गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

जो चाहोगे सो पाओगे !*

 *समय लाभ सम लाभ नहि, समय चूक सम चूक।*

*चतुरान चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।।*

*जो चाहोगे सो पाओगे !*


एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था.  

”जो चाहोगे सो पाओगे”,

जो चाहोगे सो पाओगे।”

बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई  भी उसकी बात पर ध्यान नही देता था और

सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।

एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु

की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”,

जो चाहोगे सो पाओगे।”, और आवाज सुनते ही उसके

पास चला गया।

उसने साधु से पूछा “महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे

सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मै जो चाहता

हूँ?”साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम

जो कुछ भी चाहता है मै उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे

मेरी बात माननी होगी। लेकिन

पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या?”

युवक बोला” मेरी एक ही ख्वाहिश

है मै हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना

चाहता हूँ। “

साधू बोला,” कोई बात नही मै तुम्हे एक

हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम

जितने भी हीरे मोती बनाना

चाहोगे बना पाओगे!”और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, ” पुत्र,

मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं,

लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से

अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे

कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने

हीरे बना सकते हो।

युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि

साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए

बोला, ” पुत्र , इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे

कीमती मोती है, लोग इसे“ Oधैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखना जिसके पास यह

मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर

सकता है।

युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर

विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह

कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और

हमेशा धैर्य से काम लेगा। और ऐसा सोचकर वह हीरों

के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है

और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन

खुद भी हीरों का बहुत बड़ा

व्यापारी बनता है

सन्तमत विचार- मित्रों ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-

मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य

प्राप्त कर सकते हैं।

अतः ज़रूरी है कि हम अपने

कीमती समय को बर्वाद ना करें और

अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।

         *।। जय सियाराम जी।।*

           *।। ॐ नमह शिवाय।।*

खुद को मत भुला दो/



घर के काम जल्दी जल्दी निपटा वो तैयार हो गयी, खुद को आईने में देखा उफ्फ क्या लग रही थी। फिर खुद से बोली "रुचि जल्दी कर नहीं तो फोन पे फोन आने शुरू हो जाएंगे।

फिर हॉल में बैठे सास ससुर से बोली माँ बाबूजी, एक काम से बाहर जा रही हूँ जल्दी ही आ जाऊँगी।

आज महीनों बाद वो घर से बाहर निकली थी, आह कितना अच्छा लग रहा है। इधर रोहन के फोन पे बाबूजी का फोन आया, रोहन ने उठाया -" बहु सज धज के पता नहीं कहा निकली है, उड़ती रहती है लगाम लगाओ।"- बाबूजी ने बात खत्म कर फोन रख दिया।

रोहन अपने सामने बैठी रुचि को देख मुस्करा के बोला हमेशा की तरह तुम्हारे ससुर जी का फोन था तुम्हारी तारीफ कर रहे थे। रुचि समझते हुए बोली- "मैंने तो पहले कहा था आपसे की मेरा घर से बाहर निकलना सही नहीं लगेगा उन्हे, लेकिन आपको अपनी मनमर्जी करनी है उपर से मुझे ये भी बताने से मना किया की मै आपसे मिलने आ रही हूँ, रुचि थोड़ा नाराजगी दिखाते हुए बोली।


मैंने बताने से इसीलिए मना किया ताकि उनको मौका मिले बोलने का। खुद की बेटी के लिए ये बोलते वो?

मैंने कहा था तुम चाहे कुछ कर लो वो लोग तुम्हे कभी  प्यार नहीं  देंगे। कुछ भी करो खोट खोज ही लेंगे, मैं ये नहीं कहता उनको अनदेखा करो लेकिन खुद को मत भूलो। तुम खुद को भूल के उनलोगों की सेवा मे लगी रहती हो। एक ग्लास पानी तक वो लोग खुद से नहीं लेते ये तुम गलत कर रही हो। उसके बाद भी क्या तुम्हे सम्मान मिल रहा है एक बहु का?

कितने दिनों से कह रहा था बाहर निकलो अच्छा लगेगा लेकिन तुम सुनती कहा हो। ठीक है पतिदेव जैसा आप कहे वही करूँगी- रुचि मुस्कराते हुए बोली।



....पंडित भया न कोय,

 *"पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय,*


 *ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय* ।। "


