बुधवार, 19 जनवरी 2022

प्रेरणादायक दंड /

 

अमेरिका में एक पंद्रह साल का लड़का था, स्टोर से चोरी करता हुआ पकड़ा गया। पकड़े जाने पर गार्ड की गिरफ्त से भागने की कोशिश में स्टोर का एक शेल्फ भी टूट गया। 


जज ने जुर्म सुना और *लड़के* से पूछा,


 "तुमने क्या सचमुच ब्रैड और पनीर का पैकेट" चुराया था ?


लड़के ने नीचे नज़रें कर के जवाब दिया। ;- हाँ'।

जज,:- 'क्यों ?'

लड़का,:- मुझे ज़रूरत थी।

जज:- 'खरीद लेते।

लड़का:- 'पैसे नहीं थे।'

जज:- घर वालों से ले लेते।'

लड़का:- 'घर में सिर्फ मां है।

बीमार और बेरोज़गार है, ब्रैड और पनीर भी उसी के लिए चुराई थी

जज:- तुम कुछ काम नहीं करते ?

लड़का:- करता था एक कार वाशिंग प्वाइंट में।

मां की देखभाल के लिए एक दिन की छुट्टी की थी, तो मुझे निकाल दिया गया।'

जज:- तुम किसी से मदद मांग लेते?

लड़का:- सुबह से घर से निकला था, तकरीबन पचास लोगों के पास गया, बिल्कुल आख़िर में ये क़दम उठाया।


जिरह ख़त्म हुई, जज ने फैसला सुनाना शुरू किया, चोरी और पनीर ब्रैड की चोरी बहुत शर्मनाक जुर्म है । और इस जुर्म के हम सब ज़िम्मेदार हैं। 'अदालत में मौजूद हर शख़्स मुझ सहित सब मुजरिम हैं, इसलिए यहाँ मौजूद हर शख़्स पर दस-दस डालर का जुर्माना लगाया जाता है। दस डालर दिए बग़ैर कोई भी यहां से बाहर नहीं निकल सकेगा।'


ये कह कर जज ने दस डालर अपनी जेब से बाहर निकाल कर रख दिए और फिर पेन उठाया लिखना शुरू किया:- इसके अलावा मैं स्टोर पर एक हज़ार डालर का जुर्माना करता हूं कि उसने एक भूखे बच्चे से ग़ैर इंसानी सुलूक करते हुए पुलिस के हवाले किया।

अगर चौबीस घंटे में जुर्माना जमा नहीं किया तो कोर्ट स्टोर सील करने का हुक्म दे देगी।'

जुर्माने की पूर्ण राशि इस लड़के को देकर कोर्ट उस लड़के से माफी तलब करती है।


फैसला सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोगों के आंखों से आंसू तो बरस ही रहे थे, उस लड़के के भी हिचकियां बंध गईं। वह लड़का बार बार जज को देख रहा था जो अपने आंसू छिपाते हुए बाहर निकल गये।


क्या हमारा समाज, सिस्टम और अदालत इस तरह के निर्णय के लिए तैयार है ?


चाणक्य ने कहा है कि यदि कोई भूखा व्यक्ति रोटी चोरी करता पकड़ा जाए तो उस देश के लोगों को शर्म आनी चाहिए ।

यह रचना दिल को छू गई।

इसलिए शेयर की, आपको भी अच्छी लगी हो, तो आगे जरूर भेजिएगा।

जय हिन्द !

मंगलवार, 18 जनवरी 2022

मंटो का वो कमराआकाशवाणी भवन में / विवेक शुक्ला

 

अपनी लघु कथाओं, बू, खोल दो, ठंडा गोश्त और टोबा टेक सिंह से प्रसिद्ध हुए सआदत हसन मंटो (11 मई 1912 – 18 जनवरी 1955) को गुजरे हुए और आकाशवाणी के दिल्ली केन्द्र में काम  किए हुए एक जमाना गुजर गया। पर अब भी उनके आकाशवाणी केन्द्र के कमरे के बारे में यहां के बहुत से मुलाजिमों को पता है।  मंटो का कमरा पहली मंजिल पर नाटक विभाग में था। वे यहां 1940 से अगस्त 1942 के दरम्यान रहे। उनके साथ उर्दू के मशहूर अफसाना निगार कृश्न चंदर भी काम करते थे। 

मंटो ने आकाणवाणी दिल्ली के लिए 110 नाटक लिखे। मंटो की आज पुण्यतिथि है। उनके लिखे एक नाटक ‘दस्तावेज’ को श्रोताओं ने खूब पसंद किया था। उन्होंने यहां पर रहते हुए कृष्ण चंदर के साथ बंजारा फिल्म की कहानी भी लिखी। जिसे सेठ जगत नारायण ने खऱीदा था।


 सेठ जगत नारायण दिल्ली की बड़ी हस्ती हुआ करते थे। वे जगत,रीटज और नॉवेल्टीसिनेमा घरों के मालिक थे। लाला जगत नारायण सेठ का संबंध दिल्ली की खत्री बिरादरी से था। उनकी कटरा नील में हवेली थी!  मंटो के एक जीवनीकार जगदीश चंदर वधावन कहते हैं कि “ मंटो को आकाशवाणी में 150रुपए माह पर नौकरी मिली थी। इससे पहले वे 60  रुपए महीने की नौकरी कर रहे थे।”


किसके साथ वक्त गुजरता था मंटो का


 आप जानते हैं तीस हजारी के पास है सेंट स्टीफंस अस्पताल। इससे सटा है भैंरों मंदिर। ये भार्गव लेन पर है। इधर का 5 भार्गव लेन का घर कभी स्थायी अड्डा होता था सआदत हसन मंटो का। वे रोज ही तो यहां पर अपने मित्र कृश्न चंदर  से गुफ्तुगू करने आया करते थे। ये बातें तब की हैं जब मंटो दिल्ली में रह रहे थे। उन दिनों मंटो और  चंदर आकाशवाणी की उर्दू सेवा में काम करते थे। 


