शनिवार, 12 जून 2021

#समकालीन_त्रिवेणी ~ वर्ष 2 अंक 2

 ●● #समकालीन_त्रिवेणी ~ वर्ष 2 अंक 2

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● श्री अखिलेश श्रीवास्तव "चमन" के संपादन में महानगर लखनऊ से प्रकाशित "समकालीन त्रिवेणी" ~ साहित्य संस्कृति कला पर केंद्रित पत्रिका मिली। "

समकालीन त्रिवेणी" के इस अंक में सबसे भारी भरकम सामग्री अगर कुछ समझ में आई, तो वह है, "देश काल" स्तंभ मे प्रखर आलोचक उमाशंकर सिंह परमार का एक आलेख~ "अकादमिक आलोचना की संकुचित परिधि और मूल्यों का संकट"। इस भारी भरकम और वजनदार लेख का महत्व इसलिए भी है कि इसमें बहुत ही संक्षेप में आलोचना के समग्र इतिहास को समेटने की कोशिश की है उमाशंकर सिंह परमार ने। यूँ भी उमाशंकर सिंह परमार निडर, निर्भीक और बेखौफ तथा बेरहम लेखन के लिए जाने जाते हैं। उनका लेख, उनकी बात, उनकी टिप्पणी एक बार नहीं, सौ सौ बार सोचने पर विवश करती है और अंततः उनके अकाट्य तर्क स्वीकार करना ही होता है। उदाहरण के लिए जैसे वे लिखते हैं कि~ "शुक्ल जी के बाद हिंदी आलोचना में जिस तरह अकादमिक जगत का प्रभुत्व बढ़ा और पूर्व लेखन को ही थोड़े बहुत मत मतांतरों के बाद स्वीकृति प्रदत्त करने की प्रवृत्ति बढ़ी, यह हिंदी आलोचना की व्यापकता एवं मौलिकता के लिए बड़ा घातक रहा। पूर्व आलोचक के निष्कर्षों व स्थापनाओं को ही आप्त वाक्य मान लेना तथा नए अन्वेषण तथा सामाजिक वस्तु स्थिति से अनभिज्ञता ने आलोचना को संदिग्ध भी बनाया और अकादमिक जगत की इतिहास को इतिहास की तरह न देखने की जिद ने हिंदी साहित्य से बहुत कुछ दूर कर दिया।"

● साहित्य समाज के साथ गतिशील रहता है•••• शुक्ल जी ने दो कोटियाँ बना दी। रीतिबद्ध और रीतमुक्त। उन्हीं कोटियों के तहत आज भी मूल्यांकन किया जा रहा है। ••••••

अकादमिक आलोचना ने किसी भी कवि को लोकप्रिय नहीं बनाया, न अपने सीमित साधनों और संकुचित परिधि के कारण कभी बन सकती हैं। घाघ और भड्डरी लोकप्रिय थे और इन पर शोध कार्य होते, तो जाहिर था कि विश्व साहित्य के समक्ष भारतीय लेखक की प्रगतिशील रखी जा सकती थी, मगर दरबारी काव्य और रसवादी फार्मूले की अंधी दौड़ ने रीतिकाल और भक्तिकाल के तमाम प्रगतिशील काव्य को साहित्य की मुख्य धारा से वंचित कर दिया।••••••

पंत, प्रसाद, निराला और महादेवी वर्मा अपने समय के बड़े कवि इसलिए बने, क्योंकि इनके पास अकादमिक  आलोचक थे। प्रसाद को पंत को शुक्ल और नंददुलारे वाजपेई मिल गए, महादेवी वर्मा को शांतिप्रिय दिवेदी मिल गए और निराला को रामविलास शर्मा जी मिल गए•••••••• मुक्तिबोध की खोज और स्थापना में अशोक बाजपेयी और नामवर सिंह का हाथ रहा है।••••• इससे बहुत से कवि छूट गए और समाप्त हो गए। विशेषकर वे कवि, जो अकादमिक क्षेत्र में नहीं थे। भवानी प्रसाद मिश्र, कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, शील, भगवत रावत, मान बहादुर सिंह, धूमिल, विजेन्द्र, हरेश भादानी जैसे कवि परिदृश्य से बाहर हो गए। केवल मुक्तिबोध, अशोक बाजपेई, नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह जी अकादमिक आलोचना के लोकप्रिय किरदार रहे। •••••

