बुधवार, 4 अगस्त 2021

वर्तमान का स्वीकारों

 *🌻फ्यूज बल्ब🌻*



*शहर की एक कॉलोनी में एक बड़े आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे।‌*


*ये रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान परेशान से रोज शाम को पास के पार्क में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नज़रों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे।*


*एक दिन एक बुज़ुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था-*

*मैं इतना बड़ा आईएएस अफ़सर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं।*


*मुझे तो दिल्ली या जयपुर में अमीरजादो के इलाके में बसना चाहिए था । और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे।*


*परेशान होकर एक दिन बुजुर्ग ने उनको समझाया-*


*आपने कभी फ्यूज बल्ब देखे हैं?*


*बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है‌ कि‌ बल्ब‌ किस कम्पनी का बना‌ हुआ था , या कितने वाट का था, या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी?*


*बल्ब के‌ फ्यूज़ होने के बाद इनमें‌‌ से कोई भी‌ बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है।* 

*लोग ऐसे‌ बल्ब को‌ कबाड़‌ में डाल देते‌ हैं।*


*फिर जब उन रिटायर्ड‌ आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति‌ में सिर‌ हिलाया तो‌ बुजुर्ग फिर बोले‌ - रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो‌ जाती है‌।*


*हम‌ कहां‌ काम करते थे‌, कितने‌ बड़े‌/छोटे पद पर थे‌, हमारा क्या रुतबा‌ था,‌ यह‌ सब‌ कुछ भी कोई मायने‌ नहीं‌ रखता‌।*


*मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं।*


*वो जो सामने वर्मा जी बैठे हैं, रेलवे के महाप्रबंधक थे।* 


*वे सामने से आ रहे सिंह साहब सेना में ब्रिगेडियर थे।*


*वो मेहरा जी इसरो में चीफ थे।*


*ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज़ बल्ब करीब-करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो।*


*कोई रोशनी नहीं‌ तो कोई उपयोगिता नहीं।*


*कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते‌ हैं‌ कि‌ रिटायरमेंट के बाद भी‌ उनसे‌ अपने अच्छे‌ दिन भुलाए नहीं भूलते।*


*माना‌ कि‌ आप बहुत बड़े‌ आफिसर थे‌, बहुत काबिल भी थे‌, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती‌ थी‌ पर अब क्या?* 

*अब यह बात मायने नहीं रखती है बल्कि,,,,यह बात मायने‌ रखती है‌ कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे‌ थे...*


*आपने लोगों को कितनी तवज्जो दी...*

*समाज को क्या दिया...*


*कितने लोगों की मदद की...*


*पद पर रहते हुए कभी घमंड आये तो याद कर लीजिए कि,,,*


 *एक दिन सबको फ्यूज होना है।*

*वर्तमान का आनंद लीजिये ।* 

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

कोरा कागज़

 *शिष्य*


एक शिष्य गुरू के पास आया। *शिष्य विद्वान था और मशहूर भी,* गुरू से भी ज्यादा। सारे शास्त्र उसे कंठस्थ थे। समस्या यह थी कि *सभी शास्त्र कंठस्थ होने के बाद भी वह सत्य की खोज नहीं कर सका था।* ऐसे में जीवन के अंतिम क्षणों में उसने गुरू की तलाश शुरू की। संयोग से गुरू मिल गए। वह उनकी शरण में पहुंचा।


गुरू ने पंडित की तरफ देखा और कहा, *'तुम लिख लाओ कि तुम क्या-क्या जानते हो। तुम जो जानते हो, फिर उसकी क्या बात करनी है। तुम जो नहीं जानते हो, वह तुम्हें बता दूंगा।'* शिष्य को वापस आने में सालभर लग गया, क्योंकि उसे तो बहुत शास्त्र याद थे। वह सब लिखता ही रहा, लिखता ही रहा। कई हजार पृष्ठ भर गए। पोथी लेकर आया। 


गुरू ने फिर कहा, *'यह बहुत ज्यादा है। मैं बूढ़ा हो गया। मेरी मृत्यु करीब है। इतना न पढ़ सकूंगा। तुम इसे संक्षिप्त कर लाओ, सार लिख लाओ।'*


पंडित फिर चला गया। तीन महीने लग गए। अब केवल सौ पृष्ठ थे। गुरू ने कहा, मैं *'यह भी ज्यादा है। इसे और संक्षिप्त कर लाओ।'* कुछ समय बाद शिष्य लौटा। एक ही पन्ने पर सार-सूत्र लिख लाया था, लेकिन गुरू बिल्कुल मरने के करीब थे। कहा, *'तुम्हारे लिए ही रूका हूं। तुम्हें समझ कब आएगी? और संक्षिप्त कर लाओ।'* 


शिष्य को होश आया। भागा दूसरे कमरे से एक *खाली कागज* ले आया। गुरू के हाथ में खाली कागज दिया। गुरू ने कहा, *'अब तुम शिष्य हुए। मुझसे तुम्हारा संबंध बना रहेगा।'*


 *कोरा कागज लाने का अर्थ हुआ, मुझे कुछ भी पता नहीं, मैं अज्ञानी हूं।और मुझे आप ही से सीखना है.... आप जो कुछ भी सीखाओगे वही हम आपने मे उतार लेंगे।* जो ऐसे भाव रख सके गुरू के पास, वही शिष्य है।


*गुरू तो ज्ञान-प्राप्ति का प्रमुख स्त्रोत है,* उसे *अज्ञानी बनकर ही हासिल किया जा सकता है। ज्यादा होशियार बनने से नहीं ।।*

सोमवार, 2 अगस्त 2021

आधा किलो आटा

एक नगर का सेठ अपार धन सम्पदा का स्वामी था। एक दिन उसे अपनी सम्पत्ति के मूल्य निर्धारण की इच्छा हुई। उसने तत्काल अपने लेखा अधिकारी को बुलाया और आदेश दिया कि मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति का मूल्य निर्धारण कर ब्यौरा दीजिए, पता तो चले मेरे पास कुल कितनी सम्पदा है।


सप्ताह भर बाद लेखाधिकारी ब्यौरा लेकर सेठ की सेवा में उपस्थित हुआ। सेठ ने पूछा- *“कुल कितनी सम्पदा है?”* लेखाधिकारी नें कहा – *“सेठ जी, मोटे तौर पर कहूँ तो आपकी सात पीढ़ी बिना कुछ किए धरे आनन्द से भोग सके इतनी सम्पदा है आपकी”*


