रविवार, 11 दिसंबर 2022

प्रेम की अविरल "सरिता" मैं तू है सागर, /अक्षिता प्रताप

 प्रेम की अविरल "सरिता" मैं तू है सागर,

मैं तेरी लहरों में मिलना चाहती हूं।

आंजुरी में शुभ्र पावन नीर हूं मैं,

खुद ही चरणों में उतरना चाहती हूं।


देख कुंदन सा मेरा चमका हुआ तन,

फूल की लड़ियों सा महका है मेरा मन।

दूसरा टिकता नहीं नयनों में कोई,

पा गई जनमों जनम का मैं रतन धन।

मैं दिये की भांति जलना चाहती हूं,

खुद ही चरणों में उतरना चाहती हूं।


बाहुओं के वलय को विस्तार दे दे,

रूक न तू निर्भीक सारा प्यार दे दे।

मन विकल है व्यग्र है व्याकुल बहुत है,

प्रेम का अपने मुझे उपहार दे दे।

नख से शिख तक तेरी रहना चाहती हूं,

मैं तेरी लहरों में मिलना चाहती हूं।


छोड़कर तुझको मैं कैसे रह सकूंगी,

विरह के क्षण न किसी से कह सकूंगी।

तू ही मेरा लक्ष्य है ये जानती हूं,

याद कर तुझको निरन्तर बह सकूंगी।

स्वप्न सारे पूर्ण करना चाहती हूं,

खुद ही चरणों में उतरना चाहती हूं।


प्रेम की अविरल नदी मैं तू है सागर,

मैं तेरी लहरों में मिलना चाहती हूं।

आंजुरी में शुभ्र पावन नीर हूं मैं,

खुद ही चरणों में उतरना चाहती हूं।


अक्षिता प्रताप

ग्रेटर नोएडा, गौतमबुद्ध नगर

ईरान की माहरुफ शायरा शाहरुख़ हैदर की नज़्म

 


"मैं एक शादीशुदा औरत हूँ!"

