मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

बिजय दान देथा उर्फ बिज्जी का कथा लोक



लेखक-- डॉ. रमेश ’मयंक‘

प्रस्तुति-- अखौरी प्रमोद
 
 बिज्जी-विजयदान देथा की कहानियों का जादू फिल्मकारों, नाट्य-निर्देशकों एवं सीरियल-निर्माताओं के सिर पर भी चढकर बोला है। मणि कौल, श्याम बेनेगल, प्रकाश झा और अमोल पालेकर ने आपकी कहानियों पर फिल्में बनाई हैं। साहित्य अकादेमी ने आप पर एक वृत्तचित्र का निर्माण किया है। आपकी कहानियों की दूरदर्शन प्रस्तुति और नाट्य-मंचन हुए हैं। प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर द्वारा निर्देशित आपकी कहानी पर आधारित नाटक ’’चरणदास चोर‘‘ को देश-विदेश में बेहद सराहना मिली है। अनपढ लोगों की जबान पर बसी कथाओं, गीतों, और कहावतों को लिपिबद्ध करके कलम मांजने वाले बिज्जी शुरू-शुरू में एक संग्रहकर्ता की भूमिका में रहे, लेकिन ’बातां री फुलवाडी‘ के तीनेक खंडों के बाद लोक कथाओं को सजाने-संवारने लगे। उन्हें तराशने लगे। उनमें कुछ जोडने-घटाने लगे। छठे भाग तक आते-आते उनकी सर्जनात्मक ऊर्जा खुलकर खेलने लगी। वे लोक कथाओं के नए चरित्र, नए प्रसंग जोडने लगे। दसवें भाग तक तो लोक कथाओं की शैली और उनके सृष्टा व दृष्टा ही रह गए। काफी कुछ बदल गया। कलेवर, संदेश, प्रभाव, बंदिश, संवाद इत्यादि कला के सांचे में परिष्कृत होते रहे। लोक कथाओं के बीज को वे अपने हिसाब से पुष्पित-पल्लवित करने लगे। दसवें भाग की कहानी ’दुविधा‘ पर दो फिल्में बनी १९७३ में मणिकोल की ’दुविधा‘ और २००४ में अमोल पालेकर की ’पहेली‘। ’दुविधा‘ कहानी का आइडिया जिस लोक कथा से लिया गया-वह पूर्वी राजस्थान में-’इकतार‘ का बुखार उतारने के लिए सुनाई जाती है। एक भूत दिसावर गए पति का रूप धारण कर छलपूर्वक बहू को भोगता है। कुछ समय उपरांत असली पति के दिसावर से लौटने पर पोल खुलती है और भूत को कील कर जमीन में गाड दिया जाता है। लोक कथा का संदेश....अंत बुरे का बुरा, भूत पर मनुष्य की विजय। दुविधा में स्त्री-पुरुष संबंधों और वैवाहिक संस्था के औचित्य की बेहद बारीकी और कलात्मक तरीकों से छानबीन की गई है। पुरुष सत्तात्मक परिवार में बेबस स्त्री का चित्र मार्मिकता से उभरकर आता है। लोक कथा में भूत बहू को छलपूर्वक भोगता है जबकि ’दुविधा‘ की बहू सच्चाई को जानकर भी अपनी इच्छा से समर्पण करती है-’’जब जाने वाले को नहीं रोक सकी, तो आने वाले को कैसे रोकूं?‘‘ कहकर। दबदबा, हाथी कांड, जंजाल और नाहरगढ उनकी पूर्णतया काल्पनिक कहानियां हैं। बिज्जी की कथा शैली के तत्व-किस्सागोई का अंदाज, रोचकता, कुतूहल हैं। उनकी भाषा पर डिंगल काव्य का बहुत गहरा असर है। भाषा की लय, अनुप्रास, कल-कल करते झरने सी रवानी, अनछुए प्रतीक, अनूठी उपमाएं रेखांकित योग्य हैं। गूजरी के शब्दों में-’’ज्यों का त्यों कर जीना ही आदमी का धर्म बन गया है। घर-गृहस्थी की गुजर-बसर से बडी कोई नैतिकता नहीं। आदमी के लिये यहीं इतिहास का दूध है, यही ज्ञान दही और यही धर्म का मक्खन।