सोमवार, 6 सितंबर 2021

मेरी माँ हैं

 एक प्राथमिक स्कूल मे अंजलि नाम की एक शिक्षिका थीं वह कक्षा 5 की क्लास टीचर थी, उसकी एक आदत थी कि वह कक्षा मे आते ही हमेशा "LOVE YOU ALL" बोला करतीं थी।

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मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं बोल रही । 

वह कक्षा के सभी बच्चों से एक जैसा प्यार नहीं करती थीं।

कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो उनको फटी आंख भी नहीं भाता था। उसका नाम राजू था। राजू मैली कुचेली स्थिति में स्कूल आ जाया करता है। उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मेल के निशान । पढ़ाई के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता था।

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मेडम के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखता, मगर उसकी खाली खाली नज़रों से साफ पता लगता रहता.कि राजू शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब हे यानी (प्रजेंट बाडी अफसेटं माइड) .धीरे धीरे मेडम को राजू से नफरत सी होने लगी। क्लास में घुसते ही राजू मेडम की आलोचना का निशाना बनने लगता। सब बुराई उदाहरण राजू के नाम पर किये जाते. बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते.और मेडम उसको अपमानित कर के संतोष प्राप्त करतीं। 

राजू ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया था।

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मेडम को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता जिसके अंदर आत्मा नाम की कोई चीज नहीं थी। प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी भावनाओं से खाली नज़रों से उन्हें देखा करता और सिर झुका लेता। मेडम को अब इससे गंभीर नफरत हो चुकी थी।

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पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और प्रोग्रेस रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो मेडम ने राजू की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी । प्रगति रिपोर्ट माता पिता को दिखाने से पहले हेड मास्टर के पास जाया करती थी। उन्होंने जब राजू की प्रोग्रेस रिपोर्ट देखी तो मेडम को बुला लिया। "मेडम प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो राजू की प्रगति भी लिखनी चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे राजू के पिता इससे बिल्कुल निराश हो जाएंगे।" मेडम ने कहा "मैं माफी माँगती हूँ, लेकिन राजू एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है । मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ लिख सकती हूँ। "मेडम घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ कर चली गई स्कूल की छुट्टी हो गई आज तो ।

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अगले दिन हेड मास्टर ने एक विचार किया ओर उन्होंने चपरासी के हाथ मेडम की डेस्क पर राजू की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी । अगले दिन मेडम ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी। पलट कर देखा तो पता लगा कि यह राजू की रिपोर्ट हैं। " मेडम ने सोचा कि पिछली कक्षाओं में भी राजू ने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे।" उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली। रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है। "राजू जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा।" "बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षक से बेहद लगाव रखता है।" " 

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यह लिखा था

अंतिम सेमेस्टर में भी राजू ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। "मेडम ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली।" राजू ने अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव लिया। .उसका ध्यान पढ़ाई से हट रहा है। "" राजू की माँ को अंतिम चरण का कैंसर हुआ है। । घर पर उसका और कोई ध्यान रखनेवाला नहीं है.जिसका गहरा प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ा है। 

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" लिखा था

निचे हेड मास्टर ने लिखा कि राजू की माँ मर चुकी है और इसके साथ ही राजू के जीवन की चमक और रौनक भी। । उसे बचाना होगा...इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। " यह पढ़कर मेडम के दिमाग पर भयानक बोझ हावी हो गया। कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । मेडम की आखो से आंसू एक के बाद एक गिरने लगे. मेडम ने साङी से अपने आंसू पोछे

अगले दिन जब मेडम कक्षा में दाख़िल हुईं तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश "आई लव यू ऑल" दोहराया। 

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मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं। क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे बालों वाले बच्चे राजू के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं..वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से अधिक था ।

पढ़ाई के दौरान उन्होंने रोजाना दिनचर्या की तरह एक सवाल राजू पर दागा और हमेशा की तरह राजू ने सिर झुका लिया। जब कुछ देर तक मेडम से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हंसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी तो उसने अचंभे में सिर उठाकर मेडम की ओर देखा। अप्रत्याशित उनके माथे पर आज बल न थे, वह मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने राजू को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर जबरन दोहराने के लिए कहा। राजू तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत:बोल ही पड़ा। इसके जवाब देते ही मेडम ने न सिर्फ खुद खुशान्दाज़ होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी बच्चो से भी बजवायी..

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फिर तो यह दिनचर्या बन गयी।मेडम हर सवाल का जवाब अपने आप बताती और फिर उसकी खूब सराहना तारीफ करतीं। प्रत्येक अच्छा उदाहरण राजू के कारण दिया जाने लगा । धीरे-धीरे पुराना राजू सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आ गया। अब मेडम को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिना त्रुटि उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नये नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी करता ।

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उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था। देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और राजू ने दूसरा स्थान हासिल कर कक्षा 5 वी पास कर लिया यानी अब दुसरी जगह स्कूल मे दाखिले के लिए तैयार था।

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कक्षा 5 वी के विदाई समारोह में सभी बच्चे मेडम के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और मेडम की टेबल पर ढेर लग गया । इन खूबसूरती से पैक हुए उपहारो में एक पुराने अखबार में बदतर सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था। बच्चे उसे देखकर हंस रहे थे । किसी को जानने में देर न लगी कि यह उपहार राजू लाया होगा। मेडम ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर राजू वाले उपहार को निकाला। खोलकर देखा तो उसके अंदर एक महिलाओं द्वारा इस्तेमाल करने वाली इत्र की आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक बड़ा सा कड़ा कंगन था जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे। मिस ने चुपचाप इस इत्र को खुद पर छिड़का और हाथ में कंगन पहन लिया। बच्चे यह दृश्य देखकर सब हैरान रह गए। खुद राजू भी। आखिर राजू से रहा न गया और मिस के पास आकर खड़ा हो गया। ।

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कुछ देर बाद उसने अटक अटक कर मेडम को बोला "आज आप में से मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है।" इतना सुनकर मेडम के आखो मे आसू आ गये ओर मेडम ने राजू को अपने गले से लगा लिया

राजू अब दुसरी स्कूल मे जाने वाला था

राजू ने दुसरी जगह स्कूल मे दाखिले ले लिया था

समय बितने लगा।

दिन सप्ताह,

सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है?

मगर हर साल के अंत में मेडम को राजू से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता जिसमें लिखा होता कि "इस साल कई नए टीचर्स से मिला।। मगर आप जैसा मेडम कोई नहीं था।"

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फिर राजू की पढ़ाई समाप्त हो गया और पत्रों का सिलसिला भी सम्माप्त । कई साल आगे गुज़रे और मेडम रिटायर हो गईं।

एक दिन मेडम के घर अपनी मेल में राजू का पत्र मिला जिसमें लिखा था:

"इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपके बिना शादी की बात मैं नहीं सोच सकता। एक और बात .. मैं जीवन में बहुत सारे लोगों से मिल चुका हूं।। आप जैसा कोई नहीं है.........आपका डॉक्टर राजू

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पत्र मे साथ ही विमान का आने जाने का टिकट भी लिफाफे में मौजूद था।

मेडम खुद को हरगिज़ न रोक सकी। उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह राजू के शहर के लिए रवाना हो गईं। शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं।

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उन्हें लगा समारोह समाप्त हो चुका होगा.. मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि शहर के बड़े डॉक्टर , बिजनेसमैन और यहां तक कि वहां पर शादी कराने वाले पंडितजी भी थक गये थे. कि आखिर कौन आना बाकी है...मगर राजू समारोह में शादी के मंडप के बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने का इंतजार कर रहा था। फिर सबने देखा कि जैसे ही एक बुड्ढी ओरत ने गेट से प्रवेश किया राजू उनकी ओर लपका और उनका वह हाथ पकड़ा जिसमें उन्होंने अब तक वह कड़ा पहना हुआ था कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा मंच पर ले गया।

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राजू ने माइक हाथ में पकड़ कर कुछ यूं बोला "दोस्तों आप सभी हमेशा मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको उनसे मिलाउंगा।।।........ 

ध्यान से देखो यह यह मेरी प्यारी सी मा दुनिया की सबसे अच्छी है यह मेरी मा यह मेरी माँ हैं -

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!! प्रिय दोस्तों.... इस सुंदर कहानी को सिर्फ शिक्षक और शिष्य के रिश्ते के कारण ही मत सोचिएगा । अपने आसपास देखें, राजू जैसे कई फूल मुरझा रहे हैं जिन्हें आप का जरा सा ध्यान, प्यार और स्नेह नया जीवन दे सकता है...........👍

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

संस्कृत भाषा का चमत्कार ...?

