शनिवार, 12 जून 2021

#समकालीन_त्रिवेणी ~ वर्ष 2 अंक 2

 ●● #समकालीन_त्रिवेणी ~ वर्ष 2 अंक 2

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● श्री अखिलेश श्रीवास्तव "चमन" के संपादन में महानगर लखनऊ से प्रकाशित "समकालीन त्रिवेणी" ~ साहित्य संस्कृति कला पर केंद्रित पत्रिका मिली। "

समकालीन त्रिवेणी" के इस अंक में सबसे भारी भरकम सामग्री अगर कुछ समझ में आई, तो वह है, "देश काल" स्तंभ मे प्रखर आलोचक उमाशंकर सिंह परमार का एक आलेख~ "अकादमिक आलोचना की संकुचित परिधि और मूल्यों का संकट"। इस भारी भरकम और वजनदार लेख का महत्व इसलिए भी है कि इसमें बहुत ही संक्षेप में आलोचना के समग्र इतिहास को समेटने की कोशिश की है उमाशंकर सिंह परमार ने। यूँ भी उमाशंकर सिंह परमार निडर, निर्भीक और बेखौफ तथा बेरहम लेखन के लिए जाने जाते हैं। उनका लेख, उनकी बात, उनकी टिप्पणी एक बार नहीं, सौ सौ बार सोचने पर विवश करती है और अंततः उनके अकाट्य तर्क स्वीकार करना ही होता है। उदाहरण के लिए जैसे वे लिखते हैं कि~ "शुक्ल जी के बाद हिंदी आलोचना में जिस तरह अकादमिक जगत का प्रभुत्व बढ़ा और पूर्व लेखन को ही थोड़े बहुत मत मतांतरों के बाद स्वीकृति प्रदत्त करने की प्रवृत्ति बढ़ी, यह हिंदी आलोचना की व्यापकता एवं मौलिकता के लिए बड़ा घातक रहा। पूर्व आलोचक के निष्कर्षों व स्थापनाओं को ही आप्त वाक्य मान लेना तथा नए अन्वेषण तथा सामाजिक वस्तु स्थिति से अनभिज्ञता ने आलोचना को संदिग्ध भी बनाया और अकादमिक जगत की इतिहास को इतिहास की तरह न देखने की जिद ने हिंदी साहित्य से बहुत कुछ दूर कर दिया।"

● साहित्य समाज के साथ गतिशील रहता है•••• शुक्ल जी ने दो कोटियाँ बना दी। रीतिबद्ध और रीतमुक्त। उन्हीं कोटियों के तहत आज भी मूल्यांकन किया जा रहा है। ••••••

अकादमिक आलोचना ने किसी भी कवि को लोकप्रिय नहीं बनाया, न अपने सीमित साधनों और संकुचित परिधि के कारण कभी बन सकती हैं। घाघ और भड्डरी लोकप्रिय थे और इन पर शोध कार्य होते, तो जाहिर था कि विश्व साहित्य के समक्ष भारतीय लेखक की प्रगतिशील रखी जा सकती थी, मगर दरबारी काव्य और रसवादी फार्मूले की अंधी दौड़ ने रीतिकाल और भक्तिकाल के तमाम प्रगतिशील काव्य को साहित्य की मुख्य धारा से वंचित कर दिया।••••••

पंत, प्रसाद, निराला और महादेवी वर्मा अपने समय के बड़े कवि इसलिए बने, क्योंकि इनके पास अकादमिक  आलोचक थे। प्रसाद को पंत को शुक्ल और नंददुलारे वाजपेई मिल गए, महादेवी वर्मा को शांतिप्रिय दिवेदी मिल गए और निराला को रामविलास शर्मा जी मिल गए•••••••• मुक्तिबोध की खोज और स्थापना में अशोक बाजपेयी और नामवर सिंह का हाथ रहा है।••••• इससे बहुत से कवि छूट गए और समाप्त हो गए। विशेषकर वे कवि, जो अकादमिक क्षेत्र में नहीं थे। भवानी प्रसाद मिश्र, कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, शील, भगवत रावत, मान बहादुर सिंह, धूमिल, विजेन्द्र, हरेश भादानी जैसे कवि परिदृश्य से बाहर हो गए। केवल मुक्तिबोध, अशोक बाजपेई, नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह जी अकादमिक आलोचना के लोकप्रिय किरदार रहे। •••••

आज जरूरत है कि साहित्य और समाज के पारस्परिक विकास प्रक्रिया को ध्यान में रखकर युग की जरूरतों के हिसाब से रचनाकार और रचना का मूल्यांकन हो। इस मूल्यांकन के दायरे में वैचारिकता व पारस्परिकता का समन्वय हो, न कि विधा, रूप और भाषा की क्षुद्र सीमाओं को दायरा बनाया जाए और यह काम केवल व्यवहारिक समीक्षक कर सकते हैं, न कि पाठ्यक्रम के सीमित दायरे में आबद्ध एक परम्परावादी आलोचक कर सकता है।"

● "काव्य धारा" स्तंभ के अंतर्गत राजेंद्र वर्मा के नवगीत वर्तमान समाज के हालात को बखूबी प्रस्तुत करते हैं~

 फुटपाथों पर लगा हमारा/  साझे का बिस्तर/ लोकतंत्र मुँह ढाँपे पहुँचा/  पूँजीपति के घर/ बूढ़ा गए, लेकिन अभाव का/ दरका नहीं किला।

नेतागिरी चमकी/ लेकिन छँटा न अंधियारा/ समझ नहीं आता/ धरने पर कब तक वह बैठे/  किस-किस की वह करें खुशामद/  हर कोई ऐंठे/बदल गई सरकार, मगर वह/ हुआ सर्वहारा।

● इसी तरह "आनंद पांडे तन्हा" की गजलें भी अपनी तरह का तांडव करती हैं~

पिट कर लौटा है थाने से/  अर्जी वो हर बार लगा कर/  तन्हा तन्हा रोया था घर/  आंगन में दीवार लगाकर।

● हिंदी साहित्य में जाने-माने कहानीकार राम नगीना मौर्य की कहानी "गलत फहमी" एक नए अंदाज की कहानी है। वे कहानी के एक पात्र से यह कहलाते हैं कि~ "मेरा तो मानना है कि आप लिखंत, पढ़ंत और इस छपास में चाहे जितना भी व्यस्त रहिए, लेकिन यदि आपको, आपके आस पड़ोस वाले ही अच्छी तरह से न जानते हों, तो ये पापुलैरिटी किस काम की ?" एक घरेलू महिला की पीड़ा, चिंता तथा उलझनों को कितने सरल तरीके से अपनी कहानी में प्रस्तुत किया है,  यह समझना जरूरी है।

● इसी तरह सुभाष पंत की एक अन्य कहानी "रतिनाथ का पलंग" है।  यह कहानी भी सामाजिक और पारिवारिक तथा आर्थिक समस्याओं से जूझती है। उनका एक पात्र कहता है कि~ "अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए अब तक हमने गधे और सुअर की जिंदगी जी है। अब यह बची हुई जिंदगी हमें अपनी तरह से जीनी चाहिए। लेकिन मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि इसकी शुरुआत कहाँ से करें ?"

● राघव दुबे रघु की लघुकथा "कुत्ते" बहुत ही मर्मस्पर्शी है। लघु कथा के अंत में कुत्ते समवेत स्वर में कह रहे हैं~ "हम श्वान हैं, किंतु आदमी जैसे दरिंदे कुत्ते नहीं हैं। हम एक टुकड़ा रोटी के वफादार हैं, लालची और कृतघ्न नहीं••••••।

●  "पत्थर पर लिखी इबारत" स्तंभ भी आकर्षित करता है।

● पत्रिका में कुछ अनावश्यक भी है, जैसे अपने अपने घर आँगन मे भी होता है। संभव है कि विवशता रही होगी, फिर भी यह पत्रिका महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करती है और पठनीय है।

● इस पत्रिका की एक विशेष विशेषता यह है कि इसमें वर्तमान समय की सबसे जरूरी समस्या पर्यावरण पर ध्यान केंद्रित किया है और इस संदर्भ को लेते हुए प्रदीप श्रीवास्तव का एक संस्मरण~ "प्रकृति क्या आईना~ भेड़ाघाट" पत्रिका में प्रस्तुत किया है। पर्यटकों के लिये यह अत्यंत उपयोगी होगा।

● यह भी बताना जरूरी है कि अखिलेश जी ने बड़े स्नेह के साथ यह पत्रिका हाथों हाथ भिजवाई थी, लेकिन ये कई पाठकों के पास रुकती रुकाती अब अपने ठिकाने पहुँची है।अखिलेश श्रीवास्तव "चमन" जी को हार्दिक धन्यवाद।

