मंगलवार, 18 मई 2021

नीम बरगढ़ संवाद / बीना शर्मा

 सड़क विस्तार के लिए


प्रस्तुति -  बीना शर्मा

सारे पेड़ों के कटने के बाद 

बस बचे हैं एक नीम और बरगद 

जो अस्सी साल के साथ में 

शोकाकुल हैं पहली बार



नीम बोला 

परसों जब हरसिंगार कटा था 

तो बहुत रोया बेचारा 

सारे पक्षियों ने भी शोर मचाया 

गिरगिट ने रंग बदले  

गिलहरयां फुदकी 

मगर कुल्हाड़ी नहीं पसीजी 

और फिर वो मेरे से दो पौधे छोड़कर 

जब शीशम कटा ना 

तो लगा कि मैं भी रो दूँगा 

चिड़िया के घौसलो से अंडे गिर गए

गिलहरियों को तो मैंने जगह दे दी 

मगर तोते के बच्चे कोटर से गिरते ही मर गए


बरगद कराहा 

वो मेरे पास में आम, गुंजन और महुआ थे ना 

बेचारे गिड़गिड़ाए कि

हमारी सड़क वाली तरफ की टहनियां काट दो 

सारे पक्षियों ने भी 

चीं-चीं कर गोल-गोल चक्कर काटकर गुज़ारिश की 

कि मत छीनो हमारा घर 

पर पता नहीं ये आदमलोग 

कौनसी ज़बान समझते हैं 

धड़ाम करके कटकर ये नीचे गिरे 

तो ज़मीन कंपकंपाई 

मानो अपनी छाती पीट रही हो 


नीम और बरगद बोले आपस में 

ख़ैर जो हुआ सो हुआ 

अब हम दोनों ही सम्भालेंगे 

पक्षियों से लेकर 

छाया में रूकने वालों को 


अचानक बरगद बोला 

ये लकड़हारे फिर लौट आए 

कहीं हमें तो नहीं काटेंगे

कहकर बरगद ने जोर से झुरझरी ली 

नीम ने भरोसा दिलाया 

अरे, ऐसे ही आए होंगे 

सड़क तो बन गई है ना 

अब भला क्यों काटेंगे हमें


थोड़ी देर में निशान लगने लगते हैं 

आदमलोग कह रहे हैं 

कि बसस्टॉप के लिए यही सबसे सही जगह हैं 

इन दोनों को काट देते हैं 

छोटा-सा शेड लग जाएगा 

लिख देंगे प्रार्थना बस-स्टैंड 


नीम चिल्लाया 

अरे, मत काटो 

हमारी छाया में बेंच लगा दो 

हवा दे देंगे हम टहनियां हिलाकर 

निम्बोली भी मिलेगी 

और अच्छा लगेगा पक्षियों को देखकर 


बरगद ने हामी भरी 

सारे पक्षी आशंकित से नीचे ताकने लगे 

आर्तनाद बेकार गया 

पहले नीम की बारी आई

आँख में आँसू भर नीम ने टहनियाँ हिलाई

बरगद ने थामा क्षण भर नीम को 

गलबहियाँ डाली दोनों ने 

और धड़ाम से ख़त्म हो गया एक संसार 

अब बरगद देख रहा है 

उन्हें अपने पास आते 

सिकुड़ता है 

टहनियां हिलाता है 

कातर नज़रों से ताकता है इधर-उधर 

पक्षी बोलते-डोलते हैं 

मगर नाशुक्रे आरी रखते हैं 

और फिर सब ख़त्म 


ये नीम और बरगद का क़त्ल नहीं है 

एक दुनिया का उजड़ना है 

बेज़ुबान जब मरते हैं 

तो बदले में 

बहुत कुछ दफ़न हो जाता है 


सुनो , कर्मफ़ल यहीं भुगतने पड़ते हैं

  आज सब ऑक्सीजन को तरसते हैं।


  ll    प्रस्तुति - बीना शर्मा  ll 


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बुधवार, 12 मई 2021

सुंदत कांड के लाभ

 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺



सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक 10 फायदे*




महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण पर आधारित तुलसीकृत महाकाव्य रामचरित मानस का पंचम सोपान है सुंदरकाण्ड। सुंदरकाण्ड में रामदूत, पवनपुत्र हनुमान का यशोगान किया गया है। आओ जानते हैं सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक लाभ।


