गुरुवार, 9 जून 2022

वापस घर नहीं जाना क्या /@उमाकांत दीक्षित

कहो, मुझे  पहचाना  क्या ? 

याद   नहीं   दीवाना  क्या ?   


आँख  उठाकर  देख  जरा,

मुझसे  भी  शरमाना  क्या ?  


राजनीति   के   जंगल   में,

अँधा क्या और काना क्या ?

                  

सब   चोरों   के  घर  जैसे, 

कोर्ट, कचहरी, थाना  क्या ?


सब   रक्खा   रह  जाएगा,      

माल,असबाब,खजाना क्या ?


दुनिया   भूल   भुलैया   है,

वापस घर नहीं जाना क्या ?

@उमाकांत दीक्षित

सोमवार, 6 जून 2022

सफल जीवन' क्या हैं?

प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा


एक बार अर्जुन ने कृष्ण से पूछा-*

*माधव.. ये 'सफल जीवन' क्या होता है ?*

/ 

*कृष्ण अर्जुन को पतंग  उड़ाने ले गए।अर्जुन कृष्ण  को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था।*


*थोड़ी देर बाद अर्जुन बोला-*


*माधव.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है,क्या हम इसे तोड़ दें?ये और ऊपर चली जाएगी|*


*कृष्ण ने धागा तोड़ दिया ..*


*पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...*


*तब कृष्ण ने अर्जुन को जीवन का दर्शन समझाया,पार्थ..'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं,* 

*हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं;*   *जैसे :*

           *-घर-*

         *-परिवार-*

       *-अनुशासन-*

      *-माता-पिता-*

       *-गुरू-और-*

          *-समाज-*


*और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...*


*वास्तव में यही वो धागे होते हैं - जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..*


*'इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'*


*"अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."*


*धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही '"सफल" जीवन कहते हैं..!!*🙏

*जय श्री कृष्ण.*🙏🏻

सरकारी कामकाज

 *परम्परायें कैसे बनती हैं ?* 🤔🙄🧐😳


प्रस्तुति -प्रदीप कुमार  


एक कैम्प में नए कमांडर की पोस्टिंग हुई....

इंस्पेक्शन के दौरान उन्होंने देखा कि कैम्प एरिया के मैदान में दो सिपाही एक बैंच की पहरेदारी कर रहे हैं.....😄

कमांडर ने सिपाहियों से पूछा कि वे इस बैंच की पहरेदारी क्यों कर रहे हैं ? 

🙄

सिपाही बोले:- हमें पता नहीं सर, लेकिन आपसे पहले वाले कमांडर साहब ने इस बैंच की पहरेदारी करने को कहा था.....

😄

शायद ये इस कैम्प की परंपरा है क्योंकि......

शिफ्ट के हिसाब से चौबीसों घंटे इस बैंच की पहरेदारी की जाती है.... 

😄

वर्तमान कमांडर ने पिछले कमांडर को फोन किया और उस विशेष बैंच की पहरेदारी की वजह पूछी.....? 

😎

पिछले कमांडर ने बताया:- मुझे नहीं पता, लेकिन मुझसे पिछले कमांडर उस बैंच की पहरेदारी करवाते थे.......

अतः मैंने भी परंपरा को कायम रखा..... 

😄

नए कमांडर बहुत हैरान हुए....

😎

उन्होंने पिछले के और पिछले-पिछले 3 कमांडरों से बात की......

😎

सबने उपरोक्त कमांडर जैसा ही जवाब दिया....

😎

यूं ही पीछे के इतिहास में जाते नए कमांडर की बात फाइनली एक रिटायर्ड जनरल से हुई जिनकी उम्र 100 साल थी.....

😎 

नए कमांडर उनसे फोन पर बोले:-

आपको डिस्टर्ब करने के लिए क्षमा चाहता हूं सर.....

मैं उस कैम्प का नया कमांडर हूं......

