रविवार, 1 अगस्त 2021

संयम

 || कहानी जीवन की ||– बुरे समय में सयंम रखें


जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी। वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी, कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये।


वहां पहुँचते ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।


उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।


उसने दाये देखा, तो एक शिकारी तीर का निशाना, उस की तरफ साध रहा था। घबराकर वह दाहिने मुडी, तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था। सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुडी, तो नदी में जल बहुत था।


मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी। अब क्या होगा ? क्या हिरनी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी ? क्या शावक जीवित रहेगा ?


क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी ? क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी ?क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी ? वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो ?


हिरनी अपने आप को शून्य में छोड, अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी। कुदरत का कारिष्मा देखिये। बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी। उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते, शेर की आँख में जा लगा,शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा।और शिकारी, शेर को घायल ज़ानकर भाग गया। घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी। हिरनी ने शावक को जन्म दिया।


 शिक्षा :- हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है, जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं और कोई निर्णय नहीं ले पाते। तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। निर्णय ईश्वर करता है हमें उस पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।

*सदैव जपिए* :--

*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे*

*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे*

भगवान के साथ की ख़ुशी

 भगवान से कैसे मिलें🙏


एक 6 साल का छोटा सा बच्चा अक्सर भगवान से मिलने की जिद किया करता था। उसे भगवान् के बारे में कुछ भी पता नही था , पर मिलने की तमन्ना, भरपूर थी। उसकी चाहत थी की एक समय की रोटी वो भगवान के साथ बैठकर खाये।


एक दिन उसने एक थैले में 5,6 रोटियां रखीं और परमात्मा को को ढूंढने के लिये निकल पड़ा।


चलते चलते वो बहुत दूर निकल आया संध्या का समय हो गया। उसने देखा एक नदी के तट पर एक बुजुर्ग माता बैठी हुई हैं, जिनकी आँखों में बहुत ही गजब की चमक थी, प्यार था, किसी की तलाश थी , और ऐसा लग रहा था जैसे उसी के इन्तजार में वहां बैठी उसका रास्ता देख रहीं हों।


वो मासूम बालक बुजुर्ग माता के पास जा कर बैठ गया, अपने थैले में से रोटी निकाली और खाने लग गया।

फिर उसे कुछ याद आया तो उसने अपना रोटी वाला हाथ बूढी माता की ओर बढ़ाया और मुस्कुरा के देखने लगा, बूढी माता ने रोटी ले ली , माता के झुर्रियों वाले चेहरे पे अजीब सी खुशी आ गई आँखों में खुशी के आंसू भी थे ,


बच्चा माता को देखे जा रहा था , जब माता ने रोटी खाली बच्चे ने एक और रोटी माता को दे दी ।

माता अब बहुत खुश थी। बच्चा भी बहुत खुश था। दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह केे पल बिताये।


जब रात घिरने लगी तो बच्चा इजाजत लेकर घर की ओर चलने लगा और वो बार- बार पीछे मुडकर देखता ! तो पाता बुजुर्ग माता उसी की ओर देख रही होती हैं ।


बच्चा घर पहुंचा तो माँ ने अपने बेटे को आया देखकर जोर से गले से लगा लिया और चूमने लगी,

बच्चा बहूत खुश था। माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो ख़ुशी का कारण पूछा,

तो बच्चे ने बताया!


माँ ! ....आज मैंने भगवान के साथ बैठकर रोटी खाई, आपको पता है माँ उन्होंने भी मेरी रोटी खाई,,, पर माँ भगवान् बहुत बूढ़े हो गये हैं,,, मैं आज बहुत खुश हूँ माँ....


उधर बुजुर्ग माता भी जब अपने घर पहुँची तो गाव वालों ने देखा माता जी बहुत खुश हैं, तो किसी ने उनके इतने खुश होने का कारण पूछा ..??