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मैं एक औरत हूँ ईरानी औरत


रात के आठ बजे हैं

यहां ख़याबान सहरूरदी शिमाली पर

बाहर जा रही हूँ रोटियां ख़रीदने


न मैं सजी धजी हूँ न मेरे कपड़े ख़ूबसूरत हैं

मगर यहां सरेआम ये सातवीं गाड़ी है

जो मेरे पीछे लगी है


पूछते हैं शौहर है या नहीं

मेरे साथ घूमने चलो जो भी चाहोगी तुम्हें दूंगा 


यहां तंदूरची है वक़्त साढ़े आठ हुआ है

आटा गूंथ रहा है मगर पता नहीं क्यों

मुझे देखकर आंख मार रहा है

नान देते हुए अपना हाथ मेरे हाथ से टच कर रहा है


ये तेहरान है


सड़क पार की तो गाड़ी सवार मेरी तरफ आया

गाड़ी सवार मेरी कीमत पूछ रहा है

एक रात के कितने लेती हो 

मैं नहीं जानती थी रातों की कीमत क्या है


ये ईरान है


मेरी हथेलियां नम हैं लगता है बोल नहीं पाऊंगी

अभी मेरी शर्मिंदगी और रंज का पसीना ख़ुश्क नहीं हुआ था कि घर पहुंच गई


इंजीनियर को देखा एक शरीफ़ मर्द 

जो दूसरी मंज़िल पर 

बीवी और बेटी के साथ रहता है


सलामालेकुम 

बेगम ठीक हैं आप ठीक हैं 

आपकी प्यारी बेटी ठीक है 


वस्सलाम 

तुम ठीक हो खुश हो 

नज़र नहीं आती हो 


सच तो ये है आज रात मेरे घर कोई नहीं

अगर मुमकिन है तो आ जाओ

नीलोफ़र का कम्प्यूटर ठीक कर दो

बहुत गड़बड़ करता है

ये मेरा मोबाइल है

आराम से चाहे जितनी बात करना


मैं दिल मसोसते हुए कहती हूँ

बहुत अच्छा अगर वक़्त मिला तो ज़रूर


ये सरज़मीने-इस्लाम है

ये औलिया और सूफ़ियों की सरज़मीन है

यहां इस्लामी क़ानून राइज हैं

मगर यहां जिन्सी मरीज़ों ने मादा ए मन्विया (वीर्य) बिखेर रखा है 


न दीन न मज़हब न क़ानून

और न तुम्हारा नाम हिफ़ाज़त कर सकता है 


ये है इस्लामी जम्हूरियत और मैं एक औरत हूँ

मेरा शौहर चाहे तो चार निकाह करे और चालीस औरतों से मुताह


मेरे बाल मुझे जहन्नुम में ले जाएंगे

और मर्दों के बदन का इत्र उन्हें जन्नत में ले जाएगा


मुझे कोई अदालत मयस्सर नहीं 

अगर मेरा मर्द तलाक़ दे तो इज़्ज़तदार कहलाए


अगर मैं तलाक़ मांगू तो कहे 

हद से गुज़र गई शर्म खो बैठी


मेरी बेटी को शादी के लिए मेरी इजाज़त दरकार नहीं

मगर बाप की इजाज़त लाज़िमी है 


मैं दो काम करती हूँ 

वह काम से आता है आराम करता है

मैं काम से आकर फिर काम करती हूँ

और उसे सुकून फ़राहम करना मेरा ही काम है।


मैं एक औरत हूँ 

मर्द को हक़ है कि मुझे देखे

मगर ग़लती से अगर 

मर्द पर मेरी निगाह पड़ जाए

तो मैं आवारा और बदचलन कहलाऊं


मैं एक औरत हूँ

अपने तमाम पाबंदी के बाद भी औरत हूँ

क्या मेरी पैदाइश में कोई ग़लती थी

या वह जगह ग़लत थी जहां मैं बड़ी हूई


मेरा जिस्म 

मेरा वजूद

एक आला लिबास वाले मर्द की सोच और 

अरबी ज़बान के चंद झांसे के नाम बिका हुआ है 


अपनी किताब बदल डालूं 

या यहां के मर्दों की सोच

या कमरे के कोने में क़ैद रहूं 

मैं नहीं जानती


मैं नहीं जानती 

कि क्या मैं दुनिया में

बुरे मुक़ाम पर पैदा हुई हूँ

या बुरे मौके पर पैदा हुई हूँ।


© शाहरुख हैदर

आत्मदर्शन की सिद्धि ही मुक्ति है... नमन.. 🙏

 मैं मानता हूँ कि सम्भोग तन की मूल आवश्यकताओं में से एक है, उसके पूरा होते ही एक अलग ही सुख और शांति का अनुभव होता है, जब मन तृप्त और शांत हो तब आप भगवान भक्ति या अन्य कोई भी काम करें, सफलता की संभावना दुगुनी हो जाती है।


सम्भोग और कामोत्तेजना के दौरान हमें अपनी कमजोरी और ताकत भी अहसास होता है, बेचैनी और तृप्ति का भी अहसास होता है और सही तरीके के सहवास के लिए आपको शरीर और आत्म ज्ञान का होना मतलब सामने वाले की सोच को पढ़ने की क्षमता और खुद की इच्छा और भावना को जान कर प्रकट करने का तरीका हो यहीं से आत्म दर्शन होता है।


भगवान को किसी ने नहीं देखा लेकिन जब हम भगवान की बनाई हुई सबसे अनोखी चीज सम्भोग और कामुकता से जुड़ी हुई चीजों को जानते हैं तब हम ईश्वर को जानने लगते हैं, जब हम इन सबके द्वारा तृप्त और शांत होते हैं, तब हमारे मन मस्तिष्क में स्वतः ही ईश्वर का स्मरण हो आता है। खुद की क्षमताओं को जानना इस प्रकृति के व्यवहार को समझना और ईश्वर के अलौकिक अस्तित्व और सृष्टि को अंगीकार करना ही तो आत्मदर्शन है।