तब आकाशवाणी का एक दफ्तर अंडरहिल रोड पर भी होता था। ये जगह भार्गव लेन से दो-तीन मील की ही दूरी पर है। मंटो मुंबई  को छोड़कर दिल्ली आकाशवाणी में नौकरी करने आए तो पहला मसला छत का था। उनकी पहले ही दिन किशन चंदर से दोस्ती हो गई। कृश्न चंदर अपने नए दोस्त को अपने साथ अपने घर में ले आए। फिर मंटो इधर करीब दो हफ्ते  तक रहे।


मोरी गेट में मंटो


सआदत हसन मंटो  ने यहां नोकरी करते हुए मोरी गेट में एक घर किराए पर भी ले लिया। यहां उकी पत्नी भी आ गई। अब मंटो और कृश्न चंदर  दिल्ली की खाक छानने लगे। दिल्ली में कुछ समय तक रहने के बाद मंटो फिर से बंबई लौट गए। कृश्न चंदर का मुंबई-दिल्ली आना जाना लगा रहा। मंटो बाद में जब भी दिल्ली आए तो 5 भार्गव लेन वाले घर में ही ठहरे। इसमें कृश्न चंदर की मां और छोटे भाई रहते थे। ये घर कृश्न चंदर के परिवार के पास 1990 तक रहा। बहरहाल, देश के विभाजन के बाद मंटो पाकिस्तान चले गए। वहां पर 1955 में उनकी  मृत्यु हो गई। 


मंटो की मौत से अवाक कृश्न चंदर चंदर ने तब लिखा-"जिस दिन मंटो से मेरी पहली मुलाक़ात हुई, उस रोज मैं दिल्ली में था। जिस रोज़ वह मरा है,उस रोज़ भी मैं दिल्ली में मौजूद हूं। उसी घर में हूं, जिसमें चौदह साल पहले वह मेरे साथ पंद्रह दिन के लिए रहा था। घर के बाहर वही बिजली का खंभा है, जिसके नीचे हम पहली बार मिले थे। वह ग़रीब साहित्यकार था। वह मंत्री न था कि कहीं झंडा उसके लिए झुकता। आज दिल्ली में मिर्जा ग़ालिब पिक्चर चल रही है। इसकी कहानी इसी दिल्ली में, मोरी गेट में बैठ कर मंटो ने लिखी थी। एक दिन हम मंटो की तस्वीर भी बनाएंगे और उससे लाखों रूपए कमायेंगे। यह  मोरी गेट, जहां मंटो रहता था, यह वह जामा मस्जिद की सीढियां हैं, जहां हम कबाब खाते थे, यह उर्दू बाज़ार है। सब कुछ वही है, उसी तरह है । सब जगह उसी तरह काम हो रहा है। आल इंडिया रेडियो भी खुला है और उर्दू बाज़ार भी, क्योंकि मंटो एक बहुत मामूली आदमी था। वह ग़रीब साहित्यकार था। वह मंत्री न था कि कहीं झंडा उसके लिए झुकता।”


टोबा टेक सिंह का बिशन सिंह कहाँ 


सआदत हसन मंटो कालजयी कहानी टोबा टेक सिंह के मुख्य पात्र बिशन सिंह को दिल्ली में देखना चाहेंगे  ? मानसिक रूप से विक्षिप्त बिशन सिंह को देश के बंटवारे के चलते अपनी मिट्टी से दूर भेजा जा रहा था। ये उसे नामंजूर था। तो जो इंसान शारीरिक-मानसिक रूप से स्वस्थ है उसकी अपने घर को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ने की पीड़ा किस तरह की होती होगी ? बिशन सिंह से मिलते-जुलते पात्र रोज मिलते हैं राजधानी के सब-रजिस्ट्रार के दफ्तरों में।


साउथ  दिल्ली के  एक सब-रजिस्ट्रार दफ्तर में  लगभग 50 साल का इन्सान अपने आंसू पोँछ रहा है। उसके साथ पांच-छह कुलीन दिखने वाले उसके मित्र-संबंधी बैठे हैं। इनमें दो औरतें भी हैं। आप इनसे साहस जुटाकर इधर आने की वजह जानना चाहते हैं। आंसू पोँछने वाले इंसान से रोने की वजह पूछते हैं। तो उनमें से एक सज्जन बताते हैं,‘ हमने लाजपत नगर  में अपने डैडी के बनाए घर को बेच दिया है। आज अपने घर के नए मालिक के साथ सेल डीड पर साइन करने के लिए आए हैं हम सब भाई-बहन।’ इनमें एक सुबक रहा है। पर आंखें सबकी नम हैं। अब इस ग्रुप की एक महिला कहने लगती है, ‘आज बहुत कठोर दिन है। आज हमारा उस घर से नाता टूट गया जिसे हमारे मम्मी-डैडी ने बनाया था। हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारा घर बिकेगा।’ये कहते-कहते वो भी रोने लगती है। सारा माहौल गमगीन है।


गीता कालोनी सब-रजिस्ट्रार के दफ्तर में भी होता है प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त का पंजीकरण। इधर हमेशा सन्नाटा पसरा रहता है भीड़-भाड़ के बावजूद। माहौल में उदासी है। अचानक से किसी के सुबकने की आवाज आपके कानों तक पहुंचती हैं। पांच-छह लोगों के एक समूह में एक इंसान को बाकी समझा रहे हैं। वह नाराज है। वह शख्स एक खास पेपर पर साइन करने से अंतिम क्षणों में इंकार करता है। ‘मैं नहीं करूंगा इस पेपर में साइन। तुम उस घर को बेच रहे हो जो बाऊ जी ने कितनी मेहनत से बनवाया था। मैं उस घर में ही रहूंगा’। उसके स्वर में पीड़ा और करुणा के मिले–जुले भाव हैं।


