मंगलवार, 8 मार्च 2022

विश्वविजयिनी नारी है " / अनंग

 महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं .........

        " विश्वविजयिनी नारी है "


वन-उपवन की फुलवारी है। 

धरती  पर सबसे  प्यारी  है।

           वह विश्वविजयिनी नारी है।। 

ममता है जिसके आंचल से।

सृष्टि  है  जिसके  सम्बल से।

स्वागत है उसका करतल से।

सर्वथा  समर्पित  सुंदरता, 

वह  गोरी  है  ना  कारी  है।।वह विश्वविजयिनी नारी है।।


इतिहास वही विश्वास वही।

उल्लास वही परिहास वही।

वह  वसुंधरा आकाश वही।  

उसका मन प्यार भरा सागर,

वह  शक्ति - प्रेम  संचारी है।। वह विश्वविजयिनी नारी है।।


वह पुष्प सरीखी सुंदर है।

उससे श्रृंगार  वही  घर है। 

सीता तुमसे ही रघुवर  हैं।

वह बलशाली गौरवशाली, 

उससे मानवता न्यारी है।। वह विश्वविजयिनी नारी है।।


हां उमा - महेश्वर संसारी।

राधा से गिरिधर बनवारी। 

मर्यादा की  है अधिकारी।

तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ,

माँ का पद सबसे भारी है।। वह विश्वविजयिनी नारी है।।

                                                                 " अनंग "

रविवार, 6 मार्च 2022

चाह की चाहत / ओशो

 🎡🎡🎡 🙏🎡🎡🎡


*चाह का अर्थ क्या होता है?*


*चाह का अर्थ होता है,  जैसा मैं हूं वैसा ठीक नहीं.. कुछ और होना चाहिए।*

थोड़ा और धन!

थोड़ा और पद!

थोड़ा और ध्यान!

थोड़ा और सत्य!

थोड़ा और परमात्मा!


*लेकिन थोड़ा और होना चाहिए।*


**जैसा है उस में मैं संतुष्ट नहीं।*

*चाह का अर्थ है असंतोष।*


तुमने एक शांत झील में कंकड़ फैंका।

तो लहरे उठती हैं।

तुम कोहिनूर हीरा फेंको,

फिर लहरे उठती हैं।

पानी को क्या फर्क पड़ता है?


*चाह पत्थर की तरह गिरती है तुम्हारे भीतर।*

   *फिर चाह सोने की हो, या स्वर्ग की ।*

  *इस से कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर चाह संसार की हो  कि परलोक की।*


इस से कोई फर्क नहीं पड़ता।

चाह पत्थर की तरह गिरती है

 तुम्हारे चित पर।

चित्त कंप जाता है।

और चित के कंपन के कारण

 सत्य खो जाता है।


सत्य को चाहना हो तो

सत्य को चाह मत बनाना।

चाह से जो मुक्त हो जाता है,

 उसे सत्य मिलता है।


इसे धैर्या पूर्ण समझोगे तो

 सीधी सीधी बात है।

*चाह के कारण तनाव पैदा होता है।* 

तनाव भरे चित्त में परमात्मा की छवि नही बनती। 

चाह के कारण तरंगे उठ आती हैं।

तरंगों के कारण सब कंपन पैदा हो जाता है।

*कंपते हुए मन में परमात्मा की छवि नही बनती।*


*ठीक से समझो तो कंपता हुआ मन ही संसार है।*


शांत बैठो।

कुछ समझने की भी वासना नही।

शांत बैठो ... निशतरंग ।

क्या पाने को बचा।

चाह संसार है।


*संसार या परमात्मा*

*दोनो चाह है।*


जिसके पास अन्यथा की कोई मांग नही।

जिसकी कोई चाह नहीं।

जो अभी जीता है, यही जीता है

 वर्तमान में।


*जिसके लिए जैसा है वैसा होना स्वर्ग है।जहां है वही मोक्ष है।*


*ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक है।*


*कल जो आएगा... आएगा।*


*अभी जो है उसे भोगता है।*

*बड़े आनंद और अनुग्रह से भोगता है।*


🏵️🏵️🏵️ *ओशो* 🏵️🏵️🏵️

शनिवार, 5 मार्च 2022

एक बड़ी छोटी सी चाह* / ~ *प्रेम रंजन अनिमेष*

 

