गुरुवार, 17 जून 2021

मोबाइल की गुलामी / *ग़जब_का_रिश्ता*

 "मै बिस्तर पर से उठा, अचानक छाती में दर्द होने लगा मुझे हार्ट की तकलीफ तो नहीं है? ऐसे विचारों के साथ मैं आगे वाली बैठक के कमरे में गया मैंने देखा कि मेरा पूरा परिवार मोबाइल में व्यस्त था*


""""""""""""""""""""""""""'''''''''''''''''''''''''''

*मैंने पत्नी को देखकर कहा- "मेरी छाती में आज रोज से कुछ ज़्यादा दर्द हो रहा है, डाॅक्टर को दिखा कर आता हूँ* 

*हाँ मगर सँभलकर जाना, काम हो तो फोन करना"   मोबाइल में देखते-देखते ही पत्नी बोलीं*

*मैं एक्टिवा की चाबी लेकर पार्किंग में पहुँचा, पसीना मुझे बहुत आ रहा था, ऐक्टिवा स्टार्ट नहीं हो रही थी*

*ऐसे वक्त्त हमारे घर का काम करने वाला ध्रुव साईकिल लेकर आया, साईकिल को ताला लगाते ही, उसने मुझे सामने खड़ा देखा*

*क्यों सा'ब ऐक्टिवा चालू नहीं हो रही है?*

*मैंने कहा- "नहीं..!!*

*आपकी तबीयत ठीक नहीं लगती सा'ब,*

*इतना पसीना क्यों आ रहा है?* *सा'ब इस हालत में स्कूटी को किक नहीं मारते,* *मैं किक मार कर चालू कर देता हूँ ध्रुव ने एक ही किक मारकर ऐक्टिवा चालू कर दिया, साथ ही पूछा-* 

*साब अकेले जा रहे हो?*

*मैंने कहा- "हाँ*

*उसने कहा- ऐसी हालत में अकेले नहीं जाते,* 

*चलिए मेरे पीछे बैठ जाइये मैंने कहा- तुम्हें एक्टिवा चलानी आती है?*

*सा'ब गाड़ी का भी लाइसेंस है, चिंता  छोड़कर बैठ जाओ पास ही एक अस्पताल में हम पहुँचे ध्रुव दौड़कर अंदर गया और व्हील चेयर लेकर बाहर आया*

*"सा'ब अब चलना नहीं, इस कुर्सी पर बैठ जाओ"*

*ध्रुव के मोबाइल पर लगातार घंटियां बजती रहीं, मैं समझ गया था। फ्लैट में से सबके फोन आते होंगे कि अब तक क्यों नहीं आया? ध्रुव ने आखिर थक कर किसी को कह दिया कि* *#आज_नहीं_आ_सकता*

*ध्रुव डाॅक्टर के जैसे ही व्यवहार कर रहा था, उसे बगैर बताये ही मालूम हो गया था कि सा'ब को हार्ट की तकलीफ है* *लिफ्ट में से व्हील चेयर ICU की तरफ लेकर गया*

*डाॅक्टरों की टीम तो तैयार ही थी, मेरी तकलीफ सुनकर। सब टेस्ट शीघ्र ही किये*

*डाॅक्टर ने कहा- "आप समय पर पहुँच गये हो, इसमें भी आपने व्हील चेयर का उपयोग किया, वह आपके लिए बहुत फायदेमन्द रहा"*

*अब किसी की राह देखना आपके लिए बहुत ही हानिकारक है इसलिए बिना देर किए हमें हार्ट का ऑपरेशन करके आपके ब्लोकेज जल्द ही दूर करने होंगे इस फार्म पर आप के स्वजन के हस्ताक्षर की ज़रूरत है डाॅक्टर ने ध्रुव की ओर देखा* 

*मैंने कहा- "बेटे, दस्तखत करने आते हैं?"*

*उसने कहा-* 

*"सा'ब इतनी बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर न डालो"* 

*"बेटे तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं है तुम्हारे साथ भले ही लहू का सम्बन्ध नहीं है,* *फिर भी बगैर कहे तुमने अपनी जिम्मेदारी पूरी की वह जिम्मेदारी हकीकत में मेरे परिवार की थी एक और जिम्मेदारी पूरी कर दो बेटा* *मैं नीचे सही करके लिख दूँगा कि मुझे कुछ भी होगा तो जिम्मेदारी मेरी है ध्रुव ने सिर्फ मेरे कहने पर ही हस्ताक्षर  किये हैं", बस अब... ..*

*"#और_हाँ_घर_फोन_लगा_कर_खबर_कर_दो"* 

*बस, उसी समय मेरे सामने मेरी पत्नी का फोन ध्रुव के मोबाइल पर आया। वह शांति से फोन सुनने लगा*

*थोड़ी देर के बाद ध्रुव बोला-* *"मैडम, आपको पगार काटने का हो तो काटना, निकालने का हो तो निकाल देना मगर अभी अस्पताल में ऑपरेशन शुरु होने के पहले पहुँच जाओ हाँ मैडम, मैं सा'ब को अस्पताल लेकर आया हूँ,* *डाक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली है और राह देखने की कोई जरूरत नहीं है"*

*मैंने कहा- "बेटा घर से फोन था?"*

*"हाँ सा'ब"* 

*मैंने मन में पत्नी के बारे में सोचा, तुम किसकी पगार काटने की बात कर रही हो और किसको निकालने की बात कर रही हो?* *आँखों में आँसू के साथ ध्रुव के कन्धे पर हाथ रखकर मैं बोला- "बेटा चिंता नहीं करते"*

*"मैं एक संस्था में सेवायें देता हूँ, वे बुज़ुर्ग लोगों को सहारा देते हैं, वहां तुम जैसे ही व्यक्तियों की ज़रूरत है"*

*"तुम्हारा काम बरतन कपड़े धोने का नहीं है, तुम्हारा काम तो समाज सेवा का है, बेटा पगार मिलेगा*

*#इसलिए_चिंता_बिल्कुल_भी_मत_करना"*

*ऑपरेशन के बाद मैं होश में आया, मेरे सामने मेरा पूरा परिवार नतमस्तक खड़ा था। मैं आँखों में आँसू लिये बोला- "ध्रुव कहाँ है?"*

*पत्नी बोली- "वो अभी ही छुट्टी लेकर गाँव चला गया कह रहा था कि उसके पिताजी हार्ट अटैक से गुज़र गये है,* 

*15 दिन के बाद फिर आयेगा"*

*अब मुझे समझ में आया कि उसको मेरे अन्दर उसका बाप दिख रहा होगा*

*हे प्रभु, मुझे बचाकर आपने उसके बाप को उठा लिया?*

*पूरा परिवार हाथ जोड़कर, मूक, नतमस्तक माफी माँग रहा था*

*एक मोबाइल की लत (व्यसन) एक व्यक्ति को अपने दिल से कितना दूर लेकर जाती है, वह परिवार देख रहा था* 


👌 *यही नहीं मोबाइल आज घर-घर कलह का कारण भी बन गया है बहू छोटी-छोटी बातें तत्काल अपने माँ-बाप को बताती है और माँ की सलाह पर ससुराल पक्ष के लोगों से व्यवहार करती है, जिसके परिणाम स्वरूप  वह बीस-बीस साल में भी ससुराल पक्ष के लोगों से अपनत्व नहीं जोड़ पाती.* 👍


*डाॅक्टर ने आकर कहा- "सबसे पहले यह बताइये ध्रुव भाई आप के क्या लगते हैं?"*

*मैंने कहा- "डाॅक्टर साहब,  कुछ सम्बन्धों के नाम या गहराई तक न जायें तो ही बेहतर होगा, उससे सम्बन्ध की गरिमा बनी रहेगी, बस मैं इतना ही कहूँगा कि वो आपात स्थिति में मेरे लिए फरिश्ता बन कर आया था"*

*पिन्टू बोला- "हमको माफ़ कर दो पापा, जो फर्ज़ हमारा था, वह ध्रुव ने पूरा किया, यह हमारे लिए शर्मनाक है। अब से ऐसी भूल भविष्य में कभी भी नहीं होगी पापा"*


*"बेटा,#जवाबदारी_और_नसीहत (सलाह) लोगों को देने के लिये ही होती है*


*जब लेने की घड़ी आये, तब लोग  बग़लें झाँकते हैं या ऊपर नीचे हो जाते हैं*

                   

*अब रही मोबाइल की बात...*


*बेटे, एक निर्जीव खिलौने ने जीवित खिलौने को गुलाम बनाकर रख दिया है अब समय आ गया है कि उसका मर्यादित उपयोग करना है*

*नहीं तो....*

*#परिवार_समाज_और_राष्ट्र को उसके गम्भीर परिणाम भुगतने पडेंगे और उसकी कीमत चुकाने के लिये तैयार रहना पड़ेगा"*

*अतः बेटे और बेटियों को बड़ा #अधिकारी या #व्यापारी बनाने की जगह एक #अच्छा_इन्सान बनायें*

          🙏🙏🙏🙏

*पता नहीं, किन महानुभाव ने लिखी है, लेकिन मेरे दिल को इतना छू गयी कि शेयर करने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाया*🙏

*यह हर बेटे बेटी के मोबाइल पर पहुंचनी चाहिए.!*

बुधवार, 16 जून 2021

मुझको uncle कहने वालों, तुम्हारी ऐसी की तैसी ।।।

 💞 *U   N   C   L   E*   


  उम्र 50 पार है लेकिन

   शक्ल हमारी 40 के जैसी।

    मुझको uncle कहने वालो,

     तुम्हारी ऐसी की तैसी।।।


  बेटी के कॉलेज गया तो,

   टीचर देख मुझे मुस्कुराई।।।

    बोली क्या मेनटेनड हो मिस्टर??

