रविवार, 6 नवंबर 2022

सर्दी की चादर--कहानी-देवेंद्र कुमार

 

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स्कूल में चित्रकला प्रतियोगिता हुई। सबसे अच्छे तीन चित्रों को पुरस्कार मिला। उसमें रचना का बनाया गुलाब के पौधे का चित्र भी था। स्कूल की ओर से तीनों विजेताओं को पुरस्कार दिए गए। समारोह समाप्त होने के बाद  रचना की माँ प्रतिभा प्रिंसिपल से मिलीं। पुरस्कार के लिए धन्यवाद दिया। फिर कहा- “रचना बताती है कि स्कूल के बाग में गुलाब के बहुत सुंदर-सुंदर पौधे हैं।”

“हां हैं तो सही। हमें बच्चों के साथ-साथ फूलों से भी प्यार हैं।” प्रिंसिपल ने कहा। फिर प्रतिभा और रचना को प्रिंसिपल गुलाब वाटिका दिखाने ले गई|

रचना एक छोटे से गमले में लगे सुंदर गुलाब के सामने जा खड़ी हुई और देर तक खड़ी देखती रही। लगा वह कुछ कहना चाहती है, पर कह नहीं पा रही है। प्रिंसिपल ने पूछा- “रचना, क्या गुलाब का पौधा तुम्हें पसंद है , क्योंकि तुम काफी देर से इसके सामने खड़ी हो।‘’

उत्तर में रचना कुछ बोली नहीं, पर धीरे से हां में सिर हिला दिया। उसकी आंखें अब भी गुलाब के फूलों पर टिकी थीं। रचना की मां ने कहा- “इसे फूलों से बहुत प्यार है।”

सुनकर प्रिंसिपल हंस पड़ीं। फिर उन्होंने ब्रश व पेंट लेकर गुलाब के गमले पर लिख दिया - रचना का गुलाब। फिर बोलीं-- “अब यह गुलाब रचना का हो गया। यह इस गमले को घर ले जा सकती है।‘

प्रिंसिपल से गुलाब का उपहार पाकर रचना बहुत खुश हुई। दोनों माँ-बेटी ने उन्हें धन्यवाद दिया और घर चली आईं | पूरे रास्ते रचना गुलाब के गमले को गोद में लिए बैठी रही, गमले का रंग उसके कपड़ों पर लग गया|माँ ने पौधे को नीचे रखने को कहा,पर रचना ने मना कर दिया।वह गुलाब को एक पल के लिए भी अपने से अलग नहीं करना चाहती थी। रचना ने घर पहुँच कर  गुलाब का गमला अपने पलंग के पास टेबुल पर रख दिया।

मां ने कहा-“रचना, क्या तुम इस गुलाब के गमले को यहीं रखोगी?” मां ने कई बार रचना को समझाया कि गुलाब वाले गमले को सोसायटी के बाग में रखवा दे, जहां तरह-तरह के फूलों के बहुत सारे गमले रखे हुए थे। उनकी देखभाल एक माली करता था। पर रचना उनकी बात मानने को तैयार ही नहीं हुई।

बीच में स्कूल में दो दिन की छुट्टी हुई तो रचना अपने मम्मी डैडी के साथ अपनी नानी के घर मिलने गई।

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“हम दो दिन नहीं रहेंगे। हमें गुलाब को पौधे को नीचे बाग में रख देना चाहिए।माली दूसरे पौधों के साथ तुम्हारे गुलाब की भी देखभाल कर लेगा।”- माँ ने समझाया।

रचना ने गुलाब के गमले पर प्यार से हाथ फिराया, फिर बोली- “कोई मेरे प्यारे गुलाब को चुराकर ले गया तो? नहीं, मैं इसे अपने कमरे में ही रखूंगी।”

दो दिन नानी के घर मजे करने के बाद रचना लौटी तो सबसे पहले अपने गुलाब के पास गई। फिर जोर से चीखी- “मम्मी, जल्दी आओ, देखो तो मेरे गुलाब को क्या हो गया!”

रचना की मां प्रतिभा दौड़कर गईं तो देखा रचना गुलाब के गमले के पास उदास बैठी है। मां को देखते ही बोली- “देखो मेरे गुलाब को।”

प्रतिभा ने देखा- दो दिन में गुलाब के कई फूल झर गए थे। कई मुरझाकर लटक रहे थे। उन्होंने कहा- “बेटी, मैंने कहा था न हमारे पीछे से कौन फूलों की देख-भाल करेगा। देखो पानी और ताजी हवा न मिलने से तुम्हारा पौधा बीमार हो गया है। पहले हमें इसे स्वस्थ करना है।”

“वह कैसे होगा?” रचना ने कहा।

प्रतिभा ने तब तक माली को बुला लिया था। उन्होंने रचना को समझाया- “इसका तरीका यही है कि गुलाब के पौधे को हम माली भैया को सौंप दें।‘’ मां के समझाने पर रचना मान गई। जब माली गुलाब के पौधे को उठाकर नीचे ले गया तो रचना भी उसके साथ गई, फिर माली को बताया कि वह गमले को कहां रखे। गमले को ऐसी जगह रखा गया था जो प्रतिभा की बालकनी से साफ दिखाई देती थी। गमला रखवाने के बाद रचना ने बाल्कनी में जाकर स्वयं देखा तब कहीं उसकी तसल्ली हुई।

“माली भैया, मेरे गुलाबों का ध्यान रखना।” रचना ने कहा तो माली बोला- “बेबी, बाग के सारे फूल मेरे बेटी-बेटों की तरह हैं। मैं तो सबका ध्यान रखता हूँ।”

मौसम बदल रहा था। एकाएक रात को तेज ठंड पड़ने लगी थी। गमले में गुलाब का पौधा तो था, पर फूल नजर नहीं आते थे। उसके पूछने पर माली तसल्ली देता था- “बेबी, जब मौसम कम ठंडा होगा तब फूल फिर से आयेंगे तुम्हारे गुलाब पर।”

रचना की बालकनी के सामने वाले हिस्से में धूप नहीं आती थी इसलिए माली गमले को उठाकर दिन में दूसरी तरफ धूप में रख देता था। शाम को फिर गमला पुरानी जगह पर लौट आता था। एक दिन रचना ने देखा तो गमला अपनी जगह नहीं था। घबराकर दौड़ी-दौड़ी माली के पास जा पहुँची

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“मेरे फूल, मेरा गमला!’’ वह इतना ही कह पाई थी कि माली उसका हाथ पकड़कर धूप में रखे गमले के पास ले गया। रचना ने गमले पर अपना नाम देखा तो खुश हो गई।

उस रात सोते-सोते रचना को एक सपना आया। उसने देखा ठंडी हवा चल रही है। उसके गुलाब की पंखुड़ियां थर-थर कांप रही हैं। आवाज आ रही है- “रचना, मुझे ठंड लग रही है और तुम हो कि आराम से गरम बिस्तर में सो रही हो।”

सुबह उसने प्रतिभा से कहा- “मम्मी, मुझे रात को सपना आया था और फिर मैंने रात के अंधेरे में खिड़की से देखा तो सचमुच मेरा गुलाब हवा से कांप रहा था।”

