बुधवार, 15 सितंबर 2021

साथ का सुख साथ साथ

प्रस्तुति - सिन्हा आत्म स्वरूप


,,बहू अपनी मां से कहती है,. क्या बताऊँ मम्मी, आजकल तो ,बासी कढ़ी में भी उबाल आया हुआ है| जबसे पापा जी रिटायर हुए है , दोनों लोग फिल्मी हीरो हीरोइन की तरह दिन भर अपने बगीचे में ही झूले पर विराजमान रहते हैं| न अपने बालों की सफेदी का लिहाज है और ना ही बहू-- बेटे का इस उम्र में लिहाज | दोनों मेरी और नवीन की बराबरी कर रहे हैं| ठीक है मां मैं आपसे बाद में बात करती हूं शायद सासुमा आ रही हैं।"

सासु मां ने बहू की बातें कमरे के बाहर सुन ली थी, पर नज़रअंदाज़ करते हुए खामोशी से चाय बहू सोनम को दे दी|

सासू मां बहू सोनम को चाय देने के पश्चात पति देव अशोक जी के लिए चाय ले जाने लगी, ऐसा देखकर बहू सोनम के चेहरे पर व्यंगात्मक मुस्कान तैर गयी| पर सासू मां, समझदारी दिखाते हुए बहू की इस नाजायज हरकत को नज़र अंदाज़ करते हुए सिर झुकाए वहां से निकल गईं|

पति के रिटायर होने के बाद कुछ दिन से उनकी यही दिनचर्या हो गयी थी| आजकल सासुमा प्रभा जी अपने पति देव अशोक जी को उनकी इच्छानुसार अच्छे से तैयार होकर अपने घर के सबसे खूबसूरत हिस्से में अपने पति देव के साथ झूले में बैठ कर उनको कंपनी देती थी। यह झूला मकान की एक खाली जगह में लगा हुआ था। जिसके चारों तरफ बगीचा था। प्रभाजी ने सारी उम्र तो उनकी बच्चों के लिए लगा दी थी|

पाण्डेय विला...दोमंजिला कोठीनुमा घर अशोक और प्रभा का जीवन भर का सपना था, जो उन्होंने बड़ी मेहनत से साकार किया था। घर का बगीचा 20 by 20 गज़ की कच्ची जगह में था। यह वास्तव में प्रभा के सपनोँ का बगीचा| यंहा तरह तरह की बेले, कई प्रकार के पौधे, हरसिंगार का घनेरा पेड़, और एक छोटा सा टैंक था जिसमें कमल के फूल खिले रहै थे| जाड़े में तो रँग बिरंगे फूल डहेलिया, गुलाब, पैंजी और तमाम किचन गार्डन की सब्जियां चार चाँद लगा देतीं थी।

बगीचे में धनिया, पोदीना मेंथी की बहार रहती| तरह तरह के फूलों की खुशबू से पूरा घर और अशोक बाबू और पत्नी प्रभा सकारात्मक ऊर्जा से हमेशा सराबोर रहते थे। ऐसे मनमोहक वातावरण में वहां पर लगा झूला मन को असीम शांति प्रदान करता। यहां का वातावरण इतना सुखद में और शांति मय था कि कोई भी यहां पर बैठता तो उसकी उठने की इच्छा ही नहीं होती थी| जाड़ों में वहीँ तसले में आग जलती और भुने आलू,शकरकन्द के मज़े लिये जाते थे। और बरसात में सुलगते कोयलों पर सिंकते भुट्टे का आनंद लिया जाता था।

पहले वह और अशोक इस मनमोहक जगह में कम समय के लिए ही बैठ पाते थे। प्रभा अनमनी होतीं तो अशोक बड़े ज़िंदादिल शब्दों में कहते, "पार्टनर रिटायरमेंट के बाद दोनों इसी झूले पर साथ बैठेंगे और खाना भी साथ में ही खायेंगे| आपकी हर शिकायत हम दूर कर देँगे| फ़िलहाल हमें बच्चों के लिये जीना है| बच्चों के कैरियर पर बहुत कुछ बलिदान करना पड़ा, खेर अब बेटा अच्छी नौकरी में था और बेटी भी अपने घर की हो चुकी थी |

रिटायरमेंट के बाद घर में थोड़ी रौनक रहने लगी थी, अशोक जी को भी घर में रहना अच्छा लग रहा था| पहले तो बड़े पद पर थे तो कभी उनके कदम घर में टिकते ही नहीँ थे| गाँव से आकर शहर में बसेरा बनाना आसान न था, लेकिन किसी तरह चार सौ गज़ ज़मीन कर ली| सहधर्मिणी प्रभा जी भी सहयोगी महिला थीं तो मन्ज़िल और आसान हो गयी| अब दोनों पति पत्नी आराम के पलों को सँजो लेना चाहते थे

