बुधवार, 23 अगस्त 2023

आ पहुंचे हम, चंदामामा ! / योगेन्द्र दत्त शर्मा

 बालगीत

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आ पहुंचे हम, चंदामामा !

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देखो, तुमसे हाथ मिलाने

आ पहुंचे हम, चंदामामा !

यह मत पूछो, उड़कर आये

या फिर चलते हुए खरामा !


अब तो पक्की यारी होगी

आन-बान की और शान की

मिल-जुलकर हम सैर करेंगे 

दूर-दूर तक आसमान की

          तुम भी थामो हाथ हमारा

          हमने हाथ तुम्हारा थामा !

          तुम भी राजी, हम भी राजी

          स्वीकारो यह राजीनामा !


हमें यहां पर देख, हो रही

तुमको क्यों इतनी हैरानी

चरखा कात रही थी जो कल

कहां गई वह बूढ़ी नानी

          चलो, उसी नानी से कहकर

          सिलवा लो कुर्ता-पाजामा !

          बात मान लो तुरत हमारी

          और अधिक अब करो न ड्रामा !


तुम तो आये नहीं वहां पर

हमने सोचा, हम ही जायें

धरती मैया का संदेसा

तुम्हें यहां आकर पहुंचायें

          हिल-मिलकर सब जश्न मनायें

          खूब बजायें ढोल-दमामा !

          धूम मचायेंगे मिल-जुलकर

          अब खुलकर होगा हंगामा !


                                                                ■ योगेन्द्र दत्त शर्मा

【23.8.23 सायं 6 बजकर 5 मिनट 】

रविवार, 20 अगस्त 2023

प्रेमचंद के फटे जूते / हरिशंकर परसाई

 आज प्रेमचंद जयन्ती है । परसाई जी ने प्रेमचंद का एक चित्र देखा और उसके माध्यम से समाज पर अद्भुत व्यंग्य किया ।


प्रेमचंद के फटे जूते / हरिशंकर परसाई 

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प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फोटो खिंचा रहे हैं। सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं। कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियां उभर आई हैं, पर घनी मूंछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं। 


पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है। तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं। 

दाहिने पाँव का जूता ठीक है, मगर बाएँ जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है। 


मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है। सोचता हूँ – फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी – इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फोटो में खिंच जाता है। 


मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूँ। क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा नीचे खींच लेने से अँगुली ढक सकती है? मगर फिर भी तुम्हारे चेहरे पर बड़ी बेपरवाही, बड़ा विश्वास है! फोटोग्राफर ने जब ‘रेडी-प्लीज़’ कहा होगा, तब परंपरा के अनुसार तुमने मुस्कान लाने की कोशिश की होगी, दर्द के गहरे कुएँ के तल में कहीं पड़ी मुस्कान को धीरे-धीरे खींचकर ऊपर निकाल रहे होंगे कि बीच में ही ‘क्लिक’ करके फोटोग्राफर ने ‘थैंक यू’ कह दिया होगा। विचित्र है यह अधूरी मुस्कान। यह मुस्कान नहीं, इसमें उपहास है, व्यंग्य है! 

यह कैसा आदमी है, जो खुद तो फटे जूते पहने फोटो खिंचा रहा है, पर किसी पर हंस भी रहा है! 


फोटो ही खिचाना था, तो ठीक जूते पहन लेते या न खिचाते। फोटो न खिचाने से क्या बिगड़ता था। शायद पत्नी का आग्रह रहा हो और तुम, ‘अच्छा, चल भई’ कहकर बैठ गए होंगे। मगर यह कितनी बड़ी ‘ट्रेजडी’ है कि आदमी के पास फोटो खिचाने को भी जूता न हो। मैं तुम्हारी यह फोटो देखते-देखते, तुम्हारे क्लेश को अपने भीतर महसूस करके जैसे रो पड़ना चाहता हूँ, मगर तुम्हारी आँखों का यह तीखा दर्द भरा व्यंग्य मुझे एकदम रोक देता है। 


तुम फोटो का महत्व नहीं समझते। समझते होते, तो किसी से फोटो खिचाने के लिए जूते माँग लेते। लोग तो मांगे के कोट से वर-दिखाई करते हैं। और मांगे की मोटर से बारात निकालते हैं। फोटो खिचाने के लिए तो बीवी तक मांग ली जाती है, तुमसे जूते ही मांगते नहीं बने! तुम फोटो का महत्व नहीं जानते। लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए! गंदे-से-गंदे आदमी की फोटो भी खुशबू देती है! 


