बुधवार, 25 मार्च 2015

सत्ता की चाकरी ● / शहंशाह आलम





वे भीड़े थे इन दिनों
सत्ता की चाकरी में
अपने पूर्व के दिवसों को
समेट-लपेट

सत्ता की चाकरी में
लिप्त-तृप्त
वे ही प्रगतिशील
वे ही जनवादी
वे ही वामपंथी
वे ही समाजवादी
वे ही थे 'जनता का आदमी' अब
अब नींद थी सुख की
उन्हीं के जीवन में
जबकि उनकी कविता पड़ी थी
खाइयों खंदकों गुफ़ाओं में
अंधेरे में बिलकुल अलसाई
उनकी कविताओं में
रायते की गंध नहीं थी
न कोई बहती हुई नदी थी
न अंतरिक्ष न पट कोई खुला हुआ
अब बस सत्ता की भाषा थी
अब बस सत्ता के मुहावरे थे वीभत्स
वे मरे पड़े थे जैसे
सत्ता के अंधे गलियारे में।

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