लेखाधिकारी के जाने के बाद सेठ चिंता में डूब गए, *‘तो क्या मेरी आठवी पीढ़ी भूखों मरेगी?’* वे रात दिन चिंता में रहने लगे।  तनाव ग्रस्त रहते, भूख भाग चुकी थी, कुछ ही दिनों में कृशकाय हो गए। सेठानी द्वारा बार बार तनाव का कारण पूछने पर भी जवाब नहीं देते। सेठानी से हालत देखी नहीं जा रही थी। उसने मन स्थिरता व शान्त्ति के किए साधु संत के पास सत्संग में जाने को प्रेरित किया। सेठ को भी यह विचार पसंद आया। चलो अच्छा है, संत अवश्य कोई विद्या जानते होंगे जिससे मेरे दुख दूर हो जाय।


सेठ सीधा संत समागम में पहूँचा और एकांत में मिलकर अपनी समस्या का निदान जानना चाहा। सेठ नें कहा- *“महाराज मेरे दुख का तो पार नहीं है, मेरी आठवी पीढ़ी भूखों मर जाएगी। मेरे पास मात्र अपनी सात पीढ़ी के लिए पर्याप्त हो इतनी ही सम्पत्ति है। कृपया कोई उपाय बताएँ कि मेरे पास और सम्पत्ति आए और अगली पीढ़ियाँ भूखी न मरे। आप जो भी बताएं मैं अनुष्ठान ,विधी आदि करने को तैयार हूँ”*


संत ने समस्या समझी और बोले- “इसका तो हल बड़ा आसान है। ध्यान से सुनो सेठ, बस्ती के अन्तिम छोर पर एक बुढ़िया रहती है, एक दम कंगाल और विपन्न। उसके न कोई कमानेवाला है और न वह कुछ कमा पाने में समर्थ है। उसे मात्र आधा किलो आटा दान दे दो। अगर वह यह दान स्वीकार कर ले तो इतना पुण्य उपार्जित हो जाएगा कि तुम्हारी समस्त मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। तुम्हें अवश्य अपना वांछित प्राप्त होगा।”


सेठ को बड़ा आसान उपाय मिल गया। उसे सब्र कहां था, घर पहुंच कर सेवक के साथ क्वीन्टल भर आटा लेकर पहुँच गया बुढिया के झोपडे पर। सेठ नें कहा- “माताजी मैं आपके लिए आटा लाया हूँ इसे स्वीकार कीजिए”


बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा आटा तो मेरे पास है, मुझे नहीं चाहिए”


सेठ ने कहा- “फिर भी रख लीजिए”


बूढ़ी मां ने कहा- “क्या करूंगी रख के मुझे आवश्यकता नहीं है”


सेठ ने कहा- “अच्छा, कोई बात नहीं, क्विंटल नहीं तो यह आधा किलो तो रख लीजिए”


बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा, आज खाने के लिए जरूरी, आधा किलो आटा पहले से ही  मेरे पास है, मुझे अतिरिक्त की जरूरत नहीं है”


सेठ ने कहा- “तो फिर इसे कल के लिए रख लीजिए”


बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा, *कल की चिंता मैं आज क्यों करूँ, जैसे हमेशा प्रबंध होता है कल के लिए कल प्रबंध हो जाएगा”*  बूढ़ी मां ने लेने से साफ इन्कार कर दिया।


सेठ की आँख खुल चुकी थी, एक गरीब बुढ़िया कल के भोजन की चिंता नहीं कर रही और मेरे पास अथाह धन सामग्री होते हुए भी मैं आठवी पीढ़ी की चिन्ता में घुल रहा हूँ। मेरी चिंता का कारण अभाव नहीं तृष्णा है।


वाकई तृष्णा का कोई अन्त नहीं है। *संग्रहखोरी तो दूषण ही है। संतोष में ही शान्ति व सुख निहित है।*

🙏🙏 🙏राम राम जी

जीवन बचा रहें

 झारखंड के चर्चित कवि, कहानीकार और चित्रकार बिनोद कुमार राज ’विद्रोही’ जी की हिंदी कविता ’जीवन बचा रहे’ का संताली अनुवाद


* Jion Bańcao Tahe̠nma*

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–Binod Kumar Raj Vidrohi


Ọh!

Iń do̠ cedaḱ unạḱ iń mõ̠ńja

Ińre cedaḱ unạḱ niro̠la o̠nto̠r menaḱa

Ce̠t́ ińaḱ mõ̠ńjtet́ge ińaḱ sarapkana

Hẽ̠ iń do̠ ona dhạrtikạnạń

O̠ne̠ okare sạṅgiń-sạṅgiń hạbić raṭen bir menaḱa

Ona reaḱ kukhire menaḱa lak-lak ṭan he̠nde̠ hirạ

Lagaoakanam iń lilạm

Benaoińem me̠neda iń bạṛij

Binạ hudiskate je

No̠ṇḍenaḱ raṭen bir meṭao cabaḱa

No̠ṇḍen ạdiwạsi somajko uchạdo̠ḱa

Unkoren ạsul maljal do̠ onko sãoko calaḱa

Me̠nkhan eṭaḱ jiv jiạliko be̠bạṛićko gujuḱa

Dhạrti reaḱ kukhireko jivedo̠ḱkan hajar-hajar jivianko gujuḱa

Dela achań manaokeda (me̠nkhan noṅka do̠ baṅ hoyoḱkana)

Am do̠ ale̠m uchạdgo̠t́kalea

Napae jaegate

Me̠nkhan onkoaḱ he̠ṛe̠m haṛhat́ unuihạrko do̠ cekatem uchạdtakoa

Uchạdtakoam cekate

O̠ṇḍe̠naḱ akhṛa, dupuṛuṕ piṇḍa, sũṛũkuć ḍahar,

Ạyubo̠ḱ reaḱ sonḍhaṛ mo̠ho̠k

Matko̠m ar murut́ baha

Onkoren hapṛamkoaḱ atmako.


Noa baḍaekaḱpe ape

Iń do̠ koela khadanko reaḱ bạnijo̠ḱren baṅ kạnạń birudić

Sumuṅ ninạḱge me̠n sanaidińkana

Jãhãnaḱ noṅkaepe la lahare

Je bir ṭotha reaḱ khas loksan alo hoyoḱ

Bańcao tahe̠nma o̠ṇḍenaḱ ạri-cạli, ạn-ạri

Somajiạ ar kạuḍi ạri rup alo cirạḱma

Alo hoyoḱma go̠ć aohal reaḱ

Bańcao tahe̠nma ạksijan

Bańcao tahe̠nma jion

Rukhiạ tahe̠nma aḱ sar, tumdaḱ, ṭamak, tirio

Bạhu biṭikoaḱ man bo̠ro̠m.....!