विवेक शुक्ला


नवभारत टाइम्स, 18 जनवरी, 2022

मेहनती इंसान*

 *

*🕉️🌄शुभ प्रभात🌅🌄


एक दुकानदार बड़ा दुखी रहता था। क्यूंकी उसका बेटा बहुत आलसी था। वह अपने पुत्र को एक मेहनती इंसान बनाना चाहता था। एक दिन उसने अपने पुत्र से कहा कि आज तुम घर से बाहर जाओ और शाम तक कुछ अपनी

मेहनत से कमा के लाओ नहीं तो आज शाम को खाना नहीं मिलेगा - लड़का पहुत परेशान हो गया वह रोते हुए अपनी माँ के पास गया और उन्हें रोते हुए सारी बात बताई माँ का दिल पासीज गया और उसने उसे एक सोने का सिक्का दिया कि जाओ और शाम को

पिताजी को दिखा देना। शाम को जब पिता ने

पूछा की क्या कमा कर लाए हो तो उसने वो सोने का सिक्का दिखा दिया यह देखकर उसने पुत्र से वो सिक्का कुएँ मे डालने को कहा, लड़के ने खुशी खुशी सिक्का कुएँ में फेंक दिया अगले दिन पिता ने माँ को अपने मायके भेज दिया और लड़के को फिर से कमा के लाने को कहा। अबकी बार लड़का रोते हुए बड़ी बहन के पास गया तो बहन ने दस रुपये दे दिए।

लड़के ने फिर शाम को पैसे लाकर पिता को दिखा दिए पिता ने कहा कि जाकर कुएँ में डाल दो लड़के ने फिर डाल दिए।

अब पिता ने बहन को भी उसके ससुराल भेज दिया। अब फिर लड़के से कमा के लाने को कहा अब तो लड़के के पास कोई चारा नहीं था वह रोता हुआ बाजार गया और वहाँ उसे एक सेठ ने कुछ लकड़ियाँ अपने घर ढोने के लिए कहा और कहा कि बदले में दो रुपये देगा।

लड़के ने लकड़ियाँ उठाईं और चल पड़ा चलते चलते उसके पैरों में छाले पड़ गये और हाथ पैर भी दर्द करने लगे शाम को जब पिताजी ने फिर कहा की बेटा कुएँ मे डाल दो तो लड़का गुस्सा होते हुए बोला कि मैने इतनी मेहनत से पैसे कमाए हैं और आप कुएँ में डालने को

बोल रहे हैं। पिता ने मुस्कुराते हुए कहा कि यही तो मैं तुम्हें सीखाना चाहता था तुमने सोने का सिक्का तो कुएँ में फेंक दिया लेकिन दो रुपये फेंकने में डर रहे हो क्यूंकी ये तुमने मेहनत से कमाएँ हैं।

अबकी बार पिता ने दुकान की चाबी निकल कर बेटे के हाथ में दे दी और बोले की आज वास्तव में तुम इसके लायक हुए हो क्यूंकी आज तुम्हें मेहनत का अहसास हो गया है।

सोमवार, 17 जनवरी 2022

अर्चना श्रीवास्तव,( मलेशिया) की कुछ कविताएं

--  ('तपस्या'




तपस्या से तपस्वी, साधना से साधक


है ऊंच कोटि के मुहावरे जो 


आज भी प्रासंगिक है


कल भी दैत्य-दानवों के विरुद्ध


 अडिग-शाश्वत होने का छिडा


 एकल अभियान था


आज  भी अंत-बाह्य उपस्थित, 


संकट एकसमान है


सांस्कृतिक अतिक्रमण का 


मौजूद अभेद्य-घातक हथियार हैं


लालच, भय,दबाव के डंक मारता बाजारवाद है


भीड से तन्हाई तक


वैमनस्य से प्रेम तक


स्वार्थ से परमार्थ तक


प्रगतिशीलता से पारंपारिकता तक


सत्य-मिथ्या और न्याय-अन्याय के बीच मचा


निरंतर अंदरुनी कोहराम है


गली-मुहल्ले मे ठनी प्रतिस्पर्धा का गलाफांस है


 है चुनौती अति गंभीर तमाम 


द्वंद-हामला के मध्य 


 संकल्पित रह अचल-अटल ,


एकाग्र कर्मयोगी हो ....


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@   ((2))



-"'इतिहास"'


*°°°°°°°’°°°°°°°°°°°°°°°°°*



कबतक ढोयेंगे अतीत के काले-कलंकित खंडों को

छल-प्रपंच के भ्रामक तथ्यों और निरर्थक दांवों को

आओ मिलकर पुनः पडताल करें

अपने कुंठा और ग्लानि की आहूति देकर

स्वाभिमान की उज्ज्वल अवधारणा वरण कर

स्वर्णिम इतिहास का पुनुरूत्थान-नवनिर्माण करें....।


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 कहानियां-जीवनियाँ वहीं ग्राह्य-माननीय हैं

जो देशप्रेम-मातृभूमि के लिए समर्पण सीखाये

अपने विरासत और धरोहर का संरक्षक बनाये

सनातनी संस्कृति-परंपरा और मानकों पर टिककर

देश के उपलब्धियों के नित्य नये कीर्तिमान सजायें

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जिन पन्नों से क्रुरता-वहशीपन का विवरण पडा 

तानाशाही के रक्तरंजित विभत्स चित्रण भरा

प्रण करें उन्हें मिटाने के अपने स्मृतियों से

मानवता के मुख के कालिख ,शर्मनाक तारीखों कों

जिन्हें पुनः दुहराने की न कोई साजिश करे..