टोपी आठ आने में मिल जाती है और जूते उस ज़माने में भी पांच रुपये से कम में क्या मिलते होंगे। जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियां न्योछावर होती हैं। तुम भी जूते और टोपी के आनुपातिक मूल्य के मारे हुए थे। यह विडंबना मुझे इतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं चुभी, जितनी आज चुभ रही है, जब मैं तुम्हारा फटा जूता देख रहा हूं। तुम महान कथाकार, उपन्यास-सम्राट, युग-प्रवर्तक, जाने क्या-क्या कहलाते थे, मगर फोटो में भी तुम्हारा जूता फटा हुआ है! 


मेरा जूता भी कोई अच्छा नहीं है। यों उपर से अच्छा दिखता है। अंगुली बाहर नहीं निकलती, पर अंगूठे के नीचे तला फट गया है। अंगूठा ज़मीन से घिसता है और पैनी मिट्टी पर कभी रगड़ खाकर लहूलुहान भी हो जाता है। पूरा तला गिर जाएगा, पूरा पंजा छिल जाएगा, मगर अंगुली बाहर नहीं दिखेगी। तुम्हारी अंगुली दिखती है, पर पांव सुरक्षित है। मेरी अंगुली ढकी है, पर पंजा नीचे घिस रहा है। तुम परदे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम परदे पर कुर्बान हो रहे हैं! 

तुम फटा जूता बड़े ठाठ से पहने हो! मैं ऐसे नहीं पहन सकता। फोटो तो ज़िंदगी भर इस तरह नहीं खिचाऊं, चाहे कोई जीवनी बिना फोटो के ही छाप दे। 

तुम्हारी यह व्यंग्य-मुस्कान मेरे हौसले पस्त कर देती है। क्या मतलब है इसका? कौन सी मुस्कान है यह? 

क्या होरी का गोदान हो गया? 

क्या पूस की रात में नीलगाय हलकू का खेत चर गई? 

क्या सुजान भगत का लड़का मर गया; क्योंकि डॉक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकते? 

नहीं, मुझे लगता है माधो औरत के कफ़न के चंदे की शराब पी गया। वही मुस्कान मालूम होती है। 

मैं तुम्हारा जूता फिर देखता हूँ। कैसे फट गया यह, मेरी जनता के लेखक? 

क्या बहुत चक्कर काटते रहे? 

क्या बनिये के तगादे से बचने के लिए मील-दो मील का चक्कर लगाकर घर लौटते रहे? 


चक्कर लगाने से जूता फटता नहीं है, घिस जाता है। कुंभनदास का जूता भी फतेहपुर सीकरी जाने-आने में घिस गया था। उसे बड़ा पछतावा हुआ। उसने कहा – ‘आवत जात पन्हैया घिस गई, बिसर गयो हरि नाम।’ 

और ऐसे बुलाकर देने वालों के लिए कहा था—‘जिनके देखे दुख उपजत है, तिनको करबो परै सलाम!’ 

चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया? 


मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज़ को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज़ जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आज़माया। 


तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियां पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है। 


तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमज़ोरी थी, जो होरी को ले डूबी, वही ‘नेम-धरम’ वाली कमज़ोरी? ‘नेम-धरम’ उसकी भी ज़ंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुसकरा रहे हो, उससे लगता है कि शायद ‘नेम-धरम’ तुम्हारा बंधन नहीं था, तुम्हारी मुक्ति थी! 

तुम्हारी यह पांव की अंगुली मुझे संकेत करती-सी लगती है, जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ हाथ की नहीं, पांव की अंगुली से इशारा करते हो? 

तुम क्या उसकी तरफ़ इशारा कर रहे हो, जिसे ठोकर मारते-मारते तुमने जूता फाड़ लिया? 

मैं समझता हूं। तुम्हारी अंगुली का इशारा भी समझता हूं और यह व्यंग्य-मुस्कान भी समझता हूं। 


तुम मुझ पर या हम सभी पर हंस रहे हो, उन पर जो अंगुली छिपाए और तलुआ घिसाए चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बरकाकर बाजू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे हो – मैंने तो ठोकर मार-मारकर जूता फाड़ लिया, अंगुली बाहर निकल आई, पर पांव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अंगुली को ढांकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे? 


