सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

निदा की अब बाकी रह गयी केवल निदा ....





अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही
उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
उस को खो देने का एहसास तो कम बाक़ी है
एक ही धरती हम सब का घर जितना तेरा उतना मेरा
कठ-पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मत
कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
काला अम्बर पीली धरती या अल्लाह
किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो
कुछ तबीअत ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत न हुई
कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया
कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
कोई नहीं है आने वाला फिर भी कोई आने को है
कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया
गरज बरस प्यासी धरती फिर पानी दे मौला
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे
चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं
जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दी
जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे
ज़िहानतों को कहाँ कर्ब से फ़रार मिला
जो हो इक बार वो हर बार हो ऐसा नहीं होता
तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे
तू क़रीब आए तो क़ुर्बत का यूँ इज़हार करूँ
दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही
दिल में न हो जुरअत तो मोहब्बत नहीं मिलती
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
दो चार गाम राह को हमवार देखना
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
न जाने कौन सा मंज़र नज़र में रहता है
नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर
नील-गगन में तैर रहा है उजला उजला पूरा चाँद
बृन्दाबन के कृष्ण कन्हैय्या अल्लाह हू
बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता
बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ
मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं
मैं अपने इख़्तियार में हूँ भी नहीं भी हूँ
यक़ीन चाँद पे सूरज में ए'तिबार भी रख
यूँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है
ये जो फैला हुआ ज़माना है
वक़्त बंजारा-सिफ़त लम्हा ब लम्हा अपना
हर इक रस्ता अंधेरों में घिरा है
हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो
हर एक बात को चुप-चाप क्यूँ सुना जाए
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा
हर चमकती क़ुर्बत में एक फ़ासला देखूँ
हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी
प्रस्तुति-  शैलेन्द्र किशोर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...