‘‘ बिज्जी लिखते हैं-’’खुद भगवान भी पक्का हिसाबी है। हरेक सांस का पूरा हिसाब रखता है। बरसात की बूंद-बूंद, हवा की रग-रग और धरती के कण-कण का उसके पास एकदम सही लेखा है। श्री नन्द भारद्वाज का मानना है कि-’’सामंती समाज में अछूत और उपेक्षित समझी जाने वाली मेहनतकश जातियों (नायक, बनजारे, भील, जोगी, कालबेलिये, राईके, लुहार, कुम्हार, नाई, तेली) के कर्मठ पात्रों को पहली बार उस तथाकथित सवर्ण समाज के शूरवीर और चतुर समझे जाने वाले पात्रों के मुकाबले ज्यादा गंभीर और व्यवहार कुशल बनाकर प्रस्तुत करना कोई साधारण काम नहीं था। उन्होंने अपने कथा लोक में ग्रामीण समाज में व्याप्त अन्धविश्वासों, रूढवादिता और धार्मिक आडम्बरों की धज्जियां उडाई हैं। यह राजस्थानी लेखन के क्षेत्र में नयी चेतना के उद्घोष की जीती जागती मिसाल है।‘‘ बदली हुई मानसिकता और महत्वाकांक्षा का परिचय-उलझन, कागपंथ, दोहरी जिन्दगी, अबोट लिसाब, दूजौ कबीर, केंचुली, न्यारी-न्यारी मर्यादा में मिलता है। समीक्षक रवीन्द्र वर्मा का कथन है कि- ’’विजयदान देथा की कहानियों को हिन्दी कथा परम्परा से जोडकर नहीं देखा गया। पिछले दशक से जिस गतिरोध की चर्चा हम सुन रहे हैं, उसका कोई औचित्य नहीं। जिस मुकाम पर हिन्दी कहानी अवरुद्ध हुई है, देथा की श्रेष्ठ कहानियां वहीं से नये रास्ते तलाशती हैं।‘‘ सत्ता और शक्तिशाली वर्ग के साथ-साथ चापलूस दरबारी वर्ग-ईमानदार- स्वाभिमानी, सत्यनिष्ठ व्यक्तियों का जीना हराम कर देता है। नाहरगढ के सेठ द्वारा चोरी हो जाने पर निकाले गए कुत्ते, नाहर की निरंकुशता को चुनौती, राज्य की महत्वाकांक्षा मानव जीवन की घटनाएं हैं। अनमोल खजाना, दबदबा, बेदाग नाहट चिक, फितरती चार-कहानियां शासक वर्ग और मुसाहिबों की गलतफहमी के कारण पडने वाले प्रभावों को उभारती हैं। स्वाभिमानी कलाकार कबीर द्वारा गांव के ठाकुर या राजा के सामने न झुकने और अपनी कला को विक्रय की वस्तु न बनाने की जिद का परिणाम, कला के विनाश में देखने को मिलता है। अपने व्यक्तित्व और कला से राजकुमारी को आकर्षित करने की सामर्थ्य रखने वाले इस कलाकार द्वारा राजा को दिए गए निडर उत्तर, कला की प्रक्रिया ही नहीं, उसके उद्देश्य और जीवन की वास्तविक आकांक्षा को प्रकट करते हैं। दबदबा और बेदाग चिकनाहट के काजी और राजा जीते-जागते यथार्थ हैं। स्वार्थियों द्वारा काजी की कुतिया की प्रशंसा और मृत्यु के बाद दिया गया अभूतपूर्व सम्मान खुद काजी की मौत पर उसकी बेतरह उपेक्षा और नये काजी की चापलूसी में बदल जाता है। स्वार्थ, लालच, अकारण शत्रुता, ईर्ष्या, दूसरों के नुकसान से मिली खुशी, झूठी मर्यादा, और हर हालत में खुद को सही और श्रेष्ठ साबित करने की मनुष्य की कोशिश पूरे समाज को पतन के गर्त में ले जाती है। मानवीय अविवेक के अनेक पहलुओं और उनके दृष्परिणामों को-’तृण भारत‘, ’अदीठ‘, ’लिबास‘, ’आदमखोर‘, ’समय अनमोल‘, ’मूजी सूरमा‘, ’आखिरी कसर‘, ’दोहरी जिन्दगी‘, ’झूठी आस‘ में व्यक्त किया गया है। अन्दरूनी पशुत्व की प्रवृत्तियां इनमें उभरकर आती हैं। ’इस्तीफा‘ के देवी-देवताओं की मूर्तियां लादने वाले गधे की स्वागत सत्कार की गलत फहमी-पिटाई, ठोकरों से दूर होते देर नहीं लगती। ’झूठी आस‘ के ढोली की अतृप्त आकांक्षाओं से उपजे अविवेक का परिणाम ठाकुर की पिटाई से भोगना पडता है। फकत मांगने से कुछ नहीं मिलता। आदमखोर के पुजारी और समय अनमोल कहानियों के भगत को देवी के मनचाहे वरदान और परस की प्राप्ति से भी