मैं समझता हूं। मैं तुम्हारे फटे जूते की बात समझता हूं, अंगुली का इशारा समझता हूं, तुम्हारी व्यंग्य-मुस्कान समझता हूं! 

               

                  ( हरिशंकर परसाई )


#ArunGemini के पोस्ट से काॅपी- पेस्ट

नाम बदलकर रखा 'प्रेमचंद'

 बर्थडे स्पेशल: नाम बदलकर रखा 'प्रेमचंद'


यूं तो प्रेमचंद की हर रचना बहुमूल्य है जो अपने समय की सच्चाई को बयां करती हैं और उनकी ख़ासियत है कि वे आज भी प्रासंगिक हैं। प्रेमचंद की कहानी ईदगाह आपने भी शायद ज़रूर पढ़ी होगी। हामिद को मेला घूमने के लिए उसकी दादी अमीना ने तीन पैसे दिए। मेले में किस्म-किस्म की मिठाईयां, झूले और तोहफ़े बिक रहे थे। जहां दूसरे बच्चों ने मेले से अपने लिए खिलौने, भिश्ती और मिठाइयां ख़रीदी, वहीं चार या पांच साल के हामिद ने दादी के लिए चिमटा खरीदा। 6 पैसे के चिमटे को मोलभाव कर 3 पैसे में ख़रीद लेता है। क्योंकि रोटियां सेकते समय दादी का हाथ तवे से जल जाता था और पैसों की कमी की वजह से दादी चिमटा नहीं ख़रीद पा रही थी। हामिद ने अपने बचपन की ख़्वाहिशों को भुलाकर अपनी उम्र से बड़ा हो गया। गरीबी कैसे इंसान को उम्र से पहले बड़ा बना देती है, इस मनोविज्ञान को ईदगाह की कहानी खोल कर रख देती है। 


प्रेमचंद को हिंदी और उर्दू के महानतम लेखकों में शुमार किया जाता है। प्रेमचंद की रचनाओं को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि दी थी। प्रेमचंद ने कहानी और उपन्यास में एक नई परंपरा की शुरुआत की जिसने आने वाली पीढ़ियों के साहित्यकारों का मार्गदर्शन किया। प्रेमचंद ने साहित्य में यथार्थवाद की नींव रखी। प्रेमचंद की रचनाएं हिंदी साहित्य की धरोहर हैं।


प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था और उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के नज़दीक लमही गांव में हुआ था। पिता का नाम अजायब राय था और वे डाकखाने में मामूली नौकरी करते थे। वे जब सिर्फ आठ साल के थे तब मां का निधन हो गया। पिता ने दूसरा विवाह कर लिया लेकिन वे मां के प्यार और वात्सल्य से महरूम रहे। प्रेमचंद का जीवन बहुत अभाव में बीता। 


जब उनकी उम्र महज़ 15 साल थी तो पिता अजायब राय ने उनकी शादी उम्र में बड़ी लड़की से करा दी। शादी के एक साल बाद पिता का निधन हो गया और अचानक ही उनके सिर पांच लोगों की गृहस्थी और ख़र्च का बोझ आ गया। प्रेमचंद को बचपन से ही पढ़ने का शौक था और वे वकील बनना चाहते थे। लेकिन गरीबी की मार के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करने का सपना अधूरा रह गया। प्रेमचंद को बचपन से ही उर्दू भाषा की शिक्षा मिली थी। हिंदी साहित्य के इतिहासकार बताते हैं कि उन्हें उपन्यास पढ़ने का ऐसा चस्का था कि बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही उन्होंने सारे उपन्यास पढ़ लिए और दो-तीन सालों के भीतर सैकड़ों उपन्यास पढ़ डाले। 

 

PC: BBC

13 साल की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना शुरू कर दिया था। शुरुआत में कुछ नाटक लिखे और बाद में उर्दू में उपन्यास लिखा। इस तरह उनका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो उनके अंतिम समय तक उनका हमसफर बना रहा।


आर्थिक तंगी और पारिवारिक समस्याओं के कारण उनकी पत्नी मायके चली गई और फिर कभी नहीं लौटी। वे उस समय के धार्मिक और सामाजिक आंदोलन आर्य समाज से प्रभावित रहे। प्रेमचंद विधवा विवाह का समर्थन करते थे और 1906 में अपनी प्रगतिशील परंपरा को जीवन में ढालते हुए उन्होंने दूसरा विवाह बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया। इसके बाद उनकी ज़िंदगी के हालत कुछ बेहतर हुए। अध्यापक से प्रोमशन होकर वे स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर बने और इसी दौरान उनकी पांच कहानियों का संग्रह 'सोज़े वतन छपा' जो बहुत लोकप्रिय हुआ। 


