कहो, मुझे पहचाना क्या ?
याद नहीं दीवाना क्या ?
आँख उठाकर देख जरा,
मुझसे भी शरमाना क्या ?
राजनीति के जंगल में,
अँधा क्या और काना क्या ?
देव औरंगाबाद बिहार 824202 साहित्य कला संस्कृति के रूप में विलक्ष्ण इलाका है. देव स्टेट के राजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह किंकर अपने जमाने में मूक सिनेमा तक बनाए। ढेरों नाटकों का लेखन अभिनय औऱ मंचन तक किया. इनको बिहार में हिंदी सिनेमा के जनक की तरह देखा गया. कामता प्रसाद सिंह काम और इनकi पुत्र दिवंगत शंकर दयाल सिंह के रचनात्मक प्रतिभा की गूंज दुनिया भर में है। प्रदीप कुमार रौशन और बिनोद कुमार गौहर की भी इलाके में काफी धूम रही है.। देव धरती के इन कलम के राजकुमारों की याद में .समर्पित हैं ब्लॉग.
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*जय श्री कृष्ण.*🙏🏻
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अतः मैंने भी परंपरा को कायम रखा.....
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नए कमांडर बहुत हैरान हुए....
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उन्होंने पिछले के और पिछले-पिछले 3 कमांडरों से बात की......
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सबने उपरोक्त कमांडर जैसा ही जवाब दिया....
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नए कमांडर उनसे फोन पर बोले:-
आपको डिस्टर्ब करने के लिए क्षमा चाहता हूं सर.....
मैं उस कैम्प का नया कमांडर हूं......
जिसके आप, 60 साल पहले कमांडर हुआ करते थे...😄
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5 अगस्त 2019 को जब केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35 ए हटाई थी तो उम्मीद बंधी थी कि अब शायद घाटी के हालात सुधर जाएंगे । स्वयं गृह मंत्री ने संसद में दावा किया था कि 1990 में पलायन कर चुके कश्मीरी कश्मीरी की ही न केवल घर वापसी होगी अपितु भारत के हर कोने का आदमी अब कश्मीर में बस सकेगा । कारोबार, उद्योग धंधे , पूंजी निवेश, पर्यटन और अन्य सेवा क्षेत्रों के संपूर्ण विकास का भी खाका खींच कर लोगों को भरमाया गया था मगर हाय री भाजपा सरकार , हर बार की तरह इस बार भी न कोई वादा निभाया गया और न ही किसी घोषणा को अमली जामा पहनाया गया । महबूबा मुफ्ती के साथ गठबंधन सरकार चलाने और राज्यपाल शासन के तहत सरकार चाहती तो काया पलट कर सकती मगर हुआ कुछ नहीं । धारा 370 हटने के बाद तो राह में कोई कांटा भी नहीं बचा था मगर इन तीन सालों में भी सरकार ने तिनका तक नहीं तोड़ा । हां कश्मीरी पंडितों के नाम पर जितनी राजनीति की जा सकती थी , वह की और फिर उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया । नतीजा अब घाटी के बचे खुचे कश्मीरी पंडित भी पलायन शुरू कर चुके हैं और यदि घाटी के अन्य सवा लाख हिन्दू भी यही फैसला लेते हैं तो यह 1990 से भी बड़ी त्रासदी होगी । क्या दुर्भाग्य ही है कि उस समय की वी पी सिंह सरकार में भी भाजपा सत्ता की भागीदार थी और अब भी वही सत्ता में है । सवाल लखटकिया है कि धारा 370 हटाए जाने का देश , कश्मीर और कश्मीरी पंडितों को क्या फायदा हुआ ? इस बड़े राजनैतिक कदम का कहीं भी कोई लाभ यदि हुआ है तो क्या भाजपा के अतिरिक्त कोई और उसका साझीदार है ?