बहुत अथक प्रयास के बाद अब पता लगा ये ढाई अक्षर क्या है-

✍️✍️

ढाई अक्षर के ब्रह्मा और ढाई अक्षर की सृष्टि।

ढाई अक्षर के विष्णु और ढाई अक्षर की लक्ष्मी।


ढाई अक्षर के कृष्ण और ढाई अक्षर के राम

ढाई अक्षर की दुर्गा और ढाई अक्षर की शक्ति।


ढाई अक्षर की श्रद्धा और ढाई अक्षर की भक्ति।

ढाई अक्षर का त्याग और ढाई अक्षर का ध्यान।


ढाई अक्षर की तुष्टि और ढाई अक्षर की इच्छा।

ढाई अक्षर का धर्म और ढाई अक्षर का कर्म।


ढाई अक्षर का भाग्य और ढाई अक्षर की व्यथा।

ढाई अक्षर का ग्रन्थ और ढाई अक्षर का सन्त।


ढाई अक्षर का शब्द और ढाई अक्षर का अर्थ।

ढाई अक्षर का सत्य और ढाई अक्षर की मिथ्या।


ढाई अक्षर की श्रुति और ढाई अक्षर की ध्वनि।

ढाई अक्षर की अग्नि और ढाई अक्षर का कुण्ड।


ढाई अक्षर का मन्त्र और ढाई अक्षर का यन्त्र।

ढाई अक्षर की श्वांस और ढाई अक्षर के प्राण।


ढाई अक्षर का जन्म ढाई अक्षर की मृत्यु।

ढाई अक्षर की अस्थि और ढाई अक्षर की अर्थी।


ढाई अक्षर का प्यार और ढाई अक्षर काm युद्ध।

ढाई अक्षर का मित्र और ढाई अक्षर का शत्रु।


ढाई अक्षर का प्रेम और ढाई अक्षर की घृणा।

जन्म से लेकर मृत्यु तक हम बंधे हैं ढाई अक्षर में।


हैं ढाई अक्षर ही वक़्त में और ढाई अक्षर ही अन्त में।

समझ न पाया कोई भी है रहस्य क्या ढाई अक्षर मे l


🙏वैसे ढ़ाई घड़ी का ही एक होरा यानि एक घण्टा 🕛भी होता है🙏

रविवार, 30 जनवरी 2022

हत्या होगी / राकेशरेणु

 #इसी_से_बचा_जीवन_7



 

पहले कहा, डेढ़ सौ साल जीना चाहता हूँ 

फिर कहा, एक सौ बीस साल 

फिर एक सौ दस और सौ साल पर आए 

आगे चलकर नब्बे साल जीने की इच्छा जताई 

वे अपनी उम्मीद की आयु कम करते गए धीरे-धीरे।

 

एक वक्त आया जब लोग जयंती मना रहे थे उनकी 

उन्होंने कहा 79 का हो गया, 

अब जीने की इच्छा बची नहीं मुझमें 

यह दूसरी अक्तूबर 1947 की सुबह थी।

 

गाँधी देख रहे थे 

लोग मुख्तलिफ थे, देश उनका न था

हालाँकि आज़ादी की भोर सुहावन थी अभी 

लोग वे नहीं थे लेकिन जिनके लिए वे जिए और लड़े।

 

हत्यारे घूम रहे थे चारों तरफ 

कहीं से हत्यारे नजर नहीं आते थे वे

सीधे-साधे सफेदपोश लोग 

खास तरह की मासूमियत दिखती उनके चेहरों पर 

साथ-साथ आगे-पीछे चलते लोग।

 

गाँधी देख रहे थे 

अहिंसा के भभूत के भीतर 

हिंसा की चिनगी सुलग रही थी।

 

देख लिया था उन्होंने 

अहिंसक कोई न था 

वह भी नहीं जिसका नाम लेकर वे जिए और मरे।


वे देख रहे थे 

साथ घूमता कोई हत्या करेगा उनकी 

और दूसरे अनेक     दूसरों की।


वे देख रहे थे भविष्य  

उनकी जयंती मनाई जा रही थी डेढ़ सौवीं 

वैसे ही सफेदपोश सीधे-सरल लगते लोग

घूम रहे थे हर तरफ 

वे कहीं से हत्यारे नहीं लगते थे न बलात्कारी 

पर सबके भीतर मौजूद था एक हत्यारा 

एक मर्द एक बलात्कारी मौजूद था।

 

बलात्कारियों की रक्षा करने वाले 

अनेक दूसरे बलात्कारी थे उनसे बड़े 

रक्षक तंत्र था बलात्कारियों-हत्यारों का 

स्त्रियाँ उन्हें प्रिय थीं गोश्त की तरह 

हत्या प्रिय था स्वाद की तरह।

 

गाँधी देख रहे थे  

अपनी हत्या के ठीक पहले

देख रहे थे 

उनकी हत्या होगी बार-बार।


@ राकेशरेणु

(‘दोआबा’ अक्तूबर-दिसम्बर 2021 अंक से साभार)