लेकिन उनकी बहू सोनम अपने पति नवीन को उसके माता पिता के लिये ताने देने का कोई मौका न छोड़ती|

उसने उस कोने के बागीचे से छुटकारा पाने के लिये नवीन को एक रास्ता सुझाते हुए कहा,"क्योँ न हम बड़ी कार खरीद लें...नवीन"| "आईडिया तो अच्छा है पर रखेंगे कहाँ एक कार रखने की ही तो जगह है घर में",नवीन थोड़ा चिंतित स्वर में बोला|

"जगह तो है न, वो गार्डन तुम्हारा..जहाँ आजकल दोनों लव बर्ड्स बैठते हैं।" सोनम व्यागतमक स्वर में बोली|

"थोड़ा तमीज़ से बात करो," नवीन क्रोध से बोला। लेकिन फिर भी सोनम ने अपने पति को पापा जी से बात करने का मन बना लिया।

अगले दिन नवीन कुछ कार की तस्वीरों के साथ शाम को अपने पिता के पास गया और बोला, " पापा !मैं और सोनम एक बड़ी गाड़ी खरीदना चाहते हैं "

"पर बेटा एक बड़ी गाड़ी तो घर में पहले ही है, फिर उस नई गाड़ी की रखेंगे भी कहाँ?" अशोक जी ने प्रश्न किया| "ये जो बगीचा है यहीँ गैराज बनवा लेंगे वैसे भी सोनम से तो इसकी देखभाल होने से रही और मम्मी कब तक देखभाल करेंगी? इन पेड़ों को कटवाना ही ठीक रहेगा| वैसे भी ये सब जड़े मज़बूत कर घर की दीवारें कमज़ोर कर रहें है|"

यह सुनकर प्रभा तो वहीँ कुर्सी पर सीना पकड़ कर बैठ गईं, अशोक जी ने क्रोध को काबू में करते हुए कहा, मुझे तुम्हारी माँ से भी बात करके थोड़ा सोचने का मौका दो| क्या पापा... मम्मी से क्या पूछना ..वैसे भी इस जगह का इस्तेमाल भी क्या है नवीन थोड़ा चिड़चिड़ा कर बोला| "आप दोनों दिन भर इस जगह बगैर कुछ सोचे समझे,चार लोगों का लिहाज किये बग़ैर साथ में बैठे रहते हैं| अब आप दोनों कोई बच्चे तो नहीं हो | लेकिन आप दोनों ने दिन भर झूले पर साथ बैठे रहने का रिवाज बना लिया है और ये भी नहीँ सोचते कि चार लोग क्या कहेंगे| इस उम्र में मम्मी के साथ बैठने की बजाय आप अपनी उम्र के लोगों में उठा बैठी करेंगे तो वो ज़्यादा अच्छा लगेगा न कि ये सब।" और वह दनदनाते हुए अंदर चला गया| अंदर सोनम की बड़बड़ाहट भी ज़ारी थी।

अशोक जी कड़वी सच्चाई का एहसास कर रहे थे। आज के पहले जब कभी पत्नी ने अपने मन की कही तो उन्होंने उन्हें ही सामन्जस्य बिठाने की सीख दी| पर आज की बात से तो उनके साथ प्रभा जी भी सन्न रह गईं, अपने बेटे के मुँह से ऐसी बातें सुनकर दोनों को दिल भर आया था और टूट भी चुका था। रिटायरमेंट को अभी कुछ ही समय हुआ जो थोड़ा सकून से गुजरा था। पहले की ज़िन्दगी तो भागमभाग में ही निकल गयी थी, बच्चों के लिए सुख साधन जुटाने में|

नवीन और सोनम ने उस शाम खाना बाहर से ऑर्डर कर दिया पर प्रभा से न खाना खाया गया और न उन्हें नींद आयी| नींद तो अशोक को भी नहीँ आ रही थी और वो प्रभा की मनोस्थिति भी समझ रहे थे | अशोक जी आज पूरी रात ऊहापोह में लगे रहे, कुछ सोचते रहे, कुछ समझते रहे और कुछ योजना बनाते रहे । लेकिन सुबह जब वे उठे तब बड़े शांत और प्रसन्न थे।

वे रसोई में गये और खुद चाय बनाई | कमरे में आकर पहला कप प्रभा को उठा कर पकड़ाया और दूसरा खुद पीने लगे| आपने क्या सोचा?प्रभा ने रोआंसे लहज़े में पूछा| मैं सब ठीक कर दूँगा बस तुम धीरज रखो,अशोक बोले| पर हद से ज़्यादा निराश प्रभा उस दिन पौधों में पानी देने भी न निकलीं,और न ही किसी से कोई बात की|