क्या विडंबना है कि जिन कश्मीरी पंडितों के नाम पर भाजपा ने अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकी , वही अब उसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं । घाटी के सरकारी दफ्तरों में काम कर रहे ये कश्मीरी पंडित साफ कह रहे हैं कि सरकार उनकी सुरक्षा करने में असफल रही है अतः अब हमारा तबादला घाटी से जम्मू क्षेत्र में कर दिया जाए । पता नहीं सरकार के कानों तक उनकी यह आवाज पहुंचेगी कि नहीं । वैसे पता नहीं क्यों मुझे तो लगता है कि कुछ न कुछ तो झूठा सच्चा उसे करना ही पड़ेगा । जम्मू कश्मीर का परिसीमन हो चुका है । किसी भी दिन वहां चुनावों की घोषणा हो सकती है और राज्य में अपनी सरकार और हिंदू मुख्यमंत्री बनाने के अपने इरादे के चलते हवा में ही सही मगर भाजपा को गांठ तो बांधनी ही पड़ेगी । अब बात हवा में गांठ बांधने की ही हो तो भला कौन उसका मुकाबला कर सकता है ।
एक व्यक्ति को देखा।
मुझ से आधा किलोमीटर आगे था।
अंदाज़ा लगाया कि मुझ से थोड़ा धीरे ही भाग रहा था।
एक अजीब सी खुशी मिली।
मैं पकड़ लूंगा उसे,यकीं था।
मैं तेज़ और तेज़ दौड़ने लगा।आगे बढ़ते हर कदम के साथ,
मैं उसके करीब पहुंच रहा था।
कुछ ही पलों में,
मैं उससे बस सौ क़दम पीछे था।
निर्णय ले लिया था कि मुझे उसे पीछे छोड़ना है। थोड़ी गति बढ़ाई।
अंततः कर दिया।
उसके पास पहुंच,
उससे आगे निकल गया।
आंतरिक हर्ष की अनुभूति,
कि मैंने उसे हरा दिया।
बेशक उसे नहीं पता था
कि हम दौड़ लगा रहे थे।
मैं जब उससे आगे निकल गया,
एहसास हुआ
कि दिलो-दिमाग प्रतिस्पर्धा पर इस कद्र केंद्रित था.......
कि
घर का मोड़ छूट गया
मन का सकून खो गया
आस-पास की खूबसूरती और हरियाली नहीं देख पाया,
ध्यान लगाने और अपनी खुशी को भूल गया
और
तब समझ में आया,
यही तो होता है जीवन में,
जब हम अपने साथियों को,
पड़ोसियों को, दोस्तों को,
परिवार के सदस्यों को,
प्रतियोगी समझते हैं।
उनसे बेहतर करना चाहते हैं।
प्रमाणित करना चाहते हैं
कि हम उनसे अधिक सफल हैं।
या
अधिक महत्वपूर्ण।
बहुत महंगा पड़ता है,
क्योंकि अपनी खुशी भूल जाते हैं।
अपना समय और ऊर्जा
उनके पीछे भागने में गवां देते हैं।
इस सब में अपना मार्ग और मंज़िल भूल जाते हैं।
भूल जाते हैं कि नकारात्मक प्रतिस्पर्धाएं कभी ख़त्म नहीं होंगी।
हमेशा कोई आगे होगा।
किसी के पास बेहतर नौकरी होगी।
बेहतर गाड़ी,
बैंक में अधिक रुपए,
अधिक जायदाद,
ज़्यादा पढ़ाई,
खूबसूरत पत्नी,
ज़्यादा संस्कारी बच्चे,
बेहतर परिस्थितियां
और बेहतर हालात।
इस सब में एक एहसास ज़रूरी है
कि बिना प्रतियोगिता किए, हर इंसान श्रेष्ठतम हो सकता है।
असुरक्षित महसूस करते हैं चंद लोग
कि अत्याधिक ध्यान देते हैं दूसरों पर
कहां जा रहे हैं?
क्या कर रहे हैं?
क्या पहन रहे हैं?
क्या बातें कर रहे हैं?
*जो है, उसी में खुश रहो।*
*लंबाई, वज़न या व्यक्तित्व।*
*स्वीकार करो और समझो*
*कि कितने भाग्यशाली हो।*
*ध्यान नियंत्रित रखो।*
*स्वस्थ, सुखद ज़िन्दगी जीओ।*
*भाग्य में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है।*
*सबका अपना-अपना है।*
*तुलना और प्रतियोगिता हर खुशी को चुरा लेते हैं।*
*अपनी शर्तों पर जीने का आनंद छीन लेते हैं।*
*कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर* *दादा जी से पूछा* *कि पहले लोग बहुत कम* *बीमार होते थे ?* *तो...