                                    

                               🌐

एक छोटा सा 

काम करना चाहता 


बड़े और सयाने 

हो जायें  

उससे पहले 


बच्चों को

सिखाना 

चाहता 

बनाना


दुनिया का 

नक्शा ऐसा


हो नहीं 

जिसमें कोई 

सरहद कहीं 


न सीमायें 

देशों की 

न सोच की


जाने से पहले 

जान से जहान से

जिंदगी के लिए  

हर किसी के लिए  

कुछ ऐसा

कर गुजरना चाहता


बेड़ियों में जकड़े

खानों में बँटे

लकीरों से बिंधे

अभी है जैसे

इस बनावटी संसार में  


जीते जी 

नहीं घुटना मरना चाहता... 

                               💟

                                ✍️ *प्रेम रंजन अनिमेष*

रवि अरोड़ा की नजर से......

 क्यों कमेटी /  रवि अरोड़ा



दशकों पहले मैं एक बड़ी सामाजिक सांस्कृतिक संस्था का सदस्य था । संस्था की जब भी बैठक होती कुछ सदस्य खड़े हो जाते और हर बात पर तीखे सवाल करते कि ऐसा क्यों किया, ऐसा किससे पूछ कर किया वगैरह वगैरह । उनकी  'क्यों'' 'क्यों'  इतनी थी कि मेरी मित्र मंडली ने उन लोगों का नाम रख दिया- क्यों कमेटी । तब से लेकर अब तक ज्यादा सवाल करने वालों को मैं भी ' क्यों कमेटी ' ही कहता हूं । हालांकि मेरा मानना है कि सवाल अच्छे होते हैं और बेहतरी के लिए सवाल किए ही जाने चाहिएं मगर हर बात में नुक्स निकालने की प्रवृति भी अच्छी नहीं होती । अब यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को ही लीजिए । इस मामले में सरकार से इतने सवाल किए जा रहे हैं कि चहुं ओर क्यों कमेटियां ही नजर आ रही हैं । हालांकि हमारी सरकार ने इस मामले में शुरुआती कोताही जरूर बरती मगर बाद में तो वह सक्रिय हो ही गई । यह भी ठीक है कि भारतीय छात्रों को यूक्रेन से निकालने का काम उतने बेहतर ढंग से भी नहीं हुआ जितना भक्त मंडली गुणगान कर रही है और अनेक सवाल अभी भी अनुत्तरीण ही हैं । वैसे यदि आप क्यों कमेटी के तमगे से मुझे न नवाजने का वादा करें तो मैं अवश्य इन पर बात करना चाहूंगा । 