दिन भर सब सामान्य रहा,लेकिन शाम को अपने घर के बाहर To Let का बोर्ड टँगा देख नवीन ने भौंचक्के स्वर में अशोक से प्रश्न किया,"पापा माना कि घर बड़ा है पर ये To Let का बोर्ड किसलिए"? " अगले महीने मेरे स्टाफ के मिस्टर गुप्ता रिटायर हो रहें है,तो वो इसी घर में रहेँगे", उन्होंने शान्ति पूर्ण तरीके से उत्तर दिया| हैरान नवीन बोला, "पर कहाँ?" "तुम्हारे पोर्शन में",अशोक जी ने सामान्य स्वर में उत्तर दिया| नवीन का स्वर अब हकलाने लगा था,"और हम लोग " "तुम्हे इस लायक बना दिया है दो तीन महीने में कोई फ्लैट देख लेना या कम्पनी के फ्लैट में रह लेना,अपनी उम्र के लोगों के साथ | "अशोक एक- एक शब्द चबाते हुए बोल रहे थे| हम दोनों भी अपनी उम्र के लोगों में उठे बैठेंगे। तुम्हारी माँ की सारी उम्र सबका लिहाज़ करने में निकल गयी| कभी बुजुर्ग तो कभी बच्चे| अब लिहाज़ की सीख तुम सबसे लेना बाकी रह गया थी| "पापा मेरा वो मतलब नहीँ था",नवीन सिर झुकाकर बोला|

नही बेटा तुम्हारी पीढ़ी ने हमें भी प्रैक्टिकल बनने का सबक दे दिया, जब हम तुम दोनों को साथ देखकर खुश हो सकते है तो तुम लोगों को हम लोगों से दिक्कत क्योँ है| "? इस मकान को घर तुम्हारी माँ ने बनाया, ये पेड़ और इनके फूल तुम्हारे लिए माँगी गयी न जाने कितनी मनौतियों के साक्षी हैं, तो यह अनोखा कोना छीनने का अधिकार में किसी को भी नहीं दूँगा| पापा आप तो सीरियस हो गये, नवीन के स्वर अब नम्र हो चले थे| न बेटा... तुम्हारी मां ने जाने कितने कष्ट सहकर, कितने त्याग कर के मेरा साथ दिया आज इसी के सहयोग से मेरे सिर पर कोई कर्ज़ नहीँ है| इसलिये सिर्फ ये कोना ही नहीं पूरा घर तुम्हारी माँ का ऋणी है| । घर तुम दोनों से पहले उसका है, क्योंकि जीभ पहले आती है, न कि दाँत| जब मंदिर में ईश्वर जोड़े में अच्छा लगता है तो मां बाप साथ में बुरे क्योँ लगते हैं? ज़िन्दगी हमें भी तो एक ही बार मिली है| इसलिए हम इसे अपने हिसाब से एंजॉय करना चाहते हैं,,,

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

मुस्कुराती रहें हिंदी / अरविंद अकेला

 कविता  / 🙏🏼मुस्कुराती रहे मेरी हिन्दी ,फैले धरती आसमान

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आज दिवस है जन गण मन की हिन्दी का,

मिलकर बढ़ायें हम सब हिन्दी का मान,

मुस्कुराती रहे मेरी हिन्दी,फैले धरती आसमान 

बढ़े गरिमा हिन्दी की,मिले नयी पहचान

   मुस्कुराती रहे मेरी हिन्दी...।


सुर, तुलसी, कबीर, खुसरो की यह भाषा,

रहीम, रसखान, जायसी की यह आशा,

लाल, बाल, पाल ने डाली इसमें जान,

हिन्दी से हो पूरे जगत का कल्याण।

      मुस्कुराती रहे मेरी हिन्दी ...।


गाँधी,राजेन्द्र,पटेल,रेणु ने सींचा इसको,

विवेकानंद,अटल,रफी ने फुंके इसमें प्राण,

महादेवी,शिवपूजन,निराला ने दी आहुति,

दिनकर,पंत, नेपाली,लता ने बढ़ाई शान।

     मुस्कुराती रहे मेरी हिन्दी...।


अज्ञेय,दुष्यंत,वर्मा ने हिन्दी की दी ऊँचाई

नागार्जुन,शुक्ल ने हिन्दी में दिया योगदान,

भारतेंदु,इंशा,काम ने किया अपना जीवन कुर्बान,

आनंद,हसरत,समीर हिन्दी गीत से बने महान।

    मुस्कुराती रहे मेरी हिन्दी...।


प्रेमचंद, द्विवेदी, बेनीपुरी का इसमें आन,

नीरज, प्रदीप, गुलजार ने किया सम्मान,

मीरा,सरोजिनी ने की हिन्दी साहित्य की सेवा,

कवि"अकेला"को है हिन्दी पर स्वाभिमान।

     मुस्कुराती रहे मेरी...।

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           अरविन्द अकेला

एक औरत / ( मुझे अच्छा नही लगता") *रुपाली टंडन

 एक औरत ?  / रुपाली टंडन 

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प्रस्तुति -  शैलेन्द्र किशोर