प्रतिभा हंसकर बोली- “बेटी, पेड़ पौधे इसी तरह रहते हैं। आखिर उनके पैर तो हैं नहीं जो सर्दी लगने पर चलकर बंद जगह में पहुँच जाएं। दिन में इसीलिए तो माली गमलों को उठाकर धूप में रखता है ताकि उन्हें धूप मिल सके।”

“हमें अपने गुलाब के लिए कुछ तो करना चाहिए।” रचना ने कहा और सारा दिन सोचती रही।शाम को उसने मम्मी की शाल उठाई और नीचे जाकर गुलाब के पौधे को अच्छी तरह ढक दिया।

प्रतिभा ने खिड़की से बेटी का कारनामा देखा तो हंस पड़ी। रचना ऊपर आई तो उन्होंने कहा- “बेटी, यह क्या खेल कर रही हो। आखिर तुम्हारा गुलाब का पौधा ही तो अकेला नहीं है। क्या सर्दियों में कोई पूरे जंगल को उढ़ाता है, या बारिश और तेज धूप में उन के ऊपर एक विशाल छतरी तानता है? यह पागलपन है। प्रकृति अपने तरीके से पेड़ पौधों की रक्षा करती है।”

“पर मां, वह तो मेरा गुलाब है। उसका ध्यान तो मुझे ही रखना होगा।” रचना ने कहा।

उस रात रचना आराम से सोती रही। रात में उसने एक बार उठकर नीचे झांका पर साफ-साफ कुछ नजर न आया। पर उसे तसल्ली थी कि कम से कम उसका गुलाब तो सर्दी से बचा रहेगा। सुबह नींद खुलते ही उसने नीचे झाँका तो सन्न रह गई। रात को उसने जो शाल गुलाब पर डाला था, वह दूर जमीन पर पड़ा था।

रचना ने चिल्लाकर पुकारा- “माली भैया, जरा ऊपर तो आना,’’ फिर उसके उत्तर देने से पहले ही खुद नीचे भाग गई। उसने पूछा- “माली भैया, मेरे गुलाब पर से शाल किसने उतारा?”

“रात में तेज हवा चल रही थी इसीलिए उड़ गया होगा।“ माली ने कहा। रचना ने देखा माली के बदन पर केवल एक पतली कमीज थी, हवा उस समय भी तेज भी और वह ठंड से कंपकंपा रहा था।

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तब तक प्रतिभा भी नीचे आ गईं । उन्होंने कहा- “रचना, मैंने तुम्हें बताया तो था कि पेड़-पौधे सरदी में रजाई नहीं ओढ़ते। उनकी देखभाल प्रकृति अपने आप करती है या फिर हमारे माली भैया करते हैं।” प्रतिभा ने जमीन पर पड़ी शाल उठा ली, फिर माली से ऊपर आने को कहा। उन्होंने माली को खाली कमीज में सर्दी में कंपकंपाते देखा लिया था।

माली कुछ देर बाद ऊपर आया तो प्रतिभा ने गरमागरम चाय और कुछ खाने को सामने रख दिया, फिर रचना के पापा की कमीज और स्वेटर निकालकर देते हुए कहा- “इन्हें पहन लो। अगर तुम्हें ठंड लग गई तो फिर रचना के गुलाब कैसे ठीक रहेंगे।” कहते हुए उन्होंने अपनी शाल रचना को थमा दी जिसे रचना ने रात में गुलाब के पौधे को उढ़ाया था। उनकी आंखें अब रचना पर टिकी थीं।

उनकी बात शायद रचना के मन तक पहुँच गई। रचना ने शाल माली को थमा दी। बोली- “माली भैया, तुम सुबह बहुत सवेरे बाग में आ जाते हो। जब आओ तो यह शाल ओढ़कर आना। मम्मी ठीक कह रही हैं , अगर तुम बीमार पड़ गए तो फिर मेरे गुलाब की देखभाल कौन करेगा।‘’

माली ने हौले से रचना का माथा छू दिया। बोला- “बेबी, मैंने कहा था न सब पौधे मेरे अपने बच्चों जैसे हैं, फिर तुम्हारा गुलाब तो मेरे लिए खास है।” कहकर माली नीचे उतर गया।

रचना को मां ने गोद में भर लिया। पीठ थपथपाती हुई बोली- “सब ठीक हो जाएगा, और सिर्फ तेरे गमले के गुलाब ही तो नहीं हैं। बाग के सारे फूल-पेड़, पौधे हम सबके हैं। हमें किसी एक का नहीं, सबका ध्यान रखना है।‘’

रचना चुप खड़ी थी। ( समाप्त)


शनिवार, 5 नवंबर 2022

अदब की दुनिया के शानदार दोस्तो / ज्ञान प्रकाश विवेक

 


लिखना कला है तो पढ़ना भी किसी कलात्मक अनुभव से कम नहीं है। मैं रोज़मर्रा का यात्री था। बहादुर गढ़ से मिंटो ब्रिज स्टेशन तक। रेलगाड़ी में बेतहाशा भीड़ होती। मैं अपने झोले से किताब निकालता। ज़रा सी जगह तलाश करता।एक दुनिया बीड़ी सिगरेट और ताश खेलनेवालों की। दूसरी मेरी, ख़ामोश, मरियल और किताब की दुनिया।

उस मुश्किल सफर में मैंने ख़ूब किताबें पढ़ीं और ज्यादातर पर लिखा भी।

इधर उम्र ज्यादा हो गई है, पढ़ना कम।

पत्रिकाओं में छपी रचनाएं पढ़ता रहा हूं। कुछ अरसा पहले शम्पा शाह ने निर्मल वर्मा पर अंक संपादित किया था कथादेश के लिए। दो बार पढ़ डाला। वो जब भी कोई काम करती हैं, हमारे लिए ज़रूरी हो जाता है।

कथादेश में ही अजीत कौर ने जो बलवंत गार्गी का इंटरव्यू लिया था, वो पढ़ा।दो अदीब जब अदब के नये इमकान तलाश करते हैं तो ऐसा मंज़र बन जाता है। बलवंत गार्गी, वही, नंगी धूप वाले। अफसानानिगार और रंगकर्मी।वो जीनियस, फ़क्कड, खिलंदड़े, अध्येता, यारबाश। अजित कौर ने इंटरव्यू के दौरान जो माहौल रचा है, बेमिसाल।

बिल्कुल इसी स्तर के इंटरव्यू, खुशवंत सिंह और कृष्णा सोबती के भी हैं। आपने न पढ़े हों तो ज़रूर पढ़ना। कथादेश के उसी अंक में आलम जावेद खान की कविताएं भी ताज़दम हैं।

लीक को तोड़ती हुई। नया मिज़ाज रचती हु ई।


वनमाली कथा

वनमाली कथा ने जो इस दरमियान, ठहरी हुई झील की लहरों में जो कंकर उछाल कर न सिर्फ़ लहरों को जगाया है बल्कि हलचल सी पैदा की है।

अब तक नौ अंक निकले हैं और ख़ूब निकले हैं।

नौ अंक के निकलते निकलते इस बेहद जरूरी पत्रिका को दो बड़े सम्मान मिल चुके हैं।

यह शर्फ पत्रिका के संपादक कुणाल सिंह को जाता है।वो अदबशनास, गहरी समझ के युवा संपादक हैं।


