रविवार, 17 अप्रैल 2022

पेन्सिल के गुण -

 ★★★ हम सभी को सीखने की जरूरत है

पेन्सिल के गुण, एक सन्देश – प्रेरक प्रसंग, 


★एक बालक अपनी दादी मां को एक पत्र लिखते हुए देख रहा था। 


अचानक उसने

अपनी दादी मां से पूछा,” दादी मां !” क्या आप मेरी शरारतों के बारे में लिख रही हैं ?

आप मेरे बारे में लिख रही हैं, ना “यह सुनकर उसकी दादी माँ रुकीं और बोलीं ,


” बेटा मैं लिख तो तुम्हारे बारे में ही रही हूँ, लेकिन जो शब्द मैं यहाँ लिख रही हूँ

उनसे भी अधिक महत्व इस पेन्सिल का है जिसे मैं इस्तेमाल कर रही हूँ।


मुझे पूरी आशा है कि जब तुम बड़े हो जाओगे तो ठीक इसी पेन्सिल की तरह होगे ।”


यह सुनकर वह बालक थोड़ा चौंका और पेन्सिल की ओर ध्यान से देखने लगा,

किन्तु उसे कोई विशेष बात नज़र नहीं आयी। वह बोला, “किन्तु मुझे तो यह पेन्सिल

बाकी सभी पेन्सिलों की तरह ही दिखाई दे रही है।”

इस पर दादी माँ ने उत्तर दिया, “बेटा ! यह इस पर निर्भर करता है कि तुम चीज़ों को

किस नज़र से देखते हो। इसमें पांच ऐसे गुण हैं, जिन्हें यदि तुम अपना लो तो तुम

सदा इस संसार में शांतिपूर्वक रह सकते हो।


पाँच गुण जो हमें सीखना चाहिए-

पहला गुण : तुम्हारे भीतर महान से महान उपलब्धियां प्राप्त करने की योग्यता है,

किन्तु तुम्हें यह कभी भूलना नहीं चाहिए कि तुम्हे एक ऐसे हाथ की आवश्यकता है जो

निरन्तर तुम्हारा मार्गदर्शन करे। हमारे लिए वह हाथ ईश्वर का हाथ है जो सदैव

हमारा मार्गदर्शन करता रहता है।


दूसरा गुण : बेटा ! लिखते, लिखते, लिखते बीच में मुझे रुकना पड़ता है और फ़िर कटर से

पेन्सिल की नोक बनानी पड़ती है। इससे पेन्सिल को थोड़ा कष्ट तो होता है, किन्तु बाद में

यह काफ़ी तेज़ हो जाती है और अच्छी चलती है। इसलिए बेटा ! तुम्हें भी अपने दुखों,

अपमान और हार को बर्दाश्त करना आना चाहिए, धैर्य से सहन करना आना चाहिए।

क्योंकि ऐसा करने से तुम एक बेहतर मनुष्य बन जाओगे।


तीसरा गुण : बेटा ! पेन्सिल हमेशा गलतियों को सुधारने के लिए रबर का प्रयोग करने की

इजाज़त देती है। इसका यह अर्थ है कि यदि हमसे कोई गलती हो गयी तो उसे सुधारना

कोई गलत बात नहीं है। बल्कि ऐसा करने से हमें न्यायपूर्वक अपने लक्ष्यों की ओर

निर्बाध रूप से बढ़ने में मदद मिलती है।


चौथा गुण : बेटा ! एक पेन्सिल की कार्य प्रणाली में मुख्य भूमिका इसकी बाहरी लकड़ी

की नहीं अपितु इसके भीतर के ‘ग्रेफाईट‘ की होती है। ग्रेफाईट या लेड की गुणवत्ता

जितनी अच्छी होगी, लेख उतना ही सुन्दर होगा। इसलिए बेटा ! तुम्हारे भीतर क्या हो रहा है,

कैसे विचार चल रहे हैं, इसके प्रति सदा सजग रहो।


अंतिम गुण : बेटा ! पेन्सिल सदा अपना निशान छोड़ देती है। ठीक इसी प्रकार तुम

कुछ भी करते हो तो तुम भी अपना निशान छोड़ देते हो।अतः सदा ऐसे कर्म करो

जिन पर तुम्हें लज्जित न होना पड़े अपितु तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का सिर

गर्व से उठा रहे। अतः अपने प्रत्येक कर्म के प्रति सजग रहो।


पेन्सिल के याद रखने योग्य संदेश –

1) हमेशा याद रखें कि आपके अंदर जो है वह आपके बाहर की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है। (ग्रेफाइट का हिस्सा)


2) कोई भी गलती स्थायी नहीं होती, उसे मिटाया जा सकता है।


3) खुद का सबसे अच्छा संस्करण बनने के लिए सामने आने वाले हर कष्ट, अपमान, हार को सहना होगा और ऐसा करना हमारी जरूरत है।


4) यदि आप मुसीबत में फंस जाते हैं, तो आप पहले की अपेक्षा और मजबूत हो जाते हैं।


5) आप जो कुछ भी कार्य करें. उसे इस तरह करें कि वह कार्य आपकी छाप से जाना जाए ।


6) आप कुछ भी नहीं हैं, आप उतने ही शक्तिशाली हैं जितना कि वह हाथ जो आपका उपयोग करता है। इसलिए हमेशा अच्छे हाथों में रहें।


       !!!!! इति, सम्पूर्णम !!!!!

