक दूसरी इतिहास-प्रसिद्ध अथवा परिचित स्त्रियों के उल्लेख के माध्यम से उन्होंने स्त्री से जुड़े हर कोण से उनका पक्ष रखा है। जाहिर है कि जब उपन्यास की नैरेटर ही लेखिका है तो अस्पष्टता की गुंजाइश ही कहां बचती है? अब बचता है, स्त्री के बारे में पुरुष पक्ष। चूंकि यह कोई अकादमिक विवेचन से जुड़ी बौद्धिक कसरत नहीं है, इसलिए उपन्यास में इस पक्ष को प्रस्तुत करने के लिए लेखिका ने दो चरित्रों की ‘सृष्टि’ की है – मेघेन और विजय की, जो सुकीर्ति के मित्र हैं और उससे प्रेम करते हैं। (बहुत संभव है, ये दोनों भी सुकीर्ति की तरह वास्तविक पात्र हों!) मेघेन सुकीर्ति के कॉलेज जीवन का साथी है जो नाटे कद का होने के कारण एक विचित्र किस्म की असुरक्षा-ग्रंथि का शिकार है। कॉलेज के दिनों में वह सुकीर्ति को चाहता था, मगर अपनी ‘बोंसाई ग्रंथि’ के कारण वह सुकीर्ति का नहीं हो पाया, हालांकि विवाह के अनेक वर्षों के बाद भी उसके मन में है कि सुकीर्ति उसे चाहती है। यही स्थिति विजय के साथ भी है। विजय इतिहास का विद्यार्थी है, खूब पढ़ा-लिखा है, उसके अपने मजबूत तर्क हैं, मगर अंतत: उसके तर्क भी सुकीर्ति को उतने ही हवाई अनुभव होते हैं, जितने कि दूसरे तमाम पुरुषों के। इसे उपन्यास के शिल्प का करिश्मा कहें या उसकी विश्वसनीयता, इसमें लेखिका ने अपने निजी चरित्र और चिंतन को फिक्शन के चरित्र और उसकी दृष्टि के साथ इस प्रकार एकाकार कर दिया है कि यह पहचान पाना लगभग असंभव हो गया है कि इसमें कहां कथा है और कहां सत्य… हालांकि साहित्य में इसकी जरूरत नहीं पढऩी चाहिए। मुख्य चीज तो यह है कि रचना पाठक को अपने संसार का अंग बना सकी है या नहीं? सलाम आखिरी इस दृष्टि से अपना काम पूरी कलात्मकता के साथ निभा ले जाता है।
उपन्यास में तीन ऐतिहासिक स्त्री-चरित्र भी हैं, आम्रपाली, मदनिका और कोशी। ये तीनों ही संभ्रांत वेश्याएं हैं, जिनकी भारतीय इतिहास में विशिष्ट भूमिका रही है। ये तीनों ही अपने समय के महान पुरुष चरित्रों – बुद्ध (आम्रपाली), चाणक्य (मदनिका) और महावीर (कोशी) की पुरुष-ग्रंथियों को उजागर करने के लिए रची गई हैं और इस रूप में यह प्रसंग स्त्री-विमर्श के बारे में प्रस्तुत किया गया पुरुष-पक्ष है। इस प्रकार दो कथा-चरित्रों और तीन ऐतिहासिक पुरुष चरित्रों के माध्यम से लेखिका ने स्त्री-विमर्श का एक संतुलित, संपूर्ण एवं प्रभावशाली पक्ष रखा है। इस अर्थ में यह पहली किताब है जिसमें बिना बड़बोलापन और बिना किसी एक का पक्ष लिए लेखिका ने स्त्री का (अपना नहीं) पक्ष रखा है, यह भी इस उपन्यास की अभूतपूर्व पहल है।
ऐतिहासिक पुरुष-पात्रों के माध्यम से लेखिका ने जो बहस खड़ी की है, उससे अधिकांश पाठक परिचित हैं, हालांकि इस संदर्भ में लेखिका का पाठ एकदम नया और मौलिक है। मेघेन और विजय जो एक प्रकार से लेखिका के अपने समय के पात्र हैं, उस पुरुष दृष्टि के सफल प्रस्तोता हैं, जिनके बिना उपन्यास की सम्यक् एवं संतुलित दृष्टि नहीं बन पाती। यद्यपि बोंसाई का प्रतीक लेखिका ने वेश्याओं के लिए प्रयुक्त किया है, जो कम उम्र में ही इतनी प्रौढ़ हो जाती हैं कि जीवन के किसी भी छोर को जी नहीं पातीं: एक जंग लगी बंद खिड़की की तरह जिसका चेतना-पक्ष ही जैसे मर जाता है… मगर यह प्रतीक मुख्य रूप से उस पुरुष दृष्टि के अविकसित चिंतन को रेखांकित करता अधिक लगता है, जो किसी भी समस्या पर अंतिम तर्क सुनने से पहले अपने पक्ष का स्पष्टीकरण खोजने लगता है। इतिहास बताता है कि स्त्री के जो अस्तित्वगत प्रश्न हैं, उन्हें पुरुषों के द्वारा अपने शगल की तरह पेश किया जाता है। मेघेन का बौना कद कहीं-न-कहीं पुरुषों की स्त्रियों को लेकर बौनी सोच को दर्शाता है। मेघेन और विजय की वेश्याओं को लेकर की गई बहस, स्त्रियों के प्रति उनकी हार्दिक सहानुभूति के बावजूद, पुरुष के सहारे के बगैर स्त्री के समाज में न खड़ा हो सकने के सोच से जुड़े तर्क हैं और ऐसे प्रसंग उपन्यास में बार-बार आते हैं।