*शादीशुदा महिलाओ को कुछ बाते अच्छी नहीं लगती,  पर वे किसी से कहती नहीं ,उन्ही एहसासों को इकट्ठा करके एक कविता लिखी है।*

  

💐 *" मुझे अच्छा नही लगता"*   💐

 

*मैं रोज़ खाना पकाती हूं,*

*तुम्हे बहुत प्यार से खिलाती हूं,*

*पर तुम्हारे जूठे बर्तन उठाना*

*मुझे अच्छा नही लगता।* 😢


*कई वर्षो से हम तुम साथ रहते है, लाज़िम है कि कुछ मतभेद तो होगे,*

*पर तुम्हारा बच्चों के सामने चिल्लाना मुझे अच्छा नही लगता।* 😢


*हम दोनों को ही जब किसी फंक्शन मे जाना हो,*

*तुम्हारा पहले कार मे बैठ कर यू हार्न बजाना*

*मुझे अच्छा नही लगता।* 😢


*माना कि अब बच्चे हमारे कहने में नहीं है,*

*पर उनके बिगड़ने का सारा* *इल्ज़ाम मुझ पर लगाना*

*मुझे अच्छा नही लगता।*😢


*पूरा वर्ष तुम्हारे साथ ही तो रहती हूँ,*

*पर तुम्हारा यह कहना कि,*

*ज़रा मायके से जल्दी लौट* *आना*

*मुझे अच्छा नही लगता।*😢


*तुम्हारी माँ के साथ तो*

*मैने इक उम्र गुजार दी,*

*मेरी माँ से दो बातें करते*

*तुम्हारा हिचकिचाना*

*मुझे अच्छा नहीं लगता।* 😢


*यह घर तेरा भी है हमदम,*

*यह घर मेरा भी है हमदम,*

*पर घर के बाहर सिर्फ*

*तुम्हारा नाम लिखवाना*

*मुझे अच्छा नही लगता।*😢


*मै चुप हूँ कि मेरा मन उदास है,*

*पर मेरी खामोशी को तुम्हारा,*

*यू नज़र अंदाज कर जाना*

*मुझे अच्छा नही लगता।* 😢


*पूरा जीवन तो मैने ससुराल में गुज़ारा है,*

*फिर मायके से मेरा कफन मंगवाना*

*मुझे अच्छा नहीं लगता।*😢


‌■एक औरत होना भी कहा आसान है साहब बस उसे थोडा प्यार चाहिये और सम्मान । उससेज्यादा कुछ भी नही  "🙏#Respect_women 🙏

यूं हवाओं को बदनाम न कर / सुनील सक्सेना

✌🏼✌🏼  वे पैदाइशी शायर हैं । उनके खानदान में उनसे पहले न कोई शायर हुआ न कोई अफसाना निगार  । यानी नेपोटिज्‍म वाला कोई चक्‍कर नहीं है । वे जन्‍म के समय जब  रोए थे,  तो उनका रूदन  शायराना अंदाज में हुआ था । उनके रोने का लहजा ऐसा मानो  किसी गजल को तरन्‍नुम में पढ़ रहे हों ।  वे जितने जोर से रोते घरवाले उन्‍हें चुप करने के लिए उतनी ही जोर से तालियां बजाते ।  उन्‍हें लगता कि उनका  शेर  मुक्‍कमल हो गया । वे रोना बंद कर देते थे । उनकी इस जन्‍मजात प्रतिभा को देखते हुए घरवालों ने उनका  नाम ही “शायर” रख दिया । शायर नाम होने का फायदा ये हुआ कि वे शायरी करें या न करें, पर वे  शायर हैं । 


        उम्र के साथ उनकी मकबुलियत बढ़ने लगी । शोहरत की ये फितरत होती है कि वो फनकार से अपनी कीमत वसूलती है । कुछ झण्‍डाबरदार हिंदी- उर्दू को लेकर मैदान में उतर गये । भाषाएं जहर बुझे तीरों की तरह मारक होती हैं । सीधे दिल पर चोट करती हैं । जुबानों की नूराकुश्‍ती में सियासतदानों को गहरी दिलचस्‍पी होती है । जब मजहब और कौम के मसाइल ठंडे पड़ जाते हैं तब भाषा की चिंगारी से शोले भड़काकर हाथ सेंके जाते हैं ।  सो जनाब शायर को अपने वतन के प्रति निष्‍ठा, देशभक्ति साबित करने के लिए शायरी के साथ-साथ कविता में भी हाथ आजमाना पड़ा । चुनांचे वे कवि भी हो गये ।