     पापा हो,पर लगते हो भाई।।।


   क्या बतलाऊँ उसने फिर,

    बातें की मुझ से कैसी कैसी।।

     मुझको uncle कहने वालों,

      तुम्हारी ऐसी की तैसी ।।।


 पडोसन बोली, सेकंड हैंड हो,

   लेकिन फ़्रेश के भाव बिकोगे।

    बस थोड़े से बटन खोल  लो,

     फिर अजय देवगन से दिखोगे।।


बीवी सोच रही है शौहर,

  मेरा कितना अच्छा है जी

   पढ़ती नहीं गुलज़ार साहेब को,

     दिल तो आख़िर बच्चा है जी ।।।


 नीयत मेरी साफ़ है यारों...

   नही हरकतें ऐसी वैसी।

    मुझको uncle कहने वालों,

      तुम्हारी ऐसी की तैसी।।।


  कितनी जंग लड़ी और जीती, 

   इन गुज़रे सालों में।।।

    दो-एक झुर्रियाँ गालों में हैं,

     और थोडी सफ़ेदी बालों में ।।।


  इरादे मगर मज़बूत हैं अब भी,

   उमंग भी सॉलिड पहले जैसी।

    मुझको uncle कहने वालों,

     तुम्हारी ऐसी की तैसी ।।।


  जीने का जज़्बा क़ायम हो तो,

   उम्र की गिनती फिर फ़िज़ूल है।

    अपने शौक़ को ज़िंदा रखो,

     जीने का बस यही उसूल है।।।


ज़िंदादिली का नाम है जीवन,

   परिस्थितियाँ हों चाहे जैसी।।।

    मुझको uncle कहने वालों,

      तुम्हारी ऐसी की तैसी !!!


*मेरे सभी 50+ वर्षीय दोस्तों को समर्पित*

🤠🤠🤠

विश्व पर्यावरण दिवस.🎄🎄/ रितिका सिहाग..🎄🎄🎄🎄🎄

 विश्व पर्यावरण दिवस.....🎄🎄/ रितिका  सिहाग..🎄🎄🎄🎄🎄


छायादार पेड़ों की पूछताछ वाली पोस्ट में एक बहुत ही रोचक जानकारी निकल कर सामने आई !!

पीपल-बरगद के पेड़ को हम नही उगा सकते चाहे हमारे पास इसके बीज उपलब्ध हों तो भी !!

न ही कलम विधि से इन्हें उगाया जा सकता है !!!


तो फिर ये उगते कैसे हैं ??

इंटरनेट को खंगाला तो बड़ी रोचक जानकारी प्राप्त हुई !!


दरअसल बरगद/पीपल में बहुत से फल लगते है व हर फल में हजारों बीज होते है। और हाँ, यह साल भर फलता रहता है।


अब इतनी बड़ी तादात में बीज का उत्पादन करने वाले वृक्ष की संख्या नियंत्रण के लिए प्रकृति को कुछ तो करना ही था। नहीं तो हर ओर केवल बरगद के ही पेड़ दिखाई देते। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु प्रकृति ने इसके बीजों के खोल को इतना कठोर बना दिया है कि यह आसानी से उग नहीं पाते।


बरगद के फल बीजों सहित बड़ी मात्रा में पक्षियों,जैसे मैना, बुलबुल, तोता, कौवा आदि के द्वारा खाये जाते हैं। 


उनके लिए यह भूख मिटाने की उचित सामग्री है जो हमेशा सुलभता और बहुलता से हर जगह उपलब्ध होती हैं। 

पक्षियों के पेट मे मौजूद एसिड इन बीजों की ऊपरी सतह को कमजोर बना देता है परन्तु इनकी जर्मीनेशन क्षमता नष्ट नहीं होती है। ऐसे बीज उचित माहौल पाकर उग आते हैं।


यही कारण है कि बरगद, पीपल, पाकड़ आदि के बीज पक्षियों द्वारा की गई बीट में आसानी से उगते हैं। एक बार उग आये तो ये पेड़ तेजी से बढ़ते हैं। पथरीली व खराब मिट्टी में भी इनकी जड़ें अपना स्थान बना लेती हैं।


इसीलिए इन पेड़ों को कोई लगाता नहीं है। सिर्फ उखाड़ों नहीं और ये चल निकलेंगें। इन पेड़ों (खासकर पीपल) को उखाड़ने की मनाही को धार्मिक आस्था का रूप देने के पीछे यही कारण है।


और जाते जाते युवाओँ के लिए ......


●ये जो बुलेट पे गर्लफ्रैंड को बिठा कर लॉन्ग ड्राइव पर ले जाते समय उसके साइलेंसर से वातावरण को धुंआ धुंआ कर देते हो न,

उसकी क्षतिपूर्ति फिर पेड़ ही करते हैं !!


●जिस पलंग पर सोते हुए सुन्नर सुन्नर लड़कियों के सपने लेते हो न 

उन्हें भी पेड़ों की गर्दन काटकर बनाया जाता है !!


●प्रेयसी के साथ एक नारियल में 2 स्ट्रॉ डालकर पीने आनंद लेते हो न, वो भी पेड़ से ही मिलता है!!


●खून से प्रेमिका को लिखे खत के लिए कागच भी इन्हीं पेड़ो से मिलता है !!


◆आपको छाया चाहिए ??

◆बारिश में अपनी प्रेयसी के साथ घूमना है ??

◆लकड़ी चाहिए ??

◆फल चाहिए ??

◆शुद्ध ऑक्सीजन पाने की चाहत होती है ??

◆अपनी प्रेयसी के साथ पेड़ के नीचे बैठना है ??


●तो पेड़ लगाइए !!!! 


■आइये पर्यावरण दिवस पर संकल्प ले

कि हर साल कम से कम एक पेड़ तो जरूर लगाएंगे। सिहाग 


पोस्ट अच्छी लगे तो शेयर जरूर कीजियेगा 🙏🙏


छायादार पेड़ों की पूछताछ वाली पोस्ट में एक बहुत ही रोचक जानकारी निकल कर सामने आई !!

पीपल-बरगद के पेड़ को हम नही उगा सकते चाहे हमारे पास इसके बीज उपलब्ध हों तो भी !!

न ही कलम विधि से इन्हें उगाया जा सकता है !!!


तो फिर ये उगते कैसे हैं ??

इंटरनेट को खंगाला तो बड़ी रोचक जानकारी प्राप्त हुई !!


दरअसल बरगद/पीपल में बहुत से फल लगते है व हर फल में हजारों बीज होते है। और हाँ, यह साल भर फलता रहता है।


अब इतनी बड़ी तादात में बीज का उत्पादन करने वाले वृक्ष की संख्या नियंत्रण के लिए प्रकृति को कुछ तो करना ही था। नहीं तो हर ओर केवल बरगद के ही पेड़ दिखाई देते। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु प्रकृति ने इसके बीजों के खोल को इतना कठोर बना दिया है कि यह आसानी से उग नहीं पाते।


बरगद के फल बीजों सहित बड़ी मात्रा में पक्षियों,जैसे मैना, बुलबुल, तोता, कौवा आदि के द्वारा खाये जाते हैं। 


उनके लिए यह भूख मिटाने की उचित सामग्री है जो हमेशा सुलभता और बहुलता से हर जगह उपलब्ध होती हैं। 

पक्षियों के पेट मे मौजूद एसिड इन बीजों की ऊपरी सतह को कमजोर बना देता है परन्तु इनकी जर्मीनेशन क्षमता नष्ट नहीं होती है। ऐसे बीज उचित माहौल पाकर उग आते हैं।


यही कारण है कि बरगद, पीपल, पाकड़ आदि के बीज पक्षियों द्वारा की गई बीट में आसानी से उगते हैं। एक बार उग आये तो ये पेड़ तेजी से बढ़ते हैं। पथरीली व खराब मिट्टी में भी इनकी जड़ें अपना स्थान बना लेती हैं।


इसीलिए इन पेड़ों को कोई लगाता नहीं है। सिर्फ उखाड़ों नहीं और ये चल निकलेंगें। इन पेड़ों (खासकर पीपल) को उखाड़ने की मनाही को धार्मिक आस्था का रूप देने के पीछे यही कारण है।


और जाते जाते युवाओँ के लिए ......


●ये जो बुलेट पे गर्लफ्रैंड को बिठा कर लॉन्ग ड्राइव पर ले जाते समय उसके साइलेंसर से वातावरण को धुंआ धुंआ कर देते हो न,

उसकी क्षतिपूर्ति फिर पेड़ ही करते हैं !!


●जिस पलंग पर सोते हुए सुन्नर सुन्नर लड़कियों के सपने लेते हो न 

उन्हें भी पेड़ों की गर्दन काटकर बनाया जाता है !!


●प्रेयसी के साथ एक नारियल में 2 स्ट्रॉ डालकर पीने आनंद लेते हो न, वो भी पेड़ से ही मिलता है!!


●खून से प्रेमिका को लिखे खत के लिए कागच भी इन्हीं पेड़ो से मिलता है !!


◆आपको छाया चाहिए ??

◆बारिश में अपनी प्रेयसी के साथ घूमना है ??

◆लकड़ी चाहिए ??

◆फल चाहिए ??

◆शुद्ध ऑक्सीजन पाने की चाहत होती है ??