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जीवन बचा रहे

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बिनोद कुमार राज ’विद्रोही’


ओह!

मैं इतनी सुंदर क्यों हूं

मुझमें इतना कोमल हृदय क्यों है

क्या मेरी सुंदरता ही मेरा अभिशाप है

हां मैं वही धरती हूं

जहां दूर-दूर तक फैले घने जंगल

जिसके गर्भ में मौजूद है लाखों टन काला हीरा

कर रहे हो तुम मेरी नीलामी

बनाना चाहते हो मुझे बदरंग

बगैर ये सोचे कि

यहां के घने जंगल मिट जाएंगे

यहां का जनजाति समाज विस्थापित हो जायेगा

उनके पालतू डोर-डांगर तो उनके साथ चले जाएंगे

धरती के गर्भ में कुलबुला रहे अरबों जीव मारे जाएंगे

चलो मान लिया (हालांकि ऐसा होता नहीं)

तुम हमें विस्थापित कर दोगे

अच्छी जगह

लेकिन उनकी खट्टी-मीठी यादों को

कैसे विस्थापित करोगे

कैसे करोगे विस्थापित

वहां का अखड़ा, चबूतरा, पगडंडी

गोधूली की सौंधी महक

महुआ और पलाश के फूल

उनके पुरखों की आत्माएं


यह जान लो तुम

मैं कोल खदानों के ब्यावसायीकरण का नहीं हूं विरोधी

फकत इतना कहना चाहता हूं

कुछ ऐसा करो खुदाई से पहले 

कि वन क्षेत्र का विशेष नुकसान ना हो

बची रहे वहां की लोक-संस्कृति, रीति-रिवाज

सामाजिक और आर्थिक ढांचा दरके नहीं

न हो कत्ल पर्यावरण का

बचा रहे ऑक्सीजन

बचा रहे जीवन

सुरक्षित रहे तीर-धनुष, मंदार, नगाड़ा, बासुरी

बहू-बेटियों की इज्जत....।

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बेसरा ’बेपारी’

फोटो:– getty images

साभार :–  विनोद कुमार राज ’विद्रोही’ // इश्क-ए-हजारीबाग कविता संग्रह पुस्तक से

अरविंद अकेला की कुछ कविताएँ


1

    अबकी होली में 

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अबकी होली में,

आयेंगे पिया हमार ।


आयेंगे जब होली में,

नाचूँगी,गाऊँगी,

खुशियाँ मनाऊंगी,

करूंगी सोलह श्रींगार।

     अबकी होली में...।


जब वे यहाँ आयेंगे,

अपनी सेज सजायेंगे,

करुंगी खूब बातें उनसे,

पहनाउंगी बाहों का हार।

      अबकी होली में...।


होली में जब आयेंगें,

गजरा हम लगायेंगे,

बन ठनकर छमकुंगी ,

जाऊंगी संग संग बाजार।

     अबकी होली में...।


अबकी जब वे आयेंगे,

छ्प्पन भोज लगायेंगे,

खायेंगे संग संग उनके,

खिलाउंगी मिठाई बेशुमार।

      अबकी होली में...।


नहीं छोड़ेंगे होली में उनको,

करूंगी रंगों की बौछार,

लगाउंगी अबीर गालों पर,

करूंगी वेइन्तहां प्यार।

      अबकी होली में...।

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2

       

विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर---




अपने आपको स्वस्थ्य रखें

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अपने आपको पहले स्वस्थ्य रखें,

रखें स्वस्थ्य अपना घर- परिवार,

स्वास्थ्य से हीं अपनी यह जिंदगी,

स्वास्थ्य से हीं यह सृष्टि संसार।


प्रात:काल सभी उठा करें,

उठकर करें माता पिता को प्रणाम,

सुबह सबेरे उठकर सभी  टहलें,

किया करें थोड़ा-थोड़ा व्यायाम।


सुबह सबेरे शौचालय जायें,

आकर धोयें अपने हाथ श्रीमान,

फिर दाँतों की करें सफाइ,

जीवनभर बना रहेगा  मुस्कान।


अपने शरीर की नित करें सफाई,

आकर करें अपने प्रभु का ध्यान,

हाथ धोकर खाने को बैठें ,

ताजा,स्वच्छ करें भोजन जलपान।


पान,गुटखा,खैनी को त्यागें,

नहीं करें कभी कोई  मदिरापान,

चाऊमीन,बर्गर,बासी खाना नहीं खायें,

नहीं तो चली जायेगी यह जान।


मास्क पहनकर घर से निकलें,

दो गज की दुरी को मान,

समय पर कोविड टीकाकरण करायें,

कोरोना से बचायें अपने प्राण।


स्वास्थ्य बिना कुछ भी नहीं अच्छा,

कभी नहीं कोई जग में मान,

स्वास्थ्य बचाकर सबकुछ बचा लो,

बनी रहेगी सदा तेरी शान।

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3


    यह है मेरा बिहार


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यह है मेरा बिहार,यह है मेरा बिहार,