#छत्तीसगढ़_में_मुक्ति_संग्राम और आदिवासी ~ #सुधीर_सक्सेना

 ● #छत्तीसगढ़_में_मुक्ति_संग्राम और आदिवासी ~

 #सुधीर_सक्सेना


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● सुप्रसिद्ध कवि, लेखक तथा अनुवादक एवं संपादक डाॅ सुधीर सक्सेना की एक महत्वपूर्ण पुस्तक "छत्तीसगढ़ में मुक्ति संग्राम और आदिवासी (अध्ययन)"  "भारतीय ज्ञानपीठ" नई दिल्ली से प्र काशित हुई है, 360 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य ₹ 650/ है। 

इतिहास की यह पुस्तक "बस्तर (छत्तीसगढ़)" के महान भुमकाल के महानायक गुंडाधूर और उनके सदृश्य सेनानियों की प्रतिरोध और बलिदान की अप्रतिहत परंपरा को समर्पित है।

● पुस्तक के फ्लैप पर प्रस्तावना या भूमिका के रूप में~ "छत्तीसगढ़ मे मुक्ति संग्राम" शीर्षक के अंतर्गत श्री राजेन्द्र चंद्रकांत राय लिखते हैं कि ~ छत्तीसगढ़ में सम्पन्न हुए मुक्ति संग्राम मे आदिवासियों की ऐतिहासिक भूमिका पर सबसे ज्यादा तथ्य परक और गवेषणायुक्त कोई अन्य ग्रंथ होगा, इसमे संदेह ही है।

"डाॅ सुधीर सक्सेना गहरी मानवीय चेतना के कवि हैं। वे निष्णात और प्रखर पत्रकार के तौर पर पहले से अपनी एक विशेष पहचान रखते हैं। ••••• असीम धैर्य और तथ्यों की प्रामाणिक खोजों के प्रति सचेत रहते हुए लेखक ने संदर्भों का संकलन करने मे भी भरपूर उदारता बरती है। •••••• डाॅ सुधीर सक्सेना ने इतिहास की गहरी समझ के साथ छत्तीसगढ़ के मुक्ति संग्राम पर नितांत नयी और खोजी नजर डाली है और इधर-उधर पड़े, फुटकर तथ्यों को जुटाकर एक मुकम्मल इतिहास- ग्रंथ की रचना की है। इसमे इतिहास लेखन की अनिवार्य और पारंपरिक शुष्क मरुभूमि नहीं है, बल्कि कथा-रस के निर्झरों से सराबोर घटनाओं और विवरणों मे पाठक रमते हुए बैठता है। इस विचरण मे वह इतिहास से सीधा साक्षात्कार करता है।"

ग्रंथ का इतिहास-फलक विशाल है और वह औदार्य के साथ कल्चुरियों, मरहठों, पिंडारियों और अंग्रेजी काल को समेटते हुए, उसका सम्यक विवेचन करते हुए और तद्जनित परिणामों से पाठकों की आत्मिक सहमति प्राप्त करते हुए अपने प्रवाह में आगे बढ़ता है। ••••••• अद्भुत मौलिकता, नयी और अचिन्हीं स्थापनाएं तथा कहन-शैली की प्रांजल आधुनिकता ने इस ग्रंथ को एक एक विशिष्टता और औपन्यासिक छटा प्रदान कर दी है। यह इतिहास लेखन के पारंपरिक तरीके पर प्रहार करता है और नयी राहें दिखाता है। आगे लिखे जाने वाले इतिहास-ग्रंथों को सुधीर के लिखे से प्रेरणा, आशा, शैली और दृष्टि मिलेगी।•

● आत्मकथ्य के बहाने "पूर्व रंग" शीर्षक मे पुस्तक के लेखक डाॅ सुधीर सक्सेना लिखते हैं ~ इतिहास लेखन, निस्संदेह कठिन कार्य है। पुनर्लेखन और भी कठिन। इतिहास का सच अत्यंत मूल्यवान है। यह इसे चुनौती पूर्ण बनाता है और निःशब्द चेतावनी भी देता है। यही संदर्भ इतिहास को प्रासंगिकता व अर्थवत्ता देता है। यह विस्मृति की प्रक्रिया में स्मृति का सार्थक हस्तक्षेप है। इतिहास को जानना अपनी यात्रा को जानना और अपने वर्तमान को बूझना है। उसका गहन-गंभीर विश्लेषण हमे भविष्य के पूर्वाभास की अद्भुत शक्ति देता है। भुमकाल घटे एक सदी हो चुकी है। यह विचारणीय है कि इन्द्रावती के तट पर हुए इस लोहित प्रतिकार की स्मृति को सँजोने की दिशा में सत्ता, साहित्य और समाज ने अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह कितनी गैर जिम्मेदारी से और किस तरह से किया ?

इतिहास प्रश्न जगाता है और उत्तर भी सुझाता है इन्ही अर्थों में वह सामयिक है और मूल्यवान भी। इतिहास की घटनाएँ महत्वपूर्ण हैं उतनी ही महत्वपूर्ण है उनकी व्याख्या। अलबत्ता अपने अभ्यास अर्जित कौशल के उपयोग का यत्न मैने प्रस्तुति मे किया है। 

यह प्रयास संभव हुआ ~ इसकी शुरुआत और अविचल निर्वाह एवं समापन का श्रेय छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी को है। इस उपक्रम की सफलता मे इतिहास से जुड़ी कृतियों व कृतिकारों के अलावा उन अनेक लोगों का गहरा योगदान है,  जिन्होंने वाचिक परंपरा मे इतिहास के सच को जीवित रखा। इच्छा शेष है कि इस मिशन को आगे भी जारी रख सकूँ।

● इस पुस्तक मे "छत्तीसगढ़ में मुक्तिसंग्राम" शीर्षक के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी लिखते हैं कि~  इस कृति के लेखक सुधीर सक्सेना से मैं बरसों से परिचित हूँ। उनसे परिचय का दायरा करीब 3 दशक के अंतराल में फैला हुआ है। वे पत्रकार हैं, कवि और अनुवादक भी हैं और इतिहास में गहरी रूचि रखने वाले अध्येता भी। जनजातीय जीवन और परंपराओं से उनका गहरा अनुराग है। उनकी प्रांजल भाषा और मांत्रिक शब्दों का मैं कायल हूँ। अपनी काव्यात्मक भाषा से वे अभिव्यक्ति का नया आकर्षक मुहावरा रचते हैं। उनसे आत्मीय परिचय, सतत संवाद और उनके कामों के आधार पर मुझे उनकी यह खूबी आकर्षित करती है कि वे इतिहास के अछोर गलियारों और अंधेरी खोहों मे धँसते हैं तथा बहुत धैर्य और संजीदगी से इतिहास की साँसो, फुसफुसाहटों और कराहों को सुनने और फिर उन्हें शब्दों में कैद करने का यत्न करते हैं। 

इतिहास को जानना अपनी यात्रा को जानना और अपने वर्तमान को बूझना है। बीते कल को जानकर हम अपने आज को समझ सकते हैं और आगामी कल को सँवार सकते हैं। इतिहास को उसके सही संदर्भों के साथ उद्घाटित और लिपिबद्ध करने का मेरी दृष्टि में एक और महत्व है। ऐसा करके हम अपने पुरखों और अपनी परंपरा के प्रति कर्तव्य का निर्वाह करते हैं। हमें अपने पुरखों का ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने विषमतर परिस्थितियों में भी स्वतंत्रता की चेतना को अपने झुलसने की परवाह न करते हुए बचाए रखा। उन्होंने माटी की लाज रखी और दास्ता में रहते हुए भी अपनी आत्मा का सौदा नहीं किया। इन संदर्भों में अपने सही और प्रामाणिक इतिहास को सामने न लाना मुझे हमारे पुरखों और परंपरा के प्रति द्रोह या छल नजर आता है।

"छत्तीसगढ़ में मुक्तिसंग्राम और आदिवासी" का प्रकाशन मेरे लिए निजी तौर पर मोद का विषय है। इससे हमारी नई पीढ़ी को अपनी परंपरा के गौरवशाली अध्याय को जानने में मदद मिलेगी। आजादी की लड़ाई की अंकित गाथा में अभी बहुत कुछ अनंकित है। यह छूटा हुआ 'बहुत कुछ' हमारे लिए बहुत मूल्यवान और सार्थक है। मुझे विश्वास है कि सुधीर इस 'बहुत कुछ' की तलाश के साहसिक और पुरजोखिम अभियान में आगे भी रत रहेंगे।

●● समाज, इतिहास तथा साहित्य मे रुचि और दखल रखने वाले हर पाठक और रचनाकार को इस जरूरी पुस्तक के पन्ने जरूर पलटने चाहिए। हमारा विश्वास है कि यह पुस्तक पढ़ने से हमे न केवल एक अछूते इतिहास की जानकारी मिलेगी, अपितु बहुत कुछ नया लिखने की भी लालसा जागृत होगी और अपने प्रिय रचनाकार डाॅ सुधीर सक्सेना का श्रम भी सार्थक हो सकेगा।•