इधर, वनमाली कथा की कुछ कहानियां पढ़ने का Jइत्तेफाक हासिल हुआ।नीलाक्षी सिंह, राहुल श्रीवास्तव, अनघ शर्मा, मनोज पाण्डेय, मो आरिफ़ ,और हंस में छपी कुणाल सिंह की कहानी

ये तमाम नौजवान कथा लेखक, कहानियों में ज़िन्दगी की ऐसे तलाश करते हैं जैसे एक नया ज़िंदगीनामा रच रहे हों। कुणाल सिंह ने नयी तकनीक और तकनीकी भाषाK को कहानी परिसर बना दिया तो मनोज पाण्डेय ने गणेश नीलाक्षी ने रोशन और बुआ, आरिफ़ ने अब्दुल के ज़रिए , समाज के कोने कंतरों में झांककर देखने और कथानक तैयार करने का साहस किया है। पाकिस्तान के पास मोहम्मद मंशा याद थे, हमारे पास मो आरिफ़।

सभी की कोशिश यही है कि इस संगो ख़िश्त की दुनिया में थोड़ी सी मुहब्बत बची रहे।

लीलाधर मंडलोई की डायरी कमाल की है। उनकी डायरी की किताब पर मैंने लिखा भी था।

इधर वो ज्यादा फिलाफ़र हो गये महसूस होते हैं।

विजय शर्मा विश्व सिनेमा पर बहुत सशक्त लिखती रही हैं। यहां उन्होंने गोदार पर लिखा है संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण। उन्होंने गान विद द विंड फिल्म पर भी अमर उजाला में बहुत शानदार लिखा है।

दो अंक मिले नहीं थे। कल एन एस डी से लाया था।

मुमकिन हुआ तो संतोष चौबे की लम्बी कहानी और कविताओं पर लिखूंगा।

वनमाली कथा का उसने कहा था कालम बहुत दिलकश है।

आवरण जैसे ज़िन्दगी की नज़्में


और उर्दू शायर का ये शेर


गुज़िश्ता वक़्त की यादों को फिर करो ताज़ा

नये चिराग जलाओ बहुत अंधेरा है


आप सब दोस्त लफ़्ज़ों के चिराग ही तो जला रहे हैं।

बहुत शुभकामनाएं।

बुधवार, 2 नवंबर 2022

कमलेश सिंघल के कुछ लोकगीत

 राम और लछमन दोनों भैया दोनों ही बन को जायँ  

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

एक बन चाले, दो बन चाले, तीजे पै लगि आई प्यास 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

ना यहाँ कूआ, ना यहाँ जोहड़, ना यहाँ समंद तलाब 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

छोटा सा बच्चा जल भर लाया, पीओ सिरी भगवान 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

तेरे हाथ कौ बच्चा जल ना पीऊँ, पिता कौ नाम बताय 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

पिता अपने कौ नाम ना जानूँ, सीता मेरी माय  

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

ले चल रे बच्चा वाई रे कुटरिया में, जामें तेरी माय 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

उठ ले री माता सिर नै ढक ले, बाहर खड़े भगवान 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