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वेद-पुराण, रामायण-उपनिषद का ज्ञान

सृष्टि के संपूर्ण जन-जीवन का कल्याण भाव

बुद्ध, कृष्ण, राम,नानक, तुलसी की अमृत वाणी

मानवीय गरीमा-अस्मिता को पुनर्जीवित दान

वीर योद्धाओं-विभूतियों की अमरगाथाएँ मात्र

अनुकरणीय और अनुसरणीय बने... निर्धारित हो...


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     ((3))



 दर्द की एक नदी थमी है


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'दर्द की एक नदी थमी है'...इससे बेहतर

 क्या परिभाषित होगी

 एक स्त्री ..नदी ही तो है ...


जिसकी मंजिल बस सफर है

औरों के लिए निरंतर क्रियाशील

  हरपल  प्रवाहित....


ईश्वर ने स्वयं नदियाँ  नारी-स्वरूप में रची

गंगा,जमुना, सरस्वती, कृष्णा, कावेरी 

उतंग शिखर से उतरकर नीचे सबके लिए...


निर्झर, भव्य, आक्रामक तंरंगित-बौछारों को

खुबसूरती से ,सलीके से धाराओं मे  समेटकर...

संपूर्ण बिडम्बनाओं से बेपरवाह


जिस ओर  संपूर्ण, भव्यता से,एकनिष्ठ  बही..

स्नेह, करूणा की अतुल्य जलराशि से सींचित किया कण-प्राण अपने अहं की आहुति देकर..


खुद स्वेच्छा से हर्षित छोटी धाराओं को जनमीं

फिर हरबार लोग अपने दंभ,

क्षुद्र स्वार्थ और सुविधा से

इसकी धाराओं को कांटा-मोडा

बांधा मनमाने रूप में

दर्द-चुभन के अपमानित

चट्टानों से पाटा-रोका अभिसप्त कर

ओजस-स्वयंभू  बहावों को....


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@

 

       "जिन्दगी"


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कुछ कही, कुछ अनकही  दास्तां 

है ---ये जीवन-डगर

टुकडों में बटे एहसास, कुछ वहां पनपे ,

कुछ घटे यही

चाहतों की बेजोड़ उधेडबुन 

मजबूरियों की अपनी सियासत

हर वक्त एक नजर की तलाश जारी

जिन्दगी का अक्स उभर आये जिसमें...


उम्र की आडी-तिरछी पगडंडियों पर

कभी मासूमियत से खुद को तैनात किया राहों में

तब इसके वहशी अधरों ने

निचोड लिया मेरी निश्छलता-भोलापन

लडखडाती आवाक्.. 

मैं खडी रही  

  पथराई ..स्तब्ध--


गुजरती गई मेरे सामने

उलटी-पलटी दुनिया की अजीब तसवीरें

सहसा गुजरती हवा की कहानी ,बदलते फिजा की जुबानी

आविष्कार, खोजो का विस्मयकारी सिलसिला

अनायास ही मुझे आंदोलित कर गया

सहजता से मैने ठंडी सांसे भर ,सजग हो

नयनों में माधुर्य भर चाही इसकी दोस्ती...


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--किसकी मुट्ठी में है


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        हाँ भिन्न-भिन्न इंसान

         देश से परदेश तक

         अनगिनत बेहिसाब                 

समुची धरती में

         अनंत आसमान तक

          फैले-सिमटे/    सुषुप्त-स्फूर्त...  

              कैसी-कैसी रस्मे /कायदे  हजार

              जीवन है–----रंग-रुप बेशुमार

            पर जीने के सलीके

            निधार्रित है सारे


              वो निर्मित करेंगे--------

              या फिर संशोधित करेंंगे

             प्रायोजित/प्रायोगिक रास्ते..

             पर चलने के ढ़ग /बढ़ाने को कदम 

             निर्देशों मे अंकित है..

          यूं तो भाषाएँ अनगिनत हैं

        यकीनन ..

            विषय-वस्तु /बोलने का लहजा

            लगभग तयकर रखा है

            पूछो तो जरा---

           सत्ता, पैसा, कौशल, तकनीक

          किसकी मुट्ठी मे है सारे...

           क्या राजतंत्र ,क्या प्रजातंत्र ..

           नहीं गुजांइश के पुल शेष ...  भ्रमण कर सके जहाँ

           स्वतंत्र सोच-इरादों के कदम


         सभी अधीन-पराधीन हुए

            किसी-न-किसी मदारी के..

      जो क्षुद्र-छद्म /मक्कार प्रपंचोंं से

          नैसर्गिक मान्यताओं-वृत्तियों  को pl

         प्रश्न चिन्ह के बाणों से बेधते

         तेरे आत्मबोध-आत्मसत्ता को

        हिचकोलों मे डूबोते

         तेरा इति क्या/अंत कब

          सब मापदंड वहीं तय करते

          वो उत्पादित करेंगें सामान 

         हमारी जरूरतों को जज्बातों मे पिरोके

          नयी चाहतो को

           इश्तहारों का सुर देकर

            पर कीमत लगाते

             अपने कायदे-कानून को

   अमिट- अकाट्य सुनिश्चित कर

      अपने अदृश्य एकछत्र सत्ता 

        स्थापित करते

              खुद के स्वार्थ मे

             परमार्थ विर्सजित कर...!!!!!

    †★******************************★†


        


        


        



    


            .