आत्मदर्शन की सिद्धि ही मुक्ति है... नमन.. 🙏

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

भोपाल के भारत भवन से हिंदी बाहर, अंग्रेजी का राज

 भोपाल के सम्माननीय साथियों और साहित्यिक संस्थाओं के नाम एक पत्र-

प्रिय साथियों,

नमस्कार

आप सब भोपाल में साहित्यिक आयोजन करते रहते हैं। और भोपाल की साहित्यिक संस्थाओं के आयोजन पहले “भारत भवन” में भी आयोजित किए जाते रहे हैं। लेकिन कुछ वर्ष पूर्व भारत भवन के प्रबंधक निकाय ने यह फैसला लिया कि “भारत भवन” में केवल वही आयोजन होंगे, जो भारत भवन के अपने आयोजन होंगे, बाहर की संस्थाओं को आयोजन करने हे भारत भवन नहीं प्रदान किया जाएगा। इस बात की जानकारी मुझे वहाँ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी महोदय ने प्रदान की थी जब मैं वर्ष 2019 में एक आयोजन के लिए भारत भवन हेतु आवेदन देने गया था। ख़ैर, मैंने तो अब सोच लिया है कि भोपाल के स्थान पर अपने शहर सीहोर में ही आयोजन किया जाएगा, तथा इसी वर्ष सफलतापूर्वक 4 जून को ऐसा किया भी गया। भोपाल के साथियों का शुक्रिया कि उन्होंने बड़ी संख्या में सीहोर के इस कार्यक्रम में उपस्थित होकर इस निर्णय को संबल प्रदान किया। लगभग 500 की बैठक क्षमता के सभागार में आधे से अधिक अतिथि भोपाल से आए हुए साहित्य समाज के मित्र थे। इसने एक प्रकार की स्वीकृति भी प्रदान की मेरे शहर सीहोर को।

पिछली बार भी मैंने आवाज़ उठाई थी और इस बार भी उठा रहा हूँ। मैं भारत भवन के अपने किसी भी कार्यक्रम में केवल एक बार वर्ष 2010 में ‘युवा’ में गया हूँ, उसके बाद से अब तक न गया हूँ न जाने की इच्छा है। उसमें भी मुझे नहीं बुलाया गया था मेरे “ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार” को बुलाया गया था, जो उसी वर्ष मुझे मिला था। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के ढेर सारे पुरस्कारों के लिए मैंने आज तक न अपनी कोई किताब भेजी है, न ही आगे भेजूँगा।

(बहुत विनम्रतापूर्वक अनुरोध है कि इसे मेरे दंभ के रूप में न देखा जाए, बस व्यक्तिगत असहमति के रूप में लिए गए निर्णय के रूप में लिया जाए। हालाँकि मैं जानता हूँ कि ऐसा कहना हमेशा दंभोक्ति की तरह दिखाई देता है। यदि ऐसा लग रहा है तो पहले से ही क्षमा चाहता हूँ।)

2003 के बाद से भारत भवन, साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएँ बस एक ख़ास विचारधारा के लिए सुरक्षित और संरक्षित हो गई हैं। जिस विचारधारा से मेरी असहमति है और आगे भी रहेगी। मेरे जैसे बहुत से मध्यमार्गी हैं, जिनको एक विचारधार बहुत असानी से दूसरी विचारधारा का और दूसरी विचारधारा वाले पहली विचारधारा का कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन इससे हम अपनी भूमिका नहीं बदल सकते, न अपने तेवर।

भारत भवन के प्रबंधक निकाय ने कुछ वर्ष पूर्व यह फैसला लिया है कि बाहर की संस्थाओं को भारत भवन नहीं प्रदान किया जाएगा। यह फ़ैसला भी इसलिए लिया गया है कि भोपाल की अधिकांश संस्थाएँ उस विचारधारा की विरोधी हैं, जिस विचारधारा से मध्यप्रदेश में सरकारी संस्थाओं को चलाया जा रहा है। ऐसे में आयोजनों में विचारधारा का विरोध आ ही जाता है। तो “न रहेगा बाँस न बजेगी विरोध की बाँसुरी” की तर्ज पर बाहरी संस्थाओं पर ही प्रतिबंध लगा दिया गया।