ऐसे पति कौ बच्चा मुख ना देखूँ, नाय दिखाऊँ आप  

हे जी कोई राम मिले भगवान -2

फट गयी धरती समा गई सीता, खड़े लखावैं भगवान 

हे जी कोई राम मिले भगवान -2


कान्हा बरसाने में आ जइयो,

 बुला गई राधा प्यारी 

बुला गई राधा प्यारी, बुला गई राधा प्यारी


कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी


जब कान्हा तोहे भूख लगैगी -2

माखन मिसरी खा जइयो, 

बुला गई राधा प्यारी

कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी


जब कान्हा तोहे प्यास लगैगी -2

ठंडौ पानी पी जइयो, बुला गई राधा प्यारी



जब कान्हा तोहे ठण्ड लगैगी -2

काली कमलिया ले जइयो, 

बुला गई राधा प्यारी



जब कान्हा तोहे गरमी लगैगी -2

मोर कौ पंखा ले जइयो, 

बुला गई राधा प्यारी


कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी


जब कान्हा तोहे नींद लगैगी -2

झालर तकिया ले जइयो, बुला गई राधा प्यारी

कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी



नैनन में स्याम समायगौ, मोहे प्रेम को रोग लगायगौ -2

लुट जाउंगी स्याम तेरी मुसकन पै 

मिट जाउंगी स्याम तेरी मटकन पै 

मोहे गैर-गिरार गिरायगौ, मोहे प्रेम को रोग लगायगौ

नैनन में स्याम समायगौ, मोहे प्रेम को रोग लगायगौ

मर जाउंगी स्याम तेरे नैनन पै 

मिट जाउंगी स्याम तेरे नैनन पै 

मोतै तिरछी नजर चुरायगौ, मोहे प्रेम को रोग लगायगौ

नैनन में स्याम समायगौ, मोहे प्रेम को रोग लगायगौ

मर जाउंगी स्याम तेरे अधरन पै 

मिट जाउंगी स्याम तेरे अधरन पै 

मोहे मुरली मधुर सुनायगौ, मोहे प्रेम को रोग लगायगौ

नैनन में स्याम समायगौ, मोहे प्रेम को रोग लगायगौ

मर जाउंगी स्याम तेरी पलकन पै 

मिट जाउंगी स्याम तेरी पलकन पै 

मोहे टेढ़ी चाल चलायगौ, मोहे प्रेम को रोग लगायगौ 

नैनन में स्याम समायगौ, मोहे प्रेम को रोग लगायगौ



मनिहारे का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया -2

झोली कंधे धरी उसमें चूड़ी भरी -2

गलियों में शोर मचाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

छलिया का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

राधा ने सुनी ललिता से कही -2

मोहन को तुरत बुलाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

मनिहारे का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया -2

चूड़ी लाल नहीं पहरूँ, चूड़ी हरी नहीं पहरूँ

मुझे स्याम रंग है भाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

राधा पहरन लगी, स्याम पहराने लगे -2

राधा ने हाथ बढाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

राधा कहने लगी तुम हो छलिया बड़े 

धीरे से हाथ दबाया, स्याम चूड़ी बेचने आया 

मनिहारे का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया -2

छलिया का भेस बनाया, स्याम चूड़ी बेचने आया -2



दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै -2

चोरी करने गए बरसाने -2

वहाँ पै हो गयी भोर, पकड़ लियौ राधे नै

दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै

चोर-चोर सब कोई चिल्लावैं -2

ये तो निकरौ नन्दकिसोर, पकड़ लियौ राधे नै

दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै

कोई सखी मारै कोई धमकावै -2

दियौ राधे ने झकझोर, पकड़ लियौ राधे नै 

दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै

अबकी बार बचा लै राधे -2

फिर ना आउँ तेरी ओर, पकड़ लियौ राधे नै

दधि-माखन कौ चोर पकड़ लियौ राधे नै



उठो-उठो दयानंद बीर भतेरे दिन सो लिए मेरे राम -2

दयानंद उठे ढड़ती सी रात, बनखंड की राही हो लिए मेरे राम

बनखंड के मा धौड़ी-धौड़ी गाय, आँसू तो गेरै मोरनी मेरे राम

तू क्यों रोवै धौड़ी-धौड़ी गाय, सेवा तो तेरी मैं करूं मेरे राम -2

सोने की तेरी सिंघनी घड़ाय, चाँदी की तेरी बिजनखुरी मेरे राम

रहने को तोकू गउशाला बनवाय, खाने को तोकू दाल चने की हो राम

जीवै-जीवै दयानंद तेरे पूत, सेवा तो तैने बहुत करी मेरे राम -2

उठ-उठ दयानंद बीर भतेरे दिन सो लिए मेरे राम




मेरा नौ डांडी का बीजणा, हे मेरा नौ डांडी का बीजणा 

मेरे सुसरे ने दिया घड़वाय, झणाझण बाजै बीजणा 

मेरी सास कहे बहू पीस ले, मेरे राजा जी हिला गए हाथ,

छाले पड़ जा हाथ में, मेरा नौ डांडी का बीजणा

मेरे जेठ ने दिया घड़वाय, झणाझण बाजै बीजणा 

मेरी जेठाणी कहे बेबे छान ले, मेरे राजा जी हिला गए हाथ,

धौली हो जा चून में, मेरा नौ डांडी का बीजणा 

मेरे देवर ने दिया घड़वाय, झणाझण बाजै बीजणा

मेरी दौरानी कहे जीजी गूंध ले, मेरे राजा जी हिला गए हाथ,

उँगली मुड़ जा चून में, मेरा नौ डांडी का बीजणा

मेरे नणदोई ने दिया घड़वाय,झणाझण बाजै बीजणा

मेरी नणद कहे भाभी पोय ले, मेरे राजा जी हिला गए हाथ,

उँगली जल जा आग में

मेरा नौ डांडी का बीजणा, हे मेरा नौ डांडी का बीजणा 




मेरे सिर पै बंटा-टोकनी, मेरे हाथ में नेजू-डोल, मैं पतली सी कामनी

एक राह मुसाफिर दूर के, छोरी एक घूँट नीर पिलाय, हम परदेसी दूर के,

छोरे ना मेरी डूबै बालटी,छोरे ना मेरा नवै सरीर, मैं पतली सी कामनी

मेरे सिर पै बंटा-टोकनी, मेरे हाथ में नेजू-डोल, मैं पतली सी कामनी

छोरे किसके हो तुम पावने, छोरे किसके हो लणिहार, मैं पतली सी कामनी

मेरे सिर पै बंटा-टोकनी, मेरे हाथ में नेजू-डोल, मैं पतली सी कामनी

छोरी बाप तेरे के पावने, छोरी तेरे सै लणिहार, हम परदेसी दूर के

छोरे इब मेरी डूबे बालटी, छोरे इब मेरा नवै सरीर, मैं पतली सी कामनी

मेरे सिर पै बंटा-टोकनी, मेरे हाथ में नेजू-डोल, मैं पतली सी कामनी




पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

हाय, पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

बिंदी बनवा दे चाहे टीका बनवा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

चूड़ी बनवा दे चाहे कंगन बनवा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

बाली बनवा दे चाहे झुमके बनवा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

कालर बनवा दे चाहे पैंडल बनवा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

तगड़ी घड़वा दे चाहे गुच्छा घड़वा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की 

चुटकी घड़वा दे चाहे पायल घड़वा दे

अब चाहे सोने में लदवा दे, राजा अब नहीं बचने की 

पानी में लहरें ले रही राजा बेल सिंघाड़े की



जमना किनारे मेरौ गाँव साँवरे आ जइयो 

जमना किनारे मेरी ऊँची हवेली 

मैं बृज की गोपिका नवेली 

राधा-रंगीली मेरौ नाम कि बंसी बजाय जइयो  

जमना किनारे मेरौ गाँव साँवरे आ जइयो 

मल-मल के इसनान कराऊँ

घिस-घिस चन्दन तिलक लगाऊ 

पूजा करुँगी सुबह-शाम कि माखन खाय जइयो 

जमना किनारे मेरौ गाँव साँवरे आ जइयो 

खसखस को बंगला बनवाऊँ 

चुन-चुन कलियाँ सेज बिछाऊँ 

धीरे-धीरे दबाऊँ पाँव कि प्रेम रस पाय जइयो 

जमना किनारे मेरौ गाँव साँवरे आ जइयो 

देखत रहूँगी बाट तुम्हारी जल्दी अइयो किशन-मुरारी 

झांकी करेंगे बृज धाम कि हँस मुस्काय जइयो 

जमना किनारे मेरौ गाँव साँवरे आ जइयो 

तुमसे फस रहयौ प्रेम हमारौ 

खिच्चु कह रहयौ आटे वारौ 

अटक रहयौ मेरो काम नैक करवाय जइयो 

जमना किनारे मेरौ गाँव साँवरे आ जइयो












शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

रवि अरोड़ा की नजर से

 सिक्खों से कुछ सीखो जी  /  रवि अरोड़ा




दीपावली पर इस बार स्वर्ण मन्दिर अमृतसर में था। इस बड़े त्योहार के चलते हरि मंदिर साहब को रंग बिरंगी खूबसूरत लाइटों से भरपूर सजाया गया था । दिवाली और छुट्टी का दिन होने के कारण परिसर में बेहद भीड़ थी मगर फिर भी कहीं धक्का मुक्की, आपा धापी अथवा किसी किस्म की अव्यवस्था नज़र नहीं आई। दुनिया की सबसे बड़ी सामुदायिक किचन यानि गुरू राम दास रसोई में अटूट लंगर सदा की तरह निर्बाध चल रहा था। आमतौर पर इस लंगर में प्रति दिन एक लाख लोग निशुल्क खाना खाते हैं मगर त्यौहार के चलते यह संख्या अनुमानित तौर पर डेढ़ गुना अधिक तो रही ही होगी मगर फिर भी कहीं कोई बदइंतजामी नजर नहीं आई। जिसे देखो वही हाथ जोड़े भक्ति भाव में खड़ा था और सेवा कार्यों में जुटे लोग भी हाथ बांधे खड़े थे मगर सहयोग के लिए । सिर्फ हरि मन्दिर साहिब की ही बात क्यों करें, देश दुनिया का ऐसा कौन सा गुरुद्वारा है जहां ऐसा दृश्य प्रति दिन दिखाई न देता हो। 