               


              


                 



-मिलकर आसां हुआ है'


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#"मिलकर आसां हुआ है " ऐ जिन्दगी


जबसे तेरा दामन संभाला है


पहले थी नितांत अकेली ,सहमी-सिमटी सी


भीड. की नजरों से बचकर..  खुद के उधेड़बुन में


उम्मीदों से लदी...राह पर हांफती हुई..


शब्दों का एक पुल जबसे आया 


एक अदम्य चाहत-सा जागृत हो आया


भ्रमों के चंगुल से उबरकर


सहारो की आस झटककर


तमाम अवरोधों मे...


सब्र और उत्कंठा साथ लेकर


हरशैय आशंका को रौंदकर 


चलते जाने का अद्भूत सुकून..!!


जैसे जन्म हो नये एक पथिक का..


एक अनूठी यात्रा के अभियान पर 


मौसम-दर-मौसम चलना


अंतर के नब्ज टटोलते


चांद-सूरज की आंख-मिचौली मे


हवाओं का साक्षी,नदियों का हमराही


अंधेरे-उजाले के बहुरंगी सवालों में


उम्र की पगडंडियों के चहुंओर


सत्य का आलोक बिखेरने..।



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अर्चना श्रीवास्तव 



मनुष्य के कर्मों का साक्षी कौन है.../ कृष्ण मेहता


मृत्युलोक में प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है। प्राणी का धन-वैभव घर में ही छूट जाता है। मित्र और स्वजन श्मशान में छूट जाते हैं। शरीर को अग्नि ले लेती है। पाप-पुण्य ही उस जीव के साथ जाते हैं। अकेले ही वह पाप-पुण्य का भोग करता है परन्तु धर्म ही उसका अनुसरण करता है।


‘शरीर और गुण (पुण्यकर्म) इन दोनों में बहुत अंतर है, क्योंकि शरीर तो थोड़े ही दिनों तक रहता है किन्तु गुण प्रलयकाल तक बने रहते हैं। जिसके गुण और धर्म जीवित हैं, वह वास्तव में जी रहा है।’


*पाप और पुण्य : -* वेदों में जिन कर्मों का विधान है, वे धर्म (पुण्य) हैं और उनके विपरीत कर्म अधर्म (पाप) कहलाते हैं। मनुष्य एक दिन या एक क्षण में ऐसे पुण्य या पाप कर सकता है कि उसका भोग सहस्त्रों वर्षों में भी पूर्ण न हो।


*मनुष्य के कर्म के चौदह साक्षी !!!*


सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म–ये सब मनुष्य के कर्मों के साक्षी हैं।


सूर्य रात्रि में नहीं रहता और चन्द्रमा दिन में नहीं रहता, जलती हुई अग्नि भी हरसमय नहीं रहती; किन्तु रात-दिन और संध्या में से कोई एक तो हर समय रहता ही है। दिशाएं, आकाश, वायु, पृथ्वी, जल सदैव रहते हैं, मनुष्य इन्हें छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता, इनसे छुप नहीं सकता। मनुष्य की इन्द्रियां, काल और धर्म भी सदैव उसके साथ रहते हैं। कोई भी कर्म किसी-न किसी इन्द्रिय द्वारा किसी-न-किसी समय (काल) होगा ही। उस कर्म का प्रभाव मनुष्य के ग्रह-नक्षत्रों व पंचमहाभूतों पर पड़ता है। जब मनुष्य कोई गलत कार्य करता है तो धर्मदेव उस गलत कर्म की सूचना देते हैं और उसका दण्ड मनुष्य को अवश्य मिलता है।


*कर्म से ही देह मिलता है !!!*


पृथ्वी पर जो मनुष्य-देह है उसमें एक सीमा तक ही सुख या दु:ख भोगने की क्षमता है। जो पुण्य या पाप पृथ्वी पर किसी मनुष्य-देह के द्वारा भोगने संभव नही, उनका फल जीव स्वर्ग या नरक में भोगता है। पाप या पुण्य जब इतने रह जाते हैं कि उनका भोग पृथ्वी पर संभव हो, तब वह जीव पृथ्वी पर किसी देह में जन्म लेता है।


कर्मों के अवशेष भाग को भोगने के लिए मनुष्य मृत्युलोक में स्थावर-जंगम अर्थात् वृक्ष, गुल्म (झाड़ी), लता, बेल, पर्वत और तृण–आदि योनि प्राप्त करता है। ये सब दु:खों के भोग की योनियां हैं। वृक्षयोनि में दीर्घकाल तक सर्दी-गर्मी सहना, काटे जाने व अग्नि में जलाये जाने सम्बधी दु:ख भोगना पड़ता है।  यदि जीव कीटयोनि प्राप्त करता है तो अपने से बलवान प्राणियों द्वारा दी गयी पीड़ा सहता है, शीत-वायु और भूख के क्लेश सहते हुए मल-मूत्र में विचरण करना आदि दारुण दु:ख उठाता है। इसी तरह से पशुयोनि में आने पर अपने से बलवान पशु द्वारा दी गयी पीड़ा का कष्ट पाता रहता है। पक्षी की योनि में आने पर कभी वायु पीकर रहना तो कभी अपवित्र वस्तुओं को खाने का कष्ट उठाना पड़ता है। यदि भार ढोने वाले पशुओं की योनि में जीव आता है तो रस्सी से बांधे जाने, डण्डों से पीटे जाने व हल जोतने का दारुण दु:ख जीव को सहना पड़ता है।


*विभिन्न पापयोनियां !!!*


इस संसार-चक्र में मनुष्य घड़ी के पेण्डुलम की भांति विभिन्न पापयोनियों में जन्म लेता और मरता है–