जो आवाज़ पिछली बार मैंने उठाई थी वह इस बार भी उठा रहा हूँ। कि यदि यह फ़ैसला ले लिया गया है तो फिर 2022 की तरह इस बार एक बार फिर से 13-15 जनवरी 2023 में भारत भवन में ‘भोपाल लिटरेचर एंड आर्ट फेस्टिवल’ (बी.एल.एफ़.) करने की स्वीकृति एक निजी संस्था “सोसायटी फॉर कलचर एंड एन्वायरमेंट” को किस आधार पर दी गई है (जैसा उनकी वेबसाइट पर दिखाई दे रहा है कि कार्यक्रम स्थल ‘अंतरंग’ तथा ‘रंगदर्शिनी’ हैं, जो भारत भवन में ही हैं।)

मेरे चार बहुत साधारण से प्रश्न हैं –

1- क्या इस स्वीकृति का आधार यह है कि यह संस्था वर्तमान तथा पूर्व आई.ए.एस. अधिकारियों, अन्य अधिकारियों तथा उनके परिजनों के द्वारा चलाई जा रही है ?

यदि हाँ, तो क्या अन्य साहित्यिक संस्थाओं को भी भारत भवन में कार्यक्रम करने के लिए अपने पदाधिकारियों में पूर्व या वर्तमान आई.ए.एस. अधिकारी, अन्य अधिकारियों या उनके परिजनों को शामिल करना होगा ?

2- क्या इस स्वीकृति का आधार यह है कि मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग इस कार्यक्रम में सहयोगी रहता है ? (जैसा कि मेरे पिछले बार के विरोध के बाद आयोजक संस्था ने तुरत-फुरत एक पत्रकार वार्ता कर के पत्रकारों को जानकारी प्रदान करते हुए बताया था। )

यदि हाँ, तो मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग तो भोपाल में अन्य साहित्यिक संस्थाओं के आयोजनों में सहभागी रहता है, जैसा उनके आयोजनों के बैनर, पोस्टर से पता चलता है, तो उनको भारत भवन के उपयोगी की अनुमति क्यों नहीं है। जबकि इन संस्थाओं के आयोजन पूर्व में भारत भवन में होते रहे हैं। एक ही नियम अलग-अलग संस्थाओं के लिए अलग-अलग तरीक़े से लागू होने का कारण क्या है ?

3- भारत भवन एक साहित्यिक, सांस्कृतिक परिसर है, जहाँ किसी भी प्रकार के भोजन कार्य, भोजन बनाना तथा खिलाना (कार्यक्रम से पूर्व या पश्चात् दिए जाने वाले चाय, कॉफ़ी, बिस्किट जैसे अल्पाहार जो परिसर में ही स्थित जलपान गृह से बना कर लाए जाएँगे तथा यहाँ केवल परसे जाएँगे, को छोड़कर) की अनुमति नहीं है, क्या यह बात सत्य है ?

यदि हाँ, तो “सोसायटी फॉर कलचर एंड एन्वायरमेंट” को भारत भवन परिसर में तीन दिनों तक परिसर में पांडाल लगा कर शादियों की तरह भोजन व्यवस्था की स्वीकृति किस आधार पर प्रदान की गई है?

4- इस संस्था द्वारा दिए गए कार्यक्रमों की सूची में लगभग सारे कार्यक्रम अंग्रेज़ी भाषा के ही हैं, तो क्या यह स्वीकृति इस आधार पर दी गई है कि अंग्रेज़ी में होने वाले कार्यक्रम प्रबंधक निकाय द्वारा लिए गए उस निर्णय से बाहर रहते हैं, केवल हिन्दी के आयोजन की प्रतिबंध के दायरे में आते हैं ?

यदि हाँ, तो क्या भोपाल की हिन्दी साहित्य संस्थाएँ भी अपने आयोजन अंग्रेज़ी में करना प्रारंभ कर दें, तो उनको भी भारत भवन के उपयोग की स्वीकृति प्रदान कर दी जाएगी ?