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

दो ग़ज़लें / प्रेम रंजन अनिमेष*

 *गली तो याद है...*


                        🍁 ग़ज़ल 🍁

                                   ~ *प्रेम रंजन अनिमेष*

                               🈴

गली  तो  याद है  लेकिन  मकां  मैं  भूलूँगा

तुम्हारा  घर  वहीं  निकले  जहाँ  मैं  भूलूँगा


ख़ामोशियों  की  ज़ुबानें  कई  पता  तुमको

तुम्हारे  साथ  में  अपनी  ज़ुबां   मैं  भूलूँगा


हैं जितनी  सूनी निगाहें ये  उतनी ही  गहरी

जो  इनमें  डूब  गया   दो  जहां  मैं  भूलूँगा


बहुत  बड़ी  है  ये  दुनिया  मगर  है अंदाज़ा

ख़ुद अपनी ख़लवतों के दरमियां मैं भूलूँगा


ख़ुशी  न  पूछो   अगर  प्यार  पूछ  ले  कोई

कि दिल के शोर में  कहना भी हाँ मैं भूलूँगा


ये   ज़िंदगी   तो    मुहब्बत   बग़ैर    बेमानी

किसी के जिस्म में कब अपनी जां मैं भूलूँगा


चमन को भूल गया और वतन भी भूल गया

कहा  तो  था  न  कभी आशियां  मैं  भूलूँगा


मेरी   रगों  में   तेरा  दूध   दौड़ता   हर  पल

भला कभी तुझे  किस तरह  माँ  मैं  भूलूँगा


क़फ़स में आज है  दिल को क़रार सा कैसा

उड़ान  भूला  हूँ   अब  आसमां   मैं  भूलूँगा


वो प्यार  है सही  सब कुछ  नहीं वही  प्यारे

न  एक  गुल के  लिए  गुलसितां  मैं भूलूँगा


तुम्हारे  होंठ   ये   'अनिमेष'   काम   आयेंगे

जो  कहते  कहते   कहीं  दास्तां  मैं  भूलूँगा

                               🏵️

                                ✍️ *प्रेम रंजन अनिमेष*

अनंग की दो ग़ज़लें

"दिन बदलेगा "


कर्म करो तुम,केवल अपना।

निश्चित  होगा , पूरा  सपना।।

कोई कुछ भी कहे ,मौन रह। 

हो जाएगा,तब कुछ कहना।। 

करने  वाले तो , व्यंग करेंगे।

बन जाना है ,तुमको गहना।।

बाधाएं   तो ,   रोकेंगी  पर।

नदियों जैसे , केवल बहना।।

तुम मजबूत , दीवारों  जैसे।

तुमको कभी,नहीं है ढहना।।

जब तक बाजी,जीत न जाओ। 

करते रहो सदा,व्यूह  रचना।।

अडिग रहो,उत्तम विचार हो। 

कभी बुराई में , मत फंसना।। 

आज कष्ट सह लो,तुम लेकिन।

दिन बदलेगा ,कल मत सहना।।

बड़े  परिश्रम , से मिलता है। 

अपना बनके ,दिल में रहना।।

कर्म करो तुम केवल अपना।।..."


अनंग "


*"देना सीखो"*


पास  बैठो  जरा , कुछ  सुनाया करो।

बेवजह भी कभी, आया जाया करो।।


यह  जरूरीब नहीं कि, कोई काम हो।

बिना मतलब के भी तो, बुलाया करो।।


तुम खुली छत पे बैठो तो,अच्छा लगे।

चांद  हो ,  रोशनी  में   नहाया   करो।।


कोई  मासूम  दिख  जाए , रोते  हुए।

पोछकर उसके आंसु,खिलाया करो।।


ज्ञान  के  दीप , बुझने  न  देना  कभी।

खुद पढ़ो, जिनको चहिए,पढ़ाया करो।।


पीढियों  में विचारों का, अन्तर बहुत।

इन बुजुर्गों के संग भी, बिताया करो।।


अपने खाने में रोटी, जरा कम करो।

चंद रोटी झोपड़ियों में, लाया करो।।


प्यार से बढ़ के, दुनिया में कुछ भी नहीं।

खुद  बहो , दूसरों  को  बहाया  करो।।


मांगने से तो इज्जत है,मिलती नहीं।

देना  सीखो , सदा मुफ्त पाया करो।।...