 


1. सुंदरकाण्ड का पाठ सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। किसी भी प्रकार की परेशानी या संकट हो, सुंदरकाण्ड के पाठ से यह संकट तुरंत ही दूर हो जाता है।


 


2. सुंदरकांड के पाठ से भूत, पिशाच, यमराज, शनि राहु, केतु, ग्रह-नक्षत्र आदि सभी का भय दूर हो जाता है।


 


3. हनुमानजी के सुंदर काण्ड का पाठ सप्ताह में एक बार जरूर करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र, ज्योतिष के अनुसार भी विषम परिस्थितियों सुंदरकांड पाठ करने की सलाह दी जाती है।


4. जीवन में किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है तो आप संकल्प लेकर लगातार सुंदरकांड का पाठ करें। सुंदरकांड पाठ से एक नहीं बल्कि अनेक सैकड़ों समस्याओं का समाधान तुरंत मिलने लगता है।


 


5. श्रीराम चरित्र मानस को रचने वाले गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार हनुमान जी को जल्द प्रसन्न

करने के लिए सुंदरकांड का पाठ 1 रामबाण उपाय है सुंदरकांड पाठ करने वालों के जीवन में खुशियों का संसार होता है और आपका जीवन सुखमय होता है।


6. सुंदरकांड करने वाले व्यक्ति के अंदर सकारात्मक और विचारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। वह व्यक्ति किसी भी कार्य में अपनी रुचि दिखाता है तो उसमें सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।


 


7. सुंदरकाण्ड का पाठ करने से व्यक्ति के मन से भय जाता रहता है और आत्मविश्वास एवं इच्छाशक्ति प्रबल हो जाती है।


 


8. साप्ताहिक पाठ करने से गृहकलेश दूर होता है और परिवार में खुशियां बढ़ती हैं।


 


9. नियमित पाठ करने से कर्ज और रोग से छुटकारा मिलता है।


 


10. हनुमानजी की भक्ति करने और नियमित सुंदरकाण्ड का पाठ करने से व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफलता से आगे बढ़ता है।🌺🌺🌺🌺🌺सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक 10 फायदे*




महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण पर आधारित तुलसीकृत महाकाव्य रामचरित मानस का पंचम सोपान है सुंदरकाण्ड। सुंदरकाण्ड में रामदूत, पवनपुत्र हनुमान का यशोगान किया गया है। आओ जानते हैं सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक लाभ।


 


1. सुंदरकाण्ड का पाठ सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। किसी भी प्रकार की परेशानी या संकट हो, सुंदरकाण्ड के पाठ से यह संकट तुरंत ही दूर हो जाता है।


 


2. सुंदरकांड के पाठ से भूत, पिशाच, यमराज, शनि राहु, केतु, ग्रह-नक्षत्र आदि सभी का भय दूर हो जाता है।


 


3. हनुमानजी के सुंदर काण्ड का पाठ सप्ताह में एक बार जरूर करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र, ज्योतिष के अनुसार भी विषम परिस्थितियों सुंदरकांड पाठ करने की सलाह दी जाती है।


4. जीवन में किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है तो आप संकल्प लेकर लगातार सुंदरकांड का पाठ करें। सुंदरकांड पाठ से एक नहीं बल्कि अनेक सैकड़ों समस्याओं का समाधान तुरंत मिलने लगता है।


 


5. श्रीराम चरित्र मानस को रचने वाले गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार हनुमान जी को जल्द प्रसन्न

करने के लिए सुंदरकांड का पाठ 1 रामबाण उपाय है सुंदरकांड पाठ करने वालों के जीवन में खुशियों का संसार होता है और आपका जीवन सुखमय होता है।


6. सुंदरकांड करने वाले व्यक्ति के अंदर सकारात्मक और विचारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। वह व्यक्ति किसी भी कार्य में अपनी रुचि दिखाता है तो उसमें सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।


 


7. सुंदरकाण्ड का पाठ करने से व्यक्ति के मन से भय जाता रहता है और आत्मविश्वास एवं इच्छाशक्ति प्रबल हो जाती है।


 