◆अपनी प्रेयसी के साथ पेड़ के नीचे बैठना है ??


●तो पेड़ लगाइए !!!! 


■आइये पर्यावरण दिवस पर संकल्प ले

कि हर साल कम से कम एक पेड़ तो जरूर लगाएंगे।


पोस्ट अच्छी लगे तो शेयर जरूर कीजियेगा 🙏🙏

मेरी प्रेम कहानी भाग-1 / रितिका सिहाग

 मेरी प्रेम कहानी भाग-1 / रितिका सिहाग



हस्पताल के मुख्य गेट की सीढ़ियों पर घुटनों में सर रखकर बैठी थी मैं। अंतर्मन में एक बड़ा तूफान चल रहा था।

अंदर जाकर उसको देखूं या न देखूं ये सोचते सोचते कब 2 घण्टे निकल गए पता ही न चला।


सैंकड़ों लोग पास से आते जाते रहे। ऐसे अहसाह हो रहा था जैसे इंसान नही उनकी परछाइयां चल रही है 

इतने बड़े ट्रैफिक वाली रोड पर हस्पताल था जिसकी सीढ़ियों पर मैं बैठी थी। आते जाते सैंकड़ों हजारों वाहन जैसे बिना आवाज के चल रहे थे सन्नाटा छाया था मेरे मन मे। कुछ भी सुनाई न दे रहा था।

बेसुध हालात में बैठी रही मैं वहां पर। मन अतीत की गहराइयों में डूबता चला गया।


बहुत शर्मीले स्वभाव का था राहुल।

कभी फोन नही करता था मुझे अपनी तरफ से। हमेशा मैं ही उसको फोन करती थी। अपनी तरफ से बोलती रहती थी और वो बस हां हूं में जवाब देता रहता था। हमेशा गम्भीर भाव रहते थे उसके चेहरे पर। कभी कोई गिफ्ट देती उसे तो बस एक पल के लिए मुस्कुरा देता और उसके बाद वही भाव चेहरे पर आ जाते थे।

लोगों की नाक में ऑक्सीजन+कार्बनडाईऑक्साइड का मिश्रण घुसता था और कार्बनडाइआक्साइड बाहर निकलती थी

मेरी हर सांस से राहुल अंदर जाता था और राहुल ही बाहर आता था। हर सांस में वो बसा था।


2 साल का वक़्त बीत गया था फिलहाल वो सुदूर किसी गांव में रहता था अपने खेतों में काम करता था और मैं चंडीगढ़ में जॉब करती थी।

कभी एक साथ बाहर घूमने नही गए थे हम। बहुत समय से मेरे मन मे चल रहा था ये। पर उसको समय ही नही मिल रहा था।


एक दिन सुबह सुबह राहुल के फोन की घण्टी बजी।


"कैसे हो राहुल ??"---मैं बोली


"ठीक हूँ"---राहुल बोलता है।


"5 दिन की छुट्टी ले सकते हो घर से, एक सरप्राइज लोकेशन पर घूमने चलते हैं"-मैं बोली


"लेकिन इतने दिन के लिए बाहर रहा नही कभी, घर पर क्या बोलूंगा ??"-राहुल बोला


"कभी नही निकले तो निकलना भी नही है क्या ??

घरवालों को बोलो दोस्तों के साथ घूमने जा रहा हूँ कपड़े पैक करो मैं आ रही हूं तुम्हे लेने अपनी गाड़ी लेकर"- मैने समझाते हुए उसे कहा !!


"लेकिन यहां तुम आई तो बवाल मच जाएगा घर मे"-- सहमी आवाज में राहुल बोला।


"अच्छा ये बताओ तुम्हारा पड़ोसी गांव कौनसा है ??"--- मैंने उससे पूछा।


"फलाना गांव मेरे पड़ोस में है" -- राहुल धीरे से बोला


"अच्छा ऐसे करो कपड़े पैक करो और कल उस पड़ोसी गांव के बस स्टैंड पर 9 बजे मिलना

मैं ठीक 9 बजे तुम्हे वहां से पिकउप कर लुंगी।

तुम्हे कोई परेशानी न होगी?"--मैंने उसे एक शानदार आफर देते हुए कहा।


"ठीक है कल 9 बजे वहां मिलूंगा!"--राहुल मीठी सी आवाज में बोला।


सुबह 4 बजे उठकर चंडीगढ़ से अपनी स्विफ्ट लेकर उसके गांव के रास्ते पर निकल पड़ी मैं !!


सुबह की वीरानी सड़को पर 5 घण्टे मेरी गाड़ी दौड़ती रही।

ठीक 9 बजे उस गांव के बस स्टैंड पर थी मैं।

कॉफी कलर की शर्ट पहने राहुल इंतज़ार ही कर रहा था वहां!!


गेट खोलकर उसकी तरफ बढ़ी मैं और गले लगा लिया उसको।

गांव के बस स्टैंड पर कुछ लोग हमें हैरानी से देख रहे थे!!

जल्दी से उसका बैग उठाया और डिग्गी में रख दिया मैंने।


गेट खोलकर एकदम से पिछली सीट पर पसर गया राहुल।

"क्या हुआ ??" - मैंने उससे पूछा


"मम्मी को थोड़ा बुखार था सारी रात उनकी देखभाल में जागता रहा था नींद घेर रही है मुझे"-उनींदी आवाज में राहुल बोला।

"अभी केसी है माँ"--सहम गयी थी मैं।

अभी ठीक है बिल्कुल,तुम जरा फिक्र न करो,

नही तो आता ही नही मैं"-- राहुल समझाने के अन्दाज में बोला।


राहत की सांस ली मैंने !!


मैंने 2-3 किलोमीटर गाड़ी चलाकर सुनसान सड़क पर एक साइड में गाड़ी रोक दी।

वो नींद में चला गया था तब तक।

मैंने सीट को पीछे किया और आंखे बंद कर ली।

आधे घण्टे की नैप के बाद राहुल उठ गया।

पानी की बोतल दे दी मेने उसे मुह धोने के लिए।


उसने चलने के लिए बोला उसी सीट से पड़े पड़े।


"अगली सीट पर बैठो"--मैंने आंखे तरेरते हुए उसको कहा।


वहीं से छलांग लगाकर अगली सीट पर बैठ गया वो।

और चल पड़े हम वापिस वहां से चंडीगढ़ वाले रास्ते पर ही।

हालांकि उसने बोला था कि मैं चंडीगढ़ आकर तुम्हे जॉइन कर लेता हूँ लेकिन मैंने उसको मना कर दिया।

मेरी इच्छा थी उसको उसके गांव से पिक करने की।

और अपना हर सपना जीने की कोशिश कर रही थी मैं।


बहरहाल वहां से कुछ घण्टे चलने पर एक पहलवान ढाबा आया,

गाड़ी रोक दी मैंने वहां।

राहुल घर से परांठे और अचार लेकर आया था।

हमने चाय बनवाई और उस सड़क पर विशाल पेड़ो के नीचे बैठकर ठंडी हवा में चाय के साथ परांठो का आनंद लिया।


कुछ देर वहां सुकन के पल बिताकर चल दिये वहां से।

चंडीगढ़ पहुंचने से पहले एक बड़ी नहर आई। जिसके किनारे बहुत बड़े बड़े सघन पेड़ लगे थे।

गाड़ी रोक दी मैंने।

मुझे ऐसी जगहें बहुत अच्छी लगती थी।

दोनों बाहर निकले और नहर के किनारे पेड़ो की छांव में बैठ गए।

छोटे छोटे कंकड़ फेंके कुछ मैंने उस नहर के बहते पानी मे।

वो एकटक मेरी बच्चों जैसी हरक़तें देख रहा था।


दोपहर को हम चंडीगढ़ पहुंच गए। सेक्टर 16 में शांति कुंज के आगे गाड़ी को रोक दिया मैंने।

बाहर निकले और राहुल का हाथ पकड़कर शांति कुंज में प्रवेश कर गयी मैं।

उसकी हर पगडंडियों पर चली मैं उसके हाथ मे अपना हाथ डालकर।

फिर वहां एक पेड़ के नीचे बैठ गए हम।

मैंने अपना सर उसकी गौद में रख दिया।

बिना कुछ बोले कुछ पल हम दोनों ने उसी स्तिथि में बिताए हमने।

फिर मैं उठी और बेठ गयी। राहुल का सर अपनी गौद में रख लिया। कुछ देर उसके बालों में अपनी उंगलिया फिराती रही।

अभिभूत होकर उसकी आंखें बंद होने लगी थी।


कुछ समय बाद उसको वहां से उठाया और सेक्टर 17 में चले गए हम दोनों गाड़ी में बैठकर।

उसे लेकर एक मॉल में गयी। 

वहां से उसके लिए एक शर्ट और एक घड़ी खरीदी।

एक बार फिर उसकी निश्छल मुस्कान देखकर मेरा ह्रदय प्रेम से सरोबार हो गया।


मैने अपने क्रेडिट कार्ड से बिल चुकाकर सामान गाड़ी में रखा और हम दोनों एक रेस्टोरेंट में चले गए।

उसका मनपसन्द भोजन शाही पनीर,तंदूरी नॉन और दाल मख्खनी मंगवाया गया।

एक थाली में भोजन किया हमने।

उसे उसकी मनपसन्द स्वीट्स खिलाई।

पहले ही उसको कसम दे चुकी थी कि पूरे टूर पर पैसा मैं खर्च करूँगी सो उसके हाथ बंधे थे