अहिः = सर्पः

अहिरिपुः = गरुडः

अहिरिपुपतिः = विष्णुः

अहिरिपुपतिकान्ता = लक्ष्मीः

अहिरिपुपतिकान्तातातः = सागरः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धः = रामः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ता = सीता

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरः = रावणः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयः = मेघनादः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्ता = लक्ष्मणः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदाता = हनुमान्

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजः = अर्जुनः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखा = श्रीकृष्णः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतः = प्रद्युम्नः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतः = अनिरुद्धः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्ता = उषा

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातः = बाणासुरः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यः = शिवः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यकान्ता = पार्वती

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यकान्तापिता = हिमालयः

अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यकान्तापितृशिरोवहा = गङ्गा, 


सा मां पुनातु इति अन्वयः


है किसी अन्य भाषा में इतना सामर्थ्य..

सिंदूर के मायने

 जब वो मांग में सिंदूर आते ही लड़की से औरत बन जाती है।

जब वो शादी के तुरंत बाद दीदी से आंटी बन जाती है जबकि उसका पति दो बच्चों के बाद भी भैया ही बना रहता है।

जब शादी की अगली सुबह बेटे को आराम करने दिया जाता है और उसे रसोई में प्रवेश मिल जाता है।

जब उसकी हर ग़लती भी उसकी और उसके पति की हर ग़लती भी उसी की ग़लती कहलाती है।

जब उसका शादी से बाहर आकर्षण उसको तिर्यचरित्र बना देता है और उसके पति का आकर्षण उसके प्यार की कमी कहलाता है।

जब मायके आने के लिए किसी की इजाजत जरूरी हो जाती है।

जब मायके की यादों की उदासी को उसके काम ना करने का बहाना करार दिया जाता है।

जब जरूरत पड़ने पर ना वो पति से पैसे मांग पाती है और ना ही पिता से।

जब उसकी माँ उसे समझौता करने को कहती रहती है। और अपनी सफल शादी की दुहाई देती रहती है।

जब हर रात उसके साथ जबर्दस्ती होती है और वो किसी से कह नहीं सकती है क्योंकि पति का तो अधिकार हो जाता है।

जब ऑफिस से थक कर आने के बाद कोई पानी तक नहीं पूछता है।

जब रात को पति के बाद सोती है और सुबह पति से पहले उठती है।

जब अपने सपने/ख्वाहिशें भूल जाती है और कोई पुरानी सहेली उसको याद दिलाती है।

शादी सभी के लिए उतनी मीठी नहीं होती जितनी नज़र आती है। महिलाओं के लिए आज भी जीवन मुश्किल है।

वो जो महिला आप रोज़ अपने ऑफिस में देखते है और उससे उसकी आँखों के नीचे काले घेरे होने का कारण पूछते है, मत पूछिए। वो कभी नहीं बताएगी। और अगर बताती भी है तो आप कभी नहीं समझेंगे।

अरे भई! जिसे उसकी माँ ने नहीं समझा, आप क्या खाक समझेंगे?

ऐसे ही होता है। नजरअंदाज करो। हमने भी तो सहा है और तुमसे ज्यादा सहा है। अपने बच्चों के बारे में सोचों।

और भी जाने क्या-क्या बकवास दलीलों के रूप में सुनने को मिलती है।

महिलाओं के शांत चेहरों और फूल से हँसी के पीछे कौन-कौन से तूफ़ान गुज़र रहे होते है, आप कभी नहीं समझेंगे।

चमत्कारी संत देवरहा बाबा का जीवन

 एक ऐसे संत जिसके पैरो के नीचे अपना सिर रखने नेता व अंग्रेज तक आते थे! परम पूज्य गुरदेव देवरहा बाबा ।

 

देवरहा बाबा का जन्म अज्ञात है। यहाँ तक कि उनकी सही उम्र का आकलन भी नहीं है। वह यूपी के देवरिया जिले के रहने वाले थे। मंगलवार, 19 जून सन् 1990 को योगिनी एकादशी के दिन अपना प्राण त्यागने वाले इस बाबा के जन्म के बारे में संशय है। कहा जाता है कि वह करीब 900 साल तक जिन्दा थे। (बाबा के संपूर्ण जीवन के बारे में अलग-अलग मत है, कुछ लोग उनका जीवन 250 साल तो कुछ लोग 500 साल मानते हैं.)


भारत के उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में एक योगी, सिद्ध महापुरुष एवं सन्तपुरुष थे देवरहा बाबा. डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तमदास टंडन, जैसी विभूतियों ने पूज्य देवरहा बाबा के समय-समय पर दर्शन कर अपने को कृतार्थ अनुभव किया था. पूज्य महर्षि पातंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग में पारंगत थे।


श्रद्धालुओं के कथनानुसार बाबा अपने पास आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से बड़े प्रेम से मिलते थे और सबको कुछ न कुछ प्रसाद अवश्य देते थे. प्रसाद देने के लिए बाबा अपना हाथ ऐसे ही मचान के खाली भाग में रखते थे और उनके हाथ में फल, मेवे या कुछ अन्य खाद्य पदार्थ आ जाते थे जबकि मचान पर ऐसी कोई भी वस्तु नहीं रहती थी।


श्रद्धालुओं को कौतुहल होता था कि आखिर यह प्रसाद बाबा के हाथ में कहाँ से और कैसे आता है. जनश्रूति के मुताबिक, वह खेचरी मुद्रा की वजह से आवागमन से कहीं भी कभी भी चले जाते थे. उनके आस-पास उगने वाले बबूल के पेड़ों में कांटे नहीं होते थे. चारों तरफ सुंगध ही सुंगध होता था।


लोगों में विश्वास है कि बाबा जल पर चलते भी थे और अपने किसी भी गंतव्य स्थान पर जाने के लिए उन्होंने कभी भी सवारी नहीं की और ना ही उन्हें कभी किसी सवारी से कहीं जाते हुए देखा गया. बाबा हर साल कुंभ के समय प्रयाग आते थे।


 मार्कण्डेय सिंह के मुताबिक, वह किसी महिला के गर्भ से नहीं बल्कि पानी से अवतरित हुए थे. यमुना के किनारे वृन्दावन में वह 30 मिनट तक पानी में बिना सांस लिए रह सकते थे. उनको जानवरों की भाषा समझ में आती थी। खतरनाक जंगली जानवारों को वह पल भर में काबू कर लेते थे।


लोगों का मानना है कि बाबा को सब पता रहता था कि कब, कौन, कहाँ उनके बारे में चर्चा हुई. वह अवतारी व्यक्ति थे. उनका जीवन बहुत सरल और सौम्य था।वह फोटो कैमरे और टीवी जैसी चीजों को देख अचंभित रह जाते थे। वह उनसे अपनी फोटो लेने के लिए कहते थे, लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उनका फोटो नहीं बनता था। वह नहीं चाहते तो रिवाल्वर से गोली नहीं चलती थी. उनका निर्जीव वस्तुओं पर नियंत्रण था।


अपनी उम्र, कठिन तप और सिद्धियों के बारे में देवरहा बाबा ने कभी भी कोई चमत्कारिक दावा नहीं किया, लेकिन उनके इर्द-गिर्द हर तरह के लोगों की भीड़ ऐसी भी रही जो हमेशा उनमें चमत्कार खोजते देखी गई।अत्यंत सहज, सरल और सुलभ बाबा के सानिध्य में जैसे वृक्ष, वनस्पति भी अपने को आश्वस्त अनुभव करते रहे. भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें अपने बचपन में देखा था।


 देश-दुनिया के महान लोग उनसे मिलने आते थे और विख्यात साधू-संतों का भी उनके आश्रम में समागम होता रहता था. उनसे जुड़ीं कई घटनाएं इस सिद्ध संत को मानवता, ज्ञान, तप और योग के लिए विख्यात बनाती हैं।


मुझे अच्छी तरह याद है और मैं वहाँ मौजूद भी था. कोई 1987 की बात होगी, जून का ही महीना था. वृंदावन में यमुना पार देवरहा बाबा का डेरा जमा हुआ था. अधिकारियों में अफरातफरी मची थी। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बाबा के दर्शन करने आना था।प्रधानमंत्री के आगमन और यात्रा के लिए इलाके की मार्किंग कर ली गई।


आला अफसरों ने हैलीपैड बनाने के लिए वहां लगे एक बबूल के पेड़ की डाल काटने के निर्देश दिए. भनक लगते ही बाबा ने एक बड़े पुलिस अफसर को बुलाया और पूछा कि पेड़ को क्यों काटना चाहते हो? अफसर ने कहा, प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए जरूरी है. बाबा बोले, तुम यहां अपने पीएम को लाओगे, उनकी प्रशंसा पाओगे, पीएम का नाम भी होगा कि वह साधु-संतों के पास जाता है, लेकिन इसका दंड तो बेचारे पेड़ को भुगतना पड़ेगा!