सहमति_के_पक्ष_में ~ #उमाशंकर_सिंह_परमार

 📚 #सहमति_के_पक्ष_में ~ #उमाशंकर_सिंह_परमार



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● हिन्दी साहित्य के अधिकारी विद्वान आलोचक, मार्क्सवाद के सम्यक विश्लेषक, इतिहासविद, समर्थ लेखक एवं कवि, अनुवादक एवं चिंतक तथा भाषा वैज्ञानिक  #डाॅ_रामविलास_शर्मा_की_पुण्यतिथि (10 अक्तूबर) पर उनका स्मरण इसलिए भी आवश्यक है कि उनके बाद आलोचना के क्षेत्र में एक अधूरापन, एक शून्य सा प्रतीत हो रहा था।


इधर लंबे समय से हिन्दी साहित्य मे और साहित्यिक संस्थानों व संगठनो मे  जिस तरह से अकादमिक और विश्वविद्यालयी वर्चस्व स्थापित हुआ, उसके चलते पद, पैसा, पुरस्कारों तथा अन्यान्य प्रलोभनों का मायाजाल प्रभावी हो गया। ऐसी धारणा स्थापित करने का सुनियोजित षड्यंत्र चल पड़ा कि मानो साहित्य सृजन केवल विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थाओं से ही उत्पादित हो सकता है, शेष सब मूल्यहीन एवं अर्थहीन तथा हेय है। चाटुकारिता, चापलूसी तथा चरण चंपन की बढ़ती प्रवृत्ति ने वास्तविक रचनाकारों को हाशिये पर धकेलना शुरू कर दिया। अपने समय के जरूरी रचनाकार उपेक्षित किये जाने लगे। इस घातक स्थति पर कठोर प्रहार करने की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस हो रही थी। 

● उमस भरे ऐसे वातावरण में प्रखर आलोचक के रूप में उमाशंकर सिंह परमार ने मोर्चा संभाला और बहुत ही सुचिंतित तथा स्पष्ट चिंतन के साथ उपरोक्त तमाम साजिशों पर न केवल आक्रामक हमले शुरू किए, वरन उनको बेनकाब करना भी शुरू किया।  इस पहल के कारण उनको सभी संगठनों से भी किनारा करना पड़ा, मठाधीशों का कोपभाजन भी बनना पड़ा, लेकिन परमार के चट्टानी इरादों को कोई भी षडयंत्र आगे बढ़ने से रोक नहीं सका। 

● जनकवि केदार नाथ अग्रवाल की कर्मभूमि बाँदा जैसी छोटी सी जगह मे उन्होने लगातार साहित्यिक आयोजन शुरू कर दिए, जिनमे शीर्षस्थ रचनाकारों का जुटान हुआ और अतिक्रमणकारी अवांछनीय तथा छद्मवेशी साहित्य के तथाकथित ठेकेदारों के तंबू उखड़ने लगे।

उमाशंकर सिंह परमार की तार्किक आलोचनाओं के स्वर इतने स्पष्ट और पारदर्शी रूप में सामने आए कि उसका सामना करने के लिए चुके हुए लोग बगलें झाँकने लगे, हालाँकि अर्थहीन और औचित्य हीन विरोध का सिलसिला भी जारी है, लेकिन झूठ के पैर नही होते, इसलिए उसका देर तक टिका रहना संभव नही है। 

● सैकड़ों पत्र पत्रिकाओं में परमार के आलोचनात्मक लेख निरंतर छप रहे हैं, आवश्यकता से अधिक छप रहे हैं और इसके साथ ही अल्प समय में उनकी दस आलोचनात्मक पुस्तकों का प्रकाशन एक अद्भुत उपलब्धि ही कहा जाएगा। 

● इसी क्रम मे उनकी एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक सामने आयी है ~ #सहमति_के_पक्ष_में। आलोचना की यह पुस्तक अब तक की उनकी अन्य पुस्तकों की अपेक्षा अधिक मुखर और दस्तावेजी है। पुस्तक की विषयवस्तु पर विस्तृत टिप्पणी/ समीक्षा तो समय-समय पर होती रहेगी। फिलहाल पुस्तक का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करना इसलिए भी जरूरी है कि तमाम रचाकार इस पुस्तक के पठन-पाठन के माध्यम से आश्वस्त हो सकें कि अकादमिक आलोचना, संस्थानों तथा संगठनों की गिरफ्त में कैद जनवादी साहित्य लेखन और लेखक घुटन भरे वातावरण से मुक्त हो रहे हैं और नासमझ रचनाकारों के भ्रम टूट रह हैं।  

● पुस्तक की भूमिका में उमाशंकर सिंह परमार लिखते हैं कि ~ "साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की कमजोरी के पीछे एक कारण अकादमिक पूर्वाग्रह और पूर्व मान्यताएँ ही थीं, जो प्रकारांतर से कलावादी व्यक्ति निष्ठता व अराजकता की पोषक बनकर मार्क्सवाद को कमजोर करती रही है। आलोचना को विचारधारा का स्त्रोत बनाने का काम वही कर सकता था, जो अकादमिक आलोचना के भूत से अवमुक्त हो, लेकिन इस दिशा में बहुत कम काम हुआ है या यह कहिए कि काम हुआ है, फिर भी वह चर्चा नही पा सका है या जानबूझकर ऐसे काम को नजरअंदाज किया गया है। 

● नीलकांत, कर्ण सिंह चौहान, कामेश्वर त्रिपाठी का नाम इस दिशा मे लिया जा सकता है। •••••• केदार नाथ सिंह, कुँअर नारायण, उदय प्रकाश, राजेश जोशी जैसे कलावादी और अमौलिक विचारधारा के बहुत से औसत कवियों को विभिन्न विश्वविद्यालयों के साहित्यिक कर्मियों ने देवता बनाने का उपक्रम किया, मंदिर स्थापित किए, लेकिन आम पाठक इस जबरदस्ती की सहमति को स्वीकार नही कर सका है। 

● आज का समय सूचना संचार का समय है। लेखक और पाठक पहले की अपेक्षा अधिक निकट आए हैं, संवाद बढ़ा है। मूल्य बदले हैं, लिहाजा मूर्तियों के खिलाफ पुनर्मूल्यांकन का नया अभियान चल पड़ा है। अब सहमति उन कवियो के पक्ष मे बन रही है, जो पाठकों को पसंद है और जिनका लिखा आम जनता के बीच भी लोक प्रिय रहा। •••• यह किताब ऐसी ही सहमतियों के पक्ष में है।" 

● आजादी के बाद हिन्दी में सबसे बड़ा परिवर्तन यह देखने में आया कि लेखन मे सत्ता अत्यधिक प्रभावी हो गयी है। बड़े बड़े पूँजीपतियों ने अपनी अकूत संपत्ति का निवेश कर पीठ और परिषद नामक हिन्दी की पुरस्कार दाता संस्थाएँ खोलीं और इन पीठों मे पदाधिकारी के रूप में सत्ता से जुड़े लोगों को बैठाया गया। विश्वविद्यालयों के हिन्दी प्रोफेसरों को हिन्दी का खेवनहार बताकर, उन्हें पुरस्कृत करके तथाकथित रूप से बड़ा बनाने की पूरी कोशिश की गयी। इसका प्रतिफल यह हुआ कि साहित्य जनता के बीच से कटने लगा। वह पीठों, अकादमियों व राज्य संस्थाओं का सरकार प्रायोजित साहित्य बन गया। जनता मे न तो पाठक बचे, न लेखक बचे। कबीर, सूर, तुलसी, निराला, जायसी, प्रसाद, मुक्ति बोध की परम्परा लगभग खंडित हो गयी। 

•••••• सत्ता और पूँजी के इर्द-गिर्द साहित्य की नकली बेल फलने फूलने लगी।औसत दर्जे की रचनाओं और आलोचनाओं का भीषण भंडार साहित्य का दर्जा पाकर मीडिया में चर्चित होने लगा। जेनुइन लेखन परिदृश्य से गायब हो गया और अपने आपको नोटिस लिए जाने के लिए तरसने लगा। •••• युगबोध की बजाय रिश्ता बोध प्रभावी हुआ, जिसके फलस्वरूप हिन्दी में कूड़े कचरे का अंबार लग गया। •••• ऐसे कवि लेखक, जो सत्तर अस्सी के दशक में उपेक्षित किए गये हैं, अब उनकी चर्चा की जाने लगी है, उनके लेखन का मूल्यांकन होने लगा है। ••••••