8. साप्ताहिक पाठ करने से गृहकलेश दूर होता है और परिवार में खुशियां बढ़ती हैं।


 


9. नियमित पाठ करने से कर्ज और रोग से छुटकारा मिलता है।


 


10. हनुमानजी की भक्ति करने और नियमित सुंदरकाण्ड का पाठ करने से व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफलता से आगे बढ़ता है।

मंगलवार, 11 मई 2021

ख़ुशी की तलाश

 *मुस्कुराइए* / मनोज कुमार


एक औरत बहुत महँगे कपड़े में अपने मनोचिकित्सक के पास गई और बोली

"डॉ साहब ! मुझे लगता है कि मेरा पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। क्या आप मेरी खुशियाँ ढूँढने में मदद करेंगें?"

मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं इस बूढी औरत से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"

तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।"

मैं स्वयं के जीवन को समाप्त करने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन,एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।"

"उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई। तब मैंने सोचा यदि इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करने से मुझे ख़ुशी मिल सकती है,तो हो सकता है कि दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था,के लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।"

"हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी।"

"आज,मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।"

यह सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी।

लेकिन उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।

मित्रों! हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।

तो आईये आज शुभारम्भ करें इस संकल्प के साथ कि आज हम भी किसी न किसी की खुशी का कारण बनें।

*मुस्कुराइए*

अगर आप एक अध्यापक हैं और जब आप मुस्कुराते हुए कक्षा में प्रवेश करेंगे तो देखिये सारे बच्चों के चेहरों पर मुस्कान छा जाएगी।

*मुस्कुराइए*

अगर आप डॉक्टर हैं और मुस्कराते हुए मरीज का इलाज करेंगे तो मरीज का आत्मविश्वास दोगुना हो जायेगा।

*मुस्कुराइए*

अगर आप एक ग्रहणी है तो मुस्कुराते हुए घर का हर काम किजिये फिर देखना पूरे परिवार में खुशियों का माहौल बन जायेगा।

*मुस्कुराइए* 

अगर आप घर के मुखिया है तो मुस्कुराते हुए शाम को घर में घुसेंगे तो देखना पूरे परिवार में खुशियों का माहौल बन जायेगा।

*मुस्कुराइए*

अगर आप एक बिजनेसमैन हैं और आप खुश होकर कंपनी में घुसते हैं तो देखिये सारे कर्मचारियों के मन का प्रेशर कम हो जायेगा और माहौल खुशनुमा हो जायेगा।

*मुस्कुराइए*

अगर आप दुकानदार हैं और मुस्कुराकर अपने ग्राहक का सम्मान करेंगे तो ग्राहक खुश होकर आपकी दुकान से ही सामान लेगा।

*मुस्कुराइए*

कभी सड़क पर चलते हुए अनजान आदमी को देखकर मुस्कुराएं, देखिये उसके चेहरे पर भी मुस्कान आ जाएगी।

*मुस्कुराइए*

क्यूंकि मुस्कराहट के पैसे नहीं लगते ये तो ख़ुशी और संपन्नता की पहचान है।

*मुस्कुराइए*

क्यूंकि आपकी मुस्कराहट कई चेहरों पर मुस्कान लाएगी।

*मुस्कुराइए*

क्यूंकि ये जीवन आपको दोबारा नहीं मिलेगा।

*मुस्कुराइए*

क्योंकि क्रोध में दिया गया आशीर्वाद भी बुरा लगता है और मुस्कुराकर कहे गए बुरे शब्द भी अच्छे लगते हैं।

*मुस्कुराइए*

क्योंकि दुनिया का हर आदमी खिले फूलों और खिले चेहरों को पसंद करता है।

*मुस्कुराइए*

क्योंकि आपकी हँसी किसी की ख़ुशी का कारण बन सकती है।

*मुस्कुराइए*

क्योंकि परिवार में रिश्ते तभी तक कायम रह पाते हैं जब तक हम एक दूसरे को देख कर मुस्कुराते रहते है

और सबसे बड़ी बात

*मुस्कुराइए*

😊 क्योंकि यह मनुष्य होने की पहचान है। एक पशु कभी भी मुस्कुरा नही सकता।

इसलिए स्वयं भी मुस्कुराए और औराें के चहरे पर भी मुस्कुराहट लाएं.