‘ये ही मुझे बताती है कि मैं कौन हूं’ शीर्षक एक उप-अध्याय में लेखिका ने कुछ इतिहास-प्रसिद्ध वेश्याओं के माध्यम से भारतीय पुरुषों का स्त्री-पक्ष प्रस्तुत किया है, (विजय के माध्यम से) जाहिर है कि इसी पक्ष ने भारतीय इतिहास की रूपरेखा तय की है। पुरुषों का आज भी वेश्याओं के पास जाने को किसी भी प्रकार की अनहोनी घटना न समझने वाला विजय बड़े गर्व से अपने युवा मित्र के द्वारा अड़तालीस स्त्रियों के साथ शारीरिक संपर्क की बात करता है और जब सुकीर्ति उसे ‘पुरुष वेश्या’ कहलाना अधिक उपयुक्त समझती है, तब भी विजय के पुरुषों के पक्ष में अपने तर्क हैं:
”जहां तक मैं जानता हूं, वेश्यावृत्ति हमारी संस्कृति के हर कालखंड में किसी-न-किसी रूप में जीवित रही है, चाहे वह महाभारत काल रहा हो, मौर्यकाल या वैदिकी काल। बस यूं समझ लो कि जगन्नाथपुरी के रथ की तरह वेश्यावृत्ति के रथ को खींचने के लिए हर युग में पुरुष आते रहे।…’
”हां-हां, इतिहासकारों के अनुसार वैदिक काल में गणिकावृत्ति अस्तित्व में थी। वेदों में प्रयुक्त पुनश्चली, महानग्नी और रांभा जैसे शब्द निम्नकोटि की गणिकावृत्ति के ही सूचक हैं। जैन और बौद्ध धर्म की जातक कथाएं गणिकाओं के उल्लेख से भरी पड़ी हैं।
”हां, एक फर्क अवश्य पड़ा है, पहले जहां वे काम के अलावा रिझाने की भी दुकान लगाती थीं, वहां अब सिर्फ काम की ही दुकान लगती है। देव वेश्या, तीर्थंगा (तीर्थ वेश्या) जैसे शब्द क्या सूचित नहीं करते कि तीर्थस्थानों में भी वेश्यावृत्ति का निकट का संबंध था। उसी प्रकार विषकन्या और विषांगना जैसे शब्दों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि शत्रु विनाश के लिए भी इनका प्रयोग होता था। यात्रा-प्रस्थान के समय उनका सामने आना शुभ संकेत समझा जाता था। प्रात:काल उनका मुख देखना शुभ समझा जाता था क्योंकि उन्हें सदा सुहागन माना जाता था।… अरे, जानती हो, वात्स्यायन ने तो महापुरुषों की वासना-तृप्ति करने को भी गणिकाओं का धर्म माना है। मौर्यकाल में तो गणिकाओं की देखरेख के लिए सरकारी विभाग तक भी बना दिए गए थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सरकारी गणिकाध्यक्ष को यह आदेश था कि वह रूपवती, जवान और कला-निपुण युवतियों को एक हजार पणम के वार्षिक वेतन पर गणिका की हैसियत से नियुक्त करे।…
”सोचने की बात यह है कि यहां सैद्धांतिक तौर पर नारी पूजा की वस्तु रही है पर व्यवहार में सदैव ही काम की वस्तु रही। कुछ आस्थावान नारी पात्रों को छोड़कर यहां सारी मूर्तियां प्राय: नग्न ही रहीं।… प्रसिद्ध यात्री मार्कोपोलो ने और बाद में एक अन्य यात्री हेमिल्टन ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि देवदासी यदि रूपवती होती तो कोई-न-कोई धार्मिक सेठ उसे मंदिर से अपने भोग के लिए ले जाता- लेकिन वृद्ध देवदासियों को बिना सुरक्षा के ही मंदिरों से निकाल दिया जाता था। इन देवदासियों के प्रथम संभोग का अधिकार कई जगह उस व्यक्ति को भी मिलता था जो मंदिर को सर्वाधिक धनराशि दान देता था- और कई जगह यह सौभाग्य केवल ब्राह्मणों को मिलता था।”
बोंसाई और वेश्या
इतिहास में अंकित कुलीन वेश्याओं को इसलिए याद किया जाता है कि इनका समर्पण महान नायकों के लिए था। लेकिन आज की इन बोंसाई वेश्याओं का क्या किया जाए, जिनका नाम लेना भी अपने अंदर गलीज पैदा करना है। यह प्रसंग स्त्री-विमर्श के उन स्व-घोषित नायिकाओं के लिए एक सीख भी है जो सीता, द्रोपदी-जैसे मिथकीय चरित्रों तक तो ठीक, आज के चरित्रों के रूप में भी इन ‘गलीजों’ के बदले धनिया, झुनिया या ‘उसने कहा था’ की सूबेदारनी, ‘आकाशदीप’ की चंपा आदि काल्पनिक चरित्रों की शरण में जाते दिखाई देते हैं।
