गुरुवार, 4 अगस्त 2022

लंदन में किशोर दा और रफ़ी जी

 यह तस्वीर कोई आम तस्वीर नहीं है, संगीत जगत की एक अमूल्य धरोहर है, इसमें दो दिग्गज एक साथ नजर आ रहे हैं।


रफी साहब का मुंबई से लंदन आना जाना लगा रहता था क्योंकि उनके बेटे लंदन में रहते थे, उन दिनों रफी साहब लंदन में अपने बेटे खालिद जी के घर रुकें थे, महान गायक- अभिनेता किशोर कुमार भी अपने काम से लंदन में थे तो वे रफी साहब से मिलने उनके घर पहुंचे, रफी साहब ने गर्मजोशी से किशोर दा का स्वागत किया और खूब बातें हुई, कैमरे में तस्वीरें भी कैद हुई, यह प्रस्तुत तस्वीर उसी मौके की गवाही दे रही है। 


कितने खुश नजर आ रहे हैं, दोनों के बीच खूब प्यार था इज्जत थी। कल किशोर दा का जन्मदिन है तो उनकी यादों को विनम्र अभिवादन।


Happy Birthday Kishore Kumar Ganguly!

बुधवार, 3 अगस्त 2022

"मन्दिर का घण्टा बजाने वाला"

 .                

प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा



          एक मन्दिर था। उसमें सभी लोग पगार पर थे। आरती वाला, पूजा कराने वाला आदमी, घण्टा बजाने वाला भी पगार पर था। घण्टा बजाने वाला आदमी आरती के समय, भाव के साथ इतना मशगुल हो जाता था कि होश में ही नहीं रहता था। घण्टा बजाने वाला व्यक्ति पूरे भक्ति भाव से खुद का काम करता था। मन्दिर में आने वाले सभी व्यक्ति भगवान के साथ साथ घण्टा बजाने वाले व्यक्ति के भाव के भी दर्शन करते थे। उसकी भी वाह वाह होती थी।

          एक दिन मन्दिर का ट्रस्ट बदल गया,और नये ट्रस्टी ने ऐसा आदेश जारी किया कि अपने मन्दिर में काम करते सब लोग पढ़े लिखे होना जरूरी है। जो पढ़े लिखें नही है, उन्हें निकाल दिया जाएगा। उस घण्टा बजाने वाले भाई को ट्रस्टी ने कहा कि   'तुम्हारी आज तक का पगार ले लो। कल से तुम नौकरी पर मत आना।' उस घण्टा बजाने वाले व्यक्ति ने कहा, "साहेब भले मैं पढ़ा लिखा नही हूँ,परन्तु इस कार्य में मेरा भाव भगवान से जुड़ा हुआ है, देखो !" ट्रस्टी ने कहा,"सुन लो तुम पढ़े लिखे नही हो, इसलिए तुम्हे रखा  नही जायेगा।"

          दूसरे दिन से मन्दिर में नये लोगो को रखा गया। परन्तु आरती में आये लोगो को अब पहले जैसा मजा नहीं आता था। घण्टा बजाने वाले व्यक्ति की सभी को कमी महसूस होती थी। कुछ लोग मिलकर घण्टा बजाने वाले व्यक्ति के घर गए, और विनती करी तुम मन्दिर आओ। उस भाई ने जवाब दिया, "मैं आऊँगा तो ट्रस्टी को लगेगा कि मैं नौकरी लेने के लिए आया है। इसलिए मैं नहीं आ सकता।"

          वहाँ आये हुए लोगो ने एक उपाय बताया कि 'मन्दिर के बराबर सामने आपके लिए एक दुकान खोल के देते हैं। वहाँ आपको बैठना है और आरती के समय घण्टा बजाने आ जाना, फिर कोई नहीं कहेगा तुमको नौकरी की जरूरत है।"

          उस भाई ने मन्दिर के सामने दुकान शुरू की और वो इतनी चली कि एक दुकान से सात दुकान और सात दुकानो से एक फैक्ट्री खोली। अब वो आदमी मर्सिडीज़ से घण्टा बजाने आता था। 

