मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

सुरेश कांत की नजर में व्यंग्य

 दोस्तो, हास्य और व्यंग्य के संबंध में बहुत-से विचार आए। उनमें कुछ व्यवस्थित और मौलिक भी थे, जैसे जयप्रकाश पांडेय जी के विचार। मेरे भी इस संबंध में कुछ विचार हैं, जिनसे आपका सहमत होना बिलकुल भी आवश्यक नहीं है। मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि फेसबुक पर आते ही मेरे विचारों को व्यंग्यकार विभिन्न मंचों पर अपने विचारों के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं। इससे मुझे अपने विचारों के सही होने की पुष्टि मिलती है।   

बहरहाल, अपने विचार प्रस्तुत करने से पहले मैं उनकी पूर्वपीठिका या नींव के रूप में कुछ बिंदु प्रस्तुत करूँगा।

1. हास्य व्यंग्य का सहोदर है। ‘सहोदर’ का मतलब ‘भाई’ होता है, लेकिन सिर्फ ‘भाई’ नहीं होता, बल्कि एक ही माता के उदर को साझा करने वाला (सह+उदर) ‘सगा भाई’ होता है। इसीलिए दोनों में कुछ साम्य मिलते हैं, जिनसे भ्रमित होकर कुछ लोग दोनों को एक ही समझने तक की गलती कर बैठते हैं। आखिर, जुड़वाँ न होने पर भी भाइयों की शक्ल आपस में काफी मिलती-जुलती है। एक माँ की संतान जो ठहरे!   

2. हास्य व्यंग्य का सगा भाई ही नहीं है, बल्कि उसका ‘अग्रज’ भी है, इसलिए वह व्यंग्य पर अकसर हावी होने, उस पर अपना अधिकार जमाने की कोशिश करता है।

3. हास्य का कोई उद्देश्य नहीं होता, सिवा हँसाने के सिवा, लेकिन ‘हँसाना’ उद्देश्य न होकर हास्य का गुण या धर्म होता है। अब (भारत में) यदि किसी की नाक पकौड़े जैसी है, तो हास्य को उसी में हँसाने के लिए बहुत-कुछ मिल जाता है, जबकि इसमें उस व्यक्ति-विशेष का कोई ‘दोष’ नहीं होता। जायसी के संबंध में एक जनश्रुति है। वही जायसी, जिनकी काव्य-कला के पीछे रामचंद्र शुक्ल ने कबीर तक को ‘डंप’ कर दिया था। कहते हैं कि वे जायसी कुछ कुरूप थे। एक बार वे शेरशाह के दरबार में गए। शेरशाह उनके ‘भद्दे’ चेहरे को देखकर हँस पड़ा। यह हास्य था, जो जायसी के चेहरे की कुरूपता ने उपजाया था। जायसी ने अत्यंत शांत स्वर में बादशाह से पूछा, ‘मोहि का हँसेसि कै कोहरहिं?’ यानी तू मुझ पर हँस रहा है या उस कुम्हार पर, जिसने मुझे गढ़ा है? यह व्यंग्य था, जिसका परिणाम यह निकला कि बादशाह बहुत लज्जित हुआ और उसने क्षमा माँगी। जमाने-जमाने की बात है! ऐसा ही प्रसंग अष्टावक्र ऋषि के संबंध में भी मिलता है।

4. व्यंग्य का एक स्पष्ट उद्देश्य होता है और वह है असंगति, विसंगति, अन्याय, अत्याचार आदि के खिलाफ आवाज उठाना, कमजोर की आवाज बनना (न कि उसकी गलतियाँ निकालने का परिश्रम करके कथित रूप से ‘तटस्थ’ बनने की कोशिश करना)।