माता जी बोलीं,,,, मैं दो दिन से नदी के तट पर अकेली भूखी बैठी थी,, मुझे पता था भगवान आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे।

आज भगवान् आए थे, उन्होंने मेरे सांथ बैठकर रोटी खाई मुझे भी बहुत प्यार से खिलाई, बहुत प्यार से मेरी ओर देखते थे, जाते समय मुझे गले भी लगाया,, भगवान बहुत ही मासूम हैं बच्चे की तरह दिखते हैं।


इस कहानी का अर्थ बहुत गहराई वाला है।

वास्तव में बात सिर्फ इतनी है की दोनों के दिलों में ईश्वर के लिए अगाध सच्चा प्रेम था ।

और प्रभु ने दोनों को , दोनों के लिये, दोनों में ही ( ईश्वर) खुद को भेज दिया।


जब मन ईश्वर भक्ति में रम जाता है तो, हमे हर एक जीव में वही नजर आता है।


जय श्री सीता राम

सुंदरकांड में एक प्रसंग / किरण अग्रवाल

 मैं_न_होता__तो_क्या_होता_❔  “अशोक वाटिका" में  जिस समय रावण क्रोध में भरकर, तलवार लेकर, सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर, इसका सर काट लेना चाहिये।


किन्तु, अगले ही क्षण, उन्हों ने देखा "मंदोदरी" ने रावण का हाथ पकड़ लिया !यह देखकर वे गदगद हो गये! वे सोचने लगे, यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?


बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मैं न होता, तो क्या होता ? 

परन्तु ये क्या हुआ?

सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।


आगे चलकर जब "त्रिजटा" ने कहा कि "लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!" तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये, कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है और त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा।


जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े, तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब "विभीषण" ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।


आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नहीं जायेगा, पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर, घी डालकर, आग लगाई जाये, तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता, और कहां आग ढूंढता? पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया! जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है?


इसलिये सदैव याद रखें, कि संसार में जो हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है! 

हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं।

🚩🙏❤

कंस क़ो मारने के बाद

 कंस को मारने के बाद कृष्ण अपने माता-पिता वासुदेव और देवकी को मुक्त करने के लिए जेल गए


 देवकी ने कृष्ण से पूछा

प्रिय पुत्र तुम स्वयं महान भगवान हो  कंस को मारने और हमें मुक्त करने के लिए आपने चौदह वर्षों तक प्रतीक्षा क्यों की?


 कृष्ण ने उत्तर दिया 

आदरणीय माँ आपने मुझे हमारे पिछले जन्म में चौदह वर्षों के लिए वन क्यों भेजा किस कारण से?


 देवकी ने कहा कि तुम ऐसा क्यों कहते हो कि मैंने तुम्हें वन भेजा है  यह असंभव है


 तब कृष्ण ने कहा कि आप भूल गए हो कि पिछले जन्म में आप कैकेयी  और पिता दशरथ थे


 देवकी अवाक रह गई और  जिज्ञासा से पूछा इस जीवन में कौशल्या कौन है?


 कृष्ण ने उत्तर दिया  माता यशोदा


 कर्म का प्रभाव किसी को नहीं बख्शता  भगवान भी इसे बायपास नहीं कर सकते


 देखिए कर्म का नियम कितना बेदाग है।  *नित्य मुक्ति* ही उपाय है।


🌹‼️🙏जय श्री कृष्णा जी🙏‼️🌹

दिल से जुड़ा दिल का रिश्ता ख़ास दोस्ती है...

 दिल से जुड़ा दिल का रिश्ता ख़ास दोस्ती है...

टूट न पाये जो कभी वो विश्वास दोस्ती है...

सर्दी में गुनगुनाती धूप सा अहसास दोस्ती है...

आंसुओं में लाये मुस्कान वो साथ दोस्ती है...

गिरते हुए को थाम ले वो हाथ दोस्ती है...

कड़ी धूप में घने पेड़ की छाया दोस्ती है...

मोती की माला में पिरोया अहसास दोस्ती है...

अहसासों में बंधे रिश्ते का विश्वास दोस्ती है...

जीवन के सफर की मुस्कान दोस्ती है...

दोस्तों से बनी पहचान दोस्ती है...

धड़कते दिल का अरमान दोस्ती है...

अटकी हुई सांसों की जान दोस्ती है...

दिल से दिल की पहचान दोस्ती हैं...

दिलों से मिला सम्मान दोस्ती हैं...

गैरों में अपनों का भान दोस्ती हैं...