”इन वेश्याओं के अवरुद्ध मानसिक विकास को देखकर सुकीर्ति को उसी बोंसाई पद्धति की याद आ गई थी। इन वेश्याओं में से करीब नब्बे प्रतिशत बारह-तेरह वर्ष की उम्र में ही इस माहौल में आकर बंद हो जाती हैं। किसी बाड़े में बंद भेड़ों का-सा जीवन उनका। चकले की मालकिन एवं दलाल उन्हें किसी से मिलने-जुलने तक नहीं देते कि कहीं चिडिय़ा उड़ न जाए। मुश्किल से इनकी भाषा में सत्तर-अस्सी शब्द होते हैं- अंगिया, खटिया, अंगना, जोवना, तकिया, बतिया, कंगना, चूमा, चिपटा, लिपटा जैसी सिर्फ देह की भाषा तक ही सीमित। अधिकांश का मस्तिष्क एक बच्चे के मस्तिष्क से अधिक विकसित अवस्था में नहीं रहता है।…”
अपने इस उपन्यास में मधु कांकरिया ने इस बात का बहुत साफ संकेत किया है कि इस मानवाधिकार के युग में वंचितों को मुख्यधारा में लाने के लिए केवल सैद्धांतिक सहानुभूति से काम नहीं चलेगा और समाज-सेवा जैसे मानवीय मुद्दों को अपने कैरियर की सीढ़ी बनाने की कुटिलता से भी बचना होगा। एक छोटी-सी बंद दुनिया में कैद और वहीं अपनी चेतना की पहली से लेकर आखिरी सांस तक का सफर करने वाली ये लाइनवालियों को उस तरह की सहानुभूति की भी दरकार नहीं है, जिससे कि उन्हें अपनी इसी दुनिया में पहचान अथवा सुविधाएं मिलें। जिसकी कोई पहचान ही नहीं है, उसे सुरक्षा कैसे दी जा सकती है और देगा भी कौन? दी भी क्यों जानी चाहिए? उपन्यास की नायिका इस ‘चेतनाहीन चेतना’ के बारे में बताती है, ”तुमने देखा है, ये कितनी मूर्ख और कूप-मंडूक होती हैं। एक बच्चे की तरह भोला मन होता है इनका। सहज ही किसी की बात का विश्वास कर लेती हैं ये। पहले की वेश्याएं तो फिर भी रिझाने, जलाने और तड़पाने के गुर जानती थी पर आज की लाइनवालियां तो खुद ही इतनी जली-भुनी, चिड़चिड़ी और तपी रहती हैं कि ये यह भी नहीं समझ पातीं कि ग्राहक इनसे सिर्फ देह ही नहीं, इनके नारीत्व की गरिमा को भी भोगने आता है। परिस्थितियों ने कोड़े मार-मार कर इनकी शर्म, इनका स्व और इनकी अंतर्निहित गरिमा, सभी कुछ छीन लिया है। तुम अब इन सूखी ठठरियों से कैसे आत्मसम्मान की मदद करते हो?…
धर्म और व्यभिचार
किसी रचना में, खासकर एक उपन्यास में तो निश्चय ही, लेखक के लिए सबसे चुनौती-भरा काम होता है, अपना स्वायत्त संसार रचने के बाद कैसे उसके चरित्रों को उस संसार का नागरिक बना पाता है, जहां वे चैन की सांस ले सकें, या, कहा जाए कि लेखक की समानांतर दुनिया का अस्तित्व बचा रह सके। सलाम आखिरी के 20वें अध्याय ‘जहां हर घर कालाहांडी है’ में लेखिका ने अपनी दुनिया का यह सिंहावलोकन प्रस्तुत किया है। समाज में अराजकता और अनाचार फैलाने वाली ताकतों को चिह्नित करने के बाद भी कैसे वह व्यवस्था लाई जा सके जिससे कि कीड़े-मकोड़ों की तरह, जीते-जी नरक की जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त असंख्य लोगों का यह सिलसिला फिर से सिर न उठा सके।
धनबाद के पारसनाथ मंदिर में जो दृश्य दिखाई दिया था, उसी ने उसके मन में भारतीय समाज में बोंसाई पौधों की फसल के समान तैयार किए जा रहे वेश्याओं के संसार की ओर आकर्षण पैदा किया था।… हालांकि वे वेश्याएं नहीं थीं, मगर उतना ही गलीज और घिनौना जीवन जीने के लिए अभिशप्त! कौन थे वे लोग, जो नए भारत की जातीय पहचान बनकर उभर चुके थे और आजाद भारत के दावों के समानांतर वास्तविक भारत के रूप में दोमुंहे केंचुओं की तरह इस महादेश की सड़ांध में कुकुरमुत्तों की भांति फैलते चले जा रहे थे।… उनकी धार्मिक आत्माओं को इतनी पीडि़त मानवता छू नहीं पाती।…”
वह परिदृश्य यहीं पर ठहर नहीं जाता है, आगे जंगल की ओर मुड़ती है सुकीर्ति तो वहां भी भूख, बेकारी और हाहाकार का तांडव! कुछ औरतें महुवे के पेड़ के नीचे उसके पत्ते बीन रही थीं। कुछ औरतों ने उन पत्तों को जलाया और पूछने पर बताया कि जले हुए पत्तों के चूरे से घर में रोटियां बनाई जाएंगी। महुए के जो बीज औरतें बीनेंगी, उसका आधा हिस्सा उन्हें आंख बंद करके पुजारियों और ठेकेदारों को अपना हिस्सा देना होगा, वरना पूरा परिवार भुखमरी और बेकारी की आग में झुलस जाएगा। मंदिर के पास करोड़ों का फंड है, इतना कि उससे भिखारियों के इस विशाल जुलूस को खुशहाल बनाया जा सकता है, मगर वे लोग ऐसा नहीं करेंगे।