–माता-पिता को कष्ट पहुंचाने वाले को कछुवे की योनि में जाना पड़ता है।


–मित्र का अपमान करने वाला गधे की योनि में जन्म लेता है।


–छल-कपट कर जीवनयापन करने वाला बंदर की योनि में जाता है।


–अपने पास रखी किसी की धरोहर को हड़पने वाला मनुष्य कीड़े की योनि में जन्म लेता है।


–विश्वासघात करने से मनुष्य को मछली की योनि मिलती है।


–विवाह, यज्ञ आदि शुभ कार्यों में विघ्न डालने वाले को कृमियोनि मिलती है।


–देवता, पितर व ब्राह्मणों को भोजन न कराकर स्वयं खा लेता है वह काकयोनि (कौए) में जाता है।


*दुर्लभ है मनुष्ययोनि : -* इस प्रकार बहुत-सी योनियों में भ्रमण करके जीव किसी महान पुण्य के कारण मनुष्ययोनि प्राप्त करता है। मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी यदि दरिद्र, रोगी, काना या अपाहिज जीवन मिले तो बहुत अपमान व कष्ट भोगना पड़ता है।


इसलिए दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर संसार-बंधन से मुक्त होने के लिए प्राणी को भगवान विष्णु की सेवा-आराधना करनी चाहिए क्योंकि वे ही कर्मफल के दाता व संसार-बंधन से छुड़ाने वाले मोक्षदाता हैं। भगवान विष्णु के जो-जो स्वरूप हैं, उनकी भक्ति करने से मनुष्य संसार-सागर आसानी से पार कर परमधाम को प्राप्त करता है।


भगवान विष्णु ने बताया संसार-सागर से पार होने का उपाय?


भगवान विष्णु ने संसार-सागर से पार होने का उपाय भगवान रुद्र को बताते हुए कहा कि ‘विष्णुसहस्त्रनाम’ स्तोत्र से मेरी नित्य स्तुति करने से मनुष्य भवसागर को सहज ही पार कर लेता है।


‘जिनका मन भगवान विष्णु की भक्ति में अनुरक्त है, उनका अहोभाग्य है, अहोभाग्य है; क्योंकि योगियों के लिए भी दुर्लभ मुक्ति उन भक्तों के हाथ में ही रहती है।’ (नारदपुराण)


*भक्तों की गति : -* भक्त अपने आराध्य के लोक में जाते हैं। भगवान के लोक में कुछ भी बनकर रहना सालोक्य-मुक्ति है। भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना सार्ष्टि-मुक्ति है। भगवान के समान रूप पाकर वहां रहना सारुप्य-मुक्ति है। भगवान के आभूषणादि बनकर रहना सामीप्य-मुक्ति कहलाती है। भगवान के श्रीविग्रह में मिल जाना सायुज्य-मुक्ति है।


जिस जीव को भगवान का धाम प्राप्त हो जाता है, वह भगवान की इच्छा से उनके साथ या अलग से संसार में दिव्य जन्म ले सकता है। वह कर्मबन्धन में नहीं बंधा होता है। संसार में भगवत्कार्य समाप्त करके वह पुन: भगवद्धाम चला जाता है।


*मुक्त पुरुष : -* मनुष्य बिना कर्म किए रह नहीं सकता। कर्म करेगा तो पाप-पुण्य दोनों होंगे। लेकिन जो मनुष्य सबमें भगवत्दृष्टि रखकर भगवान की सेवा के लिए, उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए और भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है तो उसके कर्म भी अकर्म बन जाते हैं और कर्म-बंधन में नहीं बांधते हैं। वह संसार में रहते हुए भी नित्यमुक्त है।


तत्त्वज्ञानी पुरुष संसार के आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। उनके प्राण निकलकर कहीं जाते नहीं बल्कि परमात्मा में लीन हो जाते हैं। सती स्त्रियां, युद्ध में मारे गए वीर और उत्तरायण के शुक्ल-मार्ग से जाने वाले योगी मुक्त हो जाते हैं।


गीता में शुक्ल तथा कृष्ण मार्ग कहकर दो गतियों का वर्णन है–


जिनमें वासना शेष है, वे धुएं, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के देवताओं द्वारा ले जाए जाते हैं। ऊर्ध्वलोक में अपने पुण्य भोगकर वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।


जिनमें कोई वासना शेष नहीं है, वे अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के देवताओं द्वारा ले जाये जाते हैं। वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेकर नहीं लौटते हैं।


*पितृलोक : -* यह एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है। एक जीव को पृथ्वी पर जिस माता-पिता से जन्म लेना है, जिस भाई-बहिन व पत्नी को पाना है, जिन लोगों के द्वारा उसे सुख-दु:ख मिलना है; वे सब लोग अलग-अलग कर्म करके स्वर्ग या नरक में हैं। जब तक वे सब भी इस जीव के अनुकूल योनि में जन्म लेने की स्थिति में न आ जाएं, इस जीव को प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पितृलोक इसलिए एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है।


*प्रेतलोक : -* यह नियम है कि मनुष्य की अंतिम इच्छा या भावना के अनुसार ही उसे गति प्राप्त होती है। जब मनुष्य किसी प्रबल राग-द्वेष, लोभ या मोह के आकर्षण में फंसकर देह त्यागता है तो वह उस राग-द्वेष के बंधन में बंधा आस-पास ही भटकता रहता है। वह मृत पुरुष वायवीय देह पाकर बड़ी यातना भरी योनि प्राप्त करता है। इसीलिए कहा जाता है–‘अंत मति सो गति।’


