शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

महानगर की कलंक कथा




Sunday, 05 February 2012 13:11


जनसत्ता 5 जनवरी, 2012 : विश्व साहित्य में सच्ची घटनाओं पर आधारित अनेक छोटे-बड़े उपन्यास लिखे गए हैं, जिनमें कई सफल हुए तो कई विफल। सच्ची घटनाएं उपन्यास के लिए कच्चा माल तो उपलब्ध कराती हैं, पर उन्हें साहित्य बनाना सबके बस की बात नहीं होती। प्रतिभावान लेखक ही इसमें सफल होते हैं। इस मामले में हरिसुमन बिष्ट ने एक बड़ा खतरा उठाया है।
चिर-परिचित घटनाओं को मानवीय और संवेदनात्मक स्पर्श देकर मार्मिक बनाना ही सच्चे कथाकार की निशानी है। इस मामले में हरिसुमन बिष्ट समय-समय पर प्रयोग करते रहे हैं। पहाड़ी लोक जीवन की कई मार्मिक घटनाओं के इर्द-गिर्द उन्होंने अपनी कथाएं बुनी हैं। कुमाऊं अंचल के जनजीवन, स्त्री-पुरुष के मार्मिक अनुभवों को उन्होंने अपनी लेखनी से छुआ है।
इधर अपने नए उपन्यास बसेरा में वे अपने चिर-परिचित विषय-वस्तु से ऊपर उठे हैं और महानगरीय जीवन में लोगों के नर्क बनते जाते जीवन को नजदीक से देखा है। मुंबई की गंदी बस्तियों पर कई मार्मिक उपन्यास हिंदी-उर्दू में लिखे गए हैं। जगदंबा प्रसाद दीक्षित, कृष्ण चंदर और राजेंद्र सिंह बेदी के उपन्यास इस संदर्भ में सहज ही याद आते हैं। हरिसुमन ने अपने उपन्यास बसेरा में भले उतनी कलात्मकता न दिखाई हो, पर इसमें एक ताजगी है।
‘बसेरा’ अपने बसेरों से दूर रहने वालों के अंतर्मन की पीड़ा और एक ठहरी जिंदगी की परतों के अंदर छिपी हलचल को अपनी करुणा का स्वर देता है। इस करुणा में कई अन्य स्वर भी मिल जाते हैं।
उपन्यास के केंद्र में हैं निठारी गांव के पुराने बाशिंदे और वहां आकर बसे पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, ओड़िशा, बांग्लादेश के कामगार, जो मजदूरी करते और रिक्शा चलाते हैं, पर खुद को शरणार्थी कहे जाने का बुरा भी नहीं मानते। धीरे-धीरे समय उन पुराने बाशिंदों और शरणार्थियों के बीच आत्मीयता की मिठास भरता चलता है, जो नेताओं की आंखों में खारेपन की कड़वाहट-सी लगने लगती है- कुछ लोगों को यह इंसानियत और दया-भाव छल-कपट से भरपूर लगे, उनका राजनीति का चूल्हा सिमसिम जलने लगा।
समय एक और करवट लेता है और वहां कंक्रीट के जंगल तैयार होने लगते हैं, किसानों की जमीन पर नोएडा के सेक्टरों की चौहद्दियां तय की जाने लगती हैं। जब तक पुराने बाशिंदों को अपनी जमीन बेचने का अफसोस होता है, तब तक निठारी और नोएडा के बीच ऊंची दीवार खड़ी हो चुकी होती है। गांव की मांग पर गांव और सेक्टर के बीच एक सड़क बना दी जाती है, जिस पर भैंसागाड़ी, रेहड़ा, हाथगाड़ी, रिक्शा के साथ-साथ मर्सिडीज कार तक चलने लगीं। मर्सिडीज हवा में उड़ना चाहती तो भैंसागाड़ी उस पर ब्रेक लगा देती।
ऊंचे मकान, ऊंचे लोग, बड़े मकान बड़े लोग। लेकिन उनके घरों के छोटे-बड़े कामों के लिए छोटे-छोटे लोग। जमीन बिकने के बाद गांव में गुणात्मक तो नहीं, पर तात्कालिक रूप से आर्थिक परिवर्तन आता है। जमीन के मुआवजे से प्राप्त राशि से एक नवधनाढ्य वर्ग तेजी से उभर कर सामने आता है, तो उतनी ही तेजी से उसका अवसान भी हो जाता है। लेखक की पंक्तियां हैं- ‘निठारी के लोगों के घर-आंगन में सरकार ने रुपयों के पेड़ उगाए, वे बड़े होकर फलने-फूलने के बजाय पतझड़ करने लगे। समय से पहले पेड़ों पर पतझड़ आना समय में आए परिवर्तन का आगमन था, जिसे वे लोग समझ नहीं पाए। वे दिन पलक झपकते बीत गए। यह चहल-पहल ज्यादा दिन नहीं टिकी। अब न जमीन रही, न पैसा। उनका जीवन रात की परछार्इं भरा होने लगा। जो उनके पूर्वजों ने तारों भरा आसमान उन्हें दिया था, उसे अब वे दिन-रात निहारते थे।’ आर्थिक स्थितियों में यह बदलाव उनके और शरणार्थियों के बीच के रिश्ते में कुछ खटास भी पैदा करने लगा। यहां से कहानी सेक्टर इकतीस के वह आदमी, उसकी पत्नी और उसके बेटे-बेटी और बसेरे से दूर काम करने निठारी आए लोगों के बीच घूमती रहती है।
उपन्यास व्यंग्यात्मक अभिव्यक्तियों से शुरू होता है- ‘कुंभीपाक डॉटकॉम... माफ करें जी मेल सर्विस का यह सेक्टर और ठिकाना बदल चुका है। पाठकवृंद अब नए पते पर संपर्क करें। अच्छा, आप इसे निठारी की गलियों में