मंदिर के पंडों, पुरोहितों, ठेकेदारों, एजेंटों की देह की तरह फूलते चले जा रहे और भिखमंगों, लाइनवालियों तथा आदिवासियों की तरह सिकुड़ते चले जा रहे हमारे राष्ट्रीय चरित्र को लेकर इतनी गहरी चिंता व्यक्त करने के बावजूद कैसे इनको ठिकाना लगाया जाएगा, इसका उत्तर उपन्यास में नहीं है, शायद हम में से किसी के पास नहीं है। लेखिका की ओर से जो निदान प्रस्तुत किए गए हैं, माया देवनार, रेशमी, पिंकी, उसकी बेटी मलका… और इसी तरह के उनके उत्तराधिकारियों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो पहले की अपेक्षा कहीं भयावह यौनरोगों और कुपोषण की समस्या से ग्रस्त होते जा रहे हैं!… सुकीर्ति ने उपन्यास का अंतिम अध्याय ‘इवेन गांधी एंड ईसा वर नॉट एक्सेप्टेड हंड्रेड परसेंट’ लिखते हुए सुना: ”रेशमी को उसके चकले की मालकिन ने अपने चकले से निकाल दिया था और उसकी जगह उसने पिंकी की लड़की मलका को ले लिया था।…
”जीवन-संध्या में मिले इस निष्कासन से रेशमी का रहा-सहा संतुलन भी गड़बड़ा गया था।
”साढ़े तेरह वर्षीया मलका अब फुल टाइम वेश्यावृत्ति में आ गई थी। उसी का ग्यारह वर्षीय भाई मुहल्ले के गंदे बच्चों के साथ रह-रहकर कई कुटेवों का शिकार हो गया था। विजय से एक बार सुकीर्ति ने चर्चा की थी। पिंकी के लड़के राजा की कि किसी भी प्रकार उसका किसी स्कूल में दाखिला हो जाए तो उसका खर्चा मलका उठाने को तैयार थी। उसकी मां ने मरते वक्त कहा था, वह अपने छोटे भाई का ख्याल रखे। यूं भी भाई के प्रति ममता का पार नहीं था।…”
मगर यह कोई औपन्यासिक अंत नहीं है। इसीलिए सलाम आखिरी को लेकर कई लोगों ने यह सवाल उठाया था कि इसे उपन्यास माना जाय या किसी और साहित्यिक विधा का नाम दिया जाए! असल में जिन लोगों को इस महागाथा में चरित्रों के रूप में समेटा गया है, वे भी बेनाम लोग ही तो हैं, बिना निजी पहचान के जन्म लेते हैं, एक पल के लिए किसी की पहचान बनकर अंकुरित होते हैं, मगर दूसरे ही पल उसी बदबूदार गटर के लिसलिसे बहाव में गायब हो जाते हैं। अगर संसार की महाशक्ति की दहलीज पर पहुंच चुके इस महादेश के सवा अरब लोगों के पास इसका उत्तर नहीं है तो हिंदी की लेखिका मधु कांकरिया के पास भला कैसे होगा?
महाभारत कि रहस्यमयी एवं अनसुनी महान प्रेम-कहानियां)
"महाभारत युद्ध में अपने ही पुत्र के हाथों मारे गए अर्जुन को किसने किया पुनर्जीवित?"
(महाभारत कि रहस्यमयी एवं अनसुनी महान प्रेम-कहानियां)
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महान धनुर्धर अर्जुन हमेशा अजेय माने जाते रहे हैं. महाभारत में अर्जुन के समान धनुर्धर और कोई नहीं बन सका इसके बावजूद अर्जुन कई जगह हारे. द्रौपदी पांचों पांडवों की पत्नी मानी गई हैं पर वह मुख्य रूप से अर्जुन की प्रिय थीं. अर्जुन ने ही धनुर्विद्या से द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था और उनसे विवाह किया था. कुंती के अनायास ही फल बांटकर खा लेने के कथन का पालन करते हुए द्रौपदी पांचों पांडवों की पत्नी बन गईं लेकिन वह हमेशा अर्जुन-प्रिया मानी गईं. इसके बावजूद अर्जुन कई बार कई और के प्रेम में पड़े और कई विवाह किया. अभिमन्यु के अलावे भी अर्जुन के तीन और पुत्र थे और अपने ही पुत्र के द्वारा अर्जुन महाभारत युद्ध में मारे भी गए. पर हर किसी से जीते हुए अर्जुन को इस हार में एक स्त्री ने जीवनदान दिया था. यहां हम आपको बता रहे हैं द्रौपदी के अलावे अर्जुन की अन्य प्रेम-कहानियां और जीवन-दान की कहानी:
सुभद्रा-अर्जुन प्रेम विवाह:-
(रहस्यमयी हिन्दी उपन्यास एवं कथाये)
कृष्ण की बहन सुभद्रा से अर्जुन का प्रेम विवाह था. इससे पहले ही अर्जुन द्रौपदी से विवाह कर चुके थे. सुभद्रा से अर्जुन का दूसरा विवाह था और यह किसी परेशानी या दबाव में नहीं हुआ था बल्कि अर्जुन खुद यह विवाह करना चाहते थे क्योंकि वे और सुभद्रा एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे.
