शुक्रवार, 3 जून 2022

दुर्गा भाभी के त्याग की नयी पहचान / आलोक यात्री

 इतिहास में दर्ज होने से वंचित दुर्गा भाभी के अवदान को अक्षयवरनाथ ने दी पहचान 

            

  आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर देश भर में विविध आयोजन हो रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में गाजियाबाद की भूमि भी संग्राम से अछूती नहीं रही। स्वतंत्रता संग्राम के अलावा गाजियाबाद की यह भूमि विरांगनाओं के कार्य स्थल के रूप में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। इस भेद सहित इतिहास में दर्ज होने से रह गईं कई घटनाओं का उद्घाटन करता है अक्षयवरनाथ श्रीवास्तव रचित और निर्देशित नाटक "दुर्गा भाभी"। मंगलवार को हिन्दी भवन में थर्टीन स्कूल ऑफ टेलेंट डेवलपमेंट संस्था द्वारा मंचित नाटक "दुर्गा भाभी" को देखने उमड़ा जनसमूह अतीत के उन पन्नों का साक्षी बना जो किन्हीं वजह से इतिहास में दर्ज होने से रह गए थे। मसलन स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने के बीच दुर्गा भाभी ने 1935 में ग़ाज़ियाबाद के एक विद्यालय में शिक्षिका के रूप में भी अपना योगदान दिया। इसके अलावा 1983 से मृत्युपरंत 1999 तक वह गाजियाबाद के राजनगर इलाके में ही वास करती रहीं। भगत सिंह और राजगुरु की फांसी की सजा माफ कराने को लेकर उनका गांधी जी से वैचारिक मतभेद भी नया रहस्योद्घाटन है।

  नाटक दर्शकों को यह संदेश देने में सफल रहा कि इमारत की ऊंचाई, नींव की सुदृढ़ता यह सुनिश्चित करती है कि इतिहास हमारी नींव है। इतिहास को गहराई से जानना उतना ही ज़रूरी है जितना भविष्य की योजनाएं बनाना। नई पीढ़ी को यह बताना बहुत आवश्यक है कि आज़ादी को मिल्कियत न समझें। हम भले ही स्वतंत्र लोकतंत्र के रास्ते पर चल रहे हैं लेकिन पाश्चात्य प्रभाव और सहायता के हम अभी भी ग़ुलाम हैं। इस सोच और निर्भरता को बदल कर हमें अपने भारतीय होने पर गर्व करना होगा।

  नाटक पूरे तौर पर दुर्गा भाभी पर ही केन्द्रित है। लगभग एक सदी पुराने इतिहास, घटनाक्रम, परिवेश, देशकाल और सामाजिक जीवन व स्थियों को नब्बे मिनट की अवधि में समेट पाना एक दुरूह कार्य था। जिसे अक्षयवरनाथ श्रीवास्तव व उनकी टीम ने संभव कर दिखाया। नाटक का निर्देशन वास्तव में चुनौतिपूर्ण इसलिए भी था कि घटनाक्रम के अनुसार दुर्गा भाभी और क्रांतिकारियों का लाहौर से कलकत्ता के बीच का सफर रेलगाड़ी में मंचित किया जाना था। इसके अलावा बम निर्माण और उसका परिक्षण, असेंबली में बम विस्फोट और अंग्रेज गवर्नर की कार पर हमला जैसे दृश्यों का मंचन भी बड़ी चुनौती थी। ऐसे ही तमाम रोमांचकारी दृश्य इस नाटक को सफलता के शिखर तक ले जाने में सहायक बने।

  दुर्गा की भूमिका में तनु पाल ने अभिनय की छाप छोड़ी। नाटक में दुर्गा भाभी के बाल्यकाल, यौवन व वृद्धावस्था का बखूबी निरूपण किया गया है। एक ही किरदार को अलग-अलग भूमिका में निभाने का कार्य तीनों ही कलाकारों ने बखूबी निभाया है। दुर्गा के साइकिल चलाने का दृश्य फिल्मांकन और रंगमंचीय तकनीक का अद्भुत सामंजस्य था। पार्श्व संगीत में संकल्प श्रीवास्तव, प्रकाश व्यवस्था में राघव प्रकाश व मंच सज्जा में दिव्यांग श्रीवास्तव ने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। स्थानीय प्रशासन की ओर से आयोजित नाटक के मंचन और प्रबंधन की जिम्मेदारी हिन्दी भवन समिति के अध्यक्ष ललित जायसवाल ने निभाई। नाटक के लिए लिखे गए मधुर और परिस्थितिजन्य गीतों के लिए चेतन आनंद और शोधपरक सामग्री व संसाधन जुटाने में सहायक रहे जगदीश भट्ट, डॉ. माला कपूर, डॉ. ईशा शर्मा, शिव वर्मा, आलोक यात्री, नरसिंह अरोड़ा, कुलदीप, रोजी श्रीवास्तव, अदित श्रीवास्तव, डॉ. दानिश इकबाल, हरि सिंह खोलिया, ऋषभ यादव, अक्षित गुप्ता, लक्ष्य राजपूत, सरू वर्मा, अर्चित वर्मा आदिका भी योगदान सराहनीय रहा। नाटक को सफलता के शिखर तक पहुंचाने में विनय कुमार, शिवम सिंघल, आभास, केशव साधना, राजीव वैद, अमन व डॉ. आरती बंसल सहित लगभग 50 अन्य कलाकारों की मेहनत भी परिलक्षित हुई। 

- आलोक यात्री.

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