प्रेमचंद आज़ादी से पहले के समय के समाज और अंग्रेज़ी शासन के बारे में लिख रहे थे। उन्होंने जनता के शोषण, दुख, दर्द और उत्पीड़न को बहुत बारीकी से महसूस किया और उसे लिखा। लेकिन अंग्रेज़ी हुकूमत को ये गवारा नहीं था। 1910 में उनकी रचना 'सोजे़-वतन' (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। उस समय वे नवाबराय के नाम से लिखते थे। उनकी खोज हुई और उनकी आंखों के सामने 'सोजे़-वतन' की सभी प्रतियां जला दी गईं। कलेक्टर ने उन्हें बिना अनुमति के लिखने पर भी पाबंदी लगा दी।


20वीं सदी में उर्दू में प्रकाशित होने वाली 'ज़माना' पत्रिका के संपादक और प्रेमचंद के घनिष्ठ मित्र मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद नवाबराय हमेशा के लिए प्रेमचंद हो गए और इसी नाम से लिखने लगे। 


प्रेमचंद का रचना संसार बहुत बड़ा और समृद्ध है। बहुआयामी प्रतिभा के धनी प्रेमचंद ने कहानी, नाटक, उपन्यास, लेख, आलोचना, संस्मरण, संपादकीय जैसी अनेक विधाओं में साहित्य का सृजन किया है। उन्होंने कुल 300 से ज़्यादा कहानियां, 3 नाटक, 15 उपन्यास, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें लिखीं। इसके अलावा सैकड़ों लेख, संपादकीय लिखे जिसकी गिनती नहीं है। हालांकि उनकी कहानियां और उपन्यास उन्हें प्रसिद्धि के जिस मुकाम तक ले गए वो आज तक अछूता है।

 

 प्रेमचंद ने शुरुआती सभी उपन्यास उर्दू में लिखे जिनका बाद में हिंदी में अनुवाद हुआ। 1918 में 'सेवासदन' उनका हिंदी  में लिखा पहला उपन्यास था। इस उपन्यास को उन्होंने पहले 'बाज़ारे हुस्न' नाम से उर्दू में लिखा लेकिन हिंदी में इसका अनुवाद 'सेवासदन' के रूप में प्रकाशित हुआ। यह एक स्त्री के वेश्या बनने की कहानी है। हिंदी साहित्यकार डॉ. रामविलास शर्मा के मुताबिक़ सेवासदन भारतीय नारी की पराधीनता की समस्या को सामने रखता है। इसके बाद 1921 में किसान जीवन पर उनका पहला उपन्‍यास 'प्रेमाश्रम' प्रकाशित हुआ। अवध के किसान आंदोलनों के दौर में 'प्रेमाश्रम' किसानों के जीवन पर लिखा हिंदी का शायद पहला उपन्‍यास है। फिर 'रंगभूमि', 'कायाकल्प', 'निर्मला', 'गबन', 'कर्मभूमि' से होता हुआ उपन्यास लिखने का उनका यह सफर 1936 में 'गोदान' के उफ़क तक पहुंचा।


प्रेमचंद के उपन्यासों में 'गोदान' सबसे ज़्यादा मशहूर हुआ और विश्व साहित्य में भी उसका बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। एक सामान्‍य किसान को पूरे उपन्‍यास का नायक बनाना भारतीय उपन्‍यास परंपरा की दिशा बदल देने जैसा था। गोदान पढ़कर महसूस होता है कि  किसान का जीवन सिर्फ़ खेती से जुड़ा हुआ नहीं होता। उसमें सूदखोर जैसे पुराने ज़माने की संस्थाएं तो हैं ही नए ज़माने की पुलिस, अदालत जैसी संस्थाएं भी हैं। यह सब मिलकर होरी की जान लेती हैं। होरी की मृत्‍यु पाठकों के ज़हन को झकझोर कर रख देती है। गोदान का कारुणिक अंत इस बात का गवाह है कि तब तक प्रेमचंद का आदर्शवाद से मोहभंग हो चुका था। उनकी आख़िरी दौर की कहानियों में भी ये देखा जा सकता है। जीवन के आख़िरी दिनों में वे उपन्यास मंगलसूत्र लिख रहे थे जिसे वे पूरा नहीं कर सके।


लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 में उन्होंने आख़िरी सांसें लीं। प्रेमचंद अपने उपन्‍यासों में भारतीय ग्रामीण जीवन को केंद्र में रखते थे। प्रेमचंद ने हिंदी उपन्‍यास को जिस ऊंचाई तक पहुंचाया वो आने वाली पीढ़ियों के उपन्‍यासकारों के लिए एक चुनौती बनी रही। प्रेमचंद के उपन्‍यास और कहानियों का भारत और दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। प्रेमचंद हिंदी साहित्य में एक मील का पत्थर हैं और बने रहेंगे।



🙏 एक रेड लाइट एरिया / तरुण शेखर

 एक रेड लाईट एरिया मे क्या खूब बात लिखी पाई गई / तरुण शेखर 

:


"यहाँ सिर्फ जिस्म बिकता है,

ईमान खरीदना हो" तो अगले चौक पर

*पुलिस स्टेशन" हैं 

.

आप चाहते हैं, कि आपकी तानाशाही चले 

औरकोई आपका विरोध न करे 

तो आप भारत में

*न्यायाधीश* बन जाइये !

.

आप चाहते हैं,

कि आप एक से बढ़कर एक झूठ बोलें

अदालत में, लेकिन कोई आपको सजा न दे,

तो आप *वकील* बन जाइये !

.

कोई महिला चाहती हो

कि वो खूब देह व्यापार करे

लेकिन कोई उनको वेश्या न बोले,

तो बॉलीवुड में *हिरोइन* बन जाये !

.

आप चाहते हैं,

कि आप खूब लूट मार करें,

लेकिन कोई आपको डाकू न बोले,

तो आप भारत में *राजनेता* बन जाइये !

.

आप चाहते हैं,

कि आप दुनिया के हर सुख मांस,मदिरा,स्त्री

इत्यादि का आनंद लें, 

लेकिन कोई आपको भोगी न कहे,

तो किसी भी धर्म के *धर्मगुरु* बन जाओ !

.

आप चाहते हैं,

कि आप किसी को भी बदनाम कर दें,

लेकिन आप पर कोई मुकदमा न हो,

तो मीडिया में *रिपोर्टर* बन जाइये !

.

यकीन मानिये कोई आप का बाल भी बाँका

नहीं कर पाएगा. भारत में, हर *"गंदे"* काम के

लिए एक *वैधानिक पद* उपलब्ध है, 

इसीलिए *मेरा भारत महान*  है..!!

आखिर क्यों..नहीं ???

 

चाहे हजारों स्त्री से उसके संबंध हो,

चाहे कई नाजायज़ अनुबंध हो,

लेकिन पुरुष कभी #वेश्या नहीं कहलाते।


चाहे वह कितने ही प्रपंच कर ले.

और इससे कितने ही प्राण हर ले,

लेकिन पुरुष कभी #डायन नही कहलाते।

अपनी खानदानी अस्मत कोठों पर बेच आता है, नज़रे पराई स्त्री पर चाहे लगाता है,

लेकिन पुरुष कभी #कुल्टा नहीं कहलाते।

चाहे ये कितने ही क्रूर स्वभाव के हों,

चाहे कितने ही घृणित बर्ताव के हों

लेकिन पुरुष कभी #चुड़ैल नहीं कहलाते।

यहां तक की दो पुरूषों के झगडे में

घर से लेकर सड़क तक के रगड़े में

स्त्रियों के नाम पर ही गालियां दी जाती हैं,

और फिर शान से ये मर्द कहलाते हैं।

क्यों डायन, कुल्टा, चुड़ैल, वेश्या, बद्दलन

केवल नारी ही कहलाए.. .?

क्या इन शब्दों के पुर्लिंग शब्द,

पितृसत्तात्मक समाज ने नहीं बनाए.......?

क्या यहाँ कोई ऐसा पुरुष है

जिसे सड़क पर चलते हुए ये भय लगता हो

कि अकस्मात ही पीछे से तेज़ रफ़्तार में

एक स्कॉर्पियो आएगी

और उसमें बैठी चार महिलाएँ

जबरन उसे गाड़ी में उठा कर ले जायेंगी

और

किसी सुनसान जगह पर

अधमरी हालत में

एक बड़े पत्थर से उसका सिर कुचल देंगी....?!?!