वह मुझसे इस बारे में पूछेगा तो मैं उसे क्या जवाब दूंगा? नही! यह पेड़ नहीं काटा जाएगा. अफसरों ने अपनी मजबूरी बताई कि यह दिल्ली से आए अफसरों का है, इसलिए इसे काटा ही जाएगा और फिर पूरा पेड़ तो नहीं कटना है, इसकी एक टहनी ही काटी जानी है, मगर बाबा जरा भी राजी नहीं हुए. उन्होंने कहा कि यह पेड़ होगा तुम्हारी निगाह में, मेरा तो यह सबसे पुराना साथी है, दिन रात मुझसे बतियाता है, यह पेड़ नहीं कट सकता।


इस घटनाक्रम से बाकी अफसरों की दुविधा बढ़ती जा रही थी, आखिर बाबा ने ही उन्हें तसल्ली दी और कहा कि घबड़ा मत, अब पीएम का कार्यक्रम टल जाएगा, तुम्हारे पीएम का कार्यक्रम मैं कैंसिल करा देता हूं. आश्चर्य कि दो घंटे बाद ही पीएम आफिस से रेडियोग्राम आ गया कि प्रोग्राम स्थगित हो गया है, कुछ हफ्तों बाद राजीव गांधी वहां आए, लेकिन पेड़ नहीं कटा. इसे क्या कहेंगे चमत्कार या संयोग.


बाबा की शरण में आने वाले कई विशिष्ट लोग थे. उनके भक्तों में जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री , इंदिरा गांधी जैसे चर्चित नेताओं के नाम हैं. उनके पास लोग हठयोग सीखने भी जाते थे. सुपात्र देखकर वह हठयोग की दसों मुद्राएं सिखाते थे. योग विद्या पर उनका गहन ज्ञान था. ध्यान, योग, प्राणायाम, त्राटक समाधि आदि पर वह गूढ़ विवेचन करते थे. कई बड़े सिद्ध सम्मेलनों में उन्हें बुलाया जाता, तो वह संबंधित विषयों पर अपनी प्रतिभा से सबको चकित कर देते।


 लोग यही सोचते कि इस बाबा ने इतना सब कब और कैसे जान लिया. ध्यान, प्रणायाम, समाधि की पद्धतियों के वह सिद्ध थे ही. धर्माचार्य, पंडित, तत्वज्ञानी, वेदांती उनसे कई तरह के संवाद करते थे. उन्होंने जीवन में लंबी लंबी साधनाएं कीं. जन कल्याण के लिए वृक्षों-वनस्पतियों के संरक्षण, पर्यावरण एवं वन्य जीवन के प्रति उनका अनुराग जग जाहिर था.


देश में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जब इंदिरा गांधी हार गईं तो वह भी देवरहा बाबा से आशीर्वाद लेने गईं. उन्होंने अपने हाथ के पंजे से उन्हें आशीर्वाद दिया. वहां से वापस आने के बाद इंदिरा ने कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ का पंजा निर्धारित कर दिया. इसके बाद 1980 में इंदिरा के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया और वह देश की प्रधानमंत्री बनीं।


 वहीं, यह भी मान्यता है कि इन्दिरा गांधी आपातकाल के समय कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती से आर्शीवाद लेने गयीं थी. वहां उन्होंने अपना दाहिना हाथ उठाकर आर्शीवाद दिया और हाथ का पंजा पार्टी का चुनाव निशान बनाने को कहा।


बाबा महान योगी और सिद्ध संत थे. उनके चमत्कार हज़ारों लोगों को झंकृत करते रहे. आशीर्वाद देने का उनका ढंग निराला था. मचान पर बैठे-बैठे ही अपना पैर जिसके सिर पर रख दिया, वो धन्य हो गया. पेड़-पौधे भी उनसे बात करते थे. उनके आश्रम में बबूल तो थे, मगर कांटेविहीन. यही नहीं यह खुशबू भी बिखेरते थे।


उनके दर्शनों को प्रतिदिन विशाल जनसमूह उमड़ता था. बाबा भक्तों के मन की बात भी बिना बताए जान लेते थे. उन्होंने पूरा जीवन अन्न नहीं खाया. दूध व शहद पीकर जीवन गुजार दिया. श्रीफल का रस उन्हें बहुत पसंद था।


देवरहा बाबा को खेचरी मुद्रा पर सिद्धि थी जिस कारण वे अपनी भूख और आयु पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते थे।


ख्याति इतनी कि जार्ज पंचम जब भारत आया तो अपने पूरे लाव लश्कर के साथ उनके दर्शन करने देवरिया जिले के दियारा इलाके में मइल गांव तक उनके आश्रम तक पहुंच गया. दरअसल, इंग्लैंड से रवाना होते समय उसने अपने भाई से पूछा था कि क्या वास्तव में इंडिया के साधु संत महान होते हैं।


प्रिंस फिलिप ने जवाब दिया- हां, कम से कम देवरहा बाबा से जरूर मिलना. यह सन 1911 की बात है. जार्ज पंचम की यह यात्रा तब विश्वयुद्ध के मंडरा रहे माहौल के चलते भारत के लोगों को बरतानिया हुकूमत के पक्ष में करने की थी. उससे हुई बातचीत बाबा ने अपने कुछ शिष्यों को बतायी भी थी, लेकिन कोई भी उस बारे में बातचीत करने को आज भी तैयार नहीं।


डाक्टर राजेंद्र प्रसाद तब रहे होंगे कोई दो-तीन साल के, जब अपने माता-पिता के साथ वे बाबा के यहां गये थे. बाबा देखते ही बोल पड़े-यह बच्चा तो राजा बनेगा. बाद में राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने बाबा को एक पत्र लिखकर कृतज्ञता प्रकट की और सन 54 के प्रयाग कुंभ में बाकायदा बाबा का सार्वजनिक पूजन भी किया।


बाबा देवरहा 30 मिनट तक पानी में बिना सांस लिए रह सकते थे. उनको जानवरों की भाषा समझ में आती थी. खतरनाक जंगली जानवरों को वह पल भर में काबू कर लेते थे.


उनके भक्त उन्हें दया का महासमुंदर बताते हैं. और अपनी यह सम्पत्ति बाबा ने मुक्त हस्तज लुटाई. जो भी आया, बाबा की भरपूर दया लेकर गया. वितरण में कोई विभेद नहीं. वर्षाजल की भांति बाबा का आशीर्वाद सब पर बरसा और खूब बरसा. मान्यता थी कि बाबा का आशीर्वाद हर मर्ज की दवाई है।


कहा जाता है कि बाबा देखते ही समझ जाते थे कि सामने वाले का सवाल क्या है. दिव्यदृष्ठि के साथ तेज नजर, कड़क आवाज, दिल खोल कर हंसना, खूब बतियाना बाबा की आदत थी. याददाश्त इतनी कि दशकों बाद भी मिले व्यक्ति को पहचान लेते और उसके दादा-परदादा तक का नाम व इतिहास तक बता देते, किसी तेज कम्प्युटर की तरह।


हां, बलिष्ठ कदकाठी भी थी. लेकिन देह त्याहगने के समय तक वे कमर से आधा झुक कर चलने लगे थे. उनका पूरा जीवन मचान में ही बीता. लकडी के चार खंभों पर टिकी मचान ही उनका महल था, जहां नीचे से ही लोग उनके दर्शन करते थे. मइल में वे साल में आठ महीना बिताते थे. कुछ दिन बनारस के रामनगर में गंगा के बीच, माघ में प्रयाग, फागुन में मथुरा के मठ के अलावा वे कुछ समय हिमालय में एकांतवास भी करते थे।


खुद कभी कुछ नहीं खाया, लेकिन भक्तनगण जो कुछ भी लेकर पहुंचे, उसे भक्तों पर ही बरसा दिया. उनका बताशा-मखाना हासिल करने के लिए सैकडों लोगों की भीड हर जगह जुटती थी. और फिर अचानक ११ जून १९९० को उन्होंने दर्शन देना बंद कर दिया।


लगा जैसे कुछ अनहोनी होने वाली है. मौसम तक का मिजाज बदल गया. यमुना की लहरें तक बेचैन होने लगीं. मचान पर बाबा त्रिबंध सिद्धासन पर बैठे ही रहे. डॉक्टरों की टीम ने थर्मामीटर पर देखा कि पारा अंतिम सीमा को तोड निकलने पर आमादा है.१९ तारीख को मंगलवार के दिन योगिनी एकादशी थी।


 आकाश में काले बादल छा गये, तेज आंधियां तूफान ले आयीं. यमुना जैसे समुंदर को मात करने पर उतावली थी. लहरों का उछाल बाबा की मचान तक पहुंचने लगा. और इन्हीं सबके बीच शाम चार बजे बाबा का शरीर स्पंदनरहित हो गया. भक्तों की अपार भीड भी प्रकृति के साथ हाहाकार करने लगी।💐💐.जय सद्गुरुदेव 💐💐