          समय बीतता गया। ये बात पुरानी सी हो गयी। मन्दिर का ट्रस्टी फिर बदल गया। नये ट्रस्ट को नया मन्दिर बनाने के लिए दान की जरूरत थी। मन्दिर के नये ट्रस्टी को विचार आया कि सबसे पहले उस फैक्ट्री के मालिक से बात करके देखते हैं। ट्रस्टी मालिक के पास गया। सात लाख का खर्चा है, फैक्ट्री मालिक को बताया। फैक्ट्री के मालिक ने कोई सवाल किये बिना एक खाली चेक ट्रस्टी के हाथ में दे दिया और कहा चैक भर लो ट्रस्टी ने चैक भरकर उस फैक्ट्री मालिक को वापस दिया। फैक्ट्री मालिक ने चैक को देखा और उस ट्रस्टी को दे दिया।

          ट्रस्टी ने चैक हाथ में लिया और कहा, "सिग्नेचर तो बाकी है।" मालिक ने कहा, "मुझे सिग्नेचर करना नंही आता है लाओ, अंगुठा मार देता हूँ वही चलेगा।" ये सुनकर ट्रस्टी चौक गया और कहा, "साहेब तुमने अनपढ़ होकर भी इतनी तरक्की की, यदि पढे लिखे होते तो कहाँ होते ?" सेठ हँसते हुए बोला, "भाई, मैं पढ़ा लिखा होता तो बस मन्दिर में घण्टा बजा रहा होता।"

सारांश: कार्य कोई भी हो, परिस्थिति कैसी भी हो, हमारी काबिलियत हमारी भावनाओ पर निर्भर करती है। भावनायें शुद्ध होगी तो ईश्वर और सुंदर भविष्य पक्का हमारा साथ देगा।

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प्रेमचंद के नए समीक्षकों के लिए / जयनारायण प्रसाद

 

प्रस्तुति -: सतीश वर्मा


  मुंशी प्रेमचंद के बहाने आज तलाश रहा था हिंदुस्तान का कौन-सा कथाकार विदेशी विश्वविद्यालयों में खूब पढ़ा/पढ़ाया जाता है, तो मुंशी प्रेमचंद का नाम सबसे ज्यादा मिला। जापान, रूस, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी आदि विश्वविद्यालयों में प्रेमचंद के उपन्यास वहां के पाठ्यक्रम में तो शामिल हैं ही, बल्कि स्कूलों में भी प्रेमचंद की कहानियां चाव से पढ़ी/पढ़ाई जाती हैं। वहां प्रेमचंद की 'ईदगाह' कहानी खूब पढ़ी गई है। 

  तलाशते-तलाशते यह भी मिला प्रेमचंद की 'ईदगाह' का अंग्रेजी अनुवाद खुशवंत सिंह ‌ने किया था। लाजवाब अनुवाद है मौका मिलें, तो कभी पढ़िएगा आराम से।

  कहते हैं कि विदेशी बुद्धिजीवियों की नजर प्रेमचंद पर तब ज्यादा पड़नी शुरू हुई, जब (ऑस्कर पुरस्कार विजेता) फिल्मकार सत्यजित राय ने प्रेमचंद की रचना 'शतरंज के खिलाड़ी' (‌द चेस प्लेयर्स 1977) और 'सद्गति' (डेलिवेरेंस, Sadgati, 1981) पर फिल्में बनाईं। 'शतरंज के खिलाड़ी' कथा फिल्म यानी फीचर फिल्म थी और 'सद्गति' दूरदर्शन के लिए बनाई गई टेलीविजन फिल्म। 

  जापान में प्रेमचंद की लोकप्रियता की एक वजह सत्यजित राय भी हैं। सत्यजित राय जापान में काफी मशहूर हैं। जापान के नामी फिल्मकार अकीरा कुरोसोवा हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा किसी फिल्मकार की कद्र करते थे, तो वह थे सत्यजित राय। 