भोपाल के साथियों, मैं तो सीहोर में रहता हूँ और अपने आयोजन भी वहीं करते रहने का निर्णय ले चुका हूँ। लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि नियमों को सूर्य की तरह होना चाहिए, सब को समान रूप से प्रकाश प्रदान करना चाहिए। नियमों की आड़ लेकर यदि किसी प्रकार का अन्याय किया जा रहा है, तो इसका विरोध किया ही जाना चाहिए। भारत भवन या तो सबके लिए उपलब्ध हो, या फिर सबके लिए प्रतिबंधित हो। अंग्रेज़ी में आयोजन हो रहा है इसका विरोध नहीं, क्योंकि जो प्रणाली इस आयोजन के पीछे है वह चाहती ही है कि भारत से हिन्दी जल्द से जल्द समाप्त हो। विरोध इस बात के लिए कि हिन्दी की संस्थाओं को दोयम दर्जे से देखा जाना बंद किया जाए। किसी संस्था को भारत भवन दिया गया उसका विरोध नहीं बल्कि बाक़ी संस्थाओं को क्यों प्रतिबंधित किया जा रहा है, इसका विरोध।

विरोध के कई तरीक़े हो सकते हैं, लेकिन होना चाहिए। मैं जानता हूँ कि भारत भवन के विरोध में खड़े होने के अपने व्यक्तिगत नुकसान हैं, किन्तु साहित्य और भाषा को होने वाले व्यापक लाभ की तुलना में वह बहुत कम हैं। हम लेखकों के मन में सरकारी संस्थाओं के विरोध में खड़े होने को लेकर हमेशा भविष्य के प्रतिबंध का भय रहता है। लाल स्याही से नाम काट दिए जाने की शंका रहती है। मगर भोपाल एक अलग शहर है, शहर जो दुष्यंत जैसे भय और शंका से मुक्त शायर का शहर है, जो आग के जलने की अनिवार्यता की बात करने वाला शायर हुआ इस शहर में। दूसरी बात यह कि हिन्दी और उर्दू भाषा के गौरव का शहर भोपाल क्या इतना अंग्रेज़ीदाँ हो गया है कि उस शहर के नाम से आयोजित होने वाला कार्यक्रम ही अंग्रेज़ी में होगा। अंग्रेज़ी… जिसे पूरे भोपाल नहीं, बल्कि इस शहर के एक इलाक़े जिसे ‘चार इमली’ कहा जाता है वहाँ रहने वाले कुछ मुट्ठी भर अंग्रेज़दाँ पोषित करते हैं। (जनश्रुतियों के अनुसार बरसों पहले तब शहर से बहुत बाहर स्थित इस स्थान का नाम चोर इमली था, जहाँ लगी हुई चार इमलियों के नीचे बैठ कर चोर चोरी के माल का बँटवारा करते थे।) बाक़ी पूरा शहर आज भी हिन्दी और उर्दू की महक से महकता रहता है।

मैं जानता हूँ कि बहुत सी बातें समाने आएँगी कि पंकज सुबीर इस मामले को बार-बार क्यों उछाल रहा है ? अच्छा ! इसको भारत भवन में नहीं बुलाया जाता है इसलिए। अच्छा ! इसको कार्यक्रम करने के लिए भारत भवन नहीं दिया गया इसलिए ? और भी बहुत से कारण इस विरोध के बताए जा सकते हैं। मैं इस प्रकार की बातों के लिए तैयार हूँ।

भोपाल के साथियों, बस अनुरोध है कि विरोध किया जाए, उसका स्वरूप कुछ भी हो, लेकिन एक संदेश जाना चाहिए कि विरोध किया गया। यदि नहीं किया गया तो यह सब होता रहेगा आगे भी। हम विरोध के रूप में एक समानांतर ‘भोपाल हिन्दी उत्सव’ उन्हीं तारीख़ों 13-14-15 जनवरी 2023 में रच सकते हैं। मुझे पता है कि समय कम है, पर भोपाल के साहित्यिक साथियों तथा उनकी संस्थाओं की सामर्थ्य के आगे यह कम समय कुछ नहीं। यदि यह संभव न हो तो हम एक निंदा प्रस्ताव पारित कर सकते हैं भोपाल के साहित्य समाज की तरफ़ से। कुछ भी करें प्रतीक रूप में या ग़ैर प्रतीक रूप में करें, लेकिन विरोध होना चाहिए।