*"अनंग"*

बुधवार, 13 अप्रैल 2022

आदिवासी जीवन और साहित्य / विद्याभूषण

 आज पटना से श्रीराम तिवारी का का फोन मिला। उन्हें  'वागर्थ' के अप्रील अंक में  'आधुनिकीकरण और आदिवासी विमर्श'  पर प्रकाशित परिचर्चा में शामिल मेरे आलेख के कई अंश अच्छे लगे। उस आलेख की मूल प्रति आपसे साझा करते हुए यह बताना जरूरी है कि पत्रिका में इसकी कुछेक पंक्तियां नहीं आ पाई हैं :-


आदिवासी जीवन और साहित्य

( परिचर्चा की अग्रसारित प्रश्नावली के संदर्भ में विमर्शमूलक एक टिप्पणी )


1. कभी न कभी हर जाति का जीवन कबीलाई रहा होगा और इस अर्थ में हर जाति के इतिहास का आदिम चरण विकास क्रम के उसी प्रस्थान बिन्दु पर खड़ा होगा जहां आज आदिवासी कही जाने वाली जातियां दिखलायी पड़ रही हैं। इसी तरह प्रायः हर आदिम समुदाय में, गद्यभाषा और लिपि के विकास से पहले तक, पीढ़ी दर पीढ़़ी छंदबद्ध गीतों और लोककथाओं के माध्यम से ही जातीय जीवन के अनुभवों और ज्ञान का अटूट अन्तरण होता रहा है। यह वाचिक परम्परा हजारों वर्षों से लोक जीवन के नियामक सूत्रों को संरक्षित करती आ रही है। सर्वविदित है कि संस्कृत में गणित और ज्योतिष के सूत्र भी छन्दबद्ध पद्धति से ही संचित हुए हैं। समग्रता में देखें तो हर समुदाय में लिखित साहित्य का अभ्युदय एक परवर्ती विकास है। लोकगीतों और लोककथाओं का उद्भव और संरक्षण इसी सामूहिक सहभागिता की उपज है। आज उनके मूल रचनाकारों की नामतः खोज की कोशिश को एक निरर्थक उद्यम माना जा सकता है। वैसे देवेन्द्र सत्यार्थी, जगदीश त्रिगुणायत और नारायण जहानाबादी जैसे अनेक श्रमसाधकों ने लोककथाओं-लोकगीतों के संग्रह और प्रकाशन का शुभारम्भ बहुत पहले कर दिया था। आज इस अध्याय में नये पन्ने भी जोड़े जा रहे हैं। विश्वविद्यालयों के भाषा विभागों में और निजी प्रयत्नों के जरिए। पिछले दिनों केन्द्रीय विश्वविद्यालय, झारखंड के तत्वावधान में लुप्त होती आदिवासी भाषाओं के अस्तित्व पर केन्द्रित एक लंबे विचार सत्र का संयोजन किया गया था।


2. सच है कि साहित्य में आदिवासी अभिव्यक्ति की केन्द्रीय विधाएं हैं कविता और कथा। विमर्श प्रधान लेखन को मैं महत्वपूर्ण मान देते हुए भी सृजनात्मक साहित्य के दायरे से बाहर रखता हूं। जहां तक आत्मकथा, यात्रावृत्त, संस्मरण, नाटक जैसी विधाओं में आदिवासी कलम की क्रियाशीलता का सवाल है, यह मान लेना चाहिए कि हर भाषा में रचनाकार के अनुभवों के मेल में उपयुक्त विधाओं का चयन एक निजी मामला है। ज्ञानपीठ या साहित्य अकादमी जैसे तमाम बड़े साहित्यिक सम्मानों और पुरस्कारों की तालिका देखी जाये तो इन्हीं विधाओं में रचनात्मकता के शिखर की खोज के बहुसंख्यक नतीजे सामने होंगे। लघुकथा और गजल जैसे साहित्य रूपों की जो प्रतिष्ठा आज सुलभ है, वह पिछले दशकों से पहले अप्राप्त थी। निष्कर्षतः, श्रेष्ठ रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए किसी खास विधा के शिल्प-सांचे का निर्देश अर्थहीन है।

इस सवाल के औचित्य को अगर झारखंड के संदर्भ में परखा जाये तो याद रखना होगा कि इसके लिए आदिवासी रचनाकारों के अनुभव संसार की कोई सीमा नहीं बतायी जा सकती। कई आदिवासी हिन्दी लेखकों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का परिपार्श्व अधिकतर हिन्दी लेखकों से अधिक फैला हुआ है। रामदयाल मुंडा की जीवन यात्रा देश-विदेश की सरहदों से बहुत ऊपर थी। रोज केरकेट्टा गृह मंत्रालय द्वारा गठित झारखंड विषयक समिति में अकेली महिला प्रतिनिधि रहीं, वन्दना टेटे देश की राजधानी समेत सीमान्त राज्यों-क्षेत्रों तक अपने विचार और कार्यक्रमों के लिए निरन्तर गतिशील हैं, जसिन्ता केरकेट्टा की विदेश यात्राओं और अनेक भाषाओं में कृतियों के अनुवाद उनके अनुभवों के व्यापक होने की तस्दीक करते हैं, अनुज लुगुन बिहार के एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं, वाल्टर भेंगरा तरुण पटना में रहते हुए कई दशक पहले आठ वर्षों तक कृत संकल्प नाम की मासिक पत्रिका का संपादन करते रहे और दूरदर्शन में वर्षों तक फोटो जर्नलिस्ट के बतौर काम करते रहे, एक समय दिल्ली के जानेमाने हिन्दी लेखकों के निकट संपर्क में रहीं रांची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की पूर्वअध्यक्ष मंजु ज्योत्स्ना, महादेव टोप्पो सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया के हिन्दी अधिकारी के बतौर अपने सेवा काल में बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम तक यायावरी करते रहे, और ग्रेस कुजूर आकाशवाणी के कई केन्द्रों में निदेशक रहने के बाद दिल्ली में कई साल तक उपमहाप्रबंधक का दायित्व निभाती रहीं। ये कुछ ऐसे दृष्टान्त हैं जो यह बताने के लिए यथेष्ट हैं कि आदिवासी कलमकार देश-देशान्तर के भरपूर अनुभवों से लैस रहे हैं। उन सबकी रचनाओं की अन्तर्वस्तु अगर उनकी आंचलिक जमीन से जुड़ी है और शिल्प उसके मेल में गढ़ा हुआ है तो बेशक यह उनके कथन-चयन की प्राथमिकता है, न कि देश-दुनिया के बारे में उनकी समझ की सीमा।