इस बार कई सालों के बाद स्वर्ण मंदिर दर्शन के लिए आना हुआ । हर बार की तरह इस बार भी बहुत कुछ बदला बदला मिला । श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और दर्शनों को और अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए पिछ्ले कई दशकों से कोई न कोई बड़ा परिवर्तन हरबार देखता ही चला आ रहा हूं। नहीं परिवर्तित हो रही तो वह है सिक्खों की सेवा की प्रवृति। कहीं कोई पंडा पुरोहित नहीं, कहीं कोई वीआईपी दर्शन नहीं। पूरे परिसर में ले देकर दान के लिए बस दो गोलक, एक ग्रंथ साहिब के पास और एक परिक्रमा स्थल पर। आप प्रसाद दस रुपए का लें अथवा लाख रुपए का कढ़ाह डोने में उतना ही मिलेगा। कहीं कोई भेदभाव नहीं और कहीं अमीर को गरीब पर वरीयता नहीं। सैंकड़ों साल पहले गुरू नानक और अन्य गुरुओं ने जो शिक्षा दी उसी के अनुरूप स्त्री-पुरूष, अमीर-गरीब, ऊंच- नीच और धर्मी- अधर्मी का कोई भेद नहीं। संगत और पंगत के सिद्धांत के अनुरूप सभी एक साथ एक ही सरोवर में स्नान करो, एक साथ बैठ कर भोजन करो और फिर एक साथ बैठ कर प्रभु का सुमिरन करो। 


हालांकि धर्म कर्म में मेरा अधिक विश्वास नहीं है मगर पारिवारिक माहौल और संस्कारों के चलते सभी धर्मों के अधिकांश धार्मिक स्थलों पर हो आया हूं। लगभग सभी जगह गंदगी और अव्यवस्था का बोलबाला और अमीर गरीब का भेद नजर आया । 

बेशक चर्च भी खुद को संभाले हुए हैं मगर उनकी मंशा को इस देश में हमेशा से शक की नज़र से देखा गया है। ले देकर गुरुद्वारे ही बचे हैं जहां अभी तक कोई रोग नहीं लगा है। हालांकि अन्य धर्मों के मुकाबले सिख नया धर्म है और चंद सौ वर्षों में बड़ी कुरीतियां अपनी जड़ें जमा भी नहीं पातीं मगर सेवा और भक्ति की परम्परा से सिख कौम इंच भर भी विचलित होती दिखाई नहीं देती। कोरोना काल और अन्य आपदाओं के समय भी सिक्खों ने समाज की सेवा में बढ़ चढ़ कर हाथ बंटाया है।

 काश हिंदू धर्म के रहनुमा भी इनसे सीखें और पूजा पाठ के अतिरिक्त इंसानियत की सेवा में भी कुछ योगदान दें। क्या ही अच्छा हो कि हमारे मठ और बड़े मंदिर अपनी अरबों खरबों रुपए की दौलत सरकार को सौंप दें और देश की माली हालत को सुधारने में एक सकारात्मक भूमिका निभाएं। 

चलिए ये भी नहीं तो कम से कम भगवान के दर्शनों के नाम पर पैसे तो न वसूलें । गरीब को भी तो थोडा बहुत सम्मान दें और फिर बेशक जितना चाहें अमीर और ताकतवर के चरणों में लोट लगाएं।

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022

डॉक्टर . एम. शेषन को श्रद्धांजलि

 डॉ. एम. शेषन को श्रद्धांजलि

 


खतौली, 22 अक्टूबर, 2022।

आज 'साहित्य मंथन' के तत्वावधान में तमिल भाषी विद्वान और भारतीय हिंदी आंदोलन के समर्थ कार्यकर्ता डॉ. एम. शेषन के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एक आयोजन संपन्न हुआ। इसमें हैदराबाद से पधारे प्रो ऋषभदेव शर्मा ने विस्तार से डॉ. एम. शेषन का परिचय दिया और उनकी हिंदी सेवा के साथ ही तमिल और हिंदी के बारे में जो तुलनात्मक अध्ययन हुआ है, उसके महत्वपूर्ण बिंदुओं की ओर सबका ध्यान खींचा। प्रो. ऋषभ ने इस बात पर बहुत बल दिया कि डॉ. एम. शेषन ने  हिंदी साहित्य में रीतिकाल और तमिल साहित्य की रीति परंपरा के बीच संबंध की जो अवधारणा प्रस्तुत की थी, उस पर गंभीर शोध किए जाने की आवश्यकता है।


 इस अवसर पर डॉ. एम. शेषन के खतौली पधारने की घटना का स्मरण दिलाते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लेखक जसवीर राणा ने यह प्रतिपादित किया कि जब शेषन जी हिंदी सेवी टी. एस. राजु शर्मा और प्रो. एन. सुंदरम म के साथ खतौली पधारे थे, तो उनकी स्पष्टवादिता तथा सहज व्यवहार ने सभी को प्रभावित किया था। उस समय उन्होंने उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच संबंध को हिंदी भाषा तथा साहित्य के सहारे अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया था, इसीलिए शेषन जी उत्तरापथ और दक्षिणापथ के मिलन को महत्व देने वाले राष्ट्रभक्त थे। जसवीर राणा ने उनके निधन को पूरे हिंदी आंदोलन और भारतीय भाषाओं की क्षति माना।


वरिष्ठ कवि-समीक्षक प्रो. देवराज ने इस अवसर पर डॉ. एम. शेषन के साथ अपने बरसों के संबंध को याद किया और यह कहा कि भारतीय साहित्य और हिंदी भाषा को मजबूत बनाने के लिए तथा सभी भारतीय भाषाओं की समृद्धि के लिए डॉ. एम. शेषन ने जो तुलनात्मक अध्ययन किया तथा अपने लेखन के माध्यम से हिंदी और तमिल के पाठकों को इन दोनों भाषाओं के साहित्य का जो ज्ञान दिया, वह कभी नहीं भुलाया जा सकता।


साहित्य मंथन के इस आयोजन में यह भी याद किया गया कि डॉ. एम. शेषन को हिंदी भाषा के प्रति रुचि तो अपने प्रारंभिक दिनों से ही हो गई थी, लेकिन उसका गहरा ज्ञान उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ. शिव प्रसाद सिंह के संपर्क में आकर अर्जित किया। आचार्य द्विवेदी ने अपने इस महान शिष्य को संस्कृति की ज़मीन से जोड़ने का जो कार्य किया था और भारतीयता को समझने की जो योग्यता दी थी, उसका शेषन जी ने सफल प्रयोग भारत की राष्ट्रीय चेतना को समृद्ध बनाने में किया। श्रद्धांजलि सभा के अंत में 2 मिनट का मौन रखकर शेषन जी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। 000


प्रेषक- 

जसवीर राणा

अध्यक्ष, #साहित्यमंथन, खतौली।

सोमवार, 24 अक्टूबर 2022

क्यों कायस्थ 24 घंटे के लिए नही करते कलम का उपयोग

 प्रस्तुति - शैलेन्द्र किशोर जारुहार 


जब भगवान राम के राजतिलक में निमंत्रण छुट जाने से नाराज भगवान् चित्रगुप्त ने रख दी  थी कलम !!उस समय परेवा काल शुरू हो चुका था, परेवा के दिन कायस्थ समाज कलम का प्रयोग नहीं करते हैं  यानी किसी भी तरह का का हिसाब - किताब नही करते है आखिर ऐसा क्यूँ  है ?

कि पूरी दुनिया में कायस्थ समाज के लोग  दीपावली के दिन पूजन के  बाद कलम रख देते है और फिर  यमदुतिया के दिन  कलम- दवात  के पूजन के बाद ही उसे उठाते है I


इसको लेकर सर्व समाज में कई सवाल अक्सर लोग कायस्थों से करते है ?