छूं ले जज्बातों के आसमान दोस्ती हैं...

प्यार भरा पैगाम दोस्ती हैं...

दिये सा रोशन उजास दोस्ती हैं...

जिंदगी निखारने का सामान दोस्ती हैं....

ऐसे दोस्तों को समर्पित ये 'कलाम' भी तो दोस्ती है...!

मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें....!!

आप सभी का साथ यूँ ही बना रहे....!!!!

कायस्थ समुदाय

 *कायस्थ समाज / *एक बुद्धिमान समाज*

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प्रस्तुति - प्रकाश नारायण


*यह वाक्या, बात उस समय का है जब बादशाह अकबर थे, एक दिन उन्होंने वीरबल से पूँछा, वीरबल हिंदुस्तान में सबसे बुद्धिमान समाज कौन सा है।*

*वीरबल :- हुजूर "कायस्थ" सबसे बुद्धिमान समाज है।*

*अकबर तो हर बात का प्रमाण चाहते थे*

*अकबर:- हमे इसका दीदार (प्रैक्टिकल) रूबरू कराओ*

*वीरबल ने सभी समाज और जातियों के दो दो लोगो की लाल किले में बुलाया, जब सब लोग लाल किले के दीवाने आम में आये तो दोनों कायस्थ भाई सबसे आगे थे, जो अकबर के बिल्कुल नजदीक (अगर कभी मिले तो अकबर पहचान लें)*

*अब वीरबल ने अकबर का फरमान सबको सुनाया*

*वीरबल :- आप सभी लोग अपनी अपनी मूँछे बादशाह की भेंट करें। यह सुन दोनो कायस्थ भाई धीरे धीरे लाइन मे सबसे पीछे चले गए।*

*सब लोग आते गए और उनकी मूँछे कटती गई और अंत मे दोनो कायस्थ भाई ही रह गए और अब उनका ही नंबर था।*

*तब कायस्थ भाई बोले कि हम मूँछे तो कटवा ले "पर" एक बात है।*

*वीरबल ने अकबर के कान में कहा कि देखिए अब इनके "पर" निकलने शुरू हो गए।*

*अकबर:- बोले क्या बात है।*

*कायस्थ भाई:- हमारे हिन्दू समाज मे मूँछे तब कटती है जब पिता का स्वर्गवास हो जाता है और बड़े होने पर जब हमारी मूँछे निकलती है तब तक कम से कम 10,000 दीनारों का खर्चा आ जाता है। तब अकबर के आदेश पर 10,000 दीनार की थैली दी गई, कायस्थ भाइयों ने थैली को तुरंत पकड़ लिया और बोले कि हुजूर इसकी क्या जरूरत है। अकबर ने कहा कि भुगतान पूरा हुआ अब यह शाही मूँछे हो गई है दोनो कायस्थ भाइयों ने इसकी सहमति दी।*

*जब शाही हज्जाम ने उनकी मूंछों पर पानी लगाना शुरू किया, तभी शाही हज्जाम पर दो झापड़ रसीद किये हज्जाम चिल्लाया हुजूर मुझे मारा, अकबर के पूछने पर कायस्थ भाई ने कहा कि यह इन शाही मूंछो पर बेअदबी से पानी लगा रहा है इसको बोलो की आदाब और तमीज से पानी लगाए, अकबर भी हज्जाम से बोले कि आदाब से पानी लगाओ।*

 *अब जैसे ही शाही हज्जाम ने कायस्थ भाई की मूँछो पर उस्तरा लगाया, तभी उस हज्जाम को चार झापड़ और रसीद किये।*

*अब शहंशाह अकबर आए और बोले कि हमारे हज्जाम को क्यों मारा। तब कायस्थ भाई से कहा कि हुजूर हमारे बुजुर्गो ने हमे यही शिक्षा दी है कि बादशाह सलामत की इज्जत के लिये अपना सिर कटवा देना पर उनकी मूँछे झुकने भी नही देना। आपने इनका भुगतान कर दिया है अब यह शाही मूँछे आपकी  हो गई है हमारे रहते हुये यह आपकी मूँछे कैसे कोई काट सकता है।*