सदियों से रही जिस पर ईश्वर की छाया

बसती रही जहाँ दिलों में अपनापन,

माया,

बांटता है जो सारी दुनियाँ को अनुपम प्यार।

     यह है मेरा बिहार...l


जगत जननी माँ सीता की है यह जन्मभूमि 

कूटनीतिज्ञ चाणक्य की है यह कर्म भूमि 

नाज करती है यह सारी दुनियाँ जिस पर ,

जहाँ बहती सदा निर्मल गंगा की कलकल धार।

     यह है मेरा बिहार...।


रही सदा वीरों की यह पावन धरती,

जहाँ पर कोटि कोटि प्रतिभा है पलती,

देता यह विश्व को प्रेम- भाईचारे का दिव्य संदेश,

बांटता सारी दुनियां को यह खुशियाँ अपार।

     यह है मेरा बिहार...।


जैन,सिख,बौद्ध धर्म फले-फुले यहाँ 

जो बात यहाँ है,कहीं और है कहाँ,

गंगा जमुनी संस्कृति का रहा यह केंद्र सदा,

यहीं पर रहता युगों युगों से सदा बहार।

     यह है मेरा बिहार...।


गौतम बुद्ध को दिया इसने अनुपम ज्ञान,

यहीं से मिला गाँधी, महावीर को अमिट  पहचान,

यही है परिवर्तन,क्रांति की अमर धरती,

यहीं पर पग धरे थे विष्णु ले बामण अवतार।

     यह है मेरा बिहार...।


साहित्य,कला,संस्कृति से उर्वरा यह धरती,

इस धरा पर पग धरने के लिये दुनियाँ है मरती,

यहीं के वैशाली से हुआ प्रजातंत्र का उदय,

यहीं पर दिखता दुनियाँ को भारतीय संस्कार।

     यह है मेरा बिहार...।


यही पर हुये एक से बढ़कर एक साहित्यकार,

जिन्होने दिया साहित्य को ऊँचाई,आधार,

यहीं पर जन्मे राष्ट्रकवि दिनकर रचनाकार,

जिन्होनें किया हिन्दी का  व्यापक प्रचार प्रसार।                          

    यही है मेरा बिहार...।


रहे सदा मेरे बिहार की महिमा बरकरार,

मिले यहाँ की जनता को सुख सुविधा बेशुमार,

सदा रहे मेरे बिहार का नाम अमिट,अमर,

अनवरत बना रहे विश्व को बिहार से सरोकार।

    यह है मेरा बिहार...।

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        4


     तेरे शहर में न होते

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गर हम पागल तुम्हारी नजर में नहीं होते,

समझो मेरी जान तेरे शहर में नहीं होते।


बड़ी मुश्किल से लाया हूँ तुम्हें सबसे छुपाके,

बड़ी कष्टों से पाया है तुम्हें बचके बचाके,

गर नहीं होते हम तेरे दिल जिगर के दीवाने,

तो समझो मेरी जान हम तेरे घर में नहीं होते।

     गर हम पागल.......।


बड़ी जालिम यह दुनियाँ तेरे मेरे प्यार की,

नहीं करती यह कद्र मेरे जाँ निसार की,

गर नहीं होते हम तरे आशिक परवाने,

समझो मेरी जाँ,जमाने के कहर में नहीं होते।

     गर हम पागल.......।

c

आरजू मेरी यह,सजा के रखना अपने चमन को,

तुझसे विनती मेरी,बचा के रखना धरा व गगन को

गर नहीं होता प्यार इस नफरत भरे जमाने में,

तो समझो मेरी जाँ तेरे दिल जिगर में नहीं हो


5



     हम हैं बिहारी 

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सबके दिलों को जीता हमने,

जीती है यह दुनियाँ सारी,

सत्य,अहिंसा का संदेश दिया जग को, 

माँ भारती पुत्र बिहारी।

      हम हैं बिहारी...।


बिहारी प्रतिभा का लोहा मानती दुनियाँ,

हमें शूरवीर जानती दुनियाँ,

खुद्दारी हमारी रग रग में,

जानती यह दुनियाँ सारी।

       हम हैं बिहारी...।


स्वतंत्रता संग्राम में दिया योगदान हमने,

हर धर्म का सम्मान किया हमने,

कई कलाकारों की जन्म भूमि यहाँ,

जगत प्रसिद्ध यहाँ की कलाकारी।

      हम हैं बिहारी...।


कई साहित्यकार हमने दिये,

शूरवीर दिये कई हमने,

जब जब माँगी देश ने कुर्बानी,

लगा दी हमने अपनी जान सारी।

       हम हैं बिहारी...।


माँ जगत जननी की धरती यह,

भगवान बुद्ध की है यह  कर्मभूमि,

गुंजती गुरु गोविन्द की ललकार यहाँ,

हम हीं हैं प्रेम पुजारी।

       हम हैं बिहारी...।


आर्यभट्ट सा खगोलविद दिया हमने,

दिया राजेन्द्र प्रसाद सा लाल,

वीर कुवँर सिंह की धरती यहाँ 

दिया जयप्रकाश 

सा वीर क्रांतिकारी।

      हम हैं बिहारी...।

      


यहीं के नालंदा, तक्षशीला ने, 

सारे जगत को ज्ञान दिया,

जिनके अवशेष आज भी सुरक्षित,

जिसे देख गर्वित होते देश के नर नारी।

      हम हैं बिहारी...।


मोक्ष की धरती गयाधाम यहाँ ,

जहाँ विश्व से लोग आते- जाते,

यहीं देव के सुर्य मन्दिर में,

शीश झुकाते हर बिहारी।

    हम हैं बिहारी...।


स्वाभिमान बसता मेरे सीने में,

रखते काम में इमानदारी,

मजाल नहीं जो कोई आँख मिला ले,

कर ले कोई हमसे रंगदारी।

      हम हैं बिहारी...।


पहलवानों की है यह धरती,

ऋषि मुनियों की तपोभूमि,

गर कोई हमें आँख दिखाये,

निकल जाती उनकी छठी की दुध सारी ।

    हम हैं बिहारी...।


बिहारी अस्मिता जग प्रसिध्द,

यह जानते मेरे भोले भंडारी,

नहीं टकराती दुनियाँ हमसे,

हम पड़ते सबपर भारी।

      हम हैं बिहारी...।

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6


     


तेरा गीत गाता रहूँ 

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तुम गीत बनकर मेरी श्वासों में,

गर महका करो,

मैं प्यार बनकर,

तेरा गीत गुनगुनाता रहूँ।


खुश्बू बनकर मेरे दिल में,

गर बिखरा करो,

मैं अहसास बनकर,

तेरे दिल में समाता रहूँ।


तुम मेरी धड़कनों में,

थोड़ा बस जाया करो,

मैं भँवरा बनकर तेरा,

पराग चुराता रहूँ।


तुम मेरी खुली आँखों में,

ख्वाब बनकर आया करो,

मैं हकीकत में यह जीवन, 

तुझपर लुटाता रहूँ।


तुम बहार बनकर,

मेरे जीवन में आया करो,

मैं तेरे दर्पण में, 

खुद को सँवारता रहूँ।


तुम चाँदनीबनकर,

अपनी किरणें बिखेरा करो,

मैं चकोर बनकर, 

हरपल तुझे निहारता रहूँ।

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7



      

