बुधवार, 4 मई 2022

ताज से भी सुंदर है यह समर्पण

 #प्रेम का स्मारक ताजमहल नहीं यह है..



चित्र में दिखाई गई महिला की फोटो को ज़ूम करके देखेंगे तो उनके गले में पहना हुआ एक बड़ा डायमंड दिखाई देगा ..... यह 254 कैरेट का #जुबली डायमंड है जो आकार और वजन में विश्व विख्यात "कोह-ए-नूर" हीरे से दोगुना है ...


ये महिला मेहरबाई टाटा हैं जो जमशेदजी टाटा की बहू और उनके बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा की पत्नी थीं ...


सन 1924 में प्रथम विश्वयुद्ध के कारण जब मंदी का माहौल था और #टाटा कंपनी के पास कर्मचारियों को वेतन देने के पैसे नहीं थे... तब मेहरबाई ने अपना यह बेशकीमती जुबली डायमंड *इम्पीरियल बैंक में 1 करोड़ रुपयों में गिरवी* रख दिया था ताकि कर्मचारियों को लगातार वेतन मिलता रहे और कंपनी चलती रहे ...


इनकी ब्लड #कैंसर से असमय मृत्यु होने के बाद सर दोराबजी टाटा ने भारत के कैंसर रोगियों के बेहतर इलाज के लिये यह हीरा बेचकर ही टाटा मेमोरियल कैंसर रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की थी ...


प्रेम के लिये बनाया गया यह स्मारक #मानवता के लिये एक उपहार है .... विडम्बना देखिये हम प्रेम स्मारक के रुप मे ताजमहल  को महिमामंडित करते रहते हैं ,और जो हमें जीवन प्रदान करता है, उसके इतिहास के बारे में जानते तक नहीं ....!

साभार

मंगलवार, 3 मई 2022

वो इंसान बुरा है 🙃🙃🙃

 "मंदिर"में दाना चुगकर चिड़ियां


प्रस्तुति - कमल शर्मा 

👍🏼👌🏽👌🏽✌🏼🙏🏿😀😀😀😀😃😃😃


"मस्जिद" में पानी पीती हैं

मैंने सुना है "राधा" की चुनरी 

कोई "सलमा"बेगम सीती हैं                         


एक "रफी" था महफिल महफिल 

"रघुपति राघव" गाता था 

एक "प्रेमचंद" बच्चों को

"ईदगाह" सुनाता था 


कभी "कन्हैया"की महिमा गाता

 "रसखान" सुनाई देता है 

औरों को दिखते होंगे "हिन्दू" और "मुसलमान"

मुझे तो हर शख्स के भीतर "इंसान"

दिखाई देता है...


क्योंकि...

ना हिंदू बुरा है ना मुसलमान बुरा है

जिसका किरदार बुरा है वो इन्सान बुरा है !!!🙃🙃🙃


सभी को ईद, अक्षय तृतीया , परशुराम जयन्ति की शुभकामनाएं  |


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संभोग से समाधि तक (पर) तर्क वितर्क

 बड़े विनीत भाव से कहना चाहूंगा कि न तो मैं ओशो का शिष्य हूं, न ही ओशो दर्शन में मेरी कोई विशेष आस्था है।फिर भी जहां तक और जितना भी ओशो का साहित्य मैंने पढ़ा है, उसमें सिद्धार्थ ताबिश के आलेख का कथ्य कहीं मिला नहीं। इसलिए कहीं न कहीं आलेख से मेरी असहमति भी है। ऐसा प्रतीत होता है कि सिद्धार्थ भाई ने भी ओशो को नया-नया पढ़ा है, इसलिए “खुलकर लिख” रहे हैं।

ओशो दर्शन और साहित्य में इस बात का शायद ही कहीं उल्लेख हो कि अति की अवस्था से विरक्ति पैदा होती है।आलेख के मुताबिक अति मयनोशी, कामक्रीड़ा या हिंसाचार एक समय कर्ता में विरक्ति का भाव पैदा करता है। लेखक (सिद्धार्थ ताबिश) ने शायद ओशो की कृति “संभोग से समाधि तक” के कथ्य को इसी तरह से हृदयंगम किया है या समझा है। यह पुस्तक मैंने भी पढ़ी है, लेकिन इसमें मुझे तो ऐसा कहीं कुछ मिला नहीं। हां, संभोग क्रिया से विरक्ति या मोहभंग की बात इसमें ज़रूर है, लेकिन यह विरक्ति या वितृष्णा अति-काम से पैदा नहीं होती। दूसरी बात कि यह विरक्त भाव ही परमानंद की अवस्था का आरंभ है, सर्वशक्तिमान से साक्षात्कार का अनुभव है।

