सोमवार, 2 अगस्त 2021

जीवन बचा रहें

 झारखंड के चर्चित कवि, कहानीकार और चित्रकार बिनोद कुमार राज ’विद्रोही’ जी की हिंदी कविता ’जीवन बचा रहे’ का संताली अनुवाद


* Jion Bańcao Tahe̠nma*

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–Binod Kumar Raj Vidrohi


Ọh!

Iń do̠ cedaḱ unạḱ iń mõ̠ńja

Ińre cedaḱ unạḱ niro̠la o̠nto̠r menaḱa

Ce̠t́ ińaḱ mõ̠ńjtet́ge ińaḱ sarapkana

Hẽ̠ iń do̠ ona dhạrtikạnạń

O̠ne̠ okare sạṅgiń-sạṅgiń hạbić raṭen bir menaḱa

Ona reaḱ kukhire menaḱa lak-lak ṭan he̠nde̠ hirạ

Lagaoakanam iń lilạm

Benaoińem me̠neda iń bạṛij

Binạ hudiskate je

No̠ṇḍenaḱ raṭen bir meṭao cabaḱa

No̠ṇḍen ạdiwạsi somajko uchạdo̠ḱa

Unkoren ạsul maljal do̠ onko sãoko calaḱa

Me̠nkhan eṭaḱ jiv jiạliko be̠bạṛićko gujuḱa

Dhạrti reaḱ kukhireko jivedo̠ḱkan hajar-hajar jivianko gujuḱa

Dela achań manaokeda (me̠nkhan noṅka do̠ baṅ hoyoḱkana)

Am do̠ ale̠m uchạdgo̠t́kalea

Napae jaegate

Me̠nkhan onkoaḱ he̠ṛe̠m haṛhat́ unuihạrko do̠ cekatem uchạdtakoa

Uchạdtakoam cekate

O̠ṇḍe̠naḱ akhṛa, dupuṛuṕ piṇḍa, sũṛũkuć ḍahar,

Ạyubo̠ḱ reaḱ sonḍhaṛ mo̠ho̠k

Matko̠m ar murut́ baha

Onkoren hapṛamkoaḱ atmako.


Noa baḍaekaḱpe ape

Iń do̠ koela khadanko reaḱ bạnijo̠ḱren baṅ kạnạń birudić

Sumuṅ ninạḱge me̠n sanaidińkana

Jãhãnaḱ noṅkaepe la lahare

Je bir ṭotha reaḱ khas loksan alo hoyoḱ

Bańcao tahe̠nma o̠ṇḍenaḱ ạri-cạli, ạn-ạri

Somajiạ ar kạuḍi ạri rup alo cirạḱma

Alo hoyoḱma go̠ć aohal reaḱ

Bańcao tahe̠nma ạksijan

Bańcao tahe̠nma jion

Rukhiạ tahe̠nma aḱ sar, tumdaḱ, ṭamak, tirio

Bạhu biṭikoaḱ man bo̠ro̠m.....!

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जीवन बचा रहे

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बिनोद कुमार राज ’विद्रोही’


ओह!

मैं इतनी सुंदर क्यों हूं

मुझमें इतना कोमल हृदय क्यों है

क्या मेरी सुंदरता ही मेरा अभिशाप है

हां मैं वही धरती हूं

जहां दूर-दूर तक फैले घने जंगल

जिसके गर्भ में मौजूद है लाखों टन काला हीरा

कर रहे हो तुम मेरी नीलामी

बनाना चाहते हो मुझे बदरंग

बगैर ये सोचे कि

यहां के घने जंगल मिट जाएंगे

यहां का जनजाति समाज विस्थापित हो जायेगा

उनके पालतू डोर-डांगर तो उनके साथ चले जाएंगे

धरती के गर्भ में कुलबुला रहे अरबों जीव मारे जाएंगे

चलो मान लिया (हालांकि ऐसा होता नहीं)

तुम हमें विस्थापित कर दोगे

अच्छी जगह

लेकिन उनकी खट्टी-मीठी यादों को

कैसे विस्थापित करोगे

कैसे करोगे विस्थापित

वहां का अखड़ा, चबूतरा, पगडंडी

गोधूली की सौंधी महक

महुआ और पलाश के फूल

उनके पुरखों की आत्माएं


यह जान लो तुम

मैं कोल खदानों के ब्यावसायीकरण का नहीं हूं विरोधी

फकत इतना कहना चाहता हूं

कुछ ऐसा करो खुदाई से पहले 

कि वन क्षेत्र का विशेष नुकसान ना हो

बची रहे वहां की लोक-संस्कृति, रीति-रिवाज

सामाजिक और आर्थिक ढांचा दरके नहीं

न हो कत्ल पर्यावरण का

बचा रहे ऑक्सीजन

बचा रहे जीवन

सुरक्षित रहे तीर-धनुष, मंदार, नगाड़ा, बासुरी

बहू-बेटियों की इज्जत....।

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बेसरा ’बेपारी’

फोटो:– getty images

साभार :–  विनोद कुमार राज ’विद्रोही’ // इश्क-ए-हजारीबाग कविता संग्रह पुस्तक से

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