*मुस्कुराइए क्योंकि यही जीवन है*

चिट्ठियाँ...! / मनोहर बिल्लोरे

 चिट्ठियाँ...! / मनोहर बिल्लोरे 

------------- 


चिट्ठियाँ लिखना-पढ़ना अब,  

भूल गये  बहुत सारे लोग 

पढ़ने-लिखने वालों की संख्या में 

जबकि, हुआ है बेतहाशा इज़ाफा 


सिर झुकाये तरह-तरह के कामों में 

दिन भर डूबे रहने वाले व्यस्त-पस्त, 

सनकी-सिरफिरे-से वे डाक-बाबू, 

अब नहीं रहे...  सनसनी सी फैलाती,

प्रतीक्षा की बेचैनी वह –

बनी रहती थी जो – कहाँ बची अब 

पाई-पठाई, लिखीं-पढ़ीं जातीं और 

घर-घर में, चर्चा में रहती थीं, 

जब – चिट्ठियाँ...!


जो पढ़ा-लिखा नहीं था  वह भी 

दूसरों से पढ़वा-लिखवा लेता था 

अपने दुख-दर्द, भाव-अभाव, 

हर्षोल्लास, अपनी आशा-निराशाएँ, 

चिंताएँ, दिल्लगी, हास-परिहास, 

ठिठोली, प्रेम-तरंगें, आलिंगन, 

और ज्वार--भाटे सब समां जाते 

इन दो पैसों की चिट्ठियों में…


अनपढ़ डाकिया भी -  

दूसरों से पढ़वा कर पते - 

बाँट देता था  घर-घर में  

तय समय पर  सही जगह    

सही-सही डाक...  


अब तो इस समय -  

पुश किये जाते हैं चट-पट-पट… 

मनचाहे नंबर और कर ली जाती 

बातें, झट-पट जी भर-भर… चाहें जब,  

जहाँ चाहें और हो इच्छा तो 

चेहरे पर चमकने वाले हाव-भाव भी 

देख सकते हैं  आमने-सामने


अंतर्जाल के ज़रिये, 

रेडियो-तरंगों पर सवार कर मनचाही 

किसी वाल पर, पुश या एक क्लिक में 

पहुँचा दिये जाते, संदेश–निर्देश 

कभी भी, कहीं से कहीं तक भी...


झूठ बोलना  बहलाना - टरकाना –

प्रसंगों से भटका देना, हो गया अब  

और भी आसान, बच्चे भी सीख रहे 

पूरे मनोयोग से अब यह गुर-कौशल...   


जानकारियाँ ज्यों भरी जा रहीं 

ज़ेहनों में, बहुत सारी,  बहुत भारी; 

पर - ज्ञान है कि होता जा रहा 

और-और कम... और ‘सच्चाई’ है –

कि डरी-दुबकी, सिकुड़ती-सिमटती

दिखाई देती – जगह-जगह...


एक समय था वह भी, कि जब

पहुँचते ही किसी घर में ‘तार’ – 

कुछ देर के लिये ही सही 

सनसनी-सी फैल जाती थी...  

अड़ोस-पड़ोस से मुहल्ले, गाँव, 

कस्बे के कौने-कौने तक तुरत-फुरत,  

कानों कान, कि फलाँ घर में – 

आया है ‘तार’,  बच्चे तक 

कर लेते खड़े अपने कान 

कि क्या हुआ…?


सनाके में सुनते लोग, कि 

घट गया हो जैसे उस घर में 

कोई दुर्घट, शंकाओं-कु-शंकाओं का 

हो जाता बाज़ार गर्म – भावों में 

आ जाता उछाल, मानते थे लोग,

कि - ‘कुशल और खुश’ लोग 

‘तार’ नहीं दिया करते…


प्रियों-प्रेमियों, साथियों-संबंधियों की  

पढ़ी जातीं चिट्ठियाँ घर-घर में 

भरपूर आत्मीयता के साथ  

बार-बार, लिखे हुए में ख़ोज़ा-

ढूढ़ा जाता कुछ और भी, 

संकेतों-कूटों की टटोली जातीं 

ज़ेबें, पकड़ी जाती नब्ज़ें... 