3. विकास की अवधारणा अपने आप में घनघोर मतान्तर का मुद्दा है। आदिवासी इलाकों में सड़कों-इमारतों के निर्माण की मार्फत कस्बों-शहरों की संरचनाओं को कुछ लोग विकास का मानक मानते हैं और होंगे। लेकिन आबादी को उजाड़ कर भूखंड के विकास को विनाश का वाहक भी माना जा सकता है। यही स्थिति भूमंडलीकरण की अवधारणा की भी है। आर्थिक उपनिवेशवाद का स्वागत किया जाये या आत्मनिर्भर और विकेन्द्रित अर्थ व्यवस्था को स्वीकार किया जाये? आज का भारतीय नागरिक, आदिवासी भारत भी उसका  एकअनिवार्य अंग है, इसी द्विधाग्रस्त मानसिकता के दोराहे पर खड़ा है। क्या चुनें या किसे छोड़ दें?

सन 2000 में अलग राज्य के गठन से पहल, झारखंड आन्दोलन के दौर में, केन्द्र और बिहार सरकार  की विकास योजनाओं और बजट आबंटन को इस अंचल में उपनिवेशवादी करार दिया जाता था। राजनीतिक हलकों में कहा जाता था कि इस प्रदेश की हरियाली प्रवासी लोगों के लिए चारागाह बन गयी है। वह बहस जनवादी विकास बनाम धनवादी विकास के फलक पर जारी रही। झारखंडी अस्मिता को सबसे बड़ी चुभन इस अनुभव से होती रही है कि नगरीकरण, औद्योगीकरण, बड़ी बांध परियोजनाएं, वन संपदा का विनाश और खनिज संपदा के अनियोजित दोहन के कारण बड़े पैमाने पर स्थानीय आबादी को विस्थापन का त्रास झेलना पड़ा है। अपनी बुनियाद सेे, गांव-घर, खेत-खलिहान, आजीविका, समाज और संस्कृति से उजड़ने की पीड़ा इतने रूपों और स्तरों पर पसरी रही है कि विकास की सरकारी अवधारणा और उसके क्रियान्वयन को विनाश का वाहक मान लिया  गया। उपनिवेशी विकास की यह संरचना इस इलाके में अस्तित्व और अस्मिता के लिए गंभीर संकट बन कर लंबे समय तक हावी रही। आज भी यह स्थिति कमोबेश जारी है। शहरों, कस्बों और औद्योगिक क्षेत्रों में जितनी चमक-दमक दिखती है, उससे दूर व अनजान है ग्रामीण अंचलों का अंधेरा। आबादी के बीहड़ में नये पैरों की बढ़ती हलचलों की ताजा मिसाल है झारखंड में क्षेत्रीय भाषा और स्थानीय/रोजगार नीति पर भारी विरोध-प्रदर्शन और आबादी के मान्य घटकों में दावों-प्रतिदावों की होड़।


4. इस प्रश्न को परम्परा और आधुनिकीकरण के टकराव से जोड़ कर भी देखा जा सकता है। आजादी के बाद  भारतीय अर्थतंत्र को कृषि आधारित व्यवस्था से निकाल कर औद्योगिक विकास के रास्ते पर ले जाने का फैसला आदिवासी अंचलों के लिए खास असर डालने वाला साबित हुआ। उद्योगों के लिए कच्चा माल और खनिज इन्हीं क्षेत्रों में अकूत सुलभ थे। लिहाजा जंगलों और पहाड़ों का सन्नाटा टूटा और कल तक उपेक्षित रहे दुर्गम क्षेत्र नयी आर्थिक-औद्योगिक हलचलों के केन्द्र बनते गये। इस तरह इन इलाकों में कथित आधुनिकीकरण का राजमार्ग खुला। नये नगर और कस्बे बनने लगे, ढेर सारी खनन परियोजनाएं चालू हुईं, सुगम यातायात के लिए सड़कें और रेल मार्ग तैयार हुए। उद्योगों और परियोजनाओं को संचालित करने वाला तकनीकी और प्रशासनिक ढांचा बना। अफसरों और कामगारों का संजाल क्रियाशील हुआ। पंचायती राज कायम हुआ और प्रखंड विकास कार्यालय नयी व्यवस्था लादने लगे। उन्हीं दिनों अनेक सरकारी-गैरसरकारी संस्थान और संगठन भी सक्रिय हुए।