पहली बात तो यही है कि विदेश में फंसे छात्रों को निकाल कर सरकार उनपर कोई अहसान नहीं कर रही क्योंकि यह उसका संवैधानिक कर्तव्य है । भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके नागरिकों को अपने जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी न केवल अपने देश में बल्कि विदेशों में भी मिली हुई है । दूसरी बात सरकार यह कार्य जनता से ही वसूले गए टैक्स से करती है और उसका इस कदर महिमा मंडन ठीक नहीं । कम से कम तब तक तो नहीं , जब तक एक एक छात्र वहां से वापिस घर नहीं लौट आता । सरकार यह कह देने भर से अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती कि उसने समय रहते एडवाइजरी जारी कर दी थी कि छात्र यूक्रेन छोड़ दें । सरकार को बताना चाहिए कि एडवाजरी जारी करने के बाद उसने यूक्रेन से भारत आने वाली फ्लाइट्स में कितना इजाफा किया ? सरकार के मुखिया मोदी जी से यह सवाल भी बनता है कि जब तक बिलखते छात्रों के वीडियो घर घर तक नहीं पहुंच गए तब तक वे चुनावी रैलियों में ही क्यों लगे रहे और हजारों बच्चों के जीवन को खतरे में क्यों डाला ? आपरेशन गंगा को किस बिना पर रेस्क्यू ऑपरेशन कहा जा रहा है जबकि छात्रों को यूक्रेन से नहीं पडौसी देशों से लाया जा रहा है । जहां से तो वे खुद भी आ सकते हैं । रेस्क्यू तो तब होता जब यूक्रेन से बच्चों को लाया जाता । यूक्रेन से तो छात्रों को बंधक बनाने की खबरें आ रही हैं । माइनस तापमान में हजारों बच्चे भूखे प्यासे सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर यूक्रेन की सीमा तक कैसे पहुंचें यह सरकार क्यों नहीं बताती  ? यह ठीक है कि कुछ छात्रों को सरकार घर वापिस ले आई है मगर क्या इसका इतना महिमा मंडन जरूरी है , वह भी उस देश में जो वर्ष 1990 के खाड़ी युद्ध के दौरान एक लाख सत्तर हजार लोगो को सकुशल घर वापिस लाने का रिकॉर्ड रखता है ? कितने छात्रों को वापिस वह ले आई है यह तो सरकार बता रही है मगर अभी कितने छात्र वहां फंसे हुए हैं , इसकी जानकारी सरकार क्यों नहीं दे रही ? ये सभी छात्र विधिवत पासपोर्ट और वीजा धारक हैं और उनका रिकार्ड विदेश मंत्रालय और स्थानीय एंबेसी के पास क्यों नहीं है ? वहां फंसे छात्र भारतीय दूतावास के असहयोग के वीडियो बार बार भेज रहे हैं , इस मामले में क्या किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई ? दावा किया जाता रहा है कि मोदी जी का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है , फिर क्यों भारतीय छात्रों को वहां से निकालने में रूस, यूक्रेन और पडौसी देश सहयोग नहीं कर रहे ? सवाल बहुत हैं मगर ज्यादा पूछ कर मैं क्यों कमेटी का सदस्य नहीं बनना चाहता। हालांकि मैं आश्वस्त तो अभी भी नहीं हूं कि आप मुझे यह तमगा नहीं देंगे ।


🙏🏿✌🏾️👌🏽👍🏼

गुरुवार, 3 मार्च 2022

जंग टलती रहे तो बेहतर है…/ साहिर लुधियानवी ...

 *ऐ शरीफ़ इंसानों

जंग टलती रहे तो बेहतर है…* 

*~साहिर लुधियानवी*


ख़ून अपना हो या पराया हो

नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर

जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में

अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर

रूह-ए-तामीर ज़ख़्म खाती है

खेत अपने जलें कि औरों के

ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है

टैंक आगे बढ़ें कि पीछे हटें

कोख धरती की बाँझ होती है

फ़तह का जश्न हो कि

 हार का सोग

ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है

जंग तो ख़ुद ही एक मसला है

जंग क्या मसलों का हल देगी

आग और ख़ून आज बख़्शेगी

भूक और एहतियाज कल देगी

इसलिए ऐ शरीफ़ इंसानों

जंग टलती रहे तो बेहतर है

आप और हम सभी के आँगन में

शमा जलती रहे तो बेहतर है !

रवि अरोड़ाकी नजर से.......

 साझे पहाड़-साझे समुंद्र / रवि अरोड़ा



अकेले भटकने की आदत के चलते एक बार फिर हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून में था । इस बार का अनुभव कुछ अलग रहा । रिसॉर्ट व होटल मालिकों तथा प्रॉपर्टी डीलरों से बातचीत करने पर पता चला कि कोविड काल में पूरे उत्तराखंड की प्रॉपर्टी में आग लग गई है । देखने ही देखते वहां जमीनों के दाम कई गुना हो गए हैं । गंगा किनारे की प्रॉपर्टी तो एनसीआर से अधिक महंगी है । बड़े शहरों की भीड़ भाड़ से दूर लोगबाग पहाड़ों में पनाह ढूंढ रहे हैं । पहाड़ों में लगभग हर सड़क पर नए होटल और रिसोर्ट तो खुल ही रहे हैं  साथ साथ गैर प्रांतीय आबादी भी वहां रिहाइश की गर्ज से पहुंच रही है । दिल्ली एनसीआर का धनाढ्य वर्ग सेकिंड होम की चाह में वहां जमीनें खरीद रहा है । बेशक वहां बाहरी आदमी सवा नाली यानी तीन सौ गज से अधिक जमीन नहीं खरीद सकता मगर वह हिंदुस्तानी ही क्या जिसके पास ऐसे कानूनो का तोड़ न हो । सो प्रॉपर्टी बाजार में बूम है । 