अविवेक और मूर्खतापूर्ण ईर्ष्या के कारण खाली हाथ रह जाना पडता है। सीमा के सेठ दौलत और ज्ञान की चरम सीमा पर पहुंच कर भी कोरे रह जाते हैं। सेठानी आत्महत्या करके और सेठ अपने घिनौने पुनर्जन्म की चिन्ता में वर्तमान सुख को दुःख में परिणत कर लेते हैं। ’आखिरी कसर‘ में भौंकने का सुख लेता हुआ ब्राह्मण युवक कुत्ते के साथ प्रतिस्पर्द्धा में छोटे भाइयों को खाना पहुचाना तक भूल जाता है। ’दोहरी जन्दगी‘ के सेठ द्वारा लालच और मोटे दहेज की आकांक्षा में मित्र को अपनी लडकी के बदले लडका बताकर उसकी लडकी से शादी तय कर देना, रहस्य पर जान बूझकर पर्दा डाले रहना दोनों लडकियों के जीवन से खिलवाड में बदल जाता है। ’राजीनामा‘ का नायक भी अपने भीतर के ईमानदार निश्चल पक्ष को जबरदस्ती कुचल कर ही समृद्धि के शिखर पर पहुंच पाता है। व्यक्तिगत सम्पति और उसके उत्तराधिकार को लेकर चलने वाले संर्घषों के कारण मनुष्य-मनुष्य के बीच बढती खाई के सत्य को ’समय-समय की हवा‘, ’खोजी‘, ’निन्यानवे के फेर‘, ’बढे सो पाए‘, ’निगरानी कथाएं‘ व ’आदमजात‘ उपन्यास में विवशता को सत्य रूप में रेखांकित किया गया है। खोजी कहानी में समृद्ध परिवार का इकलौता ईमानदार युवक समाज में चोरी, न्याय और दण्ड के सामने प्रश्नचिह्न लगाता है, और आत्महत्या द्वारा अपने व्यक्तित्व की सार्थकता और बिना श्रम के जोडे गए अटूट ऐश्वर्य की निरर्थकता साबित करता है। ’आदमजात‘ उपन्यास के कथानक में ढंग के करिश्में, निर्दोष स्त्री की, उसका धन ऐंठ कर और पुत्र की हत्या, पुत्र की अतृप्त महत्वाकांक्षाओं, सम्पति को लेकर बनाया गया लुटेरों का गिरोह सब समाज के दुश्चक्र का आधार है। बिज्जी ने अपने कथालोक में एक बेहतर समाज के लिए होने वाले संघर्ष को स्वर दिया है ताकि मनुष्य की नियति को उपेक्षा, आत्महत्या और निर्वासन से बचाया जा सके। बिज्जी का विश्वास है कि स्त्री-पुरुष के संबंधों को वैवाहिक नियमों के कटघरों में बंद कर देने पर भी समाज में धन और शक्ति के अनुरूप इनका समीकरण बदल रहा है। अब तक पुरुष प्रधान समाज में पुरुष और स्त्री के संबंधों में दोहरी नैतिकता के मानदण्ड, अवसर, बन्धन और उल्लंघन का नैतिक आधार देते रहे हैं। स्त्रियों के लिए कठोर व पुरुषों के लिए उदार इन नियमों के कारण मानसिक आघात, असंतुलन, विवशता व विद्रोह की स्थितियां उत्पन्न होती हैं। ’केंचुली‘, ’न्यारी-न्यारी मर्यादा‘, ’कागपंथी दुविधा‘ और ’उलझन‘ कथाएं समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों के विविध रूपों, समस्याओं, जटिलताओं, विकृतियों को सामने रखती हैं। लाछी गूजरी का पति डर के कारण विवश है, लाछी-विवाहित पति के स्वाभिमान को उकसाने की कोशिश करती है। उसकी असफलता ही विडम्बना है। दुविधा और संस्कारों की केंचुल में फंसी स्त्री के लिए घर गृहस्थी की गुजर-बसर से बढकर बडी कोई नैतिकता नहीं है। ये कहानियां आपसी अवैध सम्बन्धों का पर्दाफाश करती है तथा सोचने को विवश करती हैं कि क्या विवाह दिखावटी है, नैतिकता कहां है? ’लाजवन्ती‘ कहानी स्त्री के ऊपरी नाटकीय आदर्श और भीतरी आकांक्षा की मानसिक जटिलता की कहानी है। बारहठ जी द्वारा औरत और हलुए की समानता की बातें करना कागपंथियों की करतूतों का नमूना है। बिज्जी की कहानियों में स्त्री के लिए दोहरे मानदण्डों की विकृति, नैतिकता पर जोर की जरूरत को रेखांकित करती है। स्त्री की वफादारी, सेवा, प्रेम और त्याग के बदले मिलने वाली उपेक्षा उसे भावहीन जडता की तरफ ले जाती है। मूलचन्द गौतम का मत है कि-’’अपने समय और समाज ही नहीं भावी मनुष्य की शंकाओं और ज्वलंत प्रश्नों को समेटे होने के कारण ये कथाएं लम्बे समय तक नवीन बनी रहेंगी।