इन तमाम गतिविधियों के चलते नयी आबादी के आने-बसने की रफ्तार तेज हुई और एक अजनबी कार्यसंस्कृति से आदिवासियों का परिचय हुआ। नतीजतन शिक्षा और रोजगार के आरक्षण-अवसरों का लाभ उठाते हुए जनजातीय समुदायों में एक नया मध्यवर्ग उठ खड़ा हुआ। इसी दौर में स्थानीय आबादी को विस्थापन के दंश का अपूर्व अनुभव मिला। परम्परा की विरासत से जुड़े आदिवासी जन इस नयी व्यवस्था में अपने को मिसफिट पाने लगे। परिणामतः विकास की पूरी अवधारणा तीखे सवालों के घेरेे में आ गयी। झारखंड आन्दोलन की पृष्ठभूमि में इस ऐतिहासिक बदलाव के असरदार निशान खोजे जा सकते हैं।

क्या इसे आधुनिकता के अभ्युदय का मान दिया जा सकता है? क्या आदिवासी आबादी के एक छोटे से तबके को सरकारी कार्यालयों और औद्यागिक प्रतिष्ठानों में तीसरे व चौथे दर्जे की नौकरियों में जगह पा लेने को आधुनिकीकरण की आधारभूूमि के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? बेशक इस ऐतिहासिक मोड़ के बाद आदिवासियों के बीच शिक्षा और रोजगार की पात्रता धीरे-धीरे विकसित होती गयी। परिवर्तन के इस दौर ने आदिवासी समाज को नये विचारों और संस्कारों से जुड़ने के अवसर भी दिये। लेकिन परम्परा और आधुनिकता के बीच टकराव की स्थितियां आज भी प्रभावी हैं। इस दिशान्तर के विवेचन और व्याख्या के लिए संस्कृति के समाजशास्त्र की एक पूरी परिक्रमा जरूरी है। सिर्फ इस बुनियाद पर आदिवासियों के मानसिक बदलाव की पहचान किसी संक्षिप्त चर्चा से परिभाषित नहीं हो सकती।


5. जब इस बड़े देश में, अरुणाचल से केरल तक और झारखंड से गुजरात तक, मूल्य परम्परा, आस्था और आहार से आचार तक की कसौटियों पर आदिवासी जीवन शैली एक समान नहीं है, तो इस वि-सम सांस्कृतिक धरातल पर उनके साहित्य का स्वर एक कैसे हो सकता है! जब सिर्फ झारखंड प्रदेश में कथाकार हांसदा सोवेन्द्र शेखर और पीटर पॉल एक्का की समाज दृष्टि एक दूसरे से अलहदा है तो समग्र आदिवासी लेखन को एक ही लय में कैसे समेटा जा सकता है? रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित संकलन-पुस्तक ‘आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी‘ (वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित) में विविध विधाओं में आदिवासी लेखन की वैविध्यपूर्ण बानगी को मानक मान लेने में किसी को एतराज नहीं हो सकता। इसी तरह समकालीन आदिवासी रचनाशीलता के व्यापक रुझानों को  प्रस्तुत करने के लिहाज से वंदना टेटे की पत्रिका ‘अखड़ा‘ के दर्जनों अंक धरोहर की तरह याद आते हैं।


वर्तमान समय में आदिवासी साहित्य की प्रवृत्तियों और उपलब्धियों के बारे में कहने योग्य बातें कई हैं। बात यहां से भी शुरू हो सकती है कि आदिवासी साहित्य किसे कहा जाये? क्या आदिवासी समाज जीवन  पर केन्द्रित गैरआदिवासी लेखकों के साहित्य को भी इस दायरे में रखा जाये या सिर्फ आदिवासी लेखकों द्वारा लिखा जा रहा साहित्य ही यहां प्रासंगिक है? महाश्वेता या संजीव जैसे अनेक लेखकों को किस शिविर में बिठाया जाये? एक और मुद्दा भी फिलहाल चर्चा में है। जैस,े आदिवासी साहित्य वही है जिसमें आदिवासी जीवन दर्शन है।  अभिप्राय यह कि वही आदिवासी लेखन मान्य है जो आदिवासी दर्शन की कसौटी पर खरा उतरे और उसमें विजातीय दृष्टि का हस्तक्षेप नहीं हो। इस मान्यता के अपने पक्ष हो सकते हैं, लेकिन जरूरी सवाल यह भी है कि क्या देशज सृजन का रिमोट अब जीवन दर्शन के नियामक सूत्रों से अनुशासित होगा ? फिर इस ‘दर्शन‘ का दायरा कहां से कहां तक फैला होगा? राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक ? ईसाई, सरना या हिन्दू अवधारणाओं के विवादित परिदृश्य में उसका पहचान योग्य चेहरा कैसा होगा? अभिव्यक्ति की सार्थकता की कसौटी अरस्तू के आचार-विचार के आसपास होगी या मार्क्स, गांधी और बिरसा या फ्रायड-युंग की मान्यताओं के अनुरूप होने की छूट भी मिलेगी? सभी जानते हैं कि इतिहास की प्रयोगशाला में ऐसी कसौटियां कालजीवी नहीं होतीं। अगर इस नजरिए से सिर्फ झारखंड की आदिवासी कविता-कलम को परखा जाये तो रामदयाल मुंडा, ग्रेस कुजूर, रोज केरकेट्टा, मंजु ज्योत्स्ना, निर्मला पुतुल, वंदना टेटे, जसिन्ता केरकेट्टा, सरिता सिंह बड़ाइक, ज्योति लकड़ा, महादेव टोप्पो, अनुज लुगुन और सावित्री बड़ाइक की रचनाओं की जमीन तलाशने के लिए एक से अधिक कसौटियों की जरूरत होगी।