नंदकिशोर नवल शाब्दिक अर्थों में मेरे गुरु थे / मुकेश प्रत्यूष

 मै शुरू से विज्ञान का विद्यार्थी था। कविताएं, लेख   लिखता था,  गोष्ठियों-कार्यक्रमों में जाता था। हिन्दी के रचनाकारों, अध्यापकों से परिचित था  लेकिन हिन्‍दी साहित्‍य की परंपरा का विधिवत अध्ययन नहीं किया  था। 

 उन दिनों डा. रामखेलावन राय पटना विश्‍वविद्यालय में   हिन्‍दी विभाग के अध्‍यक्ष थे । वे मेरे प्रकाशित लेखों को पढ़ते थे और उसकी प्रशंसा भी किया करते थे।  एक दिन बातचीत के क्रम में उन्होंने कहा आप हिंदी  में एम. ए. कर लीजिए। दूसर दिन  यूनिवर्सिटी बुलाकर  एडमिशन फार्म भरवाया और  किसी विशेष प्रावधान के तहत  विज्ञान से स्‍नातक विद्यार्थी का दाखिला स्नातकोत्तर  हिन्‍दी में लिया।  वे   काव्‍य शास्‍त्र पढ़ाते थे । वे आधुनिक कविता को पसंद करते थे लेकिन मार्क्‍सवाद या वामपंथी विचारधारा को बिल्‍कुल नहीं और उनके ठीक विपरीत डा. नंदकिशोर नवल पूरी तरह मार्क्‍सवादी विचारधारा के समर्थक थे। अवसर मिलने पर दोनों एक दूसरे के विचारों की खिल्‍ली उड़ाने से नहीं चूकते थे लेकिन परस्‍पर आदर का भाव रखते थे ।

 नवलजी हिन्‍दी साहित्‍य का इतिहास पढ़ाया करते थे । अरूचिकर विषय लेकिन नवलजी पढ़ाने की शैली और तैयारी  इतनी अच्‍छी कि पूरा क्‍लास मंत्रमुग्‍ध रहता । वे उस नाविक की तरह थे जिसे पता था कि आने वाली तमाम दुश्‍वारियों के बावजूद कितने समय में नाव को उस पार पहुंचा देना है। मुझे याद नहीं कि कभी उन्‍हें अपने पतवार की दिशा क्‍लास में बदलनी पड़ी हो या कभी किसी विद्यार्थी को  उसके प्रश्‍न का  संतोषजनक और सार्थक उत्‍तर नहीं दिया हो। जिस  प्रश्‍न के उत्‍तर पर उन्‍हें खुद संदेह होता तो वे तुरंत कहते मैं इसके संबंध में कल विस्‍तार से बताउंगा और दूसरे दिन तैयार होकर आते और  बताते। वे इस बात को लेकर अत्‍यंत सचेत रहते थे कि कोई विद्यार्थी उनकी कक्षा में उब महसूस न करे । एक बार किसी कारणवश किसी ने  समय देखने की कोशिश की तो उन्‍होंने तुरंत पूछा  मेरी आज की  क्‍लास में मन नहीं लग रहा क्‍या? एम. ए. के विद्यार्थियों  को एक विशेष पत्र पढ़ना होता था। कई विकल्‍प होते हैं । निराला मेरे प्रिय कवि हैं इसीलिए मैंने विशेष पत्र के रूप में निराला को चुना यह कहूं तो शायद पूरा सत्य नहीं होगा,  इसकी मुख्‍य वजह यह थी कि नवलजी निराला पढ़ाते थे । ठीक से तो याद नहीं लेकिन 10 या 12 विद्यार्थियों का समूह होता था स्‍पेशल क्‍लास में । नवलजी निर्धारित समय पर स्‍वयं भी आते और सभी से यह अपेक्षा भी करते और प्रत्‍येक की प्रगति पर नजर रखते । एक बार उन्‍होंने कहा कि अच्‍छा अध्‍यपक वह होता है जो किसी नीरस विषय को भी रोचक बनाकर पढाए और छात्रों की रूचि उसमें जागृत कर दे । मैंने इसे गांठ में बांध लिया।  इसका लाभ मुझे तब मिला जब  ए.एन.कानेज, पटना में  अध्‍यापन शुरु किया और स्‍नातकोत्‍तर के विद्यार्थियों  को पढाने के लिए  भाषा विज्ञान  और  हिन्दी आलोचना मुझे आबंटित किया गया। 


एम.ए. करने के बाद मैंने नवलजी के निर्देशन में हिन्‍दी काव्‍यालोचन पर तारसप्‍तक के कवियों का योगदान विषय पर शोध करने का निर्णय लिया । नवलजी बहुत कम ही विदयार्थियों का पंजीकरण अपने साथ करवाते थे या कहें बहुत कम विद्यार्थी उनकेसाथ पंजीकृत होने की कोशिश करते थे क्‍योंकि सबको पता था कि उनके साथ सच्‍चे अर्थों  में शोध करना पड़ेगा। संबंधों का नाजायज लाभ उनसे नहीं उठाया जा सकता था ।  अपूर्वानंद, नवलजी के दामाद हैं, वे भी मेरे साथ ही  नवलजी के निर्देशन में शोध कार्य  कर रहे थे। हमने एक साथ ही एम. ए. भी किया था। एक बार उनके शोधकार्य का निर्धारित अंश समय पर पूरा नहीं हुआ तो नवलजी ने प्रगति प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया नजीजा यह हुआ कि अपूर्वानंद के मानदेय का भुगतान रूक गया। नवलजी ने वह प्रमाणपत्र तभी दिया जब कार्य में अपेक्षित प्रगति आई। मेरे शोधकार्य की प्रगति को लेकर वे  बहुत उत्‍साहित थे। लेकिन उसी दौरान अपनी प्रथम पुत्री के  निधन के कारण मैं थोड़ा विचलित रहने लगा   तो नवलजी ने सांत्‍वना का एक पत्र भेजते हुए लिखा कि मैं शोध कार्य में लग जाऊं।


मैं उन दिनों राजेन्‍द्रनगर में अकेला ही रहता था। शाम होते ही रचनाकार मित्र आ जाते। कभी कभार वरिष्‍ठ लोग भी आ जाते । उनमें खगेन्‍द्र ठाकुर मुख्‍य होते । उनके पास बजाज का एक स्‍कूटर था उसे ठेल कर र्स्‍टाट करना पड़ता था । खगेन्‍द्रजी थोड़े भारी शरीर के व्यक्ति थे और धोती-कुर्ता-सैंडिल पहना करते थे । उसी अवस्‍था वे स्‍कूटर को लेकर कुछ दूर दौड़ते और स्‍कूटर  स्‍टार्ट होते ही उस पर सवार हो जाते।  बहुत  सहज आदमी थे । नवलजी हमेशा चुस्‍त–दुरूस्‍त, सजे-संवरे  रहते और रिक्‍शे से आते-जाते थे । मैंने कभी उन्‍हें लस्‍त-पस्‍त नहीं देखा । अपने घर में भी नहीं।  वे महेन्‍द्रू में सुमति पथ में रहा करते थे । मुझे अपने शोध के सिलसिले में अक्‍सर जाना पडता था । हमेशा नीलेरंग की लुंगी, साफ सफेद बांहवाली गंजी और कंधे पर गमछा रखे हुए वे तय समय पर तैयार मिलते। पहले काम की बातचीत होती फिर  साहित्‍य और समाज की। स्‍मृतियों का भंडार था उनके पास।  एक बार  खोलते तो खुलते चले जाते । 


नवलजी मूलत: कवि थे लेकिन उनकी पहचान आलेाचक की थी और एक लंबे समय तक उन्‍होंने अपने कवि रूप को दबाया भी आलोचक को उभरने दिया। उन दिनों उनकी पहचान एक  कट्टर मार्क्सवादी आलोचक की थी गैर वामपंथी रचनाकारों को वे लगभग नापसंद करते थे । प्रगतिशील लेखक संघ को लेकर काफी सक्रिय रहते। उनका जुड़ाव नये-से-नये रचनाकार से रहता और वामपंथी विचारधारा का प्रचार-प्रसार होता रहता । अज्ञेय हमेशा  वामपंथ के निशाने पर रहते । वे इनके लिए प्रबल शत्रु सरीखे थे। और, अज्ञेय  मेरे प्रिय रचनाकार  बल्कि कहें आदर्श थे ।  इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं कि विचारों से वामपंथी नहीं होने  के बावजूद नवलजी  मुझे नापसंद नहीं करते थे।  बेशक  बाद के दिनों में वह भी  अज्ञेय के प्रशंसक हो गए  थे। 