● आलोचना कृति के साथ कृति के समय की पूरी सभ्यता का रेखांकन है। आलोचना केवल रचना की नही होती, उससे जुड़ी पूरी सभ्यता की भी होती है। •••• जब हम कवि के समूचे परिवेश और युग से परचित हो जाते हैं, तो कृति की प्रगतिशील समीक्षा जन्म लेती है। यदि हम इस नजरिए से देखें, तो हम कवियों की एक ऐसी पीढ़ी भी देखते हैं, जो अपने जीवन और कविता के प्रति बेहद ईमानदार रहे, उन्होंने अपने जीवन मे जो अर्जित किया, उसी को कविता बनाया, मगर आलोचना की भेड़ चाल ने ऐसे लोगों को उपेक्षित किया है। मान बहादुर सिंह, हरीश भादानी, विजेन्द्र, कुमारेन्द्र पारस नाथ सिंह, शील ऐसे ही कवि रहे हैं। •••••

● कोई भी कवि जनकवि साधारण नही बनता है। कवि का जनकवि बनना एक असाधारण परिघटना है। हरीश भादानी के गीत उनकी रेत की जमीन मे आज भी गुनगनाए जाते हैं। इसी तरह मान बहादुर सिंह रहे, आजीवन गाँव में रहे और गाँव के सामन्तवाद से लड़ते हुए, जूझते हुए शहीद हुए, लेकिन अपनी शहादत के बीस साल बाद अचानक उनका उभर कर सामने आना बड़ी राहत देता है। 

● इस पुस्तक मे संग्रहीत कुछ कवि हमारी प्रगतिशील जनवादी चेतना के प्रतिमान हैं, जैसे ~ केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन आदि। तीनों कवि अपने समय के दबावों से पीड़ित रहे, इनको स्वीकृति अस्सी के दशक मे मिली थी और आज भी ये कवि प्रगतिशील कविता के प्रतिमान बनकर हिन्दी में स्थापित हैं। मेरे विचार से इन कवियों को छोड़कर प्रगतिशील परम्परा का रेखांकन नही हो सकता है।

● उमाशंकर सिंह परमार दृढ़ता पूर्वक कहते हैं कि कवि की निजी पक्षधरता व निजी चरित्र भी आलोचना का विषय होना चाहिए। प्रगतिशीलता की ईमानदारी जाँचने के लिए मैने इसी पद्धति का सहारा लिया है, जिसके कारण शम्भु बादल, सुधीर सक्सेना तथा स्वपनिल श्रीवास्तव अपने युग के सबसे सजग जेनुइन रचनाकार के रूप में मुझे प्राप्त हुए।आधुनिक आलोचना मूल्यों व नव संरचनावाद के नजरिए से भी कवियों को परखने की कोशिश की गई है। समकालीन कवियों मे एकमात्र नासिर अहमद सिकन्दर हैं, जिनकी कविताओं का विस्तृत मूल्यांकन किया गया है। नासिर अहमद सिकंदर लोकधर्मी आंदोलन एवं लोकधर्मी कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। भवानी प्रसाद मिश्र, त्रिलोचन, नागार्जुन, केदार, धूमिल, शंभू बादल सुधीर सक्सेना, हरीश भादानी, मानबहादुर सिंह, नासिर अहमद सिकन्दर की प्रगतिशील जनवादी परंपरा से जुड़कर समकालीन कविता में लोकधर्मी चेतना का हस्तक्षेप बनाए रखने में योगदान कर रहे युवा कवियों पर भी एक आलेख का समावेश इस पुस्तक मे किया गया है।● यह पुस्तक किसी सैद्धांतिकी का निर्माण नहीं है,  बल्कि सैद्धांतिकी का प्रयोग है। इसमें वही कवि रखे गए हैं, जिनकी कविता प्रामाणिक अनुभूति इमानदार अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती है।  90 के दशक तक के इन कवियों को सभी ने पढ़ा है, मगर एक पंक्ति पर बैठाने की कोशिश नहीं की गई है। इस पुस्तक में एक ही विचारधारा व एक ही चेतना को लेकर सभी पर चर्चा की गई है। इसलिए सारे कवि एक दूसरे से जुड़े हैं और एक पंक्ति मे ही सब स्थापित हैं। इस पुस्तक में आलोच्य कवियों की विचारधारा और परंपरा द्वारा ही मूल्यांकन करने की कोशिश की गई है। बेसिर पैर की तुलनात्मक समीक्षाएं साहित्य के लिए घातक हैं। इस आदत ने हिंदी का बहुत नुकसान किया है। मैंने इस दोष को कभी भी अपने आलोचना में तवज्जो नहीं दी है।  यह पुस्तक भी इस दोष से मुक्त  है। यह आलोच्य विषय पर ही केंद्रित है। न उद्धरणों की बहुलता है, न बेवजह की तुलनाएं हैं। इन कवियों का पक्ष अपना पक्ष है, मेरी अपनी सहमति का पक्ष है। जिस कविता में युग बोध और विचारधारा व लोकधर्मिता का समावेश है, उस कविता से और उस कवि से मैं सहमत हूँ, वह मेरी आलोचना का पात्र है। 

● अंत मे परमार कहते हैं कि~  यह पुस्तक मेरी सहमतियों का पक्ष है। आलोचना में जिस टूल्स का आलोचना औजारों का प्रयोग हुआ है, वह सहमतियों के पक्ष में मेरे अपने तर्क हैं, मेरे अपने औजार हैं। पुस्तक को पूरा करने में लगभग 2 साल का समय लगा। साथी बली सिंह,शंभू यादव और प्रद्युम्न कुमार सिंह से विभिन्न कवियों पर निरंतर बात करता रहा, उनसे बहुत सहायता मिली। भादानी से मेरा आकर्षण युवा कथा कार संदीप मील के कारण हुआ, संदीप भादानी के गीत बड़ी शिद्दत और लय से गाते हैं। वरिष्ठ कवि शंभू बादल, विजेन्द्र, सुधीर सक्सेना, मलय जी ने निरंतर मुझे प्रेरणा दी, उनका भी मैं आभार व्यक्त करता हूँ।

● बाँदा मे समय-समय पर संपन्न साहित्यिक आयोजनों के कुछ चित्र अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं ~ ये भविष्य की धरोहर भी हैं। 

● #10_10_2020

गुरुवार, 10 जून 2021

बुढ़ापे👨🏼‍🦯 को भी प्यार चाहिए💐💐

🌳🦚आज की कहानी🌳


💐💐बुढ़ापे👨🏼‍🦯 को भी प्यार चाहिए💐💐*


मोहन बेटा ! मैं तुम्हारे काका के घर जा रहा हूँ . क्यों पिताजी ? और आप आजकल काका के घर बहुत जा रहे हो ...? तुम्हारा मन मान रहा हो तो चले जाओ ... पिताजी  !  लो ये पैसे रख लो , काम आएंगे ।


पिताजी का मन भर आया . उन्हें आज अपने बेटे को दिए गए संस्कार लौटते नजर आ रहे थे ।


जब मोहन स्कूल जाता था ... वह पिताजी से जेब खर्च लेने में हमेशा हिचकता था , क्यों कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी . पिताजी मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से घर चला पाते थे ... पर माँ फिर भी उसकी जेब में कुछ सिक्के डाल देती थी ... जबकि वह बार-बार मना करता था ।


मोहन की पत्नी का स्वभाव भी उसके पिताजी की तरफ कुछ खास अच्छा नहीं था . वह रोज पिताजी की आदतों के बारे में कहासुनी करती थी ... उसे ये बडों से टोका टाकी पसन्द नही थी ... बच्चे भी दादा के कमरे में नहीं जाते , मोहन को भी देर से आने के कारण बात करने का समय नहीं मिलता ।


एक दिन पिताजी का पीछा किया ... आखिर पिताजी को काका के घर जाने की इतनी जल्दी क्यों रहती है ? वह यह देख कर हैरान रह गया कि पिताजी तो काका के घर जाते ही नहीं हैं ! !!


वह तो स्टेशन पर एकान्त में शून्य मनस्क एक पेड़ के सहारे घंटों बैठे रहते थे . तभी पास खड़े एक बजुर्ग , जो यह सब देख रहे थे , उन्होंने कहा ... बेटा...! क्या देख रहे हो ?


जी....! वो 

अच्छा , तुम उस बूढ़े आदमी को देख रहे हो....? वो यहाँ अक्सर आते हैं और घंटों पेड़ तले बैठ कर सांझ ढले अपने घर लौट जाते हैं . किसी अच्छे सभ्रांत घर के लगते हैं ।


बेटा ...! ऐसे एक नहीं अनेकों बुजुर्ग माएँ बुजुर्ग पिता तुम्हें यहाँ आसपास मिल जाएंगे !


जी , मगर क्यों ?


बेटा ...! जब घर में बड़े बुजुर्गों को प्यार नहीं मिलता.... उन्हें बहुत अकेलापन महसूस होता है , तो वे यहाँ वहाँ बैठ कर अपना समय काटा करते हैं !