  बहुत कम‌ लोगों को मालूम होगा अकीरा कुरोसोवा और सत्यजित राय - दोनों को लाइफटाइम ऑस्कर पुरस्कार भी मिला था। अकीरा कुरोसोवा कहते थे अगर किसी ने सत्यजित राय के सिनेमा को नहीं देखा - मतलब ‌सूरज और चांद को नहीं देखा। वह यह बात राय मोशाय की‌ वर्ल्ड क्लासिक फिल्म 'पथेर पांचाली' (सांग ऑफ द लिटिल रोड) के संदर्भ में अक्सर बोलते थे। अब ना अकीरा कुरोसोवा हैं ना ही सत्यजित राय। मुंशी प्रेमचंद जरूर हैं, पर अपनी अनमोल-वेशकीमती कथाओं/उपन्यासों में जैसे अकीरा और राय मोशाय अपने सिनेमा में ! 

  चलते-चलते यह भी बता दें राय मोशाय की इन दोनों फिल्मों के ज्यादातर कलाकार भी अब जीवित नहीं ‌हैं। ना संजीव कुमार (मिर्जा सज्जाद अली) हैं ना अमजद खान (वाजिद अली शाह),‌ ना सईद जाफरी (मीर रौशन अली) और ना टॉम अल्टर (कैप्टन वेस्टन), ना अभिनेता फारुख शेख (अकील) और ‌ना ही लीला मिश्रा (हिरिया) !

'सद्गति' की ना स्मिता पाटिल (झुरिया) हैं ना अभिनेता ओमपुरी (दुःखी चमार) और ना ही अभिनेत्री गीता सिद्धार्थ (लक्ष्मी) !

  सोचिएगा राय मोशाय ने अपनी बनाई छोटी-बड़ी कुल 36 फिल्मों में से आखिर क्या वजह थी उन्होंने हिंदी साहित्य से अकेले प्रेमचंद को ही चुना ! सत्यजित राय ने 36 में से सिर्फ दो ही फिल्में हिंदी में बनाईं और उसके लिए भी दोनों फिल्मों की कहानी हेतु मुंशी प्रेमचंद को ही प्रमुखता दी। 

एक भारतीय सिनेमा का सम्राट और दूसरा हिंदी साहित्य का सम्राट। 

  मुंशी प्रेमचंद ऐसे ही नहीं कहलाते हैं हिंदी साहित्य के उपन्यास सम्राट ! 

  फिर से सोचिएगा।

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

मुंशी प्रेमचंद

 मुंशी प्रेमचंद, अपनी पत्नी के साथ इस फोटो में फटे जूते पहने हुए नज़र आ रहे हैं।


इस फोटो को देखकर, हरिशंकर परसाई ने एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था "सोचता हूँ—फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी—इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फोटो में खिंच जाता है। यह पोशाक बदल भी नहीं सकता, क्योंकि इसने भारत की जनता के मर्म को छुआ है। इस पोशाक के पीछे गोदान जैसे महाकाव्य की आदरांजली भी तो है।

चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?

मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला, जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आजमाया।

तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियां पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है।

तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमजोरी थी, जो होरी को ले डूबी, वही ‘नेम-धरम’ वाली कमजोरी? ‘नेम-धरम’ उसकी भी जंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुस्कुरा रहे हो, उससे लगता है कि शायद ‘नेम-धरम’ तुम्हारा बंधन नहीं था, तुम्हारी मुक्ति थी! तुम्हारी यह पांव की अंगुली मुझे संकेत करती-सी लगती है, जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ हाथ की नहीं, पांव की अंगुली से इशारा करते हो?

तुम क्या उसकी तरफ इशारा कर रहे हो, जिसे ठोकर मारते-मारते तुमने जूता फाड़ लिया?"


#BirthAnniversary #MunsiPremChand #Literature #Tribute

शनिवार, 30 जुलाई 2022

(बाबूजी उठे नहीं क्या अभी तक ?)