        आज शायर साहब कुछ उदास दिखे  । न… न… इसलिए नहीं कि शेर के काफिये नहीं मिल रहे हैं, या कविता का विषय नहीं सूझ रहा है,  या बिम्‍ब नहीं रच पा रहे हैं, या छंद नहीं बन रहा है, या तुकबंदी नहीं जम रही है, या अकविता टाइप की रचना नहीं रच पा रहे हैं, या वे कई दिनों से कहीं छप नहीं रहे हैं,  काव्‍य गोष्‍ठी नहीं हो रही है, कवि सम्‍मेलन और मुशायरे बंद हैं,  ऐसी कोई वजह नहीं है । शायर साहब की उदासी का सबब ये है कि कोरोना की तीसरी लहर में अब “हवाओं” को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है ।


        हवाओं पर ये तोहमत लगाई जा रही है कि “कोरोना वायरस” हवाओं का  हमसफर है । वो हवाओं के साथ रहता है, उठता है, बैठता चलता है, मरता नहीं, वो जावेद है, अमर है । हवाएं जिधर का रूख अख्तियार कर लें, कोरोना वायरस उसी ओर चल देता है । इसलिए हवाओं से बचें । घर में परदानशीं बनकर रहें ।


        अब ये भी खूब रही कि निजाम अपनी नाकामयाबियों  का इल्‍जाम हवाओं पर लगा दे ।  ये वही हवाएं है जब लहर बनकर चलती हैं तो सत्‍ता पलट देती हैं । ये वो हवाएं हैं जिसने माशुका की जुल्‍फें लहराई तो काली घटा छा गई । ये वही हवाएं हैं जिसने महबूबा का आंचल जरा सा  ढलका दिया और कयामत आ गई । ये वही हवा है जिसने प्रेयसी के संगेमरमर बदन को छुआ और चमन में बहार आगई ।  जनाब शायर ये सब सोचकर व्‍यथित हैं ।


        शायर साहब की शरीक-ए-हयात ने पूछा – “ये क्‍या रोनी सूरत बना रखी है जनाब ने ? मिजाज तो ठीक हैं ?”


        वे बोले – “बस पूछो मत बेगम,  अब तो हद हो गई..”  


        “आपने हद अभी देखी ही कहां हैं मियां । हद की कोई हद नहीं होती जनाबे आली । एक हद पार होती है, तो नई हद बन जाती है..” बेगम ने हद को परिभाषित करते हुए शायर साहब को काढ़े का गिलास थमा दिया ।     


        “बेगम ! ये कैसा निजाम है..? उन्‍होंने फरमाया घर में रहो । हम रहने लगे । दो गज की दूरी रखो, हमने रख ली । अब हवाओं पर इल्‍जाम ? कल कोई दानिशमंद खोज कर लेगा कि कोरोना देखने से फैलता है, तो आंख पर पट्टी बांध लो । कोई साइंसदां रिसर्च में ये बतायेगा कि कोरोना सुनने से फैलता है,  कान में रूई डालकर रखो । सुनना बंद कर दो । मतलब न बोलो, न सुनो, न देखो । जो हो रहा है, उसे बस सहते रहो । खामोश रहो । तमाशबीन बनकर अपनी तबाही का मंजर देखते रहो । ये कहां का इंसाफ है बेगम ?” जनाब शायर का गला दर्द से भर गया ।


        “मियां ये सियासत है । आप भी कहां दीवारों से अपना सर फोड़ रहे हैं । चलिए उठिये । भूल गये आज आपको फेसबुक पर “लाइव” गजल पढ़नी है ।” बेगम ने लेपटॉप ऑन किया । शायर साहब लाइव हो गये इस शेर के साथ “न लगा अपनी हार का इल्‍जाम मेरे सिर पर, अभी बाकी है उसका फैसला  इसी सरजमीं पर”