‘‘ बिज्जी पात्रों को गढते ही नहीं जीते भी हैं। ’महामिलन‘ उपन्यास की मीठी माँ कहती है-’’तू इस तरह रोएगा तो दीन दुखियों के आँसू कौन पोंछेगा? वह गौतम को समझाती है-’’तू मठ-मंदिरों की दीवारों के भीतर नहीं समा सकता, खुली धरती ही तेरी कर्मभूमि है।‘‘ बिज्जी का कथा लोक उन्हें एक कथाकार के साथ-साथ चिन्तक व दार्शनिक के रूप में भी प्रस्तुत करता है-’’मौत की तरह समय को भी न किसी का लिहाज, न किसी पर मेहर। दुःख सन्ताप की वेला न तेज लुढकता है और न सुख सुविधा की वेला धीरे सरकता है। सदा सर्वदा एक सी रफ्तार।‘‘ बिज्जी की भाषा का चमत्कार शिल्प वैशिष्ट्य युक्त है उजाला एक शब्द नहीं प्रतीक है, बिम्ब है, रुपक है। उजाले का शब्द सामर्थ्य अद्वितीय है-’’चारों दिशाओं में उजाला ही उजाला व्याप्त हो गया। सूरज धरती की गोद छोडकर पल-पल ऊंचा चढने लगा। उजास के समंदर में सर्वत्र हिलोरें मचल उठी, पर उसके अंतस का अंधियारा तो वैसा ही कायम है। यह सूरज तो शायद बाहर ही बाहर आलोक फैलाता है। भीतर कहीं भी उसकी गति नहीं।‘‘ बिज्जी की कहानियों में कल्पना कम यथार्थ ज्यादा है। बैंड मास्टर, इब्राहिम में यह कथन इसकी पुष्टि करता है-’’बेटा इनसान की, दुनिया में सारी माया इस आग की है। क्या चूल्हे की आग और क्या पेट की आग। पेट की आग बुझाने के लिए चूल्हे की आग जलानी पडती है। पेट की आग बुझाने का जुगाड न बने तो बडी जलन होती है।‘‘ प्रेमचन्द के पात्र-बिज्जी के आलोचनात्मक पक्ष को प्रबलता से प्रस्तुत करते हैं-वे गोदान को कृषक जीवन का महाकाय कहते है वहीं पर प्रेमाश्रम में बलराज वल्द मनोहर में वे लिखते है-’’जमींदार के दबदबे से जो नहीं डरता उसे मरना पडता है। उसका जीना हराम हो जाता है।‘‘ कर्मभूमि का मोहम्मद सलीम एक ऐसा व्यक्ति पात्र है जिसके लिए अपनी आँखों से परे किसी भी प्रकार का छोटा या मोटा आदर्श नहीं हैं फिर भी वह अपनी आँखों के सामने की वस्तुस्थिति का एक सच्चे इन्सान की हैसियत से सामना करता है।‘‘ बिज्जी व्यापक परिवेश के कथाकार है-बातां की फुलवाडी (१४ भाग), अनोखा पेड बाल कथाएं, चौधराइन की चतुराई, महामिलन, प्रिय मृणाल, मेरो दरद न जाने कोय, लाजवन्ती, प्रतिशोध उपन्यास हैं। ’रूंख‘ एक अद्भुत ग्रन्थ है-बरगदी फैलाव जैसा। विजय दान देथा के लिए प्रिय मृणाल में प्रयुक्त उन्हीं के शब्द सही प्रतीत होते हैं-’’अक्षरों से निर्मित, उस साहित्य-लोक में तुम्हारा निवास है जहां सूरज के बिना भी उजियारा है, चाँद के बगैर भी जहां चाँदनी है, फूलों के बिना भी जहां सौरभ है, पानी के बिना भी जहां नदियां बहती हैं, हवा के अभाव में भी जहां बयार सनसनाती है।