वैसे क्या तुम्हें पता है.... बुढ़ापे में इन्सान का मन बिल्कुल बच्चे जैसा हो जाता है . उस समय उन्हें अधिक प्यार और सम्मान की जरूरत पड़ती है , पर परिवार के सदस्य इस बात को समझ नहीं पाते ।


वो यही समझते हैं इन्होंने अपनी जिंदगी जी ली है फिर उन्हें अकेला छोड देते हैं , कहीं साथ ले जाने से कतराते हैं ।

बात करना तो दूर अक्सर उनकी राय भी उन्हें कड़वी लगती है . जब कि वही बुजुर्ग अपने बच्चों को अपने अनुभवों से आने वाले संकटों और परेशानियों से बचाने के लिए सटीक सलाह देते है ।


घर लौट कर मोहन ने किसी से कुछ नहीं कहा . जब पिताजी लौटे , मोहन घर के सभी सदस्यों को देखता रहा ।


किसी को भी पिताजी  की चिन्ता नहीं थी . पिताजी से कोई बात नहीं करता , कोई हंसता खेलता नहीं था . जैसे पिताजी का घर में कोई अस्तित्व ही न हो ! ऐसे परिवार में पत्नी बच्चे सभी पिताजी  को इग्नोर करते हुए दिखे !


सबको राह दिखाने के लिऐ आखिर  मोहन ने भी अपनी पत्नी और बच्चों से बोलना बन्द कर दिया ... वो काम पर जाता और वापस आता किसी से कोई बातचीत नही ...! बच्चे पत्नी बोलने की कोशिश भी करते , तो वह भी इग्नोर कर काम मे डूबे रहने का नाटक करता ! !! तीन दिन मे सभी परेशान हो उठे... पत्नी , बच्चे इस उदासी का कारण जानना चाहते थे ।


मोहन ने अपने परिवार को अपने पास बिठाया . उन्हें प्यार से समझाया कि मैंने तुम से चार दिन बात नहीं की तो तुम कितने परेशान हो गए ? अब सोचो तुम पिताजी के साथ ऐसा व्यवहार करके उन्हें कितना दुख दे रहे हो ?


मेरे पिताजी मुझे जान से प्यारे हैं . जैसे तुम्हारी माँ ! और फिर पिताजी के अकेले स्टेशन जाकर घंटों बैठकर रोने की बात छुपा गया . सभी को अपने बुरे व्यवहार का खेद था ।


उस दिन जैसे ही पिताजी शाम को घर लौटे , तीनों बच्चे उनसे चिपट गए ...! दादा जी ! आज हम आपके पास बैठेंगे...! कोई किस्सा कहानी सुनाओ ना ।


पिताजी की आँखें भीग आई . वो बच्चों को लिपटकर उन्हें प्यार करने लगे . और फिर जो किस्से कहानियों का दौर शुरू हुआ वो घंटों चला . इस बीच मोहन की पत्नी उनके लिए फल तो कभी चाय नमकीन लेकर आती . पिताजी बच्चों और मोहन के साथ स्वयं भी खाते और बच्चों को भी खिलाते , अब घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था ।


एक दिन मोहन बोला ,  पिताजी...! क्या बात है ! आजकल काका के घर नहीं जा रहे हो ...? नहीं बेटा ! अब तो अपना घर ही स्वर्ग लगता है ...! !!


आज सभी में तो नहीं लेकिन अधिकांश परिवारों के बुजुर्गों की यही कहानी है . बहुधा आस पास के बगीचों में , बस अड्डे पर , नजदीकी रेल्वे स्टेशन पर परिवार से तिरस्कृत भरे पूरे परिवार में एकाकी जीवन बिताते हुए ऐसे कई बुजुर्ग देखने को मिल जाएंगे ।


आप भी कभी न कभी अवश्य बूढ़े होंगे , आज नहीं तो कुछ वर्षों बाद होंगे । जीवन का सबसे बड़ा संकट है बुढ़ापा ! घर के बुजुर्ग ऐसे बूढ़े वृक्ष हैं , जो बेशक फल न देते हों पर छाँव तो देते ही हैं !


*अपना बुढापा खुशहाल बनाने के लिए बुजुर्गों को अकेलापन महसूस न होने दीजिये , उनका सम्मान भले ही न कर पाएँ , पर उन्हें तिरस्कृत मत कीजिये , उनका खयाल रखिये।*









*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

रविवार, 6 जून 2021

कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय’

 नए सशक्त एवं आत्म-निर्भर भारत का आगाज़ है ‘कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय’


भारत जैसे विकासशील देश में अक्सर यह महसूस किया गया है कि देश में ई-शासन को सुनिश्चित करने के लिए बहुत अधिक जोर देने की आवश्यकता है,जो इलेक्ट्रॉनिक सेवाओं, उत्पादों, उपकरणों,नौकरी के अवसरों और शिक्षा को शामिल करने वाले समावेशी विकास को बढ़ावा दे सके। इसी कड़ी में डिजिटल यूनिवर्सिटी ऑफ़ स्किल रिसर्जेंस देश के युवाओं और प्रशिक्षुओं में पारंपरिक ज्ञान व कौशल के प्रति आत्मविश्वास पैदा करने एवं समसामयिक अपेक्षित कौशल और आधुनिक तकनीकी समझ के अंतराल को कम करने के उदेश्य से सत्यापित एक प्रयोग है। उक्त विचार DUSR की नियंत्रक (Governor)डॉ.रिंजू राय के हैं।

डॉ.राय ने बात करते हुए हमें बताया कि कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय ( एक आभासी मेटा विश्वविद्यालय ) गैर सरकारी संगठन- सामाजिक विकास एवं शोध संस्था की एक इकाई है जो वर्ष 2002-03 में संस्था पंजीकरण अधिनियम 1860 के अंतर्गत पंजीकृत है। कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय ( Digital University of Skill Resurgence DUSR ) ऑनलाइन माध्यम से संचालित एक आभासी मेटा विश्वविद्यालय है जो युवाओं में व्यावसायिक कौशल विकसित करने , व्यावसायिक उद्यमी नागरिकों में व्याप्त कौशल को अद्यतन करने तथा भारतीय ज्ञान पद्धति , जीवन मूल्य और कौशल विकास को केंद्रीभूत करके कार्य करने के लिए संकल्पित है। कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय शैक्षिक तकनीक ( EdTech ) को आत्मसात करके मानव जीवन व्यवहार के सभी प्रमुख आयामों पर केंद्रित व्यावहारिक- व्यावसायिक शिक्षण प्रशिक्षण को प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

क्या हैं 'कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय'के उद्देश्य-

DUSR की नियंत्रक (Governor) डॉ.रिंजू राय ने बताया है कि COVID-19 महामारी ने हम सभी को यह बता दिया है कि 'आवश्यकता आविष्कार की जननी है' जीवित रहने के लिए और कुछ बेहतर करने के लिए जो कुछ भी जरूरी हो जाता है तो मानव किसी भी तरह से उसे प्राप्त करने के प्रयास में जुट जाता है। आज हम सब लॉकडाउन की वज़ह से घरों में बंद हैं लेकिन इसके बावजूद हमें सूचना और ज्ञान के प्रवाह को रुकने नहीं देना है डॉ.रिंजू राय कहती हैं कि DUSR का उदेश्य शैक्षिक तकनीक ( EdTech ) की संभावनाओं का उपयोग करके अधिगम आधारित शिक्षण - प्रशिक्षण को साकार करना। युवाओं और प्रशिक्षुओं को स्वरोजगार के लिए शिक्षित- प्रशिक्षित और प्रोत्साहित करना और ज्ञान संपन्न डिजिटल,होनहार युवा पीढ़ी को विकसित करके शिक्षा- संस्कार ध्येय को परिलक्षित एवं फलीभूत करना है।

समय की मांग है 'DUSR'-

DUSR नियंत्रक बताती हैं कि DUSR जैसी संस्थाओं का निर्माण समय की मांग है जिससे हम समाज में ' कौशल अंतराल ' को कम करने तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य को पूरा कर सकें। डॉ. राय कहती हैं कि DUSR राष्ट्र के पिछड़े भू - भाग जहां सदियों से ज्ञान और कौशल के भंडार रहे हैं परंतु आधुनिक जटिल व्यवस्था के कारण वे हाशिए पर पहुंच गए ,उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने के लिए एक सेतु के रूप में विश्वविद्यालय माध्यम है।