और फिर, रख दिया जाता उन्हें–

पुराने यादगार सामानों सा सहेज कर 

एहतियात के साथ, बक्सों में 

पिटारा खुलने पर और 

हाथ लगने पर जब कभी, 

प्यार से  सहलाया जाता उन्हें 

स्मृतियों में डूब कर देर तक…  


कम ही सही पर बचे हैं दीवाने...  

अब भी, लिखते-पढ़ते रहते हैं जो 

गंभीर गहन-संलग्न-तन्मयता और पूरे 

जोश-ओ-जुनून के साथ बदस्तूर, विविध 

आकार रंग, गंध स्वाद, ध्वनि और 

स्पर्श में रची-बसी चिट्ठियाँ...


अगली सदी के पुरातत्व-संग्रहालयों में 

भोज-पत्रों की तरह पीले-मटमैले 

हो गये काग़जों पर लिखी, 

सहेज कर रखी देखी-परखी जायेंगी 

क्या किसी दिन, बीत चुकी संस्कृति सी 

हमारी विरासत हस्तलिखित चिट्ठियाँ...?


चिट्ठियाँ लिखना-पढ़ना अब,  

भूल गये  बहुत सारे लोग 

पढ़ने-लिखने वालों की संख्या में

जबकि, हुआ है बेतहाशा इज़ाफा...

*

जय महावीर ज्ञान गुण सागर / कृष्ण मेहता

 *हनुमानजी के जीवन में ज्ञान, कर्म* *और भक्ति की समग्रता विद्यमान है।*

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      रामराज स्थापना पश्चात श्री हनुमानजी को वापस भेजने की आवश्यकता भगवान् राम नहीं समझते हैं। उनके संदर्भ में प्रभु दूसरी बात सोचते हैं। *कई लोग ऐसे होते हैं कि जिनमें सामीप्य के कारण रस का अभाव हो जाता है। अधिक पास रहने से उन्हें बहुत लाभ नहीं होता। क्योंकि पास रहने से लाभ उठाने वाले मैंने बिरले ही व्यक्ति देखे हैं, बहुधा हानि उठाने वाले ही अधिक देखे हैं। लोग बहुधा आश्चर्य करते हैं कि बड़े-बड़े महात्माओं के अत्यन्त पास रहने वाले व्यक्तियों का स्वभाव बड़ा विचित्र होता है। बड़े-बड़े तीर्थों में रहने वाले व्यक्तियों का आचरण तीर्थ के आदर्श से बिल्कुल भिन्न होता है। इसका रहस्य यही है कि जैसे कोई व्यक्ति प्रतिदिन किसी एक ही वस्तु का भोजन करे तो धीरे-धीरे उसे उस वस्तु का स्वाद आना बन्द हो जाता है। इसी प्रकार से कोई व्यक्ति अगर बहुत लम्बे समय तक किसी महापुरुष के साथ रहे अथवा किसी तीर्थ में रहे तो वह उससे प्रेरणा ग्रहण नहीं कर पाता। और जो थोड़े समय के लिए जाते हैं वे नई प्रेरणा ग्रहण करके लौटते हैं। निरन्तर समीप बने रहने वालों में रस की यह भावना समाप्त होकर सांसारिक वृत्ति जागृत होते देखी गई है। जिससे कि वे बदलकर सांसारिक दिखाई देने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति अधिक पास न रहकर थोड़ा दूर बने रहकर अगर पास आने की चेष्टा करें तभी उनका कल्याण होगा।* 

      पर श्री हनुमानजी के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। हनुमानजी चाहे दूर रहें, चाहे पास रहें, वे तो सदैव *राम-रस* में ही निमग्न रहते हैं। श्री हनुमानजी के जीवन में ज्ञान, कर्म और भक्ति की समग्रता विद्यमान है ; वे तो --

    *अतुलितबलधाम हेमशैलाभदेहं*

    *दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम।*

    *सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं*

    *रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।*

                         -- सुन्दरकाण्ड, वन्दना

-- महान ज्ञानी, महान कर्मयोगी तथा महान भक्त हैं । हनुमानजी के चरित्र में शरीर का भी सर्वोच्च सदुपयोग है, भावना का भी सर्वश्रेष्ठ उपयोग है और विवेक का भी उत्कृष्ट प्रयोग है । रामायण में भगवान् श्री राघवेन्द्र उनके इन तीनों योगों का सदुपयोग करते हैं। उनके विचार का सदुपयोग करते हैं, उनकी भावना का सदुपयोग करते हैं तथा उनके शरीर के द्वारा भी निरन्तर उनसे सेवा लेते हैं।