‘‘ पद्मश्री से सम्मानित देथा रेत के धोरों में कहानियां ढूंढते रहे, गढते रहे, उगाते और पनपाते रहे, सजाते-सँवारते रहे। वे लोक जीवन में रमी, रची-पची कहानियों के श्रोता बने, द्रष्टा रहे व सृष्टा कहलाए। जिस किसी का जन्म होता है, उसे मरना पडता है। जीवन में तो मौत के बाद मनुष्य सचमुच मर जाता है, किंतु साहित्य में मौत अमर कर जाती है। अनंत काल तक जिलाए रखती है। ’रूंख‘ के बारे में वे लिखते हैं-’’रूंख की इस सम्यक रचनावली की खातिर मुझे अपनी जमीन से, चारों तरफ की धूप, हवा, आकाश और सजल बादलों से प्राण स्वीकार करना ही पडेगा।‘‘ रवीन्द्र रचनावली की सत्ताईस तिजोरियाँ-एक से एक बढकर कोहिनूर हीरों से भरी हुई-कहने वाले बिज्जी की ’बाताँ की फुलवाडी‘ भी लोक जीवन के अनुभव-जन्य हीरों से भरी तिजोरियां ही तो हैं। उनके एक-एक अक्षर में-उनके रक्त का प्रवाह, हृदय की धडकन, आत्मा की सांसें, उनके व्यतित्व का अणु-अणु आप्लावित है। लोक कथाओं में घटना का बीज रूप है। बात का मिठास है। भावों के अनुरूप भाषा है। कथावस्तु में रीति रिवाज, ज्ञान-विज्ञान, इतिहास-संस्कृति के सूत्र है। पशु प्रतीक रूप में हैं पुरानी परम्पराओं को जानकर ही भारत का बालक पूर्ण रूपेण भारतवासी बन सकता है। पुराने भारत की नींव पर नया भारत खडा करना है। राजस्थान की प्राचीन सामाजिक परम्परा और जन जीवन की सौन्दर्याभिव्यक्ति इनकी लोक कथाओं में होती है। श्री देथा ने शब्दों, वाक्यावलियों, कहावतों एवं मुहावरों की आत्माओं से घनिष्ठता स्थापित की है। जीवन के विभिन्न अर्थों व संकेतों की व्यंजना इनमें हुई है। ये लोक कथाएं सामूहिक अनुभूतियों और क्रियाकलापों की वर्तुलाकार परिधि में संचरित होती हैं। सामाजिक जीवन के घनीभूत अनुभवों से परिपोषित होती हैं, निपट यथार्थ एवं सक्रिय तत्व को पहचान कर प्रकट करती हैं। लोक कथाओं का प्रयोग-समाज में व्यावहारिक संचालन, नैतिक संतुलन, पारम्परिक, स्नेह, भौतिक जीवन में हर्षोल्लास एवं जीवन की अमूर्त अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए किया जाता रहा है। बालकों की शिक्षा के दृष्टिकोण से शिक्षण पद्धति व बाल मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में भी लोक कथाएं उपयोगी हैं वाणी में सहजता, सीमित शब्दावली, ज्ञान जन्य वस्तुओं का सहारा, वातावरण से सीधा सम्बन्ध इन्हें अधिक प्रासंगिक व प्रभावी बनाता है। ये कथाएं बाल सुलभ चेतना को गुदगुदाती हैं। इनका शैक्षिक उपयोग अब भी शोध का व्यापक विस्तार दर्शाता है। निसन्देह-बिज्जी का कथा लोक व्यापक, विस्तृत एवं बहु आयामी है। शाश्वत मान्यताओें व जीवन में चरितार्थ मूल्यों का रेखांकन है। नवीन संस्कारों से अंधकार मिटाने का संघर्षरत संकल्प है। सर्वत्र रोशनी फैलाने का प्रयास है यदि हमने इस लोक के मर्म का स्पर्श कर लिया तो हमारी पीढी पंगु, असहाय और निर्बल नहीं रहेगी। हम अपने पैरों पर चल सकेंगे, बढ सकेंगे व ज्ञान विज्ञान के नए लक्ष्यों को गढ सकेंगे। यदि देश को खुशहाल, शिक्षित और स्वावलम्बी तथा विवेकवान के साथ अधिकारों के प्रति जागरूक तथा सतर्क बनाना है तो हमें इस लोक की यात्रा पूर्ण मनोयोग से करनी होगी। रेतीले धोरों में प्रवाहित होने वाले कथा लोक की यात्रा का मर्म समझना ही बिज्जी के कार्य को समझना, परखना व यथायोग्य नमन करते हुए पुनर्स्मरण करना होगा।

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