शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2022

रवि अरोड़ा की नजर से

 सिक्खों से कुछ सीखो जी  /  रवि अरोड़ा




दीपावली पर इस बार स्वर्ण मन्दिर अमृतसर में था। इस बड़े त्योहार के चलते हरि मंदिर साहब को रंग बिरंगी खूबसूरत लाइटों से भरपूर सजाया गया था । दिवाली और छुट्टी का दिन होने के कारण परिसर में बेहद भीड़ थी मगर फिर भी कहीं धक्का मुक्की, आपा धापी अथवा किसी किस्म की अव्यवस्था नज़र नहीं आई। दुनिया की सबसे बड़ी सामुदायिक किचन यानि गुरू राम दास रसोई में अटूट लंगर सदा की तरह निर्बाध चल रहा था। आमतौर पर इस लंगर में प्रति दिन एक लाख लोग निशुल्क खाना खाते हैं मगर त्यौहार के चलते यह संख्या अनुमानित तौर पर डेढ़ गुना अधिक तो रही ही होगी मगर फिर भी कहीं कोई बदइंतजामी नजर नहीं आई। जिसे देखो वही हाथ जोड़े भक्ति भाव में खड़ा था और सेवा कार्यों में जुटे लोग भी हाथ बांधे खड़े थे मगर सहयोग के लिए । सिर्फ हरि मन्दिर साहिब की ही बात क्यों करें, देश दुनिया का ऐसा कौन सा गुरुद्वारा है जहां ऐसा दृश्य प्रति दिन दिखाई न देता हो। 


इस बार कई सालों के बाद स्वर्ण मंदिर दर्शन के लिए आना हुआ । हर बार की तरह इस बार भी बहुत कुछ बदला बदला मिला । श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और दर्शनों को और अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए पिछ्ले कई दशकों से कोई न कोई बड़ा परिवर्तन हरबार देखता ही चला आ रहा हूं। नहीं परिवर्तित हो रही तो वह है सिक्खों की सेवा की प्रवृति। कहीं कोई पंडा पुरोहित नहीं, कहीं कोई वीआईपी दर्शन नहीं। पूरे परिसर में ले देकर दान के लिए बस दो गोलक, एक ग्रंथ साहिब के पास और एक परिक्रमा स्थल पर। आप प्रसाद दस रुपए का लें अथवा लाख रुपए का कढ़ाह डोने में उतना ही मिलेगा। कहीं कोई भेदभाव नहीं और कहीं अमीर को गरीब पर वरीयता नहीं। सैंकड़ों साल पहले गुरू नानक और अन्य गुरुओं ने जो शिक्षा दी उसी के अनुरूप स्त्री-पुरूष, अमीर-गरीब, ऊंच- नीच और धर्मी- अधर्मी का कोई भेद नहीं। संगत और पंगत के सिद्धांत के अनुरूप सभी एक साथ एक ही सरोवर में स्नान करो, एक साथ बैठ कर भोजन करो और फिर एक साथ बैठ कर प्रभु का सुमिरन करो। 


हालांकि धर्म कर्म में मेरा अधिक विश्वास नहीं है मगर पारिवारिक माहौल और संस्कारों के चलते सभी धर्मों के अधिकांश धार्मिक स्थलों पर हो आया हूं। लगभग सभी जगह गंदगी और अव्यवस्था का बोलबाला और अमीर गरीब का भेद नजर आया । 

बेशक चर्च भी खुद को संभाले हुए हैं मगर उनकी मंशा को इस देश में हमेशा से शक की नज़र से देखा गया है। ले देकर गुरुद्वारे ही बचे हैं जहां अभी तक कोई रोग नहीं लगा है। हालांकि अन्य धर्मों के मुकाबले सिख नया धर्म है और चंद सौ वर्षों में बड़ी कुरीतियां अपनी जड़ें जमा भी नहीं पातीं मगर सेवा और भक्ति की परम्परा से सिख कौम इंच भर भी विचलित होती दिखाई नहीं देती। कोरोना काल और अन्य आपदाओं के समय भी सिक्खों ने समाज की सेवा में बढ़ चढ़ कर हाथ बंटाया है।

 काश हिंदू धर्म के रहनुमा भी इनसे सीखें और पूजा पाठ के अतिरिक्त इंसानियत की सेवा में भी कुछ योगदान दें। क्या ही अच्छा हो कि हमारे मठ और बड़े मंदिर अपनी अरबों खरबों रुपए की दौलत सरकार को सौंप दें और देश की माली हालत को सुधारने में एक सकारात्मक भूमिका निभाएं। 

चलिए ये भी नहीं तो कम से कम भगवान के दर्शनों के नाम पर पैसे तो न वसूलें । गरीब को भी तो थोडा बहुत सम्मान दें और फिर बेशक जितना चाहें अमीर और ताकतवर के चरणों में लोट लगाएं।

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