शनिवार, 29 जनवरी 2022

स्वर्ग का शिक्षक की दावेदारी

: तीन लोग स्वर्ग के दरवाज़े पर खड़े थे।

1,पुजारी,      2,डॉक्टर      3,टीचर,


भगवान : सिर्फ एक ही सीट खाली है स्वर्ग में ।

पहला: मैं पुजारी था। सारी उम्र आपकी सेवा की है ।

दिन रात आपकी पूजा की है।

दूसरा: मैं डॉक्टर था। सारी उम्र लोगों की सेवा की है । दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा।

तीसरा: मैं एक टीचर था और मैंने पढ़ाने के साथ साथ  

वज़ीफ़ा वितरण,

ड्रेस वितरण 

पुस्तक वितरण

बैग वितरण

अभिभावक संपर्क 

बाल गणना

जनगणना

साक्षरता

स्कूल की रंगाई पुताई

स्कूल चलो अभियान की रैलियां आयोजित करना

ग्राम शिक्षा समिति

पी टी ए 

एम् टी ए

smc

आदि की की बैठके आयोजित करना। 

MDM बनवाना और उसे वितरित करना

इसके लिए लकड़ी  गैस गल्ला और सब्ज़ी ढोना

चुनाव

सेमिनार

पोषाहार

बोर्ड परीक्षा ड्यूटी

यूनिवर्सिटी परीक्षा

 CBSE

 ICSE

PTI

SMC सचिव

SSC

HSC

पल्स पोलियो

पशु गणना

राशन कार्ड

वोटर कार्ड

बी.एल.ओ....

मैपिंग

रजिस्टर्ड

जाति प्रमाण पत्र

बच्चो के फोटो

खिंचकर धुलवाना

 आधार कार्ड बनवाना,

जन्म प्रमाण

साइकिल वितरण covid 19 duty

भगवान - बस--बस---बस कर पगले... अब क्या रुलायेगा ?

चल अंदर आ जा ।"

          यदि आप शिक्षक  हैं तो इस मैसेज को इतना फैलाओ कि हर उस आदमी को जवाब मिल जाए, जो शिक्षक को लापरवाह कहता है।

[ बिहार के सुशाशन राज : में अब एक नया काम टीचर को सौंपा जारहा शराब एवं शराबियो का पता करना.होगा 

अपना काम खुद करें💐

 *🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐💐*


दिल्ली से गोवा की उड़ान में एक सज्जन मिले, साथ में उनकी पत्नी भी थी, सज्जन की उम्र लगभग 80 की रही होगी,मैंने पूछा नहीं लेकिन उनकी पत्नी भी 75 के पार ही होंगी, पत्नी खिड़की की ओर बैठी थी, सज्जन बीच में और मैं सबसे किनारे वाली सीट पर था, प्लेन के उड़ान भरने के साथ ही पत्नी ने खाने का कुछ सामान निकाला और पति की ओर किया, पति कांपते हाथों से धीरे धीरे खाने लगे...


 फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व हुआ तो उन लोगों ने राजमा चावल का आर्डर किया, दोनों आराम से राजमा चावल खा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक में उन सज्जन ने कोई जूस लिया था... 


 खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल का ढक्कन खोलना शुरु किया तो ढक्कन उनसे खुला ही नहीं, सज्जन कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और मैं लगातार उन्हें देखे जा रहा था, मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें दिक्कत हो रही थी तो शिष्टाचार वश मैंने कहा :- लाइए, मैं खोल देता हूं !


 सज्जन ने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और बोले :- बेटा जी, ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा ! मैंने कुछ कहा नहीं लेकिन प्रश्नभरी निगाहों से उन्हें देखता रहा...


 ये सज्जन ने कहा :- बेटा जी, आज तो आप खोल देंगे लेकिन अगली बार कौन खोलेगा, इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए, पत्नी भी पति की ओर देख रही थी, जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था, लेकिन सज्जन उसे खोलने की कोशिश में लगे रहे और बहुत कोशिशों के बाद अंततः उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया, दोनों आराम से जूस पी रहे थे...


 मुझे दिल्ली से गोवा की इस उड़ान में जिंदगी का *एक सबक मिला,* सज्जन ने मुझे बताया :- हमने एक नियम बना रखा है अपना हर काम खुद ही करना है..., घर में बच्चे हैं, हंसता खेलता परिवार है, सब साथ ही रहते हैं लेकिन अपनी रोज की जरूरतों के लिए केवल पत्नी की ही मदद लेते हैं, बाकी किसी की नहीं, दोनों एक दूसरे की जरूरतों को समझते हैं...


 सज्जन ने मुझसे कहा :- *जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए,* एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो बेटा, समझो बिस्तर पर ही पड़ जाउंगा, फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं वो काम उससे, फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा, अभी चलने में पांव कांपते हैं,खाने में भी हाथ कांपते हैं लेकिन जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए... 


