मंगलवार, 5 जुलाई 2022

छतरियाँ हटा के / शशि कान्त सोनी

 *छतरियाँ हटा के*

*मिलिए इनसे,*

*ये जो बूंदें हैं*

*बहुत दूर से आई हैं...*


*कुछ बूंदें लाई हैं,*

*बचपन की यादें,*

*भाई-बहनों के संग,*

*आंगन में भीगना,*

*दौड़ना और फिसलकर गिरना,*

*जब तक बारिश रहे,*

*तब तक नहीं अंदर आना,*

*फिर माँ की वो,*

*प्यार से भरी झिड़की,*

*अपने हाथों से उसका,*

*हम सबके सिर पोंछना,*

*फिर हल्दी वाला,*

*गर्म दूध देना,*

*कौन ज़्यादा भीगा,*

*और किसने की,* 

*ज़्यादा मस्ती,*

*इस बात पर,*

*सोने तक बहस करना,*

*और फिर,*

*अगली बारिश का,*

*इंतज़ार करना।*


*कुछ बूंदें लाई हैं,*

*जब बारिश में,*

*स्कूल की छुट्टी होना,*

*अपने बस्ते को,*

*रखकर अपने सिर पर,*

*भीगते हुए,*

*संग मित्रों के,*

*अपने घर आना,*

*फिर वही माँ की,*

*वो प्यारी झिड़की,*

*फिर वही,*

*हल्दी वाला,*

*गर्म दूध पीना।*


*कुछ बूंदें लाई हैं,*

*कॉलेज की,*

*यादों को भी,*

*वो बारिश में,*

*लेक्चर हॉल की,*

*टूटे कांच वाली,*

*खिड़की से,*

*लेक्चर हॉल में,*

*पानी भरना,*

*और फ़िर,*

*टीचर का,* 

*मुस्कुराते हुए,*

*उस दिन का,*

*लेक्चर कैंसिल करना,*

*साथ यारों के,*

*फिर बाहर जाना,*

*बड़े तालाब के,*

*किनारे बैठना,*

*और कैंटीन के,*

*गर्म समोसे खाना।*


*कुछ बूंदें लाई हैं,*

*वो यादें भी,*

*संग वो अपनी,*

*प्रियतमा के,*

*भीगते हुए,*

*सड़क पर चलना,*

*छतरी टूटी है,*

*ये सब से कहना,*

*और फिर धीरे से,*

*उसका वो,*

*हाथ नाज़ुक सा,*

*अपने हाथों में,*

*थामने की,*

*कोशिश करना,*

*"कोई देख लेगा",*

*धीरे से,*

*उसका कहना,*

*और फिर,*

*हाथ छुड़ा लेने की,*

*कोशिश करना,*

*मगर ना छूटे हाथ,*

*दिल में यह,* 

*ख़्वाहिश करना,*


*कुछ बूंदें लाई हैं,*

*उन यादों को भी,*

*बच्चों को बारिश में,*

*उनके स्कूल से,*

*घर पर लाना,*

*फिर बदल कर,*

*उनके वो गीले कपड़े,*

*उन्हें रूम हीटर के,*

*पास बैठा कर,*

*वो बातें करना।*


*कुछ बूंदें लाई हैं,*

*वो यादें भी,*

*जब काम से,*

*लौटते समय पर,*

*मूसलाधार बारिश का आना,*

*घर पहुँचते ही,*

*प्याज़ के पकोड़ों की,*

*वो ख़ुशबू आना,*

*और फिर साथ,*

*बैठकर सबके,*

*संग वो,*

*तीखी हरी चटनी के,*

*प्याज़ के,*

*गर्म पकोड़े खाना।*


*कुछ बूंदें लाई हैं,*

*वो यादें भी,*

*जब बच्चों के,*

*कॉलेज से,*

*आने के समय,*

*अचानक तेज,*

*बारिश का आना,*

*वो घर आ जायें,*

*सुरक्षित अपने,*

*यही भगवान से,*

*प्रार्थना करना,*

*उनके आने पर,*

*"आगे मत भीगना"*

*नसीहत देना,*

*"अब मैं बच्चा नहीं हूँ"*

*यह उनका कहना!*


*आज फिर,*

*हो रही है,*

*तेज़ बारिश, पर,*

*मैं बैठा हूँ,*

*पास खिड़की के,*

*बच्चे रहते हैं,*

*कहीं और,*

*संग उनके,*

*परिवार के,*

*पत्नी कहती है,*

*"खाओगे प्याज़ के पकोड़े क्या?"*

*मैं "नहीं" कहता हूँ,*

*फिर उठकर,*

*जाता हूँ,*

*किचन में अपने,*

*और बनाता हूँ,*

*पकोड़े ख़ुद ही,*

*और देता हूँ*

*जब मैं पत्नी को,*

*उसकी आँखों में,*

*झलकती हैं,*

*प्यार की नम बूंदें,*

*बस उनमें ही,*

*भीग जाता हूँ,*

*और बारिश में,*

*भीग जाने का,*

*वो अहसास,*

*पा जाता हूँ,*

*लेकिन डरता हूँ,*

*कल अगर हम,*

*बिछड़ गए,*

*जो कहीं तो फ़िर,*

*कौन मेरे लिए,*

*या मैं किसके लिए,*


*बनायेगा पकोड़े फिर,*

*फिर किसके साथ,*

*भीगूंगा बारिश में,*

*फिर झिड़क देhता हूँ,*

*इस ख़्याल को मैं,*

*और पत्नी को,*

*अपने हाथों से,*

*खिलाता हूँ,*

*इक पकोड़ा मैं।*



*_शशि कान्त सोनी _*

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