सुभद्रा का भाई गदा और अर्जुन ने साथ ही द्रोणाचार्य के गुरुकुल में शिक्षा ली थी. बाद में द्वारका जाने पर अर्जुन की मुलाकात सुभद्रा से हुई और उन दोनों में प्रेम हो गया. कृष्ण की प्रेरणा से अर्जुन ने सुभद्रा से ब्याह भी रचा लिया पर द्रौपदी को यह बताने की हिम्मत नहीं कर सके. इसलिए सुभद्रा जब पहली बार द्रौपदी से मिलीं तो अर्जुन की पत्नी होने की बात द्रौपदी को नहीं बताई. बाद में जब दोनों एक-दूसरे से घुल-मिल गए तो सुभद्रा ने खुद के अर्जुन की दूसरी पत्नी होने की बात बताई.
(रहस्यमयी हिन्दी उपन्यास एवं कथाये)
चित्रांगदा-अर्जुन प्रेम विवाह:-
मणिपुर राज्य की राजकुमारी चित्रांगदा बेहद खूबसूरत थीं. एक बार किसी कारणवश मणिपुर गए अर्जुन ने उन्हें देखा और देखते ही उन पर मोहित हो गए. अर्जुन ने चित्रांगदा के पिता और मणिपुर के राजा चित्रवाहन से चित्रांगदा के साथ अपनी विवाह की इच्छा बताई. चित्रवाहन विवाह के लिए मान तो गए लेकिन एक शर्त रख दी कि चित्रवाहन के बाद अर्जुन और चित्रांगदा का पुत्र ही मणिपुर का राज्य भार संभालेगा. अर्जुन मान गए और इस तरह चित्रांगदा के साथ अर्जुन का विवाह भी हो गया. चित्रांगदा के साथ अपने पुत्र बभ्रूवाहन के जन्म होने तक अर्जुन मणिपुर में ही रहे. बभ्रूवाहन के जन्म के बाद वे पत्नी और बच्चे को वहीं छोड़ इंद्रप्रस्थ आ गए. चित्रवाहन की मृत्यु के बाद बभ्रूवाहन मणिपुर का राजा बना. बाद में महाभारत युद्ध के दौरान बभ्रूवाहन ने दुर्योधन की ओर से युद्ध भी किया और अर्जुन को भी हराया
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(रहस्यमयी हिन्दी उपन्यास एवं कथाये)
उलूपी:-
जल राजकुमारी उलूपी अर्जुन की चौथी पत्नी थीं. महाभारत और अर्जुन के जीवन में उनके बहुत योगदान थे. उन्हीं ने अर्जुन को जल में हानि रहित रहने का वरदान दिया था. इसके अलावे चित्रांगदा और अर्जुन के पुत्र बभ्रूवाहन को भी उसी ने युद्ध शिक्षा दी थी. महाभारत युद्ध में अपने गुरु भीष्म पितामह को मारने के बाद ब्रह्मा-पुत्र से शापित होने के बाद उलूपी ने ही अर्जुन को शापमुक्त भी किया था और इसी युद्ध में अपने पुत्र के हाथों मारे जाने पर उलूपी ने ही अर्जुन को पुनर्जीवित भी किया था.
अर्जुन और उलूपी की प्रेम-कहानी शुरू भी एक प्रकार के शाप से ही हुई थी. द्रौपदी जो पांचों पांडवों की पत्नी थीं एक-एक साल के समय-अंतराल के लिए हर पांडव के साथ रहती थी. उस समय किसी दूसरे पांडव को द्रौपदी के आवास में घुसने की अनुमति नहीं थी. इस नियम को तोड़ने वाले को एक साल तक देश से बाहर रहने का दंड था. एक बार जब द्रौपदी युद्धिष्ठिर के साथ थीं तब अर्जुन ने यह नियम तोड़ दिया.
अर्जुन और द्रौपदी की एक वर्ष की अवधि अभी-अभी समाप्त हुई थी और द्रौपदी-युधिष्ठिर के साथ का एक वर्ष का समय शुरू हुआ था. अर्जुन भूलवश द्रौपदी के आवास पर ही अपना तीर-धनुष भूल आए. पर किसी दुष्ट से ब्राह्मण के पशुओं की रक्षा के लिए लिए उन्हें उसी समय इसकी जरूरत थी. अत: क्षत्रिय धर्म का पालन करने के लिए तीर-धनुष लेने के लिए नियम तोड़ते हुए वह पांचाली (द्रौपदी) के निवास में घुस गए. बाद में इसके दंड स्वरूप वह एक साल के लिए राज्य से बाहर चले गए. इसी दौरान अर्जुन की मुलाकात उलूपी से हुई और वह अर्जुन पर मोहित हो गईं. वह अर्जुन को जलनगर भी ले गईं. उन्होंने अर्जुन को वरदान दिया कि सभी जल-प्राणी उसका कहा मानेंगे और उन्हें पानी में कोई नुकसान नहीं होगा.