😊 प्रस्तुति - राजेश सिन्हा 


🙏🏿🍂 बाबूजी 🙏🏿🙏🏿

   

" अमित, अरे बाबूजी उठे नहीं क्या अभी तक ? टाइम पर दवा नहीं लेने से उनकी तबियत बिगड़ जाती है। अमित, जरा देखोगे क्या उनके कमरे में जाकर ? मैं रोटियाँ बना रही हूँ, सब्जी भी गैस पर रखी है, तुम्हारा टिफिन भी लगाना है अभी। जागते ही चाय चाहिए उनको, वो भी सुबह ठीक सात बजे। अब तो पौने आठ बज रहे हैं, आज चाय-चाय करते किचन तक आए भी नहीं। "🍂

 

अदिति की बातें सुनते अमित को भी आश्चर्य हुआ। बाबूजी आज अभी तक उठे क्यों नहीं ? वो तुरंत उनके कमरे में गया। बाबूजी अभी बिस्तर पर ही थे, गहरी नींद में। 

अमित ने उन्हें आवाज दी : " बाबूजी, उठिए, आठ बजने को आए। आज चाय नहीं पीनी क्या ? "🍂


कोई जवाब न पाकर अमित ने उन्हें हिलाया और जगाने की कोशिश की लेकिन उनके एकदम ठंडे पड़े शरीर के स्पर्श से वह चौंक गया और चीखा : " अदितिsss...अदितिsss...इधर आओ जरा। देखो, बाबूजी उठ नहीं रहे हैं। "🍂


रोटी बेलना छोड़, सब्जी की गैस बंद कर अदिति तेजी से बाबूजी के कमरे में पहुँची। 


अमित को कुछ सूझ नहीं रहा था। बोला : " अदिति, देखो, बाबूजी उठते नहीं हैं। "🍂


अदिति ने भी कोशिश की मगर बाबूजी न जागे। उसकी आँखों से अश्रु बह निकले फिर खुद को मानो सांत्वना देती हुई वह बोली : " जरूर रात की दवाओं के असर से गहरी नींद में हैं। ठहरो मैं डॉक्टर को फोन करती हूँ। "


अदिति ने बाबूजी के रेग्युलर डॉक्टर को कॉल किया : " हलो डॉक्टर साहब, मैं गीता बोल रही हूँ। "🍂


डॉक्टर : " हाँ, गीता, बोलो। बाबूजी तो ठीक हैं न ? परसों ही तो उन्हें चैक किया था, बीपी बढ़ा हुआ था इसलिए मैंने दवाई भी चेंज कर दी है। " 🍂

🍂

अदिती : " डॉक्टर साहब, बाबूजी उठ नहीं रहे। प्लीज आप जल्दी घर आएँगे क्या ? "🍂


डॉक्टर : " हाँ... हाँ... मैं तुरंत आता हूँ। "


10 मिनिट में डॉक्टर साहब आ गए। बाबूजी को चैक किया। फिर अमित की पीठ पर सांत्वना की थपकी देते हुए बोले : " सुबह-सुबह ही डेथ हुई है इनकी। बीपी ही इनपर भारी गुजरा। मैं डेथ सर्टिफिकेट बना देता हूँ। "


डॉक्टर की बात सुन, अदिति हिचकियाँ ले-लेकर रोने लगी।


डॉक्टर ने उसे कहा : " गीता, जन्म-मरण हमारे हाथ में थोड़ी होता है और फिर उम्र भी तो हो गई थी इनकी। होनी को कौन टाल सकता है। "🍂


फिर अमित की ओर देखते वे बोले : " मैं तो कहता हूँ, अच्छा ही हुआ जो तकलीफ से निजात पा गए। अल्जाइमर रोग बहुत तकलीफदेह होता है, खुद पेशेंट के लिए भी और उसके नाते-रिश्तेदारों के लिए भी। "🍂


" डेथ सर्टिफिकेट पर उनका नाम क्या लिखूँ ? उन्हें चैक करने आता था तो तुम लोगों की देखा-देखी मैं भी उन्हें बाबूजी ही कहता था। गीता के बाबूजी के रूप में ही जानता हूँ मैं इन्हें। " ---डॉक्टर ने आगे कहा।🍂

 

थोड़ी देर के लिए अमित और अदिति सकपकाए से एक दूसरे का मुँह देखने लगे फिर गीता ने चुप्पी तोड़ी और डॉक्टर से बोली : " डॉक्टर साहब, मेरा नाम गीता नहीं, अदिति है। पिछले दस सालों से मैं बाबूजी के लिए गीता बनी हुई थी। "