क्या हैं 'DUSR' के भावी लक्ष्य -

DUSR की नियंत्रक (Governor) डॉ.रिन्जु राय कहती हैं कि राष्ट्र के पुनरुत्थान और नए भारत के निर्माण के लिए भारत में बेहतरीन जनसांख्यिकी युवा मानस है। देश का युवा वैश्विक चुनौतियों का सामना करने तथा उनसे प्रतियोगिता करने के लिए सामर्थ्यवान और पूर्णत : तैयार है। 'कौशल पुनरुत्थान डिजिटल विश्वविद्यालय' ज्ञान और कौशल को एक सार्थक संभल बनाकर अवसरों को सृजित करने , जनमानस को कौशलयुक्त बनाने और युवाओं को अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु प्रेरित करने के लिए सदैव तत्पर है और यही DUSR के भावी लक्ष्य हैं। डॉ.राय का मानना है कि आत्मनिर्भर भारत विश्व की सर्वश्रेष्ठ ताकत बनेगा क्योंकि हम भविष्य बनाते नहीं भविष्य का निर्धारण करते हैं।और DUSR इस दिशा में सार्थक पहल है।

'DUSR' जैसी संस्थाएं डिजिटल इंडिया को बढ़ावा है-

इसमें कोई दो मत नहीं है कि DUSR जैसी संस्थाएं डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को बढ़ावा है गौरतलब है कि 7 अगस्त 2014 को डिजिटल इंडिया कार्यक्रम प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू किया गया कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य देश को डिजिटल रूप से सशक्त कर समाज को ज्ञान अर्थव्यवस्था में परिणत करना है। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिये ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा दे रही है जिससे ‘पारंपरिक अर्थव्यवस्था’ से ‘डिजिटल अर्थव्यवस्था’ की तरफ तेज़ी से बढ़ा जा सके।

गुरुवार, 3 जून 2021

अरुण कमल की इच्छा / मुकेश प्रत्यूष

 हिंदी के महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल की एक कविता है  - 'इच्छा' । पूर्वप्रकाशित है। उन पर केन्द्रित पूर्वग्रह के आवरण पर, कविता खंड में तथा एक आलेख  में यानी एक ही अंक में तीन बार इसे  जगह दी  गयी है। पूरी कविता है  


 मै जब उठूं तो भादो हो

पूरा चंद्रमा उगा हो ताड़ के फल सा 

गंगा भरी हो धरती के बराबर 

खेत धान से धधाए 

और हवा में तीज त्यौहार की गमक 

इतना भरा हो संसार 

कि जब मैं उठूं  तो चींटी भर  जगह भी

 खाली न हो


छोटी-सी, सहज संप्रेषित  होने वाली इस कविता में कवि  की छह  इच्छाएं हैं।


पहली,  जब वह सोकर उठे तो भादो का महीना हो , दूसरी आसमान में पूरा चांद खिला हो यानी पूर्णिमा की रात हो और आसमान में बादल नहीं हो। यह दोनों इच्छाएं तभी पूरी हो  सकती  हैं  जब कवि सावन  की पूर्णिमा को सोए और भादो के पहले दिन सूर्योदय से पहले या कहें  ब्रह्ममुहूर्त में जग जाए। न  बारिश  हो रही हो, न बादल उमड़-घुमड़ रहे हों।  


ऐसी स्थिति में कवि की तीसरी इच्छा - खेत  धान से धधाए  - कैसे पूरी होगी और खेती से जुड़ा किसान तो बेमौत मर जाएगा ।  नदियां भी तभी भरेंगी जब बारिश  हो और कवि को बरसात के मौसम   में निरभ्र  आसमान चाहिए।  यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि कवि चांद को ताड़ के फल जैसा देखना चाहता है। भादो में पकने वाले ताड़ के फल से चांद की तुलना उस जीवन  से जोड़ती है जो अलक्षित है। ताड़ का फल चांद की तरह  गोलाकार  होता है पूरी तरह गोल नहीं, सतह पर खुरदुरापन और रंग मटमैला। अंदर से पहले रंग का एक मीठा द्रव निकलता है जिसका सेवन  बहुत कम किया जाता है। यह प्रायः पेड़ के नीचे बिखरा रहता है।  यहां ध्यान देने की बात  यह भी है कि चांद की तरह ताड़ का भी एक कृष्ण  पक्ष है।  लोग इस मौसम में ताड़ से एक दूरी बनाए  रहते हैं क्योंकि ऊंचाई से गिरता हुआ यह फल अपनी गतिज उर्जा से  गंभीर चोट पहुंचा देता है। पांच-छह किलो के इस फल की चोट किसी गोले से कम नहीं होती। पूर्णिमा के चांद का सौंदर्य निहारने की इच्छा नैसर्गिक है लेकिन अमावस्या  का स्याह  अंधेरा भी एक ऐसा सच है जिसे  विस्तृत नहीं किया जा सकता। 


कवि की चौथी इच्छा है - गंगा भरी हो धरती के बराबर।  प्रश्न उठता है क्या गंगा धरती पर नहीं है? भरे तो केवल गंगा क्यों? यमुना, कावेरी, गोदावरी, नर्मदा आदि अन्य छोटी-बड़ी नदियां क्यों नही?  धरती   केवल गंगा के प्रवाह क्षेत्र तक   सीमित नहीं है और   अन्य नदियों में भी  जल जरूरी है। उसके प्रवाह क्षेत्र  में भी जीवन  है।  संभव है, इस पंक्ति में कवि का अपना परिवेश अनायास आ गया है क्योंकि  कवि गंगा क्षेत्र का वासी है और उसके अवचेतन में यह नदी रची-बसी हो।    कविता में कवि का  समय, समाज,  और संस्कार चाहेअपचाहै  प्रतिबिंबित होता ही हैं। लेकिन  इस सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि  नदियों का जल कभी भी भूमि (कवि के शब्दों में धरती) के बराबर नहीं होता क्योंकि इससे जल-प्रलय का खतरा हमेशा बना रहेगा।  नदियां हमेशा थोड़ा  नीचे बहा  करती हैं।  फिर वह  भूमि (धरती)  कहां की हो गंगा का प्रवाह  देवप्रयाग से लेकर गंगासागर तक  है और इस पूरे रास्ते में भूमि (धरती) की ऊंचाई हर जगह अलग-अलग है तो कवि गंगा किस ऊंचाई  पर प्रवाहित होते देखना चाहता है? 


कवि की पांचवीं इच्छा है -  हवा में हो तीज-त्यौहार की गमक।  भादो में केवल दो त्यौहार मनाये जाते हैं एक कृष्ण जन्माष्टमी और दूसरा तीज।   तीज की  चर्चा इस पंक्ति  में है। तीज संभवतः केवल  बिहार में मनाया जाता है। इस दिन  महिलाएं अपने पति के    आयुष्य के लिए चौबीस  घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं, अन्न-जल ग्रहण नहीं करती, सोती भी नहीं,  पूरा समय भगवान शिव की आराधना में व्यतीत करती  हैं  और अपने पति को  दीर्घायु करने के लिए प्रार्थना करती हैं। इसके कुछ  दिनों के बाद बिहार की महिलाएं एक और व्रत करती हैं जिउतिया।  यह व्रत वे अपने  पुत्र के दीर्घ जीवन के लिए करती हैं। इस दिन भी वो  निर्जला रहती हैं।  केवल एक फर्क होता है  जिउतिया की रात वे सो  सकती  हैं।  दोनों त्योहारों में महिलाएं खुद उपवास करने के बावजूद  परिवार के  पुरुषों के लिए तरह-तरह के पकवान बनाती हैं। पूरे पारिवारिक परिवेश में उसकी गमक बनी रहती है। लेकिन मेरी जानकारी में बिहार में ऐसा एक भी त्यौहार नहीं जिसमें पति अपने पत्नी या  पुत्र  अपनी मां के सुदीर्घ जीवन के लिए कोई पूजा या उपवास करता हो। ऐसे में कवि का संकेत किस ओर है? नि:संदेह अरूण कमल इस  व्‍यवस्‍था को बनाए रखने का पक्षधर नहीं होंगे।   


अंतिम पंक्तियों में कवि की छठी इच्छा   है-  इतना भरा हो संसार/कि जब मैं उठूं  तो चींटी भर  जगह भी/खाली न हो। पूरी धरती पर सभी जगह  हवा की मौजूदगी पहले से है।   जाहिर है कवि का इशारा इसकी ओर नहीं है।   जीवित प्राणी या वनस्पति से भरी पृथ्वी की इच्छा है। लेकिन इतनी भरी कि चींटी भर भी जगह खाली न हो तो सोकर उठा हुआ व्यक्ति पैर कहां रखेगा,  किसी प्राणी के शरीर या किसी पौधे के ऊपर? इससे तो पैरों तले कोई-न-कोई  कुचला जाएगा। और, अरुण कमल इस मानसिकता के भी पैरोकार नहीं हैं।  तो  फिर इन इच्छाओं का मतलब  क्या है? 