बिल चुकाया और 4 बजे के आसपास मैंने गाड़ी मनाली रोड पर दौड़ा दी।

उसने गाड़ी चलाने की आफर दी पर मैंने कहा जाते टाइम सिर्फ मैं चलाऊंगी

आते समय तुम चला लेना।


पहाड़ों की खूबसूरती शुरू हो चुकी थी मेरा मन, मयूर के पंखों की तरह धीरे खिलता जा रहा था।


शाम 7 बजे हम सुंदरनगर पहुंच गए।

वहां सबसे पहले एक नजदीकी अचर्चित गांव में एक कमरा लिया जो नदी के किनारे था। सामान कमरे में रखा और वापिस सुंदरनगर आ गए क्योंकि उस गांव में भोजन का प्रबंध नही था

सुंदरनगर में हम दोनों का मनपसन्द भोजन किया गया और गांव में अपने कमरे में चले गए।


संसार का सबसे शांतिप्रिय गांव लग रहा था वो।

नहा धोकर हम फ्रेश हुए तब तक 9 बज गए थे। मालिक से रिक्वेस्ट करके हमने सिर्फ एक कप चाय बनवा ली।

आधा आधा पीया उसको हम दोनों ने।

फिर हम घर की खुली छत पर जाकर बैठ गए। चांदनी रात थी

जंगली जानवरों की आवाज के साथ नदी की कलकल बहती ध्वनि कानो में मधुर रस घोल रही थी।


मैंने अपना सर राहुल के कंधो पर रख दिया।

एक बार फिर बिना कुछ बोले हम दोनों उस पल को जी रहे थे।

12 बजे तक हम दोनों छत पर बैठे रहे।

क्या खूबसूरत रात थी। 

फिर नीचे कमरे में आये हम दोनों और कल के प्लान बनाते बनाते गहरी नींद में सो गए।


सुबह मैं राहुल से जल्दी उठ गई। खिड़की खोली जहां से अदभुत नजारे दिख रहे थे।

राहूल सो रहा था मैं उसके चेहरे के नजदीक गयी।

बड़ी सुकून की नींद में था वो। 

उसके माथे पर चुम्बन लेकर जगाया उसको मैंने।


मालिक से एक कप चाय बनवाकर लाई और हमने फिर उसको आधा आधा पिया।

हम नहा धोकर फ्रेश हुए और निकल पड़े सुबह की पहाड़ियों और पेड़ो से घिरी सड़क पर।

3-4 किलोमीटर तक पैदल चलते रहे हम दोनों।

एक बड़े से चपटे पत्थर पर बैठ गए हम दोनों। मैंने अपनी टांगे सीधी की और अपना सर राहुल की गौद में रखा और आसमान की तरफ देखने लगी।

अपने सपने के एक और हिस्से को जी रही थी मैं।

छोटे छोटे पक्षियों की मधुर आवाज मुझे किसी ओर ही दुनिया मे ले गयी।

कुछ पल वहां बिताने के बाद वापिस चल पड़े हम।

रास्ते मे एक ढाबे पर चाय पी हम दोनों ने।

चाय पीकर रूम पर वापिस आये,कमरे का बिल चुकाया और गाड़ी लेकर सुंदरनगर आ गए।

यहां गाड़ी रोक दी गयी।


एक खूबसूरत झील थी यहां,जिस पर प्लास्टिक का रास्ता बना था। एक दूसरे के हाथ पकड़कर फिर उस प्लास्टिक के रास्ते पर चले हम दोनों। बहुत ही खूबसूरत पल थे।


11 बजने को थे हमने वहां हिमाचली खाना खाया और फिर मैंने गाड़ी मनाली रोड पर दौड़ा दी।


थोड़ी दूर चलते ही खूबसूरत पहाड़ी नजारे दिखने लगे थे।

बारिश का मौसम बन गया था। कार में हमारा मनपसन्द रोमांटिक गाना बज रहा था। मेरा रोम रोम खिल गया था उस नजारे को देखकर।

एक बहुत ही खूबसूरत जगह पर थोड़ी खुली जगह देखकर मैंने गाड़ी सड़क से उतारकर किनारे पर रोक दी।


मैंने अपनी सीट पीछे की और पीठ को आराम से पीछे टिकाया।

हम दोनों ने अपनी आंखे बंद कर ली।


क्रमश........

रविवार, 13 जून 2021

अल्बर्ट पिंटो को अब गुस्सा नहीं आता / प्रज्ञा रावत

 ये कविता लोक विमर्श में छपी थी। उमाशंकर सिंह परमार और उनके साथियों का आभार।

 

       बाँके बिहारी


न जाने कब से ढूंढ रही हूँ

उस तमतमाहट को आक्रोश को

आंखों में गमक थी जिसकी

जो सही को सही और गलत को गलत

साबित करने में ज़मीन और आसमान

एक कर देता था


बिजली सी चमक लिए

जिसके हाथ लगाते ही झुक जाती थी डालियाँ

मुड़ जाते थे रास्ते

जीवन की गति और लय से सराबोर

आक्रोश में सना

जिस पर नाज़ करते थे मोहल्ले वाले


वो कुछ भी हो सकता था

कवि- लेखक पत्रकार टाईपिस्ट

मनुष्यता की क्रांति के आंदोलनों

का मज़बूत स्तम्भ हो सकता था वो

जो धीमे-धीमे हमारे गिरह से छूटता गया 


ढूंढो ढूंढो उसे कहीं तो ढूंढो

वो यहीं कहीं है!

पूरे जहान का बाँके बिहारी

हमारे मोहल्लों का नायक 

अब बुदबुदाता है,मिमियाता है

उसका तेवर दब गया है 

बड़े बड़े लोन की 

महीन से महीन लिखी इबारत में


उसके गुस्से को लील गया है

शिष्टाचार का तमाचा

अनुलोम-विलोम करते हुए

मन ही मन अक्सर बक रहा

होता है जी भरके गालियाँ


बहुत नामकरण हुए उसके

कहीं 'होली एंगर' तो

कहीं 'एगॅानी आंट'

वो जो चला था अपने गाँव- घर से

चूसता हुआ गन्ना

बनने आदमी


तब्दील हो गया है 'शुगरकेन' में

पड़ा हुआ दिख जायेगा

कहीं भी चाय की ट्रे की तश्तरी

के शुगर क्यूब में

बेचता जैतून की तेल की मालिश के नुस्खे

और हम हैं कि ढूंढ रहे हैं उसे 

गली- गली मोहल्ले- मोहल्ले


शायद उसे ये बताने कि वो

शिष्टाचार नहीं था

गुलामी की मार थी 

आज़ादी के बाद की गुलामी 

जो पैदा की गई थी छोटे मुल्कों में 

बिल्कुल वैसे ही जैसे 

बीमारियाँ नहीं थीं बीमारियों

की मार थी

युद्ध नहीं थे 

युद्ध की मार थी

बांध नहीं थे बाँधो 

की मार थी

उसके आक्रोश को मारा गया

साजिश के तहत

इतना दबाया गया

कि अब वो हाथ भी सही

दिशा में उठा नहीं पा रहा


एक छोटी-सी चिप में

कैद हो गए हैं उसके सारे सपने

और उसकी ज़िंदगी की 

ख़ुशियों का पासवर्ड आपके 

पास है महामहिम!

उसकी नींद पर आपका कब्ज़ा है 

तो महामहिम अब तो आप खुश हैं

कि बाँके बिहारी को अब गुस्सा

नहीं आता

जनता जनार्दन खुश है कि

अल्बर्ट पिंटो को अब बिल्कुल गुस्सा नहीं आता।

(प्रज्ञा रावत 2016)

शनिवार, 12 जून 2021

कहानी की बात - 1 / आशी दुबे

 सामूहिक नरसंहार : हरि भटनागर

=====================


हरि भटनागर वंचित पात्रों के कथाकार हैं। उनके नायक बहुधा मजदूर, रेजगार, मिस्त्री, सब्जी बेचने वाले, रेडी वाले आदि होते हैं। दिलचस्प यह है कि उनकी कहानियों में इनके सुख-दुख, जरूरतें, बाधा, मशक़्क़त दर्ज होने के साथ ही मनोविज्ञान का बारीक विश्लेषण होता है, जो अन्य समकालीनों में नहीं है। हरि वंचित और निम्न तबके के पात्रों के 'मन' के कथाकार हैं। पात्रों के मन, जो कई-कई परतों से ढँके होते हैं, वे  परत दर परत उसे उकेरते हैं। अंत में प्याज के छिलकों के मानिंद उनकी कहानी एक 'शून्य' छोड़ जाती है। जैसे किसी ने भरे मन से उच्छवांस ली हो। वस्तुतः यह कथाकार या पात्र की न होकर पाठक की उच्छवांस होती है, जहां वह अपनी मन:स्थिति की वल्गा को थामे यह सोच रहा होता है कि अब कहां जाएं? 


प्रस्तुत कहानी भी ऐसे ही मनोविज्ञान की कथा है। मोहल्ले में एक खूनी किराएदार बनकर आ गया है, मोहल्ले भर के 'मन' में उसके प्रति जिज्ञासा और आशंका का भाव है। किराएदार की पत्नी से नायक की नोकझोंक होती रहती है और अंत में खूनी जो करता है, वही है - सामूहिक नरसंहार!