सच है कि वैचारिकता के इन विवादी सुरों के पीछे चिन्ताओं का लंबा काफिला है। अगर खोजी नजर से देखा जाये तो कई सांस्कृतिक चुनौतियों के बीच से गुजरना एक अनिवार्य विवशता है। सच यह भी है कि सांस्कृतिक संदर्भों में इन प्रतिप्रश्नों की अनदेखी नहीं हो सकती। पिछले सौ-सवा सौ वर्षों से देश के आदिवासी अंचलों में औद्योगिक विकास के जो मॉडल लागू हुए हैं, और आज भी कमोबेश जारी हैं, अगर उनके साथ बड़े बांधों और खनन परियोजनाओं को भी जोड़ दें तो कहना होगा कि उनके चौतरफा असर से इन क्षेत्रों के जनजीवन में उजाड़ का मौसम सदाबहार बन गया है। केद्रीय एजेंसियों की ओर से उपभोग और मुनाफे के लिए देशज संसाधनों का बेहिसाब इस्तेमाल आन्तरिक उपनिवेश जैसा ट्रीटमेंट लगे तो अचरज नहीं।

सनद रहे कि हम संस्कृति को रूपंकर कलाओं यानी परफॉर्मिंग आर्ट का संग्रहालय समझने की गलती नहीं करंे चूंकि वह लोकजीवन का मूल्यमान भी है और नैसर्गिक प्रवाह का गतिमान भी। ध्यान दीजिये कि आज सत्ता संस्कृति सभागारों में है जबकि प्रतिरोध की संस्कृति सड़कों पर। इनदिनों जन संस्कृति को अपसंस्कृति के रास्ते पर मोड़ा जा रहा है और मूल संदेशों को छोड़ा जा रहा है। अब मूल प्रश्न की ओर एक बार फिर लौटें। समग्रता में अगर विस्तृत दृष्टि से देखें तो आदिवासी पृष्ठभूमि के साहित्य लेखन के सौ साल अब पूरे हो चुके हैं। निजी और सामाजिक मनोभावों की तमाम विभिन्नताओं के बीच वह आज भी प्रकृति और मनुष्य के आत्मीय लगाव से जुड़ी है। खिलाफ हवाओं से संघर्ष, आक्रोश और प्रतिरोध उसके मिजाज पर तारी हैं।


6. नयी सदी के पिछले दो दशकों में आदिवासी जीवन और साहित्य में युगान्तरकारी परिवर्तन सामने आये हैं। रामदयाल मुंडा की कविता पुस्तकें ‘नदी और उसके संबंधी और अन्य नगीत‘ और ‘वापसी, पुर्नमिलन और अन्य नगीत‘ की अन्तर्वस्तु से लेकर ट्रीटमेंट तक में जमीन से लेकर आसमान जैसा अन्तर दिखता है। इस दिशान्तर को अगर कोई नाम देना हो तो कहेंगे कि मुंडा जी ने सदाबहार रूमानी रुझान की बिदाई के बाद सामयिक चुनौतियों के दबाव में देशकाल से यथार्थपरक नाता जोड़ा था। बाद के समय में जसिन्ता केरकेट्टा के कविकर्म में परिपार्श्व से अन्तःक्रिया के समान्तर राजनीतिक विवेक का उद्घोष भी सामने आया। विवेक और संवेदना की यह कौंध अनुज लुगुन की रचनाशीलता में मुखर होती दिखी। अगर पीढ़ियों के अन्तराल की ओर मुखातिब होना चाहें तो दिखेगा कि कविता की अन्तर्वस्तु के स्तर पर निर्मला पुतुल से लेकर सरिता सिंह बड़ाइक तक बरास्त ग्रेस कुजूर, वंदना टेटे और महादेव टोप्पो में प्रकृति, परिवेश और परिवार से सहज मानवीय जुड़ाव के साथ बाहरी दखलंदाजी के प्रति आक्रोश और प्रतिरोध की मनःस्थितियां भी बारबार आवाजाही कर रही हैं। इसी तरह, बदलाव की दृष्टि से समग्रता में देखें तो हिन्दी संसार में आदिवासी कलम की धार समय की शिला पर घिसते हुए बहुत नुकीली हो चुकी है। बेशक अबतक कविता की विधा आदिवासी मानस की सर्वाधिक मुखर अभिव्यक्ति बनी हुई है, शेष प्रतिपूर्ति के लिए अनवरत हो रहे विमर्शपरक लेखन की टेक अनिवार्य है। इस निष्कर्ष की प्रासंगिक विवेचना के लिए न सामग्री की कमी है, न उद्धरणों की।