*बात बादशाह अकबर की समझ मे आई और शाही हज्जाम पर चिल्ला कर बोले कि यह शाही मूँछे है यह नही काटी जाएगी। जब दोनों कायस्थ भाई वहाँ से विदा लेकर चले गए तब वीरबल ने बादशाह से कहा कि दोनों कायस्थ भाई 10,000 दीनार की रकम ले गए, आपके शाही हज्जाम को 4, 6 झापड़ मार गए और अपनी मूँछे भी सही सलामत ले गए अब आप ही फैसला करे कि कौन सी जाति बुद्धिमान है।*

*बादशाह अकबर ने कहा वीरबल तुम सही कह रहे हो वास्तव में "कायस्थ समाज का बुद्धिमानी में कोई  जबाब ही नही है।"*

*चित्रगुप्त भगवान की जय*

✍✍✍

*धन्यवाद*

खुद क़ो जानो

 *एक लड़का जब २० साल का हुआ तो उसके पिता ने उसे एक पुराना कपड़ा देकर उसकी कीमत पूछी।*

💧

*लड़का बोला 100 रु। तो पिता ने कहा कि इसे बेचकर दो सौ रु लेकर आओ। लड़के ने उस कपड़े को अच्छे से साफ़ कर धोया और अच्छे से उस कपड़े को फोल्ड लगाकर रख दिया।अगले दिन उसे लेकर वह रेलवे स्टेशन गया,जहां कई घंटों की मेहनत के बाद वह कपड़ा दो सौ रु में बिका।*


*कुछ दिन बाद उसके पिता ने उसे वैसा ही दूसरा कपड़ा दिया और उसे 500 रु में बेचने को कहा।*


*इस बार लड़के ने अपने एक पेंटर दोस्त की मदद से उस कपड़े पर सुन्दर चित्र बना कर रंगवा दिया और एक गुलज़ार बाजार में बेचने के लिए पहुंच गया।एक व्यक्ति ने वह कपड़ा 500 रु में खरीदा और उसे 100 रु इनाम भी दिया।*


*जब लड़का वापस आया तो उसके पिता ने फिर एक कपड़ा हाथ में दे दिया और उसे दो हज़ार रु में बेचने को कहा। इस बार बच्चे को पता था कि इस कपड़े की इतनी ज्यादा कीमत कैसे मिल सकती है । उसके शहर में मूवी की शूटिंग के लिए एक नामी कलाकार आई थीं।लड़का उस कलाकार के पास पहुंचा और उसी कपड़े पर उनके ऑटोग्राफ ले लिए।*


*ऑटोग्राफ लेने के बाद बच्चे ने उसी कपड़े की बोली लगाई। बोली दो हज़ार से शुरू हुई और एक व्यापारी ने वह कपड़ा 12000 रु में ले लिया!*


*रकम लेकर जब लड़का घर पहुंचा तो खुशी से पिता की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने बेटे से पूछा कि इतने दिनों से कपड़े बेचते हुए तुमने क्या सीखा?*


*लड़का बोला -"पहले खुद को समझो,खुद को पहचानो। फिर पूरी लगन से मन्ज़िल की और बढ़ो,क्योकि जहां चाह होती है,राह अपने आप निकल आती है।"*


*पिता बोले कि तुम बिलकुल सही हो,मगर मेरा ध्येय तुमको यह समझाना था कि*


*"कपड़ा मैला होने पर इसकी कीमत बढ़ाने के लिए उसे धो कर साफ़ करना पड़ा,फिर और ज्यादा कीमत मिली जब उस पर एक पेंटर ने उसे अच्छे से रंग दिया और उससे भी ज्यादा कीमत मिली जब एक नामी कलाकार ने उस पर अपने नाम की मोहर लगा दी।"*


*"संघर्ष ही जीवन है।ऐसे ही छोटे-छोटे कदमों से चलते हुए रास्ते की बाधाएं साहस और सूझबूझ से सुलझाओगे तो मंजिल बड़े प्यार से तुम्हारा स्वागत करेगी।*


*कुसंग से बचते हुए लक्ष्य पर ध्यान एकाग्र करो।अपने परम हितैषी माता पिता की सलाह को मानो और ईश्वर की कृपा का भी सहारा लो,सफलता तुम्हारे कदम अवश्य चूमेगी।"*

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...