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रविवार, 12 सितंबर 2021

सबक

 *आज का प्रेरक प्रसङ्ग*

प्रस्तुति - कृष्ण मेहता 

मदद का जज्बा : सीख सुहानी

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मैं ऑफिस बस से ही आती जाती हूँ। ये मेरी दिनचर्या का हिस्‍सा है। उस दिन भी बस काफी देर से आई, लगभग आधे-पौने घंटे बाद। खड़े-खड़े पैर दुखने लगे थे। पर चलो शुक्र था कि बस मिल गई। देर से आने के कारण भी और पहले से ही बस काफी भरी हुई थी। बस में चढ़कर मैंने चारों तरु नजर दौड़ाई पाया कि सभी सीटें भर चुकी थी। उम्‍मीद की कोई किरण नजर नहीं आई। तभी एक मजदूरन ने मुझे आवाज लगाकर अपनी सीट देते हुए कहा ‘मेडम आप यहां बैठ जाइए’। मैंने उसे धन्‍यवाद देते हुए उस सीट पर बैठकर राहत की सांस ली। 


वो महिला मेरे साथ बस स्‍टॉप पर खड़ी थी तब मैंने उस पर ध्‍यान नहीं दिया था। कुछ देर बाद मेरे पास वाली सीट खाली हुई, तो मैंने उसे बैठने का इशारा किया। तब उसने एक महिला को उस सीट पर बिठा दिया जिसकी गोद में एक छोटा बच्‍चा था वो मजदूरन भीड़ की धक्‍का-मुक्‍की सहते हुए एक पोल को पकड़कर खड़ी थी। थोड़ी देर बाद बच्‍चे वाली औरत अपने गन्‍तव्‍य पर उतर गई। इस बार वही सीट एक बुजुर्ग को दे दी, जो लम्‍बे समय से बस में खड़े थे।


मुझे आश्‍चर्य हुआ कि हम दिन-रात बस की सीट के लिए लड़ते हैं और ये सीट मिलती है और दूसरे को दे देती है। कुछ देर बाद वो बुजुर्ग भी अपने स्‍टॉप पर उजर गए, तब वो सीट पर बैठी। मुझसे रहा नहीं गया, तो उससे पूछ बैठी, ‘तुम्‍हें तो सीट मिल गई थी एक या दो बार नहीं, बल्कि तीन बार, फिर भी तुमने सीट क्‍यों छोड़ी? तुम दिन भर ईंट-गारा ढोती हो, आराम की जरूरत तो तुम्‍हें भी होगी, फिर क्‍यों नहीं बैठी ?’ मेरी इस बात का जो जवाब उसने दिया उसकी उम्‍मीद मैंने कभी नहीं की थी। उसने कहा ‘मैं भी थकती हूँ। आप से पहले स्‍टॉप पर खड़ी थी, मेरे भी पैरों में दर्द होने लगा था। 


जब मैं बस में चढ़ी थी तब यही सीट खाली थी। मैंने देखा आपके पैरों में तकलीफ होने के कारण आप धीरे-धीरे बस में चढ़ी। ऐसे में आप कैसे खड़ी रहतीं इसलिए मैंने अपको सीट दी। उस बच्‍चे वाली महिला को सीट इसलिए दी उसकी गोद में छोटा बच्‍चा था जो बहुत देर से रो रहा था। उसने सीट पर बैठते ही सुकून महसूस किया। बुजुर्ग के खड़े रहते मैं कैसे बैठती, सो उन्‍हें दे दी। मैंने उन्‍हें सीट देकर ढेरो आशीर्वाद पाए। कुछ देर का सफर है मैडम जी, सीट के लिए क्‍या लड़ना। वैसे भी सीट को बस में ही छोड़ कर जाना है, घर तो नहीं ले जाना ना। 


मैं ठहरी ईंट-गारा ढोने वाली, मेरे पास क्‍या है, न दान करने लायक धन है, कोई पुण्‍य कमाने लायक करने के लिए। रास्‍ते से कचरा हटा देती हूँ, रास्‍ते के पत्‍थर बटोर देती हूँ, कभी कोई पौधा लगा देती हूँ। यहां बस में अपनी सीट दे देती हूँ। यही है मेरे पास, यही करना मुझे आता है।’ वो तो मुस्‍करा कर चली गई पर मुझे आत्‍ममंथन करने को मजबूर कर गई। मुझे उसकी बातों से एक सीख मिली कि हम बड़ा कुछ नहीं कर सकते तो समाज में एक छोटा सा, नगण्‍य दिखने वाला कार्य तो कर ही सकते हैं। मुझे लगा ये मजदूर महिला उन लोगों के लिए सबह है जो अपना रूतबा दिखाने, अपनी प्रतिष्‍ठा का प्रदर्शन करने और आयकर बचाने के लिए अपनी काली कमाई को दान के नाम पर खपाते हैं, या फिर वो लोग जिनके पास पर्याप्‍त पैसा होते हुए भी ग़रीबी का रोना रोते हैं। 


हम समाज सेवा के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं परन्‍तु इन छोटी-छोटी बातों पर कभी ध्‍यान नहीं देते। मैंने मन ही मन उस महिला को नमन किया तथा उससे सीख ली यदि हमें समाज के लिए कुछ करना हो, तो वो दिखावे के लिए न किया जाए बल्कि खुद की संतुष्टि के लिए हो।

बुधवार, 8 सितंबर 2021

दाता राम नागर पे लोकगीत औऱ विरह कजरी

 बहुतै जबर्जत्त लेख, लोकगीतन पइहाँ, जरुरै पढ़ा जाय 🙏💕

कजरी: भीगी हुई मिट्टी का अंतर्नाद!