खोज रहे हैं। चले आइए, बेबस- विस्थापित आत्माओं का यही जाना-पहचाना, नामचीन इलाका है। यह भी मॉल कल्चर की ही उपज है। उसकी बदबूदार सुरंग का मुहाना और मैनहोल यहीं खुलता है।’ लेकिन आगे बढ़ते ही यह अपने अंतर से करुणा की धारा प्रवाहित करने लगता है, जिसमें उपन्यासकार की संवेदना और वस्तुगत यथार्थ साथ-साथ चलते रहते हैं।
‘बसेरा’ का सच ऐसा है, जिससे हम आए दिन रूबरू होते हैं, लेकिन उससे विचलित हुए बिना अपनी दुनिया में मग्न जीते चले जाते हैं। ऐसी अनेक घटनाएं हमारे आसपास घटती हैं और हम उनसे उद्वेलित तक नहीं होते। ऐसी स्थिति में हरिसुमन बिष्ट ने संवेदना के सागर में गोता लगाते हुए निठारी के समाज की सौहार्दता, नोेएडा बनते जाने के क्रम में गांव और शहर के लोगों के संबंधों के बीच टकराव और नोएडा के रहने वालों के प्रतीक रूप में सेक्टर इकतीस के वह आदमी और उसकी पत्नी के दोहरे आचरण और मजदूर वर्ग खासकर सेक्टर में काम करने वालों और रिक्शाचालकों के बीच की आत्मीयता का यथार्थ चित्रण किया है। उपन्यास का परिवेश कथाकार का जाना-पहचाना है।
यह काम की तलाश में निठारी आ बसे ऐसे लोगों की कहानी है, जिनके लिए सेक्टरों में काम करना मजबूरी है और जो सेक्टरवासियों के लिए जरूरी हैं। वह आदमी और उसकी पत्नी जैसे लोग उनके अभावग्रस्त जीवन, उनकी गरीबी पर कृत्रिम सहानुभूति दिखाते हैं। उसकी पत्नी अजीत सरकार को खून बेच कर पैसे कमाने के लिए प्रोत्साहित करती और उसे कार में बिठा कर ले जाती है। सात दिन बाद वह अधमरी हालत में उनके चंगुल से निकल कर घर आता है और अपनी पत्नी को बताता है कि उसने पांच हजार रुपए में एक किडनी बेच दी है। लेकिन कुछ घंटे बाद ही उसकी मौत हो जाती है, जो इस आशंका को दृढ़ करती है कि उसकी दोनों किडनियां निकाल ली गई हैं।
इस बीच इन मजदूरों के बच्चे एक-एक कर गायब होते जाते हैं। शबाना और रसूल का बच्चा, सागरी और सोनू मंडल का बच्चा। मलबे के नीचे उनके दबे होने की बात कही जाती है, पर वे वहां दबे-कुचले रूप में भी नहीं मिलते। मानो वे सीधे धरती में समा गए हों। इस तरह करीब दर्जन भर बच्चे गायब हो चुके होते हैं। पुलिस रपट दर्ज करने से इनकार करती है। इस संबंध में पुलिस का अपना कानून है- इनके यहां तो रोज बच्चे मरते हैं, रोज जन्म लेते हैं और फिर मरते हैं। बच्चों के गायब होने की अनसुलझी पहेली को मुस्तफा के इस दावे से कि कब्रिस्तान के इलाके में रहने के कारण कोई आत्मा उन्हें उठा कर ले गई होगी, जिसे उसने कई बार देखा भी है, झोपड़पट्टी वाले इसे ईश्वरेच्छा और नियति मान कर स्वीकार कर लेते हैं। वैसे इस अंधविश्वासी चरित्र से अलग मुस्तफा में सहज मानवीयता, सहृदयता, आत्मीयता और सहयोग की भावना है, जो हमें याद दिलाती रहती है कि अब भी ऐसी भावनाएं रखने वाले लोग हमारे आसपास हैं।
कुछ दिनों बाद शबाना का बच्चा मैनहोल से मिलता है, तो एक अन्य लड़का पंकज ए ब्लॉक के एक खाली प्लॉट से। दोनों के सारे अंग-प्रत्यंग निकाल लिए गए होते हैं, जो इस बात की सूचना देता है कि अपराधियों का एक गिरोह अपने काम को बड़े ही शातिर तरीके से और क्रूरतापूर्वक अंजाम दे रहा है।
वह आदमी बच्चों की गुमशुदगी की रपट लिखाने के लिए थाने जाता है, चौकीदार महेंद्र के प्रति अपनापन दिखाते हुए उसे अपने घर में रहने को बाध्य करता है। लेकिन जल्दी ही उसकी कलई उतरने लगती है।
ऐसा उपन्यास लिखना खतरे से खाली नहीं होता। खतरा रहता है कि उपन्यास महज अखबारी रपट न बन कर रह जाए। हरिसुमन बिष्ट ने इस बात का भरपूर ध्यान रखा है। उन्होंने इसमें अपनी भाषा-शैली से करुणा का जो भाव पैदा किया है, वह पाठक के मन में देर तक बना रहता है। यही उपन्यास की सार्थकता है।


राजेंद्र उपाध्याय
बसेरा: हरिसुमन बिष्ट, कल्याणी शिक्षा परिषद, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...