पता नहीं आपको यह मुद्दा उतना ज्वलंत लगे या न लगे जितना मुझे लग रहा है। हो सकता है आपको लगे मैं ही बहुत अतिरंजित होकर सोच रहा हूँ, बात कर रहा हूँ। ऐसा तो होता ही आया है, अधिकारी असल में तो सत्ता का ही पीछे का असली चेहरा होते हैं, और सत्ता के आयोजनों के लिए कोई प्रतिबंध अस्तित्व में ही कब रहता है। लेकिन इतनी लम्बी पोस्ट लिखने के पीछे बस मेरी यह सोच है कि मुझे लग रहा है कि यह अन्याय है जिसका विरोध होना चाहिए, ज़रूर होना चाहिए।

सादर

पंकज सुबीर, सीहोर

मोबाइल- 9977855399

subeer.india@gmail.com

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.....


 सलाम रोहिणी आचार्य को / रवि अरोड़ा 




मेरी एक दर्जन से अधिक बहनें हैं। चार तो मां जाई भी हैं। सभी में एक बात यकसां है और वह यह कि सभी अपने सास ससुर के साथ साथ अपने मां बाप का भी पूरा खयाल रखती हैं। मेरी मां तो अब नहीं रहीं मगर पिता और मैं अब भी एक ही छत के नीचे रहते हैं मगर पता नहीं क्यों मुझे अपने मां बाप की वे जरूरतें अक्सर नहीं दिखीं जो दूर बैठी बहनों को दिख जाती हैं। कब मां अथवा पिताजी को गरम जुराब जैसा कुछ चाहिए और कब उनका क्या खाने का मन है यह मुझे तब पता चलता है जब कोई बहन वह लेकर मेरे घर आ जाती है। चचेरी, मौसेरी बहनों तथा पत्नी की बहनों का भी यही हाल है और वे सभी अपने मां बाप का भरपूर पीछा करती हैं और हरसूरत बेटों से अधिक अपने मां बाप का खयाल रखती हैं। मेरे कहने का यह मतलब कतई नहीं है कि मैं अथवा मेरा कोई भाई गैर जिम्मेदार है मगर पता नहीं क्यों मां बाप की देखभाल में हम सभी भाई अपनी बहनों से पीछे ही रह जाते हैं। यकीनन आपके परिवार में भी ऐसा ही होता होगा । अब ऐसा हो भी क्यों नहीं, ये महिलाएं होती ही ऐसी हैं। तभी तो देखिए न, दो दो मजबूत बेटों के होते हुए भी लालू प्रसाद यादव को उनकी एक बेटी ने अपनी किडनी दान की । बेटे भी वे जो बाप की पूरी विरासत का अकेले रसास्वादन कर रहे हैं।


अजब विडंबना है कि जब भी शरीर का कोई अंग दान करने की नौबत आए तो पुरूष किसी बिल में जाकर छुप जाते हैं और अंतत महिलाओं को ही आगे आना पड़ता है। चलिए यह भी स्वीकार कर लिया जाए मगर जब स्त्री को किसी अंग की जरूरत होती है तब भी उसके घर के पुरुष अपने बिलों से बाहर क्यों नहीं आते ? साल 2020 में हुए एक सर्वे के अनुरूप भारत में हो रहे ऑर्गन ट्रांसप्लांट में 81 फीसदी लाभार्थी पुरूष होते हैं और महिलाओं का आंकड़ा बीस फीसदी को भी नहीं छू पाता। अपने पति की किडनी अथवा लिवर जैसा कोई अंग खराब होने पर 90 फीसदी पत्नियां ही आगे आईं जबकि केवल दस फीसदी पतियों ने पत्नी को अपना अंग दान किया । जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि पोषण के अभाव और अन्य कारणों के चलते महिलाओं के शारीरिक अंग पुरुषों के मुकाबले अधिक खराब होते हैं। 