प्रथम दृष्टया देखने में यह कहानी विरोध के मर जाने की कहानी लगती है, किंतु पाठ के बाद जब पाठक इस कहानी पर विचार करता है, तो पाता है कि प्रतिरोध मनुष्य के मूल में है। वह जीन्स में 'इन्बिल्ट' है । हां, प्रतिरोध करने का ढंग क्या है? यह पात्र की प्रकृति पर निर्भर होता है। 


तो पढ़ते हैं वरिष्ठ कथाकार हरि भटनागर की कहानी--


सामूहिक नरसंहार 

-----------------------


बहुत छोटी-सी घटना है।


उन दिनों मैं मध्यप्रदेश के एक कस्बे में रहता था। वह क़सबा बहुत ही छोटा था और बहुत ही कम आबादी वाला। किसी से भी किसी के बारे में पूरी मालूमात की जा सकती थी। सम्भव है अब ऐसा न हो। लेकिन बड़ा दिलचस्प क़सबा था वह। किसी भी क़सबे से पीछे नहीं, किसी भी बात में। राजनीति में सबसे आगे, महँगाई में सबसे आगे और गुण्डई में तो ख़ैर सबसे आगे था ही। बहरहाल, मैं वहाँ दुमंजिले मकान में किराए पर रहता था। नीचे के हिस्से में मैं रहता था। बाएँ तरफ़ के हिस्से में तीन किराएदार थे। दाएँ तरफ़ मकान मालिक रहता था। ऊपर की मंजिल पर जाने के लिए लोहे की सीढ़ी थी। सीढ़ी कमाल की थी। कुछ इस तरह थी कि उसमें पूरा पैर नहीं समाता था। चढ़ते वक्त़ उतनी परेशानी न होती जितनी उतरते वक्त़ होती। हौल रहता कि अब गिरे कि तब गिरे। ख़ैर, किसी तरह लोग चढ़-उतर जाते थे। कहते हैं कि सावधानी में दुर्घटनाएँ नहीं होतीं। यह बात इस सीढ़ी से जुड़ी थी। कोई भी आदमी या बच्चा इस सीढ़ी से कभी न गिरा। सीढ़ी में कुछ ऐसा था कि पाँव रखते ही झन्नाती थी। उसकी यह झन्नाहट नीचे के ख़ानों से भी सुनी जा सकती थी। पता पड़ जाता कि कोई सीढ़ी पर है।


ऊपर की मंज़िल पर एक हाॅलनुमा कमरा था। कमरे में रसोई थी लेकिन नहाने और पाखाने के लिए किराएदार को नीचे आना पड़ता था। कमरे की बाहरी दीवारों का पलस्तर जगह-जगह से झड़ रहा था और चारों तरफ़ काली-हरी काई बनी हुई थी।


ऊपर की तरफ़ नाली में पीपल के पेड़ निकल आए थे जिनकी जड़ें नाली के सहारे होती हुईं, नाली में कहीं खो गई थीं। कमरे की अन्दर की दीवारें सीलन की वजह से नम और बदरंग थीं। सीलन ने उन पर असंख्य तस्वीरें बना दी थीं जो अबूझ थीं। छत धुएँ से काली थी और जगह-जगह उनमें से मोर्चाखाई पपड़ियाँ झड़ रही थीं। कमरे में एक खिड़की थी जिसे बन्द करके अलमारी को शक्ल दे दी गई थी। एक कोने में रसोई थी। पानी निकास की व्यवस्था न थी इसलिए दीवार के सहारे एक हौदी बनाने के साथ सीमेंट की एक मेड़ बना दी गई थी जो दरवाज़े तक जाती थी। पानी जिसके सहारे आता और बाहर झज्जे पर छुट्टा फैलता और उसी तरह नीचे गिरता। रसोई की उस हौदी में बर्तन मले जाते और मंजन-कुल्ले के साथ वक्त़ ज़रूरत पर पेशाब भी की जाती।


शुरू-शुरू में, नीचे के हम किराएदारों में ऊपर से गिरने वाली ‘रस-बूँदों’ से भारी नाराज़गी थी। मकान मालिक से कई बार पानी निकास की व्यवस्था के लिए कहा भी, लेकिन मकान मालिक भी एक चीज़ था। वह काला, मोटा और बड़ी तोंद का मालिक था। गंजा था और आँखों पर हल्का काला चश्मा लगाता था जिसमें उसकी आँखें मिचमिचाती रहतीं। हर वक्त़ वह सफारी सूट डाटे रहता। हम लोगों की नाराज़गी पर वह ज़रा भी नाराज़ न होता। मुस्कुराता कहता - बस, अगले साल ऊपर की छत ढलेगी, उसी के साथ सब ठीक हो जाएगा .... पिछले दस सालों से वह यही एक बात दोहराता आ रहा था। इसलिए हम लोगों ने अब उससे कुछ कहना ही छोड़ दिया था। मकान से वह पूरी तरह उदासीन था। हम अपने हिस्से की खुद पुताई करा लेेते और मरम्मत। वह भी ख़ुश था और हम भी। हालाँकि हम अन्दर से बेहद नाराज़ थे। लेकिन कर क्या सकते थे? कम किराए की वजह से यह मकान छोड़ा भी न जाता था; इसलिए इसी में कुण्डली मारे हर तरह की तकलीफ़ बरदाश्त करते आ रहे थे।


फागुन रहा होगा जब ऊपर की मंज़िल के किराएदार ने मकान छोड़ दिया। उसे सरकारी मकान मिल गया था। मेरा मन हुआ कि उसे किराए पर ले लूँ। दो सौ रुपए किराया था, किसी तरह एडजस्ट कर लूँगा। दोस्त-एहबाब इतने आते हैं कि एक कमरे में दिक़्क़त हो जाती थी। मकान मालिक से बात की तो वह भाव खाने लगा। भौहें चढ़ाकर बोला - पाँच सौ लगेगा। मैंने कहा, मंगल तो दो सौ देता था। उसने कहा, ख़ाली होते ही मकान के किराए बढ़ जाते हैं। अभी आप ख़ाली करें तो आठ सौ में जाए। मैंने बढ़ाया क़दम पीछे कर लिया। नतीजा था कि चार महीने कमरा ख़ाली पड़ा रहा। न मुझे दिया गया और न ही मेरे जैसे ज़रूरतमन्द को। एक दिन पता लगा कि कमरा उठ चुका है। पाँच में नहीं, बल्कि छः सौ में। किसे दिया गया? कौन है वह शख़्स? हमें जिज्ञासा थी। एक दिन मैंने मकान मालिक से पूछा कि कमरा किसे दिया है, चार महीने से तो सुनता आ रहा हूँ कि उसी वक्त़ तीन ठेलों से सामान उतरने लगा। एक दुबली-पतली औरत जिसकी लटें चेहरे के आगे लहरा रही थीं और जो धोती के पल्लू को छाती के साथ पीछे फेंटे की तरह लपेटकर कसे थी-अकेले ठेलेवालों के सहारे अपना सामान उतार रही थी। उसके साथ तीन एक साल का बच्चा था।


औरत की शक्ल-सूरत से ऐसा लगता था जैसे नियति ने उसके साथ क्रूर मज़ाक किया और उसके आदमी को छीनकर उसे बेसहारा कर दिया हो। और वह उसके ग़म में छाती पीट-पीटकर अभी बेतरह रोई है। लेकिन ऐसा न था। उसका आदमी जीवित था और कुछ दिनों के बाद ही उसके साथ ऊपर रह रहा था।


मैंने मकान मालिक से औरत-मर्द के बारे में पूछा। मकान मालिक का मुस्कुराता चेहरा यकायक मुरझा गया। चश्मे के अन्दर से मिचमिचाती आँखों को स्थिर करता वह बोला - क्या बताऊँ? - लम्बी साँस छोड़ता वह आगे बोला - बड़ी गफ़लत हो गई। मैं तो सोचता था कि वह राँड-बेवा है, गरीब है, चलो दे दो कमरा, जितना भी किराया देना होगा दे देगी, लेकिन वह राँड थोड़े ही थी! - मकान मालिक के चेहरे पर ग़ुस्सा उभर आया - राँड जैसी लगती है हरामखोर! और वह मुस्टण्ड, उसका आदमी है कमीन! - मकान मालिक ने मेरी बाँह पकड़ी - मैं तो मकान देकर फँस गया। उसका मर्द अच्छा नहीं। आँखें देखो जैसे कातिल हो! ओफ्फ!


मैंने मन में कहा - अब रो, जब मैं माँग रहा था तब दिमाग़ आसमान में था।


तीसरे-चैथे दिन मकान मालिक ने मेरा कन्धा छूते हुए, मिचमिची आँखों में ख़ौफ़ के साथ सूचना दी - मदन बाबू, यह तो बड़ा गड़बड़ आदमी है। पीछे जमीर साब हैं न, उन्होंने बताया कि यह आदमी पास के गाँव का छँटा बदमाश है, खेती-बारी के लफड़े में पड़ोसी की हत्या कर चुका है और पुलिस को दे-देवा के साफ़ बच के निकल गया ....


मैंने पूछा - तो आपने मकान क्यों दे दिया, बिना पूछे-ताछे?


- दरअसल मैंने कोई दरयाफ्त नहीं की। वह राँड आई और रोने लगी। मुझे दया आ गई, सोचा बेवा है, अकेली है, कमरा दे दिया लेकिन ....


- अभी भी देर नहीं हुई है, आप उसे चलता करो।


मकान मालिक कुछ देर चुप रहा, फिर बोला - आसान नहीं है। उसका मर्द तो ज़ालिम है। वह तो मरने-मारने को तैयार हो जाएगा। पता है जमीर साब ने ता


कल अख़बार में छपा उसका फोटो भी दिखाया। मकान मालिक यकायक चुप हो गया। अँगुली से कान खुजाने लगा, बोला - अब यार, जैसा भी है, जब अपने साथ गड़बड़ नहीं कर रहा है तो गड़बड़ कैसा?