इसी सत्य को प्रकट करता हुआ एक सुन्दर भजन है–


*इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले,*

गोविन्द नाम लेकर, फिर प्राण तन से निकले,

श्रीगंगा जी का तट हो,

यमुना का वंशीवट हो,

मेरा सांवरा निकट हो,

जब प्राण तन से निकले,

*इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।।*


पीताम्बरी कसी हो,

छवि मन में यह बसी हो,

होठों पे कुछ हसी हो,

जब प्राण तन से निकले,

*इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।।*


श्रीवृन्दावन का स्थल हो,

मेरे मुख में तुलसी दल हो,

विष्णु चरण का जल हो,

जब प्राण तन से निकले,

*इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।।*


जब कंठ प्राण आवे,

कोई रोग ना सतावे,

यम दर्शना दिखावे,

जब प्राण तन से निकले,

*इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।।*


उस वक़्त जल्दी आना,

नहीं श्याम भूल जाना,

राधा को साथ लाना,

जब प्राण तन से निकले,

*इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।।*


सुधि होवे नाही तन की,

तैयारी हो गमन की,

लकड़ी हो ब्रज के वन की,

जब प्राण तन से निकले,

*इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।।*


एक भक्त की है अर्जी,

खुदगर्ज की है गरजी,

आगे तुम्हारी मर्जी,

जब प्राण तन से निकले,

*इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।।*


ये नेक सी अरज है,

मानो तो क्या हरज है,

कुछ आप का फरज है,

जब प्राण तन से निकले,

*इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निक








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हतप्रभ कर गया इब्राहिम अश्क का अचानक यूं चले जाना / आलोक यात्री

 🙏🙏जिधर से आया हूं एक दिन उधर ही जाऊंगा

है कायनात मेरा घर मेरा पता है खुदा...


हतप्रभ कर गया इब्राहिम अश्क का अचानक यूं चले जाना


  सुबह-सुबह हतप्रभ कर देने वाली मनहूस खबर ने भीतर तक झंझोड़ दिया

  मशहूर शायर इब्राहिम अश्क अचानक यूं चले जाएंगे यकीन नहीं हो रहा

  साल 2000 में "कहो ना प्यार है" के टाइटल गीत और उसी फिल्म के तमाम गीत लिख कर‌ शोहरत की बुंलदियों पर जा बैठे इब्राहीम अश्क के लेखन से मेरा पहला साक्षात्कार एक गंभीर एक्सीडेंट के बाद (अप्रैल 2017 में) अस्पताल प्रवास के दौरान हुआ था

  तब तक मैं उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता था

  उस दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल मैं गाहेबाना तौर पर ही कर रहा था कि तभी कहीं एक बहुत खूबसूरत सा शेर देखने को मिला

  शायर का नाम नहीं था

  गुगल पर तलाशा तो इब्राहिम अश्क के लेखन से साक्षात्कार हुआ और फिर तो उनका अधिकांश लेखन अस्पताल के बैड पर पड़े-पड़े ही पढ़ गया

  एक सुबह अस्पताल के कमरे में चहलकदमी करते हुए अहसास हुआ कि कोई हौले-हौले कंधा थपथपा कर हौसला दे रहा है

  इधर-उधर देखा कोई नहीं था

  कमरे में किसी की मौजूदगी का अहसास लगातार हो रहा था परंतु दिख कोई नहीं रहा था

  लेकिन किसी अदृश्य शक्ति के होने का अहसास लगातार पुख्ता होता जा रहा था

  मेरा हाथ अनायास ही मोबाइल की ओर चला गया और मैं इब्राहिम अश्क की इस ग़ज़ल से जा जुड़ा- जो कुछ यूं है-


जिसे मैं कह न सका वो भी सुन रहा है खुदा

तमाम हरब की बातों को जानता है खुदा


कभी जो दिल से पुकारा उसे अकेले में

सदाएं सुन के मेरी जैसे रुक गया है खुदा


मुझे खता का अहसास जब भी हो जाए

तो यूं लगे कि मेरा जैसे आईना है खुदा


जिधर से आया हूं एक दिन उधर ही जाऊंगा

है कायनात मेरा घर मेरा पता है खुदा


तमाम फिक्र ख्यालात में छिपा है वही

के अश्क मेरी सदा में बोलता है खुदा


  मैं आस्तिक नहीं हूं और 

God is  created by man 

में यकीन रखता था


  ग़ज़ल से रूबरू होने के बाद मैंने मन ही मन उस अदृश्य शक्ति को प्रणाम किया और ग़ज़ल की कई पंक्तियों को बार-बार पढ़ा

  मैं यह सोच कर भी हैरान था कि बंद कमरे में वह कौन सी शक्ति थी जो मेरा कंधा थपथपा रही थी?

  मैं अचानक ही इस ग़ज़ल से ही जाकर क्यों जुड़ा? 

  क्या यह मेरे भीतर आस्था के अंकुरण की कोई नैसर्गिक प्रक्रिया थी?

  या किसी दैवीय शक्ति से साक्षात्कार जैसी कोई घटना?

  बहरहाल आज इब्राहिम अश्क जी जब इस दुनिया में नहीं हैं तो इस ग़ज़ल का एक-एक शेर उन्हीं की आवाज़ में कानों में गूंजता हुआ सा महसूस हो रहा है

खुदा उन्हें जन्नत बख्शे

🙏🙏🙏

रविवार, 16 जनवरी 2022

इब्राहिम अश्क : हम जैसे लोग जमाने में कहाँ होंगे?"/ हरीश पाठक

 बहुत खल रहा है इब्राहिम अश्क का जाना

    "शीशे का आदमी हूँ,मिरी जिंदगी है क्या?

     पत्थर है सबके हाथ में,मुझको कमी है क्या?"