ऐसे में अपने ही इतिहास से अनभिग्य कायस्थ युवा पीढ़ी इसका कोई समुचित उत्तर नहीं दे पाती है I जब इसकी खोज की गई तो इससे सम्बंधित एक बहुत रोचक घटना का संदर्भ हमें किवदंतियों में मिला I


कहते है जब भगवान् राम दशानन रावण को मार कर अयोध्या लौट रहे थे, तब उनके खडाऊं को राजसिंहासन पर रख कर राज्य चला रहे राजा भरत ने  गुरु वशिष्ठ को भगवान् राम के राज्यतिलक के लिए सभी देवी देवताओं को सन्देश भेजने की  व्यवस्था करने को कहा I गुरु वशिष्ठ ने ये काम अपने शिष्यों को सौंप कर राज्यतिलक की तैयारी शुरू कर दीं I


ऐसे में जब राज्यतिलक में सभी देवीदेवता आ गए तब भगवान् राम ने अपने अनुज भरत से पूछा भगवान चित्रगुप्त नहीं दिखाई दे रहे है इस पर जब खोज बीन हुई तो पता चला की गुरु वशिष्ठ के शिष्यों ने भगवान चित्रगुप्त को निमत्रण पहुंचाया ही नहीं था जिसके चलते भगवान् चित्रगुप्त नहीं आये I इधर भगवान् चित्रगुप्त सब जान  चुके थे और इसे प्रभु राम की महिमा समझ रहे थे । फलस्वरूप उन्होंने गुरु वशिष्ठ की इस भूल को अक्षम्य मानते हुए यमलोक में सभी प्राणियों का लेखा जोखा लिखने वाली कलम को उठा कर किनारे रख दिया I


सभी देवी देवता जैसे ही राजतिलक से लौटे तो पाया की स्वर्ग और नरक के सारे काम रुक गये थे , प्राणियों का का लेखा जोखा ना लिखे जाने के चलते ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा था की किसको कहाँ भेजे I 

*#तब गुरु वशिष्ठ की इस गलती को समझते हुए भगवान राम ने अयोध्या में भगवान् विष्णु द्वारा स्थापित भगवान चित्रगुप्त के मंदिर ***

( श्री अयोध्या महात्मय में भी इसे श्री धर्म हरि मंदिर कहा गया है धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उसे इस तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होता।) 

*में गुरु वशिष्ठ के साथ जाकर भगवान चित्रगुप्त की स्तुति की और गुरु वशिष्ठ की गलती के लिए क्षमायाचना की, जिसके बाद  भगवान राम के आग्रह मानकर भगवान चित्रगुप्त ने लगभग ४ पहर (२४ घंटे बाद ) पुन: *कलम दवात की पूजा करने के पश्चात उसको उठाया और प्राणियों का लेखा जोखा लिखने का कार्य आरम्भ किया I कहते तभी से कायस्थ दीपावली की पूजा के पश्चात कलम को रख देते हैं और *#यमदुतिया के दिन भगवान चित्रगुप्त का विधिवत कलम दवात पूजन करके ही कलम को धारण करते है*


कहते है तभी से कायस्थ ब्राह्मणों के लिए भी पूजनीय हुए और इस घटना के पश्चात मिले वरदान के फलस्वरूप सबसे दान लेने वाले ब्राह्मणों से  दान लेने का हक़ सिर्फ कायस्थों को ही है I


#श्री_चित्रगुप्त_भगवान_की_जय


आप सभी से अनुरोध है कि इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें जिससे सभी लोगों यमद्वितीया के बारे में जानकारी प्राप्त हो सके ।

शनिवार, 22 अक्टूबर 2022

मुकेश प्रत्‍यूष की कुछ प्रेम-कवितांएं

 


कोशिश 


तुम

हमेशा अकेली नजर आती हो

भट्ठी में फूलती 

एक अदद रोटी की तरह

जिसे पाने के लिए  

उगाता रहा हूं मैं

अपनी हथेलियों पर 

अनगिनत छाले

काफी बचपन से




चिन्ता

  

कल ठीक यहीं पहंचे थे हम

-साथ-साथ चलते हुए

कल ठीक वहीं से शुरू किया था हमने चलना

जहां से चले हैं आज


क्या कल भी पहुंचना होगा हमें

-ठीक यहीं

ठीक वहीं से चलते हुए.


 संशय


न तो गाती हुई नदी थी  

न थिरकता हुआ झरना

न पत्तियों-पंखुड़ियों की जुबिंश से गूंजती हुई वादी

जब पूछा या तुमने

-'आपके साथ जीवन बिताने का निर्णय लेकर

              पछताना तो नहीं पड़ेगा मुझे`

और कहा था मैंने-

'स्वयं से पूछ कर देखो`


नयी-नयी बन रही सड़क थी

धीमी रफ़तार में हचकोले खा-खाकर

चलते टेम्पो में सवार हम

साफ-साफ गहसूस कर रहे थे

-बिछे पत्थरों का तीखापन 

धूलभरी गर्म हवाओं ने गुम कर रखे थे

-आगे के रास्ते

और लगाये थे अनगिनत थपेडे


तो क्या इन्हीं से घबरा कर तुम 

शिकार हो गयी थी संशय का

नहीं तो फिर यह प्रश्न ही क्यों पूछा था तुमने



खूटें सा गड़ा मन


मिले थे जब 

नहीं सुने थे ग्लोबल वार्मिंग जैसे शब्द

न चिन्ता थी कि कैसे कटेगी गर्मी

जो पड़ेगी इस साल पिछली दो सदियों में सबसे ज्यादा

न जानते थे क्या होते हैं ग्रीन हाउस

फिर समझते क्या उसके उत्सर्जन और दुष्प्रभाव


सरसों के खिले फूलों ने करवा दिए थे अहसास 

पाला-लाही के बीच भी बचा है बहुत कुछ


घुंघरु से बजे थे चने 

और तान कर पालें उड़ी थीं नावें

पतंगों से भर गई थी छत

किलकारियों से उमग आया था रोआं एक-एक


बीते दिनों की बातें हैं सब

जानता हूं 


खूंटे सा गड़ा मन 

कूदे लाख - निकले तब ना.




रिश्ता

       

यह कैसा रिश्ता है प्रिय.