सोवियत संघ के बिखरने और बाद में अपूर्वानंद की पतली सी पुस्तिका नागार्जुन की राजनीति प्रकाशित होने के बाद नवलजी से वामपंथियों  का और  वामपंथ से नवलजी का मोहभंग हुआ । नवल जी में एक जबरदस्त परिवर्तन आया और वह यह मानने लगे कि उन्‍होंने अज्ञेय को पहचानने में भूल की ।  वे अपने समय के सबसे बड़े कवि हैं।  मुक्तिबोध के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा के बावजूद वे यह मानने लगे कि आधुनिक हिंदी कविता की चर्चा अज्ञेय को छोड़कर नहीं की जा सकती । भूल सुधार की कोशिश भी की। यही एक बड़े आलोचक की पहचान है कि जब भी उसे लगे कि कि उसकी आलोचना की दिशा गलत है उसे तत्काल  सुधारने की कोशिश करे।  


नवलजी की सबसे बड़ी विशेषता थी नियमित जीवन और अनवरत अध्ययन जिसका वे कठोरता से पालन करते थे। उनके संपर्क का दायरा बहुत बड़ा था और उसमें रोज-रोज नये रचनाकारोंकी सूची जुड़ती जाती थी । वे सच में अपने समय से जुड़े हुए आलोचक थे । 


आज उनका जन्मदिन है और  पहली बार वे  अनुपस्थित हैं। 


(तस्वीर में दाएं बैठे हुए   सफेद  कुरता पहने   नवलजी। उनके दाहिने थोडा पीछे बैठे  गोपेश्वर सिंह,  वे उन दिनों शोधार्थी थे । इन दोनों के, बीच में खडा सफेद शर्ट  पहने मैं।  मेरे विद्यार्थी दिनों की एक तस्वीर।)

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

कर्म ही संतोष औऱ आगे का फल हैं / आनंद कुमार

 पदम् श्री और प्रसिद्ध चिकित्सक विजय प्रकाश कुछ दिन पहले एक आयोजन में अपना एक पुराना किस्सा सुना रहे थे। उन्होंने अपने उस दौर की बात की जब वो बहुत बड़े डॉक्टर नहीं थे, आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। वो इंग्लैंड में कहीं थे और उन्हें बॉन जाना था। मज़बूरी में उन्हें टैक्सी करनीorr पड़ी। उनकी पत्नी और बच्चा पीछे बैठे और वो स्वयं ड्राईवर के बगल वाली सीट पर थे। अचानक उनका ध्यान गया कि गाड़ी के डैशबोर्ड पर “डॉ. होबो” जैसा कुछ लिखा हुआ है। उन्हें लगा कि शायद गाड़ी किसी डॉक्टर की है।


वो खुद भी डॉक्टर थे तो उन्होंने ड्राईवर से पूछ लिया कि क्या गाड़ी किसी डॉक्टर की है जिसे वो चला रहा है? ड्राईवर ने जवाब दिया कि नहीं, गाड़ी मेरी ही है और मैं ही ये डॉक्टर हूँ! अब डॉ. प्रकाश चौंके। उन्होंने पूछा कि आप कौन से डॉक्टर हो, पीएचडी वाले डॉक्टर या मेडिसिन वाले? तो ड्राईवर ने जवाब दिया कि वो न्यूक्लियर साइंटिस्ट है। अब तक डॉ. प्रकाश जो अपने आप को कम अच्छी आर्थिक स्थिति में समझ रहे थे, वो और घबराये। उन्होंने पूछा कि जब आप न्यूक्लियर साइंटिस्ट हैं तो टैक्सी चलाने के पेशे में कैसे हैं? ड्राईवर मुस्कुराया और उसने अपना किस्सा सुनाया।


उस व्यक्ति ने बताया कि उसने सीरिया में पढ़ाई की थी। वहाँ से पीएचडी तो उन्होंने कर ली मगर वहाँ न्यूक्लियर रिसर्च पर काम ही नहीं होता था इसलिए वो विदेशों में काम ढूँढने आये। जिन भी देशों में वो गए वहाँ न्यूक्लियर रिसर्च से जुड़े काम में विदेशियों को न रखने का नियम था। इसलिए उन्हें न्यूक्लियर साइंटिस्ट की नौकरी नहीं मिली। आख़िरकार वो शिक्षक की नौकरी करने लगे मगर उसमें पैसे बहुत कम मिलते थे। वहाँ टैक्सी ड्राईवर उनसे दोगुना कम लेता था, इसलिए वो टैक्सी ड्राईवर का काम करने लगे थे! ऐसा हो सकता है कि पहली बार सुनने पर आपको ये कहानी अविश्वसनीय लगे।


इसलिए चलिए हम आपको आज के दौर में ले चलते हैं। आज के दौर के अफगानिस्तान में हाल में ही काफी हलचल देखने को मिली है और कई लोगों को अफगानिस्तान के इस्लामिक रिपब्लिक बनने के बाद वहाँ के राष्ट्रपति की ही तरह भागना पड़ा। अंतर बस इतना था कि ये सारे भागने वाले लोग उतने भ्रष्ट तो थे नहीं कि हेलिकॉप्टर में रुपये भरकर नहीं भाग पाए। ऐसे ही व्यक्ति थे वहाँ के इनफार्मेशन मिनिस्टर सैय्यद अहमद शाह सआदत। वो करीब साल भर पहले अफगानिस्तान से निकल भागे थे। उन्हें थोड़े समय पहले लेइप्ज़िग (जर्मनी) में पिज्ज़ा डिलीवरी करते हुए पाया गया। उनकी तस्वीरें काफी वायरल हुईं।


वैसे तो जब भी इस किस्म की तस्वीरें वायरल होती हैं, तो मुझे हमेशा शक होता है लेकिन फ़िलहाल उस मुद्दे को जाने देते हैं। हम चलते हैं भगवद्गीता के बारहवें अध्याय पर। इस अध्याय को भक्तियोग नाम से जाना जाता है और ये सबसे छोटे अध्यायों में से एक (केवल 20 श्लोकों का) होता है। हम इसके केवल तीन श्लोकों की बात कर रहे हैं -


अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।12.9

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।12.10

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।12.11


यदि तुम अपने मन को मुझमें स्थिर करने में समर्थ नहीं हो, तो अभ्यासयोग के द्वारा तुम मुझे प्राप्त करने की इच्छा (अर्थात् प्रयत्न) करो। यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो तो मत्कर्म परायण (मेरे लिए कर्म करने वाले) बनो; इस प्रकार मेरे लिए कर्मों को करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे। और यदि इसको भी करने के लिए तुम असमर्थ हो, तो आत्मसंयम से युक्त होकर मेरी प्राप्ति रूप योग का आश्रय लेकर, तुम समस्त कर्मों के फल का त्याग करो। 


आधुनिक सन्दर्भों में इसे देखना हो तो इसे मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) के वक्तव्य से जोड़ लीजिये, जहाँ वो कहते हैं – “अगर तुम उड़ नहीं सकते तो दौड़ो, दौड़ नहीं सकते तो चलो, चल भी नहीं सकते तो घिसटकर आगे बढ़ो, लेकिन चाहे जो भी हो जाए, आगे बढ़ते रहो।” इसी को स्वामी विवेकानंद द्वारा हाल के दौर में प्रसिद्ध किये गए कठोपनिषद् के वाक्य से भी जोड़ सकते हैं, जहाँ उन्होंने दोहराया था “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” -


उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ (कठोपनिषद् 1.3.14)


कठोपनिषद् के पहले अध्याय, तीसरी वल्ली का ये चौदहवाँ मन्त्र कहता है, उठो, जागो, वरिष्ठ जनों को पाकर उनसे बोध प्राप्त करो। छुरी की तीक्ष्णा धार पर चलकर उसे पार करने के समान दुर्गम है यह पथ-ऐसा ऋषिगण कहते हैं। तो ये तो बिलकुल तय है कि इस पथ पर चलने में मुश्किलें आएँगी और हो सकता है कि अगर एक रास्ता काम न कर रहा हो तो आपको दूसरा कोई तरीका प्रयोग में लाना पड़े। सनातनी परम्पराओं में ये जबरदस्ती नहीं होती कि सबको एक ही तरीका प्रयोग में लाना पड़े। कोई मूर्तिपूजक हो सकता है, कोई निराकार का उपासक, कोई वेदों को सर्वोच्च मानने वाला हो, कोई केवल रामचरितमानस पढ़े, और कोई तीसरा कुछ भी न पढ़े, ऐसा भी हो सकता है।