बाद में महाभारत युद्ध में जब अर्जुन अपने ही पुत्र बभ्रूवाहन के हाथों मारे गए तो उलूपी ने अर्जुन को दुबारा जीवित भी किया. बभ्रूवाहन को पता नहीं था कि वह अर्जुन का पुत्र है, अत: जीवित होने के पश्चात अर्जुन और बभ्रूवाहन को एक साथ लाने में भी उलूपी का बहुत बड़ा हाथ था.!
(महाभारत कि रहस्यमयी एवं अनसुनी महान प्रेम-कहानियां)
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महान धनुर्धर अर्जुन हमेशा अजेय माने जाते रहे हैं. महाभारत में अर्जुन के समान धनुर्धर और कोई नहीं बन सका इसके बावजूद अर्जुन कई जगह हारे. द्रौपदी पांचों पांडवों की पत्नी मानी गई हैं पर वह मुख्य रूप से अर्जुन की प्रिय थीं. अर्जुन ने ही धनुर्विद्या से द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था और उनसे विवाह किया था. कुंती के अनायास ही फल बांटकर खा लेने के कथन का पालन करते हुए द्रौपदी पांचों पांडवों की पत्नी बन गईं लेकिन वह हमेशा अर्जुन-प्रिया मानी गईं. इसके बावजूद अर्जुन कई बार कई और के प्रेम में पड़े और कई विवाह किया. अभिमन्यु के अलावे भी अर्जुन के तीन और पुत्र थे और अपने ही पुत्र के द्वारा अर्जुन महाभारत युद्ध में मारे भी गए. पर हर किसी से जीते हुए अर्जुन को इस हार में एक स्त्री ने जीवनदान दिया था. यहां हम आपको बता रहे हैं द्रौपदी के अलावे अर्जुन की अन्य प्रेम-कहानियां और जीवन-दान की कहानी:
सुभद्रा-अर्जुन प्रेम विवाह:-
(रहस्यमयी हिन्दी उपन्यास एवं कथाये)
कृष्ण की बहन सुभद्रा से अर्जुन का प्रेम विवाह था. इससे पहले ही अर्जुन द्रौपदी से विवाह कर चुके थे. सुभद्रा से अर्जुन का दूसरा विवाह था और यह किसी परेशानी या दबाव में नहीं हुआ था बल्कि अर्जुन खुद यह विवाह करना चाहते थे क्योंकि वे और सुभद्रा एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे.
सुभद्रा का भाई गदा और अर्जुन ने साथ ही द्रोणाचार्य के गुरुकुल में शिक्षा ली थी. बाद में द्वारका जाने पर अर्जुन की मुलाकात सुभद्रा से हुई और उन दोनों में प्रेम हो गया. कृष्ण की प्रेरणा से अर्जुन ने सुभद्रा से ब्याह भी रचा लिया पर द्रौपदी को यह बताने की हिम्मत नहीं कर सके. इसलिए सुभद्रा जब पहली बार द्रौपदी से मिलीं तो अर्जुन की पत्नी होने की बात द्रौपदी को नहीं बताई. बाद में जब दोनों एक-दूसरे से घुल-मिल गए तो सुभद्रा ने खुद के अर्जुन की दूसरी पत्नी होने की बात बताई.
(रहस्यमयी हिन्दी उपन्यास एवं कथाये)
चित्रांगदा-अर्जुन प्रेम विवाह:-
मणिपुर राज्य की राजकुमारी चित्रांगदा बेहद खूबसूरत थीं. एक बार किसी कारणवश मणिपुर गए अर्जुन ने उन्हें देखा और देखते ही उन पर मोहित हो गए. अर्जुन ने चित्रांगदा के पिता और मणिपुर के राजा चित्रवाहन से चित्रांगदा के साथ अपनी विवाह की इच्छा बताई. चित्रवाहन विवाह के लिए मान तो गए लेकिन एक शर्त रख दी कि चित्रवाहन के बाद अर्जुन और चित्रांगदा का पुत्र ही मणिपुर का राज्य भार संभालेगा. अर्जुन मान गए और इस तरह चित्रांगदा के साथ अर्जुन का विवाह भी हो गया. चित्रांगदा के साथ अपने पुत्र बभ्रूवाहन के जन्म होने तक अर्जुन मणिपुर में ही रहे. बभ्रूवाहन के जन्म के बाद वे पत्नी और बच्चे को वहीं छोड़ इंद्रप्रस्थ आ गए. चित्रवाहन की मृत्यु के बाद बभ्रूवाहन मणिपुर का राजा बना. बाद में महाभारत युद्ध के दौरान बभ्रूवाहन ने दुर्योधन की ओर से युद्ध भी किया और अर्जुन को भी हराया
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(रहस्यमयी हिन्दी उपन्यास एवं कथाये)
उलूपी:-
जल राजकुमारी उलूपी अर्जुन की चौथी पत्नी थीं. महाभारत और अर्जुन के जीवन में उनके बहुत योगदान थे. उन्हीं ने अर्जुन को जल में हानि रहित रहने का वरदान दिया था. इसके अलावे चित्रांगदा और अर्जुन के पुत्र बभ्रूवाहन को भी उसी ने युद्ध शिक्षा दी थी. महाभारत युद्ध में अपने गुरु भीष्म पितामह को मारने के बाद ब्रह्मा-पुत्र से शापित होने के बाद उलूपी ने ही अर्जुन को शापमुक्त भी किया था और इसी युद्ध में अपने पुत्र के हाथों मारे जाने पर उलूपी ने ही अर्जुन को पुनर्जीवित भी किया था.