इस विरक्ति की प्राप्ति के लिए मनुष्य को संभोग के दौरान कठिन अभ्यास से गुजरना पड़ता है। कुछ इतना कठिन कि हम जैसे भोग में आकंठ लिप्त आम इंसान के लिए तो वह लगभग असंभव है। ओशो ने इसके लिए स्खलन पर संपूर्ण नियंत्रण के अभ्यास को निरंतर मज़बूत करने की बात कही है। इस अभ्यास के आरंभ में कुछ सेकेंडों का यह समय बढ़ाते-बढ़ाते घंटों तक और अंतत: आपकी इच्छा के वशवर्ती हो जाने तक ले जाना है। यह स्खलन से पार पाने की अवस्था होगी और तब आप निश्चित रूप से विरक्ति या अहोभाव के प्रांगण में प्रवेश पाएंगे। संभोग या सेक्स की अति से इस विरक्ति का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। प्रस्तुत पुस्तक या संपूर्ण ओशो दर्शन में ऐसा कहीं लिखा या कहा भी नहीं गया है।

बक़ौल ओशो, संभोग और स्खलन एक दूसरे से जुड़ी हुई, लेकिन दो भिन्न अवस्थाएं हैं। संभोग घंटा-दो घंटा चल सकता है, लेकिन स्खलन अधिकतम मिनट भर की क्रिया है। हमें संभोग नहीं, स्खलन को साधना है, उसका अभ्यास करना है, उसके पार जाना है। ध्यान रहे कि वियाग्रा या शिलाजीत जैसे कृत्रिम उपायों से हम संभोग क्रिया की अवधि तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन स्खलन की अवस्था आते ही ये उपाय बेअसर साबित हो जाते हैं। ओशो के मुताबिक हमें स्खलन के ऐन चंद सेकेंड पहले के आनंदित क्षणों को दीर्घावधि और आखिरकार स्थायी बनाना है। इस क्षण के पहले की अवस्था कामक्रीड़ा है और इसके बाद की अवस्था स्खलन यानी प्रशांति और क्लांति की है। लिहाजा महत्वपूर्ण वह मध्यकाल है, जब स्खलन से ठीक पहले मेरूदंड में झुरझुरी या सिहरन शुरू होती है। सिहरन की इसी अवस्था को दीर्घकालिक और स्थायी बनाना है। तब जाकर खुलता है विरक्ति का दरवाजा। इस अवस्था में स्खलन कोई मुद्दा या विषय रह ही नहीं जाता है। आप संभोग करें या न करें, स्खलन पूर्व के आनंद का अहसास आपके मन-मस्तिष्क पर हमेशा रहता है। तब संभोग या स्खलन की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है। ओशो ने इसके लिए श्वास और मस्तिष्क पर नियंत्रण समेत कई विधियां बताई हैं।

यदि स्खलन पर आपका वश नहीं है तो फिर आपका इस विरक्ति या परमानंद से साक्षात्कार असंभव है। एक साधारण मनुष्य तो संभोग से विरत नहीं हो पाता है! समय और सामर्थ्य उपलब्ध होने तक वह भोग में लिप्त ही रहता है या रहना चाहता है। भोग में इस कदर पिले पड़े रहने के बावजूद उसमें सेक्स से कभी विरक्ति पैदा ही नहीं होती। इसलिए बेतहाशा संभोग विरक्ति नहीं, भोगलिप्सा की अभिवृद्धि करता है। यही कारण है कि मनुष्य में भोग की लालसा जरायु तक जिंदा रहती है। उम्मीद है कि मेरी असहमति का कोई साथी अन्यथा नहीं लेंगे। सिद्धार्थ जी भी नहीं।

ए

एक  पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित


साभार  B4M.

सोमवार, 2 मई 2022

काश / रतन कुमार अगरवाला

 कविता /: काश


लोग सपने तो बहुत देखते हैं, पर उन्हे पूरा करने के लिए कर्म पथ पर पूरे उद्यम के साथ बिरले ही आगे बढ़ते हैं । भाग्य के सहारे बैठे रहने से भाग्योदय नहीं होता । इसी भाव को शब्दों में पिरोने की एक छोटी सी कोशिश है मेरी रचना “काश”…………..


