शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

पहले सी बात नहीं / महाकवि अज्ञात

जाने क्यूँ,*

*अब शर्म से,*

*चेहरे गुलाब नहीं होते।*


*जाने क्यूँ*,

*अब मस्त मौला *मिजाज नहीं होते।*


*पहले बता दिया करते थे*, 

*दिल की बातें*,


*जाने क्यूँ,अब चेहरे,*

*खुली किताब नहीं होते।*


*सुना है,बिन कहे,*

*दिल की बात, समझ लेते थे*


*गले लगते ही,*

*दोस्त,*

*हालात समझ लेते थे।*


*तब ना फेस बुक था,*

*ना स्मार्ट फ़ोन*,

*ना ट्विटर अकाउंट,*


*एक चिट्टी से ही,*

*दिलों के जज्बात, समझ लेते थे।*


*सोचता हूँ,*

*हम कहाँ से कहाँ* 

*आ गए,*


*व्यावहारिकता सोचते सोचते,*

*भावनाओं को खा गये।*


*अब भाई भाई से*,

*समस्या का *समाधान,कहाँ पूछता है,*


*अब बेटा बाप से,*

*उलझनों का निदान,*

*कहाँ पूछता है*


*बेटी नहीं पूछती,*

*माँ से गृहस्थी के सलीके,*


*अब कौन गुरु के*,

*चरणों में बैठकर*,

*ज्ञान की परिभाषा सीखता है।*


*परियों की बातें,*

*अब किसे भाती है,*


*अपनों की याद*,

*अब किसे रुलाती है,*


*अब कौन,*

*गरीब को सखा बताता है,*


*अब कहाँ,*

*कृष्ण सुदामा को गले लगाता है*


*जिन्दगी में,*

*हम केवल *व्यावहारिक हो गये हैं,*

*मशीन बन गए हैं हम सब,*

 

*इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!....*

            🙏 😊😊😊

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