इसके अलावा सनातन परम्पराएं पुनः जन्म में विश्वास रखती हैं। इसलिए अगर इस जन्म में कुछ पूरा नहीं हुआ तो उसे फिर से आगे बढ़ाने के अवसर अगले जन्म में मिल जायेंगे। इसके बारे में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ही कहते हैं –


प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।।6.41

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।

यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।।6.43


वह योगभ्रष्ट पुण्यकर्म करनेवालों के लोकों को प्राप्त होकर और वहाँ बहुत वर्षोंतक रहकर फिर यहाँ शुद्ध  श्रीमानों के घरमें जन्म लेता है। वहाँ पूर्व देह में प्राप्त किये गये ज्ञान से सम्पन्न होकर योगसंसिद्धि के लिए उसे सहज ही अवसर भी उपलब्ध होते हैं। इसलिए जब ऐसा लगे कि प्रयास का कोई नतीजा नहीं निकल रहा, या निकलने की संभवना नहीं नजर आती, तो प्रयास बंद नहीं कर देना चाहिए। ऐसे मौकों पर उस न्यूक्लियर साइंटिस्ट, या फिर अफगानिस्तान के उस पूर्व मंत्री के बारे में सोचिये जिन्होंने तरीके बदले और प्रयास जारी रखा।


बाकी भगवद्गीता एक निराश हो रहे व्यक्ति को प्रेरणा देने के लिए ही सुनाई गयी थी इसलिए इसमें कई श्लोक ऐसे हैं जो प्रेरणा के स्रोत की तरह भी काम करते हैं। एक से अधिक अर्थों में इसे कैसे लिया जा सकता है, उसके लिए जो हमने बताया वो नर्सरी स्तर का है और पीएचडी के लिए आपको भगवद्गीता स्वयं पढ़नी होगी, ये तो याद ही होगा!


वैसे तो फिल्म को एकता कपूर ने बनाया था, लेकिन पता नहीं क्यों फिल्म का नाम “के” से न शुरू होकर “एक विलन” था। ठीक-ठाक सी हिट रही फिल्म थी क्योंकि अपने लागत से उसकी अनुमानित आय करीब तीन गुना ज्यादा रही थी। फिल्म के कलाकारों के लिए भी इसे याद किया जा सकता है क्योंकि रितेश देशमुख इस फिल्म में पहली बार खलनायक की भूमिका में थे। शुरू-शुरू में ऐसी अफवाह थी कि ये एक कोरियाई फिल्म “आई सॉ द डेविल” की नकल है लेकिन इसके निर्देशक मोहित सूरी ने साफ़ तौर पर ऐसा होने से इंकार कर दिया था। वैसे देखा जाए तो कहानी थोड़ी उससे प्रेरित सी लग सकती है, लेकिन दोनों फ़िल्में काफी अलग हैं।


कहानी के बारे में कुछ ख़ास बताने की जरुरत नहीं है क्योंकि ये प्रतिशोध पर आधारित फिल्म है। फिल्म की शुरुआत में ही नायिका की हत्या हो जाती है। जो नायिका का पति था, वो पुराने दौर का कोई अपराधियों के एक बड़े सरगना का खासमखास था जो भयावह हत्यारा माना जाता था। उसे एक बार पुलिस ने पकड़ा भी था लेकिन गवाही देने के बदले मृतक की माँ ने उसे ये कहकर छोड़ दिया था कि तुम्हें भी ये सब भुगतना पड़ेगा। बाद में वो सुधर जाता है और नायिका से शादी के बाद सामान्य जीवन जी रहा होता है। दूसरी तरफ रितेश देशमुख जो किरदार निभा रहे हैं वो आम जीवन में बेचारा भला आदमी है।


रितेश जो राकेश “रघु” नाम का किरदार निभा रहे हैं वो छोटा मोटा मिस्त्री का काम करने वाला एक जीव है। कम पैसे कमाने और भले से होने के कारण उसकी पत्नी उसकी रोज बेइज्जती करती है, मारती-पीटती भी है। वो रोज पिटता है, मगर अपनी पत्नी को कुछ नहीं कहता। इस गुस्से को वो दूसरी महिलाओं पर निकालता है। जो भी उसे लगता है कि उससे तमीज से बात नहीं कर रही, वो उनकी एक एक करके हत्या करता जाता है। इसी क्रम में उसने नायिका की भी हत्या कर डाली थी। अब पुलिस इस हत्यारे को खोजने के लिए परेशान थी क्योंकि उन्हें पता था कि जिसकी हत्या हुई है उसका पति अगर बदला लेने निकला तो पूरे शहर में कई क़त्ल होंगे।


गैंगवॉर रोकने की कोशिश में एक तरफ रघु को पुलिस ढूंढ रही थी तो दूसरी तरफ उसे नायिका का पति, यानि गुरु ढूंढ रहा था। गुरु उसे ढूंढकर मारता भी नहीं, पीट-पाट कर अस्पताल में डाल देता है, ताकि ठीक होने पर फिर से मार-पीट कर उसे अस्पताल पहुंचा सके। फिल्म है तो कई रोचक घटनाओं के बीच रघु की पत्नी का कत्ल होता है। बाद में गुरु को मारने की कोशिश कर रहा रघु भी मारा जाता है और रघु के बच्चे को गुरु गोद ले लेता है।


इस फिल्म के नायक और खलनायक के बीच के किरदारों के बदले हमने आपको फिर से भगवद्गीता का एक श्लोक पढ़ा डाला है। चौथे अध्याय के इस श्लोक में कहा गया है –


कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।

स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।4.18 


जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वह योगी सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है। वैसे तो ये बड़ा ही मुश्किल काम है क्योंकि अगर हम स्वयं ही कर्म कर रहे हों तो स्वयं को देखते नहीं। ऐसे में कौन सा कर्म अकर्म था और कब अकर्म में कर्म हो गया ये समझना मुश्किल है। फिल्म के दोनों किरदारों को चूँकि हमलोग बाहर से देख रहे हैं इसलिए उन्हें समझना अपेक्षाकृत आसान है।


रघु जो फिल्म का खलनायक है वो अनगिनत स्त्रियों की हत्या कर रहा था। इस कर्म का उसे फल क्या चाहिए था? उसे अपनी पत्नी से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा थी। बस वो मान ले कि उसका पति हीरो है, इतना ही चाहिए था उसे। लेकिन उसने अपनी पत्नी को अपने कर्म (या कहिये कुकर्म) के बारे में तो कभी बताया ही नहीं! तो कर्म का समाज पर, बाकी की दुनियां पर तो प्रभाव पड़ा, लेकिन उसे जो फल चाहिए वो मिला ही नहीं, इसलिए उसके लिए तो वो अकर्म जैसा ही रहा। इतनी हत्याओं के लिए पकड़ा जाता तो भी फांसी होती, नायक के हाथों भी मारा ही गया। अगर वो ये हत्या जैसा कर्म नहीं करता तो उसके व्यक्तिगत जीवन में क्या फर्क पड़ता? इसलिए कर्म होते हुए भी उसकी पत्नी के हिसाब से देखें तो वो अकर्म ही रहा।


दूसरी तरफ फिल्म का खलनायक जैसा नायक है जो अपराध छोड़ चुका है, लेकिन हिंसा उसके लिए कोई वीभत्स चीज़ नहीं। खलनायक के ठीक विपरीत इसके पास अकर्म का विकल्प था। वो मामले को पुलिस के लिए छोड़कर बैठ सकता था। खुद को बचाता, कोई कर्म न करता तो अकर्म हो जाता। लेकिन उसका अकर्म भी अकर्म नहीं रहता क्योंकि वो अगर रघु को जीवित छोड़ता तो रघु और हत्याएं करता। इस तरह गुरु तो हत्या न करके अकर्म कर रहा होता लेकिन उसकी वजह से रघु का कर्म (या कुकर्म) अपनेआप ही हो जाता। जैसे रघु का कर्म अकर्म होता है, उसका उल्टा गुरु का अकर्म कर्म हो जाता। यहाँ रघु और गुरु नाम भी एक दूसरे को उल्टा करने पर बनने वाले जैसे लगते हैं, लेकिन उर्दूवुड की फिल्मों में इतना सोचा गया होगा, इसकी अपेक्षा हम नहीं करते।


जहाँ तक कर्म में अकर्म और अकर्म में भी कर्म देखने का सवाल है, इस बारे में कई बार दार्शनिक कहते रहे हैं कि कोई फैसला न लेने का फैसला करना भी तो एक फैसला ही है। टाल देना किसी समस्या का निदान नहीं होता। मुश्किल परिस्थितियों में जब हम कठिन निर्णय लेना छोड़ देते हैं, “कड़वी गोली” की हिम्मत नहीं जुटा पाते तो उस अकर्म में अपने आप ही कर्म हो जाता है। इसके विपरीत कड़े फैसले से एक कोई नाराज हो जाए तो भी कई लोगों का भला हो रहा होता है, इसलिए वो कर्म भी अकर्म है। उसका फल नहीं आएगा। ये करीब करीब भारतीय न्याय के सिद्धांत जैसा है। भारतीय न्याय व्यवस्था में भी केवल इसलिए फांसी नहीं दे दी जाती क्योंकि किसी की हत्या कर दी गयी है। किस कारण से हत्या हुई उसके हिसाब से दंड देना या न देना तय होता है।