000

मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

एक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले

 एक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले।

मैंने मंजिल को तलाशा मुझे बाज़ार मिले।।


रामावतार त्यागी के इस गीत को अधिकांश लोगों ने सुना है। मैं भी इस गीत को बचपन से सुनता आ रहा हूँ। वेदना का यह गीत घोर निराशा से आशा की ओर ले जाता है। फिल्म ‘ज़िंदगी और तूफ़ान’ (1975) के इस गीत में विशेष बात यह रही कि इसमें कवि रामावतार त्यागी ने जीवन की उस सच्चाई का प्रदर्शन किया है, जिसे स्वीकारने से तत्कालीन समाज डरता रहा।

कवि रामावतार त्यागी के समय के साहित्य की बात करें तो सन् 1936 ई. के आस-पास कविता में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक शोषण से मुक्ति का स्वर अभिव्यक्त होने लगा था। इसी नवीन धारा को प्रगतिवाद नाम दिया गया। जिसका प्रारंभ पंत व निराला ने किया। यह कविता व्यक्तिवाद, कलावाद के कारण चर्चा में रहीं। परंतु कवि रामावतार त्यागी ने जिस शैली को अपनाया वह आम पाठक की समझ में खूब आती थी।

कवि रामावतार त्यागी की लगभग पंद्रह पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनकी कुछ कविताएँ एनसीईआरटी के हिंदी पाठ्यक्रम में भी शामिल की गईं। उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षा के कक्षा आठ के पाठ्यक्रम में भी उनकी ‘समर्पण’ नामक कविता शामिल है। यही नहीं बल्कि उनके जीवन की खास बात यह भी रही कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा ने उन्हें राजीव गांधी और संजय गांधी हिंदी वाचन के लिए निजी शिक्षक भी नियुक्त किया। घर की रूढ़िवादिता से विद्रोह कर त्यागी ने अत्यंत विषम परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की।

अंत में दिल्ली आकर इन्होंने वियोगी हरि और महावीर अधिकारी के साथ संपादन कार्य किया। त्यागी पीड़ा के कवि हैं। इनकी शब्द-योजना सरल तथा अनुभूति गहरी है। इनका कविता संग्रह ‘आठवाँ स्वर’ पुरस्कृत है। उन्होंने नवभारत टाइम्स के लिए एक क्राइम रिपोर्टर के रूप में काम किया। उन्होंने साप्ताहिक लेख ‘मलूक दास की क़लम से’ भी लिखा।

यह महान कवि 12 अप्रैल सन 1985 को इस नश्वर दुनिया को छोड़ सदा के लिए चला गया। वह देशप्रेमी कविताएँ भी खूब लिखते थे। उनकी ‘समर्पण’ कविता विभिन्न पाठ्यक्रम में शामिल की गई है। कविता का पाठ करते-करते मन में जो देशभावना उमड़ती है वह देखने लायक होती है- तन समर्पित मन समर्पित / और यह जीवन समर्पित / चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ 

उन्होंने जितना प्रेम अपने गाँव को किया उससे कहीं अधिक अपने देश को भी किया। प्रकृति प्रेम उनके साहित्य में स्पष्ट झलकता है तो सामाजिक ताने-बाने को भी उन्होंने अपने साहित्य की विषयवस्तु बनाया है। किंतु दुःख का विषय है कि रामावतार त्यागी जैसे महान साहित्यकार और उनके साहित्य पर अभी आवश्यक प्रकाश नहीं डाला गया है। ऐसे में रामावतार त्यागी के व्यक्तित्व एवं उनके कृतित्व पर शोधपूर्ण अध्ययन की आवश्यकता है।


विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें -

 ‘शोधादर्श’ 

(संदर्भित एवं समीक्षित शोध आलेखों की त्रैमासिक पत्रिका) का अंक 

(मार्च - मई, 2022)

RNI- UPHIN/2018/77444

ISSN 2582-1288

मूल्य- 200 रुपए

अमन कुमार

मोबा.- 9897742814

20 अप्रैल से सभी के लिए उपलब्ध


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

किससे किससे दूर करोगे / अनंग

 *"संभलना सीखा"*

. 

हमको  क्या  मजबूर करोगे।

किससे - किससे दूर करोगे।।


जब  देखो  तब  मेरी  चर्चा।

अब कितना मशहूर करोगे।।


इतना हमको याद करो मत।

लगता   है   मगरुर  करोगे।।


कहीं   बुराई  कहीं   दुहाई।

अपने दिल को चूर करोगे।।


खुशियां देकर खुश हो जाओ।

नया  -  नया   दस्तूर  करोगे।।


जान  लगाकर  पीछे  खींचो।

एक दिन तुम्हीं गुरूर करोगे।।


अब आदत से बाज तो आओ।

कितना  अधिक कसूर करोगे।।


चुगली हुईं संभालना सीखा।

भ्रम  में   हो   बेनूर   करोगे।।...*"अनंग"*

रवि अरोड़ा की नजर से....