  हम गोवा जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे, हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं,बेटे बहू कहते हैं कि अकेले आपको दिक्कत होगी लेकिन उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना फिरना बंद करके खुद को घर में बंद कर लेंगे, सारी जिंदगी खूब काम किया, अब सब कुछ बेटों को देकर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं और हम दोनों उसी से आराम से घूमते हैं, जहां जाना होता है, एजेंट टिकट बुक करा देता है, टैक्सी घर पर आ जाती है,वापसी में एयरपोर्ट पर ही टैक्सी आ जाती है ! होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है, स्वास्थ्य व उम्र के अनुसार सब एकदम ठीक है, बस, कभी कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती लेकिन थोड़ा दम लगाओ तो वो भी खुल जाती है...


*मेरी तो आंखें ही खुली रह गई, मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा लेकिन यहां तो कुछ ही पलों में मैंने पूरे जीवन की ही फिल्म देख ली ! एक ऐसी फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था...*


*दोस्तो, जब तक हो सके "आत्मनिर्भर" रहो, जहां तक संभव हो, अपना काम स्वयं ही करें...*


🙏🙏


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*


🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

चालीस साल लम्बी दर्द की कविता खत्म -----/-----गुलजार

 


मीना जी ने अपनी डायरी गुलजार को सौपी | गुलजार ने उनकी मृत्यु पर कहा था की चालीस साल लम्बी दर्द की कविता खत्म हुई |


गुलजार ने मीना जी की भावनाओं की पूरी इज्जत की |

उन्होंने उनकी नज्म , गजल

, कला और शेर की एक किताब का कलेवर दिया | जिसमे एक जगह उन्होंने मीना जी पर लिखा है ----


शहतूत की डाल पे बैठी मीना ,


बुनती है रेशम के धागे


लम्हा -- लम्हा खोल रही है ,


पत्ता -- पत्ता बिन रही है ,


एक -- एक सांस बजाकर सुनती है


सौदायन,


अपने तन पर लिपटाती जाती है , अपने ही तागो की कैदी ,


रेशम की यह शायद एक दिन


अपने ही तागो में घुटकर मर जायेगी |


इसे सुनकर दरिया में उठते ज्वार की तरह मीना जी का दर्द छलक गया | उनकी

गहरी हंसी ने उनकी हकीकत बया कर दी ....................जानते हो न , वे

तागे क्या है ? उन्हें प्यार कहते है | मुझे तो प्यार से प्यार है | प्यार

के एहसास से प्यार है , प्यार के नाम से प्यार है |इतना प्यार कोई अपने तन

से लिपटाकर मर सके और क्या चाहिए ?


सावंन कुमार टाक ने मीना जी के बारे में लिखा मीना जी बहुत अच्छी इन्सान थी

...................आज सावन कुमार जो कुछ भी है मीना जी के वजह से है ---

मैं न केवल उनसे इंस्पायर्डहुआ हूँ बल्कि उन्होंने मुझे तीच भी किया है |

मार्गदर्शन दिया है |


सच बात तो यह है की मैंने किसी हद तक उनकी जिन्दगी का मतलब समझा है | वे

जितनी बड़ी अदाकारा थी कही उससे बड़ी भी बड़ी बहुत अच्छी इंसान थी | वे

कहती थी की मुझे थोड़ी ख़ुशी चाहिए बहुत ज्यादा नही | उनका प्यार हमेशा

निश्छल और पवित्र रहा | यदि उनकी सबसे अच्छी बात थी की वे बहुत संवेदनशील

थी तो सबसे बुरी बात यह थी की वे बहुत जल्दी किसी पर यकीं कर लेती थी और वह

उन्हें चोट करके चला जाता था | आज सिर्फ यही कह सकता हूँ मैं


''तेरी याद धडकती है मेरे सीने में |


जैसे कब्र के सिरहाने शमा जला करती है || ''


मीनाजी के एक नज्म ....................


चाँद तन्हा है , आसमा तन्हा ,


दिल मिला है ,कहा कहा तन्हा ,


बुझ गयी आस , छुप गयाh तारा ,


थरथराता रहा , धुँआ तन्हा ,


जिन्दगी क्या इसी को कहते है ,


जिस्म तन्हा है और जा तन्हा ,


हमसफर कोई गर मिले भी कही


दोनों चलते रहे यहा तन्हा


जलती बुझती सी रौशनी के परे


सिमटा -- सिमटा सा एक मका तन्हा


राह देखा करेगा सदियों तक


छोड़ जायेंगे यह जहा तन्हा ||


ये दर्द का समन्दर उनमे उठते ज्वार का एहसास दिलाते मीना की नज्मे अपने आप

में एक बेमिशाल धरोहर है

.................................................कबीर

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...