इनके अलावा कर्म के मामले में काफी कुछ हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। जो हमारे हिसाब से कर्म है वो किसी और के हिसाब से कुकर्म हो ऐसा भी हो सकता है। इसके लिए भगवद्गीता कहती है –


सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।18.48


यानि दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँ से अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। देखने का दृष्टिकोण बदल दिया जाए तो हर कर्म में दोष भी दिखने लगेंगे। इस वजह से हरेक कर्म का त्याग नहीं किया जा सकता। ये कुछ वैसा ही है जैसा इस फिल्म का तथाकथित नायक। उसके लिए जो सहज ही कर्म था, वो दोषों से भरा हुआ दिखेगा, लेकिन उनका त्याग नहीं किया जा सकता है। इसकी तुलना में खलनायक को देखेंगे तो उसके कर्म किसी भी दृष्टि से कुकर्म ही थे। उन्हें सहज कर्म कहा ही नहीं जा सकता, इसलिए ये श्लोक उसपर लागू नहीं होता।


बाकी आपकी मंशा, नियत, या कर्म के पीछे की सोच से कर्म कैसे अकर्म होता है, और अकर्म कैसे कर्म हो जाता है उस बारे में जो बताया है, वो नर्सरी स्तर का है और पीएचडी के लिए आपको स्वयं ही भगवद्गीता पढ़नी होगी, ये तो याद ही होगा!

✍🏻आनन्द कुमार जी की पोस्टों से संग्रहित

बुधवार, 1 सितंबर 2021

गुरु द्रोणाचार्य / मुदित

 ◆---------श्रीकृष्ण--------◆


द्रोणाचार्य सरीखे शास्त्रज्ञ गुरु भी धर्म का तत्व नहीं समझ पाए। भीष्म पितामह जैसे धर्म सम्राट को भी धर्म का तत्व शर शैय्या पर लेटने से पहले समझ न आया। यहाँ तक कि धर्म अधर्म के नाम पर दो फाड़ हुए राजाओं में धर्म पक्ष के अर्जुन भी धर्म के नाम पर युद्ध छोड़ भिखारी बनने को तैयार हैं। युद्ध जीतने के पश्चात भी धर्मराज युधिष्ठिर भीष्म के सामने नेत्रों में अश्रु लिए धर्म का तत्व जानने के लिए चरणानुगत हो रहे हैं। वहीं समस्त धर्म-अधर्म की उलझनों से घिरे वातावरण में, भ्रमित पात्रों के बीच, गायें चराने वाला ग्वाला धर्म का साक्षात् स्वरूप बना हुआ है। सारे शंकित पात्रों के प्रश्नों का समाधान आखिर में वही कर रहा है। उसके उपदेशों से जहाँ भिखारी बनने की इच्छा वाले अर्जुन रण में प्रलय मचाने को उतावले हो रहे हैं, वहीं अजेयानुजेय भीष्म अपने प्राणों को स्वयं थाली में सजाए खड़े हैं। जहाँ बड़े बड़े विद्वानों की बुद्धि भी भ्रमित हो अधर्म को धर्म मान लेती है वहीं श्री कृष्ण का हर एक कार्य मानो धर्म की गुत्थियां सुलझा रहा है। 


धर्म सदा देश-काल-परिस्थिति सापेक्ष होता है। कोई कर्म ऐसा नहीं है जो स्वयं में पाप या पुण्य हो। पाप पुण्य की इस महीन रेखा के भगवान श्रीकृष्ण पूर्णज्ञाता थे। दुष्टों के किसी भी प्रकार दमन को वे धर्मानुमोदित मानते थे। कर्णार्जुन युद्ध में निहत्थे कर्ण को मारना उन्होंने धर्मोचित बताया, आखिर सदा अधर्म के पोषक को धर्माचरण की आशा रखने का क्या अधिकार है? अनुचित रूप से मथुरा पर चढ़ाई करने आए कालयवन को धोखा देने में उन्होंने कुछ अनुचित नहीं समझा। अधार्मिकों के साथ यदि पूर्ण धर्म का पालन किया जाए तो अधार्मिकों का हौसला बढ़ता है और धर्म की ही हानि होती है। कहाँ कहाँ धर्म को प्रधानता देनी है और कहाँ कहाँ नीति को, यह उन्होंने खूब स्पष्ट किया। इस नीति-धर्म के सामंजस्य को भूलने के कारण ही भारत आतताइयों से पदाक्रांत हो गया। व्यक्तिगत धर्म जब सामाजिक धर्म की अवहेलना करता है तो अधर्म से कम नहीं रह जाता, ऐसी परिस्थिति में अकाट्य अनुकल्पों की श्री कृष्ण ने सर्जना की, चाहे अर्जुन द्वारा युधिष्ठिर पर शस्त्र उठाने का प्रसंग हो, या द्रोण के वध का प्रसंग हो या अश्वत्थामा को मारने की अर्जुन की प्रतिज्ञा का प्रसंग हो।


व्यावहारिक, राजनैतिक, धार्मिक ज्ञान से लेकर दार्शनिक ज्ञान आदि में से कौन से ज्ञान सर्वज्ञानमय कृष्ण में पूर्ण न थे? सर्वज्ञानमय पुरुष का ज्ञान सर्वशास्त्रमयी गीता में आलोकित हुआ और आज पांच हज़ार वर्ष बाद भी उसकी थाह न मिल सकी है। 700 श्लोकों के छोटे से ग्रन्थ से नित नए चमत्कारिक ज्ञान प्रस्फुटित हो रहे हैं। 


भगवान श्रीकृष्ण का जीवन बाल्यकाल से ही कांटों से भरा रहा।  पर क्षत्रियत्व बालपन से ही प्रौढ़ता को प्राप्त है। शिशु अवस्था में पूतना के विष बुझे स्तन चूस प्राण ही निगल लिए, वहीं नन्ही सी लातों से छकड़े उलटा दिए। कुमारावस्था में प्राचीन वृक्षों को एक झटके में उखाड़ रहे हैं। कंस के भेजे असुर नित्य आ रहे हैं, पर खेल-खेल में निबटा दिए जाते। किशोरावस्था में कंस के मल्ल अखाड़े में पछाड़े और मदमत्त हाथी मार गिराए। पूतना, तृणावर्त, शकटासुर, वत्सासुर, बकासुर, अघासुर, कालिय, शंखचूड, केशी, कंस, कुवलयापीड आदि दुष्ट राक्षसों और राजाओं का जिन्होंने दमन किया, भारत का कोई महावीर क्षत्रिय जिन्हें सामने खड़ा हो हरा न सका, जिन्होंने अकेले सारे भूमण्डल का भार उतार डाला, इंद्र तक को अवहेलित करने वाले ऐसे शूरवीर धर्मरक्षा के लिए रण छोड़ भाग खड़े होते हैं! वृन्दावन में गोपियों संग महारास, भूतभावन भोलेनाथ भी गोपी बन गए, उच्च गृहस्थ मर्यादा के लिए 12 वर्ष तपश्चर्या, यादव राज्य के प्रबंध के साथ पांडवों का हर पग पर सहायक होना, आज द्वारका में हैं, तो कल देहली में, परसों बद्री में समाधि जमी है, अभी युद्ध में चढ़ाई हो रही है तो अगले ही समय बंसी बजाकर भक्तों को प्रेमरस पिला रहे हैं, भक्तों को प्रेमसुधा पिलाई और खुद दावाग्निपान किया! श्रीभगवान की ऐसी लीला भक्त समझ भी कैसे सकें? वास्तव में तो श्रीकृष्ण की ऐसी विरोधभासिता में ही उनके पूर्णवतारत्व का रहस्य छिपा है। 


सर्वदा भयानक बनी रही परिस्थितियों में भी कृष्ण एक क्षण को शोकाकुल नहीं हुए, बल्कि विनोद का एक अवसर नहीं छोड़ते। ग्वालों के साथ बंसी बजा रहे हैं, गोप-गोपियाँ सब भूलकर नृत्य करते, जब समीप कृष्ण हैं तो और किसका ख्याल रहे? बंदरों पर मक्खन लुटा रहे, मट्टी खाकर माँ को छकाते हैं, छकड़ियों से माखन के मटके उल्टाए जाते, उखल में बंधकर यमलार्जुन का उद्धार किया, फलवाली दो तीन दाने धान के पाकर सब कुछ पा गयी है, अर्जुन के साथ सैर सपाटे का आनन्द लूटा जा रहा है। 