यह सब देख कर मैं थोड़ा हैरान हुआ कि अखबार तो हमें यह बताते रहते हैं कि उत्तराखंड में पलायन हो रहा है , यदि ऐसा है तो फिर लोगबाग क्यों वहां दौड़ रहे हैं ? खोजबीन करने बैठा तो पता चला कि बेशक बाहरी आदमी सुकून की चाह में पहाड़ों पर पहुंच रहा हो मगर स्थानीय आबादी तो वहां से उकताई ही पड़ी है । रोजगार का अभाव, पानी की किल्लत, सड़कों, स्वास्थ्य सुविधाओं और अच्छे स्कूल कालेजों की कमी लोगों को बड़े शहरों की ओर धकेल रही है । गांव के गांव खाली हो रहे हैं । सरकार भी मानती है कि प्रदेश के बारह सौ गांव आबादी विहीन हो चुके हैं । हालत की गंभीरता को देखते हुए सरकार को बकायदा पलायन आयोग का गठन करना पड़ा है । अजब हालात हैं । वहां का आदमी यहां आ रहा है और यहां का वहां जा रहा है ।


 बेशक मैं क्षेत्रवाद का हिमायती नहीं मगर इस तरह के पलायन के कुछ अपने खतरे भी हैं, यह मानता हूं । सबसे बड़ा ख़तरा तो क्षेत्रीय विरासत, संस्कृति और भाषा के समक्ष खड़ा होना है । हालांकि ये खतरे भावात्मक हैं और इनके मुकाबले इसके लाभ बेहद ठोस हैं । सबसे बड़ा लाभ तो आर्थिक समानता, विकास और रोजगार के क्षेत्र में ही होता है मगर अफसोस उन पर इस मुल्क में चर्चा ही नहीं होती । विमर्श की कमान जिन्हे अपने हाथ में लेनी चाहिए वे तमाम राजनीतिक दल तो इसका लाभ उठाने में ही लगे हुए हैं और क्षेत्रीय भावनाओं को भड़का रहे हैं । पंजाब के चुनावों में मुख्यमंत्री चन्नी जब उत्तर प्रदेश व बिहार के भईया लोगों को गरियाते हैं तो साथ खड़ी प्रियंका गांधी ताली बजाती हैं । भाजपा नीत हरियाणा की सरकार सुप्रीम कोर्ट की परवाह न कर प्राइवेट सेक्टर की 75 फीसदी नौकरियों में स्थानीय निवासियों की अनिवार्यता की शर्त थोप देती है । मुंबई में यू पी बिहार के मजदूरों और टैक्सी वालों की मराठियों द्वारा पिटाई कोई नई बात नहीं है । वहां का सबसे बड़ा दल शिव सेना तो मराठी अस्मिता के नाम पर ही जिंदा है । हिंदी के विरोध के नाम पर उत्तरी भारतीयों का दक्षिण में जम कर तिरस्कार होता है । गोवा और पुद्दुचेरी में स्थानीय आदमी की साझेदारी के बिना कोई बाहरी आदमी व्यापार ही नहीं कर सकता । धारा 370 खत्म होने के बावजूद आज भी जम्मू कश्मीर में बाहरी आदमी मकान दुकान नहीं बना सकता । बाहरी आदमी को सहयोग न करने में बंगाली सबसे आगे रहते हैं । नंदी ग्राम जैसी घटनाएं इसकी मिसाल हैं । नॉर्थ ईस्ट में बसने का सपना तो हम आप देख ही नही सकते । अब बताइए क्या आपको नहीं लगता कि इस मुद्दे पर देश की स्पष्ट नीति हो और सभी राज्य उसका पालन करें । जब हम एक देश हैं , हमारा एक ही संविधान है , हमारे एक समान अधिकार हैं तो हमारे समुंद्र, पहाड़ और जमीन साझे क्यों नहीं ?

मंगलवार, 1 मार्च 2022

#लहना_सिंह_उदास_है/ प्रवीण परिमल

 मुहब्बत करनेवालों के नाम ...


एक #प्रेमकथा : 


        


                     

"तेरी कुड़माई हो गई ?"