तुम खोना चााहती हो

-मेरे गहरे नीले विस्तार में 

किन्तु दौड़ता हूं जब मैं

समेटने को बाहों में तुम्हें अपनी

धवल हो जाता हूं

-तुम्हारी देहयष्टि की तरह


यह कैसा रिश्ता है

रंगना चाहती हो तुम

-मेरे रंग में

और परिवर्तित हो जाता है रंग - मेरा




सुनिश्चित

कठिन  है 

एक अकेली लहर के लिए  

प्रवाह में कहीं रूक पाना

कुछ कह पाना राह में आए चट्टान की छाती पर टेक कर सिर

धुन-बिखर जाती है खुद ही

तट

वह तो किसी लहर का नहीं होता




प्रसंग

      

डाली से टूटे हुए गुलाब

मुझे  अजीब-सी बेचैनी से भर देते हैं

सूखकर झर जाने से पूर्व हजार-हजार डंकों की यातना भोगकर भी

उनके मुस्कुराने की कोशिश

मेरी रगों में मवाद-सा कुछ  भर जाता है

औैर इसीलिए

जब कभी तुमने जूड़े की खातिर

लाने को कहा - एक गुलाब 

मैंने की है कोशिश

बदल जाये  प्रसंग




ठीक ऐसे ही दिन थे


ठीक ऐसे ही दिन थे

जब शुरू की थी हमने यात्रा 

-साथ-साथ


आने-आने को थे : नीम को बौर

पकने-पकने को थे : महुए

और,उनकी गंध में रच-बस कर 

मदमस्त अल्हड़-सी हुई हवा 

उतर आयी थी हमारे नासापुटों तक

और, पैबस्त हो गयी थी

हमारी रक्त-शिराओं में


ठीक ऐसे ही दिन थे

बातों ही बातों में

आ गये थे हम, गंगा-तट तक

जहिर किया था अफसोस

घाट से पानी के दूर चले जाने पर 

फिर मुझे छोड़

फलांगती घुटनों तक पैठ गयी थी तुम

किया था आचमन

और, पल-पल रिक्त होती अंजुरी में

संजो लायी थी चंद-बूंदें

और आपाद-मस्तक पवित्र किया था मुझे

फिर आंखें मींच कर

न जाने किससे और क्या मांगा था आशीर्वाद

और, उसी किसी क्षण में मैंने

घाट की देवी पर चढ़ाये किसी के सिंदूर से

बना दी एक बड़ी-सी बिन्दी

और चूम लिया था उसे

और, पता नहीं क्यों अनमनी हो गयी थी तुम

फिर छीले थे हमने

साथ लाये संतरे

और देर तक करते रहे थे पीछा

-एक दूसरे का


ठीक ऐसे ही दिन थे

गुनगुनी धूप में

समाने लगी थी गुलाल की तुर्शी

और तुमने निकाल कर पर्स में धरा रंग बदलने वाला चश्मा


चढ़ा लिया था आंखों पर

और

पूछा था मुझसे :

कैसे बर्दाश्त कर रही हैं, मेरी आंखें

सूरज का तेज

और यह भी

क्यों नहीं ले लेता मैं भी

मौसम के अनुकूल रंग बदलने वाला चश्मा

ठीक ऐसे ही दिन थे




स्वीकारोक्ति


न जाने किस आवेश में

कल जब तुमने रखे थे

पसीने से तर-बतर मेरी पेशानी पर अपने होठ

तेा सच कहता हूं-

मुझे वे तुलसी-दल से पावन नहीं लगे थे

मंदिर की घंटियों से नहीं गूंजे थे

कानों में धीमे से कहे

-तुम्हारे  शब्द


खुद से लड़ते और भागते मुझे

छुपाने की कोशिश की थी

जब अपने वक्ष-स्थल में

तो गरवइया के बच्चे-सा दुबकने की कोशिश भी

नहीं की थी मैंने गरमाई पाकर

तुम्हारी सूनी मांग को देख

और दिन की तरह

न तो मुझे सागर-तट की याद आयी थी

और न उस पर सर पटकती फेनिल लहरों की

सच कहता हूं-

मेरे नासापुटों में भर गयी थी

सिंकती रोटी-सी गंध

और जागने लगा था

मेरे भीतर सोया राक्षस

अपनी पूरी आदिम प्रवृतियों के साथ




मेरी उदासी

        

एक पहाड़ी धुन सुनी

और मैं उदास हो गया


एक अल्हड़ क्वांरी नदी को

उतरते और झरते देखा 

और मैं उदास हो गया


मैं उदास हो गया-

एक ताजा खिले फूल पर बैठे

मकरंद चूसते भौंरे को देखकर


मैं उदास हो गया-

घुटनों के बल चलते एक बच्चे को मुस्कुराते देखकर


तुम्हारी याद आई

और मैं उदास हो गया




शून्य से शुरू करते हुए


(1)

शून्य से शुरू करते हुए अपनी यात्रा 

फिर से

सोचता हूं-

क्यों लौट गयी थी तुम

अकेली

साथ-साथ दूर तक चलकर


अच्छी तरह याद है मुझे

असमय हुई बारिश के गुजर जाने के बाद

खुले में आकर

तुम्हारी बायीं हथेली पर

तुम्हारी ही दी कलम से हस्ताक्षर किया था मैंने-मुकेश प्रत्यूष

और उसके ठीक नीचे

लिखा था तुमने अपना नाम


ठीक उसी क्षण

सात-सात रंगों में बांटती सूरज की रोशनी को 

न जाने कहां से टपक गयी थी-एक बूंद

लिखे हमारे नामों के उपर


साक्षी है : आकाश

साक्षी हैं : धरती और दिशाएं

कि कुछ कहने को खुले थे तुम्हारे होठ

किन्तु रह गये थे कांप कर

भर आयी थीं आंखें

फिर अचानक भींच कर मुठ्ठी, मुडकर भागती चली गयी थी तुम

और विस्मित-सा खड़ा मैं रह गया था

यह तय करता - क्या और क्यों ले गयी बंधी मुठ्ठी में

हमारा नाम

या वह बूंद जो साक्षी था हमारी सहयात्रा का

शून्य से शुरू करते हुए


(2)

शून्य से शुरू करते हुए अपनी यात्रा

-फिर से

चाहता हूं : तुम्हे याद नहीं करूं

भूलना चाहता हूं तुम्हें

गंगा की उन लहरों की तरह

जिनकी बूंदों से अभिसिंचित करने को मुझे

भरी थी तुमने अंजुरी

और रिक्त हो वह

इससे पहले ही तय कर ली थी उन लहरों ने

एक लम्बी यात्रा

उसी किसी क्षण में

लगा दिया था मैंने एक गहरा लाल टीका सीमान्त पर 

पहले  घबराये और फिर ठठाकर हंसे थे हम

यह सोचकर और बताकर कि क्या होता

अगर फैलता हुआ वह पंहुच जाता

क्वांरी-सूनी मांग तक


चाहता हूं भूलना; किन्तु यही नहीं भूल पाता


सच  कितना कठिन है

भोगे किसी क्षण को

अपनी पूरी जीवनऱ्यात्रा में भूल पाना

तो क्या 

मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाउंगा – प्रिय ?