डॉक्टर : " क्या मतलब ? "🍂


अदिति : " कोई 10 साल पुरानी बात है डॉक्टर साहब, मैं साग-भाजी लेने सब्जी मार्केट गई थी। खरीदारी के बाद जब मार्केट से बाहर आई और किसी खाली रिक्शे की तलाश में इधर-उधर देख रही थी तभी, गीताss गीताss पुकारते एक बुजुर्गवार मेरे करीब पहुँचे और मेरी बाँह पकड़ मुझसे बोले, गीताss, अरे मुझे अपना घर ही नहीं मिल रहा। कब से मैं यहाँ खड़ा हूँ लेकिन किधर जाऊँ कुछ समझ ही नहीं आ रहा। अच्छा हुआ तू आ गई। चल, अब घर चलें। "🍂


" बुजुर्गवार किसी अच्छे घर के लग रहे थे, दिखने में भी और कपड़ों से भी। मेरा हाथ थामे बोलने लगे, गीताsss चल जल्दी। मुझे कबसे भूख लगी है। " 


" मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ ? बुजुर्गवार की स्नेहमयी, मीठी वाणी सुन सोचा कि, उनको घर ले जाती हूँ। कुछ खिलाकर, शांति से उनका एड्रेस पूछती हूँ और फिर उन्हें उनके घर छोड़ आती हूँ। अतः रिक्शे पर हम दोनों घर आए। "🍂


" घर पहुँचते ही, बुजुर्गवार बोलने लगे, गीताsss जल्दी खाना दे, बहुत भूख लगी है। "


" मैंने जल्दी से थाली में उन्हें उपलब्ध भोजन परोसा तो कई दिनों के उपवासे जैसे वे तेजी से खाने लगे। भरपेट भोजन के बाद मैंने उनसे पूछा, बाबूजी आप कहाँ रहते हो ? याद है क्या आपको ? चलो मैं आपको, आपके घर छोड़ आती हूँ। " 


बुजुर्गवार बोले : " अरे गीता, यही तो है अपना घर। "


" मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था। फिर वे बाहर सोफे पर ही सो गए। "🍂


" शाम को अमित के घर आने पर मैंने सारा किस्सा सुनाया। फिर अमित के कहने पर हमने न्यूजपेपर में गुमशुदा वाले पृष्ठ पर और टीवी के गुमशुदा वाले कार्यक्रम के माध्यम से बुजुर्गवार का एड्रेस और नाते-रिश्तेदारों का पता करना प्रारंभ किया। अमित ने पुलिस थाने में भी बुजुर्गवार की जानकारी दी। पुलिस ने कहा, कुछ पता चलने पर खबर करेंगे। तब तक बुजुर्गवार को अपने घर पर रखो या तुम्हें दिक्कत हो तो उन्हें सरकारी वृद्धाश्रम अथवा अस्पताल में दाखिल करवा दो। "🍂

 

" गीता...गीता...पुकारते वे मेरे आगे-पीछे घूमा करते। गीता आज भिंडी की सब्जी बना, आज बेसन के भजिए वाली कढ़ी बना, आज हलवे की इच्छा है, ऐंसी फरमाइशें किया करते। उनकी बातें, उनका अपनापन देख-सुन मेरा मन भर-भर आता। बड़े हक से वे मुझे हर बात कहते जो मुझे भी बहुत भाता। "


" हफ्ता गुजर गया लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला। उनसे कोई हेल्प नहीं मिलती लेकिन घर में रह रहे एक बुजुर्ग का अस्तित्व हमें खूब अच्छा लगने लगा। उनके लिए कुछ करना हमें खूब भाता। "


" मैंने और अमित ने निर्णय लिया कि हम उन्हें कहीं नहीं भेजेंगे, अपने घर पर अपने साथ ही रखेंगे। फिर हमने पुलिस थाने में भी अपने इस निर्णय की सूचना दे दी। बस तभी से बुजुर्गवार हमारे बाबूजी बन गए। "