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प्रस्तुति - अनामी शरण बबल / रुपेश रुप 

कजरी खांटी लोकगीत है।यह शायरी भी है।जैसे-


बिरहा।बिरहा लोकगीत है और शायरी भी।हमें 

कुतूहल हो सकता है कि जिस तरह बिरहा का

दंगल होता है उस तरह कजरी का भी दंगल होता

है ।हां ,समानता यह है कि दंगल शायरी बिरहा

और शायरी कजरी के होते हैं।जिन्हें गायक स्वयं

लिखते हैं या किसी योग्य साथी से लिखवाते हैं।

जो कजरी सावन-भादों में घर-घर, गांव-गांव

गायी जाती है वह लोकगीत है।लोकगीत भी रचे

जाते हैं ।कविता की भांति। इन गीतों के कविजन

का नाम लोक गायन की प्रवहमान सुर-सरिता में 

तरंगवत् अदृश्य हो जाते हैं।हां, उनकी पंक्तियां

गायकों और श्रोताओं को रसानंद-नद का

अवगाहन कराती रहती हैं।यदि कोई रसिक-जिज्ञासु प्रयास करे तो परंपरागत लोकगीतों के

रचनाकारों के  शुभ-नाम मिल सकते हैं ।

कजरी या कजली का अर्थ है खरी-सांवरी।कारी।

भगवती दुर्गा का एक नाम है-कज्जला।एक करमा गीत में रिझवारिन प्रश्न पूछती है-'सात बहनों में सबसे प्यारी-दुलारी कौन है? किसके 

विवाह का नगाड़ा बज रहा है'?

रिझवार उत्तर देता है-'सात बहनोमें कारी-दुलारी

सबसे छोटी और प्यारी हैं। उन्हीं की शादी का

नगाड़ा बज रहा है'। कजरी में 'सांवरिया' शब्द

का  एक भावार्थ है- काली-घटा।जब असाढ़ में

बादल घिरते हैं, गरजते -चमकते हैं , बज्र गिराते

हैं, मिट्टी भीगती है, छाजन चूने लगता है, वर्षा भूख और भय बढ़ा देती है तब गाढ़े दिन शुरू हो

जाते हैं।खेतिहर के पास कम समय में जुताई और

रोपाई की चुनौती होती है। कहते हैं-तेरह कातिक,

तीन असाढ़।आग , पीने का पानी, भोजन का

प्रबंधन भी कठिन होता है।पावों में पनतर हो जाता है।तरह तरह के कीट-पतंगे और रोग भी...।

इसी विपरीत परिस्थिति में कजरी अंतर्मन की

व्यथा से जन्म लेती है और गायक अपनी पीड़ा को प्रकृति के सन्मुख मानवीय आकांक्षा के साथ

सावधानी से परोस देता है।एक पुरानी पक्की बनारसी कजरी है-


'द्वार ठाढ़ी बृजबाला कहे -सूनो मेरो धाम

नहीं आये घनश्याम, घेरि आई बदरी' !


कजरी उन सभी जगहों पर गायी जाती है जहां

कजरी का मर्म बूझनेवाले रसिया होते हैं।हमारे

बनारस और मिर्जापुर में कजरी का नैहर है।मेरा

पैतृक घर चुनार में है, बनारस की सरहद के निकट।बनारस और मिर्जापुर की कजरी में वही

फर्क है जो फर्क बनारस और मिर्जापुर की बोली

में है।बनारसी कजरी में लय का आरोह-अवरोह

तनिक न्यून है। मिर्जापुर में यह पर्याप्त उतार-

चढ़ाव है। कहते हैं- 'कजरी मिर्जापुर सरनाम'।

बनारस में-


मोरा पिया सैलानी , अरे सांवरिया !

खाये के मांगे पिया, पूड़ी -मिठइया रामा

पिये के ठंडा पानी, अरे सांवरिया!