जिसके आप, 60 साल पहले कमांडर हुआ करते थे...😄

मैंने यहां दो सिपाहियों को एक बैंच की पहरेदारी करते देखा है.....😄 क्या आप मुझे इस बैंच के बारे में कुछ जानकारी दे सकते हैं....?ताकि मैं समझ सकूं कि, इसकी पहरेदारी क्यों आवश्यक है....? 

😄😄

सामने वाला फोन पर आश्चर्यजनक स्वर में बोला:-

*क्या ? उस बैंच का  "ऑइल पेंट" अभी तक नहीं सूखा........?*

😄😄😄😀😀😁😁😉

ज्यादा तो नहीं, भारत में सिर्फ़ 75% परम्परायें ऐसे ही बनी हैं !😜

रवि अरोड़ा की नजर से.....

 इतिहास और साहित्य का कॉकटेल  / रवि अरोड़ा




बेशक इतिहासकार पृथ्वी राज चौहान का सच कुछ और बताएं मगर मुझे लगता है कि भारतीय जन मानस यदि चंद्र बरदायी लिखित साहित्यिक कृति पृथ्वी राज रासो को ही इतिहास मानता है तो इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए । अब जब हमारे अधिकांश इतिहास पुरूष अय्याशी और झूठी शान को आपस में ही लड़े मरे हों और आम इंसानों के हितार्थ अपने शासन में उन्होंने फली भी न फोड़ी हो तो अपने अतीत पर गौरवान्वित होने के लिए मसाला आखिर हम लोग कहां से लायेंगे ? यूं भी वास्तविक इतिहास यदि हमें अपने अतीत के बहुतायत काल पर शर्मिंदा ही करता हो तो साहित्य की शरण लेने के अतिरिक्त हमारे पास और चारा भी क्या बचता है ? अब इसी नज़र से अक्षय कुमार की नई फिल्म सम्राट पृथ्वी राज की कम से कम प्लॉट के मामले में तो बखिया नहीं उधेड़ी जानी चाहिए । हां एक साहित्यिक रचना को वास्तविक इतिहास बता कर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की जो कोशिशें इस फिल्म के माध्यम से की गई हैं,उसकी तो जितनी मजम्मत की जाए वह कम ही होगी । 


यह कोरी बकवास है कि पृथ्वी राज चौहान पर हमारा इतिहास मौन है और उन्हें जानबूझ कर दो चार लाइनों में निपटाया गया है । हां जबरन अपना स्वर्ण काल गढ़ने को यदि कुछ लोग भाट परंपरा की साहित्यिक रचना पृथ्वी राज रासो को ही एनसीईआरटी की किताबों में बढ़ा चढ़ा कर शामिल करवाना चाहें तो बात और है । इतिहासकार गौरी शंकर ओझा, आचार्य राम चंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे इतिहास और साहित्य के विद्वान विस्तार से कई पुस्तकों में लिख चुके हैं कि पृथ्वी राज रासो और स्वयं पृथ्वी राज चौहान के काल में सदियों का अंतर है । इतिहास की प्रामाणिक पुस्तकों पृथ्वी राज विजय, ताज अल मासिर, तबकाते ए नासिरो, पृथ्वी राज प्रबंध और प्रबंध चिंतामणि के अनुरूप पृथ्वी राज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच आखिरी युद्ध सन 1191 में हुआ और चौहान की हत्या सन 1192 में गौरी ने करवाई थी । स्वयं गौरी साल 1206 में एक कट्टर पंथी मुस्लिम के हाथों 14 साल बाद मारा गया था । इस हिसाब से चौहान द्वारा शब्द भेदी बाण से गौरी की हत्या करने की बात कतई सच साबित नहीं होती । विद्वान मानते हैं कि चंद बरदायी ने पृथ्वी राज रासो सोलहवीं सदी में लिखा और यदि वजह है कि इस काव्य में चंगेज खान और तैमूर लंग जैसे हमलावरों का भी जिक्र है जो चौहान के मारे जाने के कई सौ साल बाद पैदा हुए । रासो में अरबी फारसी के शब्द भी बहुतायत में मिलते हैं जो चौहान के समय तक भारत वर्ष में इस्तेमाल ही नहीं होते थे । 