अपने प्रिय कवि अरूण कमल को उनके भक्‍तों की नजर न लग जाए इसलिए मैंने यह डिठौना लगाया है। 


मानवीय गुणों से परिपूर्ण जीवन के कवि अरूण कमल पर केन्द्रित पूर्वग्रह के इस अंक को पढ़ते हुए मुझे कई बार बड़ी शिद्दत से यह अहसास हुआ कि उन्‍हें हम कितना कम जानते हैं।  


इसमें कोई दो राय नहीं कि अरूण कमल की कविताओं में हमारा समय और समाज धड़कता है। वे बहुपठित हैं, मृदुभाषी और व्‍यवहारकुशल हैं।  अपने चालीस वर्षों के संबंधों के आधार पर बिना किसी झिझक के कह सकता हूं कि उनसे किसी भी विषय पर  बात की जा सकती है।  संपादकीय में लिखे प्रेमशंकर शुक्‍त की इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं कि वे मीठे पानी के पृथ्‍वी के वासी हैं तभी तो उनकी आत्‍मा का जल कभी खारा नहीं होता है। 


इस अंक में आलेखों के अतिरिक्‍त अरूण कमल का एक महत्‍वपूर्ण साक्षात्‍कार भी प्रकाशित है। 


इसी अंक में प्रकाशित परचून में एडिनबरा की एक शाम को जिक्र करते हुए अरूण कमल ने लिखा है कि बड़े-से-बड़े कवि को लोग भूल सकते हैं अगर बार-बार याद न दिलाया जा

मंगलवार, 1 जून 2021

भारतीय धर्म के बारे में

जाने अपने #धर्म और संस्कृति समाज के बारे मे



प्रस्तुति -- दिलीप कुमार सिन्हा

*पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -*

*1. युधिष्ठिर    2. भीम    3. अर्जुन*

*4. नकुल।      5. सहदेव*


*( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )*


*यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन*

*की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।*


*वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..*

*कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -*

*1. दुर्योधन      2. दुःशासन   3. दुःसह*

*4. दुःशल        5. जलसंघ    6. सम*

*7. सह            8. विंद         9. अनुविंद*

*10. दुर्धर्ष       11. सुबाहु।   12. दुषप्रधर्षण*

*13. दुर्मर्षण।   14. दुर्मुख     15. दुष्कर्ण*

*16. विकर्ण     17. शल       18. सत्वान*

*19. सुलोचन   20. चित्र       21. उपचित्र*

*22. चित्राक्ष     23. चारुचित्र 24. शरासन*

*25. दुर्मद।       26. दुर्विगाह  27. विवित्सु*

*28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ*

*31. नन्द।        32. उपनन्द   33. चित्रबाण*

*34. चित्रवर्मा    35. सुवर्मा    36. दुर्विमोचन*

*37. अयोबाहु   38. महाबाहु  39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग  42. भीमबल*

*43. बालाकि    44. बलवर्धन 45. उग्रायुध*

*46. सुषेण       47. कुण्डधर  48. महोदर*

*49. चित्रायुध   50. निषंगी     51. पाशी*

*52. वृन्दारक   53. दृढ़वर्मा   54. दृढ़क्षत्र*

*55. सोमकीर्ति  56. अनूदर    57. दढ़संघ 58. जरासंघ   59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक*