मकान मालिक हौल के साथ आश्वस्त-सा दिख रहा था। कहने लगा - वह कैसा भी बदमाश और ज़ालिम है, जब तक हम उससे उलझें नहीं, वह क्यों उलझने लगा। बुदबुदाते हुए मकान मालिक अपने कमरे की ओर बढ़ा जिसकी खिड़की से उसकी लड़की उसे बुलाने के लिए आवाज़ें दे रही थी। अमरूद के पेड़ की छाया में खड़ा मैं मकान मालिक से सहमत होते हुए भी आशंका में डूबा था। गड़बड़ आदमी जहाँ भी रहता है, गड़बड़ी करता है, कोई उलझे, न उलझे। यह सोचते ही एक हौल मेरे मन में बैठ गया जो लाख समझाने के नहीं निकला। पता नहीं क्यों मैं उसे देखते ही काँप जाता। हौल से बचने का एक ही रास्ता था। उसकी तरफ़ देखो नहीं, उससे या उसकी घरवाली से कोई रार मोल न लो। आख़िरकार मैंने ऐसी कई दलीलों से अपने विचलित मन को किसी तरह शान्त किया। बावजूद इसके मन तो मन था। अनेक आशंकाओं से घिरा रहता


वह आदमी ज़्यादातर ऊपर छज्जे पर खड़ा दीखता। वह एकदम काला था, कोयले की तरह। वह धोती पहनता जो घुटनों तक होती। घुटनों से नीचे टखनों तक उसके पैर गझिन बालों से भरे थे। यही हाल उसके पीठ, पेट, छाती और हाथों का था जहाँ गझिन बाल चींटों जैसे चिपटे लगते। सिर के बाल पहलवानों की तरह महीन थे। गरदन तगड़ी और मूँछ तलवार जैसी खिंची थी। बायाँ हाथ पीछे बाँधे, दायाँ हाथ होंठों पर मुट्ठी की तरह कसे वह बीड़ी के धुएँ में डूबा रहता। लम्बे कशों के साथ मुट्ठी को वह रह-रह रखता और हटाता जाता था।


बीड़ी के क़शों में वह इस कदर डूब जाता कि उसे होश ही न रहता कि उसका तीन बरस का बच्चा उसके घुटनों पर हाथ मारता, नाक बहाता, रोता हुआ, गोदी में आने के लिए काफ़ी देर से ज़िद कर रहा है।


थोड़ी देर में उसकी पत्नी, गाुस्से में लाल कमरे से निकलती और बच्चे को उठा, बड़बड़ाती हुई, कमरे में वापस चली जाती।


वह घर का कोई काम नहीं करता। पत्नी ही सारा काम करती - झाड़ू-बुहारी से लेकर नीचे से पानी भरने तक का। रहा राशन-पानी जुटाने का काम - वह घर के भाई-बन्द माह में एक बार गाँव से लाकर रख जाते। ये महाशय बहुत ही कम नीचे उतरते।


नौतपा जब अपने चरम पर था और उसके ताप पर हम दाँत पीसने के अलावा कुछ भी करने में असमर्थ थे, तभी एक झंझट हो गई जिसने मेरे प्राण नहों में समो दिए।


बात यों हुई कि उस ख़ूँख़ार आदमी की औरत जो शक्ल-सूरत से रोती नज़र आती है, नीचे से पानी भर रही थी। ग़लती या गुस्ताखी जो भी कहें, यह हुई कि मैंने भरकर बहती बाल्टी नल के नीचे से हटा दी और अपनी बाल्टी लगा दी कि बस वह मुझसे उलझ पड़ी।


मैंने कहा - बहन जी, आप इत्ता नाराज़ क्यों हो रही हैं? मैंने आपकी बाल्टी ही तो हटाई, वह भी भरी। ख़ाली तो नहीं हटाई।


वह तिड़ककर बोली - मेरी भरी बाल्टी भी हटाई तो क्यों हटाई?


मैंने कहा- वह भरकर बह रही थी।


- तो बहने देते।


- तो फिर लगाये देते हैं।


वह बोली - क्यों लगाये देते हैं?


मैं हतप्रभ - हद्द है!


वह बोली - क्या हद्द है?


मैं बोला - यही कि ....


वह बोली - भरी बाल्टी फिर से लगा देते हैं।


मैं बोला - जी।


मुँह बिराते वह बोली - जी! आँखों में रोष भरकर उसने आगे कहा - आप लोग भर रहे होते हैं तो मैं झँकती नहीं। मैं भर रही हूँ तो आप टाँग क्यों अड़ा रहे हैं।


मैंने कहा - मैंने टाँग नहीं अड़ाई।


वह बोली - सिर अड़ाया था।


मेरा दिमाग़ भन्ना गया। फिर भी अपने को काबू में रखा। अश्लील जुमले को शालीनता में कहा - अब आप उसे सिर कह लीजिए।


उसने मुझे कर्री निगाहों से देखा गोया चिथड़ा बना डालेगी। स्पष्ट था कि वह मेरा मर्म भाँप गई थी। फुफकार कर बोली - बदतमीजों को औरतों से बात करना नहीं आता।


मैं बोला - औरत जब ढंग से बात करे तो ....

   

वह अँगुली नचाकर बोली - अब आप मुझे ढंग सिखाएँगे?


मैं उसी अश्लीलता के बहाव में था - ढंग तो आप बेहतर जानती हैं ....


उसका पैर जैसे अंगार पर पड़ गया हो, बोली - ढंग अपनी उस राँड का सिखा .... पत्नी की तरफ़ इशारा करते, तिड़तिड़ाते हुए उसने मेरी बाल्टी जो आधी भरी थी, मेरे आगे इस तरह पटकी कि उसका पानी ज़ोरों से ऊपर उछला, मुँह को सराबोर करता सीने पर कमीज़ और बनियान में समा गया।


अब मैं पूरी तरह ग़्ाुस्से के हवाले था। आँखों में आग जलने लगी। भुजाएँ धड़ से छटक-सी रही थीं। कुछ न सूझा तो अपनी बाल्टी उठाई और उसी अन्दाज़ में ज़मीन पर पटकी जैसे उस औरत ने पटकी थी। लेकिन इस बार पानी न उछला। वह औरत उछली क्योंकि बाल्टी उसके पैर की अँगुलियों पर गिरी थी।


मैं एकदम सकते में आ गया। बाल्टी पैर पर गिर जाएगी, तनिक गुमान न था। लेकिन ऐसा हो गया। मेरा शरीर ऐसा हो गया था जैसे समूचा ख़ून निकल गया हो। मैंने आँखें मूँद लीं। जब खोलीं तो देखा - औरत चारदीवारी पर भहराई-सी अपना बायाँ पैर उठाए थी। आँखें अधमुँदी थीं और मुँह खुला। लगता था साँस अन्दर कहीं रुक गई है। चेहरा सुर्ख हो रहा था और उस पर पीड़ा को महसूस किया जा सकता था। पैर की अँगुलियों पर जहाँ बाल्टी गिरी थी, पहले चाक की सफे़द लक़ीर जैसी खिंची थी, फिर उसमें से ख़ून चुचुआने लगा।


सहसा औरत के बदन में कम्पन हुआ। साँस ज़ोरों से चलने लगी। सम्भवतः ख़ून को देखते ही, उसकी आँखों में आँसू चू पड़े और वह फर्श पर बैठकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।


अब मैं गहरे संकट में था। जिससे दूर रहने और न टकराने का फै़सला किया था, उसी से खामखाह झंझट हो गया। मैं अपने कमरे में था। पत्नी, मकान मालिक और दूसरे किराएदार सब मुझसे ख़फा हैं। सब यही कह रहे हैं कि औरत से उलझने की क्या ज़रूरत थी। मैंने कहा, मैं कहाँ उलझा? उलझी तो वह। पत्नी बोलीं, मैं इशारे कर रही थी लेकिन आप हैं कि बहस किए जा रहे हैं। मकान मालिक ने कहा, मैं पहले ही ख़बरदार कर चुका था कि आदमी गड़बड़ है, रहस्यखोर है, उससे दूर रहना, लेकिन आप माने नहीं। मैंने गहरी साँस ली, कुछ कहना चाहा मगर पत्नी फिर बमक उठीं, अब आप यादव जी से लड़ जाइए। मैंने सिर नीचा कर लिया। हाथ मलने लगा- हद्द है।


थोड़ी देर के विलाप के बाद औरत सीढ़ी झन्नाती ऊपर चली गई थी और हम लोग आसन्न ख़तरे से कैसे निपटा जाए - इस पर सोच रहे थे। गड़बड़ आदमी का क्या भरोसा, आए और लट्ठ चमका जाए तो क्या कर लेंगे, थाने जाएँगे, लेकिन होगा क्या? वह मूजी तो अपना काम कर लेगा।


काफ़ी देर तक हम लोग दम साधे बैठे रहे। या कहें, उस ख़ूनी के उतरने का इन्तज़ार करते रहे। वह गुस्से में पागल उतरेगा क्योंकि मैंने उसकी बीवी के साथ बदसलूकी की है, उसका अपमान किया है, चोट पहुँचाई है, इसे वह क्यों कर बर्दाश्त करेगा? सीधे-साधे हम जैसे लोग नहीं कर सकते, मरने-मारने पर उतारू हो जाएँ, फिर तो वह ज़ालिम ठहरा।