         ☯️ जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

रविवार, 9 मई 2021

मेरी प्यारी दोनों माताएं/ विजय केसरी

 "मातृ दिवस' पर गुरुदेव भारत यायावर  की 'मां' शीर्षक  कविता पढ़ कर अपनी दोनों माताएं याद आ गईं। अब दोनों माताएं स शरीर इस दुनिया में नहीं हैं। फिर भी हम सभी भाई-बहन उनके होने का एहसास हमेशा महसूस करते हैं। जब भी हम सब भाई बहन किसी मुसीबत में होते हैं , तो हमारी दोनों माताएं पीठ पीछे खड़ी होती है।

गुरुदेव की कविता की पंक्तियां मन को छूती है। उनकी कविता पढ़ने के बाद कुछ पंक्तियां दोनों माताओं के श्री चरणों में अर्पित है।


मेरी प्यारी दोनों  माताएंv


यह ईश्वर की कृपा है,

मुझे एक नहीं,

दो - दो माताओं का,

प्यार मिला।


सर आप ट्यूशन पढ़ाने,

हमारे घर आते थे,

दोनों माताओं से मिलते थे,

मेरी दोनों  माताओं का स्नेह प्राप्त करते थे।


एक मां ने मुझे जन्म दिया,

दूसरी मां ने लालन-पालन किया,

दोनों माताओं की कृपा सदा,

मुझ पर बनी रही।


सिर्फ मुझ पर ही नहीं,

बल्कि सभी भाई - बहनों पर,

दोनों माताओं की कृपा,

सदा समान बनी रही।


समय के साथ दिन बीतते गए,

हम बच्चे बड़े होते गए,

दोनों माताओं की उम्र बढ़ती गई,

मां - मां बनती गई ।


दोनों माताओं के आंचल में,

हम बच्चे बसते  गए,

जरा सी नजरों से दूर होते,

माताएं ढूंढने निकल पड़तीं।


घर पर नहीं मिलने पर,

बाहर  मंदिर की ओर चल पड़ती,

मंदिर के बगीचा में हम बच्चों को देख,

नजदीक आकर कलेजे से लगा लेती।


कहती, बेटे! तुम कहां चले जाते हो,

कितना घबरा जाती हूं,

इस तरह मां को तंग नहीं करते,

तुम बच्चों में दोनों माताएं बसती हैं।


हम बच्चों को जरा सा बुखार लगने पर,

दोनों माताएं तुरंत सब काम छोड़ कर,

डॉक्टर के पास ले जाती,

स्वस्थ होने तक बिल्कुल पास रहतीं। 


माताएं  तनिक भी चीजों की,

कोई कमी नहीं होने देती,

खुद एक सब्जी कम खाती,

बच्चों की थाली में सब्जी कम ना होने देती।


हम बच्चों के पग - पग पर साथ रहती,

इस बात पर ज्यादा ध्यान देती,

बच्चे हर रोग दुख से दूर रहें,

सदा निरोग और स्वस्थ रहें।


हम बच्चों को बुरी नजरों से बचाती,

सबके सामने नहीं लाती,

हम बच्चे दीर्घायु बने,

जितिया का उपवास सहती।


हम बच्चों की मंगल कामना के लिए,

ना जाने कितने पर्व त्यौहार करती,

और ना जाने कितने देवी - देवता,

मजार में दीप जलाती।


यह सब करते करते,

दोनों माताओं की उम्र बढ़ती गई,

माताएं  बूढ़ी होती गईं,

लेकिन उन दोनों के आशीष कम नहीं होते।


एक दिन, एक - एक करके,

दोनों माताएं  हम बच्चों से विदा होती गईं,

आज दोनों माताएं  हम बच्चों के संग नहीं है,

लेकिन हर बच्चों के दिल में बसती हैं।


अभी भी सपने में हम बच्चों के पास आती है,

समझाती  और बुझाती हैं,

तुम लोग ऐसे रहो,

वैसे रहो ।


तुम लोगों ने अब तक,

फलना पूजा नहीं किए हो,

जल्दी  पूजा करो,

रूष्ट देवता को मनाओ।


हम सबों से दूर रहकर भी,