" दस बरस हो गए मेरा दूसरा नामकरण गीता हुए। आज बाबूजी के साथ गीता का भी अस्तित्व समाप्त हो गया। " ---बोलते हुए अदिति की आँखों से पुनः झर-झर आँसू बहने लगे।

 

🍂अदिति से सारा किस्सा सुन डॉक्टर निशब्द हो गए। थोड़ी देर बाद बोले : " इतने सालों में मुझे जरा भी महसूस नहीं हुआ कि, ये तुम्हारे पिता नहीं बल्कि कोई गैर हैं। सच कहूँ तो अल्जाइमर बड़ा गंभीर रोग है। आजकल वृद्ध लोगों में यह समस्या बढ़ती ही जा रही है। "🍂

" आज के दौर में खुद की औलादें अपने माता-पिता को साथ रखना पसंद नहीं कर रहीं। पैसे-प्रोपर्टी वसूली कर वृद्ध माता-पिता की जवाबदारी से मुँह मोड़ लेने का चलन समाज में बढ़ गया है। दिनोंदिन वृद्धाश्रमों में भीड़ बढ़ती ही जा रही है। लेकिन इसी समाज में आप जैसे लोग भी हैं, यह मेरे लिए बेहद आश्चर्य का विषय है। "🍂


फिर डॉक्टर साहब खामोश हो गए। उन्होंने अमित और अदिति की पीठ पर प्यार और सांत्वना भरी थपकी दी। फिर बाबूजी का डेथ सर्टिफिकेट उन्हें सौंपा और डबडबाई आँखों से घर के मुख्यद्वार की ओर बढ़ गए।।🙏

अहंकार बेमोल / कृष्ण मेहता

 अहंकार की कोई कीमत नहीं है


प्रस्तुति - उषा रानी - राजेंद्र प्रसाद सिन्हा 

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अशोक के जीवनी में मैंने पढ़ा है, गांव में एक भिक्षु आता था। अशोक गया और उस भिक्षु के चरणों में सिर रख दिया। अशोक के बड़े राज्य का जो बड़ा वजीर था, उसे यह अच्छा नहीं लगा। अशोक जैसा सम्राट गांव में भीख मांगते एक भिखारी के पैरों पर सिर रखे, महल लौटते ही उसने कहा कि नहीं सम्राट, यह मुझे ठीक नहीं लगा। आप जैसा सम्राट, जिसकी कीर्ति शायद जगत में कोई सम्राट नहीं छू सकेगा फिर, वह एक साधारण से भिखारी के चरणों पर सिर रखे!


अशोक हंसा और चुप रह गया। दो महीने बीत जाने पर उसने बड़े वजीर को बुलाया और कहा कि एक काम करना है। कुछ प्रयोग करना है, तुम यह सामान ले जाओ और गांव में बेच आओ। सामान बड़ा अजीब था। उसमें बकरी का सिर था, गाय का सिर था, आदमी का सिर था, कई जानवरों के सिर थे और कहा कि जाओ बेच आओ बाजार में।


वह वजीर बेचने गया। गाय का सिर भी बिक गया और घोड़े का सिर भी बिक गया, सब बिक गया, वह आदमी का सिर नहीं बिका। कोई लेने को तैयार नहीं था कि इस गंदगी को कौन लेकर क्या करेगा? इस खोपड़ी को कौन रखेगा? वह वापस लौट आया और कहने लगा कि महाराज! बड़े आश्चर्य की बात है, सब सिर बिक गए हैं, सिर्फ आदमी का सिर नहीं बिक सका। कोई नहीं लेता है।


सम्राट ने कहा कि मुफ्त में दे आओ। वह वजीर वापस गया और कई लोगों के घर गया कि मुफ्त में देते हैं इसे, इसे आप रख लें। उन्होंने कहा पागल हो गए हो! और फिंकवाने की मेहनत कौन करेगा? आप ले जाइए। वह वजीर वापस लौट आया और सम्राट से कहने लगा कि नहीं, कोई मुफ्त में भी नहीं लेता।