भारत का गीत मैं गाता हूँ 

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माना मुझमें तुमसा,

ओज हुंकार नहीं,

तेरी तरह मेरी होती,

जय जय जयकार नहीं,

पर मैं भी हूँ भारत का,

भारत की बात बताता हूँ  ,

भारत का हूँ वासी मैं, 

भारत का गीत मैं गाता हूँ ।


मुझे किसी पद प्रतिष्ठा की,

कभी कोई दरकार नहीं,

सत्ता की करुं दलाली,

मैं वह कलमकार नहीं,

मैं हूँ एक स्वाभिमानी कवि, 

तिरंगा सदा लहराता हूँ,

मरे जब जब जवान कोई, 

वहाँ शीश झुकाता हूँ।


महलों सभासदों का,

मैं रचनाकार नहीं,

मैं किसी सत्ता का,

रहा कभी चाटुकार नहीं,

खुद्दारी है मेरी रग रग में, 

जन जन का गीत गाता हूँ,

करता हूँ मैं साहित्य सेवा, 

अपनी रचना सबको सुनाता हूँ।

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8



भारतीयता मेरी पहचान 

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बड़ा हीं किस्मतवाला हूँ मैं,

भारतीयता मेरी पहचान,

जन्म हुआ जिस देश में मेरा,

नाम है उसका भारत,हिन्दुस्तान।


तरवाँ ग्राम का मैं निवासी,

गया जिला मेरे देश की शान,

विहार मेरा अपना राज्य है,

जग में है जिसका ऊँचा स्थान।


वीरों की भुमि मेरा भारत,

जग में जिसका रहा सदा मान,

कई विद्वान,कलाकार की धरती,

जन्में लिये मेरे आराध्य, भगवान।


हमें गर्व है अपने वतन पर,

इसके लिये करुं कई जन्म कुर्बान,

हे भगवान सदा इस देश में जन्मूँ मैं,

देश सेवा के लिए निकले  मेरी जान 


9



आओ कभी मेरे अपने बिहार में 

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आओ कभी मेरे अपने बिहार में,

देखें यहाँ की छँटा,बहार,

पटना में बड़ी पटन देवी का मंदिर,

यहीं पर माँ शीतला का  दरवार।


बड़ा पावन महावीर मंदिर पटना का,

जो दिल से सबको बुलाता है,

बड़ा अनुठा गोलघर,म्युजियम यहाँ का,

सबके मन को यह भाता है।


पटना के तट पर बहती गंगा की धारा,

यह सहर्ष सबको खींच लाता है,

पतित पावन तारणी यह गंगा,

सदियों से हम सबका इससे नाता है।


बड़ा मनोहर राजगीर की वादियाँ,

सहर्ष आकर्षित कर जाता है,

जाड़े के दिनों में गर्म कुंड में नहाना,

तन मन को खुश कर जाता है।


यहीं है प्रसिद्ध पावापुरी ग्राम,

जहाँ हुआ भगवान महावीर का निर्वाण,

कपिलवस्तु से  गौतम बुद्ध आये,

पाये बोधगया में दिव्य  ज्ञान।


यहीं के तारेगना में आर्यभट्ट आये,

यहीं से महर्षि चरक दुनियाँ में छाये,

यहीं मगध में चन्द्रगुप्त, अशोक महान,

यहीं चाणक्य को मिला  सम्मान।


इसी बिहार में गुरु गोविंद सिंह जन्में,

जिनकी थी अपनी अलग आन बान,

यहीं जन्म लिये कबीर, दिनकर,रेणु,

जिनकी अलग गाथा,कीर्तिमान।


यहीं गया में वामन के  चरण पड़े,

यहीं चूर हुआ राजा बलि का अभिमान।

यहीं वैशाली है गणतंत्र की जननी,

यहीं माँ जानकी का  जन्म स्थान।


यही गया में विष्णुपद का मंदिर,

जिसकी अपनी महिमा महान,

यहीं है मोक्षदायिनी नदी फल्गु,

जहाँ लोग किया करते  पिण्ड दान 


कभी पधारो सुर्यनगरी देव,उमगा में,

जिसकी जग में अपनी अलग पहचान,

यहीं चैत,कार्तिक में छठ मेला लगता,

जिसकी महिमा नहीं की  जाये बखान।


सासाराम में शेरशाह का मकबरा,

जिसको मिला जग में मान,

यहीं गया में जरासंध का अखाड़ा,

जिसकी अपनी कीर्ति गुणगान।


मेरे बिहार में गंगा यमुनी संस्कृति बसती,

यहीं रहते हिन्दु,सिख,इसाई,मुसलमान,

बड़ी प्राचीन अपनी सभ्यता संस्कृति,

सबसे ऊँची है बिहार की  शान।

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हम हैं माँ भारती पुत्र बिहारी

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अपनी शख्शियत है कुछ ऐसी,

मिटती नहीं कभी हस्ति हमारी,

हमसे जग में भारत की अस्मिता,

हम हैं माँ भारती पुत्र बिहारी।

    हम हैं माँ भारती पुत्र...।


हमसे से ही यह देश महान,

हमसे मिला विश्व को ज्ञान,

हमसे फैला विश्व में विज्ञान,

जानती है यह दुनियाँ  सारी।

     हम हैं माँ भारती पुत्र...।


गुरु गोविंद,कुँवर सा नहीं दूजा शूरवीर,

जयप्रकाश सा नहीं कोई क्रांतिवीर,

बिहारी कर्मठता अनमोल है जग में,

इसकी यश-कीर्ति बड़ी है न्यारी।

    हम हैं माँ भारती पुत्र...।


जरासंघ सा नहीं कोई हुआ पहलवान,

चंद्रगुप्त,अशोक सा नहीं कोई महान,

कैसे करुं दिनकर,आर्यभट्ट का वखान,

अपनी महिमा पड़ती सब पर भारी।

    हम हैं माँ भारती पुत्र...।


चाणक्य सा नहीं कुतनीतिज्ञ,रणधीर,

अंगराज कर्ण सा नहीं कोई दानवीर,

हमसे हीं जग में गंगा यमुनी संस्कृति,

हम हैं विश्व के लिये कल्याणकारी।

    हम हैं माँ भारती पुत्र...।


हमने किया पुरे विश्व पर राज,ती पुत्र 

हमने बनाया अपने देश को सरताज,

राष्ट्रीयता,खुद्दारी  हमारे दिल में रहती,

हम हैं सदैव सर्वजन हितकारी।

    हम हैं माँ भारती पुत्र



बड़ा हीं सुंदर मेरा तरवाँ गाँव 

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सबसे सुंदर,सबसे प्यारा,

मेरा अपना गाँव, घर, परिवार,,

जिसपर है ईश्वर की कृपा,

मिलता जहाँ का प्यार।

     सबसे सुंदर ...।


बिहार राज्य के गया जिला में,

अपना भी एक घर संसार,

जहाँ मेरा जन्म हुआ था,

बीते थे बचपन के दिन चार।

     सबसे सुंदर...।


घाघरा नदी के तट पर बसा,

बड़ा हीं सुंदर मेरा तरवाँ  गाँव,

बड़ी सुंदर सड़कें यहाँ की,

सुंदर पीपल,बरगद की छाँव।

     सबसे सुंदर...।

     