भगवान की लीलाओं पर आक्षेप करके अपने दुराचार साधने वाले नराकृति परब्रह्म स्वराट पुरुष श्रीकृष्ण की लीलाओं का रहस्य नहीं समझते। उनका सम्पूर्ण चरित्र शुद्ध सात्विक है, रज और तम गुण उन्हें छू भी नहीं गए हैं। जहाँ राजा महाराजाओं के बीच वे अग्रपूजा के लिए चुने जाते हैं वहीं युधिष्ठिर के यज्ञ में वे आगन्तुकों के पैर धोते और झूठन उठाते हैं, ऐसी निराभिमानिता कहीं और नहीं मिलती। सारा गोकुल जिनपर मरा जाता है, वहाँ एक बार निकलने के बाद वे झांकते भी नहीं, इसीसे उनकी निर्लिप्तता स्वतः सिद्ध है। भगवान श्री राम ने जहां साक्षात् पिता की साक्षात् आज्ञा से राज्य त्यागा, वहीं कंस को मारने पर श्री कृष्ण मथुरा का राज्य इसलिए ग्रहण नहीं करते क्योंकि उनके पुरखे यदु से महाराज ययाति ने मथुरा का राज्याधिकार छीन लिया है, पुरखे की परोक्ष आज्ञा का स्मरण कर राज्य ठुकरा दिया, अब उनको विलासी कहने वालों को क्या कहें? अपने व्यभिचार को छिपाने के लिए उन्हें रसिया छलिया कहने वाले उस द्रौपदी की कथा को ताक पर रख देते हैं जो सारे संसार में केवल कृष्ण को पुकारती है और कृष्ण ही उसकी लाज बचाते हैं। नरकासुर की कैद से 16100 कन्याओं को मुक्त कराया, उन परित्यक्ताओं को अपनी भार्या का स्थान दिया, प्रत्येक के लिए स्वयं 16100 रूपों में अभिव्यक्त होकर विवाह किया, प्रत्येक रानी के लिए दिव्य सामग्रियों से परिपूर्ण पृथक पृथक महल प्रकट किए। स्त्रीरक्षा का ऐसा महानतम उदाहरण प्रस्तुत करने वाले श्रीकृष्ण पर आक्षेप करने वालों की बुद्धि में ही दोष कहा जा सकता है। 


वास्तव में तो श्वेताशवतरोपनिषद श्रुति अनुसार परमपुरुष भगवान श्रीकृष्ण ही निखिलात्माओं के पति होने के कारण परमपति हैं। संसार के सब जीव उनके आगे स्त्री हैं क्योंकि एकमात्र वही सबके रक्षक और पालक होने से पतियों के भी पति एकमात्र पुरुष हैं। पर कृष्णलीलाएं सबके समझ नहीं आतीं, यह भी उनकी एक लीला ही है। उनकी लीलाओं में छिपे धर्मतत्व को न समझने वालों को भी भगवान ने ही उत्तर दे दिया, परीक्षित जब मृत पैदा हुए तो भगवान ने अपना धर्म आधार करते हुए कहा, "यदि मैंने धर्म और सत्य का कभी अतिक्रमण न किया हो तो यह बालक जी उठे", अब इसके बाद क्या कहना शेष है?


इसी महावीर योद्धा ने संसार में अनन्त अथाह प्रेमसरिता भी प्रवाहित की। जैसी प्रेम की नदी श्रीकृष्ण ने बहाई वैसा प्रवाह गंगा भी कभी नहीं पा सकीं। श्रीकृष्ण 'रसो वै सः' हैं, 'सर्व सौंदर्य निलय' हैं। जन्म के दिन से सब उनके दीवाने हैं। चम्पूकार ने कहा कि "जब भगवान का प्रगटन हुआ तो पृथ्वीदेवी, उस प्रियतमा पत्नी की तरह, जिसका पति बहुत समय बाद निकट आया हो, हर्ष की अधिकता से स्थूल हो गई।" श्रीकृष्ण के प्रेम ने सारे संसार को आच्छादित कर लिया। नन्हे कन्हैया अपनी प्यारी गैयाओं के पास भर जाते हैं तो थनों से दूध स्वतः छूट रहा है, दुग्धस्नान हुआ जाता है। पौधों के पास गए तो कलियाँ सुन्दर पुष्प बन इठलाती हैं। लताएं इस आशा में सुशोभित हैं कि गोपाल का पटका ही बन जाएंगी। मनुष्य ही नहीं सारे पशु पक्षियों में माधव की मादकता छाई है, कृष्ण का तो नाम ही 'चितचोर' है। असल में क्षत्रु भी क्षणभर को उनके प्रेम में आसन्न हो जाते हैं। सोने चांदी की थालियों में सजे राजमहलों के व्यंजन त्यागकर कृष्ण विदुरपत्नी के दिए केले के छिलकों में सन्तुष्ट हैं, काकी की दृष्टि मुखारविन्द पर अटकी है, वे केवल भाव के भूखे हैं। गोपांगनाओं की इच्छा को पूर्ण करने के लिए श्रीभगवान ने महारसमयी महारासलीला रचाई, जितनी गोपी उतने श्रीकृष्ण, गोपियों को महाभाव की प्राप्ति हुई। श्रीराधारानी वृषभानुनान्दिनी और श्रीकृष्णचन्द्र नंदनंदन का सम्बन्ध सर्वथा अकाट्य, लोकोत्तर वस्तु है।  श्रीराधारकृष्ण क्या हैं? दोनों-दोनों के भाव स्वरूप और दोनों-दोनों के रस स्वरूप हैं। श्रीराधारानी के भाव स्वरूप और रस स्वरूप हैं श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णचन्द्र के भावस्वरूप-रसस्वरूप हैं श्री राधारानी। वल्लभाचार्य के शब्दों में। 


क्या संसार में आजतक कोई ऐसा जीव हुआ जिसको दुःख का स्पर्श भी न हुआ हो? जो सब लौकिक सुख भोगते हुए भी पूर्ण कर्तव्यनिष्ठ हो? संसार में लिप्त दिखकर भी आत्मनिष्ठ हो? दिव्य लोकोत्तर कर्मों द्वारा जो सारे जगत का तारणहार बना हुआ भी चिंता से दूर रहे? निःसन्देह ये पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीभगवान के लक्षण हैं, जीवकोटि के पूर्णतः बाहर की बातें हैं। नराकृति परब्रह्म स्वराट पुरुष परमानंदघन भगवान् श्रीकृष्ण ही इस जगत के एकछत्र निरंकुश स्वामी हैं।  


ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।

ज्ञानवैराग्ययोगश्चैव षष्णाम् भग इतीरणा।।

वैराग्यं ज्ञानमेश्वर्यं धर्मश्चेत्यात्मबुद्धयः।

बुद्धमः श्रीर्यशश्चैते षड वै भगवतो भगाः।।

इन सब लक्षणों की समग्रता भी श्री भगवान के लिए कम ही है।


अधिष्ठानभूत ब्रह्म श्री कृष्ण के लिए भगवान आद्य शंकराचार्य कहते है -

भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमयः सच्चिदानन्दः। 

प्रकृतेः परः परात्मा यदुकुलतिलकः स एवायम्।।

जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृति से परे परमात्मा सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित है, यह यदुकूल भूषण श्रीकृष्ण वही तो हैं।


आज भी सब संसार में सबसे अधिक प्रेम मनुष्यों का श्रीकृष्ण पर ही देखा जाता है, इहलोक और परलोक की हर श्रेणी में श्रीभगवान के भक्तों की जितनी संख्या है उतनी अन्य किसी की नहीं। जो जिस श्रेणी का है, अपने ही तरीके से भगवान को प्रसन्न करने में लगा है। संसार में मनुष्य ही नहीं पशु, पक्षी, लता, वृक्ष, पत्थर, पहाड़, नदियाँ, और ताल सभी के सभी माधव के स्तवन में मोहितचित्त हैं। सारा चर-अचर, दृश्य-अदृश्य जगत उन्हीं चितचोर के आकर्षण पाश में बंधा हुआ है। वे अचिन्त्य मोहन हमें अपनी अहैतुकी भक्ति देने की कृपा करें..


हमारे सत्य सनातन वैदिक धर्म के प्रखर दीप्त-प्रभाकर सर्वान्तरात्मा भगवान परात्पर परब्रह्म श्रीकृष्णचंद्र परमानंदकंद श्यामसुन्दर मदनमोहन व्रजेंद्रनंदन के प्राकट्यदिवस की सभी प्रभुभक्तों को हार्दिक शुभकामनाएं.. जय श्री कृष्ण.. जय गोविंद।  

✍🏻मुदित अग्रवाल

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...