काश ऐसा होता, काश वैसा होता,

काश ये न होता, काश वो न होता ।

काश, “काश” से पूरी होती आस,

बन गया “काश” सिर्फ सपनो का आकाश ।


काश में जो सिमट कर रहता,

मिलता नही उसे आज से अवकाश ।

कल की राह वह ढूंढ न पाता,

काश ही उसके सपनो का आकाश ।


काश की कैद से निकल अगर,

कल पर करता गहरी शोध,

और भी बहुत हो जाता हासिल,

प्रगति में होता न यूं अवरोध ।


बुरी होती यह काश की बंदिशें,

दिमाग हो जाता काश से कुंद ।

काश से न मिलता आकाश,

कल का मार्ग हो जाता रूद्ध ।


मिलता उन्हीको अपना आकाश,

जो न रहते काश के साथ ।

छोड़ कर लगाम इस काश की,

आगे बढ़ते जोश के साथ ।


काश का चोगा पहनते जो,

छोटी लड़ाई भी जाते हार ।

लक्ष्य की ओर जो बढ़ते जाते,

जीत जाते हर बड़ा समर ।


काश तो होता सपनो का वास,

पूरे करने को करो साधना ।

काश में ही मिट जायेंगे सब,

अगर न हो लक्ष्य की आराधना ।


छोड़ो अभी से काश का दामन,

कर्म पथ का करो आचमन ।

बढ़ो सदा गंतव्य की ओर,

शिखर से होगा आर्लिंगन् ।


काश तो है बहाना आलस्य का,

कुछ न करने का आलम है काश ।

काश की वेदना काश कोई जाने,

काश में है हताशा और संत्रास ।


काश से कभी न पूरे होते सपने,

रह जाते सपने यूहीं आधे अधूरे ।

काश का दामन न छोड़ें तो,

रह जाएंगे पीछे कदम बहुतेरे ।


काश से न होता जीवन यापन,

काश ही में रह जाओगे आजीवन ।

काश से न होता जीवन का आकलन,

काश नहीं कभी कर्म का साधन । 


काश के स्वप्नजाल में फंसे लोगों को आगाह करती हुई रचना ।



  रतन कुमार अगरवाला

गुवाहाटी, असम

सृजन तिथि : १५.०८.२०२१


हिन्दी विभाग मगध विवि

राणा प्रताप तेरा घोड़ा भी रजपूती धर्म निभाता था ।।

 भस्म उड़ा कर मिट्टी की, सर हाथी के चढ़ जाता था।

राणा प्रताप तेरा घोड़ा भी रजपूती धर्म निभाता था ।।


चेतक की हस्ति मिटा सकें अकबर तेरी औकात नहीं।

मेरे ह्रदय में राणा धड़कता है जिसका तुमको आभास नही ।।


रामप्रसाद से हाथी ने जीवन को अर्पित कर डाला   ।

सौगंध वीर महाराणा की एक कण भी मुख में नही डाला।


रोइ थी हल्दी घाटी मंजर रक्त विलीन था।

दिल्ली की गद्दी कंपि है  जिसपर अकबर आसीन था।।


चीख पड़ी है हल्दी घाटी  चेतक अध बेहोश है।

अखंड सौर्य ले उड़ा है चेतक मृत्यु तक ख़ामोश है।।


हरण करे तलवार प्राण जिन्हें बरन करे म्रत्यु रानी।

लाखों जाने अर्पित हैं चेतक को छोड़ दे महारानी।।


चेतक की चिंघाड़ बिना मेरा सूर्य उदय क्या होयगा।

चेतक की यादों में राणा पल पल आँख भिगोएगा।।


चेतक चढ़के युद्ध में दुश्मन भगा भगा के मारे हैं।

उछल उछल के चेतक ने कई दबा दबा के गाड़े हैं।।


गिरा धरा पर धड़ चेतक का कैसी मदहोशी छाई है।

आँख खोल मेरे प्यारे चेतक आगे और लड़ाई    हैं।।


चिर हवा को उड़ता चेतक पवन देख   थर्राता है  ।

महाराणा में तेरा सिंघासन मृत्यु तक का नाता है।।


ठुमक ठुमक के चेतक चलता   नंगी तलवार दीवानी हैं।

घोड़े हाथी बलिदान दिये इतिहासों में अमर कहानी है।।


जय महाराणा 🙏

जय राजपुताना

रविवार, 1 मई 2022

*!! कभी किसी को छोटा न समझें !!*

 *⚜️ आज का प्रेरक प्रसंग ⚜️*


 कभी किसी को छोटा न समझें !!*-


प्रस्तुति - उषा रानी /राजेंद्र प्रसाद सिन्हा 


       