 कहां लिखा हैं / रवि अरोड़ा 


 

हालांकि धर्म कर्म में अपना हाथ जरा हल्का है मगर फिर भी धार्मिक स्थलों पर आना जाना लगा ही रहता है । हाल ही में मित्रों के साथ वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर भी गया था । वैसे तो पहले भी कई बार वहां गया हूं मगर इस बार का अनुभव ऐसा रहा कि फिर वहां जाने की तौबा ही कर ली है । वृंदावन में बंदर चश्मे , मोबाइल फोन और पर्स आदि लूट लेते हैं और फिरौती वसूलने के बाद ही वापिस करते हैं , यह तो पता था मगर कभी झेला नहीं था । इस बार झेला तो उन तीर्थयात्रियों का दर्द महसूस हुआ जो इस लूट का शिकार रोज़ होते हैं । वृंदावन ही क्यों अन्य धार्मिक स्थलों और दिल्ली समेत तमाम बड़े शहरों की भी तो यही गाथा है । बंदरों का आतंक पूरे मुल्क में है । बंदरों की लूटपाट और अपने घर में गमलों और कपड़ों को तहस नहस करने का गवाह तो मैं खुद आए दिन बनता हूं । 


वृंदावन भ्रमण के दौरान बंदरों से बचाने की गर्ज से इस बार भी मैंने अपना चश्मा, मोबाइल फोन और पर्स भीतरी कपड़ों में छुपा लिए थे । कुल मिला कर लगभग एक घंटा इस धार्मिक नगरी में रहा मगर भरपूर असुविधा के बावजूद चश्मा जेब से नहीं निकाला । मगर वापसी में कार में बैठते समय तो चश्मा निकालना ही था । बस इसी पल एक बंदर आया और चश्मा झपट कर ले गया । आसपास खड़े एक दो लोगों ने फ्रूटी लाने की सलाह दी और हम लोग दौड़ कर लाए भी मगर तब तक बंदर नाराज़ हो चुका था और उसने मेरा महंगा चश्मा अपने पैने दांतों से चूर चूर कर दिया । दुखी मन वृंदावन से लौटने पर मैंने अपने परिचित वहां के एक गोस्वामी जी को फोन किया और जानना चाहा कि यह सारा माजरा क्या है ? उनके द्वारा बताई गई बातें बेहद चौंकाने वाली थीं । गोस्वामी जी ने बताया कि सवा लाख की आबादी वाले वृंदावन में साठ हजार से अधिक बंदर हैं । उन बंदरों में से कुछ बंदर ही झपटमार हैं और वे भी कुछ दुकानों के नियमित कर्मचारी की तरह काम करते हैं । सामान झपटने वाली सभी जगह वही हैं जहां कोई दुकानदार फ्रूटी बेच रहा होता है । बंदर से सामान वापिस दिलवाने वाला कोई स्थानीय व्यक्ति भी वहीं खड़ा आपको मिल जायेगा जो बंदर को फ्रूटी देकर आपका सामान वापिस दिलवाएगा । महंगा सामान वापिस मिलने पर आप उस व्यक्ति को स्वेच्छा से जो नज़राना देंगे , उसमें भी दुकानदार का हिस्सा होता है । बेशक शुरू शुरू में स्थानीय लोग इसे खेल तमाशा समझ कर कुछ नहीं कहते थे मगर अब सभी तंग आए हुए हैं । बंदरों के खौफ से सभी को अपने घरों में लोहे के बड़े बड़े जाल लगवाने पड़ रहे हैं । बंदरों के खौफ से छत से गिर कर अथवा उनके द्वारा काटे जाने से हर साल कई लोग मर भी रहे हैं । इलाके के हर चुनाव में बंदरों का आतंक बड़ा मुद्दा रहता है मगर धार्मिक संगठनों , दुकानदारों और कुछ धर्मभीरू लोगों के कारण अभी तक कोई समाधान नहीं हो पाया है । 


वैसे तो इस मुल्क में इतनी समस्याएं हैं कि उसने समक्ष बंदर जैसे मुद्दे पर बात करना अजीब लगता है मगर फिर भी हमें यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि बेशक छोटी सही मगर ये बंदर भी हमारे शहरों की एक समस्या हैं । यह समस्या नहीं होते तो संसद में इस पर कई बार चर्चा नहीं हुई होती । स्वयं उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने संसद में इनके बाबत अपना दुखड़ा न रोया होता । सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजों को इस बंदरों से बचाने के लिए टेंडर न निकाला होता । राष्ट्रपति भवन और संसद समेत पूरे लुटियंस जोन को बंदरों से बचाने को लंगूरों की तैनाती न करनी पड़ती । कमाल है हमारे बड़े बड़े लोग इन बंदरों से त्रस्त हैं मगर इनके खिलाफ कुछ ठोस करने का साहस नहीं करते । माना हमारे धर्म ग्रंथों में बंदरों का जिक्र है मगर ये बंदर हमारा जीना दूभर कर दें , यह तो कहीं नहीं लिखा ।



कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...