इस फिल्म के लेखक चंद्र प्रकाश द्विवेदी चौहान को आखिरी हिंदू सम्राट घोषित करते हैं जबकि यह सत्य नहीं है । उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस के प्रोफेसर सिंथिया टैलबोट की किताब द लास्ट हिंदू एंपरर से शायद यह पंक्ति उठाई जबकि इस पुस्तक की ऐतिहासिक मान्यता ही नहीं है । बेशक इसमें कोई दो राय नहीं है कि पृथ्वी राज चौहान एक महान योद्धा थे और विदेशी हमलावर गौरी के हाथों पराजित होने से पूर्व वे उसे एक बार पहले हरा भी चुके थे । अब उनकी इसी वीरता को यदि किसी फिल्म अथवा स्कूलों के पाठ्यक्रम में उचित स्थान दिया जाता है तो इसका स्वागत ही होना चाहिए मगर कविताओं और कहानियों को इतिहास बता कर आपनी सौहार्द बिगाड़ने की कोशिशें हों तो इसका विरोध होना ही चाहिए.

शनिवार, 4 जून 2022

रवि अरोड़ा की नजर से

 असली कश्मीर फाइल्स / रवि अरोड़ा 


भगवान न करे कि जब तक आप ये पंक्तियां पढ़ें, संख्या बढ़ चुकी हो , मगर इन्हे लिखते समय तक तो कश्मीर के दस घरों में मातम छाया हुआ है । वैसे मातम तो कश्मीर के लाखों परिवारों में पसरा हुआ है मगर ये दस घर वे हैं जिनके किसी न किसी सदस्य को हाल ही में आतंकियों ने सरे आम गोली से उड़ा दिया । जी हां टारगेट किलिंग का शिकार हुए अधिकांश लोग वही कश्मीरी पंडित थे जिनके नाम पर आपको एक जहर भरी फिल्म हाल ही में दिखाई गई और मजबूर किया गया कि आप फिल्म देख कर रोएं और कुछ खास इतिहास पुरुषों को गाली दें । कश्मीर फाइल्स नाम की इस फिल्म के प्रचार प्रसार में खुद प्रधान मंत्री तक कूद पड़े थे और भगवा पार्टी की अधिकांश राज्य सरकारों ने भी इसे टैक्स फ्री कर दिया तथा पार्टी के तमाम सदस्यों को जैसे अघोषित टास्क दे दिया गया कि कैसे लोगों को सिनेमा घर तक लाना है और फिल्म की समाप्ति के बाद कौन कौन से नारे लगाने हैं । कश्मीरी पंडितों के दुखों पर बनी इस फिल्म के निर्माता ने सैंकड़ों करोड़ कमा लिए और उस पर राजनीति करने वालों ने वोट बटोर लिए मगर सवाल मौजू है कि पीड़ितों के हाथ आखिर क्या आया ? फिल्मी नहीं असली जीते जागते कश्मीरी पंडित तो अब भी रोज़ मारे जा रहे हैं और जो बचे हैं वे पानी पी पी कर सरकार को कोस रहे हैं और आए दिन सड़कों पर जुलूस निकाल रहे हैं और धरने दे रहे हैं । 