स्कूल,डाकघर,अस्पताल यहाँ पर,

बड़ा यहाँ का बैंक, हाट, बाजार,

दूरदराज से लोग यहाँ आकर,

करते यहाँ खरीदारी, व्यापार।

     सबसे सुंदर...।


गाँव की सोंधी मिट्टी व प्यार से बना,

सबसे सुंदर अपना घर,आँगन,द्वार,

यहीं बसती गोविंद लाल की आत्मा,

रहता उनके बेटा का परिवार।

    बड़ा सुंदर...।


मेरे घर से सटे रहते माली व लोहार,

पास पड़ोस कोइरी,कुर्मीबसते,

रहते हैं मेरे घर के कोने पर,

धोबी,बढई,रजवार, कहार।

     बड़ी सुंदर...।


बड़ा हीं सुंदर मेरा अपना गाँव है,

सुंदर यहाँ की सभ्यता संस्कार,

सभी लोग यहाँ हिल मिल रहते,

रखते हैं जन जन से सरोकार।

     बड़ी सुंदर...।

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    वह छोड़ गये हैं 

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आज नहीं है मेरे पास,

मेरे माता-पिता की कोई वसीयत,

कोई जमीन जायदाद,

नहीं है कोई बैंक बैलेंस,

नहीं कोई छोड़ी हुई हवेली,

या साधारण सा मकान। 


वह छोड़ गये है,

मेरे तन मन में अपना वजूद,

अपनी अजीम शख्शियत,

अपना अलौकिक व्यक्तित्व,

अपनी कर्मठता,ईमान, 

और अपनी ऊँची शान।


करता हूँ महसूस खुद में,

उनका जूझारुपन,

उनकी दयालुता,संघर्ष,

उनका दिया अनुशासन ,

उनकी सकारात्मक सोच,

और उनका सामजिक सम्मान।


आज उनकी बदौलत,

बन पाये एक इंसान,

मिल रही राष्ट्रीय प्रतिष्ठा,

स्वस्थ हैं अपने तन, प्राण,

बढ़ रही मेरी यश कीर्ति,

हो रहा मेरा कल्याण।

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         चाहिये


काली नहीं, कलुटी  नहीं,

मोटी नहीं, नाटी नहीं ,

हमको तो रुपवती गुणवती,

एक श्रीमती चाहिये।

   काली नहीं कलुटी नहीं...।


ससुर मेरा धनवान,

सास मेरी गुणवान,

साला की कोई चाह नहीं,

साली दो चार चाहिये।

   काली नहीं,कलुटी नहीं...।


रुपया नहीं,पैसा नहीं,

धन नहीं,दौलत नहीं,

हमको तो टीवी,फ्रीज,गोदरेज,

एक मोटरकार चाहिये।

   काली नहीं,कलुटी नहीं...।


गर कोई ऐसा परिवार मिले,

पत्नी का प्यार मिले,

अतिशीध्र हीं मुझे,

उसका पत्ता बतलाईये।

    काली नहीं,कलुटी नहीं...।


बताने वाले को उचित कमीशन,

इज्जत और शोहरत मिशन,

गर कोई मुल्ला हो,

उनको यहाँ लाईये।

    काली नहीं,कलुटी नहीं...।

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   श्रीराम का संदेश है 

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आओ अपने प्यारे देश भारत को , 