हमेशा हे पास रहती,

माताओं के मरने के बाद भी,

उन दोनों की छत्रछाया बनी रहती।


जब भी उदास होता हूं,

एकाएक दोनों माताओं के चेहरे,

मन - मस्तिष्क में आ जाते हैं,

उदासी क्षण में दूर हो जाती है।


माताएं रोज घर आतीं हैं,

हम बच्चों को हंसता खेलता देख,

स्वर्ग लोक का सब सुख भूल जाती,

बच्चों में ही माताएं सब सुख पती हैं।


बच्चों के घबराने पर माताएं कहती हैं,

बेटे !   तुम क्यों घबराते हो,

तुम बच्चों पर हम माताओं की कृपा है,

तुम सबों का बाल बांका भी कभी ना होगा।


 हम माताएं  तुम्हारे साथ हैं,

 तुम सबों का  भला ही होगा ,

 तुम लोगों ने किसी का बुरा नहीं किया है,

 तुम्हारा भी बुरा नहीं होगा।

 

माताएं आज भी जब ईश्वर से दुआ करती हैं,

बच्चे ही उनकी दुआओं में होती हैं,

माताएं जब जीवित थीं,

आज भी उनकी दुआओं में बच्चे ही होते हैं।


माताओं की  मंगल कामना बच्चों से शुरू होती हैं,

बच्चों में ही पूरी होती हैं,

आज जब माताएं नहीं है,

उनकी मंगल कामना मिलती रहती हैं।


मां - मां होती हैं,

मां का स्थान कोई रिश्ता ले नहीं सकता,

मां के आशीष के बिना,

कोई भी बेटा कामयाब नहीं हो सकता।


मां करुणा के सागर होती हैं,

मां दया के सागर होती है,

मां ममता की सागर होती है,

मां बस मां होती है।


आज दोनों माताएं साथ नहीं  है,

फिर भी माताएं दिल में बसती हैं,

हर मुसीबत की घड़ी में,

पीछे दोनों माताएं खड़ी होती है।


विजय केसरी ,

(कथाकार / स्तंभकार) ,

पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301,

 मोबाइल नंबर - 92347 99550,

सलाह नहीं साथ चाहिए

 *प्रेरक कहानी*

       एक बार एक पक्षी समुंदर में से चोंच से पानी बाहर निकाल रहा था। दूसरे ने पूछा भाई ये क्या कर रहा है। पहला बोला समुंदर ने मेरे बच्चे डूबा दिए है अब तो इसे सूखा कर ही रहूँगा। यह सुन दूसरा बोला भाई तेरे से क्या समुंदर सूखेगा। तू छोटा सा और समुंदर इतना विशाल। तेरा पूरा जीवन लग जायेगा। पहला बोला *देना है तो साथ दे*। सिर्फ़ *सलाह नहीं चाहिए*। यह सुन दूसरा पक्षी भी साथ लग लिया। ऐसे हज़ारों पक्षी आते गए और दूसरे को कहते गए *सलाह नहीं साथ चाहिए*। यह देख भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी भी इस काम के लिए जाने लगे। भगवान बोले तू कहा जा रहा है तू गया तो मेरा काम रुक जाएगा। तुम पक्षियों से समुंदर सूखना भी नहीं है। गरुड़ बोला *भगवन सलाह नहीं साथ चाहिए*। फिर क्या ऐसा सुन भगवान विष्णु जी भी समुंदर सुखाने आ गये। भगवान जी के आते ही समुंदर डर गया और उस पक्षी के बच्चे लौटा दिए। 


आज इस संकट के समय में भी देश को हमारी सलाह नहीं साथ चाहिए। आज सरकार को कोसने वाले नहीं समाज के साथ खड़े हो कर सेवा करने वाले लोगों की आवश्यकता है ।इसलिए सलाह नहीं साथ दें। 


*जो साथ दे दे सारा भारत, तो फिर से मुस्कुरायेगा भारत*।

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...