खैर, बात रोहिणी आचार्य की हो रही थी। आज देश में ऐसा कोई नहीं है जो उसकी तारीफ न कर रहा हो। इस काम में वे लोग भी जरूर शामिल होंगे जिन्होंने अपने घर की किसी स्त्री को अंग दान के अभाव में मर जाने दिया होगा । पता नहीं रोहिणी के इस कदम से उन्हें थोड़ी बहुत आत्म ग्लानि भी हुई होगी अथवा नहीं ? वैसे हो तो यह भी सकता है कि वे मुतमईन हों कि इस पितृसत्तात्मक समाज में ऐसा करना उनका फर्ज था ही नहीं। वह देश जहां भ्रूण हत्या को लेकर डेढ़ सौ साल से अधिक पुराना कानून हो और फिर भी जहां गर्भ में हत्या के चलते स्त्रियों की तादाद पुरुषों की तुलना में 1000 मुक़ाबिल 943 हो । जहां दहेज के नाम पर स्त्रियों का उत्पीड़न रोकने को एक से बढ़कर एक कानून हों और फिर भी विवाहिताओं के शोषण की एफआईआर सर्वाधिक हों । जहां बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का राग अलापते अलापते  सरकारों के गले बैठ गए हों और फिर भी लड़कियों को लड़कों के मुकाबले शिक्षा के अवसर न मिलते हों, वहां एक अदना सी रोहिणी पूरे समाज को कैसे झकझोर सकती है ? मगर फिर भी जी तो यही चाहता है कि पूरा समाज उठे और रोहिणी आचार्य को पूरे सम्मान से सलाम पेश करे।


गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

त्याग

 एक राजा को राज भोगते काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया।


राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी। नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा - "बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई। एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए।"


अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा।


जब यह बात गुरु जी ने सुनी। गुरु जी ने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं।


वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया।


उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया।


नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा - "बस कर, एक दोहे से तुमने वेश्या होकर सबको लूट लिया है।"


जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे - "राजा! इसको तू वेश्या मत कह, ये अब मेरी गुरु बन गयी है। इसने मेरी आँखें खोल दी हैं। यह कह रही है कि मैं सारी उम्र जंगलों में भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई! मैं तो चला।" यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े।


राजा की लड़की ने कहा - "पिता जी! मैं जवान हो गयी हूँ। आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था। लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही। क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है?"


युवराज ने कहा - "पिता जी! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना था। लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है।धैर्य रख ।"


जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया। राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैंसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं। तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया।



धुंध, कुहासा, सर्द हवाएँ... / #तेवरी # / ऋषभदेवशर्मा

 धुंध, कुहासा, सर्द हवाएँ...

#तेवरी #

ऋषभदेवशर्मा



धुंध, कुहासा, सर्द हवाएँ, 

भीषण चीला हो जाताहै!

शाकाहारी जबड़े में भी 

हिंसक कीला हो जाता है!!


फूलों पर चलने वाले तुम, 

कड़ी चोट को क्या जानोगे?

बहुत ज़ोर की ठोकर खाकर,

तन-मन नीला हो जाता है!!


वोट डालते दम तो, भैया, 

सब कुछ ठीक-ठाक लगता है,

किंतु नतीजा आते-आते,

ऊटमटीला हो जाता है!!


अपना दल कुर्सी पाए तो, 

अपनी मिहनत की माया है।

और जीतना किसी और का, 

प्रभु की लीला हो जाता है!!


अगर मेनका नोट लुटा कर 

वोट माँगने आ जाए तो!

विश्वामित्रों के चरित्र का 

बल भी ढीला हो जाता है!!


इतने बरसों के अनुभव से, 

अब तक बस इतना सीखे हैं!

जनता लापरवाह हुई तो, 

शासन ढीला हो जाता है!!


✍️ #ऋषभदेव_शर्मा 5/12/2022 : हैदराबाद

(Praveen Pranav की प्रेरणा से)

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...