अर्जुन और उलूपी की प्रेम-कहानी शुरू भी एक प्रकार के शाप से ही हुई थी. द्रौपदी जो पांचों पांडवों की पत्नी थीं एक-एक साल के समय-अंतराल के लिए हर पांडव के साथ रहती थी. उस समय किसी दूसरे पांडव को द्रौपदी के आवास में घुसने की अनुमति नहीं थी. इस नियम को तोड़ने वाले को एक साल तक देश से बाहर रहने का दंड था. एक बार जब द्रौपदी युद्धिष्ठिर के साथ थीं तब अर्जुन ने यह नियम तोड़ दिया.
अर्जुन और द्रौपदी की एक वर्ष की अवधि अभी-अभी समाप्त हुई थी और द्रौपदी-युधिष्ठिर के साथ का एक वर्ष का समय शुरू हुआ था. अर्जुन भूलवश द्रौपदी के आवास पर ही अपना तीर-धनुष भूल आए. पर किसी दुष्ट से ब्राह्मण के पशुओं की रक्षा के लिए लिए उन्हें उसी समय इसकी जरूरत थी. अत: क्षत्रिय धर्म का पालन करने के लिए तीर-धनुष लेने के लिए नियम तोड़ते हुए वह पांचाली (द्रौपदी) के निवास में घुस गए. बाद में इसके दंड स्वरूप वह एक साल के लिए राज्य से बाहर चले गए. इसी दौरान अर्जुन की मुलाकात उलूपी से हुई और वह अर्जुन पर मोहित हो गईं. वह अर्जुन को जलनगर भी ले गईं. उन्होंने अर्जुन को वरदान दिया कि सभी जल-प्राणी उसका कहा मानेंगे और उन्हें पानी में कोई नुकसान नहीं होगा.
बाद में महाभारत युद्ध में जब अर्जुन अपने ही पुत्र बभ्रूवाहन के हाथों मारे गए तो उलूपी ने अर्जुन को दुबारा जीवित भी किया. बभ्रूवाहन को पता नहीं था कि वह अर्जुन का पुत्र है, अत: जीवित होने के पश्चात अर्जुन और बभ्रूवाहन को एक साथ लाने में भी उलूपी का बहुत बड़ा हाथ था.!
दुनिया में सबसे पहला उपन्यास कब लिखा गया?
यों तो विश्व साहित्य की शुरुआत किस्सों-कहानियों से हुई और वे महाकाव्यों के युग से आज तक के साहित्य की बुनियाद रही हैं. उपन्यास को आधुनिक युग की देन कहना बेहतर होगा. साहित्य में गद्य का प्रयोग जीवन के यथार्थ चित्रण की कोशिश है. आमतौर पर गेंजी मोनोगतारी या ‘द टेल ऑफ गेंजी’ को दुनिया का पहला आधुनिक उपन्यास मानते हैं. जापानी लेखिका मुरासाकी शिकिबु ने इसे सन 1000 से सन 1008 के बीच कभी लिखा था. बेशक यह दुनिया के श्रेष्ठतम ग्रंथों में से एक है, पर इस बात पर एक राय नहीं है कि यह पहला उपन्यास था या नहीं. इसमें 54 अध्याय और करीब 1000 पृष्ठ हैं. इसमें प्रेम और विवेक की खोज में निकले एक राजकुमार की कहानी है. अलबत्ता हमें पहले यह समझना चाहिए कि उपन्यास होता क्या है. उपन्यास गद्य में लिखा गया लम्बा आख्यान है, जिसकी एक कथावस्तु होती है और चरित्र-चित्रण होता है. कथावस्तु को देखें तो महाभारत, रामायण और तमाम भाषाओं में महाग्रंथ हैं. पर वे सब प्रायः महाकाव्य हैं. अलबत्ता संस्कृत में दंडी के ‘दशकुमार चरित्र’ और वाणभट्ट के ‘कादम्बरी’ को भी दुनिया का पहला उपन्यास माना जा सकता है. यूरोप का प्रथम उपन्यास सेर्वैन्टिस का ‘डॉन क्विक्ज़ोट’ माना जाता है जो स्पेनी भाषा का उपन्यास है. इसे 1605 में लिखा गया था. अनेक विद्वान 1678 में जोन बुन्यान द्वारा लिखे गए “द पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस” को पहला अंग्रेजी उपन्यास मानते हैं. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार ‘परीक्षा गुरु’ हिन्दी का पहला उपन्यास है, जो 1882 में प्रकाशित हुआ. इसके लेखक लाला श्रीनिवास दास हैं. हालांकि इसके पहले सन 1870 में 'देवरानी जेठानी की कहानी' (लेखक -पंडित गौरीदत्त) और श्रद्धाराम फिल्लौरी के ‘भाग्यवती’ को भी हिन्दी के प्रथम उपन्यास होने का श्रेय दिया जाता है. पर ये पुस्तकें मुख्यतः शिक्षात्मक और अपरिपक्व हैं.
खबर है कि इस साल मॉनसून सामान्य से कम होगा. यह मॉनसून क्या होता है?