जैसे कभी न भूलनेवाली गजल के हरदिल अजीज शायर इब्राहिम अश्क का रविवार की शाम चार बजे मीरा रोड से सटे मेडीटेक मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल में निधन हो गया।वे कोरोना से पीड़ित थे और शनिवार की सुबह उन्हें इस अस्पताल में भर्ती कराया गया था।उन्हें बुखार व खून की उल्टियाँ हो रही थीं।यह जानकारी उनकी बेटी  मुसफा खान ने दी।सोमवार को मीरा रोड के एक कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्दे खाक किया जाएगा।

       20 जुलाई,1951 को मध्यप्रदेश में जन्मे इब्राहिम अश्क मूलतः शायर थे।वे वाया पत्रकारिता फिल्मों में आये।मुझे याद हैं 1978 के वे दिन जब मैं दिल्ली प्रेस की पत्रिका 'मुक्ता' का प्रभारी था तब अश्क जी 'शमा','सुषमा' से होते हुए दिल्ली प्रेस की तब की पत्रिका 'भूभारती' से जुड़े थे और  प्रभारी राकेशलाल श्रीवास्तव के साथ पहले पंचायतों , फिर राजनीतिक पत्रकारिता में चर्चित रही इस पत्रिका के रचनात्मक पक्ष को खूब मजबूती देने में जुटे रहते थे।उनका लंच ज्यादातर मेरे साथ सरदार के ढाबे पर ही होता।कभी श्रीशचंद्र मिश्र,कभी ज्योतिर्मय,कभी आलोक तोमर,कभी नवोदित,कभी राकेश श्रीवास्तव ,कभी दिनेश तिवारी तो कभी विश्राम वाचस्पति हमारे साथ होते।

     तब उनकी जुबान पर नये शेर और आंखों में सिर्फ एक सपना रहता-मुंबई जाना है और फिल्मों में गीत लिखने हैं।वे लिखते थे:

     "उस शख्स के चेहरे में कई रंग छुपे थे,

      चुप था तो कोई और था, बोला तो कोई और"।

यह भी उन्हीं की कलम से निकला था:

      "तिरी जमीं से उठेंगे तो आसमाँ होंगे,

       हम जैसे लोग जमाने में कहाँ  होंगे?"

और एक दिन वे धीरे से मेरे पास आ कर बोले,"पाठक मैंने अभी-अभी परेश नाथ जी को इस्तीफा दे दिया है।एक-दो दिन में मुम्बई निकल जाऊंगा।मेरा आसमान वहीं है।"

    फिर वह दिन भी आ गया जब हम कुछ मित्रों ने उन्हें विदा दी।झंडेवालान एस्टेट में स्थित दिल्ली प्रेस की परंपरा से उलट उनके साथ सरदार के ढाबे पर ही भोजन किया और गुमशुम से हम आठ-दस लोग उस बस स्टॉप तक उनके साथ गये जहाँ से उन्हें अपनी बस पकड़नी थी।

         1986 के मार्च में जब मैं 'धर्मयुग' (टाइम्स ऑफ इंडिया) जॉइन करने आया तो उन्हें खोज ही रहा था कि एक दोपहर 'माधुरी' से जुड़े राकेश रंजन (जो दिल्ली प्रेस में फिल्मी लेख लिखते थे) करीब आकर बोले,"इब्राहिम अश्क का यह नम्बर है।वे बहुत खुश हुए जब मैंने आपके बारे में बताया।बात कर लेना।"

       तब तक अश्क जी ने मुम्बई में अपने पैर जमा लिए थे।वे एलबम और मुशायरे कर रहे थे और एक हिट फिल्म का इंतजार।1996 में टाइम्स ऑफ इंडिया से इस्तीफा दे कर जब मैं 'कुबेर टाइम्स'  का संपादक बना तो लाल गुलाबों का गुलदस्ता लिए वे महेंद्र कार्तिकेय के साथ मेरे केबिन में थे।वे 'कुबेर टाइम्स' के नियमित लेखक भी थे।पर तब भी उनके होठों पर एक ही सवाल था-'एक हिट फिल्म का इंतजार है'।

        वह दिन भी आ गया जब साल 2000 में रितिक रोशन की पहली फिल्म 'कहो ना प्यार है' रिलीज हुई और फिल्म का शीर्षक गीत रातों रात आसमान में गूंजने लगा।यह गाना अश्क जी ने ही लिखा था।फिर सफलता उनके सँग-साथ रही।इसी गीत के लिए उनका फिल्मफेयर व आइफा एवार्ड के लिए नॉमिनेशन भी हुआ था।

       बाद में मेरे शहर भी बदले,नौकरियाँ भी पर परिवार और स्थायी ठिकाना मुम्बई ही रहा।अश्क जी मेरे,मैं उनके हाल लेता रहा।वे अपने शब्दों और उनकी ऊंचाइयों से प्रसन्न थे पर फिल्मी उतार चढ़ाव से तनिक रुष्ट भी।

      पर आज मैं उनकी वादाखिलाफी से आहत हूँ।उनका वादा था कि मीरा रोड में आ जाने के बाद फिर लौटेंगे दिल्ली प्रेस वाले दिन।वे मीरा रोड आ भी गये।बस भी गये।वह भी मेरे घर के कुछ कदम की दूरी पर।पर वे यह संदेश देना भूल ही गये की अब हम पड़ोसी हैं।आज जब यह पड़ोसी अनन्त यात्रा पर चला गया तब यह उजागर हो रहा है कि वे उतने ही नजदीक आ गए थे,जितने दिल के करीब थे।

     आंखें नम,गला भारी और शब्द धीरे धीरे साथ छोड़ रहे हैं।आपको कैसे कह दूं अलविदा?कल आप सुपुर्दे खाक हो जाएंगे पर मन और दिल के हर वक्त करीब रहेंगे अश्क जी।

   आपको कौन, कैसे भूल सकता है?

   कभी नहीं,हरगिज नहीं।


हरीश पाठक 

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...