एकबार फिर से जगत गुरु बनायें,

भगायें देश के दुश्मनों को देश से बाहर,

विश्व में अपना परचम लहरायें,

यह"अकेला"का नहीं कोई उपदेश है ,

यह भगवान श्रीराम का संदेश है ।

    यह भगवान श्रीराम ...।


बाटें फिर से विश्व को ज्ञान,विज्ञान,

योग,आयुर्वेद में बढ़ायें  भारत का मान,

रहें सभीजन यहाँ सुखी,स्वस्थ,शान्ति से,

करें सभी एकदूजे का आदर सम्मान,

वे लोग देखें इस देश से बाहर का रास्ता ,

जिन्हें हिन्दुस्तान से नफरत,क्लेश है।

    यह भगवान श्रीराम का...।


विश्व में भारत रहे सदैव शक्ति सम्पन्न,

किसान होंगे सुखी,कम नहीं होगा अन्न,

सभी धर्म के लोग रहें यहाँ हँसी-खुशी से,

सभी भारतवासी रहें  एकदुजे से प्रसन्न,

चुन चुनकर मारें आतंकी,नक्सली को ,

बदले जो नेता,पत्रकार,आमजन के भेष हैं।

    यह भगवान श्रीराम का...।


देश में अब हो रहा जनसंख्या विस्फोट,

मिलकर सभी इसे विस्फोट से बचायें,

गर रखना हो देश सुखी,संपन्न,सुरक्षित,

दो वच्चों का छोटा परिवार अपनायें,

जो नहीं कर सकते यह सपना साकार,

उनका कर रहा इंतजार दुसरा देश है।

     यह भगवान श्री राम का...।


हर भारतीय में राष्ट्रीय भावना जगायें,

देश में सभी वंदे मातरम् कहना सीख जायें,

जो उठाते अंगुली अपने वीर जवान पर,

सभी जन उनकी अंगुली तोडकर लायें,

नहीं रहेगा अब निर्धन,कमजोर भारत,

बदल रहा समय,बदल रहा परिवेश है।

     यह भगवान श्री राम का...।

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    प्रेम की एक पाती

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प्रेम की एक पाती लिखो,

देश के वीर जवानों के नाम,

माता-पिता सकुशल तुम्हारे,

वेफिक्र हो करो अपना काम।

    प्रेम की एक पाती लिखो...।


बीबी तुम्हारी सदैव राह देखती,

लेती सुबह-शाम तेरा नाम,

करती दुवा वह अपने ईश से,

करो दुश्मन का काम तमाम।

    प्रेम की एक पाती लिखो...।


वीर पिता के पुत्र हो तुम,

देश को तुमपर नाज,अभिमान 

कभी डगमगाये नहीं तेरे कदम,

देना अपने फर्ज को अंजाम।

    प्रेम की एक पाती लिखो...।


यह देश वलिदान मांगता,

मांगता यह तन-मन प्राण,

नहीं समझो कमजोर खुद को,

दुश्मन को दो यह पैगाम।

    प्रेम की एक पाती लिखो...।


बढ़ रहा दुश्मन अपने सीमा पर ,

लगा दो तुम उसपर लगाम,

चीर दो सीना दुश्मन का,

तब लो तुम चैन,विश्राम।

    प्रेम की एक पाती लिखो...।


कभी खुद को अकेला नहीं समझो,

यह कवि"अकेला"तेरे साथ सुबह-शाम,

तुम हो माँ भारती के लाल,

करती सैल्युट तुझे सारी आवाम।

    प्रेम की एक पाती लिखो...।

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भेड़िया चल रहा अपनी चाल

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भेड़िया चल रहा अपनी  चाल,

भ्रष्टाचारी हो रहे मालामाल,

नेता लूट रहे अपने देश को,

यह देश हो रहा है कंगाल।


किसी को नहीं देश की चिंता,

सब सजा रहे इस देश की चिता,

जनता यहाँ की सोयी हुयी है,

करके खुद को बदहाल।


आयेगा कोई मदारी एक दिन,

दिखायेग अपनी खेल व चाल,

लुटकर सब ले जायेगा वह,

कर देगा हम सबको फटेहाल।


मत सोओ,अब जागो देशप्रेमियों,

नहीं तो होगा बड़ा बुरा हाल,

"अकेला"की बात नजरअंदाज किये तो,

मचेगा देश में हाहाकार,बबाल।

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         अरविन्द अकेला

रविवार, 1 अगस्त 2021

घरेलू उपचार

कृष्ण मेहता:


दमा :


लगभग 75 ग्राम भुना हुआ सुहागा 100 ग्राम शहद में मिला ले इसे सोते समय 1 चम्मच की मात्रा में लेकर चाटने से श्वास रोग (दमा) में बहुत लाभ होता है।


लगभग 30 ग्राम पिसे हुए सुहागे को 60 ग्राम शहद में मिलाकर रख दें। कुछ दिनों तक 3 अंगुली भर चाटते रहने से श्वास रोग (दमा) खत्म हो जाता है।


सुहागे का फूला और मुलहठी को अलग-अलग पकाकर या पीसकर कपड़े में छानकर बारीक चूर्ण बना लें और फिर इन दोनों औषधियों को बराबर मात्रा में मिलाकर किसी शीशी में सुरक्षित रख लें। आधा ग्राम से 1 ग्राम तक इस चूर्ण को दिन में 2-3 बार शहद के साथ चाटने से या गर्म पानी के साथ लेने से दमा के रोग में लाभ मिलता है। बच्चों के लिए लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा या आयु के अनुसार कुछ अधिक दें। इसका सेवन करने से श्वास (दमा), खांसी तथा जुकाम नष्ट हो जाता है। इस औषधि का सेवन करते समय दही, केला चावल तथा ठंडे पदाथों का सेवन नहीं करना चाहिए।

बालों के रोग :


20 ग्राम सुहागा और 10 ग्राम कपूर को 50 ग्राम उबले पानी में मिलाकर हल्के गर्म पानी के साथ धोने से बाल मुलायम तथा काले हो जाते हैं।


5 ग्राम सुहागा और 10 ग्राम कच्चे सुहागे को 250 ग्राम पानी में डालकर उबाल लें। इसके ठंडा होने पर बालों को धोने सें बाल मजबूत बनते हैं।

[8/2, 06:59] Morni कृष्ण मेहता: दांत निकलना :


भुना हुआ सुहागा और शहद को मिलाकर बच्चे के मसूढ़ों पर धीरे-धीरे मलें। इससे दांत आसानी से निकल आते हैं तथा मसूड़ों का दर्द कम होता है।


सुहागा को शहद के साथ पीसकर बच्चों के मसूढ़ो पर मलें। इससे बच्चों के नये दांत आसानी से निकल आते हैं और दर्द में आराम मिलता है।


लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग भुनी सुहागा को शहद में मिलाकर बच्चों के मसूडें पर मलने से दांत आसानी से निकल आते हैं।


10 ग्राम भुना सुहागा और 10 ग्राम पिसी हुई मुलहठी लेकर चूर्ण बना लें। इसमें से लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग चूर्ण में शहद मिलाकर मसूड़ों पर मलें। इससे बच्चों के दांत निकलते समय दर्द नहीं होता तथा बार-बार दस्त आना बंद हो जाता है।

[8/2, 07:00] Morni कृष्ण मेहता: बवासीर (अर्श) : 1 चम्मच सुहागा, 1 चम्मच हल्दी, 1 चम्मच चीता (चित्रक) की जड़, थोड़े-से इमली के पत्ते तथा 10 ग्राम गुड़ को पीसकर मलहम बना लें। इसके मलहम को बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से जल्द सूख कर गिर जाते हैं।

अनियमितता 


10 ग्राम सुहागा, 10 ग्राम हीरा कसीस, 10 ग्राम मुसब्बर तथा 10 ग्राम हींग को पानी के साथ पीसकर लगभग 0.24 ग्राम की गोली बनाकर 1 गोली सुबह और शाम अजवायन के साथ सेवन करना चाहिए। इसे कुछ दिनों तक लगातार सेवन करने से मासिक धर्म ठीक समय पर आने लगता है।

[8/2, 07:01] Morni कृष्ण मेहता: पथरी : 5-5 ग्राम सुहागा, जौंखार तथा कलमी शोरा को मिलाकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस 1-1 ग्राम चूर्ण को रोजाना सुबह-शाम मूली के रस या कुल्थी के जुसांदे में मिलाकर पीने से गुर्दे व मूत्राशय की पथरी घुलकर निकल जाती है।

कौआ कान ले गया !/ मार्टिन जॉन

बंधुओं  ! आपने गौर किया होगा कि आपकी फ्रेंड लिस्ट में कुछदोस्तों की सजगता ,सतर्कता क़ाबिले-गौर , क़ाबिले तारीफ़ होती है | कुछ ऐसी मुस्तैदी से इस पटल पर वे आवा-जाही करते हैं कि 'कौआ कान ले गया ' सुनते ही दौड़ पड़ते हैं उस परिंदे के पीछे , बग़ैर अपने कान देखे ! दरअसल इन बंधुओं को इस प्लेट्फ़ॉर्म पर कूदने-फांदने की आदत- सी हो गई है - अपशब्दों , मुद्दों के विपरीत अनर्गल तर्कों , प्रलापों के भोथरे हथियारों को लेकर विचारों के रणक्षेत्र में |

    बीते दिन , कुछ ऐसा ही कडुवा अनुभव से गुज़ारना पड़ा मुझे | हुआ यह कि 'पाखी' पत्रिका के संपादक सम्मानीय अपूर्व जोशी ने किन्हीं हर्षवर्द्धन पाण्डेय की वाल से एक पोस्ट शेयर किया था , जिसमें इस समाचार का उल्लेख था , "स्वर्ण मंदिर की तरफ से कहा गया कि समूचे पंजाब के वेंटिलेटर और पीपीई किट की आपूर्ति करेंगे , यह है धर्म ! गंगा स्नान से ही पुण्य नहीं मिलता !"