दोपहर हुई, फिर शाम। फिर रात। दूसरा दिन हुआ। इस तरह तीन दिन निकल गए - वह आदमी नहीं उतरा। हम लोगों ने सोचा कि औरत लड़ंका है, सबसे बेवजह उलझती रहती है, आदमी ने सम्भवतः इसी वजह से उलझना उचित नहीं समझा, अन्यथा वह फाड़ खाता।


इस बीच औरत लँगड़ाती हुई, अस्पष्ट-सा बड़बड़ाती, अँगुलियाँ चटकाती कोसती गुस्से में तम-तम किसी तरह चलती, नीचे से ऊपर पानी भरने आती रही। चोट खाई जगह पर उसने लाल-लाल मरहम जैसा कुछ लगा रखा था, बावजूद इसके अँगुलियाँ सूजी थीं।


आने वाले दिनों में औरत के पैर का घाव पुर गया, सूजन मिट गई और वह भली-चंगी हो गई और हम पूरी तरह सहज। मैंने कान पकड़े। कसमें खाईं। आगे से कोई ग़लती न करूँगा। उठक-बैठक लगा ली।


गुलाबी ठण्ड वाले दिन शुरू हो गए थे। बावजूद इसके दिन में तेज़ धूप होती। हम इसकी शिकायत करते लेकिन शाम को गुलाबी ठण्ड में देर तक घूमते। अँधेरा होते ही बड़ा-सा चाँद पेड़ों के झुरमुट से काँपता हुआ ऊपर उठता और धीरे-धीरे आसमान में अपना असली रूप धारण करता जाता। हवा इतनी हल्की और साफ़ होती कि फेफड़ों में भरकर उड़ने को जी करता।


ऐसी ही शाम का मज़ा लेकर उस शाम जब मैं घर लौटा तो दरवाजे़ पर उस औरत को खड़ा पाया। औरत के चेहरे पर गुस्सा था। हाथों में उसके साड़ी थी जिसे वह कस के दबोचे थी। सामने मकान मालिक, मकान मालकिन और पड़ोसी, कपूर साहब भी थे। पहले तो मैं कुछ समझ न पाया। घर में दाखिल हुआ तो पत्नी ने बात स्पष्ट की।


औरत ने सूखने के लिए डौली पर साड़ी डाली थी। गीली थी तो गिरी नहीं, जब फरैरी हुई और सूख गई तो नीचे आ गिरी। मेरी बेटी, सोफू ने साड़ी गिरते देखी। पहले तो उसने आँटी को आवाज़ें लगाईं। जब आँटी ने नहीं सुना तो उसने उठाने का काम खुद कर डाला। साड़ी बेगनबेलिया के झाड़ पर गिरी थी, काँटों में बिंधी थी। सोफू थी कि निकालने में लगी थी। साड़ी तो उसने निकाल ली लेकिन साड़ी में कई खोंते लग गए थे। पहनने लायक नहीं रह गई थी। पत्नी ने उस औरत से कहा, आप चिन्ता न करें, मैं आपको दूसरी और इससे अच्छी साड़ी मँगा दूँगी।


मगर वह औरत कोई बात सुनने को तैयार न थी।


इस बीच पत्नी बाथरूम गईं और मैं छोटे-छोटे डग बढ़ाता बाहर आ खड़ा हुआ।


मैं उस औरत से बात नहीं करना चाह रहा था, लेकिन वह जबरन मुझसे मुखातिब हुई - यह साड़ी आप रखिए।


- मैं क्या करूँगा इसका।


- आप जो भी करें।


- आप जो भी करें - मैंने धीमी आवाज़ में उसकी बात को उसी की तरफ़ ठेलना चाहा।


- जो भी करें मतलब? जलती आँखों से उसने प्रश्न किया मानो मैंने कोई अपशब्द कहा हो।


- आप नाहक उलझ रही हैं, जब आपसे कह दिया गया है कि नई साड़ी आपको मिल जाएगी तो फ़िजूल हुज्जत क्यों कर रही हैं? यकायक मकान मालिक ने मध्यस्थता करते सभी अँगुलियों में पहने अँगूठी वाला हाथ उठाते बहुत ही विनम्र स्वर में कहा।


वह अँगुली उठाकर तिरछी नज़रों से बोली - आप बीच में क्यों पड़ रहे हैं?


- मैं बीच में नहीं पड़ रहा हूँ, फालतू हुज्जत खतम करना चाहता हूँ, छोड़िए, जाने दीजिए, साड़ी फट गई अब क्या हो सकता है - मकान मालिक ने फिर उसी स्वर में कहा।


- क्या नहीं हो सकता? वह बोली।


इस बीच पत्नी आ गईं, बोलीं - बहन जी, आप एक नहीं दो साड़ी ले लीजिए इसके बदले में, खुद खरीद लाइए। लेकिन बात मत बढ़ाइए।


- मैं बात बढ़ा रही हूँ कि आप लोग - वह कठोर लहजे में बोली - यह साड़ी मेरी माँ की है, उसने वैष्णव देवी को ओढ़ाई थी, फिर मुझे लाकर दी ....


- ओऽऽ - मकान मालिक ने मुँह गोल किया - इसीलिए आप ....


वह बोली - हाँ, इसीलिए हुज्जत कर रही हूँ।


- लेकिन बहन जी, अब इसे आप सम्हालकर रख दीजिए, जो हो गया, सो हो गया।


मकान मालिक के समर्थन में पत्नी ने भी यही वाक्य सिर हिलाकर दुहराया।


इस बीच सोफू ऊन का प्लास्टिक का बहुत ही मजबूत थैला अन्दर से ले आई। साड़ी को सम्हालकर सुरक्षित रखा जा सकता था थैले में - मुझे सोफू की अक्ल पर हँसी आई। साथ में यह भी सोचने लगा कि अगर इस औरत ने थैला देख लिया तो चिढ़ जाएगी और अनर्थ हो जाएगा - इस लिहाज से थैला मैंने सोफू से लिया और कुर्ते के अन्दर छिपाता हुआ कमरे में जाने लगा कि वह औरत शेरनी की तरह मेरे ऊपर झपटी। मजबूत हाथों से उसने मेरा गिरेबान पकड़ा और दाँत पीसते हुए पलक झपकते, मेरे कुर्ते को फाड़कर दो हिस्सों में बाँट दिया।


- पन्नी में रख अपना कफ्फन!!! कहते हुए उसने ज़मीन पर थूका और जलती आँखों हम सबको घूरकर देखते हुए आगे कहा- देवी माँ का अपमान किया है, तुम सब उच्छिन्न हो जाओगे।


दो फाँक में बँटा कुर्ता और औरत की हरकत पर मैं सन्न था। यह बहुत बड़ी हतक थी। मैं गुस्से से पागल होता, इससे पहले पत्नी गुस्से से तमक उठीं। तेजी से आगे बढ़कर उन्होंने औरत की पीठ पर ज़ोरों का धौल जमाया। कुर्ता फाड़कर औरत विजय-मुद्रा में हम सबको देखकर मुड़ रही थी कि धौल से अपने को सम्हाल न पाई, लड़खड़ाई और फर्श पर मुँह के बल गिर पड़ी।


अब फिर पहले जैसी समस्या थी। न चाहते हुए भी उस औरत से टंटा हो ही गया था। और हमें पूरी तरह यक़ीन था कि औरत का आदमी इस बार ज़रूर लट्ठ लेकर उतरेगा क्योंकि इस बार औरत का आगे का एक दाँत टूट गया था और वह बुरी तरह लहूलुहान थी। आदमी ने अपनी आँखों के सामने उसे गिरते देखा था, वह ड्योढ़ी पर बीड़ी के धुएँ उड़ाता खड़ा था, उघारे बदन, जैसा कि हमेशा खड़ा होता है।


एक-एक पल बड़ी मुश्किल से बीत रहा था। लेकिन समय रुकता कहाँ है? शाम से धीरे-धीरे रात हुई और सबेरा हुआ। फिर दोपहर, शाम और फिर रात। इस तरह वक्त़ बीतता गया और तीन-चार दिन गुज़र गए - वह आदमी नहीं उतरा। मकान मालिक ने बताया कि औरत बुरी तरह रोती रही लेकिन वह टस से मस न हुआ। औरत ने उसे बुरा-भला भी कहा मगर वह बेजान, बेहिस, काठ बना रहा!


पता नहीं क्यों, आदमी के इस बर्ताव को लेकर हममें काफ़ी ग़्ाुस्सा था। वह लड़ा-झगड़ा नहीं और न ही लट्ठ लेकर उतरा - यह बात अपने में सुखद थी ही, लेकिन वह क्यों नहीं हरकत में आया? यह बात हमें छेद रही थी। मकान मालिक ने कहा कि मेरे साथ ऐसा हो तो चाहे पिट जाऊँ लेकिन मर-मिटूँ। मैंने भी तकरीबन ऐसा ही भाव प्रकट किया। दूसरे पड़ोसियों ने भी तकरीबन-तकरीबन ऐसे ही अलफ़ाज़ दोहराए।


मकान मालिक ने उसे मरा कुत्ता कहा। मैंने मरे जानवर की खाल। पत्नी के आदमी के नाम पर कलंक। और इस बात पर शर्म महसूस करते रहे कि फ़िजूल हम उससे ख़ौफ़ खाते रहे। पत्नी ने मकान मालिक को आड़े हाथों लिया जिन्होंने उसके बारे में हवा फैलाई थी कि किसी की हत्या करके यहाँ रहने आ गया है। अगर वह ऐसा होता तो यहाँ क्यों आता? निडर, निर्भीक मूजी आदमी अपने ठीहे से हिलता नहीं। वहीं बना रहता है। भागना तो सीधे-सादे लोगों का काम है।


उस आदमी के बारे में हमने अपने दिलों में यह धारणा बना ली थी लेकिन उस दिन के वाकेआ ने हमारी धारणा के परखचे उड़ा दिए और हमारी जान-सी निकाल ली ....