5. स्तरीय हास्य रचना कोई आसान काम नहीं है, समस्या सिर्फ यह है कि वह अधिक देर तक स्तरीय रह नहीं पाता, ‘निरुद्देश्य’ होने के कारण बड़ी जल्दी ट्रैक से उतर जाता है, फूहड़ हो जाता है। व्यंग्य के साथ आने पर वह उसे भी अपनी संगति से प्रभावित करने की कोशिश करता है। इसीलिए व्यंग्य में हास्य से परहेज रखने की बात की जाती है।

इन बिंदुओं से आप हास्य और व्यंग्य का अंतर समझ गए हॉगे।

अब सवाल यह उठता है कि व्यंग्यकार हास्य और व्यंग्य को लेकर खेमे में क्यों बँट जाते हैं। मेरा विचार है ऐसा केवल वही व्यंग्यकार करता है, जो असल में व्यंग्यकार नहीं है, पर जो किसी तरह, या जिसने किसी तरह, अपने को व्यंग्यकार ‘मनवा’ लिया है। वरना ये दोनों अलग-अलग विधाएँ हैं, जिन्हें अपने-अपने सामर्थ्य और रुचि के अनुसार अलग-अलग लोग लिखते हैं। 

लेकिन चूँकि ये सहोदर हैं, इसलिए दोनों अनायास ही एक-दूसरे को ओवरलैप करते हैं। यहीं व्यंग्यकार को सजग रहना पड़ता है, क्योंकि हास्य के साथ आकर व्यंग्य तो उसकी गुणवत्ता बढ़ा देता है, किंतु व्यंग्य के साथ आकर हास्य उसकी गुणवत्ता घटा सकता है, और घटा सकता क्या, घटा ही देता है।

शुद्ध हास्य पढ़कर आपका मनोरंजन तो हो सकता है, किंतु अंत में ’तो क्या?’, ‘मिला क्या?’ जैसे प्रश्न खड़े हो जाते हैं, जबकि व्यंग्य पढ़कर आदमी का मनोरंजन भले हो, पर उसमें स्थितियों के प्रति आक्रोश, असहमति और सक्रियता भी उत्पन्न होती है।

ध्यान रहे, व्यंग्य साहित्य है और सरस होना साहित्य का अनिवार्य गुण-धर्म है—रसो वै स:! व्यंग्य में र्स नहीं होगा, तो उसे साहित्य से खारिज कर दिया जाएगा। लेकिन वह ‘रस’ फूहड़ता से नहीं आता. व्यंग्य अपना रस स्वयं उत्पन्न करता है। वह हास्य जैसा लग सकता है, पर होता नहीं है।  

रही बात यह कि व्यंग्य में हास्य और हास्य में व्यंग्य होना चाहिए या नहीं, या होंना चाहिए तो कितना? तो यह व्यंग्यकार नहीं, रचना तय करती है। जब रचना यह तय करती है, रचनाकार नहीं, और रचनाकार रचना को ऐसा करने देता है, उसमें बाधा नहीं डालता, रेलगाड़ी के ड्राइवर की तरह केवल जरूरत पड़ने पर ही हस्तक्षेप करता है, तो व्यंग्य में हास्य और हास्य में व्यंग्य बिलकुल सही मात्रा में आता है, अन्यथा रचनाकार द्वारा जबरन ‘घुसेड़ा’ गया हास्य व्यंग्य की गरिमा नष्ट करने में देर नहीं लगाता।

यह भी गौरतलब है कि व्यंग्य में जो हास्य आता है, वह हूबहू वैसा ही हास्य नहीं होता, जैसा वह शुद्ध हास्य में होता है। मेरे विचार से उसे हास्य कहा भी नहीं जाना चाहिए।    

बहुत कम प्रतिभाएँ हास्य से व्यंग्य उत्पन्न कर पाती हैं। रवींद्रनाथ त्यागी शायद इसके अकेले उदाहरण हैं।

बातें बहुत-सी हैं, लेकिन समय हो रहा है, और मेरी तबीयत भी ठीक नहीं है, इसलिए फिलहाल इतना ही।

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