अंग्रेज़ी शब्द मॉनसून पुर्तगाली शब्द ‘मॉन्सैओ’ से निकला है। यह शब्द भी मूल अरबी शब्द मॉवसिम (मौसम) से बना है. यह शब्द हिन्दी एवं उर्दू एवं विभिन्न उत्तर भारतीय भाषाओं में भी प्रयोग किया जाता है. आधुनिक डच शब्द मॉनसून से भी मिलता है. मानसून मूलतः हिन्द महासागर एवं अरब सागर की ओर से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर आनी वाली हवाओं को कहते हैं जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में भारी वर्षा करातीं हैं. यह ऐसी मौसमी पवन होती हैं, जो दक्षिणी एशिया क्षेत्र में जून से सितंबर तक, प्रायः चार महीने तक सक्रिय रहती है.
इस शब्द का पहला इस्तेमाल अंग्रेजों के भारत आने के बाद बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से चलने वाली बड़ी मौसमी हवाओं के लिए हुआ था. हाइड्रोलॉजी में मानसून का व्यापक अर्थ है- कोई भी ऐसी पवन जो किसी क्षेत्र में किसी ऋतु-विशेष में ही वर्षा कराती है. मॉनसून हवाओं का अर्थ अधिकांश समय वर्षा कराने से नहीं लिया जाना चाहिए. इस परिभाषा को देखते हुए संसार के अन्य क्षेत्र, जैसे- उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, उप-सहारा अफ़्रीका, आस्ट्रेलिया एवं पूर्वी एशिया को भी मॉनसून क्षेत्र की श्रेणी में रखा जा सकता है.
बादल क्यों और कैसे फटता है?
बादल फटना, बारिश का एक चरम रूप है। इस घटना में बारिश के साथ कभी-कभी गरज के साथ ओले भी पड़ते हैं. सामान्यत: बादल फटने के कारण सिर्फ कुछ मिनट तक मूसलधार बारिश होती है लेकिन इस दौरान इतना पानी बरसता है कि क्षेत्र में बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है. बादल फटने की घटना अमूमन पृथ्वी से 15 किलोमीटर की ऊंचाई पर घटती है. इसके कारण होने वाली वर्षा लगभग 100 मिलीमीटर प्रति घंटा की दर से होती है. कुछ ही मिनट में 2 सेंटी मीटर से अधिक वर्षा हो जाती है, जिस कारण भारी तबाही होती है.
मौसम विज्ञान के अनुसार जब बादल भारी मात्रा में पानी लेकर आसमान में चलते हैं और उनकी राह में कोई बाधा आ जाती है, तब वे अचानक फट पड़ते हैं, यानी संघनन बहुत तेजी से होता है. इस स्थिति में एक सीमित इलाके में कई लाख लीटर पानी एक साथ पृथ्वी पर गिरता है, जिसके कारण उस क्षेत्र में तेज बहाव वाली बाढ़ आ जाती है. भारत के संदर्भ में देखें तो हर साल मॉनसून के समय नमी को लिए हुए बादल उत्तर की ओर बढ़ते हैं. हिमालय पर्वत एक बड़े अवरोधक के रूप में इसके सामने पड़ता है. इसके कारण बादल फटता है.
पहाड़ ही नहीं कभी गर्म हवा का झोंका ऐसे बादल से टकराता है तब भी उसके फटने की आशंका बढ़ जाती है. उदाहरण के तौर पर 26 जुलाई 2005 को मुंबई में बादल फटे थे, तब वहां बादल किसी ठोस वस्तु से नहीं बल्कि गर्म हवा से टकराए थे.
अंटार्कटिका की खोज किसने और कब की?
अंटार्कटिका के होने की संभावना करीब दो हजार साल पहले से थी. इसे ‘टेरा ऑस्ट्रेलिस’ यानी दक्षिणी प्रदेश के नाम के एक काल्पनिक इलाके के रूप में जानते थे. यह भी माना जाता था कि ऑस्ट्रेलिया का दक्षिणी इलाका दक्षिण अमेरिका से जुड़ा है. यूरोपीय नक्शों में इस काल्पनिक भूमि का दर्शाना लगातार तब तक जारी रहा जब तक कि 1773 में ब्रिटिश अन्वेषक कैप्टेन जेम्स कुक ने अपने दो जहाजों के साथ अंटार्कटिक सर्किल को पार करके उस सम्भावना को खारिज कर दिया. पर जबर्दस्त ठंड के कारण कैप्टेन कुक को अंटार्कटिक के सागर तट से 121 किलोमीटर दूर से वापस लौटना पड़ा. इसके बाद सन 1820 में रूसी नाविकों और ने अंटार्कटिक को पहली बार देखा. उसके बाद कई नाविकों को इस बर्फानी ज़मीन को देखने का मौका मिला. 27 जनवरी 1820 को रूसी वॉन फेबियन गॉतिलेब वॉन बेलिंगशॉसेन और मिखाइल पेत्रोविच लजारोव जो दो-पोत अभियान की कप्तानी कर रहे थे, अंटार्कटिका की मुख्य भूमि के अन्दर पानी पर 32 किलोमीटर तक गए थे और उन्होंने वहाँ बर्फीले मैदान देखे थे. प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार अंटार्कटिका की मुख्य भूमि पर पहली बार पश्चिम अंटार्कटिका में अमेरिकी सील शिकारी जॉन डेविस 7 फ़रवरी 1821 को उतरा था, हालांकि कुछ इतिहासकार इस दावे को सही नहीं मानते.
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