अशोक ने कहा कि अब मैं तुमसे यह पूछता हूं कि अगर मैं मर जाऊं और तुम मेरे सिर को बाजार में बेचने जाओ तो कोई फर्क पड़ेगा? वह वजीर थोड़ा डरा और उसने कहा कि मैं कैसे कहूं क्षमा करें तो कहूं। नहीं, आपके सिर को भी कोई नहीं ले सकेगा। मुझे पहली दफा पता चला कि आदमी के सिर की कोई भी कीमत नहीं है।


सम्राट अशोक ने कहा कि फिर इस बिना कीमत के सिर को अगर मैंने एक भिखारी के पैरों में रख दिया था तो क्यों इतने परेशान हो गए थे तुम।


आदमी के सिर की कीमत नहीं, अर्थात आदमी के अहंकार की कोई भी कीमत नहीं है। आदमी का सिर तो एक प्रतीक है आदमी के अहंकार का, ईगो का। और अहंकार की सारी चेष्टा है भीतर लाने की और भीतर कुछ भी नहीं जाता—न धन जाता है, न त्याग जाता है, न ज्ञान जाता है। कुछ भी भीतर नहीं जाता। बाहर से भीतर ले जाने का उपाय नहीं है। बाहर से भीतर ले जाने की सारी चेष्टा खुद की आत्महत्या से ज्यादा नहीं है, क्योंकि जीवन की धारा सदा भीतर से बाहर की ओर है।

बुधवार, 27 जुलाई 2022

प्रसाद की याद कहीं बची है क्या? / आलोक श्रीवास्तव

 


15 नवंबर, 1937 की भोर बनारस के दशाश्वमेध घाट से लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर गोवर्धन सराय में हलकी ठंड में भीगी सी थी. अभी जाड़ा पूरी तरह से आया नहीं था. पर उन दिनों गंगा में पानी की कमी न थी. गंगा की लहरों को छूकर आती हवा सिहरन पैदा करने लगी थी. जयशंकर प्रसाद ने अपने निवास प्रसाद मंदिर में अपनी अंतिम सांस इस भोर ली. पिछले साढ़े नौ महीनों से चल रहा मृत्यु से उनका संग्राम समाप्त हुआ.


प्रसाद को गुजरे 83 साल हो चुके हैं. वे मात्र 47 साल साढ़े नौ माह जिए. उनकी मृत्यु सहसा घटी घटना नहीं थी. उन्हें टीबी हो गया था. वे रोज क्षीण हो रहे थे और रोज मृत्यु कुछ और नजदीक आ रही थी. महीनों तक वे अशक्त मृत्युशैया पर लेटे रहे, धैर्य, विश्वास के संबल के साथ. उन्हें अभी बहुत कुछ लिखना था. हिंदी की दुनिया समझती है कि वे कामायनी, चंद्रगुप्त, कंकाल के रूप में अपना श्रेष्ठ दे चुके थे. यह बिल्कुल सच नहीं है. ये कृतियां निस्संदेह बेशकीमती हैं. परंतु प्रसाद की वृहत लेखन-योजनाएं थीं. भारत के प्राचीन इतिहास पर 11 खंडों की उपन्यास श्रृंखला का इरावती के रूप में वे आरंभ भी कर चुके थे. इंद्र के मिथकीय चरित्र पर वृहत नाटक शुरू ही करने वाले थे. काव्य, कथा, उपन्यास सभी विधाओं में उन्हें अभी विपुल लेखन करना शेष था. पर मृत्यु के पूर्व के नौ महीनों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे अब कुछ नहीं लिख सकेंगे. मृत्यु सुनिश्चित है. टीबी का उन दिनों कारगर इलाज नहीं था. बस उन्हें प्रतीक्षा करनी है. उन्होंने गरिमापूर्वक इस स्थिति को अंतिम दिनों में जिया. उन पर लिखे ढेरों संस्मरणों में उनसे मिलने वाले आत्मीय जनों ने वह छवि सुरक्षित रखी है.