मिर्जापुर में-

डगरिया भुलानी ,अरे सांवरिया।

एक तs बाई हम अकेली

दूजे संग ना सहेली

तीजे डगरिया भुलानी, अरे सांवरिया।


बनारस में-

मिर्जापुर के कइला गुलजार हो

कचौड़ीगली सून कइला बलमू।


मिर्जापुर में-

सब कर नैया जाला रामा,

कासी अउर बिसेसर रामा

अरे रामा नागर नैया जाला कालेपनियां रे हरी।


उपरोक्त दोनों कजरियों में नायक है बनारस का

देशभक्त रंगबाज दाताराम नागर।पं. शिवप्रसाद

मिश्र रुद्र काशिकेय की पुस्तक 'बहती -गंगा' में

इस कजरी की मार्मिक अंतर्कथा है।पठनीय।

हमारे मिर्जापुर में सावन में बेटियों को नैहर

बुलाने की परंपरा रही है।वे सहेलियों-संग कजरी

खेलती हैं ।हाथ मैं हाथ थाम कर आगे-पीछे बढ़ते

हटते हुए वृत्त में घूमती लड़कियां जब कजरी

शुरू करती हैं तब सुनने वाले रीझ जाते ।यह रतजग्गा है, करमाकी भी यही शैली है।अंतर सिर्फ गति, वाद्य और जोड़ी का है।कजरी-रतजग्गे में

पुरुष लड़कियों के साथ नहीं नाचते-गाते।करमा

में यह वर्जना नहीं है।

 घरवां से निकलीं ननद-भौजाई रामा

बनल रहे जोड़ी अरे सांवरिया।

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कवने रंग मुंगवा,कवने रंग मोतिया

कवन रंग ननदी रे तोर बिरना!

लाल रंग मुंगवा, सबुज रंग मोतिया

संवर रंग भउजी रे मोर बिरना!

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कजरी लिखने और गाने की परंपरा सिर्फ 

अखाड़े बाज शायरों तक नहीं सीमित रही है।

भारतेंदु काल से अब तक कविजन कजरी में

लिख रहे हैं। महेंद्र सिंह अधीर की पंक्तियां हैं-


नयनों में बरबस झरना ,सावन बांध गया।

चंचल मन का हिरना ,सावन बांध गया।


एक बार विचित्रवीणा के सुविख्यात वादक, काशी

हिंदू विश्वविद्यालय ,संगीत -कला संकाय के डीन

प्रो. लालमणि मिश्र ने मालवीय भवन में एक

कजरी सुना कर मुग्ध कर दिया-


तन के पिंजरे में डोल रही 

एक मुनिया सांवर गोरिया।

हर बखत कहे -है झूठी

सारी दुनियां सांवर गोरिया।

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आलेख :नरेंद्र नीरव

चित्र :जितेंद्र मोहन तिवारी

सोमवार, 6 सितंबर 2021

जीवन में आनंद के पल की तलाश

 *एक बुजुर्ग के सिर पर 8 बाल थे..*

*वो नाई की दुकान गया तो नाई ने गुस्से से पूछा : क्या करूँ, "गिनू की काटू?"*


*बूढ़े ने हँस कर कहा : "कलर कर दो !!"*

*और दोनों हँस दिए !*


*जीवन आनंद के लिए है, चाहे जो हो, बस मुस्कुराते रहो !!*


*यदि आप चिंतित हो, तो खुद को थोड़ा आराम दो,*

*कुछ हलवा, रबड़ी, मलाई लो...*


*अंग्रेजी वर्ण हमें सिखाते हैं...*

*A B C....*

*Avoid Boring Company*

*मायूस संगत से दूर रहो*


*D E F...*

*Don't Entertain Fools*

*मूर्खों पर समय व्यर्थ मत करो*


*G H I....*

*Go For High Ideas*

*ऊंचे विचार रखो*


*J K L M....*

*Just Keep a friend like Me*

*मेरे जैसा मित्र रखो*


*N O P...*

*Never Overlook the Poor n Suffering*

*गरीबों व पीडितों को कभी अनदेखा मत करो*


*Q R S.*.

*Quit Reacting to Silly tales*

*मूर्खों की बातों पर प्रतिक्रिया मत दो*


*T U V....*

*Tune Urself for ur Victory*

*खुद की जीत सुनिश्चित करो*


*W X Y Z...*.

*We Xpect You to Zoom ahead in life*

*हम आपसे जीवन मे आगे देखने की आशा करते हैं !!*


*यदि आपने चाँद को देखा, तो आपने ईश्वर की सुन्दरता देखी। यदि आपने सूर्य को देखा, तो आपने ईश्वर का बल देखा,और यदि आपने आइना देखा तो आपने ईश्वर की सबसे सुंदर रचना देखी। इसलिए आप सभी स्वयं पर विश्वास रखो !!*

जय श्री कृष्णा राधे राधे ||

आप सभी का दिन शुभ रहे। 🙏🏻🙏

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...