एक जंगल में एक शेर सो रहा था। अचानक एक चूहा शेर को सोता देखकर उसके ऊपर आकर खेलने लगा। जिसके कारण उछलकूद से शेर की नींद खुल गयी और उसने उस चूहे को पकड़ लिया। चूहा डर से कांपने लगा और शेर से बोला- हे राजन! हमें माफ़ कर दो। जब कभी आपके ऊपर कोई दुःख आएगा तो मैं आपकी सहायता कर दूंगा। तो शेर हंसते हुए बोला- मैं सबसे अधिक शक्तिशाली हूं, मुझे किसी की सहायता की क्या जरूरत, यह कहते हुए उसने चूहे को छोड़ दिया।


कुछ दिनों बाद वही शेर शिकारी द्वारा फैलाये गये जाल में फंस गया और फिर खूब जोर लगाया लेकिन वह जाल से छुटने की अपेक्षा और अधिक फंसता चला गया। यह सब देखकर पास में ही उस चूहे की नजर शेर पर पड़ी तो उसने शेर की सहायता वाली बात याद दिलाकर अपने नुकीले दांतों से जाल काट दिया और फिर शेर जाल से आजाद हो गया। इस प्रकार चूहे ने अपने जान की कीमत शेर की जान को बचाकर पूरा किया।


*शिक्षा:-*

कभी किसी को छोटा समझकर उसकी शक्ति नहीं आंकनी चाहिए क्यूंकी मुसीबत में किसी की भी सहायता की जरूरत पड़ सकती है।


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

अच्छाई की तलाश करें !!*

 *⚜️ ⚜️*


        

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किसी गाँव में एक किसान को बहुत दूर से पीने के लिए पानी भरकर लाना पड़ता था. उसके पास दो बाल्टियाँ थीं जिन्हें वह एक डंडे के दोनों सिरों पर बांधकर उनमें तालाब से पानी भरकर लाता था. उन दोनों बाल्टियों में से एक के तले में एक छोटा सा छेद था जबकि दूसरी बाल्टी बहुत अच्छी हालत में थी. तालाब से घर तक के रास्ते में छेद वाली बाल्टी से पानी रिसता रहता था और घर पहुँचते-पहुँचते उसमें आधा पानी ही बचता था. बहुत लम्बे अरसे तक ऐसा रोज़ होता रहा और किसान सिर्फ डेढ़ बाल्टी पानी लेकर ही घर आता रहा.


अच्छी बाल्टी को रोज़-रोज़ यह देखकर अपने पर घमंड हो गया. वह छेदवाली बाल्टी से कहती थी की वह आदर्श बाल्टी है और उसमें से ज़रा सा भी पानी नहीं रिसता. छेदवाली बाल्टी को यह सुनकर बहुत दुःख होता था और उसे अपनी कमी पर लज्जा आती थी. छेदवाली बाल्टी अपने जीवन से पूरी तरह निराश हो चुकी थी. एक दिन रास्ते में उसने किसान से कहा – “मैं अच्छी बाल्टी नहीं हूँ. मेरे तले में छोटे से छेद के कारण पानी रिसता रहता है और तुम्हारे घर तक पहुँचते-पहुँचते मैं आधी खाली हो जाती हूँ.”


किसान ने छेदवाली बाल्टी से कहा – “क्या तुम देखती हो कि पगडण्डी के जिस और तुम चलती हो उस और हरियाली है और फूल खिलते हैं लेकिन दूसरी ओर नहीं. ऐसा इसलिए है कि मुझे हमेशा से ही इसका पता था और मैं तुम्हारे तरफ की पगडण्डी में फूलों और पौधों के बीज छिड़कता रहता था जिन्हें तुमसे रिसने वाले पानी से सिंचाई लायक नमी मिल जाती थी. दो सालों से मैं इसी वजह से अपने देवता को फूल चढ़ा पा रहा हूँ. यदि तुममें वह बात नहीं होती जिसे तुम अपना दोष समझती हो तो हमारे आसपास इतनी सुन्दरता नहीं होती.”


*शिक्षा:-*

मुझमें और आपमें भी कई दोष हो सकते हैं. दोषों से कौन अछूता रह पाया है. कभी-कभी ऐसे दोषों और कमियों से भी हमारे जीवन को सुन्दरता और पारितोषक देनेवाले अवसर मिलते हैं. इसीलिए दूसरों में दोष ढूँढने के बजाय उनमें अच्छाई की तलाश करें..!! 


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...