क्या हिंदी ने प्रसाद को उनका वास्तविक दाय दिया? निश्चित रूप से नहीं. ऐसा करके हिंदी के साहित्य की सृजनशीलता ने स्वयं को स्थाई रूप से अशक्त कर लिया, उसने अपने लिए बड़ी रचनाशीलता का मार्ग बंद कर दिया. हिंदी की परंपरा, जो यदि हो सकती थी, तो वह प्रसाद-प्रेमचंद की ही परंपरा थी, न कि केवल प्रेमचंद की परंपरा. इस परंपरा को विभाजित करके सिर्फ प्रेमचंद की पंरपरा के रूप में आगे बढ़ाने का उपक्रम करना और एक नकली-झूठी मध्यमवर्गीय प्रगतिशीलता से उसे मंडित करने का दीन प्रयास करना हिंदी साहित्य के भविष्य को बहुत दूर तक के लिए क्षतिग्रस्त कर गया.


यह कैसी विडंबना है कि अभी परसों ही मुक्तिबोध की जयंती पर भावुकतापूर्ण उदगारों की बाढ़ आई हुई थी. प्रसाद निस्संदेह उनसे न सिर्फ वरिष्ठ थे, बल्कि उनका युगांतरकारी महत्व है, उन्हें ठंडे ढंग से भी याद करते शब्द दुर्लभ हैं. यह ऐसा ही है जैसे अंग्रेजी शेक्सपियर के साथ, रूसी पुश्किन के साथ, अमेरिकी वाल्ट व्हिटमैन के साथ उदासीन हो जाएं. प्रसाद हिंदी के आधुनिक साहित्य का आरंभ हैं, उसकी अस्मिता हैं, उनसे जीवंत सबंध न होने का तात्पर्य जो कुछ इस भाषा के साहित्य विकास के लिए हो सकता था, वह हुआ है.


यदि हिंदी क्षेत्र में कोई नवजागरण होता तो उसके आदिकवि जयशंकर प्रसाद होते. पर हिंदी क्षेत्र में जो हुआ वह साहित्यिक नवजागरण था. भाषा और साहित्य का नवोत्थान. व साहित्य-समाज से बाहर अपना विस्तार न कर सका. वह हिंदी खड़ी बोली साहित्य के विकास का एक गौरवशाली चरण भर बन कर रह गया. प्रसाद उसकी एक उत्तुंग लहर थे.


यह विडंबना है कि उनका काव्य जिस संपदा को अपने भीतर धारण किए हुए है, हिंदी समाज के लिए उसका कुछ अधिक मूल्य नहीं है. ऐसा नहीं कि हिंदी समाज उनको महत्वपूर्ण रचनाकार नहीं मानता, पर उसकी दृश्टि में वे महान कवि होते हुए भी उसके बहुत काम के नहीं हैं - आज भी और विगत में भी. वे उसके काम के तब होते, जब इस समाज को अपने व्यक्ति-मन के पुनर्गठन की, उसके नव-निर्माण की आवश्यकता होती. प्रसाद का साहित्य स्वत्व के रूपांतरण का साहित्य है. वह मैथिलीशरण गुप्त का राष्ट्रीय प्रबोधन या जातीय पुनरुत्थान का साहित्य नहीं है. राष्ट्रीय उदबोधन व जातीय पुनरुत्थान की भावना उसमें एक प्रबल अंतःसलिला की तरह विद्यमान अवश्य है, पर वह भी मन के रूपांतरण को ही संबोधित है - किसी स्थूल अभियान को नहीं. वह निराला की तरह आत्मस्थ साधना-गीत या सहसा व्यवस्था-विरोधी हो उठा क्षुब्ध काव्य भी नहीं है.

प्रसाद का काव्य हिंदी की काव्य-परंपरा में अपवाद था - अपने काव्य-उत्कर्ष के कारण नहीं. इस कारण कि वह जिस भाव-भूमि पर खड़ा था, वह हिंदी की सहज भाव-भूमि नहीं थी. वे व्यक्ति-चेतना के धरातल पर खड़े थे. इसी कारण वे अपने सभी पूर्ववर्तियों व समकालीनों से भिन्न थे. हालांकि पूरी छायावादी काव्य-परंपरा को व्यक्ति-चेतना का काव्य कहा गया. पर इसकी जैसी घनीभूत और प्रामाणिक अभिव्यक्ति प्रसाद के काव्य में हुई थी, वैसी किसी भी अन्य कवि में नहीं.

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...