एक स्त्री जब खामोश होती है
.....................................
देव औरंगाबाद बिहार 824202 साहित्य कला संस्कृति के रूप में विलक्ष्ण इलाका है. देव स्टेट के राजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह किंकर अपने जमाने में मूक सिनेमा तक बनाए। ढेरों नाटकों का लेखन अभिनय औऱ मंचन तक किया. इनको बिहार में हिंदी सिनेमा के जनक की तरह देखा गया. कामता प्रसाद सिंह काम और इनकi पुत्र दिवंगत शंकर दयाल सिंह के रचनात्मक प्रतिभा की गूंज दुनिया भर में है। प्रदीप कुमार रौशन और बिनोद कुमार गौहर की भी इलाके में काफी धूम रही है.। देव धरती के इन कलम के राजकुमारों की याद में .समर्पित हैं ब्लॉग.
.....................................
हमरी निसानी ढाँप के रखियो,
जाको तमासो मत बनवईयो
सावन में रपटन होवत है
ताल तलैयन पर मत जइयो
हम जावत हैं कंडा थापन
पीछे पीछे मत आ जइयो
प्रेम का बिरवा सूख न जाये
पानी वानी देवत रहियो प्रेम
ऐसे ही अच्छे लागत हो
मजनू फजनू मत बन जइयो
हमरे दिखैया आवन लागे
तुम खेतन पर सोवत रहियो
चंपा हमरी पक्की दुश्मन,
बाकी बातन में मत अइयो,
हमका औरन से का मतबल,
कालिया मच्छी तुम मत खइयो
भौजी तो अपने माईं हैं
महतारी से बच के रहियो
नैन लडावन में कुछ न है
खोट नजर में मत ले अइयो
कोई ततैया जब रपटावे
हमरी चुनरी में डुक जइयो
हमरो बियानो जेब मे धर के,
और कहीं पर मत बिक जइयो,
आलोचना की नवल शैली चली है
कुछ लोचनों को रचना खली है
कुछ पालतू हैं, बाकी फालतू हैं
भले हैं वे जिनकी दाल गली है.
पेपरबैकd
*बचपन की यादें,*
*भाई-बहनों के संग,*
*आंगन में भीगना,*
*दौड़ना और फिसलकर गिरना,*
*जब तक बारिश रहे,*
*तब तक नहीं अंदर आना,*
*फिर माँ की वो,*
*प्यार से भरी झिड़की,*
*अपने हाथों से उसका,*
*हम सबके सिर पोंछना,*
*फिर हल्दी वाला,*
*गर्म दूध देना,*
*कौन ज़्यादा भीगा,*
*और किसने की,*
*ज़्यादा मस्ती,*
*इस बात पर,*
*सोने तक बहस करना,*
*और फिर,*
*अगली बारिश का,*
*इंतज़ार करना।*
*कुछ बूंदें लाई हैं,*
*जब बारिश में,*
*स्कूल की छुट्टी होना,*
*अपने बस्ते को,*
*रखकर अपने सिर पर,*
*भीगते हुए,*
*संग मित्रों के,*
*अपने घर आना,*
*फिर वही माँ की,*
*वो प्यारी झिड़की,*
*फिर वही,*
*हल्दी वाला,*
*गर्म दूध पीना।*
*कुछ बूंदें लाई हैं,*
*कॉलेज की,*
*यादों को भी,*
*वो बारिश में,*
*लेक्चर हॉल की,*
*टूटे कांच वाली,*
*खिड़की से,*
*लेक्चर हॉल में,*
*पानी भरना,*
*और फ़िर,*
*टीचर का,*
*मुस्कुराते हुए,*
*उस दिन का,*
*लेक्चर कैंसिल करना,*
*साथ यारों के,*
*फिर बाहर जाना,*
*बड़े तालाब के,*
*किनारे बैठना,*
*और कैंटीन के,*
*गर्म समोसे खाना।*
*कुछ बूंदें लाई हैं,*
*वो यादें भी,*
*संग वो अपनी,*
*प्रियतमा के,*
*भीगते हुए,*
*सड़क पर चलना,*
*छतरी टूटी है,*
*ये सब से कहना,*
*और फिर धीरे से,*
*उसका वो,*
*हाथ नाज़ुक सा,*
*अपने हाथों में,*
*थामने की,*
*कोशिश करना,*
*"कोई देख लेगा",*
*धीरे से,*
*उसका कहना,*
*और फिर,*
*हाथ छुड़ा लेने की,*
*कोशिश करना,*
*मगर ना छूटे हाथ,*
*दिल में यह,*
*ख़्वाहिश करना,*
*कुछ बूंदें लाई हैं,*
*उन यादों को भी,*
*बच्चों को बारिश में,*
*उनके स्कूल से,*
*घर पर लाना,*
*फिर बदल कर,*
*उनके वो गीले कपड़े,*
*उन्हें रूम हीटर के,*
*पास बैठा कर,*
*वो बातें करना।*
*कुछ बूंदें लाई हैं,*
*वो यादें भी,*
*जब काम से,*
*लौटते समय पर,*
*मूसलाधार बारिश का आना,*
*घर पहुँचते ही,*
*प्याज़ के पकोड़ों की,*
*वो ख़ुशबू आना,*
*और फिर साथ,*
*बैठकर सबके,*
*संग वो,*
*तीखी हरी चटनी के,*
*प्याज़ के,*
*गर्म पकोड़े खाना।*
*कुछ बूंदें लाई हैं,*
*वो यादें भी,*
*जब बच्चों के,*
*कॉलेज से,*
*आने के समय,*
*अचानक तेज,*
*बारिश का आना,*
*वो घर आ जायें,*
*सुरक्षित अपने,*
*यही भगवान से,*
*प्रार्थना करना,*
*उनके आने पर,*
*"आगे मत भीगना"*
*नसीहत देना,*
*"अब मैं बच्चा नहीं हूँ"*
*यह उनका कहना!*
*आज फिर,*
*हो रही है,*
*तेज़ बारिश, पर,*
*मैं बैठा हूँ,*
*पास खिड़की के,*
*बच्चे रहते हैं,*
*कहीं और,*
*संग उनके,*
*परिवार के,*
*पत्नी कहती है,*
*"खाओगे प्याज़ के पकोड़े क्या?"*
*मैं "नहीं" कहता हूँ,*
*फिर उठकर,*
*जाता हूँ,*
*किचन में अपने,*
*और बनाता हूँ,*
*पकोड़े ख़ुद ही,*
*और देता हूँ*
*जब मैं पत्नी को,*
*उसकी आँखों में,*
*झलकती हैं,*
सलाह तो ठीक थी लेकिन सब्जेक्ट...?
गुरुवर ने सुझाया "हिंदी, इंग्लिश लिटरेचर के अलावा दर्शनशास्त्र ले सकते हो..."
खैर... गुरुवर की इस तस्वीर से तमाम लोग वाक़िफ होंगे, लेकिन मैं आता हूं अब दूसरी बात पर...।
हमारे सिलेबस में कहानी और उपन्यास भी शामिल थे। एक दिन गुरुवर ने सिलेबस में लगी एक कहानी पढ़ कर आने को कहा।
घर पहुंचकर कहानी कई बार पढ़ी। हर बार सिर के ऊपर से गुज़र गई।
गुरुवर से बहुत लंबा नाता रहा।
------------------
*कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर* *दादा जी से पूछा* *कि पहले लोग बहुत कम* *बीमार होते थे ?* *तो...