आज जरूरत है कि साहित्य और समाज के पारस्परिक विकास प्रक्रिया को ध्यान में रखकर युग की जरूरतों के हिसाब से रचनाकार और रचना का मूल्यांकन हो। इस मूल्यांकन के दायरे में वैचारिकता व पारस्परिकता का समन्वय हो, न कि विधा, रूप और भाषा की क्षुद्र सीमाओं को दायरा बनाया जाए और यह काम केवल व्यवहारिक समीक्षक कर सकते हैं, न कि पाठ्यक्रम के सीमित दायरे में आबद्ध एक परम्परावादी आलोचक कर सकता है।"

● "काव्य धारा" स्तंभ के अंतर्गत राजेंद्र वर्मा के नवगीत वर्तमान समाज के हालात को बखूबी प्रस्तुत करते हैं~

 फुटपाथों पर लगा हमारा/  साझे का बिस्तर/ लोकतंत्र मुँह ढाँपे पहुँचा/  पूँजीपति के घर/ बूढ़ा गए, लेकिन अभाव का/ दरका नहीं किला।

नेतागिरी चमकी/ लेकिन छँटा न अंधियारा/ समझ नहीं आता/ धरने पर कब तक वह बैठे/  किस-किस की वह करें खुशामद/  हर कोई ऐंठे/बदल गई सरकार, मगर वह/ हुआ सर्वहारा।

● इसी तरह "आनंद पांडे तन्हा" की गजलें भी अपनी तरह का तांडव करती हैं~

पिट कर लौटा है थाने से/  अर्जी वो हर बार लगा कर/  तन्हा तन्हा रोया था घर/  आंगन में दीवार लगाकर।

● हिंदी साहित्य में जाने-माने कहानीकार राम नगीना मौर्य की कहानी "गलत फहमी" एक नए अंदाज की कहानी है। वे कहानी के एक पात्र से यह कहलाते हैं कि~ "मेरा तो मानना है कि आप लिखंत, पढ़ंत और इस छपास में चाहे जितना भी व्यस्त रहिए, लेकिन यदि आपको, आपके आस पड़ोस वाले ही अच्छी तरह से न जानते हों, तो ये पापुलैरिटी किस काम की ?" एक घरेलू महिला की पीड़ा, चिंता तथा उलझनों को कितने सरल तरीके से अपनी कहानी में प्रस्तुत किया है,  यह समझना जरूरी है।

● इसी तरह सुभाष पंत की एक अन्य कहानी "रतिनाथ का पलंग" है।  यह कहानी भी सामाजिक और पारिवारिक तथा आर्थिक समस्याओं से जूझती है। उनका एक पात्र कहता है कि~ "अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए अब तक हमने गधे और सुअर की जिंदगी जी है। अब यह बची हुई जिंदगी हमें अपनी तरह से जीनी चाहिए। लेकिन मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि इसकी शुरुआत कहाँ से करें ?"

● राघव दुबे रघु की लघुकथा "कुत्ते" बहुत ही मर्मस्पर्शी है। लघु कथा के अंत में कुत्ते समवेत स्वर में कह रहे हैं~ "हम श्वान हैं, किंतु आदमी जैसे दरिंदे कुत्ते नहीं हैं। हम एक टुकड़ा रोटी के वफादार हैं, लालची और कृतघ्न नहीं••••••।

●  "पत्थर पर लिखी इबारत" स्तंभ भी आकर्षित करता है।

● पत्रिका में कुछ अनावश्यक भी है, जैसे अपने अपने घर आँगन मे भी होता है। संभव है कि विवशता रही होगी, फिर भी यह पत्रिका महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करती है और पठनीय है।

● इस पत्रिका की एक विशेष विशेषता यह है कि इसमें वर्तमान समय की सबसे जरूरी समस्या पर्यावरण पर ध्यान केंद्रित किया है और इस संदर्भ को लेते हुए प्रदीप श्रीवास्तव का एक संस्मरण~ "प्रकृति क्या आईना~ भेड़ाघाट" पत्रिका में प्रस्तुत किया है। पर्यटकों के लिये यह अत्यंत उपयोगी होगा।

● यह भी बताना जरूरी है कि अखिलेश जी ने बड़े स्नेह के साथ यह पत्रिका हाथों हाथ भिजवाई थी, लेकिन ये कई पाठकों के पास रुकती रुकाती अब अपने ठिकाने पहुँची है।अखिलेश श्रीवास्तव "चमन" जी को हार्दिक धन्यवाद।

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