     मुझे पोस्ट अच्छी लगी | मैंने साभार अपनी वाल में डाल दी | बस फिर क्या था , सब टूट पड़े मुझ पर !  मुझको संबोधित कर किसी ने तंज़ कसा कि मूढ़ता भरी टिप्पणी से मोक्ष मिलेगा , किसी ने व्यंग्य किया मुझे स्वर्ग मिलेगा , किसी ने  एक अंगुली उठाने पर चार अंगुलियां उठाये जाने की धमकी दे डाली | और तो और एक बहन और भाई  ने तो मामले से अलग जाकर चर्च को घसीट लाए  और उसके नकारेपन को साबित करने में जुट गए | कुछ ज़्यादा ही चहलक़दमी करने वाले , हर किसीकी पोस्ट पर अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराने  वाले , मेरे बेटे के हमउम्र, नौजवान क़लमकार ने मुझ जैसे लिखने -पढ़ने लिखने वाले को इन सब से ऊपर रहने, जकड़न भरी सोच को बदलने  की सलाह दे डाली |

    इन बंधुओं ने ओरिजिनल पोस्ट राइटर का नाम देखने की ज़रुरत नहीं समझी |  अरे भाई , पहले यह तो देख लिया होता कि पोस्ट राइटर कौन है | पोस्ट राइटर मार्टिन जॉन नहीं वरन हर्षवर्द्धन पाण्डेय हैं | खंडन -मंडन , जो भी किया आपने , पाण्डेयजी को संबोधित करके करना चाहिए था | उन्हीं से आपको माकूल ज़वाब मिल जाते |

    वैसे , इस पोस्ट से मेरी सहमति इसलिए बनती है कि मैं  इस कथन पर दिली यक़ीन करता हूं "सोबार ऊपरे मानुष सत्य !" मनुष्य बचा रहेगा तो बचा रहेगा परिवार , समाज और राष्ट्र | मनुष्य को और उसकी मनुष्यता को बचाए रखना पुनीत कार्य ही नहीं , यही सच्चा और परम धर्म है | इस संकट की घड़ी में पाण्डेयजी की ख़बर (जिसकी सत्यता का दावा मैं नहीं करता ) के अनुसार मनुष्य को बचाए रखने की मुहिम की पवित्रता गंगा स्नान कर पुण्य अर्जित करने की तुलना में अग्रणी स्थान रखता है कि नहीं --सहमति -असहमति इसी मुद्दे पर होनी चाहिए थी | लेकिन खेद है , मित्रों ने तंगनज़रिए और तंगख्याली का परिचय देते हुए मुझको संबोधित कर जबरन चर्च को घसीट लाया | अरे भाई 'मेरा सब सर्वश्रेष्ठ , तेरा सब निकृष्ट ' वाला मामला है कहां है इसमें ? बग़ैर चर्च को  घसीटे भी तो अपनी सहमति -असहमति जतायी जा सकती थी | चर्च को लेकर  ऐसा दृष्टिकोण  जताना  इस बात को प्रमाणित नहीं  करता  है कि आपके मन में समुदाय विशेष के प्रति वैमनस्य , विद्वेष की भावना फल - फूल रही है | सच तो यह है कि गोदी मीडिया के शर्मनाक आचरण के इस दौर में इस ख़बर से बाख़बर होने नहीं दिया जाता है कि संक्रमण काल  में चर्च की क्या -क्या भूमिका रही है , उसकी कैसी भागीदारी रही है |

     जानकारी के लिए बताये देना ज़रूरी समझता हूं कि बीते साल , कोरोना काल में दक्षिण भारत के चार चर्चों ने अपनी धार्मिक गतिविधियां स्थगित कर , उन्हें क्वारंटाइन सेंटर में बदल दिया गया था | पीएम केयर फंड के लिए देश के सभी चर्चों ने करोड़ों रूपये चंदा उगाही कर सम्बंधित मंत्रालय को सौंपा था | कई बस्तियों में मुफ़्त भोजन वितरण किया गया | ........स्वास्थ्य , चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में उसकी भागीदारी जग जाहिर है | शासक -प्रशासक , नेता , मंत्री यहीं के प्रोडक्ट हैं |

    अफ़सोस है , ये तमाम कल्याणकारी गतिविधियां कभी ख़बर नहीं बनी | योँ कहे बनने नहीं दी गई | मीडिया का पक्षपाती रवैया कल भी था और आज भी है |

     यक़ीन करना पड़ रहा है कि बीते कुछ सालों में सत्ता केन्द्रित शक्तियों ने लोगो की मानसिकता कुछ इस तरह तैयार कर दी है कि अल्पसंख्यक समुदाय की प्रतिरोधी , किन्तु सच बातें क़तई बरदाश्त की जाती | ....आनन्- फानन में टूट पड़ते हैं सच के प्रवक्ताओं पर !

    अभी अभी 'विश्व्गाथा' पत्रिका के संपादक (पंकज त्रिवेदी) के संपादकीय में गुजराती कवि जयंत डांगोदराकी काव्य पंक्तियां पढने को मिली --- " तमारा तीर-तुक्काने सभा गंभीरताथी ले , कहुं जो हूं कशुं तो कांकरीचालो बनी जातो |" अर्थात आप जो तीर और तुकबंदी करते हैं उसे सभा गंभीरता से लेती है | मगर मैंने कुछ कह दिया तो चिंगारी बन जाती है |

        इसी सन्दर्भ में शायर अकबर इलाहबादी का ये शे'र मौजूं  है ---

        "हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता |"

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...