पहल किसने की


सपनों से डरता हुआ मैं

देखता हूं-

न जाने कितने-कितने सपने


कभी देखता हूं-

मैं बुन रहा हूं

   -सिर पर एक अदद आसमान

और, तुम भर रही हो रंग उसमें

पसंद के अपनी - नीला, गहरा नीला और सफेद


जब मैं बुन चुका होता हूं आसमान

और भर चुकी होती हो तुम रंग उसमें

हम उगाते हैं : तारे 

और दीखने भर रौशनी दे देते हैं उसे


हम उगाते हैं : चांद

और देते हैं रौशनी उतनी

जितनी में देख सकें एक-दूसरे को


फिर हम उगाते हैं : सूरज

और चाहते हैं दे देना

   -ढेर सारी रौशनी उसे

ताकि देख सकें साफ-साफ 

जहां तक दीख जाए


रौशनी पाते-पाते गर्म हो जाता है सूरज

हम सह नहीं पाते उसका तेज

भागते हैं हम

-अपने ही बुने, रंग भरे आसमान के नीचे से 

और आकर उसकी हद से बाहर 

चाहते हैं तय करना

-भागने की पहल किसने की 

अचानक हमारे सामने आ जाता है -एक आदमकद शीशा 

और हम नापने लगते हैं - अपनी-अपनी उंचाइयां उसमें

तभी शीशे  से निकलते हैं

-दो,लम्बे-लम्बे, हाथ वर्जनाओं के

एक में होता है ढेर-सारा संशय-रत्न

तराशे हुए सलीके से

चौधियाने लगती हैं, हमारी आंखें

खुद को रोक नहीं पाती हो तुम

उठा लेती हो कई एक 

और करने लगती हो कई-कई सवाल खुद से 


इसी बीच शीशे से निकला दूसरा हाथ

उठाकर, उछाल देता है मुझे – सुदूर ;  शून्य विस्तार में


अचानक दिखायी देती है

-मेरी ही हथेली

लटकती बिना किसी सहारे के

मिट गयी हैं - उसकी सारी की सारी रेखाएं

देखकर उदास नहीं होता हूं मैं

-मुझे याद है; रोटी की जुगाड़ की कोशिशें


तभी न जाने कहां से आ जाता है

एक धारदार हथियार

मेरे शेष बचे दूसरे हाथ में 

मैं आर्केमीडिज की तरह चिल्ला उठता हूं

और उभारने लगता हूं रेखाएं

बारी-बारी से अपनी हथेली में

      धन की; आयु की; पे्रम की.  खूनेखून हो जाती है मेरी हथेली

किन्तु, रेखाएं तब भी नजर नहीं आतीं

नजर आता है : सिर्फ खून-ही-खून; खून-ही-खून




विश्वास


 मैं कौधूंगा स्मृतियों में

 दूर-दराज से आए और घनीभूत हुए बादल

 बिखरेंगे जब बूंद-बूंद होकर 

 पैरों तले से फूटेगी और नासापुटों में भर जाएगी 

 बिसरी हुई एक चिन्ही-सी गंध

 मैं कौधूंगा 


 जब चूएंगे महुए

 झरेंगे हरसिंगार एक पूरी रात की अनवरत प्रतीक्षा के बाद

 मैं कौधूंगा 


 जब लिखेगा कोई प्रेम-पत्र

 घुटरुन लपकेगा कोई बच्चा

 आरी की तीक्ष्णता-सी 

मैं कौधूंगा, जरुर कौधूंगा

-स्मृतियों में . 




स्मृतियों का दरवाजा मेरा


स्मृतियों का दरवाजा मेरा

है रंगा 

चटख लाल पाढ़ वाले सफेद रंग से


डाल वहीं कुर्सी

बैठा हूं मैं - काल से अनन्त

देखता बूंदें टपकती  


है नहीं चौड़ी हैंडिल कुर्सी  की 

मजबूत भी नहीं

फिर भी 

निकल आ बैठती  हो  

फेरती उंगलियां 

जाती हैं धीरे से  जकड़ती


होता नहीं कुछ भी सायास

प्रत्यक्ष भी नहीं

सपनों में गड्ड-मड्ड 

रहती है होती 

सफेदी

दिखती है चांदनी  मटमैली

गुजरता है जब ठीक चांद के बगल से 

एक पक्षी सिकोड़े पंख 

गर्दन उठाए 


बिखर जाती हैं आहिस्ते से बूंदें

छिटकते  ही अलग जलधार से 

टपकते नभ या आंखों से

झलक जाती हैं बूंदें

लिखा जा सकता है कुछ भी सफेदी पर


यादों के सहारे


हो गई है दूर 

उत्सुक- प्रश्‍नकुल रहती थीं जो आंखें

उच्चरित होने से पहले शब्‍द 

रह जाते थे अक्सर कांप कर ही जिस पंखुरी पर 

तैरती रहती थी गंध जिसकी देहयष्टि की हवा में

भूल दिन-दोपहरी की चिन्ता 

छूटती थी जो कहानी   गंगा के किनारे 

सलवटों सी हर बार होती वह नई थी

 रह पाता था कब  विन्यास ही थोड़ा संभलकर  

 छोड़कर पतवार  लहरों पर तिरे थे

उकेरे कुछ निशान भी रेत पर ही

चीर संतुष्‍टि की सतह को 

उभर आते हैं वो सभी  

अक्सर यादों के सहारे



बेजान  सुधियों के 


हो गया मुहरबंद 

लगा कील  

दरवाजा ऊंचा परकोटे का


निकल नहीं पाया मैं

रहते समय


रह गया खड़ा देखता 

विस्मित गुजरता समय


चली गई  जकड़ती 

लताएं

बेड़ियो  से ज्यादा सखत और मजबूत 

करुं नहीं पाऊं मैं कोशिश 

मुक्ति की इससे

हैं हो गए तैनात 

असंख्‍य पहरेदार  परिधि पर


बस रह गए हैं साथ मेरे   

लगे दीमक 

स्मृतियों के खुले गवाक्ष 

आते हैं रह-रहकर उन्हीं  से 

झकोरे 

और जाते हैं पलट 

पन्ने 

बेजान सुधियों के 



आमंत्रण 


सपनों की राह में बनने लगे हैं गड्ढे


बरस रही है 

इस बार फिर आसमान से 

आग

रातों में भी चल रही है लू

खोलकर शरीर का रोयां-रोयां 

धरती कर रही जद्दोजह‍द जिन्‍दगी की 

चल रही है धूल भरी आंधी 

आसार नहीं है कि होगी इस बार भी मौनसून से मुलाकात 

घाट से दूर चली गई है गंगा

उदास हैं देवी महीनों से चढ़ाया नहीं है किसी ने सिंदूर


आओ कि बिछ गई हैं नीमकौडि़यां

फट रहे जामून

और रह-रह कर चू रहे महुए

आओ कि मुश्किल हो रहा है 

पहचानना हवाओं में मिली गंध को 

धधकती रेत पर आचमन की प्रतीक्षा में खड़ा मैं 

लिख लिख कर हवा में मिटा रहा हूं तुम्‍हारा नाम

आओ कि देखकर भी इस बार देख नहीं पाउंगा तुम्‍हारा देखा हुआ चेहरा 

संकल्‍प है नहीं करूंगा इस बार हस्‍ताक्षर भी तुम्‍हारी हथेली पर तुम्‍हारी ही दी कलम से 

आओ कि विदा का वक्‍त है

कहो कि शुभ हो यह अंधेरे से अंधेरे की यात्रा 

जानते हुए भी कहा झूठ 

कहो कि होगा पाथेय 

आओ कि 

चाहिए ही अब तुम्‍हें आना 







*मुकेश प्रत्यूष

 3G जानकीष मंगल इंक्‍लेव,  

पूर्वी बोरिंग कनाल रोड, 

 निकट पंचमुखी मंदिर, 

 पटना 800 001

O

मोबाईल  :  

                                 

 +91 9431878399     

ईमेल : mukeshpratyush@gmail.com


कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...