5 अगस्त 2019 को जब केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35 ए हटाई थी तो उम्मीद बंधी थी कि अब शायद घाटी के हालात सुधर जाएंगे । स्वयं गृह मंत्री ने संसद में दावा किया था कि 1990 में पलायन कर चुके कश्मीरी कश्मीरी की ही न केवल घर वापसी होगी अपितु भारत के हर कोने का आदमी अब कश्मीर में बस सकेगा । कारोबार, उद्योग धंधे , पूंजी निवेश, पर्यटन और अन्य सेवा क्षेत्रों के संपूर्ण विकास का भी खाका खींच कर लोगों को भरमाया गया था मगर हाय री भाजपा सरकार , हर बार की तरह इस बार भी न कोई वादा निभाया गया और न ही किसी घोषणा को अमली जामा पहनाया गया । महबूबा मुफ्ती के साथ गठबंधन सरकार चलाने और राज्यपाल शासन के तहत सरकार चाहती तो काया पलट कर सकती मगर हुआ कुछ नहीं । धारा 370 हटने के बाद तो राह में कोई कांटा भी नहीं बचा था मगर इन तीन सालों में भी सरकार ने तिनका तक नहीं तोड़ा । हां कश्मीरी पंडितों के नाम पर जितनी राजनीति की जा सकती थी , वह की और फिर उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया । नतीजा अब घाटी के बचे खुचे कश्मीरी पंडित भी पलायन शुरू कर चुके हैं और यदि घाटी के अन्य सवा लाख हिन्दू भी यही फैसला लेते हैं तो यह 1990 से भी बड़ी त्रासदी होगी । क्या दुर्भाग्य ही है कि उस समय की वी पी सिंह सरकार में भी भाजपा सत्ता की भागीदार थी और अब भी वही सत्ता में है । सवाल लखटकिया है कि धारा 370 हटाए जाने का देश , कश्मीर और कश्मीरी पंडितों को क्या फायदा हुआ ? इस बड़े राजनैतिक कदम का कहीं भी कोई लाभ यदि हुआ है तो क्या भाजपा के अतिरिक्त कोई और उसका साझीदार है ? 


क्या विडंबना है कि जिन कश्मीरी पंडितों के नाम पर भाजपा ने अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकी , वही अब उसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं । घाटी के सरकारी दफ्तरों में काम कर रहे ये कश्मीरी पंडित साफ कह रहे हैं कि सरकार उनकी सुरक्षा करने में असफल रही है अतः अब हमारा तबादला घाटी से जम्मू क्षेत्र में कर दिया जाए । पता नहीं सरकार के कानों तक उनकी यह आवाज पहुंचेगी कि नहीं । वैसे पता नहीं क्यों मुझे तो लगता है कि कुछ न कुछ तो झूठा सच्चा उसे करना ही पड़ेगा । जम्मू कश्मीर का परिसीमन हो चुका है । किसी भी दिन वहां चुनावों की घोषणा हो सकती है और राज्य में अपनी सरकार और हिंदू मुख्यमंत्री बनाने के अपने इरादे के चलते हवा में ही सही मगर भाजपा को गांठ तो बांधनी ही पड़ेगी । अब बात हवा में गांठ बांधने की ही हो तो भला कौन उसका मुकाबला कर सकता है ।

प्रतिस्पर्धा / बीणा शर्मा

 आज सुबह दौड़ते हुए,

एक व्यक्ति को देखा।

मुझ से आधा किलोमीटर आगे था।

अंदाज़ा लगाया कि मुझ से थोड़ा धीरे ही भाग रहा था।

एक अजीब सी खुशी मिली।

मैं पकड़ लूंगा उसे,यकीं था। 


मैं तेज़ और तेज़ दौड़ने लगा।आगे बढ़ते हर कदम के साथ,

मैं उसके करीब पहुंच रहा था।

कुछ ही पलों में,

मैं उससे बस सौ क़दम पीछे था।

निर्णय ले लिया था कि मुझे उसे पीछे छोड़ना है। थोड़ी गति बढ़ाई।


अंततः कर दिया।

उसके पास पहुंच,

उससे आगे निकल गया।

आंतरिक हर्ष की अनुभूति,

कि मैंने उसे हरा दिया।


बेशक उसे नहीं पता था

कि हम दौड़ लगा रहे थे।


मैं जब उससे आगे निकल गया,

एहसास हुआ

कि दिलो-दिमाग प्रतिस्पर्धा पर इस कद्र केंद्रित था.......