_वैश्या_और_संयासी


वैश्या_और_संन्यासी 

💙💙💙💙💙💙💙💙💙💙💙💙💙💙



एक वैश्या मरी और #संयोग की बात, उसी दिन उसके सामने रहने वाला बूढ़ा #सन्यासी भी मर गया।#देवता लेने आए सन्यासी को नरक में और वैश्या को स्वर्ग में ले जाने लगे। संन्यासी एक दम अपना डंडा पटक कर खड़ा हो गया, तुम ये कैसा अन्याय कर रहे हो ? मुझे नरक में और वैश्या को स्वर्ग में ले जा रहे हो,जरूर कोई भूल हो गई है तुमसे,कोई दफ्तर की गलती रही होगी, पूछताछ करो..मेरे नाम आया होगा स्वर्ग का संदेश और इसके नाम नर्क का। मुझे #परमात्मा का सामना कर लेने दो, दो दो बातें हो जाए,सारा जीवन बीत गया शास्त्र पढ़ने में--और ये परिणाम। मुझे नाहक परमात्मा ने धोखे में डाला। 

उसे परमात्मा के पास ले जाया गया, परमात्मा ने कहा इसके पीछे एक गहन कारण है, वैश्या शराब पीती थी, भोग में रहती थी, पर जब तुम मंदिर में बैठकर #भजन गाते थे, धूप दीप जलाते थे, घंटियां बजाते थे......

तब वह सोचती थी...कब मेरे जीवन में यह सौभाग्य होगा, मैं मंदिर में बैठकर भजन कर पाऊंगी कि नहीं, वह ज़ार जार रोती थी और तुम्हारे धूप दीप की सुगंध जब उसके घर मे पहुंचती थी तो वह अपना अहोभाग्य समझती थी, घंटियों की आवाज सुनकर मस्त हो जाती थी।

लेकिन तुम्हारा #मन पूजापाठ करते हुए भी यही सोचता कि वैश्या है तो सुंदर, पर वहां तक कैसे पंहुचा जाए ? 

तुम हिम्मत नही जुटा पाए....तुम्हारी प्रतिष्ठा आड़े आई....गांव भर के लोग तुम्हें संयासी मानते थे। 

जब वैश्या नाचती थी, #शराब बंटती थी, तुम्हारे मन में वासना जगती थी तुम्हें रस था खुद को अभागा समझते रहे..

इसलिए वैश्या को स्वर्ग लाया गया और तुम्हें नरक में। वेश्या को विवेक पुकारता था तुम्हें #वासना, वह प्रार्थना करती थी तुम इच्छा रखते थे वासना की। वह कीचड़ में थीं पर कमल की भांति ऊपर उठती गई और तुम कमल बनकर आए थे कीचड़ में धंसे रहे । 

असली सवाल यह नहीं कि तुम बाहर से क्या हो.....असली #सवाल तो यह है कि तुम भीतर से क्या हो ?

मन के भीतर ही निर्णायक है।

🙏🙏

कर दो मेरा उद्धार / अरविंद अकेला


कर दो मेरा जीवन आलोकित 

कर दो मेरा उद्धार 

कर दो मुझको चंदन- चंदन 

आकर मेरे घर-द्वार ।

      कर दो मेरा जीवन...I 


तुम बिन मैं हूँ अधूरा 

अधूरा मेरा घर-परिवार 

तुम बिन अधुरी जिन्दगी 

अधुरा यह रचनाकार। 

      कर दो मेरा जीवन...I 


आँखों की थोड़ा काजल दे दो

कर दूँ तेरा रूप श्रृंगार 

काजल का तुझे टीका लगाकर

कर दूँ सुरक्षित तेरा संसार। 

      कर दो मेरा जीवन...I 


थोड़ी सी मुझे मुस्कान दे दो

अपने दिल की अरमान दे दो

ले लो मेरी सारी खुशियाँ 

ले लो मेरा प्यार। 

      कर दो मेरा जीवन...I 


दे दो थोड़ी होंठो की लाली 

दे दो तुम थोड़ी हरियाली

तेरे लिए मैं जी सकूँ 

देकर खुशियाँ अपार। 

      कर दो मेरा जीवन...I 


थोड़ी सी रूप-रंग दे दो 

जीने की थोड़ी उमंग दे दो

करूँ  निसार तुमपर ये जीवन 

करूँ प्यार बेशुमार ।

      कर दो मेरा जीवन...I 

       ------0-----

      अरविन्द अकेला,पूर्वी रामकृष्ण नगर,पटना-27

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...