इतना घुमाकर तो नहीं पूछा था मैंने,

जैसे कोर्स में पढ़ी 

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की 

अमर प्रेम कथा

'उसने कहा था' में

नायक ने नायिका से पूछा था!


सीधा और सपाट- सा तो प्रश्न था मेरा--

"मेरी लुगाई बनोगी?" 


बदले में, 

तुमने भी 

'धत्त्!' कहाँ कहा था!? 


सिर्फ शरमाकर रह गई थी तुम

और चेहरा तुम्हारा लाल हो गया था!


आज 

पूरे बयालीस वर्षों के बाद 

तुम्हारा अप्रत्याशित यह पूछना-- 

"सासाराम की कुछ याद 

है, कि नहीं दिल में ?"

जैसे

ठहरे हुए ताल में 

एक ही साथ

कई-कई पत्थर फेंक गया!


हठात् तुम्हारा नाम 

कलेजे से उछलकर 

होठों पर आ चिपका है। 


रसोई के लिए बड़ियाँ खरीदने आई

उस नायिका की तरह 

और अपने मामा के केश धोने के लिए 

दही लेने 

चौक की दुकान पर आए 

उस नायक की तरह 

बीच बाज़ार में 

औचक तो नहीं मिले थे हम!

लेकिन, आई तो तुम भी थी 

अपने मामा के ही घर 

मैट्रिक की परीक्षा देने 

धनबाद से

और मैं गया से 

किसी और को 

परीक्षा दिलवाने।


दूर के रिश्तेदार होने के नाते 

हम भी रुके थे 

तुम्हारे मामा के ही घर पर।


पहली ही मुलाकात में

तुम मुझे इतनी भाई

इतनी भाई

कि उस नायक की तरह 

मैंने पूछ ही लिया था तुमसे

अपने अंदाज़ में --

"मेरी लुगाई बनोगी?"

और तुम

उस नायिका की तरह

'धत्त्' कहे बिना

सिर्फ शरमाकर रह गई थी।


कौन जानता था --

हफ़्ते भर की वह मुलाक़ात 

हमारे पूरे जीवन पर 

भारी पड़ जाएगी!


अपने शहर लौटते वक़्त 

फिर से पूछा था मैंने तुमसे

उसी अंदाज़ में  -- 

"मेरी लुगाई बनोगी?"

और मेरी संभावना के विरुद्ध 

शरमाकर चुप रह जाने के बजाय 

इस बार तुम्हारी आवाज़ 

कानों में मिसरी घोल गई थी-- 

"मामाजी से बात कर लीजिएगा! 

लेकिन, पहले 

कुछ बन तो जाएँ हम।"


न जाने क्या हुआ था फिर ...

कि 'कुछ बनने' के दरम्यान 

समय अपने विकराल डैने पसारता गया 

और ... 

और ... 

और बयालीस वर्ष बीत गए!


मैं किसी और का,

तुम किसी और की! 


गूगल से मेरा नंबर निकालकर 

व्हाट्सएप पर आज 

जब एक अपरिचित की तरह 

सवाल किया तुमने 

कि सासाराम की कुछ याद है दिल में, कि नहीं ?

तो कलेजा धक् से रह गया। 


पल भर में 

जब मैंने तुम्हारा नाम लिखकर 

प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया, 

तो बच्चों जैसा सवाल किया तुमने --

"इतने वर्षों के बाद भी याद हूँ मैं!?"


अब तुम्हें कैसे बताऊँ, सूबेदारनी! 

कि दिल की सिगड़ी में

यादों के कोयले की लहक

कभी मद्धम पड़ी ही नहीं!


भरा-पूरा परिवार लिए

तुम्हारा लहना सिंह 

आज तक उदास है

चेहरे पर मुस्कराहट का मुखौटा लगाए!


लेकिन, तुम बतलाओ, सूबेदारनी!

सूबेदार हजारा सिंह कैसे हैं?

उनके साथ 

तुम खुश तो हो न??


इतने वर्षों के बाद

मुझे तलाशने की

आख़िर वजह क्या है?


ईमानदारी के साथ

शिद्दत से की गई

अपनी मुहब्बत पर

लहना को फख्र होगा,

यदि वो 

तुम्हारे किसी काम आ पाए।


॰ प्रवीण परिमल

तस्वीर गूगल से ...

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...