कि


घर का मोड़ छूट गया

मन का सकून खो गया

आस-पास की खूबसूरती और हरियाली नहीं देख पाया,

ध्यान लगाने और अपनी खुशी को भूल गया


और


तब समझ में आया,

यही तो होता है जीवन में,

जब  हम अपने साथियों को,

पड़ोसियों को, दोस्तों को,

परिवार के सदस्यों को,

प्रतियोगी समझते हैं।

उनसे बेहतर करना चाहते हैं।

प्रमाणित करना चाहते हैं

कि हम उनसे अधिक सफल हैं।

या

अधिक महत्वपूर्ण।

बहुत महंगा पड़ता है,

क्योंकि अपनी खुशी भूल जाते हैं।

अपना समय और ऊर्जा

उनके पीछे भागने में गवां देते हैं।

इस सब में अपना मार्ग और मंज़िल भूल जाते हैं।


भूल जाते हैं कि नकारात्मक प्रतिस्पर्धाएं कभी ख़त्म नहीं होंगी।

हमेशा कोई आगे होगा।

किसी के पास बेहतर नौकरी होगी।

बेहतर गाड़ी,

बैंक में अधिक रुपए,

अधिक जायदाद, 

ज़्यादा पढ़ाई,

खूबसूरत पत्नी,

ज़्यादा संस्कारी बच्चे,

बेहतर परिस्थितियां

और बेहतर हालात।


इस सब में एक एहसास ज़रूरी है

कि बिना प्रतियोगिता किए, हर इंसान श्रेष्ठतम हो सकता है।


असुरक्षित महसूस करते हैं चंद लोग

कि अत्याधिक ध्यान देते हैं दूसरों पर 

कहां जा रहे हैं?

क्या कर रहे हैं?

क्या पहन रहे हैं?

क्या बातें  कर रहे हैं?


*जो है, उसी में खुश रहो।*

*लंबाई, वज़न या व्यक्तित्व।*


*स्वीकार करो और समझो*

*कि कितने भाग्यशाली हो।*


*ध्यान नियंत्रित रखो।*

*स्वस्थ, सुखद ज़िन्दगी जीओ।*


*भाग्य में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है।*

*सबका अपना-अपना है।*


*तुलना और प्रतियोगिता हर खुशी को चुरा लेते‌ हैं।*

*अपनी शर्तों पर जीने का आनंद छीन लेते हैं।*


*इस लिए

अपनी दौड़ खुद लगाओ

 बिना किसी प्रतिस्पर्धा के* 🙏

शुक्रवार, 3 जून 2022

दुर्गा भाभी के त्याग की नयी पहचान / आलोक यात्री

 इतिहास में दर्ज होने से वंचित दुर्गा भाभी के अवदान को अक्षयवरनाथ ने दी पहचान 

            

  आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर देश भर में विविध आयोजन हो रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में गाजियाबाद की भूमि भी संग्राम से अछूती नहीं रही। स्वतंत्रता संग्राम के अलावा गाजियाबाद की यह भूमि विरांगनाओं के कार्य स्थल के रूप में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। इस भेद सहित इतिहास में दर्ज होने से रह गईं कई घटनाओं का उद्घाटन करता है अक्षयवरनाथ श्रीवास्तव रचित और निर्देशित नाटक "दुर्गा भाभी"। मंगलवार को हिन्दी भवन में थर्टीन स्कूल ऑफ टेलेंट डेवलपमेंट संस्था द्वारा मंचित नाटक "दुर्गा भाभी" को देखने उमड़ा जनसमूह अतीत के उन पन्नों का साक्षी बना जो किन्हीं वजह से इतिहास में दर्ज होने से रह गए थे। मसलन स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने के बीच दुर्गा भाभी ने 1935 में ग़ाज़ियाबाद के एक विद्यालय में शिक्षिका के रूप में भी अपना योगदान दिया। इसके अलावा 1983 से मृत्युपरंत 1999 तक वह गाजियाबाद के राजनगर इलाके में ही वास करती रहीं। भगत सिंह और राजगुरु की फांसी की सजा माफ कराने को लेकर उनका गांधी जी से वैचारिक मतभेद भी नया रहस्योद्घाटन है।