*61. उग्रश्रवा   62. उग्रसेन     63. सेनानी*

*64. दुष्पराजय        65. अपराजित* 

*66. कुण्डशायी        67. विशालाक्ष*

*68. दुराधर   69. दृढ़हस्त    70. सुहस्त*

*71. वातवेग  72. सुवर्च    73. आदित्यकेतु*

*74. बह्वाशी   75. नागदत्त 76. उग्रशायी*

*77. कवचि    78. क्रथन। 79. कुण्डी* 

*80. भीमविक्र 81. धनुर्धर  82. वीरबाहु*

*83. अलोलुप  84. अभय  85. दृढ़कर्मा*

*86. दृढ़रथाश्रय    87. अनाधृष्य*

*88. कुण्डभेदी।     89. विरवि*

*90. चित्रकुण्डल    91. प्रधम*

*92. अमाप्रमाथि    93. दीर्घरोमा*

*94. सुवीर्यवान     95. दीर्घबाहु*

*96. सुजात।         97. कनकध्वज*

*98. कुण्डाशी        99. विरज*

*100. युयुत्सु*


*( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,*

*जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )*


*"श्री मद्-भगवत गीता"के बारे में-*


*ॐ . किसको किसने सुनाई?*

*उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।* 


*ॐ . कब सुनाई?*

*उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।*


*ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?*

*उ.- रविवार के दिन।*


*ॐ. कोनसी तिथि को?*

*उ.- एकादशी* 


*ॐ. कहा सुनाई?*

*उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।*


*ॐ. कितनी देर में सुनाई?*

*उ.- लगभग 45 मिनट में*


*ॐ. क्यू सुनाई?*

*उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।*


*ॐ. कितने अध्याय है?*

*उ.- कुल 18 अध्याय*


*ॐ. कितने श्लोक है?*

*उ.- 700 श्लोक*


*ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है?*

*उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।* 


*ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा* 

*और किन किन लोगो ने सुना?*

*उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने*


*ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?*

*उ.- भगवान सूर्यदेव को*


*ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?*

*उ.- उपनिषदों में*


*ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?*

*उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।*


*ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?*

*उ.- गीतोपनिषद*


*ॐ. गीता का सार क्या है?*

*उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना*


*ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?*

*उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574*

*अर्जुन ने- 85* 

*धृतराष्ट्र ने- 1*

*संजय ने- 40.*


*अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे। धन्यवाद*


*अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है।*


*33 करोड नहीँ  33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू*

*धर्म मेँ।*


*कोटि = प्रकार।* 

*देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,*


*कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।*


*हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं...*


*कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-*


*12 प्रकार हैँ*

*आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,*

*शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,*

*सविता, तवास्था, और विष्णु...!*


*8 प्रकार हे :-*

*वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।*


*11 प्रकार है :-* 

*रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,*

*अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,*

*रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।*


*एवँ*

*दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।*


*कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी* 


*अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है*

*तो इस जानकारी को अधिक से अधिक*

*लोगो तक पहुचाएं। ।*


*🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏*


*१ हिन्दु हाेने के नाते जानना ज़रूरी है*


*THIS IS VERY GOOD INFORMATION FOR ALL OF US ... जय श्रीकृष्ण ...*


*अब आपकी बारी है कि इस जानकारी*

 *को आगे बढ़ाएँ ......*


*अपनी भारत की संस्कृति* 

*को पहचाने.*

*ज्यादा से ज्यादा*

*लोगो तक पहुचाये.* 

*खासकर अपने बच्चो को बताए* 

*क्योकि ये बात उन्हें कोई नहीं* *बताएगा...*


*📜😇  दो पक्ष-*


*कृष्ण पक्ष ,* 

*शुक्ल पक्ष !*


*📜😇  तीन ऋण -*


*देव ऋण ,* 

*पितृ ऋण ,* 

*ऋषि ऋण !*


*📜😇   चार युग -*


*सतयुग ,* 

*त्रेतायुग ,*

*द्वापरयुग ,* 

*कलियुग !*


*📜😇  चार धाम -*


*द्वारिका ,* 

*बद्रीनाथ ,*

*जगन्नाथ पुरी ,* 

*रामेश्वरम धाम !*


*📜😇   चारपीठ -*


*शारदा पीठ ( द्वारिका )*

*ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )* 

*गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,* 

*शृंगेरीपीठ !*


*📜😇 चार वेद-*


*ऋग्वेद ,* 

*अथर्वेद ,* 

*यजुर्वेद ,* 

*सामवेद !*


*📜😇  चार आश्रम -*


*ब्रह्मचर्य ,* 

*गृहस्थ ,* 

*वानप्रस्थ ,* 

*संन्यास !*


*📜😇 चार अंतःकरण -*


*मन ,* 

*बुद्धि ,* 

*चित्त ,* 

*अहंकार !*


*📜😇  पञ्च गव्य -*


*गाय का घी ,* 

*दूध ,* 

*दही ,*

*गोमूत्र ,* 

*गोबर !*


*📜😇  पञ्च देव -*


*गणेश ,* 

*विष्णु ,* 

*शिव ,* 

*देवी ,*

*सूर्य !*


*📜😇 पंच तत्त्व -*


*पृथ्वी ,*

*जल ,* 

*अग्नि ,* 

*वायु ,* 

*आकाश !*


*📜😇  छह दर्शन -*


*वैशेषिक ,* 

*न्याय ,* 

*सांख्य ,*

*योग ,* 

*पूर्व मिसांसा ,* 

*दक्षिण मिसांसा !*


*📜😇  सप्त ऋषि -*


*विश्वामित्र ,*

*जमदाग्नि ,*

*भरद्वाज ,* 

*गौतम ,* 

*अत्री ,* 

*वशिष्ठ और कश्यप!* 


*📜😇  सप्त पुरी -*


*अयोध्या पुरी ,*

*मथुरा पुरी ,* 

*माया पुरी ( हरिद्वार ) ,* 

*काशी ,*

*कांची* 

*( शिन कांची - विष्णु कांची ) ,* 

*अवंतिका और* 

*द्वारिका पुरी !*


*📜😊  आठ योग -* 


*यम ,* 

*नियम ,* 

*आसन ,*

*प्राणायाम ,* 

*प्रत्याहार ,* 

*धारणा ,* 

*ध्यान एवं* 

*समाधि !*


*📜😇 आठ लक्ष्मी -*


*आग्घ ,* 

*विद्या ,* 

*सौभाग्य ,*

*अमृत ,* 

*काम ,* 

*सत्य ,* 

*भोग ,एवं* 

*योग लक्ष्मी !*


*📜😇 नव दुर्गा --*


*शैल पुत्री ,* 

*ब्रह्मचारिणी ,*

*चंद्रघंटा ,* 

*कुष्मांडा ,* 

*स्कंदमाता ,* 

*कात्यायिनी ,*

*कालरात्रि ,* 

*महागौरी एवं* 

*सिद्धिदात्री !*


*📜😇   दस दिशाएं -*


*पूर्व ,* 

*पश्चिम ,* 

*उत्तर ,* 

*दक्षिण ,*

*ईशान ,* 

*नैऋत्य ,* 

*वायव्य ,* 

*अग्नि* 

*आकाश एवं* 

*पाताल !*


*📜😇  मुख्य ११ अवतार -*


 *मत्स्य ,* 

*कच्छप ,* 

*वराह ,*

*नरसिंह ,* 

*वामन ,* 

*परशुराम ,*

*श्री राम ,* 

*कृष्ण ,* 

*बलराम ,* 

*बुद्ध ,* 

*एवं कल्कि !*


*📜😇 बारह मास -* 


*चैत्र ,* 

*वैशाख ,* 

*ज्येष्ठ ,*

*अषाढ ,* 

*श्रावण ,* 

*भाद्रपद ,* 

*अश्विन ,* 

*कार्तिक ,*

*मार्गशीर्ष ,* 

*पौष ,* 

*माघ ,* 

*फागुन !*


*📜😇  बारह राशी -* 


*मेष ,* 

*वृषभ ,* 

*मिथुन ,*

*कर्क ,* 

*सिंह ,* 

*कन्या ,* 

*तुला ,* 

*वृश्चिक ,* 

*धनु ,* 

*मकर ,* 

*कुंभ ,*

*मीन!*


*📜😇 बारह ज्योतिर्लिंग -* 


*सोमनाथ ,*

*मल्लिकार्जुन ,*

*महाकाल ,* 

*ओमकारेश्वर ,* 

*बैजनाथ ,* 

*रामेश्वरम ,*

*विश्वनाथ ,* 

*त्र्यंबकेश्वर ,* 

*केदारनाथ ,* 

*घुष्नेश्वर ,*

*भीमाशंकर ,*

*नागेश्वर !*


*📜😇 पंद्रह तिथियाँ -*


*प्रतिपदा ,*

*द्वितीय ,*

*तृतीय ,*

*चतुर्थी ,* 

*पंचमी ,* 

*षष्ठी ,* 

*सप्तमी ,* 

*अष्टमी ,* 

*नवमी ,*

*दशमी ,* 

*एकादशी ,* 

*द्वादशी ,* 

*त्रयोदशी ,* 

*चतुर्दशी ,* 

*पूर्णिमा ,* 

*अमावास्या !*


*📜😇 स्मृतियां -* 


*मनु ,* 

*विष्णु ,* 

*अत्री ,* 

*हारीत ,*

*याज्ञवल्क्य ,*

*उशना ,* 

*अंगीरा ,* 

*यम ,* 

*आपस्तम्ब ,* 

*सर्वत ,*

*कात्यायन ,* 

*ब्रहस्पति ,* 

*पराशर ,* 

*व्यास ,* 

*शांख्य ,*

*लिखित ,* 

*दक्ष ,* 

*शातातप ,* 

*वशिष्ठ !*


*॥ हरे कृष्णा हरे कृष्ण* 

*कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥*

*॥ हरे राम हरे राम*

*॥ राम राम हरे हरे ॥*


*इस पोस्ट को अधिकाधिक शेयर करें जिससे सबको हमारी संस्कृति का ज्ञान हो।*


*🙏🏻॥ जय श्री कृष्णा ॥🙏🏻*

🚩🚩 *जय हनुमान* 🚩🚩

  🚩🚩  **🙏🏻🙏🏻🙏🏻

[6/1, 09:06] Anami: शास्त्रों में स्वच्छता के सूत्र


हमारे पूर्वज अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने  हजारों वर्षों पूर्व वेदों व पुराणों में महामारी की रोकथाम के लिए परिपूर्ण स्वच्छता रखने के लिए स्पष्ट निर्देश दे कर रखें हैं- 


1. लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं

    तैलं तथैव च । 

    लेह्यं पेयं च विविधं 

    हस्तदत्तं न भक्षयेत् ।। 

       - धर्मसिन्धू ३पू. आह्निक


नामक, घी, तेल, चावल, एवं अन्य खाद्य पदार्थ चम्मच से परोसना चाहिए हाथों से नही।


2. अनातुरः स्वानि खानि न 

    स्पृशेदनिमित्ततः ।।

    - मनुस्मृति ४/१४४


 अपने शरीर के अंगों जैसे आँख, नाक, कान आदि को बिना किसी कारण के छूना नही चाहिए।


3. अपमृज्यान्न च स्न्नातो

    गात्राण्यम्बरपाणिभिः ।। 

    - मार्कण्डेय पुराण ३४/५२


एक बार पहने हुए  वस्त्र धोने के बाद ही पहनना चाहिए। स्नान के बाद अपने शरीर को शीघ्र सुखाना चाहिए।


4. हस्तपादे मुखे चैव पञ्चाद्रे

    भोजनं चरेत् ।।

    पद्म०सृष्टि.५१/८८

    नाप्रक्षालितपाणिपादो

    भुञ्जीत ।।

    - सुश्रुतसंहिता चिकित्सा

    २४/९८

 अपने हाथ, मुहँ व पैर स्वच्छ करने के बाद ही भोजन करना चाहिए।


5. स्न्नानाचारविहीनस्य सर्वाः 

    स्युः निष्फलाः क्रियाः ।।


   - वाघलस्मृति ६९


बिना स्नान व शुद्धि के यदि कोई कर्म किये जाते है तो वो निष्फल रहते हैं।


6. न धारयेत् परस्यैवं

    स्न्नानवस्त्रं कदाचन ।I

    - पद्म० सृष्टि.५१/८६


स्नान के बाद अपना शरीर पोंछने के लिए किसी अन्य द्वारा उपयोग किया गया वस्त्र(टॉवेल) उपयोग में नही लाना चाहिये।


7. अन्यदेव भवद्वासः

    शयनीये नरोत्तम ।

    अन्यद् रथ्यासु देवानाम

    अर्चायाम् अन्यदेव हि ।।

    - महाभारत अनु १०४/८६


पूजन, शयन एवं घर के बाहर  जाते समय अलग- अलग वस्त्रों का उपयोग करना चाहिए।


8. तथा न अन्यधृतं (वस्त्रं 

    धार्यम् ।।

   - महाभारत अनु १०४/८६


दूसरे द्वारा पहने गए वस्त्रों को नही पहनना चाहिए।


9.  न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं

     वसनं बिभृयाद् ।।

    -  विष्णुस्मृति ६४


एक बार पहने हुए वस्त्रों को स्वच्छ करने के बाद ही दूसरी बार पहनना चाहिए।


10. न आद्रं परिदधीत ।।

      - गोभिसगृह्यसूत्र ३/५/२४


गीले वस्त्र न पहनें।


सनातन धर्म ग्रंथो के माध्यम से ये सभी सावधानियां समस्त भारतवासियों को हजारों वर्षों पूर्व से सिखाई जाती रही है।

इस पद्धति से हमें अपनी व्यग्तिगत स्वच्छता को बनाये रखने के लिए सावधानियां बरतने के निर्देश तब दिए गए थे जब आज के जमाने के माइक्रोस्कोप नही थे। लेकिन हमारे पूर्वजों ने वैदिक ज्ञान का उपयोग कर धार्मिकता  व सदाचरण का अभ्यास दैनिक जीवन में स्थापित किया था।

   आज भी ये सावधानियां अत्यन्त प्रासंगिक है। यदि हमें ये उपयोगी लगती हो तो इनका पालन कर सकते हैं।


सनातन संस्कृति 🚩


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कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...