हुआ यह कि पाइप लाइन ख़राब होने की वजह से तीन दिन से नल में पानी नहीं आ रहा था। उस दिन सुबह जब नल से सूँ-सूँ और थोड़ी गुर्राहट के बाद पानी टपका तो सबसे पहले मैंने बाल्टी लगा दी। अन्दर मैं दूसरे बर्तन लाने के लिए गया ही था कि देखा, ऊपर वाली औरत ने मेरी अधभरी बाल्टी हटा दी और अपना गगरा लगा दिया। मैंने कहा - बाल्टी तो भर जाने दीजिए।


उस औरत ने लापरवाही से कहा- आधी बाल्टी से काम चलाइए, मेरे बाद भर लीजिएगा।


- आपके बाद क्यों भर लूँगा?


- इसलिए कि अभी आपके पास आधा बाल्टी पानी है और मेरे पास एक बूँद नहीं।


मैंने कहा - थोड़ा तो सब्र करतीं आप।


उसने कहा - थोड़ा आप कर लीजिए।


मैंने कहा - उस दिन तो आप भरी बाल्टी हटाने पर पें-पें कर रही थीं।


वह तिड़क उठी - ढंग से बात करिए। पें-पें क्या होता है?


अब मैं निधड़क था ही। उसकी बात पर अलफ हो गया और उसका गगरा परे कर अपनी बाल्टी लगाता बोला - पें-पें ये होता है।


- ये नहीं होता - उसने मेरी भरी बाल्टी उठाकर दूर फेंक दी और आँखें मटकाकर बोली - पें-पें ये होता है।


अब मेरा मूड आॅफ हो गया। मैंने आव देखा न ताव उसका गगरा उठाया और फर्श पर पटक दिया। गगरा ज़ोरों की आवाज़ करता दूर तक ढनगता चल गया।


इस बीच ऊपर से कोई चीखा। मैंने देखा, औरत का मर्द था जो उघारे बदन ड्योढ़ी पर झुका नीचे देख रहा था। बड़ी-बड़ी बाहर को निकली पड़ती आँखें ऐसी लग रही थीं जैसे उनमें से आग निकल रही हो। और उस आग से वह मुझे जलाकर ख़ाक़ कर डालेगा!


आदमी का चीखना था कि यह औरत ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाती हुई छाती पीटने लगी।


मैं सन्न रह गया। चीख और रोने-पीटने का ही असर था कि मेरी पत्नी, मकान मालिक, मकान मालकिन, कपूर साहब और दूसरे पड़ोसी अपने-अपने कमरों से निकलकर बाहर आ खड़े हुए। माजरा समझते उन्हें देर न लगी।


ज़ोरों की सीढ़ियाँ बजीं। तात्पर्य कि वह आदमी आज अपने नंगे रूप में आ गया है। वह मुझे चटका ही देगा। वह सीढ़ियाँ धड़-धड़ उतर ही रहा था कि पत्नी समेत सारे पड़ोसी मेरे गिर्द कवच जैसे आ खड़े हुए।

यकायक वह आदमी दीवार की ओट से सामने प्रकट हुआ। पसीने से वह लथपथ था। बाएँ हाथ से धोती की लाँग उठाए दाएँ हाथ से ठुड्डी खुजलाता सपाटे से शेर की तरह वह हम लोगों के सामने खड़ा हो गया, लगता था, बिना हाथ लगाए आँखों से चीर कर सबके दो टुकड़े कर देगा।


हम उसके वार के इन्तज़ार में थे कि यकायक वह अपनी पत्नी की तरफ़ मुख़ातिब हुआ, महीन आवाज़ - जिसे हमने पहली बार सुनी थी - में बोला - इतनी चिल्ला चोट क्यों? यहाँ झगड़ा-झंझट है तो परली पार से पानी ले आओ। वहाँ भी फसाद हो, तो नद्दी से काढ़ लाओ।


पत्नी तमक कर हाथ मटकाती बोली - और तू मर्द होके कमर पे हाथ रख खड़ा रह बीड़ी पीता!


वह बोला - मेरा तो अपने हक के लिए भी किसी से कर्रा बोलते जी मितलाता है। झगड़ा करूँ तो पता नहीं क्या हो। .... तेरे पाँव पड़ता हूँ, अकड़फूँ छोड़, ऊपर आ ....


यह कहता वह धीरे-धीरे चलता, सीढ़ियाँ झन्नाता ऊपर चला गया।


हम लोगों पर बिजली-सी गिर पड़ी। लगा, किसी ने उस व्यक्ति का नहीं, हमारा काम तमाम कर दिया है।

कुलीन कवियों की आत्ममुग्धता😊 # भारतेंदु मिश्र

कुलीन कवियों की आत्ममुग्धता/ भारतेंदु मिश्र


😀🙃😀😀😀😀😃😃😃😃😃😃😃😃😃🙃🙃

कविता की राजनीति पर चर्चा हो रही है।कुछ कुलीन कवि उस चर्चा को आगे बढ़ा रहे हैं।उन्हें मालूम है कि उनके सजातीय, संगोत्रीय संगोष्ठी में बुलाए जा चुके हैं। कुछ भक्त पत्रकार ,कुछ उनकी कृपा से  नौकरी पाए हुए अघाए हुए कवि नुमा लोग उनकी चर्चा को चर्चित करने के लिए आतुर बैठे हैं।प्रकाशक ने बैनर देकर दरी बिछा दी है।उसे अपना धंधा चलना है।अचर्चित कम चर्चित पुस्तकें बेचनी हैं उसकी भी अपनी राजनीति है। कविता  की राजनीति पर कुलीन कवि ही बोल सकते हैं।ये कुलीनता उन्होंने लगातार हिंदी की जनोन्मुख छंदोबद्ध कविताओं और ऐसे कवियों को उपेक्षित करके,उनकी लोकोन्मुख कविताओं को लतिया कर अर्जित की है।  प्रकशित होने के लिए आयी ऐसी कविताओं को तब उन्होंने बहुत जतन से फाड़ कर कचरापेटी में फेंका था।उन्होंने बन्द कमरे में शपथ ली थी कि कुछ खास पत्र और पत्रिकाओं में न ये कविताएं छपेंगी और न कभी छंदोबद्ध कवियों की चर्चा  होगी।और यह भी कि हिंदी के नाम से जो सम्मान और पुरस्कार सुलभ हैं उन्हें किस आधार पर मिलकर बाँट लिया जाए। ये कुलीन कवियों की सेवा से हुए लाभ पर भी विमर्श करते हैं। बड़ा कुलीन नामवरी दांव से युवा कुलीन को अपने तौर सिखाता गया।इन्होंने लोक कवियों का दम घोट दिया।लेनिन और मॉर्क्स ने ब्रज, अवधी, बुंदेली कविताओं और उनकी संवेदना पर कभी विचार नहीं किया था तो ये कैसे समझ पाते।संघियों ने राष्ट्रवाद और धार्मिक हेरा फेरी के अलावा मनुष्य को देखा ही नहीं।विचार विमर्श तो बहाने हैं।कविता के इन कुलीन कारीगरों ने जनता के सामने कई परदे लगा दिए। विद्यार्थियों के सामने झूठ मूठ के तर्कों से स्वयं को सबसे बड़ा जनवादी सबसे बड़ा वाला प्रगतिशील साबित करने में कामयाब हुए। घटिया कवियों की घटिया कविताएं पाठ्यक्रमों में घुसा दीं।मार्क्सवादी कुलीनता का संबंध सांध्य संगोष्ठियों के बाद होने वाली तदुपरांत सुरा गोष्ठी में पर्यवसित होकर फलदायी होता है। इसी रास्ते पर चलकर सिद्ध प्रसिद्द कवि से कविराज बना जा सकता है।पत्रिकाओं में अपने ऊपर विमर्श कैसे प्रायोजित कराया जाए ये सब कुलीनता की राजनीति का हिस्सा है।

इनकी कविताओं में इनका दम फूल चुका है।लेकिन कविता की राजनीति को तो जिंदा रखना है।इस लिए ये इस प्रकार के आयोजनों के माध्यम से खुद को मीडिया में जिंदा रखे हैं।छपास और पुरस्कारास का लोभ इन नए मुमूर्ष कवियों को इन बचे खुचे कुलीन कवियों से जोड़े है। प्रगतिशील कुलीन कवि मौके पर चौका लगाने की राजनीति में निपुण हो चुके हैं।लेकिन अब सोशल मीडिया इन्हें परास्त कर चुका है।

अब "जनसत्ता" में ,या फिर "तद्भव" "हंस" में कविता और कहानी न छपे तो भी कवि बनने का मार्ग सोशल मीडिया ने खोल दिया है।अब अकुलीन कच्चे कवियों  को कब तक रोका जा सकता है।आलोचक तो हैं भी नहीं, जो एक दो हैं भी वो नए कवियों पर बात नहीं करते।अब आत्ममुग्धता केवल कुलीन कवि में  ही नहीं बल्कि तमाम दलित,स्त्रियां, और नए अकुलीन कवियों की जमात में कोरोना वायरस की तरह आत्ममुग्धता ने संक्रमण कर लिया है।इनकी कुलीन चेतना का मोहभंग होने में अब देर नहीं है।

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...