  नाटक दर्शकों को यह संदेश देने में सफल रहा कि इमारत की ऊंचाई, नींव की सुदृढ़ता यह सुनिश्चित करती है कि इतिहास हमारी नींव है। इतिहास को गहराई से जानना उतना ही ज़रूरी है जितना भविष्य की योजनाएं बनाना। नई पीढ़ी को यह बताना बहुत आवश्यक है कि आज़ादी को मिल्कियत न समझें। हम भले ही स्वतंत्र लोकतंत्र के रास्ते पर चल रहे हैं लेकिन पाश्चात्य प्रभाव और सहायता के हम अभी भी ग़ुलाम हैं। इस सोच और निर्भरता को बदल कर हमें अपने भारतीय होने पर गर्व करना होगा।

  नाटक पूरे तौर पर दुर्गा भाभी पर ही केन्द्रित है। लगभग एक सदी पुराने इतिहास, घटनाक्रम, परिवेश, देशकाल और सामाजिक जीवन व स्थियों को नब्बे मिनट की अवधि में समेट पाना एक दुरूह कार्य था। जिसे अक्षयवरनाथ श्रीवास्तव व उनकी टीम ने संभव कर दिखाया। नाटक का निर्देशन वास्तव में चुनौतिपूर्ण इसलिए भी था कि घटनाक्रम के अनुसार दुर्गा भाभी और क्रांतिकारियों का लाहौर से कलकत्ता के बीच का सफर रेलगाड़ी में मंचित किया जाना था। इसके अलावा बम निर्माण और उसका परिक्षण, असेंबली में बम विस्फोट और अंग्रेज गवर्नर की कार पर हमला जैसे दृश्यों का मंचन भी बड़ी चुनौती थी। ऐसे ही तमाम रोमांचकारी दृश्य इस नाटक को सफलता के शिखर तक ले जाने में सहायक बने।

  दुर्गा की भूमिका में तनु पाल ने अभिनय की छाप छोड़ी। नाटक में दुर्गा भाभी के बाल्यकाल, यौवन व वृद्धावस्था का बखूबी निरूपण किया गया है। एक ही किरदार को अलग-अलग भूमिका में निभाने का कार्य तीनों ही कलाकारों ने बखूबी निभाया है। दुर्गा के साइकिल चलाने का दृश्य फिल्मांकन और रंगमंचीय तकनीक का अद्भुत सामंजस्य था। पार्श्व संगीत में संकल्प श्रीवास्तव, प्रकाश व्यवस्था में राघव प्रकाश व मंच सज्जा में दिव्यांग श्रीवास्तव ने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। स्थानीय प्रशासन की ओर से आयोजित नाटक के मंचन और प्रबंधन की जिम्मेदारी हिन्दी भवन समिति के अध्यक्ष ललित जायसवाल ने निभाई। नाटक के लिए लिखे गए मधुर और परिस्थितिजन्य गीतों के लिए चेतन आनंद और शोधपरक सामग्री व संसाधन जुटाने में सहायक रहे जगदीश भट्ट, डॉ. माला कपूर, डॉ. ईशा शर्मा, शिव वर्मा, आलोक यात्री, नरसिंह अरोड़ा, कुलदीप, रोजी श्रीवास्तव, अदित श्रीवास्तव, डॉ. दानिश इकबाल, हरि सिंह खोलिया, ऋषभ यादव, अक्षित गुप्ता, लक्ष्य राजपूत, सरू वर्मा, अर्चित वर्मा आदिका भी योगदान सराहनीय रहा। नाटक को सफलता के शिखर तक पहुंचाने में विनय कुमार, शिवम सिंघल, आभास, केशव साधना, राजीव वैद, अमन व डॉ. आरती बंसल सहित लगभग 50 अन्य कलाकारों की मेहनत भी परिलक्षित हुई। 

- आलोक यात्री.

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...